26 अग॰ 2020

वायरस क्या होता हैं । वायरस और बैक्टीरिया में अंतर what is virus in hindi difference between virus and bacteria


वायरस क्या होता हैं virus kya hota hai

वायरस virus अतिसूक्ष्म अकोशिकीय संरचना होती हैं ,जो नाभिकीय अम्ल Nucleus acid RNA या DNA और प्रोटीन से बना होता हैं । वायरस साधारण आंखों से नहीं दिखाई देते  हैं इन्हें देखने के लिए विशेष इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता होती हैं । वायरस को सफेद बारीक क्रिस्टल के रूप में संग्रहित किया जा सकता हैं ।

अब तक 6 हजार से ज्यादा विभिन्न प्रकार के वायरसों का पता वैज्ञानिकों द्वारा लगाया जा चुका है ।

वैज्ञानिकों के मुताबिक वायरस एक बीज की तरह से व्यहवार करते हैं जैसे एक बीज पानी, सूर्य प्रकाश और मिट्टी का सहयोग पाकर पौधा बनता हैं उसी प्रकार वायरस निर्जीव बनकर बहुत समय तक पड़े रहते हैं ।
वायरस जब जीवित कोशिका के संपर्क में में आते हैं तो कोशिका भेदकर उसके अंदर प्रवेश कर जाते हैं और कोशिका की RNA या DNA और जेनेटिक संरचना को परिवर्तित कर अपनी जेनेटिक संरचना उस कोशिका में प्रतिस्थापित कर देता हैं और अपने जैसी कोशिकाओं का उत्पादन शुरू कर देता हैं ।

वायरस की खोज कब हुई थी virus ki khoj kab hui thi


वायरस की  खोज virus ki khoj का श्रेय एडवर्ड जेनर को जाता हैं जिन्होंने सन 1796 में यह बताया कि चेचक रोग वायरस से होता हैं इसी क्रम में उन्होंने चेचक के टीके की खोज की ।

एडवर्ड जेनर के बाद सन 1886 में मोजेक और 1892 में रसियन जीव विज्ञानी दिमित्री इवानोवास्की ने बताया कि तम्बाकू में मोजेक रोग का कारण वायरस होता हैं । 

० पोलियो क्या होता हैं ?


इवानोवास्की के बाद भी अनेक वैज्ञानिकों ने वायरस का अध्ययन किया और अलग अलग वायरसों की खोज की ।

वायरस कितने प्रकार के होते हैं virus kitne prakar ke hote hai


1.जन्तु वायरस ANIMAL VIRUS


जो वायरस पशुओं की कोशिकाओं को संक्रमित करते हैं और इन पशुओं के माध्यम से उन वायरसों को जन्तु वायरस कहते हैं । जन्तु वायरस में न्यूक्लिक एसिड़ DNA और कभी कभी RNA भी पाया जाता हैं । जैसे रेबीज वायरस, पोलियो वायरस,इन्फ्लुएंजा,मम्स, कोरोनावायरस, निमोनिया,एशियन इन्फ्लुएंजा,स्वाइन फ्लू, मेनिनजाइटिस,बर्ड फ्लू,खुरपका मुंहपका आदि ।

2.पादप वायरस PLANT VIRUS

जो वायरस पौधों की कोशिका को संक्रमित करते हैं उन्हें पादप वायरस कहते हैं। जैसे तम्बाकू का मोजेक वायरस,पोटेटो वायरस, टमाटर का पीली पत्ती वायरस आदि ।

पादप वायरस में न्यूक्लिक एसिड RNA होता हैं ।


3.जीवाणुभोजी वायरस Bacteriaphage

जो वायरस बैक्टेरिया की कोशिका को नुकसान पंहुचाते हैं उन्हें जीवाणुभोजी या Bataria phage कहते हैं । इनमें न्यूक्लिक एसिड RNA पाया जाता हैं जैसे T - phage वायरस,mv-11 


