बुधवार, 26 अक्तूबर 2016

LUPUS DISEASE, ल्यूपस डिसीज क्या हैं इसका आयुर्वेदिक इलाज

Lupus
 Lupus diseases

 

ल्यूपस डिसीज़ (lupus disease) :::

ल्यूपस नामक बीमारी मात्र एक बीमारी न होकर बीमारीयों का समूह हैं, जिससे शरीर के प्रत्येक अंग प्रभावित होतें हैं,इसमें शरीर का रोग प्रतिरोधक तंत्र स्वंय के शरीर के प्रति संवेदनशील होकर शरीर के उत्तकों (Tissues) और अंगों को शत्रु मानकर हमला कर देता हैं.इस बीमारी में जो अंग प्रभावित होता हैं,उससे संबधित बीमारी भी हो जाती हैं,जैसें फेफडें प्रभावित होनें पर अस्थमा, त्वचा प्रभावित होनें खुजली, चकते निकलना, जोड़ प्रभावित होनें पर गठिया आदि बीमारीयाँ पैदा हो जाती हैं.


कारण :::

ल्यूपस डिसीज़ का वास्तविक कारण अभी तक पता नही चल पाया हैं.और इस पर वर्तमान समय में काफी शोध चल रहा हैं ,कुछ शोधों का निष्कर्श हैं,कि यह बीमारी शरीर की जीन संरचना में परिवर्तन की वज़ह से होती हैं,किन्तु यह परिवर्तन क्यों होता हैं,इस पर लगातार शोध जारी हैं.


                             ● अलसी हैं गुणों की खान

बीमारी का प्रबंधन :::

यदि बीमारी का पता लगतें ही जीवनशैली को संतुलित और खानपान संतुलित कर लिया जावें तो स्वस्थ जीवन व्यतित किया जा सकता हैं जैसें

० अपनें दैनिक जीवन को समयबद्ध करें खानें - पीनें ,दैनिक क्रियाकलापों का निश्चित समय रखे क्योंकि नियमित जीवनशैली बाँड़ी क्लाक (body clock) को एक निश्चित दिशा की और ले जाती हैं, जिसमें शरीर हर क्षण में होनें वालें कार्यों का अभ्यस्त हो जाता हैं,ऐसे में बीमारी का शरीर पर आक्रमण नही होता हैं.

० नियमित व्यायाम और योग शरीर और माँसपेशियों को ताकत प्रदान कर रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता हैं,अत : रनिंग ,प्राणायाम, सूर्यनमस्कार,जैसी क्रियाएँ अवश्य करें.

० खानें - पीनें का विशेष ध्यान रखें ऐसा भोजन लें जिसमें ओमेगा 3 फेटीएसिड़, एन्टीआँक्सीडेन्ट़ भरपूर मात्रा में हो जैसें ड्रायफ्रूट,काड लीवर आँयल,मूँगफली,पालक,मैथी आदि.

० जंकफूड़ पूर्णत :बन्द कर दे क्योंकि इसमें प्रयुक्त sodium monoglutamate प्रतिरोधक क्षमता पर विपरीत असर डालता हैं.

० जिन चीजों को खानें से समस्या पैदा होती हो उन्हें तुरन्त बंद कर दे जैसे कुछ लोगों को 
बैंगन,आलू,टमाटर ,दही ,छाछ अचार खानें से समस्या बढ़ती हैं, अत : इनका सेवन नहीं करें.

तम्बाकू, शराब का सेवन किसी भी रूप में नही करना चाहियें.

० तले हुये खाद्य पदार्थों के स्थान पर ताजा फलों और सलाद का प्रयोग भोजन में बढ़ायें.

० लो फेट पदार्थों और नमक का संतुलित उपयोग करें.

कोई भी बीमारी या समस्या मनुष्य के साहस से बढ़ी नहीं होती हैं,अत : इच्छाशक्ति से बढ़ी नही हैं,अत : जीनें की मज़बूत इच्छाशक्ति बनाये रखें.





मंगलवार, 25 अक्तूबर 2016

synthetic milk सिंथेटिक दूध में क्या मिला होता हैं जिससे जान को खतरा हो जाता हैं

 

सिंथेटिक दूध (synthetic milk) क्या हैं 

सिंथेटिक दूध (synthetic milk) कृत्रिम रूप से बनाया गया दूध होता हैं,जो गाय या भैंस के दूध से वसा निकालकर बचे हुये सपरेटा दूध में यूरिया,डिटरजेंट़,कास्टिक सोड़ा, स्टार्च आयल,ग्लूकोज शेंपू,हाइड्रोजन पराआँक्साइड़,डालडा आयल,चाक,चूना आदि मिलाकर बनाया जाता हैं.स्किमड़ दूध पावड़र में भी यही वस्तुएँ मिलाकर उसे दूध में परिवर्तित कर दिया जाता हैं.

सिंथेटिक दूध से जान को खतरा :::

सिंथेटिक दूध मानव के लिये धीमा ज़हर होता हैं,इससे मानव शरीर बीमारी के घर में बदल जाता हैं,आईयें जानतें हैं, इससे होनें वाली स्वास्थ समस्याओं को 
० सिंथेटिक दूध का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव छोट़े बच्चों पर होता हैं,क्योंकि उनका सम्पूर्ण आहार दूध ही होता हैं, इस दूध के सेवन से बच्चा कुपोषित हो जाता हैं,क्योंकि बच्चों के विकास के लिये ज़रूरी विटामिन, प्रोटीन इस दूध से बच्चों को नही मिलतें हैं.


० सिंथेटिक दूध में यूरिया,पेंट,और डिटरजेंट मिला होता हैं, जिनसे किड़नी फेल होनें का का खतरा पैदा हो जाता हैं.

