सोमवार, 20 अगस्त 2018

अटल बिहारी वाजपेयी (ATAL BIHARI VAJAPEYI) राजनीति के मर्यादा पुरुषोत्तम

              ।।। अटल बिहारी वाजपेयी ।।।


स्वतंत्रता के पश्चात भारत में ऊँगली पर गिनने लायक नेता ही हुए हैं जो लोगों के दिलों में राज करतें हैं। ऐसे ही शख्स का नाम हैं, अटल बिहारी वाजपेयी ।
भारतीय जनता पार्टी
 अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी भारत के सबसे लोकप्रिय जननायकों में अग्रणी पंक्ति के जननायक थे। जिन का कद इतना ऊँचा था कि पद, पार्टी इनसे शोभा पाते थे न कि पद से इनकी शोभा थी। यही कारण था कि राजनीति से रिटायर होने के 14 वर्षों के बाद जब इनकी अंतिम यात्रा निकली तो देश के प्रधानमंत्री 5 किमी पैदल चलकर इन्हें बिदा करने " स्मृति वन " तक गये हो।
जिनकी मृत्यु के शोक में कई देशों के राष्ट्र ध्वज झुकें हो।
मन्त्र मुग्ध कर देने वाले उनके भाषण जिन्हें सुनने के लिये लोग मिलों चलकर पहुंचते थे । गजब की तार्किकता ओर हाजिर जवाबी वे जब संसद में किसी महत्वपूर्ण मसले पर बोलने खड़े होते तो हंगामों के लिये बदनाम लोकसभा ऐसी ख़ामोश होती थी कि लोकसभा की टेबलों पर पन्ने पलटने की आवाज स्पष्ट सुनी जा सकती थीं।

● भृष्टाचार के बारें में विस्तृत जानकारी

विदेश मंत्री ओर प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए भारत की विकास यात्रा को सुनहरे पंख लगाने का माद्दा यदि किसी राजनेता में था तो वो सिर्फ ओर सिर्फ अटल बिहारी वाजपेयी ही थे।

विपक्ष में रहते हुए भी सत्ता पक्ष के अच्छे कामों पर इंदिरा गांधी को दुर्गा का अवतार बताने वाला शख्स कोई ओर नहीं सिर्फ और सिर्फ़ अटल बिहारी वाजपेयी ही हो सकते थे।

सत्ता में रहते हुए विपक्ष को की आवाज संसद में बैठकर सुनने वाली शख्शियत कोई हो सकती थी तो वो सिर्फ़ अटल बिहारी वाजपेयी ही थे ।

सत्ता आएगी, सत्ता जायेगी लेकिन यह देश रहना चाहिए यह कहने वाले व्यक्तित्व का नाम भी अटल बिहारी वाजपेयी था। 


अटल बिहारी वाजपेयी ये मात्र नाम हैं बल्कि जीवन शैली हैं जो हर एक भारतीय के जीवन में परिलक्षित होना चाहिए।

             

               ।।। अटल बिहारी वाजपेयी का जीवन परिचय ।।।


अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म ग्वालियर में 25 दिसम्बर 1924 को हुआ था।इनके पिता का नाम कृष्ण बिहारी वाजपेयी था जबकि माता का नाम श्री मति कृष्णा बाजपेयी था।

अटल बिहारी वाजपेयी के पिताजी मूल रूप से बटेश्वर आगरा के रहने वाले थे।इनके पिताजी ग्वालियर रियासत में अध्यापक थे।

।।।  शिक्षा।।।


अटल बिहारी वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा बड़नगर जिला उज्जैन और ग्वालियर में हुई।

बड़नगर में उस समय के ऐंग्लो वर्नाकुलर स्कूल में इनके पिताजी का स्थानांतरण हो गया था जिस वज़ह से अटल बिहारी वाजपेयी भी इनके साथ बड़नगर आ गये और उन्होंने यहाँ 5 वी कक्षा में प्रवेश लिया।

अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी जिंदगी का पहला भाषण भी बड़नगर के इस स्कूल में  ब्रिटिश कालीन भारत में रेल विषय पर दिया था ।

एक साल बड़नगर में पढ़ने के बाद इनके पिताजी का स्थानांतरण पुनः ग्वालियर हो गया जहाँ इन्होंने विक्टोरिया कॉलेज  से बी ए तक की पढ़ाई की।

इन्होंने एम ए की पढ़ाई DAV कॉलेज कानपुर से पूरी की .अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने पिता के साथ LLM यानि वकालात की पढ़ाई कानपुर के ही DAV कॉलेज से की थी।


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ने से पूर्व अटल बिहारी वाजपेयी साम्यवाद विचारधारा से प्रभावित थे किन्तु बाबा साहब आप्टे के कहने पर  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों में भाग लेने लग गये ,और संघ के सक्रिय कार्यकर्ता बन गये।




।।। राजनीतिक जीवन ।।।


अटल बिहारी वाजपेयी जनसंघ के संस्थापक सदस्य थे। वे सन 1968 से 1973 तक इसके अध्यक्ष रहें।

सन 1955 में जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा किंतु हार गये ,सन 1957 में दूसरी लोकसभा के लिये बलरामपुर से विजयी हुए थे।

इसके पश्चात अटल बिहारी वाजपेयी ने 10 बार सांसद रहने का रिकॉर्ड बनाया था।

सन 1977 में जनसंघ से जनता पार्टी बनायी जिसे आपातकाल के बाद बहुमत मिला ओर अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री बने।

6 अप्रैल 1980 को जनता पार्टी टूट गई ओर अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की जिसके वे प्रथम अध्यक्ष बने ।

अटल बिहारी वाजपेयी दो बार राज्य सभा के लिये भी निर्वाचित हुए थे ।

।।। अटल बिहारी वाजपेयी का प्रधानमंत्री काल ।।।


प्रथम बार 11 वी लोकसभा के समय वे 16 मई 1996 को देश के प्रधानमंत्री बने किन्तु बहुमत के अभाव में इन्हें 28 मई 1996 को त्यागपत्र देना पड़ा ।

दूसरी बार 19 मार्च 1998 को प्रधानमंत्री बने किंतु मात्र एक वोट से इनकी सरकार गिर गयी।

तीसरी बार 13 वी लोकसभा में 10 अक्टूबर 1999 को 23 दलों को साथ लेकर प्रधानमंत्री बने ओर कार्यकाल पूर्ण करने वाले पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।

इस तरह अटल बिहारी वाजपेयी 3 बार देश के प्रधानमंत्री रहे ,वे भारत के 10 वे प्रधानमंत्री थे ।


।।।  अटल बिहारी वाजपेयी के महत्वपूर्ण कार्य ।।।


।।। सयुंक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी का मान बढ़ाया।।।


सन 1977 में अटल बिहारी वाजपेयी देश के विदेश मंत्री रहते हुए सयुंक्त राष्ट्र संघ को हिंदी में सम्बोधित करने वाले पहले व्यक्ति बनें ।

।।। पोखरण परमाणु परीक्षण।।।


11 और 13 मई 1998 को परमाणु परीक्षण कर भारत को विश्व रंगमंच पर एक महत्वपूर्ण भूमिका के लिये तैयार करने वाले सिर्फ़ अटल बिहारी वाजपेयी ऐसा करने वाले इंदिरा गांधी के बाद सिर्फ दूसरे शख्स थे ।
अटलबिहारीवाजपेयी
 पोकरण में अटल जी 

परमाणु परीक्षण के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने वैज्ञानिक के सम्मान में लाल बहादुर शास्त्री द्वारा दिये गये नारे जय जवान, जय किसान को आगे बढ़ाते हुए जय विज्ञान कहकर वैज्ञानिको के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया म

अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा किया गया परमाणु परीक्षण दुनिया के कई राष्ट्रों को नागवार गुजरा ओर अमेरिका समेत कई राष्ट्रों ने भारत पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये किन्तु अटल बिहारी वाजपेयी ने इसकी परवाह नहीं करते हुए विकास दर 7 प्रतिशत के स्तर पर बनाये रखी।

अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा किये गये परमाणु परीक्षण का ही असर था कि बाद में दुनिया के कई ताकतवर राष्ट्र भारत को ताकतवर राष्ट्र के रूप में गम्भीरता से सुनने लगे। 

बाद के वर्षों में भारत के परमाणु अप्रसार सन्धि पर हस्ताक्षर नहीं करने के बावजूद अमेरिका जैसे राष्ट्रों ने भारत से परमाणु ऊर्जा से सम्बंधित समझौते किये ।

