27 अप्रैल 2018

मध्यप्रदेश मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना [mukhyamantri gramin awas yojna]

मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना
 awas yojna

# मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना


मध्यप्रदेश की ग्रामीण आबादी 5 करोड़ 25 लाख हैं.जो कुल जनसँख्या का लगभग 72% हैं.इस आबादी में से 37 लाख परिवारों के पास अपना स्वंय का घर नहीं हैं या वे कच्चे मकानों में रहतें हैं,जहाँ जीवन की ज़रूरी सुविधाँए उपलब्ध नहीं हैं.

आवासहीन परिवारों को आवास उपलब्ध करवानें के लिये केन्द्र सरकार द्धारा राज्य को  प्रतिवर्ष 75 हजार इंदिरा आवास आवँटित किये जातें हैं,किंतु राज्य की बड़ी आवास ज़रूरत को ध्यान रखतें हुये यह आवास नाकाफी साबित होतें हैं.इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुये मध्यप्रदेश सरकार नें सन् 2012 - 13 में मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना प्रारंभ की गई थी.

# कार्यान्वयन विभाग


पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग म.प्र.शासन


# योजना की विशेषता 


मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना पूर्ण रूप से मांग आधारित स्वभागीदारी ऋण - सह - अनुदान योजना हैं.अर्थात इस योजना का लाभ उठाने वालें व्यक्ति को उसकी आय के आधार पर ॠण चुकानें की क्षमतानुसार बैंक द्धारा 10,12 और 15 वर्षीय ऋण प्रदान किया जाता हैं.

# मुख्यमंत्री आवास योजना हेतू पात्रता


• व्यक्ति को मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र का स्थायी निवासी होना अनिवार्य हैं.

• व्यक्ति के पास एक हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि नही होना चाहियें.

• परिवार की वार्षिक आय 1.25 लाख से अधिक नही होना चाहियें.

• योजना का लाभ लेनें वालें व्यक्ति के पास अपनी स्वंय की भूमि हो या वह भूमि खरीदनें की क्षमता रखता हो

# योजना का लाभ प्राप्त करनें हेतू आवश्यक दस्तावेज


• मतदाता पहचान पत्र
• गरीबी रेखा से निचें जीवन यापन संबधित राशन कार्ड़
• बैंक पासबुक
• भू - अधिकार पत्र
• मनरेगा जाब कार्ड


# मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना में आवेदन प्रक्रिया


• इस योजना का लाभ प्राप्त करनें हेतू आवेदन ग्राम पंचायत में प्रस्तुत करना होगा.

• आवेदन का परीक्षण पंचायत सचिव,पटवारी और पंचायत समन्वय अधिकारी द्धारा किया जायेगा.

• परीक्षण के पश्चात आवेदन को ग्राम सभा के अनुमोदनार्थ प्रस्तुत किया जावेगा.

• ग्राम सभा के अनुमोदन उपरांत बैंक में ऋण सहायता हेतू प्रस्तुत किया जायेगा.


# भूमि प्राप्त करनें के लिये आवेदन


यदि किसी व्यक्ति के पास मकान निर्माण के लिये भूमि उपलब्ध नही हैं और वह मकान बनाना चाहता हैं,तो उसे भूमि प्राप्त करनें हेतू ग्राम पंचायत में आवेदन करना होगा.

भावांतर भुगतान योजना के बारें में जानियें

# योजना की समीक्षा


कोई भी योजना पूर्णरूपेण खामी रहित नही होती हैं.यही बात मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना के सन्दर्भ में लागू होती हैं इसकी कुछ खामीयाँ हैं तो कुछ अच्छाईयाँ भी विघमान हैं आईयें जानतें हैं कमियों को

#१.योजना में पैसा बैंक द्धारा दिया जाता हैं,अत:हितग्राही को ऋण देना न देना पूरी तरह से बैंक के विवेक पर निर्भर करता हैं.

#२. बैंको द्धारा अपनें इस विशेषाधिकार का उपयोग सिर्फ अपनी बैंक शाखा के पास स्थित गाँवों के हितग्राही को ऋण बाँटनें में हुआ हैं,यह सीमा बैंक शाखा से मात्र 5 से 7 किमी के गाँवों के हितग्राही तक ही सीमित हैं.

#३.ऐसे गाँव जहाँ बैंक शाखा नही हैं या जिन गाँवों के पास बैंक शाखा स्थित नही हैं ,उन गाँवों के हितग्राहीयों को ऋण प्राप्त करनें में बहुत परेशानी आती हैं या यू कहें की ऋण मिलता ही नहीं हैं.

#३.ऋण प्राप्त करनें के लिये कागजी औपचारिकता इतनी अधिक हैं,कि हितग्राही बैंकों के और सरकारी दफ़्तर के चक्कर लगातें - लगातें ऋण प्राप्त करनें का फैसला ही त्याग देता हैं.

#४.मध्यप्रदेश मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना में आवेदन करनें वाले और अंतिम रूप से ऋण प्राप्त कर मकान बनानें वालों का अनुपात प्रति 100 आवेदन में से मात्र 25 हैं.

#५.इन 25 ऋण प्राप्त करनें वालों में भी 5 परिवार ऐसे हैं जिनकों बैंक की लापरवाही की वज़ह से मात्र एक किश्त की राशि ही मिल पाती हैं.और वे मकान का निर्माण पूर्ण नही कर पातें फलस्वरूप बैंक को ऋण वसूलनें में काफी परेशानी आती हैं.


#६.हितग्राही चयन में भारी भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद देखनें को मिलता हैं .एक अध्ययन के अनुसार अंतिम किश्त प्राप्त करनें तक हितग्राही औसतन 30 हजार रूपये रिश्वत के बाँट देता हैं,यह पैसा हितग्राही के पास नही होनें पर किश्त प्राप्त करनें के दोंरान बैंक मे ही ले लिया जाता हैं.

#७.इस योजना को लागू करनें से पूर्व क्षेत्र आधारित आवश्यकताओं का अध्ययन नही किया गया उदाहरण के लियें जहाँ रेत,गिट्टी आदि मकान निर्माण सामग्री आसानी से उपलब्ध हैं वहाँ भी इतना ही पैसा मंजूर किया जाता हैं,जितना कि इन सामग्री के अभाव वालें क्षेत्रों में

#८.योजना की मानिटरिंग सामान्य प्रशासनिक सेंवाओं के अधिकारीयों के हाथ में हैं जबकि इस योजना को शतप्रतिशत सफल होनें के लिये विशेषज्ञ अधिकारियों के हाथ में इस योजना का होना अतिआवश्यक हैं.

#९.भारत और मध्यप्रदेश की गरीबी रेखा को ध्यान में रखतें हुये गरीबों से संबधित योजना में शून्य प्रतिशत खामी होना आवश्यक हैं तभी हम भारत और मध्यप्रदेश को तय समयावधि में गरीबी मुक्त कर सकतें हैं.

वास्तव में मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना का उद्देश्य पवित्र हैं परंतु क्रियान्वयन ढ़ीला ढ़ाला हैं अत : आवश्यकता इस बात की हैं कि इस योजना के हितग्राही का चयन सिंगल विंड़ों सिस्टम की भाँति कुछ दिनों का कर दिया जावें ताकि हितग्राही लम्बें समय तक चलनें वाली झंझट से मुक्त होकर अपनें "सपनो के घर" का सपना पूरा कर सकें.








22 अप्रैल 2018

सौर मंडल [Solar System] सामान्य जानकारी

# सौर मंड़ल क्या हैं ?


सूर्य के चारों और चक्कर लगानें वालें ग्रहों,उपग्रहों,धूमकेतू,उल्काओं ,तथा पुच्छल तारों के समूह को सौर मंड़ल या Solar System कहतें हैं.

 सूर्य के चारों और चक्कर काट़नें वालें ग्रहो,उपग्रहों,धूमकेतू,पुच्छल तारें दीर्घवृतीय या अँड़ाकार कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करतें हैं.

आईंयें जानतें हैं सौर मंड़ल के बारें में ==

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#१.सूर्य [SUN]

सौरमंड़ल
 सूर्य

सूर्य सौरमंड़ल का सबसे बड़ा तारा हैं.यह सौरमंड़ल का जनक हैं,जिसका व्यास 13,93000 किलोमीटर हैं.

सूर्य का भार 2.18×10²7 टन हैं.यह प्रथ्वी से 14.96 किमी दूरी पर हैं.यह प्रथ्वी से 109 गुना बड़ा हैं.इसका प्रकाश प्रथ्वी पर पहुँचनें में लगभग 8 मिनिट लगतें हैं.

सूर्य में उपस्थित गैसों का संघटन


हीलियम.      :::::    71%

हाइड्रोजन.    :::::  26.5%

अन्य तत्व      ::::: 2.5%



उपरोक्त संघटन से स्पष्ट है कि सूर्य की संरचना गैसीय है .सूर्य की बाहरी सतह का तापमान 6000 डिग्री सेंटीग्रेड़ होता हैं,जबकि सूर्य के वे क्षेत्र जो अपेक्षाकृत ठंड़े होतें हैं उनका तापमान 1500° C होता हैं.

सूर्य अाकाशगंगा का चक्कर लगाता हैं,जो वह लगभग 25 करोड़ वर्ष में पूरा करता हैं.सूर्य द्धारा आकाशगंगा का एक चक्कर पूरा करनें में लगे समय को ब्रम्हांड़ वर्ष कहतें हैं.


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#२.बुध [Mercury]


बुध सूर्य का सबसे निकटतम और सौरमंड़ल का सबसे छोटा ग्रह हैं .

इसकी सूर्य से दूरी लगभग 5.7 करोड़ किमी है,और इसका व्यास 4878 किमी हैं.

यह सूर्य की परिक्रमा करनें में 88 दिन का समय लेता हैं.जो अन्य ग्रहों की अपेक्षा सबसे कम समय हैं.इसकी अपनें अक्ष पर गति 1,76 हजार किमी प्रतिघंट़े हैं.
Mercury
 Budh

बुध पर वायुमंड़ल नही हैं,यहाँ दिन का तापमान 427°C और रात का तापमान - 173° C तक पहुँच जाता हैं.यह तापांतर बुध को सर्वाधिक तापांतर वालें ग्रहों की श्रेणी में खड़ा करता हैं.

बुध का एक दिन प्रथ्वी के तीन महिनों के बराबर होता हैं और इतनी ही अवधि की रात होती हैं.

बुध का कोई उपग्रह नही हैं.


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#३.शुक्र [Venus]


ग्रह
 शुक्र ग्रह


यह ग्रह सूर्य से बुध के बाद दूसरें क्रम की दूरी पर स्थित हैं.इसका व्यास 12,102 किमी और सूर्य से दूरी 10.82 करोड़ किमी हैं.

यह ग्रह सूर्य की परिक्रमा 225 दिनों में पूरी करता हैं. प्रथ्वी के समीप स्थित होनें घनत्व,व्यास तथा आकार में प्रथ्वी के समान होनें के कारण इस ग्रह को प्रथ्वी की जुडवाँ बहन भी कहा जाता हैं.

यह ग्रह सबसे चमकीला और गर्म ग्रह हैं.सुबह और शाम को प्रथ्वी से पूर्व और पश्चिम में दिखाई पड़ने के कारण इस ग्रह को " सुबह का तारा" और "शाम का तारा" कहतें हैं.

शुक्र प्रथ्वी के विपरित पूर्व से पश्चिम की तरफ़ अपनें अक्ष पर घूमता हैं,इस ग्रह का भी बुध की भाँति कोई  'उपग्रह' नही हैं.


• शुक्र ग्रह की संरचना 

शुक्र ग्रह की सतह चट्टानों और ज्वालामुखियों से निर्मित हैं.इसका वायुमंड़ल निम्न गैसों से निर्मित हैं,

कार्बन डाई आँक्साइड़  ::::: 90%

सल्फ्यूरिक एसिड़,जलवाष्प,नाइट्रोजन आदि ::10%


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#३.प्रथ्वी [Earth]


सूर्य से दूरी के क्रम में यह तीसरा ग्रह हैं.यह एकमात्र ग्रह हैं,जिस पर जीवन हैं.जल की अधिकता के कारण प्रथ्वी अंतरिक्ष से नीली दिखाई देती हैं,इसी कारण इसे नीला ग्रह कहतें हैं.

प्रथ्वी का विषुवतीय व्यास 12,756 किमी ध्रुवीय व्यास  12,714 किमी हैं ,इसकी सूर्य से दूरी 14.96 करोड़ किमी हैं. 

प्रथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा करनें में 365 दिन 6 घंटे लगतें हैं.यह अपनें अक्ष पर 24 घंटे में एक चक्कर पूरा कर लेती हैं.इसे प्रथ्वी की 'घूर्णन गति'कहतें हैं.इसी घूर्णन गति के कारण प्रथ्वी पर दिन और रात होतें हैं. प्रथ्वी का एकमात्र उपग्रह  'चन्द्रमा'हैं.

प्रथ्वी पर उपस्थित स्थल और जल भाग

स्थल भाग ::: 29%

जल भाग  ::: 79%

प्रथ्वी अपनें अक्ष पर 23½°. झुकी हुई हैं.इस अक्षीय झुकाव के कारण ही प्रथ्वी पर मौसम परिवर्तन होतें हैं.

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#४.मंगल [Mars]


मंगल सूर्य से दूरी के क्रम में चौथा ग्रह हैं.इस ग्रह की सतह पर उपस्थित आइरन आक्साइड़ के कारण यह ग्रह लाल दिखाई देता हैं,इसी कारण इसे लाल ग्रह कहतें हैं.

मंगल का अक्ष प्रथ्वी के समान 25° के कोण पर झुका हुआ हैं,इसी कारण यहाँ ऋतु परिवर्तन होतें हैं.मंगल अपनें अक्ष पर 24 घंटे में एक चक्कर पूरा करता हैं.

मंगल सूर्य की परिक्रमा करनें में 687 दिन लगाता हैं.