० वर्षों तक लगातार सिंथेटिक दूध के सेवन से स्त्रीयों को बार - बार गर्भपात का होता हैं.

० सिंथेटिक दूध से बनें मावा,मिठाई खानें से कैंसर होनें की सम्भावना कई गुना बढ़ जाती हैं,क्योंकि इसमें उपस्थित प्लास्टिक पेंट गर्म होनें पर खतरनाक कार्सिनोम का निर्माण करता हैं.


० सिंथेटिक दूध की अस्वच्छता कई संक्रामक रोग के लिये उत्तरदायी हैं जैसें डायरिया,टाइफाइड, पेचिस,पेप्टिक अल्सर आदि.


सिंथेटिक दूध से होनें वाली इन समस्याओं से सम्पूर्ण विश्व पीड़ित हैं,अत : सिंथेटिक दूध को पहचाननें वाली तकनीकों को अधिक विकसित किया जाकर इस दूध को बनानें व बेचनें वालों पर कठोर दंड़ात्मक कार्यवाही करनी चाहियें ताकि जीनें के मूलभूत अधिकार की रक्षा की जा सके.

टोन्ड़ मिल्क (Toned milk):::

भैंस के दूध में पानी मिलाकर वसा (fat) तथा वसा रहित ठोस पदार्थों की मात्रा कम कर दी जाती हैं,तथा इसमें पुन: सप्रेटा दूध (skimed milk) मिलाकर वसा रहित ठोस पदार्थों को शुद्ध दूध के बराबर कर दिया जाता हैं.यह दूध टोन्ड़ दूध कहलाता हैं.


० प्याज के औषधीय प्रयोग


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रविवार, 23 अक्तूबर 2016

Mushroom कुकुरमुत्ता एक उपयोगी पौधा

 

कुकुरमुत्ता (mushroom) :::



आपनें बरसात के मौसम में पेड़ों,कुड़े - कचरें के ढ़ेर के ऊपर या भूसे  पर सफेद,मट़मेला या पीलापन लिये छतरीनुमा मखमली पौधा अवश्य देखा होगा, यही पौधा मशरूम कहलाता हैं.मशरूम की किस्में mashrum ki kishme भी कई होती हैं जो भारत और दुनिया भर में उगती हैं, परन्तु खाद्य फसल के रूप में सीप मशरूम या oyster mushroom अत्यन्त लोकप्रिय हैं. oyster mushroom की  भी अनेक किस्में दुनियाभर में उगाई जाती हैं.जैसे भारत में प्लूटोरस सजोरकाजू,चीन में प्लूटोरस एबोलनस तथा प्लूटोरस सिस्टीडिओसस,यूरोप में प्लूटोरस औस्ट्रिएटस प्रमुख हैं.
कुकुरमुत्ता
 Oyster mushroom

पोषक तत्व :::



थायमीन.          | 4.8 mg

राइबोफ्लेविन    | 4.7 mg

नियासीन.         | 108 .8 mg

कैल्सियम.        | 34 mg

फाँस्फोरस.       | 1347 mg

सोड़ियम.         | 837 mg

पोटेशियम.       | 3793 mg. 

                       (per 100 gm mushroom)


इसके अतिरिक्त मशरूम में पर्याप्त मात्रा में पानी,लगभग 9 प्रकार के अमीनों एसिड़ खनिज़ लवण,  फ्रक्टोज ,कार्बोहाइड्रेट,साइलोसाइबिन कंपाउँड़ और प्रोटीन पायी जाती हैं.

•उपयोग :::



#थकावट (fatigue) में :::



यदि सम्पूर्ण शरीर पर्याप्त मात्रा में भोजन लेनें के बाद भी थका हुआ लगता हैं, चेहरा निस्तेज और कांतिहीन लगता हो तो सुबह के नाश्ते में मशरूम सोयाबीन के साथ लें दिनभर तरोताजा महसूस करेगें.इसके अलावा मशरूम को सुखाकर पावड़र बना ले इस पावड़र को चाय काँफी या दूध में एक चम्मच ड़ालकर पीतें रहें.

#हार्मोंनल समस्याओं में :::



यदि स्त्रीयों में मासिक धर्म की अनियमितता हो,शरीर पर अनचाहे बाल आ गये हो,थायरड़ कम या ज्यादा होता हो,पुरूषों में शुक्राणु की कमी हो तनाव रहता हो तो नियमित रूप से आलिव आइल के साथ मशरूम का सेवन करतें रहें,सारी समस्याओं में बहुत फायदा होगा.

#ह्रदय (heart problem) रोगों में :::



मशरूम में उपस्थित अमीनों एसिड़ शरीर में HDL कोलेस्ट्राल का स्तर बनाये रखतें फलस्वरूप ह्रदय रोग होनें की सम्भावना नहीं होती हैं.

#टाइफाइड (Typhoid)में :::



यदि टाइफाइड फीवर में दवाईयों के सेवन से भूख लगनें की इच्छा समाप्त हो गई हो,उल्टी की इच्छा बार - बार होती हो तो मशरूम को घी के साथ सेवन करवायें .इसके लिये इसकी सब्जी बनाकर खायें.

#कब्ज और अल्सर में :::



इसमें फायबर प्रचुरता में उपलब्ध रहता हैं,जिससे आंतो की बेहतर सफाई होती हैं.जो लोग कब्ज से परेशान रहते हैं उन्हे मशरूम सलाद के रूप में कच्चा सेवन करते रहना चाहियें.
यदि पेट़ में अल्सर हैं तो मशरूम रात को पानी में भीगोंकर सुबह इस पानी को पीयें,बचें हुये मशरूम को कोकोनट़ आइल के साथ सब्जी बनाकर खायें.

