27 अप्रैल 2017

विटामिन D और हमारा स्वास्थ किस प्रकार संबधित हैं जानियें विटामीन D के कुछ अनुपम स्वास्थ्य लाभ (vitamin D and our health)

विटामिन D और हमारा स्वास्थ

विटामिन D vitamin D हमारें शरीर में सूर्य की धूप में खड़े रहनें से मिलता हैं.

यदि व्यक्ति सुबह की गुनगुनी धूप में दस मिनिट खड़ा रहें,तो उसे पर्याप्त मात्रा में विटामिन D मिल जाता हैं.
 

विटामिन D हमारी हड्डीयों के स्वास्थ के लियें बहुत महत्वपूर्ण विटामिन हैं,क्योंक इसकी उपस्थिति में ही हड्डीया कैल्सियम ग्रहण कर पाती हैं.
विटामीन D

विटामिन D हमारी हड्डीयों के स्वास्थ के लियें बहुत महत्वपूर्ण विटामिन हैं,क्योंक इसकी उपस्थिति में ही हड्डीया कैल्सियम ग्रहण कर पाती हैं.

अनेक शोधों में यह प्रमाणित हुआ हैं,कि विटामिन D न केवल हड्डीयों के स्वास्थ के लिये ज़रूरी हैं,बल्कि कई अन्य शारीरिक क्रियाकलाप इसकी कमी या अनुपस्थिति में प्रभावित होतें हैं.जैसें


#1.ह्रदय के क्रियाकलाप :: 


ह्रदय हमारें शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं,जिसके सही संचालन पर ही हमारा उत्तम स्वास्थ्य निर्भर करता हैं.

अनेक शोधकर्ताओं ने प्रयोग द्धारा यह सिद्ध किया हैं,कि यदि ह्रदय को विटामिन D vitamin D की आपूर्ति बाधित होती हैं,तो धमनियों में कैल्सियम जमा हो जाता हैं,जिससे कि ह्रदयघात का जोखिम बढ़ जाता हैं.


#2.उच्च रक्तचाप :::


विटामिन D की कमी होनें पर खून में जमा कैल्सियम की वज़ह से ह्रदय को अधिक कार्य करना पड़ता हैं,फलस्वरूप उच्च रक्तचाप की समस्या पैदा हो जाती हैं.

#3.मधुमेह :::


विटामिन D की कमी का असर हमारें पेन्क्रियास पर पड़ता हैं,और इसकी माँसपेशिया कमज़ोर हो जाती हैं,फलस्वरूप ये माँसपेशियों इंसुलिन का स्त्रावण ( secretion) नहीं कर पाती हैं,जिसका परिणाम मधुमेह होता हैं.

#4.मस्तिष्क स्वास्थ्य :::


हमारा मस्तिष्क बहुत जटिल संरचनाओं से निर्मित होता हैं.इन जटिल संरचनाओं के कुशल कार्य हेतू अनेक पोषक तत्वों की ज़रूरत पड़ती हैं.

अनेक शोधों से यह प्रमाणित हुआ हैं,कि विटामिन D की कमी से माइग्रेन, अवसाद,डिमेंसिया,अत्यधिक नींद आना जैसी बीमारी पैदा हो जाती हैं.

चूहो पर किये अध्ययन में यह प्रमाणित हुआ कि जिन चूहों को समय समय पर विटामिन D युक्त आहार दिया गया उनमें चुस्ती फुर्ती एंव मानसिक एकाग्रता उन चूहों से अधिक पाई गयी जिन्हें बिना विटामीन D दिये दूसरें समूह से अलग रखा था.

#5.रोगप्रतिरोधक प्रणाली :::



जिन लोगों में विटामिन D की कमी होती हैं,वे बार - बार बीमार होतें हैं,क्योंकि श्वेत रक्तकणिकाये इसकी अनुपस्थिति में फूलकर बीमार हो जाती हैं,फलस्वरूप प्रतिरोधक तंत्र कमज़ोर होकर अनेक बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं.

#6.पेट संबधित परेशानियाँ :::


एक शोध द्धारा स्पष्ट हुआ कि जो लोग मोटे थें,उनमें एसीडीटी, बदहजमी,कब्ज की समस्या अधिक थी.

जब इसके कारणों का विश्लेषण किया गया तो एक कारण यह भी निकला कि मोटें लोगों की त्वचा में जमा चर्बी सूर्य की रोशनी से बननें वालें विटामिन D की प्रक्रिया को बाधित करती हैं,

फलस्वरूप शरीर को पर्याप्त विटामिन नही मिल पाता यही विटामिन D की कमी आंतों की कार्यपृणाली घटाती हैं,जिससे एसीडीटी, कब्ज, बदहजमी जैसी समस्या पैदा हो जाती हैं.

#7.हड्डीयों का स्वास्थ्य :::


हड्डीयों का स्वास्थ्य निर्धारित करनें में विटामिन D का योगदान बहुत महत्वपूर्ण होता हैं,

यदि इसकी कमी होगी तो हड्डीयाँ चटकना,हाथ पैरों में तीव्र दर्द,जोड़ों में दर्द ,माँसपेशियों में दर्द जैसी समस्या पैदा हो जाती हैं.