मंगल के दो उपग्रह हैं,जिन्हें फोबोस (Phobos) और डीमोस (Deimos) कहतें हैं.

मंगल पर सौर मंड़ल का सबसे ऊँचा पर्वत 'निक्स ओलम्पिया' (Nix Olympia)स्थित हैं.जो प्रथ्वी पर स्थित सबसे ऊँची पर्वत चोंटी माऊँट एवरेस्ट से तीन गुना बड़ा हैं.

सौरमंड़ल का सबसे बड़ा ज्वालामुखी 'ओलिपस मेसी'भी मंगल पर स्थित हैं.

मंगल के वायुमंड़ल में मिथेन,अमोनिया,कार्बन डाइ आँक्साइड़ और जलवाष्प प्रचुरता में पाये जातें हैं.


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# ५.बृहस्पति [JUPITER]


यह सूर्य से पाँचवा ग्रह हैं जिसकी सूर्य से दूरी 77.83 करोड़ किमी हैं,यह ग्रह सौरमंड़ल का सबसे बड़ा ग्रह हैं.

इस ग्रह का व्यास 1,38,081 किमी हैं.यह सूर्य की परिक्रमा 11.9 वर्ष में पूरी करता हैं.

बृहस्पति की घूर्णन गति सर्वाधिक होती हैं.यह ग्रह 10 घंटे में अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा कर लेता हैं.

इस ग्रह के 69 उपग्रह हैं,जिनमें " गेनीमीड़"नामक उपग्रह सौरमंड़ल का सबसे बड़ा उपग्रह हैं अन्य उपग्रह हैं,आयो यूरोपा,कैलिस्टों,आलमथिया आदि.

बृहस्पति पर वायुंड़लीय दाब प्रथ्वी से एक करोड़ गुना अधिक हैं,इस ग्रह पर अमोनिया गैस के विशाल भंडार उपस्थित हैं.


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# ६.शनि (Saturn)


शनि सौरमंड़ल का दूसरा बड़ा ग्रह हैं,सूर्य से इस ग्रह का छठा क्रम आता हैं.

इस ग्रह का व्यास 1,20,500 लाख किमी हैं,इसकी सूर्य से दूरी 142.7 करोड़ हैं.

शनि सूर्य की परिक्रमा करनें में 30 वर्ष लगाता हैं.

शनि के आसपास वलय हैं जो छोटें - छोटें कणों से मिलकर बनें हैं.इन वलयों की मोटाई 18 किमी तक हैं.

शनि पर मुख्यत नाइट्रोजन, हीलियम,हाइड्रोजन गैस पाई जाती हैं,इसके अलावा कुछ मात्रा में मिथेन और अमोनिया भी विधमान हैं.

शनि के कुल 18 उपग्रह हैं ,इसका सबसे बड़ा उपग्रह "टाइटन" हैं,जो आकार में बुध ग्रह के बराबर हैं.

शनि सबसे कम घनत्व वाला ग्रह हैं इसका घनत्व पानी से भी कम होता हैं,यदि इस ग्रह को पानी में रखा जायें तो यह तेरनें लगेगा.

शनि अंतिम ग्रह हैं जिसे नंगी आँखों से देखा जा सकता हैं.


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# ७.अरूण (Uranus)


यह सूर्य से सातवें क्रम का ग्रह हैं,और आकार में तीसरा बड़ा ग्रह हैं.

अरूण का व्यास 51,400 किमी और इसकी सूर्य से दूरी 287 करोड़ किमी हैं.यह 84 वर्ष में सूर्य की परिक्रमा पूरी करता हैं.

यह ग्रह अपनें अक्ष पर पूर्व से पश्चिम की ओर घूमता हैं.यह ग्रह अपनें अक्ष पर इतना झुका हुआ हैं,कि लेटा हुआ दिखाई देता हैं,इसलिये इसे ' लेटा हुआ ग्रह'के नाम से भी जाना जाता हैं


इसके 18 उपग्रह हैं,जिसमें एरियल,अम्ब्रियल,टिटेनिया,ओबेरान,तथा मिरांड़ा प्रमुख हैं.टिटेनिया इसका सबसे बड़ा उपग्रह हैं.



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# ८.वरूण (Neptune)


सूर्य से सबसे दूरस्थ ग्रह हैं,जो सूर्य से 497 करोड़ किमी दूर हैं,यह सूर्य का एक चक्कर 165 वर्ष में पूरा करता हैं.इसका व्यास 48,600 किमी है.

यह ग्रह अपनें अक्ष पर 16 घंटे में एक चक्कर पूरा करता हैं.

यह ग्रह मिथेन गैस की उपस्थिति के कारण हरें रंग का दिखाई देता हैं.

इसके 8 उपग्रह हैं,जिसमें ट्रिटान सबसे बड़ा हैं.

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# पुच्छल तारें या धूमकेतू (Comets)


 धूमकेतू या पुच्छल तारें सौरमंड़ल के सबसे अधिक उत्केन्द्रित कक्षा वालें सदस्य हैं.जो सूर्य के चारों ओर लम्बी किंतु अनियमित कक्षा में घूमतें हैं,ये आकाशीय धूल,बर्फ और हिमानी गैसों के पिंड़ हैं जो सूर्य से दूर ठंड़े और अंधेरे क्षेत्र में रहतें हैं.

अपनी कक्षा में घूमतें हुये जब ये सूर्य के समीप से गुजरते हैं तो गर्म होकर इनसे गैस की फुहार निकलती है जो एक लम्बी चमकीली पूँछ के समान प्रतीत होती हैं.जबकि सामान्य अवस्था में पूच्छल तारें में यह पूँछ प्रकट नही होती हैं.

पुच्छल तारें की यह पूँछ लाखो किमी लम्बी होती हैं.सन् 1843 में विशाल पुच्छल तारा दिखा था जिसकी पूँछ 80 करोड़ किमी लम्बी थी.

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# एस्टराइँड़ (Asteroid)


मंगल ग्रह और बृहस्पति ग्रह के मध्य 547 लाख किमी क्षेत्र में हजारों की सँख्या में लघु पिंड़,लघु ग्रह या एस्टराँइड़ सूर्य की परिक्रमा करतें रहतें हैं,जिन्हें सर्वपृथम इटली के खगोलशास्त्री पियाजी ने खोजा था.

खगोलशास्त्रीयों के मुताबिक  ग्रहों के विस्फोट़  फलस्वरूप टूटे हुये टुकड़ो से Asteroid का निर्माण हुआ हैं.

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# उल्का पिंड़ और उल्काश्म


अंतरिक्ष में घूमतें हुये धूल और गैस  और धूल के पिंड़ जब प्रथ्वी के समीप से गुजरतें हैं,तो प्रथ्वी के गुरूत्वाकर्षण के कारण प्रथ्वी की ओर खींचते चले आतें हैं,प्रथ्वी के वायुमंड़ल में प्रवेश करतें ही घर्षण के कारण ये पिंड़ जलनें लगतें हैं.जो पिंड़ प्रथ्वी के धरातल पर पहुँचनें से पूर्व ही जलकर राख  हो जातें हैं उन्हें उल्का पिंड़ कहतें हैं.

कुछ पिंड़ पूर्ण रूप में जल नही पातें हैं वे प्रथ्वी पर चट्टान बनकर गिर जातें हैं,इन्हें उल्काश्म कहतें हैं.



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# नक्षत्र


प्रथ्वी के आसपास 27 तारा समूह या नक्षत्र हैं,जो रात्री में आकाश से दिखाई देतें हैं.

प्रथ्वी का चक्कर लगातें समय चन्द्रमा प्रतिदिन किसी न किसी नक्षत्र या तारा समूह में से गुजरता हैं,जिससे उस दिन वह नक्षत्र दिखाई नही देता हैं.जिस दिन चंद्रमा नक्षत्र को चन्द्रमा पार करता हैं,उस दिन वह नक्षत्र दिखाई नहीं देता हैं.

प्रथ्वी एक नक्षत्र को पार करनें में 14 दिन का समय लगाती हैं, इसलिये नक्षत्रों की अवधि 14 दिनों की होती हैं.

प्रमुख नक्षत्र इस प्रकार हैं

१.अश्विनी

२.भरणी

३.कृतिका

४.रोहिणी

५.मृगसिरा

६.आद्रा

७.पुन्रवर्सु

८.मघा

९.अश्लेषा

१०.स्वाति

११.विशाखा

१२.अनुराधा

१३.ज्येष्ठा

१४.मूल

१५.पूर्वी हस्त

१६.चित्रा

१७.अषाढ़

१८.श्रावण

१९.घनिष्ठा

२०.शक्तिभिषा

२१.पूर्वाभा्द्र

२२.उत्तराभाद्र

२३.रेवती

२४.फाल्गुनी

२५.उत्तरा फाल्गुनी आदि


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# राशियाँ


प्रथ्वी सूर्य की परिक्रमा करतें समय अनेक तारा समूह में से होकर गुजरती हैं.इन तारा समूह के आकार किसी न किसी जानवर,वस्तु आदि से मिलतें जुलतें दिखाई देतें हैं.जिन्हें राशियाँ कहा जाता हैं.

राशियों की सँख्या 12 हैं

१.मेष

२.वृष

३.मिथुन

४.कर्क

५.सिंह

६.कन्या

७.तुला

८.वृश्चि

९.धनु

१०.मकर

११.कुम्भ

१२.मीन



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15 अप्रैल 2018

भ्रष्टाचार [Corruption]

अवैध धन
 भ्रष्टाचार

#भ्रष्टाचार की परिभाषा 


भ्रष्टाचार दो शब्दों से मिलकर बना हैं भ्रष्ट + आचार अर्थात भ्रष्टाचार शिष्टाचार या नैतिकता विहिन व्यवस्था का परिचायक हैं.जिसमें भ्रष्टाचारी व्यक्ति नैतिकता,नियम,कानून,व्यवस्था के विपरीत जाकर पैसों या सेंवा का लेनदेन करता हैं.

भारतीय दंड़ संहिता में भ्रष्टाचार को परिभाषित करतें हुये लिखा हैं,कि
जो कोई भी एक लोक कर्मचारी होतें हुये या होनें की प्रत्याशा रखतें हुये अपनें लिये या किसी अन्य व्यक्ति के लियें अपनें वैध पारिश्रमिक के अतिरिक्त हेतू या पारितोषिक कोई कार्यालय कार्यकलाप में किसी व्यक्ति का अनुग्रह या विग्रह प्रदर्शित करनें के लिये या केन्द्रीय या प्रांतीय सरकार या संसद या विधानमंड़ल के किसी व्यक्ति की सेवा या सेवा शून्यता प्रदान करनें या करनें हेतू प्रयत्न करनें के लिये किसी व्यक्ति से कोई परितोषण स्वीकार करता हैं या प्राप्त या स्वीकार करनें के लिये सहमत होता हैं या प्राप्त करनें का प्रयत्न करता हैं,उसे 3 वर्षों का कारावास या आर्थिक दंड़ या दोनों देय होगा.

## भ्रष्टाचार के प्रकार

भ्रष्टाचार अपनें आप में बहुत व्यापक शब्द हैं,इसके कई प्रकार हैं जैसें


#1.आर्थिक भ्रष्टाचार 


भ्रष्टाचार का यह सबसे महत्वपूर्ण और सर्वव्यापक रूप हैं जिसमें शामिल हैं

#१.नियमानुसार  नि:शुल्क होनें वालें कामों के बदलें में आमजनता से पैसा लेना या देना.

#२.जनता के लाभ के लिये बननें वालें सड़क,रेलवे लाइनों,पुलों,भवनों,और अन्य आधारभूत संरचनाओं के लियें स्वीकृत पैसों में से कमीशन लेना.

# ३.टेंड़र मंजूर करवानें के बदलें रिश्वत लेना.

# ४.पैसा लेकर  परीक्षा पास करवाना या कापी में नम्बर बढ़ाना.

#५.दुकानदार द्धारा ग्राहकों को कम माल तोलकर अधिक पैसा लेना.

# ६.पैसा लेकर या देकर स्थानांतरण,पदोन्नति,पदस्थापना आदि करना या करवाना.

# ७.किसानों की अच्छी गुणवत्ता की फसल को घट़िया बताकर उसे रिजेक्ट करना और फिर पास करनें के बदलें पैसा लेना.

# ८.अधिकारीयों द्धारा सरकारी कार्यालयों में निरीक्षण के नाम पर जानबूझकर खामिया निकालना और बाद में पैसा लेकर उसे सही करना.

#९.फर्जी तरीके से यात्रा भत्ता,आवासीय भत्ता प्राप्त करना.

#१०.सरकारी राशन को खुलें बाजारों में बेचना.

# ११.बुजुर्गों,विधवाओं,विकलांगों को मिलनें वाली पेंशन में हेरफेर कर अपने खाते में अंतरित करवा लेना.

#१२.अवैध तरीके से शराब बनाकर बेचना.

# १३.नकली पैसा बाजार में चलाना.

#१४.सरकारी आवास को किराये पर देना.

#१५.यातायात नियमों के पालन न करनें वालों को पैसा लेकर छोड़ना.

# १६.पैसा लेकर या देकर वोट खरीदना बेचना.

# १७.रेल,बस में बिना टिकिट यात्रा करना.

# १८.शासकीय जमीन,आवास और संपत्तियों पर अवैध रूप से कब्जा करना.

#१९.पैसा लेकर समाचारों में खबरें प्रकाशित करना या करवाना.

#२०.कर चोरी करना या करवाना.

#2.सामाजिक भ्रष्टाचार


# १.जातपाँत के नाम पर भेदभाव करना.

# २.सांम्प्रदायिकता को प्रोत्साहित करना.

#३.बच्चों से भीख मंगवाना .

# ५.14 साल से कम उम्र के बच्चों से मज़दूरी करवाना.

# ६.बुजुर्ग माता पिता की सेवा नहीं करना, उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ना.

#७.पत्नि,बच्चों,बुजुर्गों से मारपीट करना.