।।। कारगिल विजय ।।।


सन 1999 में पाकिस्तान ने भारत की महत्वपूर्ण सुरक्षा चौकियों पर कब्जा कर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं का उल्लंघन किया था । ये अटल बिहारी वाजपेयी के दूरदर्शी नेतृत्व का प्रतिफल था कि भारत ने तुरन्त कार्यवाही करते हुए भारत की भूमि को छुड़ा लिया बल्कि पाकिस्तान को करारा जवाब देकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति से अलग थलग कर दिया।

इसके पहले अटल बिहारी वाजपेयी दोस्ती का पैगाम लेकर सदा ए सरहद से पाकिस्तान जा चुके थे किन्तु पाकिस्तान ने दोस्ती का उल्टा प्रतिफल दिया । आज पाकिस्तान के अनेक बुद्धिजीवी अटल बिहारी वाजपेयी के इस महत्वपूर्ण काम को असाधारण बताकर अटल बिहारी वाजपेयी को शान्ति दूत कहकर संबोधित कर रहे हैं।


अनेक पाकिस्तानी ओर भारतीय अर्थशास्त्रियों का मत हैं कि यदि पाकिस्तान अटल बिहारी वाजपेयी के दोस्ती के पैगाम को स्वीकार कर लेता तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था विदेशी सहायता की इस हद तक गुलाम नहीं होतीं।


।।। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना ।।।


अटल बिहारी वाजपेयी उन नेताओं में शुमार थे जो गांव के विकास में भारत का विकास देखते थे। उनका मानना था कि यदि भारत के गांव पक्की बारहमासी सड़को से जुड़ गये तो भारत के विकास में पंख लगते देर नहीं लगेगी।

इसी उद्देश्य से उनके द्वारा शुरू की गई प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना आज भारत की सबसे महत्वपूर्ण सड़क परियोजना बन गयी हैं जिनके दुम पर भारत के गांव तरक्की में कई कदम आगे बढ़ चुके हैं ।


।।। स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क योजना ।।।


देश के शीर्ष महानगरों को आपस में सड़क और रेल मार्ग से जोड़ने की योजना अटल बिहारी वाजपेयी के द्वारा ही शुरू की गई थी यदि ये योजना आगामी भविष्य में पूरी होती हैं तो भारत सड़क के मामले में विश्व के विकसित राष्ट्रों के समकक्ष हो जायेगा।

इस योजना की शुरू करने वाले प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी सदा याद किये जायेंगे ।

 अटल बिहारी वाजपेयी ने लोक लेखा समिति के अध्यक्ष, विदेश मामलों से सम्बंधित समिति के अध्यक्ष और विपक्ष के नेता रहते हुए भी देश हित में महत्वपूर्ण कार्य किये जिससे देश की प्रतिष्ठा बढ़ी।


।।। सफ़ल गठबंधन सरकार ।।।


सन 1995 के बाद लोगों ने गठबंधन राजनीति का युग देखना शुरू किया किंतु कोई भी गठबंधन सरकार सन 1999 तक सही तरीके से अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी । देश विषम परिस्थितियों में था क्योंकि कुछ समय पहले ही सरकार को सोना गिरवी रखकर अर्थव्यवस्था चलानी पड़ रही थीं।

इन सब के बीच अटल बिहारी वाजपेयी ने 24 दलों को मिलाकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की नींव रखी ओर सफलतापूर्वक कार्यकाल पूरा किया। राजग सफलतापूर्वक कार्यकाल पूरा करने वाली पहली गैरकांग्रेसी सरकार थीं ।






।।। सम्मान ।।।


अटल बिहारी वाजपेयी को अपने राजनीतिक जीवन में अनेक सम्मानों से अलंकृत किया गया या  कह ले सम्मान उन्हें पाकर पाकर अलंकृत हुए इनमे कुछ महत्वपूर्ण सम्मान निम्न हैं 

सन 1992 पदम् विभूषण 

सन 1994 में गोविंद वल्लभ पन्त सर्वश्रेष्ठ सांसद पुरुस्कार

सन 2014 भारत रत्न देने की घोषणा की गई और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 27 मार्च 2015 को घर जाकर उन्हें इस पुरस्कार से सम्मानित किया ।


।।। सरस्वती के वरद पुत्र अटल बिहारी वाजपेयी ।।।



अटल बिहारी वाजपेयी प्रखर पत्रकार कवि और उच्च कोटि के लेखक थे ।उन्होंने लम्बे समय तक राष्ट्रधर्म,वीर अर्जुन ,स्वदेश और पांचजन्य का सम्पादन कार्य कुशलतापूर्वक किया।

इसके अलावा अनेक रचनाओं से अपनी लेखन विधा का परिचय कराया इन रचनाओं में प्रमुख रचनाएं हैं मृत्यु या हत्या, अमर बलिदान, संसद में 3 दशक, सेक्युलरवाद, राजनीति की रपटीली राहें और मेरी 51 कविताएं प्रमुख हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रिय कविताओं की बानगी 


।।। मौत से ठन गयी ।।।


ठन गई ।मौत से ठन गई ।

जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोककर वह खड़ी हो गई, यूँ लगा जिन्दगी से बड़ी हो गयी।

मौत की उमर क्या है ।दो पल भी नहीं जिंदगी सिलसिला आज कल की नहीं।

में जी भर जिया,में मन से मरूँ ,लौटकर आउँगा ,कूच से क्यों डँरु ।

तू दबे पाँव चोरी छिपे से न आ, सामने वार कर फिर मुझे आजमा।
मौत से बेख़बर जिंदगी का सफ़र, शाम हर सुरमई,रात बंशी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई गम ही नही ,दर्द अपने पराये कुछ कम भी नहीं।प्यार इतना परायो से  मुझेको मिला ,न अपनों से बाकि हैं कोई गिला ।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये, आंधियों में जलाएं हैं बूझते दिये।आज झकझोररता तेज तूफान हैं, नाव भँवरों की बाँहो में मेहमान हैं ।

पार पाने का मगर कायम मगर हौसला ।देख तेवर तूफाँ का तेवरी तन गयी। मौत से ठन गई।म

।।। हार नहीं मानूँगा रार नहीं ।।।



टूटे हुए तारों से फूटे बासन्ती स्वर,पत्थर की छाती में उग आये नव अंकुर ।।

झरे सब पिले पात,कोयल की कूक रात । प्राची में अरुणिमा की रेख देख में पाता हूँ । गीत नया गाता हूँ ।।

टूटे हुए सपनों की सुने कोंन सिसकी । अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठीठकी ।। हार नहीं मानूंगा रार नहीं  ठानूँगा ।।

काल के कपाल पर लिखता हूँ मिटाता हूँ । गीत नया में गाता हूँ ।।




।।। ताजमहल ।।।

यह ताजमहल यह ताजमहल । यमुना की रोती धार विकल कल ।कल चल चल।।

जब रोया हिंदुस्तान सकल तब बन पाया ताजमहल यह ताजमहल यह ताजमहल।।


।।। क़दम मिलाकर चलना होगा ।।।


बाधायें आती हैं आये घिरे प्रलय की घोर घटाये
पाँवो के निचे अंगारे ,

सिर पर यदि बरसे ज्वालायें ,

निज हाथों में हँसते हँसते,

आग लगाकर चलना होगा क़दम मिलाकर चलना होगा ।।

हास्य रुदन में तूफानों में ,

अगर असँख्यक बलिदानों में ,

उद्यानों में वीरानों में।

अपमानों में सम्मानों में ।

उन्नत मष्तक उभरा सीना। पीड़ाओं में पलना होगा ।

क़दम मिलाकर चलना होगा।।

उजियारे में अंधकार में ।

कल कहार में बीच धार में ।

घोर घृणा में  पूत प्यार में ।

क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में ।

जीवन के शत शत आकर्षक ।

अरमानों को ढलना होगा।क़दम मिलाकर चलना होगा।।

सम्मुख फैला अगर धेय्य पथ ।

प्रगति चिरन्तन कैसा इति अब ।

सुस्मित हर्षित कैसा श्रम शलभ ।

असफ़ल सफल समान मनोरथ।

सबकुछ देकर कुछ न माँगते पावस बनकर ढलना होगा क़दम मिलाकर चलना होगा।।

कुछ काँटो से सज्जित जीवन ।

प्रखर प्यार से वंचित यौवन।

नीरवता से मुखरित मधुबन

,परहित अर्पित अपना तन मन,

जीवन को शत शत आहुति में।जलना होगा, गलना होगा। क़दम मिलाकर चलना होगा।।

।।। निधन ।।।

दिनांक 16 अगस्त 2018 को युग पुरूष अनन्त ज्योति में विलीन हो गया ।
















शनिवार, 18 अगस्त 2018

मांडव ( mandav) या मांडू ऐतिहासिक, प्राकृतिक और अध्यात्म से सरोबार पर्यटन स्थल

                                        ।।। मांडव ।।।

मध्यप्रदेश भारत का ह्रदय प्रदेश हैं, जहां अनेक विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक, धार्मिक, और प्राकृतिक स्थल मौजूद हैं, इन स्थानों पर देश विदेश के लाखों पर्यटक प्रतिवर्ष आते हैं।
ऐसा ही एक पर्यटन स्थल मांडू या मांडव हैं जो ऐतिहासिक, प्राकृतिक और आध्यात्मिक विशेषताओं को अपने में समेटे हुए हैं।