इसके अलावा शरीर की लम्बाई निर्धारित करनें में भी विटामिन D महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं,इसकी कमी से  बोनापन और शरीर का अनियमित विकास होता हैं.

रक्त में यदि कैल्सियम का नियत्रंण विटामिन D की कमी से नही होता हैं,तो कैल्सिमिया नामक रोग हो जाता हैं.

# 8.महिला स्वास्थ्य :::


महिलाओं का स्वास्थ्य निर्धारित करनें में विटामिन की भूमिका को नज़रअंदाज नही किया जा सकता इसकी कमी से pcod,बांझपन,अनियमित मासिक चक्र,बार - बार गर्भपात जैसी समस्या पैदा हो जाती हैं.

#9.त्वचा स्वास्थ्य :::


आस्ट्रेलिया के मेनजीन संस्थान के शोधकर्ताओं के मुताबिक विटामिन D त्वचा के लिये बहुत महत्वपूर्ण विटामिन हैं,

यदि यह विटामिन त्वचा के माध्यम से हमारें शरीर को मिलता हैं,तो त्वचा संबधित बीमारियाँ जैसें दाद खाज खुजली होनें की संभावना कम हो जाती हैं,इसके अलावा रोमछिद्रों के खुलनें से त्वचा की सुंदरता बढ़ती हैं.

#10. योन सम्बंधों में चरम सुख का अभाव :::


जिन महिला पुरूषों में विटामिन D की कमी होती हैं,वे योन सम्बंधों में चरमसुख प्राप्त नही कर पातें हैं,क्योंकि शारीरिक सम्बंध बनानें के समय वे बहुत जल्दी थककर स्खलित हो जातें हैं.

इसी प्रकार इसकी कमी से यौनि में कसावट़ का अभाव,लिंग का ढ़ीला होना जैसी समस्या आम हो जाती हैं.

#11.विटामिन D की कमी पहचानने वाला परीक्षण :::


विटामिन D की कमी को पहचानने के लिये 25 OH D TEST किया जाता हैं,जिसमें खून में मोजूद 25 हाइड्राक्सी विटामिन शरीर में मोजूद विटामिन D की मात्रा को बताता हैं.

विटामिन D की शरीर में मोजूदगी को नेनोग्राम में मापा जाता हैं.
शरीर में 12 नेनोग्राम न्यूनतम विटामिन D का स्तर होना चाहियें, जबकि इसकी अधिकतम मात्रा 50 नेनोग्राम होनी चाहियें.

#12.विटामिन डी युक्त आहार :::


 विटामिन D हमारें शरीर द्धारा सूर्य की रोशनीहैं सम्पर्क आनें से निर्मित होता हैं,10 मिनिट तक सुबह की गुनगुनी धूप में खड़े रहनें से  हमें पर्याप्त मात्रा में विटामिन D मिल जाता हैं.किन्तु कुछ खाद्य पदार्थ भी हैं,जो विटामीन डी का बहुत अच्छा स्त्रोंत हैं जैसें समुद्री उत्पाद ,काँड लीवर आइल,मशरूम,दूध,मक्खन,चीज,अंकुरित अनाज और सूखे मेवे जैसें अखरोट,काजू विटामिन D का बहुत अच्छा स्रोत हैं.




• च्वनप्राश



० तेलों के हेरान करने वाले फायदे





० यूटेराइन फाइब्राइड़




23 अप्रैल 2017

मिट्टी में अम्लीयता का कारण प्रभाव और उसका समाधान [ cause effect and managment of acidic soil]


भारत सहित सम्पूर्ण विश्व में फसलों को उगानें के दृष्टिकोण से मिट्टी को अम्लीय और क्षारीय मिट्टी में विभाजित किया गया हैं.इस अम्लीयता और क्षारीयता की गणना PH मान से की जाती है.एक आदर्श मिट्टी का PH मान 7 होता हैं.आज हम मिट्टी की अम्लीयता की बात करेंगें.

खेत का pH
 मिट्टी में अम्लीयता

(अ).अम्लीय मिट्टी [Acidic soil] :::



• जिस मिट्टी का PH मान 7 से कम होता हैं,उसे अम्लीय मिट्टी की श्रेणी में रखा जाता हैं.मिट्टी में अम्लीयता होनें से इसमें कैल्सियम जैसें पोषक तत्वों की भारी कमी हो जाती हैं.


(ब).कारण [cause] :::



• मिट्टी में अम्लीयता का प्रमुख कारण अत्यधिक वर्षा हैं.जिन क्षेत्रों वार्षिक वर्षा 2,000 मिमी से अधिक होती हैं.वहाँ कि मिट्टी में यह आम समस्या हैं,क्योंकि पानी के साथ कैल्सियम बह जाता हैं,जो मिट्टी को क्षारीय बनाने वाला प्रमुख तत्व हैं.भारत में पूर्वी क्षेत्र की मिट्टी में यह आम समस्या हैं.