# ८.बुराई में सलिंप्त रहना.

# ९.दूसरों के प्रति ईर्ष्या रखना.

# १०.शराब पीकर गाली गलोच करना.

#११.धोंस धमकी देना.

#१२.सामान में मिलावट करना.

#१३.झूठ बोलना.

#१४.दहेज लेना और देना.

#१५.बलात्कार,हत्या,छेड़छाड़ और परेशान करना.

#१६.झूठे आरोप लगाकर मानहानि करना.

#१७.सरकारी नियमों,कानूनों और सामाजिक मानदंड़ों का जानबूझकर उल्लघंन करना.

#१८.बढ़ा चढ़ाकर चीजों का विज्ञापन करना .


#3.धार्मिक भ्रष्टाचार


#१.धार्मिकता के नाम पर आड़म्बरपूर्ण व्यहवार करना.

#२. धर्म के नाम पर हिंसा को प्रोत्साहन देंना.

#३. दूसरें धर्मों के रिती रिवाजों धार्मिक क्रियाकलापों ,विश्वासों के प्रति घृणापूर्ण व्यहवार करना.

#४.बहुसंख्यक धार्मिक समूह द्धारा अल्पसंख्यकों को देश छोड़नें को मज़बूर करना.

#५.धर्म गुरूओं द्धारा धार्मिक पुस्तकों की गलत व्याख्या कर जनता को भ्रमित करना.

#६.धर्म का भय दिखाकर लोगों से पैसें ऐंठना.

#७.अंधविश्वासों को प्रोत्साहित करना.

# 4.खेलों में भ्रष्टाचार


#१. पैसा लेकर मेंच हारना या हरवाना.

#२. खेलों में उत्कृष्ठ प्रदर्शन के नाम पर प्रतिबंधित शक्तिवर्धक दवाईयों का सेवन करना.

#३.खेल निर्णायक द्धारा जानबूझकर किसी विशेष टीम का पक्ष लेना.

#४.अनैतिक तरीके अपनाकर  मैच जीतना .

# ५.टीम चयन में पक्षपात करना.

#६.खेल नियमों के विरूद्ध दूसरी टीम के खिलाड़ीयों से व्यहवार करना.


#5.राजनितिक भ्रष्टाचार


#१. विरोधी दल को पैसा देकर कम़जोर प्रत्याशी खड़ा करवाना.

#२.फर्जी वोटर से मतदान करवाना या करना

#३.पैसा लेकर संसद या विधानसभा में प्रश्न पूछना.

#४.मतदान केन्द्र में घुसकर जबरन मतदान करवाना या करना या मतदान बूथ लूटना.

#५.विरोधी दल को कम़जोर करनें के लिये अनैतिक तरीके अपनाना.



## भ्रष्टाचार के कारण


# 1.नैतिकता का हास 


भ्रष्टाचार का सबसे महत्वपूर्ण कारण नैतिकता का हास होना हैं.प्राचीन काल में हमारा देश भारतीय मूल्यों जैसें ईमानदारी, सच्चरित्रता,सत्यनिष्ठा के कारण सम्पूर्ण विश्व में अलग पहचान रखता था. ये मूल्य प्रत्येक भारतीय की विशेषता थें.

किंतु शनै:शनै: इन मूल्यों को हास शुरू होना शुरू हो गया और इनका स्थान पर बेईमानी,भ्रष्ट आचरण,झूठ,छल कपट आदि ने ले लिया.

आज ये मूल्य भारतीय समाज में इस कदर व्याप्त हो गये हैं,कि समाज में यदि कोई व्यक्ति इस प्रकार का आचरण करता हैं,तो समाजजनों द्धारा इसे बहुत हल्कें में लिया जाता हैं.बल्कि कहा तो यह भी जाता हैं,कि व्यक्ति को आज के समाज के हिसाब से चलना चाहियें.जिसमें "भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार हैं"


#2.भौतिकवादी सोच


आज के समय में व्यक्ति में सच्चरित्रता की अपेक्षा धन दौलत की तलाश की जाती हैं.उदाहरण के लियें यदि कोई व्यक्ति अपनी लड़की के लिये रिश्ता देखता हैं,तो बजाय गुणों के यह देखता हैं कि रिश्तेदार के पास कितनी संपत्ति हैं,फिर यह संपत्ति किस तरीके से अर्जित की गई हैं.इसका कोई महत्व नही हैं.

यही भौतिकतावादी सोच भ्रष्टाचार को जन - जन के बीच व्याप्त कर रही हैं.

भौतिकतावादी संस्कृति लोगों में इस कदर पेंठ कर गई हैं,कि यदि कोई व्यक्ति किसी जिम्मेदार पद पर हैं,और ईमानदारी पूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा हैं,तो उसे मूर्ख समझा जाता हैं.उसके बारें में कहा जानें लगता हैं,कि उसनें अपनें पत्नि बच्चों की सुख सुविधा के लिये कुछ नही किया.

बड़ा मकान,गाड़ी,सुख सुविधा और तथाकथित ऐशोआराम के लिये बहुत सारा पैसा चाहियें जिसे  मध्यम आय वर्ग वाला व्यक्ति भ्रष्ट आचरण से अर्जित करना चाह रहा हैं. 


# 3.कठोर कानूनों का अभाव


भारत में भ्रष्टाचार का इतिहास देखें तो पता चलता हैं,कि लगभग 95% मामलों में न्यायालय भ्रष्टाचारी को कठोरतम सजा देनें में असफल साबित हुआ हैं.फलस्वरूप आनें वाली भ्रष्टाचारी पीढी़ में यही संदेश गया कि इतनें बड़े भ्रष्टाचार करनें के बाद यदि पकड़े गये और सजा हुई तो वह स्वीकार्य होगी.

सजा होनें के पूर्व भी भारतीय न्याय प्रणाली में इतनें छिद्र हैं,कि भ्रष्टाचारी व्यक्ति इनसें आसानी से बच निकलता हैं.और मामूली सजा के बाद मजें से भ्रष्टाचार से अर्जित पैसों से फरियादी को मुँह चिढ़ाता रहता हैं.

स्वतंत्रता के पश्चात भारत कितनें ही बड़ें घोटालों जैसें जीप कांड़,दूरसंचार घोटाला,चीनी घोटाला,बोफोर्स घोटाला ,ताबूत घोटाला,चारा घोटाला,कामनवेल्थ खेल घोटाला ,बैंकिंग धोखाधड़ी आदि का साक्षी रहा हैं,किंतु इन घोटालों से भारत की न्याय प्रणाली और विधायिका ने कोई सबक नहीं लिया इसी का परिणाम हैं,कि भारत नित नये घोटालों की बाढ़ में नहा रहा हैं.

आजकल सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार को " कम जोखिम अधिकतम फायदा" कहकर भारतीय न्याय प्रणाली का मजाक उड़ाया जाता हैं.



# 4.शासन प्रशासन में व्याप्त कमियाँ


दुनिया के वे बड़े संगठन जिनमें भ्रष्टाचार लगभग न के बराबर हैं,जैसें Google, Facebook, Microsoft, Apple,अमेरिकी प्रशासन, ब्रिटिश प्रशासन, नार्वें प्रशासन आदि का अध्ययन करतें हैं.तो पता चलता हैं,कि यदि इन संगठनों से किसी व्यक्ति को कोई काम करवाना हैं,और यदि इसके लियें कोई आनलाइन आवेदन करता हैं,तो आवेदन के साथ प्राप्ति रसीद पर कार्य होनें की समय सीमा लिख दी जाती हैं,साथ ही यह भी लिख दिया जाता हैं,कि समय सीमा में कार्य नहीं होनें पर आप कहाँ अपील कर सकतें हैं.

लेकिन यदि हम भारतीय प्रशासन का अध्ययन करतें हैं,तो पता चलता हैं,कि कई विभागों में कुछ गिनी चुनी सेंवाओं को छोड़कर किसी भी काम की समय सीमा तय नहीं हैं.

जहाँ कार्यों को करनें की समय सीमा तय हैं,वहाँ भी लालफीताशाही इतनी अधिक हैं,कि समय सीमा का पालन नहीं होता हैं.

कार्यों की समय सीमा तय नहीं होनें से अधिकारी कर्मचारी संबधित फाईलों को लम्बें समय तक अपनें पास दबाकर बैंठे रहतें हैं,फलस्वरूप व्यक्ति अपनी फाईल आगें बढ़ानें हेतू बड़ी रकम घूस के रूप में देता हैं.



# 5.वेतन विसंगति 


सम्पूर्ण भारत में चाहें वह राज्य सरकार द्धारा नियत्रिंत विभाग हो या केन्द्र सरकार द्धारा नियत्रिंत विभाग इन विभागों में कार्य करनें वालें अधिकारीयों और कर्मचारीयों में वेतन विसंगति की खाई इतनी चोड़ी हैं,कि यह छोटें कर्मचारी के मन में इतनी हीनता भर देती हैं,कि वह न चाहतें हुये भी भ्रष्टाचार से अपनें परिवार को पालनें हेतू भ्रष्ट तरीकों का सहारा लेता हैं. 

भारत में मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी का वेतन लगभग 2.50 प्रतिमाह हैं साथ ही अन्य जरूरी सुविधायें जैसें गाड़ी,बंगला,नौकर और भत्तें भी मिलतें हैं.जबकि उसी मंत्रालय में काम करनें वालें चपरासी को मात्र 18 से 30 हजार तक ही वेतन मिलता हैं,जो कि आज के महंगाई वालें जमानें में सामान्य परिवार की ज़रूरतों के लिये नाकाफी हैं.

एक अन्य बात यह हैं कि इतना कम वेतन मिलनें के बाद भी यदि कोई व्यक्ति आफिस समय के बाद नियोजित होता हैं,तो इस पर शासन का प्रतिबंध रहता हैं.फलस्वरूप व्यक्ति के पास सिर्फ भ्रष्टाचार द्धारा पैसा बनानें का ही विकल्प बचता हैं.

कई विभागों में तो कर्मचारीयों की वेतन विसंगति मात्र इसी आधार पर दूर नहीं की जाती हैं,कि वहाँ घोषित रूप से यह मान लिया गया हैं,कि यहाँ के कर्मचारी अधिकारी की "ऊपरी कमाई" वैसे भी बहुत अधिक हैं.

# 6.राजनितिक पार्टीयों का स्वार्थी गठबंधन


भारत में जबसें गठबंधन दलों की सरकार बननी शुरू हुई हैं,तब से भ्रष्टाचार दिन दुगनी रात चौगुनी तरीके से उन्नति करतें हुये नित नये रिकार्ड़ स्थापित कर रहा हैं. 

हमारें देश की प्रमुख पार्टीयों के कई शीर्ष लोगों पर भ्रष्टाचार के केस अदालतों में चल रहें हैं,परंतु सत्तारूढ़ दल जानबूझकर इन शीर्ष नेताओं के विरूद्ध कम़जोर अभियोजन प्रस्तुत करता हैं, क्योंकि उसे पता हैं न जानें कब सरकार बनानें में इस दल के सहयोग की ज़रूरत पड़ जायें.

स्वार्थी गठबंधन का एक अन्य उदाहरण राजनितिक दलों को मिलनें वालें चंदे का हैं,जब अन्य दूसरें मुद्दों पर बात करनें की बारी आती हैं,तो राजनितिक दल पानी पी पीकर एक दूसरें पर आरोप प्रत्यारोप लगातें हैं किंतु इनकों मिलनें वालें राजनितिक चंदों पर यह दल न तो एक दूसरें पर आरोप लगातें हैं और ना ही इस मुद्दें पर बात करतें हैं.फलस्वरूप राजनितिक दल अपनें अपनें तरीके से खूब पैसा एकत्रित करतें हैं.



# 7.सामाजिक कुरूतियाँ


देश को सामाजिक कुरूतियों ने इस कदर जकड़ रखा हैं,कि इन कुरूतियों ने भ्रष्टाचार को प्रश्रय ही दिया हैं,उदाहरण के लिये आज भी व्यक्ति को अपनी लड़की की शादी में इतना अधिक दहेज देना पड़ता हैं,कि एक सामान्य जीवन गुजारनें वालें व्यक्ति के लिये यह असंभव होता हैं.फलस्वरूप व्यक्ति इस दहेज रूपी धन को भ्रष्टाचार द्धारा ही एकत्रित करता हैं.

# 8.बुद्धिजीवियों का पलायन


हमारें देश का बुद्धिजीवी वर्ग स्वतंत्रता के पश्चात राजनिती,समाज आदि में भाग लेनें से अपनें आपकों धीरें - धीरें दूर करता रहा फलस्वरूप राजनिती समाज में अपराधी और भ्रष्ट प्रवृत्ति के लोग आ गये जिनका काम ही भ्रष्ट तरीके अपनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना रह गया हैं.


# 9.भ्रष्टाचार रोधी संगठन का अभाव


भारत में भ्रष्टाचार से निपट़नें के लिये कहनें को अनेक संगठन और संस्थाएँ कार्यरत हैं,जैसें केन्द्रीय सतर्कता आयोग,सी.बी.आई.लोकपाल,लोकायुक्त आदि परंतु ये सभी संगठन " बिना दाँत के शेर" की तरह से साबित हो रहें हैं,जिस प्रकार बिना दाँत का शेर अपना शिकार करनें में अक्षम होता हैं,उसी प्रकार ये संस्थाएँ स्वंय संज्ञान लेकर भ्रष्टाचार के विरूद्ध प्रभावी कार्यवाही करनें में अब तक असफल साबित हुई हैं.

लोकपाल संस्था की बात करें तो सन् 1968 से ही इसे केन्द्र में स्थापित करनें का बार - बार प्रयास किया गया इसे स्थापित करवानें हेतू सन् 2011 में अन्ना हजारे दिल्ली में बड़ा जनआंदोलन कर चुके हैं,परंतु अभी तक इस संस्था को स्थापित नही किया गया हैं.

राज्यों में जहाँ लोकायुक्त संस्थाएँ गठित हैं वहाँ भी यह संस्था इतनी कमज़ोर हैं कि भ्रष्टाचारी़यों पर अभियोजन की स्वीकृति के लिये राज्य सरकार पर इसे निर्भर रहना पड़ता हैं.