4.इंसेक्ट वायरस insect virus

जो वायरस कीट पतंगों में प्रवेश कर उन्हें बीमार करके नष्ट कर देते हैं। 



इन वायरसों का खेती में प्रयोग कर बेहतरीन बायो पेस्टीसाइड बनाये जातें हैं । उदाहरण एस्कोवायरस और एंटोमोपाक्स वायरस


वायरस की संरचना Structure of virus

वायरस की संरचना
 वायरस की संरचना


वायरस के आसपास के सुरक्षात्मक आवरण को केप्सीड़ कहते हैं। यह केप्सीड़ प्रोटीन से बनी संरचना होती हैं । जो कि सरल से लेकर जटिल होते हैं । केप्सीड़ वायरस के जीनोम की बाहरी वातावरण से सुरक्षा करता है और केप्सीड़ के द्वारा ही कोशिका में आनुवांशिक पदार्थों का स्थानांतरण होता हैं । कभी कभी केप्सीड़ में फास्फोलिपिड़ के envelope भी पाये जातें हैं जो ग्रहणकर्ता कोशिका की झिल्ली को संक्रमित करते हैं ।

वायरस से संक्रमण कैसे फैलता है virus se sankraman kese felta hai

वायरस अपने स्वयं के दम पर जीवित नहीं रह सकते वह संक्रमित करने वाली कोशिका में आड़े या खड़े घुसकर अपनी प्रतिलिपि बनाते हैं । 

आईये जानतें हैं वायरस कैसे फैलता है 


सीधे भौतिक संपर्क से 

यदि वायरस संक्रमित व्यक्ति किसी साधारण व्यक्ति से यौन संसर्ग करता हैं,चूमता है,हाथ मिलाता है तो साधारण आदमी भी वायरस से संक्रमित हो जाता हैं ।

संक्रमित वस्तु के संपर्क द्वारा

संक्रमित व्यक्ति के संपर्क जो वस्तु आती हैं उसे वह संक्रमित कर देता हैं यदि साधारण व्यक्ति इन संक्रमित वस्तु के संपर्क में आएगा तो वह भी संक्रमित हो जायेगा इस तरह के संक्रमण को अप्रत्यक्ष संक्रमण कहते हैं।

हवा द्वारा संक्रमण airborne spreading


यदि वायरस संक्रमित व्यक्ति छिंकता, खांसता या सांस लेता है तो वायरस के सूक्ष्म कण Droplets हवा के माध्यम से स्वस्थ व्यक्ति के श्वसन तंत्र में प्रवेश कर जाते हैं और इस तरह स्वस्थ व्यक्ति संक्रमित हो जाता हैं ।

वायरस का आकार कितना होता हैं 


वायरस अतिसूक्ष्म आकार का परजैविक होता हैं जिसका आकार 0.02 lu m से 0.3 lu m तक होता हैं । कुछ वायरस 1lu m आकार के भी होते हैं ।


वायरस के सिंगल या डबल स्ट्रैंड से क्या तात्पर्य है

वायरस को उसकी बीमार करने की क्षमता के आधार पर नहीं इस आधार पर पहचाना जाता हैं कि वायरस में मौजूद न्यूक्लिक एसिड सिंगल स्ट्रैंड है या डबल स्ट्रैंड है । 


वायरस से होने वाले रोग


खसरा रोग 

खसरा पैरा मिक्सो वायरस के कारण होता हैं । जिससे खुजली चलती है ।


येलो फीवर

येलो फीवर yellow fever का कारक आरबो वायरस arbo virus हैं जो मच्छरों के काटने से फैलता है । 

इंन्फुलुएंजा 

इंन्फुलुएंजा Influenza आर्थोमेक्स वायरस के द्वारा फैलता है । इससे श्वसन तंत्र में संक्रमण हो जाता हैं और सर्दी, खांसी और श्वास लेने में परेशानी हो जाती हैं ।

कोविड़ 19

कोविड़ 19 नोवल कोरोनावायरस से फैलता हैं । इस बीमारी में भी सर्दी खांसी , बुखार और श्वास लेने में परेशानी होती हैं ।