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                ।।। मांडव कहाँ स्थित हैं ।।।



मांडव या मांडू भारत के  मध्यप्रदेश राज्य के पश्चिमी भाग में स्थित धार जिले में  हैं। धार से मांडव की दूरी 36 किमी हैं।

जबकि इंदौर से मांडव की दूरी 100 किमी हैं।
विंध्याचल पर्वतमालाओं पर लगभग दो हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित यह स्थल लगभग 72 वर्ग किलोमीटर में फैला हैं।

 ।।। इतिहास ।।।


मांडव की स्थापना का श्रेय परमार राजवँश को जाता हैं। परमार कालीन राजाओं ने इस स्थान को अपने " शाही निवास " के रूप में प्रयोग किया।

बाद के अनेक राजवंशो ने इस पर कब्जा कर लिया और अपने निवास स्थान के रूप में उपयोग किया।


।।। दर्शनीय स्थल ।।।


       ।।। कांकड़ा खोह ।।।


मांडू में प्रवेश करते ही यह खाई पर्यटकों का बरबस ही ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं। इस खायी के मुहाने पर प्राकृतिक झरना हैं ,इस झरने से गिरता जल पर्यटकों के सामने अद्भुत दृश्य उपस्थित करता हैं।

बरसात के समय जब छोटी छोटी बदलिया इस खोह के ऊपर से गुजरती हैं तो ऐसा लगता हैं सफेद चादर आसमान में उड़ रही हैं।

यह खोह अनेक जीव जंतुओं और प्राकृतिक वनस्पतियों का आश्रय स्थल हैं।

   

  ।।। 12 दरवाजे ।।।


मांडू के आसपास सुरक्षा प्रदान करने के दृष्टिकोण से यहां के राजाओं ने 12 दरवाजों का निर्माण कराया था।ये दरवाजे निर्माण कला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं । जिनमें प्रमुख दरवाजे हैं ,दिल्ली दरवाजा, आलमगीर दरवाजा, भंगी दरवाजा, गाड़ी दरवाजा ,तारापुर दरवाजा, जँहागीर दरवाजा आदि।

 इन दरवाजों को देखने पर उस काल की उच्चस्तरीय सुरक्षा का अहसास होता हैं। हालांकि इनमें से कुछ दरवाजे अवशेष बन चुके हैं।

।।। जहाज महल ।।


इस महल का निर्माण सन  1469 ईस्वी से 1500 ईस्वी के मध्य गयासुद्दीन ख़िलजी ने कराया था।
मांडू
जहाज महल

 दो तालाबों के बीच स्थित होने के कारण यह महल पानी मे लंगर डाले जहाज के समान दिखाई देता हैं । इसी कारण इसे जहाज महल कहा जाता हैं । इस महल की वस्तुकला बेजोड़ कारीगरी का नमूना हैं। इस महल के सामने खड़े होकर सेल्फी लेने का अपना ही मजा है।

            

।।। रूपमती महल ।।।


यह महल अपनी बेजोड़ निर्माण कला के कारण जितना प्रसिद्ध हैं उससे कहीं अधिक इस महल के साथ रानी रूपमती ओर बाजबहादुर की प्रणय गाथा प्रचलित हैं। 
मांडव
 रानी रूपमती महल

बाजबहादुर शेरशाह सूरी के सूबेदार शुजात खान का बेटा था।शेरशाह सूरी ने सन 1542 ईस्वी में मांडू पर कब्जा कर लिया ओर शुजात खान को यहाँ का सूबेदार नियुक्त कर दिया, शुजात खान की मृत्यु के बाद बायजीद उर्फ बाजबहादुर ने स्वंय को मांडू का स्वतंत्र शासक घोषित कर लिया।

एक बार बाजबहादुर शिकार के सिलसिले में बाहर गया हुआ था जहाँ उसकी नज़र  रूपमती पर पड़ी, रूपमती के असीम सौन्दर्य और संगीत निपुणता पर बाजबहादुर मोहित हो गया।बाद में बाजबहादुर ने रूपमती से विवाह कर लिया।

कहते हैं कि हिंदू  रानी रूपमती की माता नर्मदा में असीम श्रद्धा थी ओर  रूपमती महल पर चढ़कर यहाँ से कई किलोमीटर दूर स्थित नर्मदा के दर्शन उपरांत अन्न ग्रहण करती थी।

इस महल के ऊपरी भाग से नर्मदा नदी चांदी के पतले तार के समान दिखाई देती हैं। पर्यटक आज भी इस महल पर चढ़कर नर्मदा को देखने की कोशिश करना नहीं भूलते हैं।

इस महल की छत से विंध्याचल पर्वत मालाओं का मंत्र मुग्ध कर देने वाला दृश्य दिखाई देता हैं।

महल के अंदर दरवाजों, खिडकियों की विशालता ओर नक्कासी को देखकर इस महल की समृद्धता का अहसास होता हैं, जो काल के थपेड़ों में विस्मृत हो गई हैं।

यहां के विशाल कमरे एक अजीब खामोशी की ओर  इशारा करते प्रतीत हो रहे हैं मानो कह रहे हो कभी हमारी भी समृद्ध राते ओर दिन  हुआ करती थीं।



।।। हिंडोला महल ।।।


हिंडोला महल का निर्माण गयासुद्दीन ख़िलजी ने ईस्वी सन 1469 से ईस्वी सन  1500 के आसपास कराया था।

यह महल अफगानी वास्तुकला का बेजोड़ नमूना हैं,इस महल की भीतरी दीवार भीतर की की ओर झुकी हुई हैं जिस कारण यह दूर से झूले जैसा दिखाई देता हैं। चूंकि मालवा में झूले को हिंडोला कहा जाता हैं इसी कारण इसे हिंडोला महल कहा जाता हैं।

इस महल का उपयोग महत्वपूर्ण व्यक्तियों के सभा स्थल के रूप में किया जाता था । जिसे ''दीवाने - ए - खास "कहा जाता था।

इस महल में लगे खूबसूरत स्तम्भ इस स्तम्भ की भव्यता का अहसास कराते हैं।


       ।।। जामी मस्जिद ।।।


यह इमारत सीरिया में बनी मस्जिद की तरह हैं ।इसके निर्माण काल को लेकर इतिहासकारो में एकराय नहीं हैं।कोई इसे परमार कालीन बताता है तो कोई सल्तनत कालीन।

इस इमारत को आम जनता की समस्या सुनने के लिये प्रयुक्त किया जाता था । इसमें बैठने के कई चबूतरे बने हैं जिस पर राजा और उनके सिपहसालार बैठते थे। 

मांडू
 राजा के बैठने का चबूतरा

यह इमारत अपनी भव्यता ओर उत्कृष्ट शिल्प के कारण पर्यटकों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। इसका भव्य प्रवेश द्वार और आँगन देशी विदेशी पर्यटक के लिये किसी कौतूहल से कम नहीं हैं।


 ।।। नीलकण्ठ महादेव ।।।


यह इमारत एक स्मारक थीं, जिसे मुगल काल में अकबर के सिपहसालार शहाबुद्दीन खां ने बनाया था। सन 1585 में अकबर ने अपनी हिंदू रानी जोधाबाई के लिये " शिवलिंग " की स्थापना कराई थी । बाद में जब ओरंगजेब हिन्दू मन्दिरों को नष्ट कर रहा था तब इस शिवलिंग को पत्थरो से हिंदू राजाओं ने ढकवा दिया था।

सन 1724 के आसपास मराठा शासक पेशवा बाजीराव प्रथम ने इस पर ढंकी शिला को हटाकर शिवलिंग की पुनः पूजा प्रारम्भ करवायी तब से यहां निरन्तर पूजा हो रही हैं।

सावन महिने में जब शिवभक्त कावड़िये इस शिवलिंग पर दूर दूर से जल चढ़ाने आते हैं तो बहुत ही आध्यात्मिक दृश्य यहां उपस्थित होता हैं। 

यहां स्थित शिवलिंग मन्दिर के मुख्य द्वार से 2 से 3 फिट नीचे हैं । श्रद्धालुओं को शिवलिंग के दर्शन हेतु सीढ़ी के सहारे नीचे उतरना पड़ता हैं। 

।।। होशंगशाह का मक़बरा ।।।


गोरी वंश के शासक होशंगशाह ने मांडू पर चौदहवीं शताब्दी में शासन किया था। उसने अपने जीवित रहते ही अपने नाम से इस मकबरे का निर्माण करा दिया था।ताकि उसकी मौत के बाद भी दुनिया उसे याद करती रहे।