भ्रष्टाचार रोधी सांवैधानिक संस्था का अभाव होनें से ही भारत में यह बहुत व्यापक हो गया हैं.


# 10.अशिक्षा और गरीबी


भ्रष्टाचार और अशिक्षा में बहुत निकट संबध हैं.अशिक्षित व्यक्ति अपनें अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति उस स्तर तक जागरूक नही रहता हैं जितना एक शिक्षित व्यक्ति फलस्वरूप उसे शासन प्रशासन में चलनें वालें कार्यकलापों से कोई मतलब नही रहता.यह स्थिति शासन प्रशासन में बैठें लोगों को अपनी मनमानी करनें हेतू प्रेरित करती हैं.

इसी प्रकार गरीबी भी भ्रष्टाचार का एक प्रमुख कारण हैं,संस्कृत में एक उक्ति हैं बुभुक्षित: किं न करोति अर्थात भूखा व्यक्ति क्या नही करता.

# 11.राष्ट्रीयता की भावना का घोर अभाव


"स्वतंत्रता के पूर्व भारत में देश सेवा की भावना एक मिशन के रूप में थी,किंतु यह आज के दोंर में कमीशन के रूप में हो गई हैं"

देश सेवा और देश प्रेम का मतलब अब बस दुश्मन राष्ट्र को भलाबुरा कहनें और खेलों में पराजित करनें पर पटाखे फोड़नें तक ही सीमित हो गया हैं.इसके अलावा न तो हम देश की सम्पत्ति को अपनी मानतें हैं और ना ही इस सम्पत्ति की रक्षा का दायित्व निभातें हैं,बल्कि लोगों की यही कोशिश रहती हैं,कि सरकारी सम्पत्ति में से कितना अपनें लिये प्राप्त कर लिया जायें.

एक उदाहरण इस संबध में देना चाहूँगा,अभी हाल ही में एक समाचार ने  आमजनता का ध्यान अपनी ओंर खींचा था ,इस समाचार के अनुसार भारत में चलनें वाली रेलगाड़ी गतिमान एक्सप्रेस के बिजनेस वर्ग के कोच से यात्री Headphone निकालकर अपनें साथ ले गये.जब देश के संपन्न वर्ग का देश की संपत्तियों के प्रति यह सोच हैं,तो दूसरें वर्गों के बारें में आसानी से अंदाजा लगा सकतें हैं.



## भ्रष्टाचार का प्रभाव


#1.व्यापक जन असंतोष का जन्म


देश में नित नये भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारीयों के खुलें आम घूमनें की वज़ह से जनता में व्यापक रूप से जन असंतोष का जन्म हो रहा हैं,और संविधान, न्यायपालिका,राष्ट्रीय आदर्शों का लोग खुलकर मजाक बनाकर सोशल मीड़िया में खूब शेयर कर रहें हैं.


युवा वर्ग में असंतोष बहुत गहरा हैं और वह जनआंदोलन के नाम पर हिंसा करनें से भी नहीं ड़र रहा हैं.इस हिंसा में देश की खरबों रूपये की संपत्ति और सामाजिक तानें बानें का बहुत नुकसान हो रहा हैं.कुछ युवाओं में इस असंतोष की परिणीति नक्सलवादी,आतंकवादी घटनाओं में शामिल होकर हो रही हैं.

# 2.समानांतर अर्थव्यवस्था का जन्म


भ्रष्टाचार की वज़ह से राजनितिज्ञों,व्यापारी,और प्रशासनिक अधिकारीयों के पास अरबों रूपयों की संपत्ति जमा हो जाती हैं,जिसे वे विदेशी बैंकों में जमाकर पुन: भारत में फर्जी कंपनियों के माध्यम से निवेश करतें हैं.इस तरह से एक समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी हो जाती हैं जो देश का बहुत बड़ा नुकसान कर रही हैं.

सीमा पर तैनात अधिकारीयों को पैसा देकर नकली नोटों की खेप भारत लाई जाती हैं,जो हमारी अर्थव्यवस्था का गला घोंट़ रही हैं.

# 3.प्रगति में बाधा


भ्रष्टाचार देश की प्रगति को कई वर्ष पीछे ले जाता हैं,जब गुणवत्ताहीन सड़क,पुल पुलिया इमारतें बनेगी तो इनका जीवनकाल कम ही होगा फलस्वरूप शासन का ध्यान इन्हीं मुद्दों पर केन्द्रित रहेगा और विज्ञान,तकनीक,अतरिक्ष विज्ञान और शोध जैसें मुद्दे कही पीछे छूट जायेंगें.

विशेषज्ञों को भारत के विकासशील रहनें का यही कारण नज़र आ रहा हैं,जबकि भारत के साथ आजाद होनें वाला चीन भ्रष्टाचार के प्रति कठोर निति के कारण भारत से विज्ञान,शोध,और तकनीक ,खेल आदि के मामलें में कही अधिक आगें निकल चुका हैं.


# 4.प्रतिभा और योग्यता की उपेक्षा


भ्रष्टाचार की वज़ह से अयोग्य व्यक्ति शासन और प्रशासन पर काबिज हो जातें हैं फलस्वरूप योग्य व्यक्ति और प्रतिभाओं की उपेक्षा होती हैं,इस उपेक्षा की कीमत देश को चुकानी पड़ती हैं,उदाहरण के लिये यदि कोई अयोग्य व्यक्ति भ्रष्ट तरीके से शिक्षक बनता हैं,तो वह आनें वाली पीढी़ को बेहतर शिक्षा नही दे पायेगा.
इस तरह राष्ट्र की कई पीढ़ी बेहतर शिक्षा से वंचित रह जायेगी,बेहतर शिक्षा के अभाव में बेहतर व्यक्तित्व का निर्माण नही हो पायेगा और बेहतर राष्ट्र निर्माण का  सपना भी अधूरा रह जायेगा.

#5.राष्ट्रीय संपत्ति का हास


भ्रष्टाचार के कारण राष्ट्रीय संपत्ति का बड़ा भाग भ्रष्टाचारीयों की तिजोरीयों में चला जाता हैं.एक अनुमान के अनुसार स्वतंत्रता के पश्चात से अब तक देश का लगभग 2.50 लाख करोड़ रूपया भ्रष्टाचार की भेंट़ चढ़ चुका हैं.

भ्रष्टाचार के संदर्भ में पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी का कथन बहुत प्रसिद्ध हैं,जिसमें उन्होंनें कहा था कि " केन्द्र से भेजा गया 1 रूपया गाँवों तक पँहुचतें - पँहुचतें मात्र 15 पैसें ही रह जाता हैं.

## भ्रष्टाचार को दूर करनें के उपाय


# 1.समाज और परिवार की भूमिका


भ्रष्टाचार को समाप्त करनें का रास्ता समाज और परिवार से ही निकलता हैं.यदि परिवार बच्चों को ईमानदारी सच्चरित्रता और राष्ट्र के प्रति भक्ति की शिक्षा देगा साथ ही स्वंय परिवार के सदस्य इन उसूलों को स्वंय पर लागू करेंगें तो दुनिया की कोंई ताकत भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित नही कर पायेगी.

भ्रष्टाचार को समाप्त करनें का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण अंग समाज हैं,जब समाज भ्रष्टाचार से संपत्ति बनानें वालों को  अलग थलग कर उन्हें सबसे घृणित समझेगा तो भ्रष्टाचार समाप्त होनें में ज्यादा समय नहीं लगेगा.

भारत  में कानून से ज्यादा शक्तिशाली बदलाव का माध्यम  समाज और परिवार हैं.जब कोई सामाजिक बदलाव लाना हो तो  समाज और परिवार को साथ लेकर चलें बिना बदलाव नही लाया जा सकता.

भारतीय समाज के बदलाव में परिवार और समाज की भूमिका को हम  दो संदर्भों में समझ सकतें हैं.

स्वतंत्रता संग्राम के दोरान महात्मा गाँधी नें ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध अपनें आंदोंलन में समाजों और परिवारों के बीच पहुँचकर उनका खुला समर्थन प्राप्त किया और स्वतंत्रता आंदोंलन को सफल बनाया.

दूसरा उदाहरण स्वच्छता अभियान का हैं,स्वच्छता अभियान में जब खुलें में शौच जानें को परिवार की महिलाओं की इज्जत के साथ जोड़ा गया तो देश में तेजी से शोचालय क्रांति आई और कई राज्य समय से पहलें खुले में शौच मुक्त हो चुकें हैं.

अब कोई बुराई समाज की सहायता से कैंसें आगें बढ़ती रहती हैं इसका भी उदाहरण देख लेतें हैं.
दहेज लेना और देना दोंनों कानूनन जुर्म हैं किंतु यह बुराई कई वर्षों से भारतीय समाज में व्याप्त हैं,क्योंकि दहेज लेना और देना समाज द्धारा स्वीकार्य हैं और यह बेटी के नये जीवन की शुरूआत में सहयोग के रूप में माना जाता हैं.

अत: कहा जा सकता हैं कि बिना परिवार और समाज  के सहयोग से ही भ्रष्टाचार को समाप्त किया जा सकता हैं.

# 2.पारदर्शी व्यवस्था


शासन प्रशासन से भ्रष्टाचार को समाप्त करनें का सबसे महत्वपूर्ण साधन पारदर्शी प्रणाली हैं.

शासन के समस्त कार्यों को जब जनता की नज़रों के समक्ष पारदर्शी प्रणाली के साथ किया जायेगा तो भ्रष्टाचार होनें की संभावना को पूरी तरह से समाप्त किया जा सकता हैं जैंसें

१.परीक्षा प्रणाली में छात्रों को उत्तरपुस्तिका की प्रतिलिपी उपलब्ध कराना.

२.प्रतियोगी परीक्षाओं में चयनित अभ्यर्थीयों के अंकों का सार्वजनिकरण करना.

३.सार्वजनिक निर्माण कार्यों के कार्यों का स्वतंत्र जाँच ऐजेन्सीयों से मूल्याकंन कराना और इन ऐजेन्सीयों पर कड़ी निगरानी व्यवस्था.

# 3.कठोर दंड़ व्यवस्था


भ्रष्टाचार को समाप्त करनें का एक महत्वपूर्ण सूत्र कठोर दंड़ प्रणाली हैं.भ्रष्टाचारीयों को ऐसा दंड़ मिलना चाहियें कि वह अन्य भ्रष्टाचारीयों के लिये नजीर बन सकें.

भ्रष्टाचार में सलिंप्त व्यक्ति की समस्त चल अचल संपत्ति जब्त कर उसका उपयोग जन हितार्थ कार्यों में किया जावें.

#4. स्वतंत्र निगरानी समितियाँ


भ्रष्टाचार से निपट़नें और इसे समाप्त करनें हेतू ऐसी निगरानी समितियाँ नियुक्त की जायें जिसके पास न केवल व्यापक अधिकार हो बल्कि इसमें समाज के प्रत्येक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व हो .

यह संस्था भ्रष्टाचार से संबधित मामलों को सरकार और समाज के समक्ष रख सकें.साथ ही भ्रष्टाचार होनें के संभावित छिद्रों की पड़ताल कर उन छिद्रों तुरंत बंद करायें.

#5. लोकपाल और लोकायुक्त


भारत में सन् 1968 से ही लोकपाल की नियुक्ति के प्रयास चल रहें हैं परंतु यह संस्था अभी तक आकार नहीं ले सकी हैं.

अत: केन्द्र में ऐसा प्रभावी लोकपाल स्थापित किया जायें जिसके दायरें में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति सम्मिलित हो.

इस संस्था को शक्तिशाली उत्तरदायी बनाया जायें ताकि भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगें.

राज्यों में स्थापित लोकायुक्त को भी शक्तिशाली और जवाबदेय बनाया जायें जो फैसला लेंनें और क्रियान्वयन करवानें में सक्षम हो.तथा जिसकी नियुक्ति अराजनितिक हो.


#6. वेतन विसंगति दूर होनी चाहियें


भारत में कर्मचारीयों को दिये जानें वाले वेतन की संरचना दुनिया के दूसरें साफ सुधरें राष्ट्रों जैसें नार्वें,स्वीट्जरलैंड़ की तुलना में बहुत ही निम्न स्तर की हैं.

एक आदर्श प्रशासनिक व्यवस्था में उच्च और निम्न कर्मचारी के वेतन का अँतर 20% - 30% के बीच होना चाहियें जबकि भारत में यह अंतर 400% से 500% तक हैं.

वेतन संरचना सुधारनें से कर्मचारी भ्रष्टाचार की ओर पृवृत्त नही होगा. 

#7. आर्थिक विषमता में कमी


भ्रष्टाचार में कमी करनें के लिये देश में फैली आर्थिक विषमता में कमी लाना अत्यंत आवश्यक हैं. 

भारत में एक ओर दुनिया के सबसे अमीर 1% लोग जिनके पास देश की 60% संपत्ति हैं निवास करतें हैं वही दूसरी और दुनिया के सबसे गरीब 30% लोग भी यहीं निवास करती हैं.

जब तक इन गरीबों को गरीबी रेखा से ऊपर नहीं किया जाता तब तक भ्रष्टाचार का खात्मा मुश्किल होगा.

#8. आदर्श निर्वाचन प्रणाली


भारत में लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन में प्रत्याशीयों द्धारा अरबों खरबों रूपया पानी की तरह बहा दिया जाता हैं,जिसे जीतनें के बाद प्रत्याशी विकास कार्यों के लिये मिले धन की बंदरबाट करके हासिल करतें हैं.

भ्रष्टाचार को अल्पतम करनें हेतू आदर्श निर्वाचन व्यवस्था की अत्यंत आवश्यकता हैं जिसमें 

• प्रत्याशी के चुनाव प्रचार की व्यवस्था निर्वाचन आयोग करें.