एड्स 

एड्स का कारक वायरस HIV human immunodeficiencie virus होता हैं ।

इसके अलावा हर्पीज,सार्स,एशियन इन्फ्लुएंजा,रैबीज, पोलियो, निमोनिया,स्वाइन फ्लू मेनिनजाइटिस आदि का कारण वायरस ही है ।


वायरस से पौधों में होने वाले नुकसान 

विषाणु से फसल बहुत बुरी तरह प्रभावित होकर नष्ट हो जाती हैं और किसानों को बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता हैं । वायरस से पौधों में होने वाले रोग है । तम्बाकू का मोजेक वायरस रोग,केले का बंटी टाप आफ बनाना,पोटेटो मोजेक वायरस आदि ।

वायरस का वर्गीकरण

वायरस को उसकी जेनेटिक संरचना और उसमें मोजूद जेनेटिकल पदार्थों के आधार पर अनेक भागों में बांटा गया है जैसे DNA वायरस 

सिंगल स्ट्रैंड वायरस जैसे पिकोर्नवायरस,पैरा वायरस

डबल स्ट्रैंड वायरस एडिनो वायरस,हर्पीज वायरस


RNA वायरस

सिंगल स्ट्रैंड वायरस - जिस वायरस की जेनेटिक संरचना में RNA पाज़ीटिव और नेगेटिव होता हैं उदाहरण पोलियो वायरस, हेपिटाइटिस- A,रैबीज वायरस, इन्फ्लुएंजा वायरस 


डबल स्ट्रैंड वायरस - रिओ वायरस


बैक्टीरिया क्या हैं Bacteria kya hai

बैक्टीरिया एक कोशिकीय, अत्यंत सूक्ष्म,अकेन्द्रकीय, कोशिका भित्ति जीव होतें हैं । बैक्टीरिया को प्रोकेरियोट्स में वर्गीकृत किया गया है ।

बैक्टीरिया हमारे शरीर के अंदर बाहर ,जल, जमीन प्रत्येक जगह विधमान रहते हैं । लगभग 40 करोड़ वर्ष पूर्व मनुष्य के पूर्वज एक कोशिकीय बैक्टेरिया थे जो बाद में में विकसित होकर जटिल मानव,जंतु और पादप में परिवर्तित हो गये ।

बैक्टीरिया सर्पिलाकार (स्पिरीला),गोल (कोकस) चपटे (बेसिस),जड़ के आकार के होते हैं ।


बैक्टीरिया की खोज किसने की थी ?

बैक्टीरिया की खोज का श्रेय डच वैज्ञानिक एंटनी वान ल्यूवोनहाक को जाता हैं जिन्होंने सन 1676 ई.में सूक्ष्मदर्शी से इन बैक्टैरिया को देखा ।

बैक्टीरिया की संरचना 



जीवाणु
 बैक्टीरिया


कोशिका भित्ति cellwall - जीवाणु कोशिका के चारों ओर कोशिका भित्ति पाई जाती हैं । जिसमें कोशिका का जीवद्रव्य, संचित भोजन और आनुवांशिक पदार्थ उपस्थित होते हैं ।

कोशिका भित्ति बैक्टीरिया के लिए सुरक्षा दीवार की तरह होती हैं जो जीवाणु को फटने से बचाती हैं ।

प्लाज्मा झिल्ली - प्लाज्मा झिल्ली अर्द्ध पारगम्य झिल्ली होती हैं।यह कोशिका के जीव द्रव्य को बाह्य वातावरण में प्रवेश कराती हैं और बाह्य वातावरण से द्रव्य अंदर कराती हैं ।

मीजोसोम - मीजोसोम माइट्रोकान्ड्रिया के समान होती हैं जिसका मुख्य कार्य कोशिका भित्ति का निर्माण करना, डीएनए की प्रतिकृति बनाना,श्वसन में सहायता प्रदान करना,स्त्रावी प्रक्रिया में सहायता प्रदान करना, एंजाइम की मात्रा बढ़ाना ।

