29 जन॰ 2019

सॉलिड बनो इंडिया 11 साप्ताहिक आयरन फोलिक एसिड अनुपूरण (WIFS)कार्यक्रम11

भारत में एनीमिया एक गम्भीर समस्या के रूप में विद्यमान हैं । भारत सरकार के साथ राज्य सरकारे एनीमिया से निपटने के लिये वृहत कार्ययोजना के तहत काम कर रही हैं । एनीमिया को खत्म करने के लिये चलाये जाने वाला ऐसा ही एक कार्यक्रम हैं । सॉलिड बनो इंडिया ।

आइये जानते है सॉलिड बनो इंडिया कार्यक्रम के बारे मे विस्तार से की सॉलिड बनो इंडिया कार्यक्रम क्या है ।

एनीमिया आयरन या लौह तत्व की कमी से होने वाली गम्भीर बीमारी हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों के अनुसार देश के 50% से अधिक किशोर किशोरियों में खून की कमी पायी जाती है । किशोरियों में पर्याप्त पोषण नहीं मिलने के कारण और माहवारी शुरू होने से एनीमिया गम्भीरतम रूप में विद्यमान रहता हैं ।

# साप्ताहिक आयरन फोलिक एसिड अनुपूरण कार्यक्रम किशोर अवस्था पर ही क्यों केंद्रित हैं ?


1.इस गम्भीरतम एनीमिया का प्रभाव किशोर अवस्था से ही आ जाने के कारण देश का बड़ा नुकसान होता हैं । क्योंकि किशोर अवस्था से ही बीमार होने का सीधा मतलब है राष्ट्र लम्बे अर्से तक बीमार व्यक्ति के साथ आगे बढ़ेगा । 

2.किशोर बालिकाओं में माहवारी के दौरान अधिक रक्तस्राव।

3.किशोर अवस्था मे एनीमिया से बचाव एवं उपचार अधिक आसान होता हैं ।


# किशोरों में एनीमिया एवँ पोषण में कमी के परिणाम 


1.जल्दी थकावट

2.सांस फूलना 

3.घबराहट होना

4.चक्कर आना

5.एकाग्र नही हो पाना

6.कार्यक्षमता प्रभावित होना

7.आयु अनुसार वृद्धि नहीं होना 

8.यौन परिपक्वता में देरी

9.गर्भपात होना

10.रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी

11.बार - बार बीमार होना

12.असुरक्षित मातृत्व

13.पढ़ाई में कमज़ोर

14.हाथो की हथेलियों में, नीचे की पलकों में अंदर की ओर, जीभ, त्वचा, नाखून में सफेदी या पीलापन

15.मुँह के कोने फटे होना 

16.मुँह में घाव होना

17.परिश्रम करने पर हृदय की गति तीव्र होना

18.पैरों में ऐंठन होना

19.पैरों में सूजन आना

आयरन क्या है ?


आयरन हमारे शरीर के लिये आवश्यक खनिज पदार्थ हैं।आयरन मानव शरीर की कोशिकाओं का ही भाग हैं । आयरन प्रोटीन हीमोग्लोबिन का ही भाग हैं जो फेफड़ों से हमारे शरीर से विभिन्न अंगों में ऑक्सीजन पहुंचाने का कार्य करता हैं ।

एनीमिया क्या हैं ?


मानव रक्त में हीमोग्लोबिन नामक एक लाल रंगदृव्य होता हैं ,जो लौह तत्वों से परिपूर्ण होता हैं ।इसका कार्य शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचाना होता हैं ।

आहार में आयरन की कमी के कारण रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा घट जाती हैं।जिससे रक्त पतला एवँ कम लाल रंग का हो जाता हैं इस कारण शरीर के विभिन्न अँगों में ऑक्सीजन की आपूर्ति कम हो जाती हैं। यह स्थिति रक्ताल्पता अथवा एनीमिया कहलाती हैं ।

# एनिमिया की पहचान हेतू हीमोग्लोबिन का न्यूनतम स्तर 


आयु / लिंग                              हीमोग्लोबिन ग्राम / 100

बच्चे 6 माह से 6 वर्ष                             11                   
शिशु 6 से 14 वर्ष                                  12                