#पीलिया (jaundice)में :::



इसका ताजा रस निकालकर पीतें हैं,क्योंकि इसमें उपस्थित फ्रक्टोज और पानी लीवर में उपस्थित हानिकारक पदार्थों की सफाई कर शरीर को एनर्जी देता हैं.

#रक्तचाप (blood pressure) में :::



इसमें सोड़ियम और पोटेशियम प्रचुरता में पायें जातें हैं, जो रक्तचाप का संतुलन बनाते हैं.




#रोगप्रतिरोधक (immunity)क्षमता बढ़ानें में ::
मशरूम को एलोवेरा, आंवला के साथ मिलाकर जूस बनाकर पीनें से शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती हैं.


#अनिद्रा में :::



मशरूम में उपस्थित कैल्सियम गहरी नींद लाता हैं, इसके लिये मशरूम को रात को सोते समय सब्जी या सलाद की तरह ले .


#डीमेंसिया (Dementia) में :::


यदि स्मृतिलोप की समस्या हो,किसी का नाम तक भूल जातें हो तो मशरूम को मिस्री और आंवला मिलाकर पेस्ट बना लें और इसे रोटी या ब्रेड़ के साथ मक्खन की तरह सेवन करें.



#मानसिक अवसाद में :::



ब्रिट़ेन के इंपीरियल कालेज में मशरूम पर हुये शोध में पता चला कि इसमें मौंजूद साइलोसाइबिन कंपाऊँड़ मानसिक अवसाद होनें की संभावना नगण्य कर देता हैं.

मानसिक अवसाद से बचनें के लियें कच्चें मशरूम का सेवन स्वादानुसार नमक मिर्च मिलाकर किया जा सकता हैं.



मशरूम की प्रकृति शीत होती हैं अत : एलर्जी, अस्थमा ,और शरीर शीत प्रकृति का होनें पर वैघकीय परामर्श अवश्य लें.









गुरुवार, 20 अक्तूबर 2016

गाय 😊 स्वास्थ कृषि और पर्यावरण cow health agricultural and environment

गाय 😊 स्वास्थ कृषि और पर्यावरण cow health  agricultural and environment 

गोमाता
 गाय
दुनिया के आधे से अधिक राष्ट्र कृषि अर्थव्यवस्था
की प्रधानता वाले हैं, भारत भी अपनी कृषि प्रणाली के साथ सदियों से विश्व का सर्वप्रमुख राष्ट्र था,इसका मूल कारण रासायनिक नहीं बल्कि आर्गेनिक (organic) कृषि थी.

और इस आर्गेनिक खेती के मूल में गाय (gay) का स्थान प्रमुख था.आईयें जानतें हैं,किस प्रकार से गाय के योगदान से स्वास्थ,पर्यावरण और कृषि को उन्नत बना सकतें हैं.


#स्वास्थ्य :::

गाय का दूध अमृततुल्य होता हैं,ये बात सदियों से हमारी रिषी - मुनि कहतें आयें हैं,किन्तु हमनें इस बात को विस्मृत कर दिया और जब अनेक शोधों में यह बात प्रमाणित हुई तब हमनें इसको माना.


शोधों के अनुसार गाय के दूध में जो पीलापन होता हैं वह इसमें उपस्थित सोने की वज़ह से होता हैं. और आयुर्वेदानुसार सोना सुरक्षित और सुदृढ़ शरीर के लिये आवश्यक हैं.


यदि शिशु को 6 माह से प्रतिदिन 300 ग्राम दूध पिलाया जावें तो बालक कभी कुपोषित नही होगा.

गाय का दूध अन्य पशुओं के दूध के मुकाबले हल्का और सुपाच्य होता हैं,जिसकी वजह से ये तुरन्त शरीर द्धारा ग्रहण कर लिया जाता हैं, तथा ग्लूकोज की भाँति तुरन्त शरीर को ऊर्जा प्रदान करता हैं.

इसी प्रकार गाय के पंचगव्य से अनेक असाध्य बीमारियों का इलाज संभव हैं.जैसे यदि नियमित वैघकीय मार्गदर्शन में गौमूत्र Gomutra का सेवन किया जावें तो कैंसर, गठिया, lucoderma,मधुमेह, मोटापा ,pH level का असंतुलन जैसें सेकड़ों रोगों को जड़ से ठीक किया जा सकता हैं.

#पर्यावरण और कृषि :::


गाय पर्यावरण मित्र पशु हैं,गाय कभी चारें को जड़ से उखाड़कर नहीं खाती हैं,जिससे भू - क्षरण और मिट्टी कटाव की समस्या नहीं होती हैं.


रासायनिक कीट़नाशकों ने न केवल कृषि को बर्बाद किया हैं,बल्कि पर्यावरण और किसानों की आर्थिक हालात को भी प्रभावित किया हैं.


यदि इन किट़नाशको की बजाय गौमूत्र से निर्मित आर्गेनिक कीट़नाशक का प्रयोग कृषि में किया जावें तो न केवल पर्यावरण संतुलित रहेगा बल्कि फसलों के मित्र पक्षी और किसान की जेब भी सुरक्षित रहेगी.


भारत दुनिया का प्रमुख खाद आयातक राष्ट्र हैं,तथा प्रतिवर्ष अरबों रूपये भारत द्धारा विदेशो को खाद खरीदनें के लिये दिये जातें  हैं.


यदि हम किसानों को गाय पालन के लिये प्रोत्साहित कर उसके गोबर को खेत में डालनें का समुचित प्रशिक्षण दे तो किसानों का न केवल पैसा बचेगा वरन अनेक बीमारी से भी जनमानस बचा रहेगा,क्योंकि शोधों से प्रमाणित हुआ हैं,कि जिन फसलों में रासायनिक खाद और कीट़नाशकों का प्रयोग किया जाता हैं उनमें अनेक कैंसरकारक तत्व मोजूद रहते हैं. 