(स).अम्लीयता का जनजीवन पर प्रभाव :::




मिट्टी में अम्लीयता का व्यापक प्रभाव फसलों एंव जनजीवन पर देखा गया हैं,जैसें

#1. निम्न फसल उत्पादकता .


#2.खाद्य एँव चारा फसलों की निम्न गुणवत्ता जिसकी वजह से कुपोषण ,उदाहरण के लियें पूर्वोत्तर भारत में रहनें वाले लोग बोने होतें हैं,जिसका प्रमुख कारण फसलों में कैल्सियम की कमी हैं.


#3.फसलें कम पैदा होनें से व्यापक गरीबी और बेरोजगारी.

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आत्मविकास के 9 मार्ग👈


प्रधानमन्त्री फसल बीमा योजना👈


० तुलसी 



० जल प्रबंधन के बारें में जानें

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(द).समाधान :::




अम्लीय मिट्टी को सुधारकर व्यापक स्तर पर खेती के प्रयोग लायक बनाया जा सकता हैं,इसके लियें निम्न सुझाव अपनायें जा सकतें हैं.


#1.मिट्टी परीक्षण कर आवश्यकतानुसार अम्लीय मिट्टी के क्षेत्रों में चूनें का छिड़काव.


#2.जैविक खाद का खेतों में और पेड़ पौधों की जड़ में छिड़काव.


#3. फसलों को सिंचित करनें वालें पानी के स्रोतों में चूना मिलाकर उपयोग करना ताकि मिट्टी द्धारा बेहतर तरीके से कैल्सियम का अवशोषण हो सकें.
#4.पोल्ट्री फार्मों से निकलनें वाले अवशेषों को मिट्टी में गहराई तक जाकर मिलाना ताकि इनका बहाव नही हो सकें.


#5.वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग और निर्माण व्यापक स्तर पर कर मिट्टी में मिलाना चाहियें, इसके लियें अम्लीयता प्रभावित क्षेत्रों में वर्मी कम्पोस्ट बनाना प्रत्येक ग्राम या नगर सरकार के लिये अनिवार्य कर देना चाहियें.


यदि बेहतर प्रबंधन कर अम्लीय मिट्टी में फसल उगाई जावें तो इसमें उगनें वाली फसल भी सामान्य मिट्टी में उगनें वाली फसलों के समान गुणवत्तापूर्ण एँव पोषक पैदा होगी.


० पलाश वृक्ष के औषधीय गुण



० गेरू मिट्टी के औषधीय प्रयोग


21 अप्रैल 2017

वेश्यावृत्ति [Prostitution] के बारे में वो सबकुछ जो आपको जानना ही चाहियें

पैसा लेकर सेक्स
 वैश्यावृत्ति
संसार के प्रत्येक देशों में योनिक स्वच्छंदता सदियों से चली आ रही हैं,फर्क बस इतना हैं,कि पश्चिमी समाज इसे सामाजिक रूप से ठीक मानता हैं,
जबकि पूर्वी समाज ठीक इसके उलट मानता हैं,योनिक स्वच्छंदता का यही पूर्वी संस्करण वेश्यावृत्ति (prostitution) कहलाता हैं.

वेश्यावृत्ति vesyavruti का समर्थन करतें हुये यूरोप के पादरी इक्वीनास ने कहा था कि " वेश्यावृत्ति घर में स्थित गटर की नाली के समान हैं,यदि इसे बंद कर दिया तो पूरा घर गन्दगी से भर उठेगा " अर्थात समाज से व्यभिचार मिटाने के लिये वेश्यावृत्ति आवश्यक हैं.

एक अन्य व्यक्ति सेंट आगस्टाइन ने भी वेश्यावृत्ति के बारें में इसी प्रकार की राय देते हुये कहा था,कि "समाज से यदि वेश्यावृत्ति को निकाल दिया जायें तो सम्पूर्ण समाज वासना से पथभ्रष्ट बन जायेगा 
 

दूसरी और पूर्वी समाज विशेषकर भारत में देखे तो वेश्यावृत्ति को अलग - अलग नजरीये से.देखा गया हैं,धर्म की सेवा में अपना सर्वस्व अर्पित करनें वाली स्त्री को कही देवदासी कहा गया,कही अप्सराएँ तो कही रूपजीवाँए .

जबकि आर्थिक आधार पर अपना शरीर बेचने वाली या वालें को विशुद्ध वेश्या का ठप्पा लगाकर समाज में सबसे घृणित बना दिया गया.और इन्हें तरह तरह से प्रतिबंधित किया गया.

महात्मा गांधी ने वेश्यावृत्ति को आर्थिक लाभ प्राप्त करनें तथा समाज में बुराई फेलानें के दृष्टिकोण से सबसे घिनोना कृत्य कहा .