• चुनाव में खड़ें प्रत्याशी को प्रचार  हेतू निर्धारित मंच उपलब्ध कराया जायें.जहाँ वह अपनी बात रख सकें.

• प्रत्याशी को चाय पान जितनी ही राशि खर्च करनें की अनुमति मिलें इससे ज्यादा खर्च करनें पर निर्वाचन आयोग द्धारा कड़ा नियत्रंण हो.



#9. राष्ट्र संघ की घोषणा अनुरूप व्यवस्था


भ्रष्टाचार पर राष्ट्र संघ की घोषणानुसार देश की निति और कार्यान्वयन निर्धारित होना चाहियें.


० भगवान श्री राम का चरित्र






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9 अप्रैल 2018

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना [Prime Minister Crop Insurance Scheme]

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (pmfby) क्या हैं?



फसल बीमा योजना
 प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना

भारत एक कृषि प्रधान राष्ट्र हैं,जिसकी  62% प्रतिशत जनसँख्या कृषि से जीविकापोर्जन करती हैं.किंतु कृषि पूरी तरह से बरसात का जुआ हैं.और इसी बरसात के जुये की वज़ह से करोड़ों किसानों को फसल उत्पादन में बहुत अधिक घाटा उठाना पड़ता हैं.

किसानों को मौसम की अनिश्चितता और कीटों के प्रकोप से फसल क्षति की क्षतिपूर्ति दिलानें हेतू सरकार समय - समय पर अनेक फसल बीमा लेकर आई हैं,इसी क्रम में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना खरीफ 2016 सत्र से केन्द्र की NDA सरकार द्धारा शुरू की गई हैं.


नई फसल बीमा योजना में वर्ष 1999 में लागू राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना और  वर्ष 2010 में लागू संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना को एकीकृत कर दिया गया हैं.

० कृषि वानिकी क्या हैं यहाँ जानें

० अटल बिहारी वाजपेयी

# योजना के मुख्य बिंदु 


१.इस योजना में सभी प्रकार की फसलों जैसें रबी,खरीफ,बागवानी और वाणिज्यिक को सम्मिलित किया गया हैं.

३.इस योजना में प्रिमियम की दर 10% के हिसाब से निर्धारित की गई हैं.जिसमें से किसानों को प्रिमियम दर रबी के लियें  1.5% ,खरीफ के लिये  2% तथा वार्षिक वाणिज्यिक फसलों के लियें 5% का भुगतान करना होगा.शेष राशि का भुगतान केन्द्र और राज्य सरकार द्धारा 50 - 50 के अनुपात में किया जावेगा.इसके पूर्व की फसल बीमा योजना में प्रिमियम की दर 23% से लेकर 57% तक होती थी.

योजना को ऐसे समझीयें 

• बीमित राशि         ::::   1,00000

• प्रीमियम दर.        :::: 10% यानि 10,000

• केन्द्रीय अंश.       :::: 4% यानि 4,000

• राज्य अंश.         :::: 4% यानि 4,000

• किसान का अंश. :::: 2% यानि 2,000 

४.फसल नुकसानी का आकलन करनें के लिये नई फसल बीमा योजना में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करनें का प्रावधान किया गया हैं.इससे फसल का नुकसान शीघ्र और सही - सही हो सकेगा.तथा किसान को दावा राशि त्वरित रूप से मिल सकेगी.

५.इस योजना में पहली बार कटाई के बाद चक्रवात और बेमौसम बारिश का जोखिम भी सम्मिलित किया गया हैं.इसके अलावा कई अन्य परंपरागत जोखिम को सम्मिलित किया गया हैं जैसें

१.आग लगना.
२.बिजली गिरनें.
३.ओला पड़नें.
४.चक्रवात.
५.अंधड़
६.बवंड़र
७.बाढ़.
८.जल भराव.
९.जमीन धंसनें
१०.सूखा.
११.खराब मौसम.
१२.कीट़ और फसल को होनें वाली बीमारी आदि जोखिम  सम्मिलित हैं.

६.इस योजना में बीमा पर कोई केंपिंग नहीं होती हैं,जिसकी वजह से दावा राशि में कोई कटोती नहीं की जा सकती हैं.

७.यदि किसान बुवाई - रोपाई के लिये खर्च करनें के बावजूद ख़राब मौसम की वज़ह से बुवाई - रोपाई नहीं कर पाता हैं,तो वह बीमित राशि के 25% तक नुकसान का दावा ले सकता हैं.

८.फसल कटाई के बाद रखी फसल को चक्रवात,बेमौसम बारिश और स्थानीय आपदा जैसें जमीन धंसनें,जल भराव से होनें वालें नुकसान का अंदाजा प्रभावी खेत के आधार पर तय किया जायेगा.

९.फसल कटाई के बाद खेत में पड़ी फसल को यदि 14 दिन के भीतर चक्रवात और बेमौसम बरसात से नुकसान होता हैं,तो खेतवार आकलन करके भुगतान किया जायेगा.

१०.नयी योजना में स्मार्टफोन से फसल कटाई की तस्वीरें खींचकर सर्वर पर अपलोड़ की जावेगी, इससे फसल कटाई के आँकड़े जल्द से जल्द बीमा कंपनी को प्राप्त होनें पर बीमा दावों को जल्दी से भुगतान किया जा सकेगा.

११.इस योजना में बीमित राशि जिला स्तर तकनीक समिती द्धारा उस फसल के लिये तय वित्त पैमानें के बराबर होगी. 






5 अप्रैल 2018

भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में निलम्बन (Suspension) सही या गलत : एक वृहत विश्लेषण

#भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में निलम्बन सही या गलत ?


निलम्बन
 निलम्बन क्या है




#१.निलम्बन क्या हैं ?


भारतीय प्रशासन अपनें कर्मियों से संचालित होता हैं.ये कर्मी अनेक संस्तरणों में अपनी योग्यतानुसार पदों पर कार्य करतें हैं.

कर्मियों के पदानुसार  संस्तरण  अनुसार ही इन पर वरिष्ठ अधिकारीयों का नियत्रंण रहता हैं.

जब कर्मीयों द्धारा प्रशासनिक नियमों के विरूद्ध कोई काम किया जाता हैं,जिससे शासन को गंभीर क्षति हुई हो तब संस्तरण में वरिष्ठ अधिकारी नियम विरद्ध कार्य की सजा निलम्बन के रूप में देता हैं.

निलम्बन के दोरान कर्मी को जीवन निर्वाह जितनी तनख़्वाह और अन्य ज़रूरी सुविधाँए मिलती रहती हैं.और नियम विरूद्ध किये गये कार्यों के सम्बंध में वरिष्ठ कार्यालय या न्यायालय द्धारा जाँच चलती रहती हैं.






##२.निलम्बन का इतिहास





कर्मीयों द्धारा राज खजानें या राजकाज में गड़बड़ करनें पर सजा देनें का वर्णन गुप्तकाल से मुगल काल तक मिलता हैं,परंतु निलम्बन का अधिक स्पष्ट ज्ञान हमें कोट़िल्य की रचनाओं में मिलता हैं,जहाँ उन्होंनें राज्य के ख़जानें से चोरी करनें वालें कर्मियों की सजा के बारें में अपनें ग्रंथ "अर्थशास्त्र" में उल्लेख किया हैं.




इसके पश्चात मुगल प्रशासन में भी इस व्यवस्था के बारें में बताया गया हैं,जहाँ मनसबदारों द्धारा गलत तरीकें से मनसब लेनें पर दंड़ की व्यवस्था का उल्लेख हैं.




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● भारत में सड़क दुर्घटना कारण और समाधान


● आश्रम व्यवस्था का विस्तृत वर्णन



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आधुनिक भारतीय प्रशासन में निलम्बन की जहाँ तक बात की जाती हैं,तो यह व्यवस्था विशुद्ध रूप से अँग्रेजों की देन हैं.

अंग्रेजी प्रशासनिक व्यवस्था दो तरह के निलम्बन पर आधारित थी भारतीय कर्मीयों के लिये कठोर निलम्बन या बर्खास्तगी तथा अंग्रेज कर्मीयों के लियें इंग्लैंड़ वापस भेजकर वहाँ उच्च पदों पर तैनाती.




##३.आधुनिक भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था और निलम्बन






आधुनिक भारतीय प्रशासनिक के सन्दर्भ में निलम्बन की बात की जायें तो यह व्यवस्था भारतीयों नें अंग्रेजों से जस की तस ग्रहण की थी.



 जिसमें समय - समय पर माननीय न्यायालय के निर्देश पर इसमें हुये संशोंधन को छोड़कर यह व्यवस्था आज भी उसी रूप में चल रही हैं.




यह व्यवस्था देश के सामाजिक वातावरण,अर्थव्यवस्था ,कार्य संस्कृति और स्वास्थ को किस तरह प्रभावित कर रही हैं आईंयें इसकी पड़ताल करतें हैं.




## राष्ट्र पर प्रभाव





भारत के सबसे बड़े नियोक्ता संगठन भारतीय रेलवें में होनें वालें निलम्बन की बात करें तो यहाँ औसतन 10-12 निलम्बन प्रतिदिन होतें हैं.




इन निलम्बनों में गंभीरतम् प्रकार के औसतन 1 निलम्बन को छोड़ दे तो बाकि के 10 -11 निलम्बन नियमों में चूक,मानवीय त्रुटि,नाचना गाना और वरिष्ठ अधिकारी या राजनेताओं की नापसंद के आधार पर होतें हैं.



निलम्बन के दोरान कर्मी को मुख्यालय में अटेच कर दिया जाता हैं और सामान्य से काम करनें को दे दिये जातें हैं.लगभग इसी प्रकार की कहानी भारत के हर सरकारी विभाग में दोहरायी जाती हैं.




यह व्यवस्था पूर्णत: अवैज्ञानिक या अतार्किक हैं क्योंकि निलम्बित कर्मी इस व्यवस्था से कुछ भी नहीं सीखता उसका काम मात्र इतना ही रह जाता हैं,कि घर से आकर उपस्थिति रजिस्टर पर अपनें हस्ताक्षर करें और समय होनें पर अपनें घर चला जायें.




क्या इस व्यवस्था से जो समस्या कर्मी ने निलम्बन के पूर्व पैदा की थी,उसका समाधान हो गया ? 




जवाब हैं,कदापि नही !




बल्कि हास्यपद बात तो यह हैं,कि कर्मी एक ही गलती के लियें दो- दो तीन - तीन बार सजा प्राप्त करता हैं.




उससे भी मज़ेदार बात यह हैं,कि जिस पद पर रहतें हुये कर्मी ने गलती की हैं,उसी प्रकार की गलती उसके कई पूर्वकर्मी कर चुकें होतें हैं,जिसमें कुछ कर्मीयों को निलम्बन की सजा मिल चुकी हैं और कुछ को नही.यानि पुरानी गलतीयों का सिलसिला लगातार जारी रहता हैं,कुछ समय बाद कर्मी बहाल हो जातें हैं,जितनें समय ये कर्मी निलम्बित रहतें हैं उस अवधि की तनख्वाह और भत्तें शासन को वहन करनें पड़तें हैं.





जितनें समय कर्मी निलम्बित रहता हैं उतनें समय के दौरान उसके द्धारा की गई गलतियों को सुधारनें का कोई प्रशिक्षण नही दिया जाता हैं.




इस व्यवस्था ने स्वतंत्रता से अब तक देश की अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा झटका दिया हैं,यदि मौद्रिक रूप से इस झटकें का आकलन करें तो यह देश के वर्तमान सकल घरेलू उत्पाद ( GDP)से  दो से तीन गुना बैंठता हैं.




## निलम्बित कर्मी के परिवार पर प्रभाव 





निलम्बन का सबसे बड़ा प्रभाव निलम्बित व्यक्ति के परिवार पर पड़ता हैं.उसकी पत्नि,बच्चें,बूढ़े माँ बाप और वह स्वंय  अजीब तनाव के साये में जीवन व्यतीत करतें हैं, और इस तनाव का मूल कारण हैं,निलम्बन को समाज में परिवार की बेइज्जती के रूप में प्रचलित होना.जब परिवार समाज के दबाव में होता हैं,तो परिवार के सभी व्यक्तियों की उत्पादकता भी प्रभावित होती हैं.





बच्चों का स्कूल प्रभावित होता हैं,माँ बाप पत्नि और स्वंय निलम्बित व्यक्ति का Biological body clock तनाव की वज़ह से बायोलाजिकल बाँड़ी क्लाक गड़बड़ हो जाता हैं.जिससे डाँक्टर की शरण लेनी पड़ती हैं,जिसका पूरा खर्चा स्वास्थ बिल के रूप में सरकार को चुकाना पड़ता हैं.




अब तक शासन इस व्यवस्था पर कई खरब रूपये फूँक चुका हैं,वही दूसरी और शासन " सर्वें संतु निरामया" की भी बात भी करता हैं.




बच्चों के पढ़ाई या अन्य गतिविधियों का नुकसान होनें का झट़का इतना बढ़ा हैं,कि आनें वालें कई वर्षों तक देश इस नुकसान की भरपाई  करनें की स्थिति में नहीं होता हैं.क्योंकि बच्चों की जीवन प्रत्याशा  कही अधिक होती हैं.




बच्चा परिवार के तनाव की अवधि में जो उत्पादकता राष्ट्र को प्रदान कर सकता था वह उस अवधि में प्रदान नहीं कर पाता.


## निलम्बित कर्मी के कार्य स्थल का वातावरण




भारत के एक बड़े सरकारी विभाग के सेवानिृत्त कर्मीयों से बातचीत के बाद सामनें आया कि
निलम्बित कर्मी और उसे निलम्बित करनें या करवानें वालें अधिकारी कर्मचारीयों  के सम्बंध पूरे सेवाकाल में कभी - भी सामान्य नहीं हो पातें हैं.और उनमें आपसी वैमनस्यता बनी रहती हैं,जो कभी - कभी भीषण खूनी संघर्ष का भी रूप ले लेती हैं.