यह मक़बरा संगमरमर से बना है ,शाहजहां ने इसी मकबरे से प्रेरित होकर अपने वास्तुविद अब्दुल हमीरी को मांडू भेजा और इसके जैसा मकबरा आगरा में बनाने की इच्छा जताई।

अब्दुल हमीरी ने इस मकबरे से प्रेरित होकर आगरा में ताजमहल का निर्माण किया था। ताजमहल इस मकबरे की नकल कर बनाया गया है बस दोनों में अंतर इतना ही हैं कि इस मकबरे के चारों ओर गुम्बद हैं जबकि ताजमहल के चारों ओर मीनारे हैं।

यदि आपने ताज महल देखा है ओर इस इमारत को नही देखा तो निश्चित रूप में आपका ताजमहल देखना अधूरा माना जायेगा।

इस मकबरे में संगमरमर से निर्मित विभिन्न संरचना कला पारखियों की नज़र में बहुत ही अद्भुत ओर अविस्मरणीय हैं। 



।।। चतुर्भुज श्री राम मंदिर ।।।


मांडू में स्थित चतुर्बुज श्री राम मंदिर में स्थापित श्री राम की प्रतिमा 10 वी शताब्दी की हैं।
इस प्रतिमा की स्थापना रघुनाथ दास महाराज ने की थी जो कि पुणे ( महाराष्ट्र ) निवासी थे।

 इस जगह प्रतिमा जमीन के नीचे होने की बात उन्हें सपने में पता चली थी जो बाद में उन्होंने खुदाई करवाकर स्थापित करवाई।

यह मंदिर भी दर्शनीय स्थल के रूप में अपनी पहचान बना चुका हैं।


।।। रूपायन कलादीर्घा ।।।


मांडू आये ओर यहाँ तशरीफ़ नही लाये तो फिर आपका मांडू घूमना अधूरा हैं। रूपायन  कला दीर्घा देश विदेश के पर्यटकों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं।

कला दीर्घा में धार की प्रसिद्ध " बाघ प्रिंट " से निर्मित वस्तुओं की बिक्री स्थानीय कलाकारों द्वारा की जाती हैं।

ये कलाकार वस्तु बेचने के साथ उसके सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी भी पर्यटकों को देते हैं जैसे 
''बाघ प्रिंट कैसे की जातीं हैं, इसमे रंगों का चयन किस आधार पर होता हैं, आपके द्वारा ली गयी बाघ प्रिंट से निर्मित वस्तु किस कलाकार द्वारा निर्मित हैं आदि ''

यदि आपने बहुत सारा सामान खरीद लिया हैं और आपके बैग या गाड़ी में जगह नहीं हैं, तो भी चिन्ता की कोई बात नहीं है, आप जी भर के सामान खरीदे आप का सामान दुकानदार कुरियर से आपके घर पहुंचा देगा।


।।। म्यूजियम ।।।


मांडू में खुदाई से मिली अनेक मूर्तियों ओर वस्तुओं का संग्रह इस स्थल पर हैं ।इसे देखना मांडू की गौरवशाली पृष्ठभूमि से से परिचित होंने के समान हैं।



इन पर्यटक स्थलों के अतिरिक्त मांडू में चम्पा बावड़ी, अशर्फी महल,रेखा कुंड ,दाई निवास जैसी कई ऐतिहासिक इमारते हैं।

आप मांडू घूमने गए हैं तो इसके आसपास स्थित स्थानों को भी अपनी लिस्ट में जोड़ ले जैसे ओंकारेश्वर, महेश्वर, पातालपानी,इंदिरा सागर बांध, चोरल बांध आदि । ये सभी स्थान मांडू से 200 किमी के घेरे में स्थित हैं।

मांडू में ही सन् 1446 में मालवा सल्तनत के शासक महमूद खिलजी देश के पहले मानसिक चिकित्सालय की स्थापना की गई थी जिसमें प्रसिद्ध यूनानी चिकित्सक मौलाना - लाह - हकीम नियुक्त थे ।



।।। मांडू कब घूमने जाएं ।।।


मांडव प्रकृति का सुकुमार क्षेत्र हैं जहाँ बारह महीने देशी विदेशी पर्यटकों की आवाजाही बनी रहती हैं,परन्तु बरसात ओर जाड़े के दिनों में यह प्रदेश पर्यटकों की आवाजाही से भरा रहता हैं।

इस दौरान यहाँ कई प्रकार के विविधतापूर्ण आयोजन होते रहते हैं।

सर्दी के दिनों में अलाउद्दीन खान संगीत अकादमी यहां   " मांडू उत्सव '' नामक कार्यक्रम का आयोजन करती हैं जिसमें गायन,नृत्य, नाटक जैसे आयोजन होते हैं जिसमें भारत  की विविध सांस्कृतिक छटा के दर्शन होते हैं।

इसके अलावा इस दौरान पैराग्लाइडिंग, फ़ोटो प्रतियोगिता, साहसिक खेल कूद जैसे आयोजन होते हैं।

मध्यप्रदेश पर्यटन निगम और मध्यप्रदेश शासन पर्यटकों को बेहतर अनुभव देने के लिये लगातार प्रयासरत हैं ।



।।। मांडू में कहाँ रुके ।।।


मांडव में मध्यप्रदेश पर्यटन निगम द्वारा संचालित होटलों के अलावा निजी क्षेत्रों की कई होटलें पर्यटकों को कम कीमत पर उच्च गुणवत्ता की सेवाएं उपलब्ध कराती हैं।अतः इन होटलों में ठहरकर आप अपने पर्यटक अनुभव को चार चाँद लगा सकते हैं।

 ।।। मांडू का खान पान ।।।


मांडू में हर प्रकार का शाकाहारी मांसाहारी खान पान प्रचलित हैं।किन्तु एक विशेष भोजन जो देश विदेश के पर्यटकों के बीच लोकप्रिय हैं वह हैं  "'' पानिया '''' पानिया मक्का के आटे से बनाया जाता हैं।

मक्का के आटे को गोल रूप देकर  पलाश के पत्तों पर लपेटा जाता हैं और अंगारो पर सेंका जाता हैं। जिसे तुवर, उड़द, मूंग आदि को मिलाकर बनायी दाल के साथ खाया जाता हैं।

सड़क किनारे स्थित किसी ढ़ाबे पर बैठकर पानिया खाने का जो मजा है वो शब्दों में बांधना सम्भव नहीं हैं।



।।। मांडू का निकटतम रेलवे स्टेशन ।।।


मांडू का निकटतम रेलवे स्टेशन इंदौर और रतलाम हैं ।
इंदौर रेलवे स्टेशन मांडू से 100 किमी हैं जबकि रतलाम रेलवे स्टेशन की दूरी 124 किमी हैं।इन दोनों स्टेशनों पर भारत के किसी भी जगह से आसानी से पहुंचा जा सकता हैं।

।।। मांडू का निकटतम हवाई अड्डा ।।।


मांडू का निकटतम हवाई अड्डा इंदौर हैं जो यहाँ से 100 किमी की दूरी पर हैं ।यहाँ देश के प्रमुख हवाई अड्डों से प्रमुख विमान सेवा कम्पनियों की सीधी विमान सेवा उपलब्ध हैं ।

इसके अलावा इंदौर के  कई टूर ऑपरेटर भी कम कीमत पर मांडू के लिये बेहतरीन टूर वयस्था करते हैं।

तो दोस्तों आप परिवार समेत कब जा रहे हो मांडू बताइयेगा जरूर ।



बुधवार, 15 अगस्त 2018

आयुष्मान भारत प्रधानमन्त्री जन आरोग्य योजना (Ayushman Yojna) या मोदीकेयर (Modicare)

                           ।।। आयुष्मान भारत या प्रधानमन्त्री जन आरोग्य योजना योजना क्या है ।।।

आयुष्मान भारत योजना ,प्रधानमंत्री जन स्वास्थ्य सुरक्षा योजना मोदीकेयर
 Ayushman yojna


आयुष्मान भारत योजना या प्रधानमन्त्री जन आरोग्य योजना (PM -JY) स्वास्थ्य देखभाल से सम्बंधित भारत सरकार की योजना हैं। इस योजना के माध्यम से अधुसूचित परिवारों को प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये तक द्वितीयक ओर तृतीयक स्तर की स्वास्थ्य देखभाल सुविधा उपलब्ध कराई जायेगी।

यह योजना राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा मिशन के रूप में संचालित होगी ,यह दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सुरक्षा योजना होगी।इसकी  व्यापकता को देखते हुए इसे  "मोदीकेयर " या प्रधानमंत्री जनस्वास्थ्य सुरक्षा योजना भी कहा जा रहा हैं।