उनके दृष्टिकोण को सम्मान देते हुये भारत सरकार ने इस समस्या से निपटने हेतू " स्त्रियों तथा कन्याओं का अनैतिक व्यापार अधिनियम 1956 " बनाया जो वेश्यावृत्ति को अनेतिक घोषित करता हैं.किन्त इन सब के बावजूद वेश्यावृत्ति लगातार बनी हुई हैं,इसके कई कारण हैं ::

 वेश्यावृत्ति के कारण 


 वैवाहिक जीवन में असफलता :::


कभी - कभी स्त्री या पुरूष का वैवाहिक जीवन इतना कष्टपूर्ण हो जाता हैं,कि दोनों मे से कोई एक प्रताड़ना से तंग आ जाता हैं,यह प्रताड़ना कई कारणों से होती हैं,जैसें शराब का सेवन ,जुए की लत,नपुसंकता, impotency मारपीट,बेमेल विवाह आदि.इनके फलस्वरूप दोनों शारीरिक सुख में चरम आनंद नही ढूंढ पाते फलस्वरूप पैसों से या बिना पैसों के अपनी हवस मिटानें हेतू अन्य लोगों से शारीरिक सम्पर्क स्थापित करतें हैं.



 भोगी जीवनशैली modern lifestyle :::



कई मध्यमवर्गीय परिवारों,गरीब परिवारों के स्त्री पुरूष  अपनी जीवनशैली को समाज के उच्च वर्गों के अनूकूल बनानें का प्रयास करतें हैं,इसी प्रयास में जब वे मेहनत से विलासिता का सामान नही जुटा पाते हैं,तो अपना शरीर बेचकर विलासिता का सामान बटोरनें का प्रयास करतें है.


# वंशानुगत इतिहास :::



कई परिवारों में वेश्यावृत्ति का वंशानुगत इतिहास पाया जाता हैं,जिसमें पारिवारिक सदस्य महिला को इस धंधें में लेकर आतें हैं,और वेश्यावृत्ति में प्रवेश करते समय उसे उत्सव के रूप में मनातें हैं.ऐसी अनेक जातियाँ मध्य,उत्तर,पश्चिमी भारत में पाई जाती हैं.

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वेश्यावृत्ति करवाने वाली परिस्थितियाँ :::



कभी कभी परिस्थितियाँ भी स्त्री पुरूष को वेश्यावृत्ति के लिये मज़बूर करती हैं.अपहरण कर बालिका को वेश्या बना दिया जाता हैं.

प्राचीन भारत में स्त्रीयों को देवदासी बनाकर मंदिरों में दान कर दिया जाता था और ऐसा करना पुण्य का काम समझा जाता था, इस धार्मिकता के पिछे स्त्री के शरीर का अत्यधिक शोषण किया जाता था.यह शोषण किसी एक व्यक्ति द्धारा न होकर सामूहिक रूप से किया जाता था.

बेरोजगारी एक अन्य परिस्थिति हैं,जो व्यक्ति को वेश्यावृत्ति के लिये मज़बूर करती हैं.

# मानसिक या जैविकीय कारण :::



ऐसा माना जाता हैं,कि वेश्यावृत्ति के पेशे में समाज के निम्न या मध्यम तबके के स्त्री पुरूष होतें हैं,किन्तु पिछलें समय के तमाम अध्ययनों से यह बात स्पष्ट होती हैं,कि इस पेशे में बहुत उच्च तबके के लोग भी सम्मिलित होते हैं,इसके पिछे आर्थिक कारक के बजाय जैवकीय या मानसिक कारक जिम्मेदार होतें हैं,जैसे नये की चाहत,जैविक संरचना आदि.



# वेश्यावृत्ति का आधुनिकीकरण :::



समय के साथ वेश्यावृत्ति ने आधुनिक रूप ग्रहण कर लिया हैं,अब यह व्यापार सोशल साईटों,जैसें फेसबुक,वाट्सअप,पर संचालित होता हैं,जहाँ से ग्राहकों की मांग अनुसार लड़कें लड़कियों की सप्लाई की जाती हैं,जिन्हें कालगर्ल या कालबाय कहा जाता हैं.वेश्यावृत्ति के इस रूप में रहनें वाले स्त्री पुरूष समाज में सभ्य लोगों के बीच रहकर अपना धंधा चलातें हैं.

वेश्यावृत्ति का एक अन्य रूप मसाज पार्लर ,स्पा,ब्यूटी सेलून की आड़ में पनप रहा हैं,यह भी समाज की नज़रो से बचकर जल्दी पैसा कमानें का आधुनिक तरीका हैं.

polycystic ovarian syndrome me bare me janiye


भारत में वेश्यावृत्ति कानून और वेश्यावृत्ति समाप्ति के लिए सरकारी प्रयास :::



भारत ने वेश्यावृत्ति को एक समस्या मानकर इसका समाधान करनें का प्रयास स्वतंत्रता के पश्चात ही कर दिया था,इसी क्रम में अनेतिक व्यापार निरोधक अधिनियम 1956 पारित किया गया किन्तु उक्त अधिनियम भी वेश्यावृत्ति को रोकनें में पूर्ण सफल नही हो पाया हैं.इसके कुछ प्रावधान निम्न हैं.