मृत्यु से अमरता की ओर विमर्श


देशी खाद और गौमूत्र युक्त कीट़नाशकों के प्रयोग से मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ती हैं,और केचुएँ जैसें कृषि मित्र के लियें आदर्श आवास परिस्थितियों का निर्माण होता हैं.


दुनिया में प्रतिवर्ष चार करोड़ लोगों की मोंत वायु प्रदूषण की वज़ह से होती होती हैं,यदि हम छोटे़ किसानों को ट्रेक्टर के विकल्प के रूप में बैल आधारित टेक्नालाजी वालें उपकरण उपलब्ध करवानें में सफल हो गये तो पर्यावरण संरक्षण के साथ खेती की लागत कम करनें में मदद मिलेगी.और लागत कम होनें से किसानों का मुनाफा बढे़गा जो अन्तत : किसान आत्महत्या को रोकेगा.

बुधवार, 19 अक्तूबर 2016

इमली के घरेलू उपयोग TAMARIND

परिचय :::

इमली का पेड़ पादप वर्ग के शिंबी कुल में आता हैं.यह उष्ण कटिबंधीय जलवायु का वृक्ष हैं. जो भारत में जन्मा हैं.
खट्टा
इमली

इमली के कई नाम प्रचलित हैं,जैसे संस्कृत में इसे अम्लिका,चुंचिका,दंतशठा,चिंचा बंगाली में तेतुल,गुजराती में आंवली तथा लेटिन में टेमरिण्डस इण्ड़िका लिन्न कहते हैं.

इमली के फल और पत्तियों का स्वाद खट्टा,चटपटा और स्वादिष्ट होता हैं.जिसकी वज़ह से यह भारतीय  रसोई का अभिन्न अँग हैं.


पाये जानें वाले पोषणीय तत्व :::



फल में :::



इसके फल में कैल्सियम,आयरन,विटामिन बी ,सी,के साथ फास्फोरस बहुतायत में पाया जाता हैं.

इसमें टार्टरिक एसिड़ 18%,तक तथा,ग्लूकोज 20% तथा फ्रक्टोज 30% पाया जाता हैं.इसके अतिरिक्त अन्य अनेक तत्व पाये जातें हैं जैसे टरपीन,लिमोनिन,जेरा नियोल,फेनाइल,प्रोपेनाइड़स,सैफाल,सिनामिक अम्ल,इथिलसिनामेट़,मिथाइल,सैलिजिलेट,पेक्टीन,पाइजारीन,और अल्काइथाईजाल्स नामक एसिड़ भी सूक्ष्म मात्रा में पाये जाते हैं.




बीज में :::




इसके बीज में अल्बूमिनयडस,वसा,कार्बोहाइड्रेट, फायबर,नाइट्रोजन और फास्फोरस की मात्रा पर्याप्त मात्रा में उपस्थित रहती हैं.



जड़ों में :::



विटेक्सीन,आइसोविटेक्सीन,ओरियेटीन जैसे ग्लाइकोसाइड़ पाये जातें हैं. 



छाल और तनों में :::



एल्कालाइड़ हार्डिनिन पाया जाता हैं.



औषधिगत उपयोग :::




पेट़ रोगों में :::



कब्ज होनें पर इमली के फल के गुदे में दूध मिलाकर सेवन करने से कब्ज में आराम मिलता हैं.



० गुदे में कपूर मिलाकर सेवन करने से पतले दस्त आ जाते हैं,इस तरह यह मृदु विरेचक का काम करती हैं.



० इसमें पाया जानें वाला पाइजारिन एक उत्तम कृमिनाशक हैं .इसके लिये गुदे में मक्खन मिलाकर सेवन करवाते हैं.


० इमली के बीज के चूरें में गुड़ और जीरा मिलाकर सेवन करवानें से पुरानें से पुराना आँव और पेचिस का मरीज स्वस्थ हो सकता हैं.


० कच्ची इमली को नमक के साथ खानें से पेट़ की वायु बाहर निकल जाती हैं.



० इमली की चट़नी बनाकर खानें से भूख खुलकर लगती हैं,तथा भोजन आसानी से पच जाता हैं.



भाँग का नशा  :::




० इमली के गुदे का रस भांग खानें वाले व्यक्ति को थोड़े थोड़े अन्तराल पर पिलाया जावें तो नशा तुरन्त ही उतर जाता हैं.

० इमली का रस लगातार पीनें वाला व्यक्ति मादक दृव्यों की ओर आकर्षित नहीं होता हैं.

त्वचा संबधित रोगों में :::




० खुजली होनें पर गुदे को पीसकर त्वचा पर लपेटनें से खुजली दूर हो जाती हैं.

० इमली की छाल को तिल के तेल के साथ जले स्थान पर लगानें से शीघृ आराम मिलता हैं, और फफोले नही पड़ते.

० इसके बीज का बारिक चूर्ण बनाकर पके घाव पर लगानें से घाव से पीप बाहर निकल जाता हैं.






नपुसंकता में :::



० इमली के बीजों को दूध के साथ उबालकर इसे बारिक पीस लें और घी शक्कर मिलाकर रात को सोते समय एक चम्मच सेवन करें इस विधि से न केवल नपुसंकता खत्म होती हैं,बल्कि धातु भी पुष्ट होती हैं.


गठिया रोग में :::



० इमली के गुदे को नमक के साथ मिलाकर घुट़नों,शरीर के जोंड़ों पर बांधनें से गठिया रोगों में आराम मिलता हैं.