राइबोसोम - राइबोसोम संदेश वाहक RNA से मिलकर प्रोटीन निमार्ण में भाग लेते हैं ।


बैक्टीरिया से होने वाले फायदे 

बैक्टीरिया हमेशा नुकसान नहीं पहुंचाते बल्कि कुछ बैक्टीरिया मनुष्य के लिए बहुत उपयोगी होते हैं जैसे आंतों में उपस्थित कुछ बैक्टीरिया भोजन पचाने में मदद करते हैं । इसी प्रकार राइजोबियम नामक बैक्टीरिया फसलों में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर फसल को बढ़ाने में मदद करता है ।

बैक्टीरिया से होने वाले रोग 

मेनिनजाइटिस - 

1.स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी

2.नेसेरिया मेनिनजाइटिस

3.हिमोफिलस इन्फ्लुएंजा

4.स्ट्रेप्टोकोकस अगलाम्टी

5.लिस्टिरिया सोनोसाइटोजीन 


ओटाइटिस मिडिया -


1.स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी

न्यूमोनिया -


1.स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी

2.हिमोफिलस इंन्फुलुएंजा

3.माइकोप्लाज्मा न्यूमोनी

4.चलमायिडियन न्यूमोनिया

5.लेजियोनिला न्यूमोफिला


ट्यूबरक्लोसिस - 

1.माइकोबैक्टेरियम  ट्यूबरक्लोसिस 

त्वचा का संक्रमण -

1.स्टेफिलोकोकस एलियंस

2.स्ट्रेप्टोकोकस पायोजिनस

3.स्यूडोमोनास एरूजिनोसा


आंखों का संक्रमण - 

1.स्ट्रेफिलोकोकस एरूएस 

2.नेसेरिया गोनोरिया

3.चलमाइडिया ट्रेकोमटिस


साइनाइटिस -

1.स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी

2.हिमोफिलस इंन्फुलुएंजा


Upper respiratory tract infection


1.स्ट्रेप्टोकोकस पायोजिनस

2.हेमोफिलस इन्फ्लुएंजा

गैस्ट्रोटाइटिस 

1.हेलोबेक्टर पायलोरी

फूड़ पायजनिंग -

1.केम्फलोबैक्टर जेजूनी

2.सालमोनेला

3.सिगेला
4.क्लोस्ट्रोडिम 

5.स्टेफाइलोकोकस एरेस

6.इस्चिरिया कोलाई

7.स्ट्रेप्टोकोकस सेपरोफाइटिकस

8.स्यूडोमोनास एरूजिनोसा


Urinary tract infection-


1.इस्चिरिया कोलाई 

2.स्ट्रेप्टोकोकस सेपरोफाइटिकस

3.स्यूडोमोनास एरूजिनोसा

Sexual transmited disease

1.चेलेमाइडिया ट्रैकोमेटिस

2.नेसेरिया गोनोरिया

3.ट्रेपोनिया पेलिडम 

4.यूरेप्लाजा यूरेलेक्टिकम

5.हैमोफिलस ड्यूकरेई

वायरस और बैक्टीरिया में अंतर -

1.वायरस अकोशिकीय होते हैं जबकि बैक्टीरिया एक कोशिकीय होते हैं ।

2.वायरस वर्षों तक सुषुप्तावस्था में पढ़ें रहते हैं जबकि बैक्टीरिया मे यह प्रकृति नहीं पाई जाती हैं ।

3.बैक्टैरिया वायरस के मुकाबले आकार में बढ़े होते हैं ।

ग्राम पाज़िटिव और ग्राम नेगेटिव बैक्टीरिया -

ग्राम पाज़िटिव बैक्टीरिया में एक प्रकार के पालीमर  पेप्टिडोग्लाइकन की मोटी परत पाई जाती हैं जबकि ग्राम नेगेटिव प्रकार के बैक्टीरिया में पेप्टिडोग्लाइकन की पतली परत पाई जाती हैं ।