1.अनेतिक व्यापार निरोधक अधिनियम अधिनियम 1956 के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो वेश्यावृत्ति में संलग्न हैं,उसे 1 से 3 वर्ष की सजा और 2000 रूपये का अर्थदंड़ देकर दंड़ित किया जायेगा.

2.वेश्यावृत्ति करानें वालें व्यक्ति को भी दंड़ का भागी बनाकर उसे भी दो वर्ष का कारावास और आर्थिक दंड़ से दंड़ित करनें का प्रावधान हैं.
यदि वेश्यावृत्ति के दुष्परिणामों से हम जनता को जागरूक करें तो समस्या को जड़ से मिट़ाया जा सकता हैं,इसके लिये यह आवश्यक हैं,कि

1.समाज में  जनजागरूकता फैलायी जायें की वेश्यावृत्ति से एड्स,सिफलिस, जैसी लाईलाज बीमारी बहुत तेजी से फैलती हैं.

2.समाज में ऐसें गुणों को हतोत्साहित किया जायें जो एक पुरूष या स्त्री को वेश्यावृत्ति करनें हेतू प्रोत्साहित करते हो.

3.वेश्यावृत्ति करनें वालों के पुनर्वास की बेहतर व्यवस्था होनी चाहियें.

कोई भी बुराई बिना जनसमर्थन के ज्यादा दिनों तक नही टिक सकती वेश्यावृत्ति को समाप्त करनें के लियें भी समाज को ही आगे आकर इस बुराई को समाप्त करना होगा.जहाँ तक पुरूष वेश्यावृत्ति की बात हैं,यह भारत सहित पूर्वी देशों में कम ही हैं,किन्तु महिला वेश्यावृत्ति का घिनोना रूप दिन प्रतिदिन हमें देखनें को मिल रहा हैं,जो स्त्री के व्यक्तित्व के साथ परिवार ,समाज,और देश के व्यक्तित्व को विघटित कर रहा हैं.



16 अप्रैल 2017

सांप्रदायिक सद्भाव [communal harmony] भारत का मूल भाव

हिन्दू मुस्लिम एकता
 साम्प्रदायिक सदभाव
वैदिक काल से ही भारत अनेकानेक संस्कृतियों,धर्मों,और धर्मावलम्बीयों का जन्मस्थान और पालनकर्ता रहा हैं.

चाहे वह हिन्दू धर्म हो,सिक्ख हो,बोद्ध हो  जैन धर्म हो या इस्लाम धर्म हो.इन धर्मों ने साथ पल्लवित होकर पिछली कई शताब्दीयों से साम्प्रदायिक सद्भाव की नई मिशालें पेश की हैं

किन्तु यदि इस साम्प्रदायिक सद्भावना का विश्लेषण पिछली शताब्दी में अंग्रेजों के आगमन से करें तो पायेंगें कि साम्प्रदायिक सद्भावना में उल्लेखनीय कमी दर्ज हुई हैं और इसका परिणाम भारत धर्म के नाम पर विभाजन के रूप में झेल चुका हैं.

पाकिस्तान जैसे मुल्क का जन्म धर्म के नाम पर भारत से अलग होकर हुआ. यह साम्प्रदायिकता आज भी भारत में कायम हैं,और लगातार बढ़ती ही जा रही हैं.

NCRB [राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड़ ब्यूरों ] के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष औसतन 750 साम्प्रदायिक दंगे होतें हैं,जिनमें जान माल का नुकसान तो होता ही हैं,किन्तु उससे बढ़ा नुकसान भारत की सदियों पुरानी सामाजिक संरचना को होता हैं,जिसमें मोहब्बत और भाईचारें का स्थान नफ़रत और घृणा ले लेता हैं.

● 100 साल जीने के तरीक़े

● स्वस्थ सामाजिक जीवन के 3 पीलर

आईंये पड़ताल करतें हैं इन साम्प्रदायिक ताकतों के पनपनें की वज़हो की.

धार्मिक शिक्षण संस्थाएँ :::

महात्मा गांधी अन्य धर्मों के विचारों के सन्दर्भ में कहा करतें थे,कि अन्य धर्मग्रंथों का अध्ययन करना न केवल मानसिक दृष्टिकोण से बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से भी मनुष्य के लिये हितकारक होता हैं.

यदि वर्तमान सन्दर्भ में देखे तो यह कथन अत्यन्त प्रासंगिक लगता हैं.हमारें देश में प्रत्येक धर्म की संस्थाएँ बच्चों को अपनें कुछ विशेष धर्मग्रंथो की शिक्षा देनें का कार्य कर रही हैं.

यह विशेष धर्मग्रंथों की शिक्षा भी पूरी तरह से न देकर ऐसे प्रसंगों तक सीमित कर दी जाती हैं,जिसमें कट्टरता ही सर्वव्यापक हो अर्थात अपनी संस्कृति श्रेष्ठ दूसरों की हीन जरा सोचिये इस तरह की शिक्षा ग्रहण करनें वाला बालक बड़ा होकर धर्मांध नही बनेगा तो क्या बनेगा ?