० संधियों में सूजन आने पर इमली की पत्तियों को पीसकर गरम कर लें तत्पश्चात संधियों पर बांध ले बहुत आराम मिलेगा.

लू (heat stroke)लगनें पर :::




० फल का रस बनाकर पीला दें,साथ ही हाथों,तलवों पर गुदे से मालिश करें.



आँखों के रोगों में :::



० इसके बीजों को पीसकर आँखों पर बाँधनें से Digital eye strain का खतरा कम हो जाता हैं.

आयुर्वैद चिकित्सा में इमली को रूक्ष मलसारक,उष्ण और कफ वात शामक माना गया हैं.इससे अनेक औषधियों का निर्माण भी होता हैं,जैसे अम्लिकासव,चिंचा फल्लातक वटी आदि.



० प्याज के औषधीय प्रयोग



सोमवार, 17 अक्तूबर 2016

sutshekhar ras, AKIKA PISTI Saravajwarhara lauha

Sutshekhar ras :::

content :::

० shuddha Gandhak.
० pippali (piper longum).
० saunth (zingiber officinale).
० kalimirch (piper nigrum).
० shankh bhasma (Turbinelal pyrum).
० shuddha dhatura (Datura metel).
० shuddha para.
० Tankan bhasma.
० Tamra bhasma.
० Dalchini (cinnamomum zeylanicum).
० Nagkesar (mesua ferrea).
० Elaichi (Elettari cardamomum).
० kapur.
० Belgiri


Indication :::

० Urological disorder.
० Acidity.
० Giddiness.
० Headache.
० Stomatitis.
० Abdominal disturbance.
० chardi (vomiting).
० chronic obstructive jaundice.
० cough.
० Grahni (sprue).
० Diarrhoea with vata,pitta and kapha.

Dosage :::

As directed by the physician.

Pathya and Apathaya :::

० oily and fatty foods should be avoided.
० tea and coffee should be avoided.
० saunf (Anissed croomy) and coriander seeds should be taken twice a day.
० sugar and salt mixed in cold lemon water should be taken twice a day.



अकीक पिष्टी (Akika pisti):::


घट़क (counter) :

• अकीक शुद्ध चूर्ण
• कुमारी रस
• केतकी रस
• जलपिप्लिका स्वरस
• कदाली स्वरस

उपयोग (Indication):::

• पित्त रोग
• कास
• ह्रदय रोग

अनुपान :::

• शहद
• अश्वगंधा
• श्रंगवेरा स्वरस


सर्वज्वरहर लोह (SARVAJWARHARA LAUHA) 


घट़क (content) :::


चितृक 
• हरितकी
• विभीतकी
• आमलकी
• सुंठी मारिका
• पिपली
• विडंग
• मुस्तका
• गजपीपली
• पीपलीमूल
• उसीरा
• देवदारू
• किरातिक्ता
• बला
• कटुका
• सिगरू
• यष्टी
• कटाजा (एक भाग)
• लोह भस्म (20 भाग)

उपयोग (Indication)::

समस्त ज्वर

शनिवार, 15 अक्तूबर 2016

what is metabolic syndrome

what is metabolic syndrome ?
Syndrome
 Metabolic syndrome

metabolic syndrome encompasses three or more than three disorders related to metabolism. It is a term which refers to a cluster of conditions, including various interrelated cardio - metabolic risk factors that promote development of atherosclerotic cardiovascular diseases and type 2 diabetes. The cluster of conditions include increase blood pressure, high blood sugar, excess body fat around waist and abnormal cholesterol levels. Although any of these conditions increase risk of serious disease, presence of one of these conditions does not indicate metabolic syndrome. The term metabolic syndrome is necessarily used in conditions where you have most of the above conditions at once resulting in serious complication.

cause :::

According to a study in Indians, females were three times more likely to have metabolic syndrome when compared to males, Individuals with hypercholesterolemia were almost two and half times as likely to be at risk of metabolic syndrome as those with normal levels.some important cause for metabolic syndrome are :::


obesity :::

obese people having large waistline and greater body mass index.These people have five times higher risk of metabolic syndrome. obesity as an epidemic is considered as primarily responsible for prevalence of metabolic syndrome.

Lifestyle :::

People with sedentary lifestyle are more prone to insulin resistance, Diabetes and hence metabolic syndrome.

Ethnicity :::

people in south Asian countries are seen to be at higher risk of metabolic syndrome as indicated by it's high prevalence in those region.

Medication :::

people under medications such as some of the anti - inflammatory drugs,Anti - retroviral drugs,anti - allergic,anti - depressants and anti - psychotic agents increase the risk of obesity, in turn elevating the risk of metabolic syndrome.

Age :::

Aging increases the risk factors associated with metabolic syndrome.

Diet :::

It has been a topic of debate, whether people consuming less anti - oxidants and more of trans - fats are at greater risk than those consuming more of sour fruits and balanced diet.

other conditions :::

people with risk factors related to heart diseases which are responsible for long or short term cardiac risk like high LDL,low HDL etc,are inclined to getting metabolic syndrome. People who have been diagnosed with other conditions like blood pressure, cardiovascular diseases, polycystic ovarian syndrome etc are also prone to metabolic syndrome.

Treatment :::

obesity and body fat distribution :
losing weight is primary treatment for metabolic syndrome. It includes plans of healthy living like regular exercise for 30 minutes, Walking healthy eating and quitting smoking would help to check metabolic syndrome. Losing weight would in turn lower the levels of cholesterol and triglycerides, increase the levels of HDL and also lowers blood pressure values all these implications would reduce the risk of cardiovascular diseases.

Targeting insulin resistance :::
Targeting insulin resistance along with measures to control obesity will have a synergistic effect as treatment therapy. Metformin and insulin sensitizers such as thiazolidinediones  are used to reduce insulin resistance. Among these, metformin has shown to reduced risk of CHD in obese diabetic people.