किशोर 15 से 19 वर्ष                              12                

वयस्क पुरूष                                          13      

वयस्क गर्भवती                                        11


एनिमिया के सामान्य कारण 


1.पोषण से सम्बंधित

आहार के माध्यम से कम लौह तत्व लेने से शरीर में आयरन की कमी,

आयरन की निम्न जैव उपलब्धता आदतन उच्च फेट वाला अन्न आधारित आहार लेना तथा लौह तत्वों को अवशोषित करने वाले तत्वों जैसे की विटामिन C का कम लेना ।

अपोषणीक एनीमिया 


किशोर अवस्था में शरीर में लौह तत्व की आवश्यकता एकाएक बढ़ जाना ।

पेट में कृमि होना।

शरीर में संक्रमण होना।

माहवारी के दोरान अत्यधिक रक्तस्त्राव ।

कम उम्र में विवाह के बाद जल्दी जल्दी गर्भधारण ।


किशोरावस्था में एनिमिया की रोकथाम एवँ नियंत्रण 

आयरन युक्त सन्तुलित आहार जैसे अरहर दाल,रोटी, चावल, हरी पत्तेदार सब्जियां, फल जैसे अनार तथा दूध आदि का सेवन दैनिक उपभोग में करना ।

विटामिन सी युक्त खाद्य पदार्थ लौह तत्वों को शरीर मे अवशोषित करने में सहायक होते हैं । अतः भोजन में इनको शामिल करना ।

चाय में उपस्थित टैनिन लौह तत्वों का शरीर में अवशोषण कम करता हैं । अतः भोजन के तुरंत बाद चाय नही पीना चाहिए ।


साप्ताहिक आयरन फॉलिक एसिड अनुपूरण कार्यक्रम (wifs )

Wifs कार्यक्रम द्वारा किशोरावस्था में होने वाली रक्ताल्पता को नियमित साप्ताहिक आयरन तथा फॉलिक एसिड की गोलियों से रोका जाता हैं । आदर्श रूप में 1 वर्ष में 52 गोलियां रक्ताल्पता निरोध के लिये पर्याप्त मानी जाती हैं । 

1.किशोर एवँ किशोरियों को साप्ताहिक आयरन फॉलिक एसिड की बड़ी नीली गोली खिलाना (आयरन 100 मि.ग्रा. व फॉलिक एसिड 500 माइक्रो ग्राम )

2.वर्ष में दो बार पेट के कीड़ों का संक्रमण रोकने हेतू एल्बेंडाजोल 400 मि. ग्रा. वर्ष में दो बार देना ।


आयरन फॉलिक एसिड गोली लेने की कुछ सावधानियां


खाली पेट गोली नही लेना चाहिये ।

गोली खाने के बाद कुछ मामलों में चक्कर आना,जी मचलाना जेसे दुष्प्रभाव देखे जाते हैं ,इसके लिये गोली का सेवन भोजन के पश्चात करना चाहिये ।

गोली सेवन के 1 घण्टे पश्चात तक चाय / कॉफी का सेवन न करें ।


प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न


1.यदि कोई बालक बालिका गोली का सेवन किसी वज़ह से नियत दिन नहीं कर पाते तो क्या करेंगे ?

उत्तर : यदि किसी कारण गोली का सेवन नियत समय पर नहीं हो पाता हैं ,तो अगले दिन गोली का सेवन किया जा सकता हैं।इसके पश्चात गोली नियमित समय से फिर शुरू की जा सकती हैं ।


2.क्या थैलीसीमिया या सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित व्यक्ति को आयरन फॉलिक एसिड गोली दी जा सकती हैं ?

उत्तर :: यदि बच्चा थैलीसीमिया या सिकल सेल एनिमिया से पीड़ित हैं तो अच्छा होगा गोली नहीं दी जाये क्योंकि इस केस में आयरन की कमी से एनीमिया नहीं हुआ है ।

3.यदि कोई गम्भीर बीमारी हैं तो क्या गोली देनी चाहिये ?

उत्तर :: यदि कोई गम्भीर बीमारी का पता चलता हैं तो गोली तुरन्त रोक देनी चाहिये और इस बारे में विशेषज्ञ द्वारा दिये गये निर्देशों का पालन करना चाहिये ।

4.क्या आई. एफ.ए. की गोली खाने से कोई एलर्जी या रिएक्शन होता हैं ?

उत्तर :: जी नहीं आई. एफ.ए. की गोली से किसी भी प्रकार का कोई रिएक्शन नहीं होता हैं ।

5.क्या आई. एफ.ए. गोली को टीबी उपचार के साथ दिया जा सकता हैं ?