जब बालक को सभी धर्मग्रंथों की शिक्षा देनें की बात आती हैं,तो तथाकथित धर्म के ठेकेदारों के विरोध की वज़ह से सरकारें ऐसे फैसलें लेनें  से पिछे हट जाती हैं .

स्वामी विवेकानंद ने धार्मिक शिक्षा के दृष्टिकोण से एक बात कही थी कि भारत का भावी धर्म वह होगा जिसमें वेदान्त का मन और इस्लाम का शरीर एकाकार होंगें.

# धर्मग्रंथों के अच्छे गुण पिछे कर दिये गये :

गुरूग्रंथ साहिब में लिखा हैं,कि " सच्चाई,संतोष और प्रेम का व्यहवार करें,सतनाम का सिमरन करें,अपने मन से पाप का विचार निकाल दें तब सच्च साहेब वाहेगुरू उनको सत्य का उपहार देगा"
कितनें उत्कृष्ट विचार हैं .

लगभग यही विचार अन्य धर्मग्रंथों और महापुरूषों के हैं.किंतु इन विचारों को तिरष्कृत करके उन विचारों को समझाया जानें लगा जिसमें दूसरें के धर्म को हीन और अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ कहा गया हो.


वैदिक ग्रंथों में लिखा हैं," आनों भद्रा : कृतवो यन्तु विश्वत:" अर्थात सभी ओर से सुंदर विचार आकर मन को संपुष्ट करें.


एक अन्य जगह लिखा हैं कि "संगच्छध्व संवदध्वंसं वो मनांसि जानताम्" अर्थात समाज में सभी समरसता के साथ आगे बढ़ें और साथ - साथ रहें.


इन्ही विचारों के दम पर दो हजार वर्षों से ईसाइ,बारह सौ वर्षों से पारसी और  पच्चीस सौ वर्षों से इस्लाम धर्म भारत में संपुष्ट होता रहा जबकि शक,हूण,किरात और मुस्लिम जैसें आक्रान्ताओं ने अपनी संस्कृति और धर्म एक दूसरें पर जबर्दस्ती थोपना चाहा.

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं.सामाजिकता उसे पूर्ण बनाती हैं,और समाज में रहकर दूसरों के प्रति सद्भावना उसे सम्पूर्ण बनाती हैं.

मात्र आचार - विचार,उपासना पद्धति, के आधार पर मनुष्यता में विभेद करना कोरी मूर्खता के सिवाय कुछ नही हैं.

इस सन्दर्भ में बाबर का उद्धरण देना चाहूंगा जो उसनें अपनी भूलों से सीखकर अपनें पुत्र हूमाँयू के वसियत नामें लिखा था, "हिन्दुस्तान में अनेकोनेक धर्म के लोग रहते हैं,भगवान को धन्यवाद दो कि तुम इस देश के बादशाह हो ,तुम निष्पक्ष होकर काम करना,जिस गाय को हिन्दू पूजनीय मानते हैं,उसका वध नही करवाना तथा किसी भी धर्म के पूजास्थल को नष्ट मत करवाना''

आज के वैश्वीकरण के दोर में जहाँ विश्व एकीकृत हो रहा हैं,एक दूसरें पर निर्भरता बढ़ती जा रही हैं,वहाँ भी धार्मिक दृष्टिकोण से मनुष्य अपने आप को बंद व्यवस्था में सीमित कर रहा हैं.

इसका मूल कारण अपने धर्मों को  दूसरें धर्म के प्रभाव से बचाना रहा हैं.यह बंद व्यवस्था तब तक नही खुल सकती जब तक की समाजीकरण की संस्थाएँ बच्चों को सिर्फ एक धर्म की शिक्षा में शिक्षित करती रहेगी.

इस प्रकार की व्यवस्था से समुदायों के बीच अविश्वास पनपता हैं,जो कालान्तर में साम्प्रदायिकता में परिवर्तित हो जाता हैं.
यदि समस्या का समाधान करना हैं,तो हमें भारत की प्राचीन परंपरा को पुन: सामाजिक जीवन में शामिल करना ही होगा जिसमें कहा गया हैं,कि
  " समानो मंत्र: समिती : समानी समानं मन: सह चित्तमेषाम् समानम् मंत्रमभिमंत्रवे व: समानेन वो हविषा जुहामि"
अर्थात हमारा मन ह्रदय एक हो,हम लोग सह अस्तित्व के साथ सबका कल्याण करतें रहे .




13 अप्रैल 2017

(Rota virus) रोटावायरस टीकाकरण के बारें में लगातार पूछे जानें वाले प्रश्न

प्रश्न १. रोटावायरस (Rota virus) क्या हैं ?