इस योजना में केन्द्र और राज्यों का वित्तीय अंशदान क्रमशः 60 : 40 का रहेगा।



                                     ।।। उद्देश्य ।।।



1.भारत में 80%  लोग बीमार होने पर खर्च अपनी जेब से करते हैं ,यह खर्च या तो उनकी बचत में से होता हैं या किसी से उधार लेकर होता हैं ।
 इस प्रकार के स्वास्थ्य खर्च के कारण लगभग 60 लाख परिवार गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं । इन लोगों को बेहतरीन स्वास्थ्य देखभाल सुविधा के साथ गुणवत्तापूर्ण जीवन की गारंटी देना योजना का प्रमुख उद्देश्य हैं ।


मध्यप्रदेश सामान्य अध्ययन

                                   

                  ।।। आयुष्मान भारत योजना की विशेषता ।।।


1.आयुष्मान भारत योजना में  शामिल परिवार को पैसा बीमा कम्पनी या ट्रस्ट के माध्यम से उपलब्ध कराया जायेगा।


2.योजना पूरी तरह से कैशलेस मोड पर संचालित होगी अर्थात लाभार्थी परिवार को अस्पताल में भर्ती होने व डिस्चार्ज होने पर नकद राशि नहीं देना पड़ेगी।


3. इस योजना में देश की लगभग 50% आबादी यानि 10 करोड़ परिवारों को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।


4.लाभार्थियों का चयन समाजिक आर्थिक जनगणना में चिन्हित डी एक से डी सात ( डी 6 को छोड़कर)  से किया जायेगा ।
इसके अलावा असंगठित श्रमिकों ओर गरीब रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले व्यक्ति योजना के लिए पात्र होंगे।


5.इस योजना में शामिल परिवार के आकार और सदस्यों की आयु के मामलों में कोई बंधन नहीं रखा गया हैं।


6.इस योजना के अंतर्गत देशभर में लगभग 1.50 लाख 'स्वास्थ्य और आरोग्य केन्द्र' की स्थापना की जायेगी ।



7. इस योजना में अस्पताल में भर्ती होने के पहले ओर बाद के खर्चों को भी कवर किया गया हैं।

8.बीमा लेने के प्रथम दिन से ही सक्रिय हो जायेगा अर्थात बीमा लेने के बाद अस्पताल में भर्ती होने पर समस्त खर्च बीमा कम्पनी या ट्रस्ट उठाएगा।

9. योजना के अधीन लगभग 1350 प्रकार की बीमारियों के उपचार की व्यवस्था हैं ।

10. योजना लागू होने के बाद गम्भीर बीमारियों की जद में आने से देश की बड़ी आबादी बच जायेगी क्योंकि प्राथमिक स्तर पर बीमारियों का बेहतर इलाज हो सकेगा।

11. इस योजना में मरीज के अस्पताल में भर्ती होने ओर इलाज शुरू करने के लिये बीमा कंपनी या ट्रस्ट की अनुमति तुरन्त मिल जायेगी जिससे दावों के भुगतान में समस्या पैदा नहीं होंगी।
       

                            ।।। योजना क्रियान्वयन इकाई ।।।



    इस योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिये जिलों में " जिला क्रियान्वयन इकाई " का गठन किया जायेगा जिसमें निम्न लोग सम्मिलित होंगे 

1. अध्यक्ष ,  जिला मलेरिया अधिकारी

2. सदस्य,जिला स्वास्थ्य अधिकारी या आर. एम. ओ.

3.  सदस्य, संक्रमण रोग विशेषज्ञ

4. सदस्य ,ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर

5.जिला स्वास्थ्य कार्यक्रम नर्स

यह समिति योजना का प्रचार प्रसार करने के साथ ,योजना से सम्बंधित प्रशिक्षण प्रदान  करेगी । इसके अलावा यह समिति

1.दवाओं, चिकित्सा उपकरण की  उपलब्धता सुनिश्चित करेगी ।

2. आयुष्मान भारत योजना में शामिल निजी अस्पतालो के साथ समन्वयन स्थापित करेगी ।

3.केन्द्र और राज्य सरकार से निर्देश लेकर योजना का सुचारु क्रियान्वयन सुनिश्चित करेगी।

4.जिला स्तर पर योजना का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करेगी।

5.समय समय पर जिला मेडिकल बोर्ड की बैठक आयोजित करवायेगी ।

6.बीमा कंपनी, लाभार्थी और अस्पताल के बीच कड़ी के रूप में " आयुष्मान मित्र" तैनात किये जाएंगे।जो योजना का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने में मदद करेंगे।

7.इस योजना से के लिए हेल्पलाइन भी जारी की गयी हैं जिसके नम्बर 14555 और 1800111565 हैं ।

8.इस योजना का एक नारा भी हैं """ स्वास्थ्य आपका साथ हमारा """"


                                   ।।। आलोचना ।।।

1.इस योजना के आलोचकों का मानना हैं कि भारत मे स्वास्थ्य से सम्बंधित अनेक सरकारी योजनायें बड़े पैमाने पर संचालित की जा रही हैं ओर इन योजनाओं के माध्यम से लाखों करोड़ रुपया ख़र्च किया जा रहा हैं । ऐसे में नई योजना लाने की बजाय पहले से संचालित योजनाओं को ओर बेहतर बनाया जा सकता था । 

2.आयुष्मान भारत योजना बहुत वृहद योजना हैं और इस अनुरूप अस्पतालो का संस्थागत ढांचा बहुत कमजोर है।

3.लाभार्थियों का चयन सामाजिक आर्थिक जनगणना 2011 के आधार पर किया जायेगा ,यह सूची सन 2011 के बाद अद्यतन नहीं हैं।

4.योजना के अंतर्गत बीमारियों के पैकेज की व्यवस्था होनी चाहिये थी,यानि हृदय रोग  इतना खर्च,किडनी रोग पर इतना खर्च आदि 

5.इस योजना के लागू होने के बाद पूर्व सरकारों द्वारा शुरू कई महत्वपूर्ण स्वास्थ योजना जैसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन जो कि बहुत सफ़ल योजना मानी जाती हैं पर प्रभाव पड़ेगा।

6.कुछ अन्य जानकारों का मानना है कि इस योजना में प्रतिवर्ष दीये जाने वाले 5 लाख रुपये बढ़ते स्वास्थ्यगत ख़र्च को देखते हुए एक परिवार की आवश्यकता के लिये बहुत कम है।

7.आयुष्मान भारत योजना से सम्पूर्ण देश की आबादी को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना चाहिए था इसके लिये सक्षम लोगों के लिये कुछ अंशदान का प्रावधान रखा जा सकता था ।

8.आयुष्मान भारत योजना की सफलता पूरी तरह राज्यों की प्रतिबद्धता पर निर्भर करती हैं , योजना के शुरू होने के पूर्व कई राज्यों ने इस योजना को लेकर ढ़ीला ढाला रुख अपनाया हैं।


■एक देश एक चुनाव पर यहां पढ़ें

             
भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 1.5% ही स्वास्थ्य पर खर्च करता हैं, जबकि अमेरिका, जापान,चीन और कई यूरोपीय देश अपनी GDP का 6 से लगाकर 18 प्रतिशत तक स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं पर ख़र्च करते हैं। 

राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार आम भारतीय अपने स्वास्थ्य खर्च का 42% सिर्फ़ दवाइयों पर ही ख़र्च कर देता हैं ,जबकि विकसित देशों में इस ख़र्च का अधिकांश भाग सरकारों द्वारा वहन किया जाता हैं।

ऐसे में आयुष्मान भारत योजना निश्चित रूप में भारत के लोगों का स्वास्थ्य सुधारने में मिल का पत्थर साबित होंगी।



० तनावमुक्त जीवन के लिये उपाय






                               

रविवार, 12 अगस्त 2018

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ( PANDIT DINADAYAL UPADHYAY)

                       ।।। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ।।।


महान राष्ट्रवादी, चिंतक, कुशल संघठनकर्ता,राष्ट्रनिर्माता पंडित दीनदयाल उपाध्याय उन व्यक्तित्वों में शुमार हैं। जिन पर हर भारतीय गर्व महसूस करता हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक और जनसंघ
पंडित दीनदयाल उपाध्याय

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का जन्म अश्विन कृष्ण त्रयोदशी संवत1973 तदनुसार,25 सितम्बर1916 को राजस्थान के धनक्या गांव में प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार मेंहुआ था। ( पासपोर्ट में जन्म स्थान नागल चन्द्रभान गांव दर्ज हैं)


इनके पिता का नाम ' भगवती प्रसाद उपाध्याय ' और माता का नाम ' रामप्यारी बाई ' था।
इनके पिता रेलवे में असिस्टेंट स्टेशन मास्टर थे।


                              ।।।  प्रारम्भिक जीवन ।।।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के बचपन का नाम " दीना "था।इनका बचपन कठोर संघर्ष में बीता, मात्र 3 वर्ष की उम्र में इनके पिता का देहांत हो गया था.