यह स्थिति राष्ट्र को दोगुनी रफ़्तार से पिछे ले जा रही हैं,क्योंकि एक तो कार्यालयों का कामकाज आपसी वैमनस्यता की वजह से धीमा हो जाता हैं,वहीं दूसरी ओर पुलिस और कोर्ट़ कचहरी में कर्मी का सबसे कीमती कार्यालयीन समय बर्बाद होता हैं,यह समय वास्तव में कर्मी का नही राष्ट्र का समय होता हैं,क्योंकि आरोप सिद्ध नही होनें तक कर्मी राष्ट्र के संसाधनों और पैसों का उपयोग करता हैं.





## क्या कर्मी या अधिकारी का निलम्बन उसका स्वंय का निलम्बन हैं ?





कर्मी का या अधिकारी का निलम्बन को उसका स्वंय का निलम्बन कह कर समाचारों में प्रसारित किया जाता हैं.




लेकिन क्या कर्मचारी या अधिकारी का निलम्बन उसका स्वंय का निलम्बन होता हैं ?




 जवाब हैं नही ! 



जब किसी विभाग से कोई कर्मचारी या अधिकारी निलम्बित होता हैं तो इसका सीधा  मतलब हैं विभाग के शीर्ष मंत्री से लेकर उसके सबसे निम्न कर्मचारी और विभाग की नितियाँ तक भी असफल हैं.




यह ठीक उसी प्रकार हैं जब कोई बच्चा अपनी कक्षा में फैल होता हैं तो वह अकेला ही फैल नही होता बल्कि उसके शिक्षक,माता - पिता ,स्कूल सब फैल हो जातें हैं.क्योंकि ये लोग बच्चें की रूचि को पहचान ही नहीं पायें .




मध्यप्रदेश राज्य भारत का एकमात्र राज्य हैं,जहाँ उसके कर्मचारीयों की कार्य संस्कृति को सुधारनें और उन्हें आनंद देने के लिये "आनंद विभाग" का गठन किया गया हैं.





किंतु अपनें कर्मचारी अधिकारी को निलम्बित करनें में यह राज्य भी भारत का सिरमौर राज्य हैं.आनंद विभाग के गठन के कई वर्षों बाद भी यह विभाग कर्मचारीयों के लिये उल्लेखनीय नवाचार करनें में अब तक सफ़ल साबित नहीं हुआ हैं.




## निलम्बित करनें या करवानें वालें व्यक्ति की मनोस्थिति





 कई जिलों के जिला कलेक्ट़र कार्यालय का इतिहास देखनें पर पता चलता हैं कि जिस कलेक्टर के कार्यकाल में जितनें अधिक निलम्बन हुये उसका आगें का और पिछला कार्यकाल काफी आलोचना और विवाद का शिकार हुआ था.और कई कर्मचारी और अधिकारी ऐसे कलेक्ट़र को कर्मचारी विरोधी कलेक्ट़र कहकर प्रचारित करतें थे,जिसका प्रभाव उनकी आगामी पदस्थापना पर भी पड़ा.



कई सेवानिवृत्त जिला कलेक्टरों से जब निलम्बन के संबध में बात की जाती हैं,तो उनका जवाब होता हैं कि कर्मचारी या अधिकारी को निलम्बित करनें का उनका निर्णय उनके कार्यकाल का सबसे घटिया निर्णय था जिसनें उनकी आत्मा को  गहरे तक विदीर्ण किया हैं और जिसका उन्हें ताउम्र पछतावा रहेगा.




कुछ ऐसे व्यक्तियों से बात की गई जिन्होंनें अधीनस्थ कर्मी को इतनी छोटी सी गलती पर निलम्बित करवाया जो उसके संज्ञान में नही थी और जिसे सहकर्मी के संज्ञान में लाकर आसानी से ठीक करवाया जा सकता था.जब उनसे और आगें बात की गई तो उन्होंने आगे रहकर ही बताया की मैंनें थोड़ी सी वैमनस्यता में सहकर्मी को निलम्बित करवाके जिन्दगी भर के लिये एक सम्बंध की हत्या कर दी.




कोई भी संगठन उसके सदस्यों के संगठित प्रयासों और  संतुष्टि के आधार पर ही लक्ष्य प्राप्त कर सकता हैं,इसके अभाव में लक्ष्य बहुत दूर की कोढ़ी नज़र आता हैं.भारतीय प्रशासन के द्धारा लक्ष्यों की प्राप्ति में दशकों खपा देनें का भी यही कारण हैं.






## निलम्बन का विकल्प क्या होना चाहियें?





#१.हमनें पश्चिम की गलत बातों का अंधानुकरण करनें में कोई कसर नहीं छोड़ी जबकि हमारें प्राचीन आदर्श तिरोहित कर दिये गये .इस सन्दर्भ में भारत के कई आदिवासी समाजों का उदाहरण देना चाहूँगा कि कैसें वहाँ कि पंचायत उनके समाज को संचालित करती हैं.




जब कभी आदिवासी समाज में कोई शादी ब्याह होता हैं और उनका ढ़ोली इस उत्सव पर शराब पीनें की वज़ह से ढ़ोल बजानें में असमर्थ हो जाता हैं,तो उत्सव में खलल पड़ता हैं.इस समस्या से निपट़नें के लियें पंचायत ने शादी संपन्न होनें तक ढ़ोली के शराब पीनें पर प्रतिबंध रहता हैं.




यदि ढ़ोली इस उत्सव के दोरान बाराती या घराती के साथ शराब का सेवन कर लेता हैं और ढ़ोल बजानें में असमर्थ हो जाता हैं,तो ढ़ोली को जाति पंचायत गाँव के प्रत्येक घर के सामनें कई महिनों तक ढ़ोल बजानें की सजा देती हैं,जिसें ढ़ोली को पूरा करना पड़ता हैं.और इस दोंरान शराब पीनें पर प्रतिबंध रहता हैं,ताकि ढ़ोल बजानें वाला शराब का आदि नहीं बनें.




यही बात भारतीय प्रशासन के लिये लागू की जा सकती हैं.यदि कर्मी या अधिकारी कहीं कम गंभीर प्रकृति की गलती करता हैं तो उसे उस गलती को सुधारनें के लियें संबधित क्षेत्र की प्रशिक्षण शाला में भेजा जा सकता हैं.




किसी सूदूर ग्रामीण अँचल की शाला में जहाँ शिक्षक नहीं हैं वहाँ कर्मी को बच्चों को पढ़ानें के लियें भेजा जा सकता हैं.




किसान के खेतों में हाथ बंटानें भेजा जा सकता हैं.



 शासन द्धारा संचालित योजनाओं की जानकारी देनें के लिये गाँव में  भेजा जा सकता हैं.जिसमें गाँव में निवास करनें की अनिवार्य शर्त हो.




नेतिक दशा उन्नत करनें के लियें जीवन प्रबंधन की कार्यशाला में भेजा जा सकता हैं.



प्रत्येक सरकारी कर्मचारी के लियें सैनिक सेवा अनिवार्य की जाना चाहियें ताकि इनमें देशभक्ति की भावना जागृत हो.




शासकीय सेवकों के वेतन में अंतर बहुत कम रखा जाना चाहियें, उदाहरण के लिये एक प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी को हमारें देश में औसतन 2.50 लाख मिलतें हैं,वही एक वरिष्ठ लिपिक को 50 हजार प्रतिमाह मिलतें हैं,जबकि यही लिपिक प्रमुख सचिव के बगल में बैठकर फाईल तैयार करता हैं.




वेतन का यह बड़ा अंतर ही पास बैठनें वालें लिपिक के मन में हीन भावना पैदा करता हैं,जिससे वह अनेतिक रास्तों का सहारा लेकर आगें बढ़नें की कोशिश करता हैं,और पकड़ में आनें पर निलम्बन का दंश झेलता हैं.




प्रत्येक कर्मचारी अधिकारी को अच्छा कार्य करनें पर  असीमित पदोन्नति के अवसर प्रदान करनें चाहियें.




कर्मचारी अधिकारी को उनकी रूचि के कार्य करनें को दियें जायें.



जिस प्रकार खेलों में हार जीत किसी एक व्यक्ति के योगदान की वज़ह से नहीं होती उसी प्रकार किसी विभागीय काम की सफलता असफलता में भी  किसी एक व्यक्ति का योगदान नहीं माना जा सकता तो फिर निलम्बन व्यक्तिगत क्यों ? 






4 अप्रैल 2018

आत्मविकास के 9 मार्ग (9ways of self Development)

#आत्मविकास के 9 मार्ग

आत्मविकास के 9 मार्ग
आत्मविकास


 प्रथ्वी पर लड़े गये विनाशकारी महायुद्धों जैसें महाभारत का युद्ध, रामायण का राम - रावण युद्ध, प्रथम विश्व युद्ध तथा द्धितीय विश्व युद्ध के  परिणामों की जब चर्चा की जाती हैं,तो एक पक्ष की हार तथा दूसरें पक्ष की जीत से अधिक मानवता के विनाश की चर्चा कभी कभार कर ली जाती हैं.

लेकिन इन युद्धों से पूर्व और पश्चात आत्मा का भी अत्यधिक विनाश हुआ और आज भी हो रहा हैं,जिसकी चर्चा बहुत सीमित रूप से ही हम कर पातें हैं.


 इन युद्धों के पूर्व यदि मनुष्य अपना आत्मावलोकन कर लेता तो शायद मानवता इससे कही अधिक उन्नत होती.

आईयें जानतें हैं आत्मवलोकन का मार्ग क्या हैं 


## 1.सत्य वचन 


दुनिया में सत्य वचनों की बात तो बहुत होती हैं,किंतु सत्य वचन बोलनें वाले मुठ्ठीभर लोग ही होतें हैं.

हितोपदेश में लिखा हैं,कि असत्य वचन वाणी का गंभीर पाप हैं,जिसके बोलनें से आत्मा संताप को प्राप्त होती हैं.




कभी उस परिस्थिती के बारें में विचार करें जब आपनें झूठ बोला था तब आपके मन में कौंन - कौंन से नकारात्मक विचार आये जिनसें आपकी अंतरात्मा को कष्ट हुआ.


और अब उस परिस्थिती के बारें में विचार कीजिये जब आपनें सच बोला था,उसके बाद आपके मन में कौंन से नकारात्मक विचार आयें थे,शायद एक भी नहीं क्योंकि सत्य वचन को बोलनें के बाद याद रखनें की ज़रूरत नहीं रहती जैसाकि असत्य वचन को याद रखनें की होती हैं.


महात्मा गाँधी, अपनें जीवन में मिली अपार सफ़लता का श्रेय सत्य संभाषण को देते थे.महात्मा गांधी का तो यह मानना था कि सत्य बोलकर मनुष्य अपनी आत्मा को संतापों से बचाता हैं.


भगवान महावीर ने मनुष्य की मुक्ति के जो मार्ग बतायें हैं उनमें सत्य बोलना एक महत्वपूर्ण मार्ग हैं,इस मार्ग पर चलें बिना मनुष्य मुक्ति प्राप्त नही कर सकता हैं.




आचार्य चरक रचित चरक संहिता में लिखा  हैं कि

"तघथाशुचिंसत्याभिसन्धंजितात्मानंसंविभागिज्ञानविज्ञानवचनप्रतिवचनशक्तिसम्पन्नंस्मृतिमन्तंकामक्रोधलोभमानसोहेष्र्याहर्षोंपेतंसमंसर्वभूतेषुब्राम्ह्अविघात्"





अर्थात जो मनुष्य सत्य वचन बोलता हैं,काम क्रोध,लोभ से मुक्त हैं,ऐसे मनुष्य को ब्रम्ह मनुष्य कहा गया हैं,जिसकी चिकित्सा करनें को वैध को तत्पर रहना चाहियें,तथा ऐसे मनुष्य पर औषधियों का भी शीघ्रातिशीघ्र प्रभाव पड़ता हैं.


सत्य का एक पक्ष ओर हैं जिसके अनुसार सत्य को प्राप्त करना हैं,तो सच्चाई को स्वीकार करनें का गुण भी मनुष्य में होना आवश्यक हैं. इसके अभाव में मनुष्य सच्चाई को पूर्ण प्राप्त नही कर पायेगा.



ईमानदारी से अपनी कमज़ोरी को स्वीकार कर सुधार करनें का साहस होना सच्चे मनुष्य की निशानी हैं.


## 2.प्रायश्चित 




प्रायश्चित का तात्पर्य हैं अपने द्धारा किये गये गलत कामों का पश्चाताप या इसके बारें में अन्तर्मन से क्षमा मांगना.

स्वामी विवेकानंद का मानना हैं,कि सच्चे मन से किया गया प्रायश्चित आत्मा को अंदर तक शुद्ध करता हैं.

भगवान महावीर प्रायश्चित  को महत्वपूर्ण तपों में से एक मानतें हैं.उन्होनें कहा हैं,कि प्रायश्चित से क्रोध, लोभ,मोह का नाश होता हैं.यदि किसी मनुष्य से कोई गलती हो गई हैं,तो  प्रायश्चित कर स्वंय को हल्का कर लेना चाहियें.

महात्मा गांधी प्रायश्चित के लिये उपवास,दीन दुखीयों की सेवा का संकल्प लेतें थे.गांधी जी का स्पष्ट मानना था कि प्रायश्चित से आत्मा निर्मल और ब्रम्ह स्वरूपमय हो जाती हैं.




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##3.आत्मसंयम 


आत्मसंयम बिना आत्मविकास के बारें में सोचना जल बिन मछली के समान हैं.

स्वामी विवेकानंद आत्मसंयम की प्रतिमूर्ति थे,जिनका जीवन आत्मसंयम से ओतप्रेत था,इसी आत्मसंयम के बल पर वे स्वामी रामकृृष्ण के सबसे योग्य उत्तराधिकारी बनें.

स्वामी जी के आत्मसंयम का परिचय हमें शिकागों धर्म सम्मेलन में दिये भाषण और उसके बाद अमेरिका भ्रमण के कई दृष्टांतों में मिलता हैं.