उत्तर = रोटावायरस अत्यधिक संक्रामक प्रकार का विषाणु होता हैं.यह बच्चों को प्रभावित कर उनकों अपनी चपेट में ले लेता हैं,फलस्वरूप बच्चों में दस्त शुरू हो जातें हैं.
रोटावायरस
                        रोटावायरस (Rota virus)


प्रश्न २.रोटावायरस प्रभावित बच्चें में दस्त के क्या लक्षण होतें हैं ?


उत्तर = शुरूआत में हल्के दस्त होतें  हैं,जो धिरें - धिरें गंभीर रूप धारण कर लेते हैं.फलस्वरूप बच्चें के शरीर में नमक और पानी की कमी हो जाती हैं.उचित इलाज नहीं मिलनें पर बच्चें की मृत्यु हो सकती हैं.


प्रश्न ३. क्या रोटावायरस दस्त गंभीर रूप धारण कर सकता हैं ?


उत्तर = भारत में दस्त के कारण अस्पताल में भर्ती होनें वालें 40% बच्चें रोटावायरस से संक्रमित होतें हैं.यही कारण हैं,कि 8,72000 बच्चें जो कि अस्पताल में भर्ती होतें हैं उनमें से प्रतिवर्ष लगभग 78000 बच्चों की मृत्यु हो जाती हैं.


प्रश्न ४. रोटावायरस दस्त होनें का खतरा किन बच्चों को रहता हैं ?


उत्तर = रोटावायरस दस्त से संक्रमित होनें का खतरा 0 से 1 वर्ष के बच्चों को अधिक होता हैं.यदि बच्चा कुपोषित हैं,और रोटावायरस से संक्रमित हैं,तो मृत्यु की संभावना बढ़ जाती हैं.


प्रश्न ५.रोटावायरस कैसे फेलता हैं ?



उत्तर = रोटावायरस प्रभावित बच्चें के स्वस्थ बच्चें के सम्पर्क में आनें से.
दूषित पानी,दूषित खानें एंव गन्दे हाथों के सम्पर्क में आनें से.
यह वायरस कई घंटो तक हाथों और खुली जगहों पर जीवित रह सकता हैं.


प्रश्न ६.रोटावायरस दस्त किस मोंसम में अधिक होता हैं ?


उत्तर = रोटावायरस संक्रमण और दस्त पूरें साल में कभी भी हो सकता हैं,किन्तु सदियों में इसका खतरा अधिक होता हैं.


प्रश्न ७. रोटावायरस दस्त की पहचान कैसे होती हैं ?


उत्तर = लक्षणों द्धारा रोटावायरस दस्त की पहचान संभव नही हैं,केवल मल का लेबोरेटरी परीक्षण ही बीमारी का पता लगा सकता हैं.


प्रश्न ८. रोटावायरस दस्त का उपचार क्या हैं ?


उत्तर = रोटावायरस दस्त की अन्य दस्तों की भांति लाक्षणिक चिकित्सा ही की जाती हैं.जैसे जिंक की गोली 14 दिनों तक खिलाना,ओ.आर.एस का सेवन करवाना आदि.
दस्त की गंभीरता को देखते हुये बच्चें को अस्पताल में भी भर्ती करना पड़ सकता हैं.


प्रश्न ९.एक बार रोटावायरस दस्त होनें के बाद क्या ये बच्चें को दूसरी बार भी हो सकता हैं ?


उत्तर = हाँ,रोटावायरस बच्चें को बार - बार हानि पहुँचा सकता हैं.हालांकि दुबारा होनें वालें दस्त ज्यादा खतरनाक नही होतें हैं.

प्रश्न १०.रोटावायरस दस्त होनें से केंसें बचें ?


उत्तर = रोटावायरस टीकाकरण रोटावायरस दस्त के विरूद्ध एकमात्र सटीक विकल्प हैं.
अन्य कारणों से होनें वालें दस्त की रोकथाम स्वच्छता रखने से,बार - बार हाथ धोनें से ,साफ पानी पीनें से,साफ और ताजा खानें से,बच्चों को भरपूर स्तनपान करवानें से,तथा विटामिन ए युक्त पूरक आहार देने से की जा सकती हैं.


प्रश्न ११.क्या रोटावायरस वैक्सीन सभी तरह के दस्त की रोकथाम करता हैं ?


उत्तर = नहीं, रोटावायरस वैक्सीन सिर्फ उस दस्त की रोकथाम करनें में सक्षम जो रोटावायरस से हुआ हैं.जो कि बच्चों में दस्त का बड़ा कारण हैं.रोटावायरस वैक्सीन लगने के बाद भी बच्चों को अन्य कारणों से दस्त हो सकते हैं,जिनमें जीवाणुजनित कारण प्रमुख हैं.


प्रश्न १२.रोटावायरस वैक्सीन किस प्रकार दी जाती हैं ?


उत्तर = रोटावायरस वैक्सीन की खुराक पाँच बूँद मुँह द्धारा बच्चों को पीलाई जाती हैं.यह वैक्सीन छह,दस,और चौदह सप्ताह के अंतराल से बच्चों को दी जाती हैं.