आपकी प्रारम्भिक शिक्षा मामा राधारमण शुक्ल के यहां गंगापुर में हुई, अपनी छोटी सी उम्र में ही दीनदयाल जी ने अपनी प्रतिभा का परिचय करा दिया था जब इन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा में सर्वोच्च अंक हासिल किये थे।

इसके उपलक्ष्य में तत्कालीन सीकर नरेश ने दीनदयाल जी को स्वर्ण पदक,250 रुपये नकद और 10 रुपये मासिक की छात्रवृत्ति प्रदान की थी।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय को गणित में महारत हासिल थी, इनकी गणित की उत्तरपुस्तिका काफी समय तक छात्रों को दिखाने के लिये रखी गई थी, ताकि युवा पीढ़ी इनकी बौद्धिकता से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ सके।

इसके बाद आगे की पढ़ाई इन्होंने कानपुर के सनातन धर्म कॉलेज से की इस कॉलेज से अध्ययन करने के दोरान दीनदयाल जी का सम्पर्क प्रखर राष्ट्रवादी चिंतकों सुंदर सिंह भंडारी ओर बलवन्त महसिंघे जैसे लोंगो से हुआ।

इसके बाद दीनदयाल जी एम. ए. की पढ़ाई करने आगरा चले गए जहाँ वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्तम्भ नानाजी देशमुख और भाऊराव जुगाड़े के सम्पर्क में आए,और संघ की गतिविधियों में सक्रिय हो गये।

इस बीच सरकारी नोकरी की भी पेशकश हुई परन्तु दीनदयाल जी का मन और विशाल था वे देश की सच्ची सेवा करना चाहते थे।यह बात उन्होंने पत्र के माध्यम से अपने मामा को बता दी थी।



                            ।।।   राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ।।।


पंडित दीनदयाल जी ने सन 1937 में बलवन्त महाशब्दे के प्रेरणा से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचार प्रसार करने का बीड़ा उठाया  ।

सन 1947 ई में पंडित जी ने राष्ट्रधर्म मासिक, पांचजन्य, और स्वदेश के सम्पादन में नानाजी देशमुख, अटल बिहारी वाजपेयी, और यादव राव देशमुख का सहयोग किया।

सन 1950 में जब श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने नेहरू मन्त्रिमण्डल से त्यागपत्र देकर जनसंघ का निर्माण किया तो पंडित जी ने मुखर्जी जी के साथ जनसंघ के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सन 1951 में आप जनसंघ के संघठन मन्त्री बने।
सन 1953 में जनसंघ के महामंत्री बने।सन 1955 में आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघठन के उप प्रांतीय संघठक बने।

सन 1967 में पंडित जी कालीकट में आयोजित सम्मेलन में जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए।

                                      ।।।   निधन ।।।


जब जनसंघ का संघठनात्मक कार्य पूर्ण हो चुका था और पार्टी पंडित दीनदयाल उपाध्याय के कुशल नेतृत्व में आगे बढ़ रही थी ,अचानक काल का पहिया घुमा 11 फरवरी 1968 को पंडित जी मुग़लसराय स्टेशन( अब पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्टेशन) के निकट पोल संख्या 1276 पर मृत अवस्था में पाये गये। 

सारा राष्ट्र  इस हृदय विदारक घटना से स्तब्ध रह गया राष्ट्र अपना कमाऊ पूत खो चुका था।

किन्तु आदरणीय पंडित दीनदयाल उपाध्याय अपने साथ राष्ट्र भक्ति की वो विचारधारा छोड़ गए हैं जिसे पढ़कर हर भारतीय अपना सीना गर्व से चौडा कर सकता हैं।


                                 ।।।   पंडित जी ।।।



एक बार दीनदयाल उपाध्याय जी सिविल सेवा की परीक्षा में सम्मिलित होने धोती,कुर्ता और सिर पर टोपी लगाकर गये थे ।जबकि अन्य अभ्यर्थी सूट पहनकर।
पंडित जैसी वेशभूषा में देखकर कुछ अभ्यथियों ने हँसी उड़ाई, बाद में जब परिणाम आया तो दीनदयाल उपाध्याय जी ने इस परीक्षा में सर्वोच्च स्थान हासिल किया। किन्तु उन्होंने नोकरी नही की।

इसके पश्चात दीनदयाल उपाध्याय अपने समर्थकों में  " पंडित जी "नाम से लोकप्रिय हो गये।
    

                                   ।।।   पुस्तकें ।।।


1.दो योजनायें
2.राजनितिक डायरी
3.अर्थनीति का अवमूल्यन
4.सम्राट चन्द्रगुप्त
5.जगतगुरु शंकराचार्य
6.एकात्म मानववाद
7.राष्ट्र जीवन की दिशा
8.एक प्रेमकथा

                              ।।।   एकात्म मानववाद ।।।


स्वतन्त्रता के पश्चात देश पूंजीवाद और समाजवाद के अन्तर्द्वन्द से गुज़र रहा था। पश्चात्यकरण के प्रभाव में आकर अपनी नीतियां बना रहा था। भारतीय दर्शन, संस्कृति, और विचारों से दूर जा रहा था। तब पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने  " एकात्म मानववाद" के दर्शन से भारत को परिचित कराया ।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का एकात्म मानववाद व्यक्ति को केन्द्र में रखकर विकास करने से सम्बंधित हैं,जिसके अनुसार व्यक्ति से जुड़ा परिवार, परिवार से जुड़ा समाज, समाज से जुड़ा राष्ट्र, और राष्ट्र से जुड़ा विश्व अन्तरसम्बन्धित रहते हुए ही प्रगति कर सकते हैं। और इनमें कोई संघर्ष नहीं हो सकता।

पंडित जी ने राष्ट्र को जीवित व्यक्ति के समान माना हैं, जिस प्रकार से व्यक्ति के प्राकृतिक सहज ज्ञान को दबाया नही जा सकता, उसे दबाने पर अलग अलग मानसिक रोग हो सकते हैं, व्यक्ति बेचेन और उदासीन रहता हैं, उसकी क्षमता घट जाती हैं।

उसी प्रकार राष्ट्र की प्राकृतिक सहज पहचान को नजरंदाज करने के घातक परिणाम होते हैं।

               

              ।।।   महात्मा गांधी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय ।।।


कई लोग महात्मा गांधी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों में विरोधाभास प्रकट करते हैं, जबकि हम गहराई से अध्ययन करें तो पता चलता हैं कि कई मामलों में ,विशेषकर विदेशी संस्कृति और सभ्यता को लेकर दोनों में बहुत कुछ समान हैं। एक उदाहरण देखिए 

      '' महात्मा गांधी विदेशी संस्कृति अपनाने को लेकर कहा करते थे कि           मेरा  घर ऐसा होना चाहिये जिसमें चारों ओर खिड़किया हो ,लेकिन           ये मेरे ऊपर निर्भर करेगा कि में वही खिड़की खोलूँ जिसमें से शीतल           पवन आ रही हो अर्थात में वही  विदेशी विचार या सँस्कृति ग्रहण               करू,जिसमें देश का कल्याण हो "


इसी प्रकार पंडित दीनदयाल उपाध्याय का मत था कि 

       " विदेशी परम्परायें सार्वभौमिक नहीं हो सकती हो सकता हैं उसके               कुछ अंश अच्छे हो और वे हमारे अनुकूल हो तो उन्हें अपनाने में                 कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। आयुर्वेद में भी रोगी की जगह के                     अनुरूप निदान तलाशा जाता हैं"



                  ।।।   राजनीतिक शुचिता के कट्टर समर्थक ।।।


पंडित दीनदयाल उपाध्याय राजनीति में शुचिता के कट्टर समर्थक थे, सत्ता प्राप्ति के लिये दलबदल ओर छलकपट के वे कट्टर विरोधी थे।

पंडित दीनदयाल जी का स्पष्ट मत था कि यदि राजनीतिक दलों के प्रति जनता में इज्जत रहे तो उन्हें इन पचड़ों से दूर रहना चाहिए।

सन 1967 में जब दीनदयाल उपाध्याय ने चुनाव लड़ा तो जौनपुर में ब्राह्मण मतदातओं का बाहुल्य देखते हुए अनेक कार्यकर्ताओ ने उन्हें अपने नाम के आगे  " पंडित " शब्द लिखने का आग्रह किया, परन्तु दीनदयाल जी ने कार्यकर्ताओं को निर्देश दे दिया कि मेरे नाम के आगे यदि पंडित लगाकर जाति के नाम पर वोट मांगने की कोशिश की तो में चुनाव बीच में ही छोड़ दूंगा।