Targeting therapy involving treatment for individual risk :::
Risk factors like atherogenic dyslipidemia ,blood pressure, prothrombotic state,pro - inflammatory state,and hyperglycemia (diabetes) can be targeted individually for effective treatment of metabolic syndrome.

Being a lifestyle disease, right diet,exercises along with regular health monitoring of blood cholesterol levels would help in prevention as well as diagnosis of metabolic syndrome.





शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2016

vascular tumour, वस्कुलर ट्यूमर

वस्कुलर ट्यूमर (vascular tumour)::

आप में से कई लोग ऐसे लोगों से मिलें होगें जिन्हें शरीर के विभिन्न भागों जैसें हाथ,पैर,गर्दन,या शरीर के अन्य भागों पर बड़ी - बड़ी गांठें हो और जो समय के साथ एक जैसी या बड़ी हो रही हो.

इन गांठों को चिकित्सतकीय भाषा में एन्युरिज्म,एंजियोमा तथा हिमैंजियोमा कहतें हैं.चूँकि ये गांठें खून की नसों के ऊपर होती हैं,और परजीवी बेल की तरह खून की नसों से पोषित होती हैं,अत : इन्हें वस्कुलर ट्यूमर (vascular tumour) भी कहतें हैं.

कारण :::

० खून की शिराओं में जन्मजात विकृति होनें के कारण खून की नसें फूलकर मोटी हो जाती हैं,जो समय के साथ बड़ी गांठ बन जाती हैं,ज्यादातर वस्कुलर ट्यूमर के मामलें इसी प्रकार के होतें हैं.

० कोलेस्ट्राल की अधिकता की वज़ह से खून की नसों की दीवारों पर दबाव पड़ता हैं फलस्वरूप नसें फूलकर वस्कुलर ट्यूमर में परिवर्तित हो जाती हैं.

मधुमेह की वज़ह से शरीर में चोट़ लग जाती हैं,तो चोट़ वाली जगह फूलकर वस्कुलर ट्यूमर बन जाती हैं.

० दुर्घट़ना की वज़ह से खून की नसें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं,और यदि उचित देखभाल नहीं हो तो नसों की दीवार फूलकर वस्कुलर ट्यूमर में परिवर्तित हो जाती हैं.


वस्कुलर ट्यूमर से संभावित खतरें ::::

यदि आपके परिवार में या आपको स्वंय को वस्कुलर ट्यूमर की समस्या हो तो सावधानिपूर्वक
ट्यूमर की देखभाल सुनिश्चित करनी चाहियें जैसें

० चोंट़ लगनें से बचाना चाहियें क्योंकि अधिक रक्तस्त्राव जान का खतरा पैदा कर सकता हैं,यदि मधुमेह की समस्या हो तों खतरा भी दोगुना हो जाता हैं,क्योंकि चोंट़ वाली जगह गेंग्रीन में परिवर्तित हो जाती हैं.इसी तरह उच्च रक्तचाप में चोंट़ लगनें पर खून अधिक बहता हैं.

० वस्कुलर ट्यूमर धिरें - धिरें बढ़नें पर प्रभावित अंग पूर्ण विकसित नहीं हो पाता फलस्वरूप व्यक्ति विकलांगता का शिकार हो जाता हैं.

अत : आवश्यकता इस बात की हैं,कि बीमारी के संभावित खतरों को देखतें हुये समय रहतें उपचार ले लिया जावें.क्योंकि जान हैं तो जहान हैं.

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बुधवार, 12 अक्तूबर 2016

रक्तदान ,Blood donation

रक्तदान :::

रक्तदान को सभी दानों में श्रेष्ठ दान माना गया हैं.अन्य दानों में जहाँ हम दान लेनें वाले की आर्थिक और सामाजिक मदद करतें हैं,वही रक्तदान ऐसा दान हैं, जिसमें हम किसी अनजान या परिचित व्यक्ति को जीवनदान देतें हैं.
रक्तदान
 रक्तदान करता युवा

विश्व स्वास्थ संगठन (w.h.o.) के अनुसार दुनिया में प्रति दो सेकेण्ड़ में रक्त की आवश्यकता पड़ती हैं.यह आवश्यकता दुर्घट़ना में घायल व्यक्ति को,एनिमिया, आपरेशनों आदि अनेक प्रकारों में होती हैं.किन्तु इस आवश्यकता के मुकाबले रक्त की आपूर्ति बहुत कम हो पाती हैं,

उदाहरण के लिये भारत में प्रतिवर्ष  100 लाख यूनिट़ रक्त की आवश्यकता के मुकाबले मात्र 60 लाख यूनिट़ रक्त ही एकत्रित होता हैं.और इसमें से भी लगभग 25% रक्त उचित भंड़ारण प्रक्रिया के अभाव में नष्ट़ हो जाता हैं.

रक्त का जीवनचक्र :::

रक्त का जीवनचक्र अत्यंत लघु होता हैं.इसके अलग - अलग भागों को मात्र कुछ दिवस तक भण्ड़ारित करके रखा जा सकता हैं ,जैसे --::
० लाल रक्त कणिकाओं (w.b.c.) को 41 दिन .
० प्लेटलेट्स को पाँच दिन.
० प्लाज्मा तथा कायोप्रेसीपीटेट को एक वर्ष तक रखा जा सकता हैं.

रक्तदान कौन कर सकता हैं ?

18 वर्ष से अधिक के वे सभी स्त्री पुरूष जिनका वज़न 50  से अधिक होता हैं. तथा जो चिकित्सतकीय रूप से स्वस्थ हो रक्तदान कर सकतें हैं.

