सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

बरगद पेड़ के चमत्कारिक कर देंनें वालें फायदे जानकर हैरान रह जायेंगें bargad ped KE fayde in Hindi

बरगद पेड़ Bargad ped सम्पूर्ण भारतवर्ष सहित सम्पूर्ण एशिया यूरोप अफ्रीका अमेरिका आदि  में पाया जाता हैं। यह पेड़ बहुत ही विशाल पेड़ होता हैं ।

बरगद का पेड़
 बरगद पेड़

बरगद पेड़ की उम्र बहुत लम्बी होती हैं ,इसकी लम्बी लम्बी झूलेनुमा शाखाओं के इर्द गिर्द कितनें ही लोगों के बचपन गुजरें हैं यहाँ तक की कई बुजुर्ग अपनें नाती पोतों को पुरानी यादों को यादकर  बतातें मिल जातें हैं कि फला बरगद के पेड़ निचें मेरें दादा जी भी झूला झूलतें थे और यह बरगद का पेड़ आज भी वैसा ही सीना तानकर खड़ा हैं जैसें मेरें बचपन के दिनों में खड़ा रहता था ।


बरगद के पेड़ के तनें की चोड़ाई 50 फुट से लेकर 60 फुट हो सकती हैं । इसके पत्तें मोटें और दिल की आकृति के होतें हैं । जिनकों तोड़नें पर दूध निकलता हैं ।



बरगद के फल लाल रंग के होतें हैं । तथा इसके तनों से लम्बी लम्बी जटायें निकलती हैं। 


बरगद पेड़ का संस्कृत नाम bargad tree Sanskrit name 



बरगद पेड़ को संस्कृत में वटवृक्ष ,शुंगी,स्कन्धज,क्षीरी,यमप्रिय,नामों से पुकारा जाता हैं ।



बरगद पेड़ का हिन्दी नाम



बड़,बरगद



बरगद पेड़ का अंग्रेजी नाम bargad tree English name


बरगद पेड़ को अंग्रेजी में "BANYAN TREE" के नाम से जानतें हैं ।



बरगद पेड़ का लेटिन नाम letin name banyan tree 



  बरगद पेड़ का लेटिन नाम    ficus bengalensis फायकस बेेंंगलेनसिन्स  हैं ।



बरगद पेड़ की प्रकृति :::



आयुर्वेद मतानुसार बरगद पेड़ कसेला ,मधुर ,तथा शीतल होता हैं । यह पित्त का शमन करनें वाला पेड़ हैं ।



बरगद पेड़ के चमत्कारिक फायदे :::

1.गठिया रोग पर :::

गठिया रोग में बरगद पेड़ के पत्ते गर्म करके जोड़ों पर बाँधनें से गठिया के दर्द में आराम मिलता हैं ।

इसी प्रकार बरगद पेड़ का दूध गर्म कर जोड़ों पर मालिश करनें से गठिया ठीक हो जाता हैं किन्तु इस प्रयोग में रोगी अपनी प्रकृति को ध्यान रखे । शीत प्रकृति के लोग यह प्रयोग न करें ।




2.मधुमेह रोग में बरगद पेड़ के फायदे :::


बरगद पेड़ की छाल का क्वाथ मधुमेह रोग पर बहुत ही ज्यादा फायदेमंद होता हैं । इसके क्वाथ से पेशाब में शक्कर जाना बंद हो जाता हैं । 

बरगद पेड़ की के पत्तों की कोपल खानें से मधुमेह की बीमारी नही होती हैं ।



3.दाँत दर्द और मसूड़ों की सूजन :::



बरगद पेड़ की छाल का क्वाथ बनाकर कुल्ला करनें से मसूड़ों की सूजन समाप्त हो जाती हैं ।


इसी प्रकार इसके दूध को दर्द करनें वालें दांतों पर लगानें से दांतदर्द मिट जाता हैं ।


4.पैशाब की जलन :::

गर्मीयों में पेशाब की जलन एक आम समस्या हो जाती हैं । यदि आपके आस पास बरगद का पेड़ हैं तो 5 ग्राम इसकी लटकती हुई जटाओं को तोडकर पानी के साथ पीस लें और छानकर पी ले इससे पेशाब की जलन मिट जाती हैं ।