आत्मसंयम अभ्यास और मन की एकाग्रता द्धारा विकसित होता हैं.

तुलसीदास जी आत्मसंयम के बारें में लिखतें हैं,"संयम:खलु जीवनम्"अर्थात संयम में बंधा व्यक्ति का जीवन सफल हैं.
संयमी व्यक्ति हर परिस्थिती में सम रहता हैं वह कभी आक्रांता नहीं होता हैं.

जिस व्यक्ति में आत्मसंयम की कला का बीजारोपण हो गया उस व्यक्ति की सम्पूर्ण जीवनशैली ही बदल जाती हैं.उसका आचार विचार ,व्यहवार,रहन - सहन सबकुछ उच्चकोटी के आदर्श स्थापित करतें हैं.





## 4.मौंन 


कहतें है शब्द मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत है शब्द जबतक आपके पास हैं तब तक उन पर आपका अधिकार हैं,किंतु यही शब्द जिह्वा से आजाद होतें ही आपके अधिकार क्षेत्र से परे हो जातें हैं.कहा भी गया हैं,कि '' बंदूक से निकली गोली और मुँह से निकली बोली कभी वापिस नही आतें"

 शब्द अप्रिय,अहितकर या कटु हो तो सामनें वालें पर तीर बनकर चुभतें हैं.जिसके बाद सामनें वालें से आरोप - प्रत्यारोप का दोर भी चल सकता हैं.यह आरोप - प्रत्यारोप आत्मा को असहनीय कष्ट पँहुचाता हैं.

इसके विपरीत यदि हम मौंन रहें तो न केवल अपनी आत्मा को कष्टों से बचातें हैं बल्कि मौंन के द्धारा आत्मा और मन की अन्तर्तम गहराई में गोते लगानें के योग्य हो जातें हैं.

कहते भी हैं कि किसी के द्धारा कहे गये कटु वचनों का सबसे प्रभावशाली जवाब मौंन ही होता हैं.
भगवान बुद्ध को जब ज्ञान प्राप्त हुआ तो कई दिनों तक उनके पास बोलनें के लिये एक शब्द भी नही था.बाद में उन्होंनें अपनें शिष्यों को उपदेश देतें हुये कहा था कि यदि हम अच्छा बोलनें में असमर्थ हैं तो मौंन ही श्रेयस्कर हैं.

दुनिया की 99.99% आबादी ऐसे लोगों की हैं जिनके पास कहनें को कुछ भी नहीं हैं लेकिन वो कहते जा रहें हैं,जबकि मात्र 0.1% आबादी ऐसी हैं जिनके पास कहनें को बहुत कुछ हैं,लेकिन वह कहतें नही बल्कि  करतें जा रहें हैं.



#5.मीठे वचन 




आत्मा को स्वस्थ और प्रसन्न रखनें का एक माध्यम मीठे वचन भी हैं.जो बात आपको पसंद नही हैं वह दूसरो को भी नही बोलना चाहियें.

जब हम दूसरों को कटु वचन बोलतें हैं तो जितना कष्ट सामनें वाले की आत्मा को होता है उतना ही कष्ट बोलनें वाले की आत्मा भी सहती हैं.यह न्यूट़न के गति के 3 रे नियम की तरह हैं अर्थात हर क्रिया के बराबर और उतनी ही मात्रा में विपरीत प्रतिक्रिया होती हैं.

यदि सामनें वाला आपके कटु वचनों का कोई प्रतिउत्तर नही  देता हैं तो भी आपकी आत्मा कष्ट पायेगी और ये कष्ट़ आपकी आत्मा को प्रकृति या ईश्वर द्धारा दिया जायेगा.यह बात  आंइस्टीन के ऊर्जा संरक्षण नियम की तरह शाश्वत सत्य हैं,अर्थात ऊर्जा का कभी क्षय नही होता हैं यह एक माध्यम से दूसरे माध्यम में स्थानांतरित होती रहती हैं.

श्री मद्भागवत पुराण में भी लिखा हैं कि किये गये कर्मों का फल इस जन्म में नही मिला तो अगले जन्म में अवश्य मिलेगा और यह संचयी कर्म कहलाता हैं.

वाणी के बारें में ही कबीरदास कहतें हैं

ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोय 
आपोको शीतल करें दूजों शीतल होय
अर्थात मनुष्य की वाणी ऐसी होना चाहियें कि वह न केवल दूसरों को शीतल करें बल्कि उस वाणी को बोलनें वाला भी  शीतलता ग्रहण करें.

मीठी वाणी बोलनें वाले व्यक्ति के व्यक्तित्व की चर्चा जब भी कही होती हैं उसके बारें में सकारात्मक बातें ही की जाती हैं.

 ज्योतिष को जाननें वालें भी कहतें हैं कि मीठे वचन बोलनें वालें की ग्रहदशा हमेशा अनूकूल  बनी रहती हैं और कष्ट भी क्षणिक समय तक ही ऐसे लोगों के पास तक रहतें हैं.

मीठे वचनों से संबधित एक कहानी ओर सुनाना चाहता हूँ 

एक बार एक राजा अपनें सेनापति और एक सैनिक के साथ जंगल में शिकार करनें गया काफी देर तक शिकार करनें से राजा बहुत थक गया था.और उसे बहुत प्यास भी लग रही थी.
राजा ने अपनें सेनापति से पानी पिलानें को कहा इस पर सेनापति जंगल में पानी की तलाश करनें गया .

सेनापति को दूर जंगल में एक झोपड़ी दिखाई दी जिसमें एक अँधा और बूढ़ा व्यक्ति निवास करता था.
सेनापति ने झोपड़ी में जाकर उस व्यक्ति से कहा :- ऐ ! अंधे ! थोड़ा पानी लाकर दे.

उस अंधे व्यक्ति ने सेनापति को पानी देनें से इंकार कर दिया और कहा ::- तुझ जैसें व्यक्ति को मैं पानी नहीं दूँगा.

सेनापति वापस राजा के पास वापस आ गया और कहा जंगल में मुझे एक झोपड़ी मिली परंतु उसमें रहनें वाले एक बूढ़े अँधे ने मुझे पानी देनें से इँकार कर दिया.

राजा ने इसपर पानी लानें अपनें सैनिक को पहुँचाया ,सैनिक झोपड़ी के पास जाकर चिल्लाया ! अरे ! ओ अंधे तू पानी देता हैं या तेरी जान लेकर पानी ले जाँऊ.

अँधा भी उसी रफ़्तार की आवाज में झोपड़ी के अँदर से चिल्लाया चाहें जान ले ले,पर पानी नहीं दूँगा.
सैनिक ने सोचा निहत्थे अँधे आदमी पर वार करना उचित नहीं होगा और वह भी बिना पानी के वापस लोट आया.

वापस लोटकर सैनिक ने राजा को सारा किस्सा सुनाया,राजा बिना कुछ बोलें वहाँ से अँधे की झोपड़ी की ओर चला गया.

झोपड़ी के अंदर पहुँचकर राजा ने आवाज लगाई महात्मा : मुझे बहुत तीव्र प्यास  लगी हैं,यदि आप मुझे पानी पीला दोगे तो आपकी बड़ी कृपा होगी.

राजा के वचन सुनकर अँधा बोला : राजन् आपको मैं पानी अवश्य ही पीलाऊँगा.
अँधे के राजन् कहकर पुकारनें पर राजा बहुत आश्चर्य हुआ!!
राजा ने अंधें से पूछा : महात्मा आपनें मुझे राजा कहकर क्यों पुकारा क्या आपको मेरें बारें में पता हैं.
अँधे ने कहा नही राजा मुझे आपके बारें में कुछ पता नहीं था.
राजा ने फिर प्रश्न किया तो फिर आपको कैसें पता चला कि मैं राजा हूँ?
अँधें ने कहा:जिसके बोल इतनें मीठे हो कि आत्मा की गहराई में जाकर आत्मा को प्रसन्न कर दें वह व्यक्ति निश्चित रूप से राजा होनें का अधिकारी होता हैं.

#6.ईमानदारी


ईमानदारी आत्मा को स्वस्थ और प्रसन्न रखनें का सबसे महत्वपूर्ण उपागम हैं. जब हम किसी चीज में बेईमानी करतें हैं तो हमेशा किसी न किसी चीज का डर सा बना रहता हैं यह डर आत्मा को असीम अधिक क्षति पहुँचाता हैं.

आप स्वंय आजमा कर देखिये जब कभी आपने बेईमानी की थी तब आप कितनें समय तक एक अजीब ड़र के साये में रहे थे.वास्तव में इतनें समय तक आपकी आत्मा भी कष्ट में रही थी.

आत्मा जितनें समय कष्ट में रहती हैं उतनें समय तक गुणवत्तापूर्ण जीवन की संभावना क्षीण हो जाती हैं.

#7.आत्मवलोकन 


आत्मावलोकन आत्मा के विकास का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग हैं, आत्मवलोकन के बिना आत्मा आत्मविकास संभव नहीं हैं.

आत्मविकास के लिये आत्मवलोकन ध्यान मुद्रा और आत्मा के साथ एकांत में समय बितानें से प्राप्त किया जा सकता हैं.

यदि आप नियमित रूप से एकाग्र होकर ध्यान करें तो एक समय पश्चात मनुष्य उस स्थिति को ग्रहण कर लेता हैं जिसमें आत्मा व्यक्ति के दैनिक क्रियाकलापों को संचालित करती हैं.

आत्मा के इस प्रकार मनुष्य की दैनिक गतिविधियों को संचालित करनें से मनुष्य देवत्व के गुणों से युक्त हो जाता हैं.
गौतम बुद्ध के सिद्धार्ध से बुद्ध बननें यही मार्ग था,वर्धमान के महावीर बनने का यही मार्ग था,नरेन्द्र के विवेकानंद बनने का यही मार्ग था और मोहनदास के महात्मा गांधी बनने का भी यही मार्ग था.

भगवान महावीर ने यह बात ज़ोर देकर कही थी कि "दु:ख तुम्हारें पास हैं तो उपाय भी तुम्हारें पास हैं" तुम इस बात की आशा मत करों की तुम्हारें दु:ख का समाधान महावीर किसी चमत्कारिक शक्ति से कर देगा.महावीर सिर्फ मार्ग दिखा सकता हैं उस पर चलना तुमको ही पड़ेगा.

तुम जब आत्मवलोकन के द्धारा अपनी समस्याओं का समाधान खोजनें की कोशिश करोगें तो पाओगे की समाधान भी तुम्हारें आसपास ही हैं,फिर तुम्हें अपनी समस्या के लिये किसी भविष्यवक्ता के पास चक्कर नही लगाना पड़ेगा.

आजकल का विज्ञान नित प्रतिदिन नये - नये आविष्कार कर रहा हैं,जिनसे जिन्दगी आसान बन रही हैं.किंतु इन आविष्कारों के पश्चात भी हम वैदिक कालीन आयु 100 वर्ष को प्राप्त नही कर पा रहें हैं, क्यों ? क्योंकि हमनें आविष्कारों की नींव आत्मवलोकन को भूला दिया ,जिसके बल पर मनुष्य की कोशिकाओं का स्वास्थ टीका होता हैं.


#8.अहिंसा 


इस दुनिया में यदि हम मनुष्य द्धारा की गई हिंसा का इतिहास देखें तो पता चलेगा कि जितना प्रयत्न हिंसा मनुष्य द्धारा ने अपनें इस नश्वर शरीर की नश्वर इच्छाओं को प्राप्त करनें के लिये किया  हैं उतना ही प्रयत्न अहिंसा द्धारा विकास के लिये भी किया गया हैं परंतु मनुष्य ने अपने लक्ष्यों को प्राप्त करनें के लियें अहिंसा पर हिंसा को अधिक तरजीह दी हैं.फलस्वरूप आत्मविकास का मार्ग हमेशा अवरोधित ही रहा,जबकि आत्मविकास के मार्ग पर अहिंसा के पड़ाव पर विश्राम करके ही आगे बढ़ा जा सकता हैं.

जब आप किसी के विरूद्ध हिंसा करतें हैं,तो यह हिंसा उसके शरीर के साथ ही नहीं बल्कि उसकी आत्मा के साथ भी की जाती हैं.और जब किसी की आत्मा कष्टमय होती हैं तो वह दूसरें की आत्मा को भी कष्टमय बनाती हैं.

भगवान महावीर,महात्मा गाँधी अहिंसा पर इतना अधिक बल देतें थे कि किसी चीज में हिंसा दिखाई देनें पर वे उस चीज से जीवनभर किनारा कर लेते थे.इसका एक उदाहरण महात्मा गांधी का देना चाहूँगा जिन्होंनें चोरी - चोरा आंदोंलन में हिंसा समाहित होनें पर उस आंदोंलन को तुरंत स्थगित कर दिया था.

इस आंदोंलन में हुई हिंसा से महात्मा गाँधी की आत्मा को अत्यधिक कष्ट़ पहुँचा था.

सम्राट़ अशोक द्धारा कलिंग युद्ध में की गई हिंसा और इस युद्ध में हुई व्यापक जनहानि से अशोक की आत्मा इतनें कष्ट को प्राप्त हो गई थी कि कंलिंग के बाद अशोक ने हिंसा को सदा के लिये त्याग दिया और अंहिसा का प्रचार प्रसार करनें में अपनी समस्त ऊर्जा और जीवन का बचा समय ख़पा दिया था.

अंहिसा मनुष्य की आत्मा को संतापों से तो बचाती ही है,बल्कि इसके द्धारा हुआ आत्मविकास मनुष्य की कई पीढ़ीयों का भविष्य सुधार देता हैं.

विकास की एक अनिवार्य शर्त शांति या अहिंसा भी हैं,जापान जो कि द्धितीय विश्व युद्ध के पूर्व एक साम्राज्यवादी राष्ट्र था और अपनी इस साम्राज्यवादीता के लिये हिंसा का सहारा लेकर अनेक राष्ट्रों पर कब्जा कर रहा था किंतु द्धितीय विश्व युद्ध में हार जानें के बाद जापान द्धारा अंहिसा का मार्ग चुना गया उस पर चलकर जापान आज कही अधिक शक्तिशाली और विकसित राष्ट्र बन गया हैं.