आज की राजनीति में जहां राजनीति का आधार ही जातिवादी बन गया हैं, जातिवाद के आधार पर वोट मांगने वाले राजनितिक दलो के लिये यह एक सबक हैं।


                                   ।।। वसुधैव कुटुम्बकम ।।।

वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा को समग्र रूप में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ही प्रचारित किया है, उनके अनुसार यह विचार भारतीय सभ्यता के शुरू से ही प्रचलित हैं।इसी के अनुसार भारत में सभी धर्मों का आदर हैं।


                                      ।।।   राष्ट्रधर्म ।।।


पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रधर्म को सबसे बहुत व्यापक दृष्टिकोण से देखते थे। उनके अनुसार राष्ट्रधर्म व्यक्ति के साथ राष्ट्र को भी नियमानुकूल ओर प्रकृति अनुकूल आचरण करना सिखाता है ।

जब जर्मनी ने फ्रांस पर आक्रमण किया तो फ्रांस की सेना नाजी जर्मनी का सामना नहीं कर सकी ओर फ्रांस के राष्ट्रपति ने नाजी जर्मनी की अधीनता स्वीकार कर ली ओर फ्रांस के राष्ट्रपति के इस फैसले का फ्रांस की जनता ने समर्थन किया,किंतु  " डिगाल " नामक व्यक्ति ने जर्मनी की अधीनता नही स्वीकार की ,यह व्यक्ति भागकर लन्दन चला गया ओर वहाँ फ्रांस की निर्वासित सरकार की स्थापना की।

उसका मत था कि  

                        " फ्रांस आजाद था,और आजाद रहेगा " 

बाद में उसने फ्रांस को आजाद देखा अब कई लोग यह कहते हैं कि डिगाल फ्रांस के जनमत के विरुद्ध गया, जबकि वास्तविकता यह हैं कि डिगाल के लिये राष्ट्रधर्म जनमत से कही बड़ा था।


कश्मीर पर भी दीनदयाल जी इसी प्रकार का विचार रखते थे उनका मत था कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग हैं।इसमे जनमत का कोई सवाल ही नही उठता।


                                     ।।।   राष्ट्रवाद ।।।


पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का मत था कि राष्ट्रवाद की भावना किसी ज़मीन के टुकड़े पर एक साथ रहने मात्र से ही नहीं उपजती बल्कि इसके लिए राष्ट्रवाद का तत्व मनुष्य की अंतरात्मा में होना चाहिए।

ग्रीक ओर मिस्र जैसे राष्ट्रों का कभी विघटन नहीं हुआ लेकिन क्या हम आज के ग्रीक ओर मिस्र की तुलना  प्राचीन ग्रीक ओर मिस्र से कर सकते हैं ,शायद कदापि नहीं जबकि यहूदियों ने इस्राइल बनने के पूर्व दूसरे समाजो ओर राष्ट्रों में रहकर भी अपनी राष्ट्रीय पहचान ओर अस्मिता बचाकर रखी थी।  

                              ।।।    शिक्षा के संदर्भ में मत ।।।


शिक्षा के संदर्भ में पंडित दीनदयाल उपाध्याय बहुत खुले ओर उदार विचारों के धनी थे।उनका मत था कि शिक्षा पूर्णतः निःशुल्क होनी चाहिये।
वे कहते थे बीज बोने ओर पेड़ बनने तक क्या हम उस पेड़ से पैसे लेते है, बिल्कुल भी नही क्योंकि हमें पता हैं कि पेड़ में किया गया निवेश हमें प्राणवायु प्रदान करेगा।
उसी प्रकार किसी बच्चे की शिक्षा में किया गया निवेश राष्ट्र ओर समाज को बहुत आगे तक ले जाने का कार्य करेगा।

प्राचीन गुरुकुलों में भी बच्चों से किसी प्रकार की कोई फीस नही ली जाती थी । ये राष्ट्र का उत्तरदायित्व हैं कि वह अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा प्रदान कर स्वयं विकसित बने।


                                            ।।। रोजगार।।।


रोजगार प्रदान करने के सन्दर्भ में दीनदयाल जी का मत था कि राष्ट्र को प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता अनुसार काम करने की गारंटी देना चाहिए, जिससे समाज और राष्ट्र विकृत होने से बच सके।

हमें ऐसी व्यवस्था बिल्कुल भी नहीं चाहिए की जिसमें बच्चे ओर बुजुर्ग अपने स्वाभाविक कर्मों को छोड़कर कठोर परिश्रम करें और युवा काम के अभाव में बेरोजगार घूमे।

                

                                         ।। ज्ञान ।।


दूसरे समाजो के ज्ञान को अपनाने के संदर्भ में दीनदयाल उपाध्याय का मत था की दूसरे समाजो में प्रचलित ज्ञान की अच्छाई को ग्रहण कर लिया जाना चाहिए, ओर उसकी विकृति को छोड़ दिया जाना चाहिए।



वास्तव में पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीयता की प्रतिमूर्ति थे। जिनसे प्रत्येक भारतीय को प्रेरणा ग्रहण करना चाहिये।






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० आत्मविकास के 9 मार्ग



० राज्यपाल

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रविवार, 5 अगस्त 2018

भारत का स्वतंत्रता दिवस - 15 अगस्त पर भाषण और कविता

मेरे प्यारे देश वासियों,

15 अगस्त ,72 वे स्वतन्त्रता दिवस की आपको बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं।
Bharat ka rastriy dhavj
 तिरंगा झंडा

जैसा कि आप जानते हैं, हमारा देश लगभग 300 वर्षों की गुलामी के बाद  आजाद हुआ था । आजादी के उस उल्लास को महसूस करने के लिये ही हम प्रतिवर्ष उल्लास और संकल्प से आबद्ध होकर यह पर्व मनाते हैं।
लेकिन इन 72 वर्षों में हमनें बहुत कुछ खोया और बहुत कुछ पाया हैं।यदि हम पाने की बात करें तो आज हम विश्व के लोकतंत्र बनकर दुनिया को लोकतंत्र का पाठ पढ़ा रहे है।

लोकतंत्र के मंदिर हमारी '' संसद '' को स्थापित करने में अनेक महापुरुषों जैसे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चन्द्र बोस, भीम राव अम्बेडकर, सरदार पटेल, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद जैसे व्यक्तित्वों का बलिदान लगा हैं।

लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है क्या हम इन महापुरुषों की विरासत और इनके नव भारत निर्माण के संकल्प को पूरा कर सके हैं ?

आजादी को एक लंबा वक़्त बीत जाने के बाद भी हमारा यह संकल्प इतना पीछे क्यों रह गया ?

एक लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी हम सविंधान मूलक धर्मनिरपेक्ष, समानता ,औऱ जात पात से मुक्त व्यवस्था क्यों नहीं निर्मित कर सके ?

क्या इन समस्याओं , गरीबी, पिछड़ापन,अशिक्षा आदि के रहते हम भारत को " विश्व गुरु "बनाने की कामना कर सकते हैं। ?

आज हमें आवश्यकता इस बात की हैं कि हम हमारे प्राचीन गौरवो राम,कृष्ण, महावीर, गांधी ,अशोक और बुद्ध के पदचिन्हों पर चलते हुए पुनः भारत को विश्व गुरु के पद पर काबिज करें ।ताकि आने वाली पीढ़ी हमारे कार्यो पर गर्व महूसस कर सके।

इसके लिये में निम्नलिखित शक्तियों से आव्हान करना चाहता हूँ 

#  युवा शक्ति 


भारत दुनिया में सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश हैं।हमारे युवा न केवल देश के विकास को आगे ले जा रहे हैं।अपितु दुनिया के तमाम विकसित देशों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बने हुए हैं।

लेकिन आज आवश्यकता इस बात की हैं कि हमारे युवाओं को विध्वंसक गतिविधियों की और ध्यान देने की बजाय राष्ट्र निर्माण और चरित्र निर्माण पर ध्यान देना चाहिए.