5.उल्टी होनें पर 


लगातार उल्टी हो रही हो तो इसकी जटाओं को मिश्री के साथ मिलाकर उल्टी करनें वालें व्यक्ति को खिला दें उल्टी में तुरंत ही आराम मिल जाता हैं । 




6.रक्तप्रदर में :::



बरगद पेड़ के चार पाँच बूंद दूध को प्रतिदिन लेनें से रक्तप्रदर में राहत मिलती हैं । 




7.त्वचा के रोगों में :::


बरगद पेड़ का दूध त्वचा रोगों जैसे फोड़े फुन्सी और खुजली का रामबाण इलाज हैं । इसके दूध को प्रभावित स्थान पर लगानें से बहुत आराम मिलता हैं ।

इसी प्रकार यदि त्वचा जल जायें तो इसके सूखे पत्तों की भस्म बनाकर गाय के दही को मिलाकर  प्रभावित स्थान पर लगानें से जलनें के बाद होनें वाले फफोलें नही होतें हैं ।




8.दस्त लगनें पर :::



बरगद के पेड़ के दूध को नाभि में लगानें से दस्त बंद हो जातें हैं । 



9.पैरों की बिवाई :::



बरगद पेड़ की जड़ को कूटकर फटी हुई एड़ियों पर लगानें से फटी हुई एडियाँ ठीक हो जाती हैं ।




10.फोडें फुन्सी में :::


बरगद के पत्तों को पीसकर शहद मिला लें और इसे फोडे फुन्सी पर लेप कर दें । लम्बे समय से ठीक नही हो रहें फोडे फुन्सी भी ठीक हो जायेंगें ।


शरीर पर अंधफोड़ा हो जानें पर बरगद के पत्तों को हल्दी और तेल के साथ गर्म कर अंधफोडे पर बाँधनें से फोड़ा फुट जाता हैं और सारा मवाद बाहर निकल जाता हैं ।


यदि शरीर पर कही चोंट लगी हैं जिसमें टांके लगानें की आवश्यकता महसूस हो रही हो तो त्वचा को मिलाकर बरगद के पत्ते उस चोंट पर रखकर कसकर बाँध दें ,2 - 3 दिन बाद इस बंध को खोलें ,चोंट पूरी तरह ठीक हो जायेगी और टांके लगानें की जरूरत भी नही पडेगी ।



11.सेक्स पावर   sex power :::


बरगद पेड़ का तीन चार बूंद दूध पतासे के साथ  रात को सोनें से एक घंटा पहले लेनें से पुरूष सेक्स समस्या जैसें लिंग में उत्तेजना नही होना,सेक्स की इच्छा न होना ,वीर्य जल्दी स्खलित  हो जाना, समाप्त हो जाती हैं ।



12.गंजापन दूर करता हैं :::



बरगद पेड़ के पत्तों को जलाकर राख बना लें इस राख को अलसी के तेल में मिलाकर गंजे सिर पर लगानें से गंजापन धिरें - धिरें समाप्त हो जाता हैं । 

और यदि बाल झड रहें हैं तो बालों का झडना बंद हो जाता हैं ।



13.एडी की हड्डी बढना :::


बरगद पेड़ के पत्तों को रात को सोतें समय एडी पर बाँधनें से एडी की हड्डी बढ़ना रूक जाता हैं ।



14.कानदर्द में :::


बरगद पेड़ के दूध की तीन चार बूंद कानदर्द होनें पर कान में डालनें से कानदर्द में आराम मिलता हैं ।



15.तनाव अनिद्रा होनें पर :::


बरगद पेड़ के पके फलों का सेवन करनें से तनाव अनिद्रा जैसी समस्या समाप्त हो जाती हैं । इसके लियें इसके एक दो पके फल रात को सोतें समय दूध के साथ सेवन करें ।


बरगद पेड़ के निचें कुछ देर ध्यान ,प्राणायाम करनें से मन को असीम शाँति का अनुभव होता हैं यही कारण हैं कि प्राचीन समय में साधु संत ध्यान के लिये बरगद पेड़ को चुनते थे ।