उत्तर:: जी आई. एफ.ए. गोली को टी. बी. उपचार के साथ दिया जा सकता हैं । 

6.गोली खाने के बाद उल्टी जी मचलाना चक्कर आने पर क्या करना चाहिये ?

उत्तर :: गोली खाने के बाद यदि उल्टी ,जी मचलाना, या चक्कर आ रहे हो तो निकटतम स्वास्थ्य केंद्र पर उपचार ले ।







20 जन॰ 2019

8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और महिला सशक्तिकरण के भारतीय मूल्य

8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और महिला सशक्तिकरण के भारतीय मूल्य



दोस्तों आज मैं आपको 8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और महिला सशक्तिकरण के भारतीय मूल्य से से सम्बंधित विचारों से परिचित कराना चाहता हूँ। तो आईये जानते हैं 8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और महिला सशक्तिकरण के भारतीय मूल्य के बारे मे 

वैदिककालीन भारतीय साहित्य गार्गी और मैत्रयी जैसी दार्शनिक महिला विद्वानों द्वारा अपने पुरुष समकक्ष विद्वानों के साथ किये जाने वाले उच्च कोटि के शास्त्रार्थ से भरा हुआ है ।

रानी लक्ष्मी बाई  जैसी वीरांगना ने अपनी नेतृत्व क्षमता ओर साहस से अंग्रेजों को परिचित करवाकर महिला को कमतर नहीं आंकने को विवश किया। 

अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च


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स्वंत्रता संग्राम में भी महात्मा गांधी के आह्वान पर महिलाएं ऐसे समय में घर से निकलकर आगे आयी जब उनकी बिरादरी मात्र 2 प्रतिशत शिक्षित थी,साथ ही महिलाओ पर पुरूष प्रधान समाज की कई वर्जनाएं कठोरतम रूप में प्रचलित थी।


लेकिन महिला सशक्तिकरण की परिकल्पना आजादी के बाद जिस तेजी से परवान चढ़नी थी । वह नहीं चढ़ पायी क्योंकि पुरूष प्रधान समाज की वर्जनाओं का अंधा समर्थन खुद नारी शक्ति ने ही कर महिला सशक्तिकरण की धार को कुंठित किया । उदाहरण के लिये किसी की बेटी जब दूसरे के घर बहू बन कर जाती हैं तो सबसे पहले अतार्किक और अवैज्ञानिक मर्यादा की लकीर  सास या ननद द्वारा ही खींची जाती हैं ।


भारतीय सविंधान निर्माताओं ने महिला समानता को सविंधान में यथोचित स्थान दिया लेकिन शासन प्रशासन की कार्यप्रणाली ने सविंधान निर्माताओं की भावना आगे बढ़ाने में  बहुत लचीला रुख अपनाया यही कारण हैं कि सविंधान में समानता मिलने के बावजूद महिला सशक्तिकरण के कई अधिनियम बनाने पड़े। 



कई पढ़ी लिखी और प्रशासन के उच्च पदों पर बैठी महिलाएं भी पुरुष प्रधान वर्चस्व को आगे बढ़ाने का काम कर रही हैं । मैंने कई महिला प्रशासकों को देखा हैं जो रात में काम करने से मात्र इस आधार पर छूट चाहती हैं और शासन भी इस कदम में उनके साथ खड़ा रहता हैं, क्योंकि वह महिला हैं क्या यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में महिला प्रशासकों की सही भूमिका हैं ?

समाज के शीर्ष पदों पर बैठी महिलाएं और अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त महिलाएं भी शादी के बाद या तो अपना उपनाम (surname) बदल लेती हैं या फिर अपने उपनाम के पिछे पति का उपनाम जोड़कर समाज को स्पष्ट संदेश दे रही हैं कि वह अभी पुरुष प्रधान समाज की बेड़ियों से जकड़ी हुई है। एक स्त्री अपने दांपत्य जीवन की शुरुआत युवावस्था में करती हैं और यदि स्त्री समाज के शीर्ष पद पर हैं तो निश्चित रुप से उसके पालन पोषण और इस पद तक पहुंचाने में माता पिता की अहम भूमिका रहती हैं ऐसे में एक झटके में माता पिता की पहचान त्यागकर नया उपनाम ग्रहण कर लेना "स्त्री गुलामी"का प्रतीक नहीं तो और क्या है ? 