कान्वलेसेंट प्लाज्मा थैरेपी






7 अग॰ 2020

बांस के औषधीय गुण

बांस के औषधीय गुण benifits of bamboo in Hindi




Benifits of bamboo in hindi
 बांस के औषधीय गुण



बांस का परिचय 


बांस सम्पूर्ण भारतवर्ष में पाया जानें वाला पेड़ हैं । बांस का पेड़ bansh ka ped  पहाड़ों की तलहटी और घने जंगल में बहुतायत में उगता है। बांस के पेड़ एकदम सीधे  लम्बे और झाड़ीदार होते हैं। बांस के पेड़ की लम्बाई 40 से 50 फ़ीट तक हो जाती हैं । 


एक बांस की झाड़ी bansh ki jhadi में सौ दौ सौ तक बांस होते हैं । बांस जहां उगता है उसके आसपास की जमीन से खतरनाक और जहरीले तत्वों को खींच लेता है और जमीन को विषैले तत्वों से मुक्त कर देता है ।


बांस के पेड़ पर दो से ढाई फीट के अंतर से ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌ पंगेर फूटती हैं । यह पंगेर वर्षा ऋतु में जब बादल गरजतें है तब फूटती हैं । बांस के पेड़ bansh ke ped पर पत्ते बहुत कम होते हैं।

० गेंदा फूल के औषधीय गुण


बांस की दो जातियां होती हैं  एक नर और दूसरी मादा नर बांस अंदर से ठोस होते हैं जबकि मादा बांस अंदर से खोखले होते हैं । आयुर्वेद में जिस बांस का औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता हैं उसे पीत बांस, पीला बांस या



स्वर्ण बांस कहते हैं bambusa vulgaris scharad 


बांस में प्रचुर मात्रा में विटामिन, प्रोटीन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट पाये जातें हैं जिससे यह औषधि के साथ अचार,सब्जी, और मुरब्बे के रूप में बहुतायत में खाया जाता हैं ।


बांस के बर्तनों में खाना बनाया और खाया जाता हैं ।


बांस के पेड़ों की उम्र 60 से 90 वर्ष तक होती हैं और बांस के जीवन के उत्तरार्ध में फूल और फल आते हैं । ऐसा कहा जाता हैं कि बांस में फूल लगना मानव के लिए तबाही का मंजर लाता है क्योंकि बांस में लगने वाले फल और फूल चूहों को बहुत प्रिय होते हैं फलस्वरूप बांस में फलन के समय बांस के आसपास चूहे बहुतायत में निवास करने लग जाते हैं , और बांस के फल और फूल bansh ke fal aur ful खाकर  अपनी आबादी तेजी से बढ़ाते हैं । 


चूहों की यह बड़ी हुई आबादी आसपास की फसल और पेड़ पौधों को नुकसान पहुंचाती हैं फलस्वरूप भूखमरी की समस्या पैदा हो जाती हैं ।

बांस का संस्कृत नाम


बांस को संस्कृत में बहुपल्लव,वृहतृण,कंटकी,वंश,और यवफला कहते हैं ।

बांस का हिंदी नाम


बांस,

कांटाबास,


मलबास


बांस का english name



Throny bamboo


Spiny bamboo


बांस का लैटिन नाम 


Bambusoideae बेम्बूसोआईडियाई 


बैब्यूसा अरंडिनेसी (Bambusa arundinacea) इस प्रजाति के बांस का वर्णन भारतीय औषधि ग्रन्थों में किया गया है ।



बांस की प्रकृति 



बांस प्रकृति में शीतल, कड़वे,रुक्ष,कसेले और पित्त का शमन करने वाले होते हैं ।


Bansh ke oshdhiy gun बांस के पोधे के फायदे,बांस के औषधीय गुण benifits of bamboo in Hindi


स्त्री रोगों में बांस


बांस स्त्री रोगों की जनप्रिय औषधि हैं । प्रसव को सुरक्षित और दर्दरहित बनाने के लिए बांस के पत्तों का काढ़ा बनाकर गर्भवती स्त्री को पिलाया जाता हैं यह क्वाथ गर्भाशय को संकुचित करता हैं जिससे शिशु आसानी से बाहर आ जाता हैं ।