इसी प्रकार गाँव के बीचों बीच बरगद का पेड़ लगाया जाता था। जहाँ चौपाल लगाकर बैठक होती थी । और गाँव के सारे लड़ाई झगड़े शांतिपूर्वक बरगद पेड़ के निचें ही सुलझाये जाते थे ।

० वात पित्त और कफ प्रकृति के लक्षण

टिप्पणियां

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

टीकाकरण चार्ट [vaccination chart] और संभावित प्रश्न

 टीकाकरण चार्ट # 1.गर्भावस्था के समय टीकाकारण ::: गर्भावस्था की शुरूआत में Titnus का पहला टीका टी.टी - 1. टी.टी -1 के चार सप्ताह बाद टी.टी.-2 यदि पिछली गर्भावस्था में टी.टी - 2 दिया गया हैं,तो केवल बूस्टर दीजिए. ० गर्भावस्था के प्रथम तीन महिनें मे किए जानें वाले योगासन # टीके की मात्रा ,कैसें और कहाँ दें 0.5 ml.मात्रा प्रशिक्षित व्यक्ति द्धारा ऊपरी बांह की मांसपेशी में. # महत्वपूर्ण गर्भावस्था के 36 सप्ताह हो गयें हो तो मात्र टी.टी.- बूस्टर देना चाहियें.  टीकाकरण का दृश्य # 2.शिशुओं के लियें टीकाकरण  #जन्म के समय ::: 1. B.C.G.  =     0.1 ml बाँह पर त्वचा के निचें. 2.हेपेटाइटिस बी.=  0.5 ml मध्य जांघ के बाहरी हिस्सें पर मांसपेशी में 3.o.p.v.या oral polio vaccine = दो बूँद मुहँ में . ///////////////////////////////////////////////////////////////////////// ० आँखों का सूखापन क्या बीमारी हैं ? जानियें इस लिंक पर ०  जानिये पोलियो क्या होता हैं ? ० चुम्बक चिकित्सा के बारें में जानें ० बच्चों की परवरिश कैसें करें healthy parating

SANJIVANI VATI ,CHANDRAPRABHA VATI,SHANKH VATI

१.संजीवनी वटी::-   संजीवनी वटी का वर्णन रामायण में भी मिलता हैं. जब मेघनाथ के साथ युद्ध में लक्ष्मण मूर्छित हुए तो  संजीवनी  बूटी ने लक्ष्मण को पुन: जीवन दिया था शांग्रधर संहिता में वर्णन हैं कि  "वटी संजीवनी नाम्ना संजीवयति मानवम" अर्थात संजीवनी वटी नाना प्रकार के रोगों में मनुष्य का संजीवन करती हैं.आधुनिक शब्दों में यह वटी हमारें बिगड़े मेट़ाबालिज्म को सुदृढ़ करती हैं.तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता (immunity)   बढ़ाती हैं. घटक द्रव्य:: विडंग,शुंठी,पीप्पली,हरीतकी,विभीतकी, आमलकी ,वच्च, गिलोय ,शुद्ध भल्लातक,शुद्ध वत्सना उपयोग::- सन्निपातज ज्वर,सर्पदंश,गठिया,श्वास, कास,उच्च कोलेस्ट्रोल, अर्श,मूर्छा,पीलिया,मधुमेह,स्त्री रोग ,भोजन में अरूचि. मात्रा::- वैघकीय परामर्श से Svyas845@gmail.com २.चन्द्रप्रभा वटी::- चन्द्रप्रभेति विख्याता सर्वरोगप्रणाशिनी उपरोक्त श्लोक से स्पष्ट हैं,कि चन्द्रप्रभा वटी समस्त रोगों का शमन करती हैं. घट़क द्रव्य::- कपूर,वच,भू-निम्बू, गिलोय ,देवदारू,हल्दी,अतिविष,दारूहल्दी,