रक्तदान के फायदे :::

० नियमित रक्तदान करनें वाले व्यक्ति में ह्रदय रोग की आशंका रक्तदान न करने वाले व्यक्ति की तुलना में 50% कम होती हैं क्योंकि रक्त में उपस्थित आयरन की अधिक मात्रा अधिक कोलेस्ट्राल के लिये उत्तरदायी होती हैं,नियमित रक्तदान करनें से आयरन का स्तर कम होता रहता हैं, अत : कोलेस्ट्राल भी कम बनता हैं.

० रक्तदान करने से नई लाल रक्त कणिकाओं का उत्पादन बढ़ता हैं, क्योंकि इनका स्तर घट़नें पर तुरन्त अस्थि मज्जा (Bone marrow) द्धारा नई w.b.c.का उत्पादन शुरू कर दिया जाता हैं अत : शरीर में नया रक्त आ जाता हैं.

मोटापे से ग्रसित व्यक्ति द्धारा रक्तदान करनें से शरीर की अतिरिक्त चर्बी ऊर्जा में परिवर्तित होकर मुक्त हो जाती हैं,फलस्वरूप व्यक्ति दुबला और शारीरिक रूप से चुस्त हो जाता हैं.

० रक्तदान करने से हेपेटाइटिस वायरस के खतरे को कम करनें में मदद मिलती हैं.

० किड़नी शोथ (Nephritis) का खतरा नहीं रहता .

० सबसे बढ़कर मन में किसी की जान बचानें का सन्तोष रहता हैं, जो प्रत्येक कार्य में आशावादी दृष्टिकोण रखनें में मदद करता हैं, अत : तनाव, विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होनें की क्षमता विकसित होती हैं.


बाम्बे ब्लड़ ग्रुप [Bombay blood group] :::

बाम्बे ब्लड़ ग्रुप एक विशिष्ट किस्म का रक्त का समूह होता हैं.जो 'ओ' रक्तसमूह के अन्तर्गत आता हैं.इस समूह के रक्त चढ़ानें वाले व्यक्ति में अपने समूह से रक्त लेने के बावजूद रिएक्सन होता हैं.

रिएक्सन क्यों होता हैं :::

इस किस्म के रक्त प्राप्त करता समूह में एंटीजन H की कमी पाई जाती हैं,जिस वजह से रिएक्सन होता हैं.एंटीजन H की अनुपस्थिति की में इन्हें OH ब्लड़ समूह में रखा जाता हैं.

इस प्रकार के रक्त समूह वाले सिर्फ अपने ही समूह में रक्त का आदान प्रदान कर सकते हैं.




मंगलवार, 11 अक्तूबर 2016

Body integrity identity disorder,BIID

body integrity identity disorder

बाँड़ी इंटीग्रिटी आइडेंटी डिसआर्डर या BIID एक मनोशारीरिक समस्या हैं,जिससे प्रभावित व्यक्ति अपनें ही शरीर के अँगों से घृणा करनें लगता हैं, और उन अंगों को शरीर से हटा देनें के लियें प्रयत्नशील रहता हैं. 

उदाहरण के लिये कई व्यक्ति अपनें पुरूष या महिला होनें से घृणा करतें हैं,और किसी भी कीमत पर अपना लिंग परिवर्तित करना चाहतें हैं,यही समस्या शरीर के अन्य अँगों के प्रति भी रहती हैं.

BIID की समस्या लाखों लोगों में एक या दो व्यक्तियों को होती हैं.

समस्या क्यों होती हैं ?

० शोध कहतें हैं,कि इस समस्या से पीड़ित व्यक्ति का मस्तिष्क सामान्य मस्तिष्क के मुकाबले कम विकसित होता हैं,इस वज़ह से प्रभावित व्यक्ति अपने को हानि पहुँचाकर समाज की सहानूभूति या समाज का ध्यान अपनी और आकृष्ठ करवाना चाहता हैं.
० मनोचिकित्सकों के अनुसार  यह समस्या प्रभावित व्यक्ति के मस्तिष्क द्धारा शरीर की संरचना नहीं समझनें की वज़ह से होती हैं.क्योंकि मस्तिष्क शरीर के अँगों से तालमेल नहीं बिठा पाता और अपनें ही अँगों को शरीर से अलग समझनें लगता हैं.

क्या इसका कोई इलाज़ हैं ?

यदि समय पर उचित देखभाल और रोगी के साथ उचित रूप से पेश आकर उचित विधियों का प्रयोग किया जावें तो निश्चित रूप से बीमारी पर काबू पाया जा सकता हैं. इसके लिये ज़रूरत इस बात की हैं,कि रोगी का उचित रूप से प्रशिक्षण हो.

योग की कुछ क्रियाएँ इस बीमारी का समूल उन्मूलन कर सकती हैं, जैसे भ्रामरी, प्राणायाम, अनुलोंम विलोम आदि.

पंचकर्म की कुछ विधियों के द्धारा मानसिक मज़बूती पायी जा सकती हैं.

इसके अलावा रोगी को यदि लगातार अपनें अंगों की कार्यपृणाली उसकी उपयोगिता के विषय में जागरूक किया जावें तो रोगी को स्वस्थ जीवन जीने के लिये तैयार किया जा सकता हैं.





रविवार, 9 अक्तूबर 2016

जीन संवर्धित फसल और हमारा स्वास्थ,Gm

जीन संवर्धित (Genitcally modified)


फसल क्या हैं ? :::


जीन संवर्धन या Genitacally modified फसलें ऐसी फसलें होती हैं,जो परंपरागत फसलों के मुकाबले अधिक कीट़रोधी,तापरोधी,सूखारोधी और बाढ़रोधी होती हैं, इन फसलों का उत्पादन भी सामान्य फसलों के मुकाबलें अधिक होता हैं.