क्या किसी पुरुष ने कभी ऐसा किया ? यदि नहीं,तो हर बार महिला ही क्यों ? प्रश्न स्वाभाविक है लेकिन शायद उत्तर बहुत अस्वाभाविक हो ?



 इसके स्थान पर इन जिम्मेदार पदों पर बैठी महिलाओं को समाज में महिला सशक्तिकरण का आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए जिससे समानता का सही सन्देश समाज मे संचारित हो।



कई लोग महिला सशक्तिकरण का बहुत संकीर्ण अर्थ निकाल कर बैठे हैं 


✓जो पुरुष करता हैं वह महिला करें क्या यही महिला सशक्तिकरण हैं ? 


✓जो पुरुष पहने वह महिला पहने क्या यह महिला सशक्तिकरण कहा जायेगा ?


✓जो पुरुष सेवन करें वह महिला करें क्या यह महिला सशक्तिकरण हैं ?



✓क्या पुरुष महिला के वस्त्र पहनकर सशक्त बन जायेगा ?



नहीं ना बल्कि जो महिला करती हैं वह पुरुष करेगा तो वह हास्यपद और उपहास का पात्र बन जाता हैं । तो फिर महिला पुरुष के समान दिखकर सशक्त कैसे ?



 आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता, और आत्मविश्वास ही महिला सशक्तिकरण के 3 स्तम्भ हैं ।जिस पर टिक कर ही महिला सशक्त हो सकती हैं ,इन स्तम्भों पर टीका महिला सशक्तिकरण न केवल महिलाओं को बल्कि देश और दुनिया को नई ऊंचाइयों पर ले जायेगा ।



यह बात सही हैं कि भारत में पिछले 10 - 15 वर्षों के दौरान महिला सशक्तिकरण का नया दौर शुरू हुआ हैं पंचायत से लेकर विधानसभा और संसद महिला प्रतिनिधियों की साक्षी बन रही हैं लेकिन इस दौर को और आगे ले जाना होगा और यह काम भी खुद उन्हें ही अपने बलबूते करना होगा । क्योंकि पुरुषवादी मानसिकता और उनके अधिकार में रहकर प्राप्त किया गया सशक्तिकरण वास्तव में अधूरा सशक्तिकरण ही माना जायेगा । स्त्री का सशक्तिकरण, उसके जीवन का आकर्षण उसके अपने निज पहचान में छिपा हैं न कि पुरुषों की प्रतिलिपि बनने में ।


भारत और यूरोप का स्त्री सशक्तीकरण 



भारत और यूरोप में महिला सशक्तिकरण की तुलना करें तो पायेंगे की भारत में स्त्री सशक्तिकरण समाज का अभिन्न अंग रहा हैं, वेद की ऋचाओं से लेकर वर्तमान आदिवासी समुदायों की समाज व्यवस्था इसका जीता जागता प्रमाण हैं। जबकि यूरोप का स्त्री सशक्तिकरण  18 वी शताब्दी में 'मैरी' के फ्राँस की क्रांति से प्रभावित स्वतन्त्रता ,समानता और भातृत्व से जुड़ा हैं।


 लेकिन इसके बावजूद वर्तमान भारत का स्त्री सशक्तिकरण यूरोप के स्त्री सशक्तिकरण से बहुत पीछे हैं।बल्कि यह कहा जा सकता हैं कि भारत का स्त्री सशक्तिकरण भारतीयता से प्रभावित होने के बजाय यूरोप के स्त्री सशक्तिकरण की प्रतिलिपि बनने की ओर अग्रसर हैं।

✓ यदि यह सशक्तिकरण भारतीयता से विलग होगा तो इसकी खूबसूरती खत्म हो जायेगी।



✓यदि यह सशक्तिकरण भारतीयता से भिन्न हुआ तो इसकी आत्मा मर जाएगी ।



यदि यह सशक्तिकरण भारतीयता की सुंगध को विश्व मे नहीँ फैला पाया तो ऐसे जीवन मूल्यों का पतन होगा जो स्वामी विवेकानंद, महात्मा गाँधी, मदर टेरेसा, देवी अहिल्याबाई,मैत्रयी, गार्गी आदि ने विश्व को दिये थे ।




० मध्यप्रदेश सामान्य अध्ययन




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