गेरू के औषधीय प्रयोग

गेरू के औषधीय प्रयोग गेरू के औषधीय प्रयोग   आयुर्वेद चिकित्सा में कुछ औषधीयाँ सामान्य जन के मन में  इतना आश्चर्य पैदा करती हैं कि कई लोग इन्हें तब तक औषधी नही मानतें जब तक की इनके विशिष्ट प्रभाव को महसूस नही कर लें । गेरू भी उसी श्रेणी की आयुर्वेद औषधी हैं । जो सामान्य मिट्टी से कही अधिक इसके विशिष्ट गुणों के लियें जानी जाती हैं । गेरू लाल रंग की की मिट्टी होती हैं जो सम्पूर्ण भारत में बहुतायत मात्र में मिलती हैं । इसे गेरू या सेनागेरू भी कहतें हैं । गेरू आयुर्वेद की विशिष्ट औषधी हैं जिसका प्रयोग रोग निदान में बहुतायत किया जाता हैं । गेरू का संस्कृत नाम  गेरू को संस्कृत में गेरिक ,स्वर्णगेरिक तथा पाषाण गेरिक के नाम से जाना जाता हैं । गेरू का लेटिन नाम  गेरू   silicate of aluminia  के नाम से जानी जाती हैं । गेरू की आयुर्वेद मतानुसार प्रकृति गेरू स्निग्ध ,मधुर कसैला ,और शीतल होता हैं । गेरू के औषधीय प्रयोग 1. आंतरिक रक्तस्त्राव रोकनें में गेरू शरीर के किसी भी हिस्से में होनें वाले रक्तस्त्राव को रोकनें वाली सर्वमान्य औषधी हैं । इसके लिय

एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन क्या हैं

#1.एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन क्या हैं ?  एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन प्रणाली से अभिप्राय यह हैं,कि मृदा उर्वरता को बढ़ानें अथवा बनाए रखनें के लिये पोषक तत्वों के सभी उपलब्ध स्त्रोंतों से मृदा में पोषक तत्वों का इस प्रकार सामंजस्य रखा जाता हैं,जिससे मृदा की भौतिक,रासायनिक और जैविक गुणवत्ता पर हानिकारक प्रभाव डाले बगैर लगातार उच्च आर्थिक उत्पादन लिया जा सकता हैं.   विभिन्न कृषि जलवायु वाले क्षेत्रों में किसी भी फसल या फसल प्रणाली से अनूकूलतम उपज और गुणवत्ता तभी हासिल की जा सकती हैं जब समस्त उपलब्ध साधनों से पौध पौषक तत्वों को प्रदान कर उनका वैग्यानिक प्रबंध किया जाए.एकीकृत पौध पोषक तत्व प्रणाली एक परंपरागत पद्धति हैं. ///////////////////////////////////////////////////////////////////////// यहाँ भी पढ़े 👇👇👇 विटामिन D के बारें में और अधिक जानियें यहाँ प्रधानमन्त्री फसल बीमा योजना ० तम्बाकू से होनें वाले नुकसान ० कृषि वानिकी क्या हैं ///////////////////////////////////////////////////////////////////////// #2.एकीकृत पोषक त

Ayurvedic medicine list । आयुर्वैदिक औषधि सूची

Ayurvedic medicine list  [आयुर्वैदिक औषधि सूची] #1.नव ज्वर की औषधि और अनुसंशित मात्रा ::: १.त्रिभुवनकिर्ती रस  :::::   १२५ से २५० मि.ग्रा. २.संजीवनी वटी       :::::    १२५ से २५० मि.ग्रा. ३.गोदन्ती मिश्रण.    :::::     १२५ से २५० मि.ग्रा. #2.विषम ज्वर ::: १.सप्तपर्ण घन वटी  :::::    १२५ से २५० मि.ग्रा. २.सुदर्शन चूर्ण.        :::::     ३ से ६ ग्रा.   # 3 वातश्लैष्मिक ज्वर ::: १.लक्ष्मी विलास रस.  :::::  १२५ से २५० मि.ग्रा. २.संशमनी वटी          :::::  ५०० मि.ग्रा से १ ग्रा. # 4 जीर्ण ज्वर :::: १. प्रताप लंकेश्वर रस.  :::::  १२५ से २५० मि.ग्रा. २.महासुदर्शन चूर्ण.     :::::   ३ से ६ ग्राम ३.अमृतारिष्ट              :::::    २० से ३० मि.ली. # 5.सान्निपातिक ज्वर :::: १.नारदीय लक्ष्मी विलास रस. :::::  २५० से ५०० मि.ग्रा. २.भूनिम्बादि क्वाथ.      ::::: १०से २० मि.ली. #6 वातशलैष्मिक ज्वर :::: १.गोजिह्यादि क्वाथ.      ::::: २० से ४० मि.ली. २.सितोपलादि चूर्ण.       ::

karma aur bhagya [ कर्म और भाग्य ]