ऐसा परिवर्तन इन फसलों के बीजों में डी.एन.ए.परिवर्तन के जरियें होता हैं.दुनिया में जीन संवर्धित फसलों की अनेक किस्में उगाई जा रही हैं जैसें -- भारत में कपास,अमेरिका(U.S.A) में कपास,मक्का,सोयाबीन,चुकंदर,पपीता,और आलू अर्जेंटीना(Argentina) में सोयाबीन,मक्का,कपास चीन(China) में पपीता,कपास बांग्लादेश(Bangladesh) में बैंगन अफ्रीका(Africa) में कपास और मक्का .
जीन संवर्धित फसल का फोटो
 Gm फसल का दृश्य

Gm फसलों का स्वास्थ पर प्रभाव :::



विश्व के अनेक विकसित और विकासशील देशों में Gm फसलों के स्वास्थगत एँव पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर व्यापक शोध चल रहें हैं.लेकिन इन फसलों के स्वास्थ पर होनें वालें प्रभाव को लेकर शोधगत बातों की अपेक्षा आशंकापूर्ण बातें ज्यादा की जा रही हैं जैसे बीटी बैंगन को लेकर कहा जा रहा हैं,कि इससे शरीर की प्रतिरोधकता कम हो जाती हैं,और कैंसर, मधुमेह की संभावना बढ़ जाती हैं.




लेकिन इंडियन इंस्टीट्यूट आँफ साइंस के शोधकर्ताओं के अनुसार ये बातें भ्रामक और तर्कहीन तथ्यों पर आधारित हैं,


जिन देशों में बीटी बैंगन पैदा और खाया जा रहा हैं वहाँ इस तरह की कोई स्वास्थगत समस्या नही पैदा हुई हैं,बल्कि बीटी बैंगन खानें वाले लोगों का स्वास्थ उन्नत ही हुआ हैं बांग्लादेश जो कि बीटी बैंगन उगाता और खाता हैं के लोगों का स्वास्थ सूचकांक भारत,चीन और अफ्रीका के कई देशों से बेहतर हुआ हैं.


भारत लम्बें समय से बीटी काँटन उगा रहा हैं और इसके बीनोले से निकलने वाला तेल उपयोग कर रहा हैं,इसी प्रकार इससे बनने वाली खल पशु खा रहे हैं,क्या इसका कोई दुष्प्रभाव मनुष्य पर देखा गया हैं ? नही बिल्कुल नहीं बल्कि पशु स्वास्थ में सुधार ही हुआ हैं जिससे दूध और मांस की गुणवत्ता बढ़ी हैं,इसके फलस्वरूप भारत विश्व में दूध और मांस का अग्रणी उत्पादनकर्ता राष्ट्र बन गया हैं.


इसी प्रकार अमेरिका और कनाड़ा जैसें देशों में जीन संवर्धित मक्का मानव और पोल्ट्री दोनों के खाद्य पदार्थ के रूप में प्रयोग हो रही हैं, 


क्या इस मक्का को खानें वालें व्यक्तियों या मक्का खाकर बढ़े हुये पोल्ट्री उत्पादन खानें वालें व्यक्तियों पर इसका कोई दुष्प्रभाव देखा गया हैं ? नहीं बिल्कुल नही .


तो फिर जीन संवर्धित फसलों को लेकर इतनी हायतोबा क्यों ? विश्व स्वास्थ संगठन (w.h.o.)और विश्व सरकारों को चाहियें की जीन संवर्धित फसलों को लेकर पलनें वाली भ्रान्तियों का समाधान करें ताकि विश्व के अल्पविकसित और विकासशील राष्ट्रों में होनें वाली भूख और कुपोषण (malnutrition) से होनें वाली मौंतों पर अंकुश लगाया जा सकें.


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शनिवार, 8 अक्तूबर 2016

Amritarishta

Amritarishta :::

''Amrita'' is a very famous plant for ayurveda practice .it is also known " Giloe".



Content :::

० Giloe (Tinospora cordifolia).
० chirayta (Swertia chirayita).
० kutki (pichrorhiza kurroa).
० pippli (piper longum).
० pittpapra (fumaria indica).
० Dhaiphool (Woodfordia fruticosa).
० Indrajao (Holarrhena antidysent erica).
० Atees (Aconitum heterophyllum).
० Jeers.
० Nagarmotha (Cyprus rotundus).
० saptaparna.
० Nagkeshar.
० saunth (Zingiber officinale).
० marich.


० पंचनिम्ब चूर्ण



Indication :::

० chronic fever.
० various infection like urinary tract infection,Blood infection.
० skin disease.
० Dengue.
० chickengunia.
० spleen enlargement.
० pyrexia unknown origin.
० Typhoid.

Dosage :::

As directed by the physician.



Jatyadi oil

  1. Jatyadi oil :::

#Content :::

० Chameli pati.

० Neem patti.

० Patolpatra.

० Karanjpatti.

० Mulethi (Glycyrrihiza glabra).

० koot.

० Haldi.

० Daruhaldi (Berber is aristata).

० kutki (picrorhiza kurroa)
० majeetha.

० Kamal.

० Lodra.

० Harad (Terminalia bellerica).

० Nelkamal (Nelumbo nucifera).

० Neelathotha.

० Sariva.

० karanjseed.

० Till tel and other.


#Indication :::

० Kacchu.

० sphotka.

० Nazi vrana.

० sastraprahara.

० Dagdha varana.

० Santa nakha ksata.

० Dusra varana.

० Also use in healing wound,ulcers, skin disease, eruptions in piles,fistula.

#Dosage :::


local application on the affected part as directed by physician .


० पंचनिम्ब चूर्ण









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