सरकारी नोकरी, प्राइवेट नोकरी की और ताकने के बजाय खुद का बिज़नेस स्थापित कर नोकरी लेने वाला नहीं, नोकरी देने वाला बने ।


स्टार्टअप इंडिया, स्टेण्डअप इंडिया, युवा उधमी जैसी कई योजनाएं युवाओं के स्वरोजगार स्थापना हेतु सरकार द्वारा चलाई जा रही हैं।इनका फायदा युवा अवश्य उठावे।

मैं युवा बहनो से आह्वान करना चाहता हूं कि आपके सामने परिस्थितिया चाहे कितनी भी विकट क्यों न आ जाये ,अपने सपनो का पीछा करना मत छोड़ना ।

यदि आप संघर्ष में सफल होती हैं तो देश चार क़दम आगे चलेगा और भारत को फिर से वही "" सोने की चिड़िया"'' वाली प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकेगा।

देश के नागरिकों से आव्हान करना चाहता हूँ वे बच्चों को राष्ट्रभक्ति के संस्कार के साथ महिलाओं की इज्ज़त देना व उनके आत्मसम्मान को महत्व देना सिखाये ।

ये देश रानी लक्ष्मीबाई,दुर्गाबाई, अहिल्या देवी, अवन्तिबाई जैसी वीरांगनाओं का हैं ।

समाज का अस्तित्व महिलाओं से ही जुड़ा है ।अतः महिला जितनी सशक्त होगी राष्ट्र भी उतना ही सशक्त होगा।

युवाओं से में आव्हान करना चाहता हूँ कि वे समय मिलने पर उन स्मारकों पर शीश नवाने जरूर जाये जहां हमारे वीर बलिदानियो का समय गुजरा हैं।इससे देशभक्ति की प्रेरणा मिलती हैं।

संस्कृति और देश की परम्पराओ के प्रति समझ बढ़ती हैं।

# पर्यावरण 


इस बार का 72 वां स्वतंत्रता दिवस एक अन्य महत्वपूर्ण त्योहार  " नाग पंचमी '' के साथ आ रहा हैं। ये त्यौहार हमें पर्यावरण की रक्षा और पारिस्थितिक सन्तुलन बनाने के प्रति प्रेरित करता हैं।

पर्यावरण प्रदूषण आज विश्व के साथ भारत की बढ़ी चुनोती बन गया है।

गंगा, यमुना, नर्मदा, कावेरी,गोदावरी, क्षिप्रा और ब्रह्मपुत्र जैसी जीवनदायी नदियों ने सदियों से देश की सभ्यता और संस्कृति को सींचा हैं, लेकिन आज ये नदियां अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं।

एक सच्चे नागरिक का परिचय देते हुए इन नदियों में कूड़ा करकट, पूजन सामग्री और सीवेज प्रवाहित न करके इनकी दशा में सुधार लाये ये आपके प्रयासों से ही सम्भव होगा।

प्लास्टिक मुक्त भारत के सपने को साकार करने के लिए प्लास्टिक का कम से कम इस्तेमाल करें। 

पौधा लगाने के साथ उसका पेड़ बनने तक उसका संरक्षण करें।


# स्वास्थ्य


देश का नागरिक स्वस्थ रहेगा तो देश भी स्वस्थ रहेगा, देश के नागरिक लम्बा और गुणवत्ता वाला जीवन व्यतीत करें, इसके लिये प्रत्येक नागरिक योग,व्यायाम को जीवन का अनिवार्य अंग बना लें।

स्वास्थ्य को उन्नत करने वाले आहारों का सेवन करें।

शराब, गांजा, तम्बाकू, सिगरेट जैसी बुराइयों से दूर रहे ताकि आपका परिवार और देश खुशहाल बन सके।



# सैनिक ##



मैं देश के उन लाखों सैनिको की देशभक्ति को नमन करता हूँ जो अपने परिवार से हजारों किलोमीटर दूर कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक ,असम से लेकर दमन दीव तक देश की सीमाओं की रक्षा अपने प्राणों की परवाह नहीं करते हुए कर रहे हैं।

मैं आपको कहना चाहता हूँ
पुणयतम् पूज्यतम् विश्ववरिष्ठम्।सुरमयतम् भव्यतम् सर्वश्रेष्ठम्

साथ ही देश के युवाओं से अपील करना चाहता हूँ ।कि वे देश की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहे।




# राज्य


भारत के सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश भारत रुपी माला में पिरोये मोती हैं।इन मोतियों से ही माला की शोभा हैं।

इन राज्यों को देश की एकता अखंडता और तरक्की के लिए काम करना चाहिए।

इन राज्यों में निवासरत नागरिक, यहां की सरकारें देश के विकास के लिए कन्धे से कंधा मिलाकर आगे बढ़े।

# किसान 


भारत की सस्य श्यामला भूमि ने अनाज, दूध, फल, सब्जियों के भंडार भरकर इस देश मे हरित क्रांति, श्वेतक्रान्ति ,पीली क्रांति को सम्भव बनाया है ।

इन क्रांतियों को सम्भव बनाने में हमारे किसानों की भी अथक मेहनत हैं।

देश में अनाजो,फल ,सब्जियों के भण्डार भरे पड़े हैं,इनका उचित दाम किसानों को मिले इसके लिये हमें इनके निर्यात और प्रसंस्करण पर ध्यान देना होगा।

सरकार और निजी क्षेत्र के उद्यमी मिलकर किसानों को बेहतर आय का स्त्रोत उपलब्ध करा सकते हैं। ताकि किसान भी एक कदम आगे बढ़े और भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का सपना शीघ्र पूरा हो सके ।


# विज्ञान 


विज्ञान और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के मामले में हम विश्व के विकसित राष्ट्रों के समकक्ष खड़े हैं।

हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने विभिन्न देशों के एक साथ 106 उपग्रहों को अंतरिक्ष मे सफलता पूर्वक स्थापित कर देश का मान विश्व के सामने बढ़ाया हैं।
और अंतरिक्ष से राजस्व के नए स्त्रोत अर्जित किये हैं। इसके लिए देश के वैज्ञानिक और इंजिनीयर बधाई के पात्र हैं।

अंत में कुछ चुनिंदा पंक्तियों के साथ अपनी बात को विराम देना चाहता हूँ।

अपनी सभ्यता, संस्कृति से, मैंने वह पाया हैं।इस धरती से उस अम्बर तक जो सबसे प्यारा हैं।।

जय हिंद 

भारत माता की जय




# कहानी आज़ादी की  


""भारत में चतुर फिरंगी कुटिल चाल से बैठ गया था।हम सब आपस में बिखरे देश हित का ध्यान नहीं।।''"

""एक दूजे से लड़ते थे समझ नहीं थीं ज्ञान नही, कुछ साल बीत गये।छिन गई आजादी आखिर अत्याचार भयानक,जब सीमा को तोड़ने लगे,वीरो ने खुद को धिक्कारा ।''"

""आजादी के सपने जागें।एक दिन 1857 आया अंग्रेजों को मार भगाने का सबने मिलकर कदम उठाया, लक्ष्मीबाई,, तंत्याटोपे, मंगल पांडे वीरो ने कहा हटो अंग्रेजों यहाँ से, हमारा हिंदुस्तान हैं।''"

""पर साधन थे सीमित ,सूझ बूझ का ज्ञान नहीं।लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लड़ते लड़ते स्वर्ग सिधारी थीं।।खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी ।।"''

'''"अंग्रेजों ने देश हमारा जी भर लूटा था, जिसके सपने देख रहा था पर भाग्य बीच मे आकर फूटा था गांधी ने युद्ध भूमि में जा ललकारा, सुनकर, उनको देश, यह जाग पड़ा सारा का सारा ।

वीरो की कुर्बानी रंग लाई और वह दिन आया।देश ने अपना खोया गौरव पाया।। 15 अगस्त 1947 की शुभ घड़ी आयी भारत ने आजादी पाई।भारत ने आजादी पाई ।।''''


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● संथाल विद्रोह




15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस पर श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा रचित कविता 👉


पन्द्रह अगस्त का दिन कहता आज़ादी अभी अधूरी हैं ।सपनें सच होंने बाकी हैं,रावी की शपथ न पूरी हैं ।।

जिनकी लाशों पर पग धरकर आजादी भारत में आयी । वे अब तक हैं खानाबदोश गम की काली बदली छाई ।।

कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आंधी - पानी सहते हैं।उनसे पूछो पन्द्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं।।

हिंदू के नाते उनका दुःख सुनते यदि तुम्हें लाज आती ।तो सीमा के उस पार चलो सभ्यता जँहा कुचली जाती ।इंसान जँहा बेचा जाता,ईमान खरीदा जाता।इस्लाम सिसकियां भरता हैं,डॉलर मन मे मुस्काता हैं।।

भूखों कों गोली नगों को हथियार पिन्हाये जाते हैं।सूखे कण्ठों से जेहादी नारे लगवाये जाते हैं।।

लाहौर,कराची,ढाका पर मातम की हैं काली छाया।पख़्तूनों पर,गिलगित पर हैं ग़मगीन ग़ुलामी का साया ।।

बस इसलिए तो कहता हूँ आज़ादी अभी अधूरी हैं। कैसे उल्लास मनाऊं मैं ? थोड़े दिन की मज़बूरी हैं।।

दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखण्ड बनाएंगे । गिलगित से गारो पर्वत तक आज़ादी पर्व मनाएंगे।।

उस स्वर्ण दिवस के लिये आज से कमर कसे बलिदान करें।जो पाया उसमें खो न जायें,जो खोया उसका ध्यान करें ।।


































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