# 1 कर्म और भाग्य   कर्म आगे और भाग्य पिछे रहता हैं अक्सर लोग कर्म और भाग्य के बारें में चर्चा करतें वक्त अपनें - अपनें जीवन में घट़ित घट़नाओं के आधार पर निष्कर्ष निकालतें हैं,कोई कर्म को श्रेष्ठ मानता हैं,कोई भाग्य को ज़रूरी मानता हैं,तो कोई दोनों के अस्तित्व को आवश्यक मानता हैं.लेकिन क्या जीवन में दोनों का अस्तित्व ज़रूरी हैं ? गीता में श्री कृष्ण अर्जुन को कर्मफल का उपदेश देकर कहतें हैं.     " कर्मण्यें वाधिकारवस्तें मा फलेषु कदाचन " अर्थात मनुष्य सिर्फ कर्म करनें का अधिकारी हैं,फल पर अर्थात परिणाम पर उसका कोई अधिकार नहीं हैं,आगे श्री कृष्ण बतातें हैं,कि यदि मनुष्य कर्म करतें करतें मर  जाता हैं,और इस जन्म में उसे अपनें कर्म का फल प्राप्त नहीं होता तो हमें यह नहीं मानना चाहियें की कर्म व्यर्थ हो गया बल्कि यह कर्म अगले जन्म में भाग्य बनकर लोगों को आश्चर्य में ड़ालता हैं, ]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]][]]]]]][[[[[[[]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]] ● यह भी पढ़े 👇👇👇 ● आत्मविकास के 9 मार्ग ● स्वस्थ सामाजिक जीवन के 3 पीलर

गिलोय के फायदे । GILOY KE FAYDE

  गिलोय के फायदे GILOY KE FAYDE गिलोय का संस्कृत नाम क्या हैं ? गिलोय का संस्कृत नाम गुडुची,अमृतवल्ली ,सोमवल्ली, और अमृता हैं । गिलोय का हिन्दी नाम क्या हैं ? गिलोय GILOY का हिन्दी नाम 'गिलोय,अमृता, संशमनी और गुडुची हैं । गिलोय गिलोय का लेटिन नाम क्या हैं ? गिलोय का लेटिन नाम Tinospra cordipoolia (टिनोस्पोरा  कोर्ड़िफोलिया ) गिलोय की पहचान कैसें करें ? गिलोय सम्पूर्ण भारत वर्ष में पाई जानें वाली आयुर्वेद की सुप्रसिद्ध औषधी हैं । Ayurveda ki suprasiddh oshdhi hai यह बेल रूप में पाई जाती हैं, और दूसरें वृक्षों के सहारे चढ़कर पोषण प्राप्त करती हैं । गिलोय के पत्तें दिल के (Heart shape) आकार के होतें हैं।  गिलोय का तना अंगूठे जीतना मोटा और प्रारंभिक   अवस्था में हरा जबकि सूखनें पर धूसर हो जाता हैं । गिलोय के फूल छोटे आकार के और हल्का पीलापन लियें गुच्छों में लगतें हैं । गिलोय के फल पकनें पर लाल रंग के होतें हैं यह भी गुच्छों में पाये जातें हैं । गिलोय में पाए जाने वाले पौषक तत्व 1.लोह तत्व : 5.87 मिलीग्राम 2.प्रोटीन : 2.3

म.प्र.की प्रमुख नदी [river]