##9.आत्मा को प्रिय लगनें वालें काम


प्रथ्वी पर जन्म लेनें वाला प्रत्येक प्राणी अपनी कुछ विशेष योग्यताओं के साथ जन्म लेता हैं और इन्ही विशेष योग्यताओं के साथ काम भी करता हैं.

आपनें स्वंय ने महसूस किया होगा कि आपको कुछ विशेष काम करनें में बड़ा आनंद आता हैं,जबकि वही काम जब दूसरा करता हैं,तो उसे बोझ लगता हैं.

जबकि कुछ काम जो आपको बोझ लगतें हैं दूसरें उसे बड़े आनंद के साथ करतें हैं.

जिन कामों को करनें से आनंद मिलता हैं वास्तव में वह काम हमारी आत्मा को अत्यंत प्रिय लगतें है.

जब व्यक्ति अपनी रूचि के कामों को करता हैं,तो उसकी प्रसिद्धि भी चहुँओर फैलने लग जाती हैं.
स्टीव जाब्स,ध्यानचंद,सचिन तेडुंलकर,लता मंगेशकर,पेले,माइकल फेल्पस,उसेन बोल्ट,अमिताभ बच्चन आदि कुछ ऐसे नाम हैं,जिन्होंने वही पेशा अपनाया जो इनकी आत्मा को प्रिय लगा ,फिर परिणाम आप सब के सामनें हैं,ये लोग अपनें - अपनें पेशों में इतिहास रच चुकें हैं.

ऐसे ही एक क्रिकेटर शेन वार्न हैं,जिन्हें बचपन में समुद्र किनारें बेठकर कलाई से पत्थर घुमाकर फेंकनें में असीम आनंद मिलता था,और ये कई घंटो तक समुद्र में कलाई से घूमाकर पत्थर फेंका करते थे.

इनके इस तरह से कलाई घूमाकर पत्थर फेंकनें की कला को आस्ट्रेलिया के प्रसिद्ध क्रिकेटर ने देखा और क्रिकेट  में कलाई घूमाकर गेंद फेंकने के लिये कहा .

इसके पश्चात की कहानी आप सब जानतें ही हो कि कैसें यह व्यक्ति विश्व क्रिकेट इतिहास का सबसे सफल क्रिकेटर बना.

अमिताभ बच्चन भी उन कालजयी व्यक्तियों में सम्मिलित हैं जिन्होंनें अपनें शौक को अपना पैशा बनाकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करवाया,अमिताभ बच्चन आज 78 वर्ष के हैं परंतु 18 से 19 घंटे काम करतें हैं,इनके साथ काम करनें वाले नवागत अभिनेता इनके  काम देखकर दाँतों तले ऊगंली दबा लेतें हैं.   ःःःःःः

वास्तव में आत्मविकास का यह मार्ग बिना आत्मवलोकन के अधूरा हैं और अधूरा ही रहेगा.

यदि संसार के समस्त मनुष्य आत्मवलोकन के सहारे आत्मा का विकास करें तो गरीबी,साम्प्रदायिकता,भूखमरी,वर्ग संघर्ष,जातिय संघर्ष,युद्ध, आतंकवाद,नक्सलवाद और बेरोजगारी जैसी समस्याओं का अपनें आप समाधान मिल जायेगा.

सप्तचक्रों को कैसें जागृत करें 


 योग विज्ञान  पारंपरिक भारतीय चिकित्सा विज्ञान, आयुर्वेद में औषधीय चिकित्सा के साथ योगिक विधियों का सहारा लेकर व्यक्ति को रोगमुक्त रखा जाता है । योग और आयुर्वेद का मूल उद्देश्य ही यही है कि व्यक्ति बीमार होने पर उपचार करवाने की बजाय इस प्रकार की दिनचर्या रखें कि वह बीमार ही न हो,और इसी उद्देश्य की प्राप्ति हेतू शरीर में स्थित सात मूलाधार चक्र या सप्तचक्र को जागृत कर व्यक्ति बीमारी से मुक्त रह सकता है ।

सप्तचक्र क्या होतें हैं 

योग विज्ञान के अनुसार हमारे शरीर के मस्तिष्क से लेकर मलद्वार तक सात स्थान होतें हैं । जिन्हें मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र,मणिपुर चक्र,अनाहत चक्र,विशुद्धि चक्र, आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र कहते हैं। इन स्थानों को योग की विशेष मुद्राओं के द्वारा जागृत करने पर व्यक्ति निरोगी जीवन जी सकता है।
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सप्तचक्र सिद्धांत के अनुसार हमारे शरीर में कुल 72 हजार नाड़ियां होती हैं जिनमें से तीन प्रमुख नाड़ियां हैं 

• ईडा़
• पिंगला
• सुषुम्ना

इन नाड़ियों में से ईडा और पिंगला के जागृत होने के बाद सुषुम्ना नाड़ी जागृत हो जाती हैं और इसके बाद शरीर के सप्तचक्र जागृत हो जातें हैं। 

सप्तचक्रों को कैसें जागृत करतें हैं 


1.मूलाधार चक्र


मूलाधार चक्र गुदा के ठीक पिछे रीढ़ की हड्डी के सबसे नीचे स्थित होता है। मूलाधार चक्र के जाग्रत हो जाने पर शरीर के प्रजनन अंग  की कार्यप्रणाली सुचारू होकर इनसे संबंधित रोग नहीं होते हैं।  मूलाधार चक्र शरीर का संतुलन बनाए रखने का काम भी करता है इसके जागृत हो जानें पर शरीर का दांया और बांया भाग मस्तिष्क द्वारा ठीक बारह बजे घड़ी की सुई जिस तरह  एक सीध में होती है उसी प्रकार संतुलित रहता है।

मूलाधार चक्र कैसे जाग्रत करें

जिन योगासनों को करने में शरीर और मन को विशेष मेहनत करनी पड़ती है उनके द्वारा मूलाधार चक्र जाग्रत हो जाता है उदाहरण के लिए योगिक जागिंग,स्वास्तिका आसन, पश्चिमोत्तानासन,भूनम्नासन ।

2.स्वाधिष्ठान चक्र

स्वाधिष्ठान चक्र मूत्राशय के ठीक पिछे वाले रीढ़ की हड्डी पर स्थित होता है। प्रजनन प्रणाली के लिए जरूरी हार्मोन इस चक्र के जाग्रत होने पर स्त्रावित होतें हैं।

स्वाधिष्ठान चक्र कैसे जाग्रत करें

स्वाधिष्ठान चक्र जानुशिरासन, मंडूकासन और कपालभाति द्वारा जागृत होता है।

3.मणिपुर चक्र 


मणिपुर चक्र नाभि के ठीक स्थित होता है। इस चक्र के जाग्रत होने पर पाचन प्रणाली के सारे विकार दूर होते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से शरीर की गर्मी और सर्दी में संतुलन बना रहता है।

मणिपुर चक्र कैसे जाग्रत करें

पवनमुक्तासन, मंडूकासन,एकपादमुक्तासन, भस्त्रिका प्राणायाम और कपालभाति द्वारा मणिपुर चक्र जाग्रत होता है।

4.अनाहत चक्र

अनाहत चक्र रीढ़ की हड्डी में ह्रदय के थोड़ा सा निचें स्थित होता है। अनाहत चक्र के जाग्रत होने पर ह्रदय और फेफड़ों की सफाई और इनकी कार्यकुशलता बढ़ती है।

अनाहत चक्र कैसे जाग्रत करें

उष्ट्रासन, भुजंगासन,अर्धचक्रासन,और भस्त्रिका प्राणायाम द्वारा अनाहत चक्र जाग्रत होता है।

5.विशुद्धि चक्र

विशुद्धि चक्र थाइराइड ग्रंथि के ठीक पिछे स्थित होती है। विशुद्धि चक्र जाग्रत होने पर शरीर की मेटाबॉलिज्म रेट संतुलित रहती है।

विशुद्धि चक्र को कैसे जाग्रत करें

हलासन, सेतुबंधासन,सर्वागांसन,और उच्चाई द्वारा विशुद्धि चक्र जाग्रत करें।

6.आज्ञा चक्र

मानसिक मजबूती और स्थिरता प्रदान करने वाला आज्ञा चक्र दोनों भोंहो के बीचों-बीच स्थित होता है।

आज्ञा चक्र को कैसे जाग्रत करें

सुखासन, मकरासन,शवासन अनुलोम-विलोम द्वारा आज्ञा चक्र को जाग्रत किया जाता है

7.सहस्रार चक्र

सहस्रार चक्र सिर के ऊपर मध्य भाग में स्थित होता है यह चक्र जाग्रत होने पर सभी चक्रों में सामंजस्य स्थापित हो जाता है या कह लें यह चक्र एक राजा की तरह है जो सभी चक्रों को नियंत्रित करता है।

सहस्रार चक्र कैसे जाग्रत करें

मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धि चक्र और आज्ञा चक्र के जाग्रत हो जाने पर सहस्रार चक्र स्वत: ही जाग्रत हो जाता है।


# यम और नियम yam aur niyam

यम और नियम ,आसन,प्राणायाम, मुद्रा और बंध शट क्रिया और ध्यान के सैद्धान्तिक पक्ष, Theoretical aspects of yam niyam aasan pranayama,mudra bndha, and shat kriya in Hindi
 yoga poses


यम और नियम योग की आधारभूत क्रियाएँ हैं जिनके बिना अन्य यौगिक क्रियायें मनचाहा परिणाम नही देगी ।

यम और नियम द्धारा व्यहवार पर स्वनियत्रंण किया जाता हैं जिससे एक स्वस्थ्य दृष्टिकोण विकसित होता हैं ।

यम और नियम द्धारा  सामाजिक और मानसिक दृष्टिकोण के लिये हमारें दिमाग को तैयार किया जाता हैं । 

यम और नियम  क्रमश:  पंच नैतिक और पंच उद्धविकासीय निरीक्षण हैं ।

#आसन Aasan in Hindi


आसन संस्कृत शब्द "असी" से लिया गया हैं । जिसका अर्थ हैं "बैठना"

यौगिक क्रिया में आसन शरीर की एक विशेष अवस्था हैं जो शरीर को संतुलित करनें के लियें किया जाता हैं । आसन द्धारा शरीर की सभी क्रियाएँ लयबद्ध रूप चलती हैं ।

आसन द्धारा शारीरिक और मानसिक स्थिरता प्राप्त होती हैं ।

#प्राणायाम Pranayama in Hindi


प्राणायाम दो शब्दों से मिलकर बना हैं प्राण + आयाम  

प्राण का मतलब हैं मनुष्य को जीवित रखनें वाली जीवन शक्ति ।

प्राण के बिना मनुष्य निष्प्राय हैं जब तक प्राण रहेगा तब तक शरीर भी रहेगा जहाँ प्राण निकला वहाँ शरीर भी नष्ट़ हो जाता हैं ।

आयाम का मतलब होता हैं विस्तार करना 

इस प्रकार प्राणायाम वह यौगिक क्रिया हैं जो जीवनशक्ति को विस्तारित करती हैं । प्राणायाम के माध्यम से श्वास प्रक्रिया को नियंत्रित कर जीवनशक्ति को विस्तारित किया जाता हैं । 

प्राणायाम करनें से जीवन लम्बा और रोगरहित होता हैं ,मस्तिष्क की सारी प्रक्रियाएँ सुचारू रूप से चलती हैं तथा मस्तिष्क इस प्रकार तैयार होता हैं कि हर परिस्थिति में संतुलन स्थापित कर सकें ।


#मुद्रा और बंध Mudra and bandh in Hindi


मुद्रा और बंध यौगिक क्रियाओं के प्रकार हैं जिसके द्धारा ऐच्छिक और अनेच्छिक मांसपेशियों पर अपनी इच्छानुसार नियंत्रण रखा जाता हैं । मुद्रा और बंध के द्धारा शरीर की ऊर्जा का प्रवाह शरीर के सभी भागों में एकसमान बनाया जाता हैं । 

मुद्रा और बंध यौगिक क्रियाओं से शरीर के आंतरिक अंग मज़बूत बनतें हैं ।

प्राणायाम के दौरान जो मुद्रा प्रयोग की जाती हैं उसे बंध कहतें हैं । बंध के माध्यम से शरीर की ऊर्जा एक भाग से दूसरें भाग तक प्रवाहित की जाती हैं ।

#शट क्रिया 

शट क्रिया या शट कर्म सम्पूर्ण शरीर का शुद्धीकरण करनें वाली  6 क्रियाएँ हैं । इन क्रियाओं में पानी,हवा,रूई की रस्सी,कपडे के माध्यम से शरीर को शुद्ध किया जाता हैं ।

ये शट क्रियायें हैं नेति, धोती,बस्ती,नौली ,त्राटक और कपालभाँति

# नेति 

नेति क्रिया में नासा छिद्रों को पानी के माध्यम से धोया जाता हैं तथा रूई की रस्सी के माध्यम साफ किया जाता हैं ।

#धोती क्रिया 

धोती क्रिया में अमाशय को धोकर साफ किया जाता हैं । 

#बस्ती क्रिया

Colon साफ करनें की क्रिया को बस्ती क्रिया कहा जाता हैं इस विधि में विशेष औषधियों का प्रयोग कर colon को साफ किया जाता हैं ।

#नौली क्रिया


नौली क्रिया पेट की मांसपेशियों को मज़बूत करनें के लियें की जाती हैं ।

#त्राटक 

आँखों को एकबिन्दु पर स्थिर रख शुद्धिकरण किया जाता हैं ।


#कपालभाँति 

कपालभाँति द्धारा फेफड़ों को शुद्ध किया जाता हैं ।


० बरगद पेड़ के फायदे

० तनाव क्या हैं

० बहेडा का वानस्पतिक नाम

० दशमूल क्वाथ के फायदे

० बांस के औषधीय गुण

० फैटी लिवर का इलाज






































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