टीकाकरण
 रोटावायरस टीकाकरण का दृश्य

प्रश्न १३. क्या रोटावायरस की बूस्टर खुराक की ज़रूरत बच्चों को होती हैं ?


उत्तर = बूस्टर खुराक की ज़रूरत नहीं होती हैं,केवल 6,10,14 सप्ताह की खुराक ही पर्याप्त हैं.


प्रश्न १४.रोटावायरस और पोलियों वैक्सीन में क्या अंतर हैं ?


उत्तर = १.दोंनों ही वैक्सीन का रंग गुलाबी से लगाकर हल्का पीला या नारंगी हो सकता हैं.

२.रोटावायरस की पाँच बूँदें बच्चों को पीलायी जाती हैं,जबकि पोलियो की दो बूँदें पीलाई जाती हैं.

३.रोटावायरस की तीन खुराक 6,10,14 सप्ताह में बच्चों को पीलायी जाती हैं,जबकि पोलियो की खराक खुराक जन्म से लेकर पाँच वर्ष के बच्चों को बार - बार पीलायी जा सकती हैं.


प्रश्न १५.रोटावायरस वैक्सीन पीलानें के बाद क्या स्तनपान कराया जा सकता हैं ?


उत्तर = जी हाँ,न केवल बाद में बल्कि पीलानें के पहले भी स्तनपान कराया जा सकता हैं.

प्रश्न १६.रोटावायरस वैक्सीन किन्हें नहीं दी जाना चाहियें ?
उत्तर = 1.यदि बच्चें की उम्र 6 सप्ताह से कम हो.

           2.गंभीर रूप से किसी बीमारी से पीड़ित हो.

           3.यदि बच्चें को रोटावायरस से एलर्जी हो

           4.यदि पहले से रोटावायरस पीलाया जा चुका हो.


प्रश्न १७.पहली रोटावायरस वैक्सीन की खुराक देनें की अधिकतम उम्र क्या हैं ?

उत्तर = पहली रोटावायरस वैक्सीन देनें की अधिकतम उम्र एक वर्ष हैं.यदि एक वर्ष तक के बच्चें को रोटावायरस टीके की पहली खुराक मिल गई हो तो बाकि दो खुराक दी जा सकती हैं.दो खुराक के बीच चार सप्ताह का अंतराल रखना आवश्यक हैं.


प्रश्न १८.जिन बच्चों को पेंटावेलेट और ओरल पोलियो वैक्सीन की दूसरी खुराक दी जा चुकी हो क्या उन्हें रोटावायरस की पहली खुराक दी जा सकती हैं ?


उत्तर = नही, रोटावायरस की खुराक उन बच्चों को नही दी जाना चाहियें जिनकों पहलें पेंटावेलेट और ओरल पोलियो वैक्सीन दो बार दी जा चुकी हैं.
रोटावायरस की पहली खुराक सिर्फ पहली बार  पेंटावेलेट और  opv के साथ दी जाना चाहियें.


प्रश्न १९.क्या रोटावायरस टीकाकरण समय से पूर्व जन्म लेने वाले बच्चों को दिया जा सकता हैं ?


उत्तर = रोटावायरस टीकाकरण बच्चों की उम्र के अनुसार किया जाना चाहियें जिसका हिसाब उसके जन्म समयानुसार होना चाहियें,न कि उसकी गर्भ की उम्रानुसार.

प्रश्न २०.क्या रोटावायरस वैक्सीन के कोई दुष्प्रभाव हैं ?


उत्तर = रोटावायरस वैक्सीन एक सुरक्षित वैक्सीन हैं.इसके कुछ सामान्य लक्षण उभर सकतें हैं,जैसें उल्टी,दस्त,खाँसी,नाक बहना,बुखार,चिड़चिड़ापन और शरीर पर दानें निकलना.


रोटावायरस वैक्सीन देनें के बाद एक दुर्लभ शिकायत जिसे इंटससेप्सन (आंत का मुढ़ जाना) के नाम से जाना जाता हैं,के बारें में बताया गया हैं.इससे ग्रसित बच्चों में अत्यधिक पेट दर्द और बार - बार उल्टी के साथ मल में खून की शिकायत हो सकती हैं.इन लक्षणों के दिखते ही तुरन्त बच्चें को अस्पताल में भर्ती करवा देना चाहियें.


प्रश्न २१.क्या होगा यदि बच्चा रोटावायरस की खुराक मुँह से बाहर निकाल दे या फिर उल्टी कर दें ?


उत्तर = यदि बच्चा खुराक निकाल दें तो बच्चें को नई खुराक तुरंत उसी वक्त दें.

प्रश्न २२.रोटावायरस वैक्सीन का भंड़ारण कैसें करें ?


उत्तर = रोटावायरस वैक्सीन को - 20 डिग्री से + 8 डिग्री तापमान तक संग्रहित कर रखा जा सकता हैं.वैक्सीन का इस्तेमाल करनें से पूर्व इसे पिघला लेना चाहियें.



० पंचनिम्ब चूर्ण


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