म.प्र.की प्रमुख नदी [river]  म.प्र.भारत का ह्रदय प्रदेश होनें के साथ - साथ नदी,पहाड़,जंगल,पशु - पक्षी,जीव - जंतुओं के मामलें में देश का अग्रणी राज्य हैं.  river map of mp प्रदेश में बहनें वाली सदानीरा नदीयों ने प्रदेश की मिट्टी को उपजाऊ बनाकर सम्पूर्ण प्रदेश को पोषित और पल्लवित किया हैं.यही कारण हैं कि यह प्रदेश "नदीयों का मायका" उपनाम से प्रसिद्ध हैं. ऐसी ही कुछ महत्वपूर्ण नदियाँ प्रदेश में प्रवाहित होती हैं,जिनकी चर्चा यहाँ प्रासंगिक हैं. #१.नर्मदा नर्मदा म.प्र.की जीवनरेखा कही जाती हैं.इस नदी के कि नारें अनेक  सभ्यताओं ने जन्म लिया . #उद्गम  यह नदी प्रदेश के अमरकंटक जिला अनूपपुर स्थित " विंध्याँचल " की पर्वतमालाओं से निकलती हैं. नर्मदा प्रदेश की सबसे लम्बी नदी हैं,इसकी कुल लम्बाई 1312 किमी हैं. म.प्र.में यह नदी 1077 किमी भू भाग पर बहती हैं.बाकि 161 किलोमीटर गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र में बहती हैं. नर्मदा प्रदेश के 15 जिलों से होकर बहती हैं जिनमें शामिल हैं,अनूपपुर,मंड़ला,डिंडोरी,जबलपुर,न

पारस पीपल के औषधीय गुण

पारस पीपल के औषधीय गुण Paras pipal KE ausdhiy gun ::: पारस पीपल के औषधीय गुण पारस पीपल का  वर्णन ::: पारस पीपल पीपल वृक्ष के समान होता हैं । इसके पत्तें पीपल के पत्तों के समान ही होतें हैं ।पारस पीपल के फूल paras pipal KE phul  भिंड़ी के फूलों के समान घंटाकार और पीलें रंग के होतें हैं । सूखने पर यह फूल गुलाबी रंग के हो जातें हैं इन फूलों में पीला रंग का चिकना द्रव भरा रहता हैं ।  पारस पीपल के  फल paras pipal ke fal खट्टें मिठे और जड़ कसैली होती हैं । पारस पीपल का संस्कृत नाम  पारस पीपल को संस्कृत  में गर्दभांड़, कमंडुलु ,कंदराल ,फलीश ,कपितन और पारिश कहतें हैं।  पारस पीपल का हिन्दी नाम  पारस पीपल को हिन्दी में पारस पीपल ,गजदंड़ ,भेंड़ी और फारस झाड़ के नाम से जाना जाता हैं ।   पारस पीपल का अंग्रजी नाम Paras pipal ka angreji Nam ::: पारस पीपल का अंग्रेजी नाम paras pipal ka angreji nam "Portia tree "हैं । पारस पीपल का लेटिन नाम Paras pipal ka letin Nam ::: पारस पीपल का लेटिन paras pipal ka letin nam नाम Thespesia

भगवान श्री राम का प्रेरणाप्रद चरित्र [BHAGVAN SHRI RAM]

 Shri ram #भगवान श्री राम का प्रेरणाप्रद चरित्र रामायण या रामचरित मानस सेकड़ों वर्षों से आमजनों द्धारा पढ़ी और सुनी जा रही हैं.जिसमें भगवान राम के चरित्र को विस्तारपूर्वक समझाया गया हैं,यदि हम थोड़ा और गहराई में जाकर राम के चरित्र को समझे तो सामाजिक जीवन में आनें वाली कई समस्यओं का उत्तर उनका जीवन देता हैं जैसें ● आत्मविकास के 9 मार्ग #१.आदर्श पुत्र ::: श्री राम भगवान अपने पिता के सबसे आदर्श पुत्र थें, एक ऐसे समय जब पिता उन्हें वनवास जानें के लिये मना कर रहें थें,तब राम ही थे जिन्होनें अपनें पिता दशरथ को सूर्यवंश की परम्परा बताते हुये कहा कि रघुकुल रिती सदा चली आई | प्राण जाई पर वचन न जाई || एक ऐसे समय जब मुश्किल स्वंय पर आ रही हो  पुत्र अपनें कुल की परंपरा का पालन करनें के लिये अपने पिता को  कह रहा हो यह एक आदर्श पुत्र के ही गुण हैं. दूसरा जब कैकयी ने राम को वनवास जानें का कहा तो उन्होनें निसंकोच होकर अपनी सगी माता के समान ही कैकयी की आज्ञा का पालन कर परिवार का  बिखराव होनें से रोका. आज के समय में जब पुत्र अपनें माता - पिता के फैसलों