मासिक धर्म साफ़ नहीं हो रहा हो तो बांस के नरम तने या पत्तों  का क्वाथ बनाकर पीने से मासिक धर्म खुलकर आता हैं ।

मधुमेह में बांस 



मधुमेह में बांस के पत्तों और तने का क्वाथ पीने से मधुमेह नियंत्रित रहता है । 

बांस से बने पात्र में रखा जल शरीर की रक्त शर्करा को नियंत्रित करता हैं । रात को जल बांस पात्र में भरकर सुबह खाली पेट पीना चाहिए ।



शरीर के किसी भाग में सूजन होना


बांस के तने bansh ke tane पर लगने वाले अंकुरो को पीसकर सूजन वाली जगह पर बांधने से सूजन मिट जाती हैं । यदि सूजन शरीर के आंतरिक भाग में हो तो इसका क्वाथ बनाकर पीना चाहिए ।


हड्डी टूटने पर बांस के पोधे के फायदे


प्राचीन काल से ही भारत में बांस का प्रयोग टूटी हड्डी को जोड़ने bansh ka prayog tuti haddi jodne ke liye के लिए हो रहा है । आज भी आदिवासी टूटी हड्डी को जोड़ने के लिए बांस का प्रयोग कुशलता से कर रहे हैं । 

बांस की सूखी किमची टूटे हुए अंग के आसपास रस्सी की सहायता से इस प्रकार बांधी जाती हैं कि प्रभावित अंग की हड्डी बिना हिले डुले जुड़ जाती हैं ।

शरीर की गर्मी बढ़ने पर बांस


बांस पर जो चावल समान फल आते हैं उन्हें बांस के चावल कहते हैं। ये बांस के चावल शीतल प्रकृति के होते हैं। इनको खाने से शरीर की गर्मी उतर जाती हैं ।

गंजेपन की चिकित्सा 


बांस की जड़ और बांस की छाल जलाकर इसकी राख नारियल तेल में मिलाकर गंजे सिर में लगाने से गंजापन समाप्त हो जाता हैं ।

दांत दर्द होनें पर बांस का प्रयोग 


बांस की पतली टहनी को आगे से कुचलकर कूचेदार बना लें इस कूचेदार टहनी से दातुन करने से दांतों का दर्द नहीं होता हैं । और दांत दर्द होनें पर दर्द बंद हो जाता हैं ।


त्वचा रोगों में बांस


बांस के पत्तों को जलाकर सरसों तेल के साथ खुजली वाली त्वचा पर लगाने से खुजली मिटती है । 


घाव होने पर बांस को उबालकर इसका पानी घाव पर गरम गरम डालने से घाव जल्दी भर जाता हैं ।

मुंह के छालों पर बांस का प्रयोग


बांस के तने का मुरब्बा बनाकर खाने से लम्बे समय से ठीक नहीं हो रहें मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं ।

पेट के छालों पर बांस


बांस के पत्तों का रस बनाकर सुबह शाम एक एक चम्मच लेने से पेट के छालों में आराम मिलता हैं ।


बांस की जड़ जलाकर इसकी राख को पेट के आसपास पानी मिलाकर लपेटने से पेट की गर्मी समाप्त हो जाती हैं ।


कैंसर रोकने में बांस


बांस की कोमल टहनियों में एंटीऑक्सीडेंट तत्व प्रचुरता में मिलते हैं अतः बांस की इन कोमल टहनियों को सब्जी के रूप में खाना चाहिए इससे कैंसर जैसी बीमारी से बचाव होता हैं ।


पेशाब रुकने पर बांस

बांस की जड़ का क्वाथ पिलाने से रुकी हुई पेशाब खुलकर आती हैं । इसके पत्तों का रस एक दो चम्मच पीनें से भी रूकी हुई पैशाब चालू हो जाती हैं ।

सिरदर्द में बांस 

बांस की जड़ का रस एक दो बूंद नाक में डालने से पुराने सिरदर्द में राहत मिलती हैं ।

इसके अलावा माइग्रेन और तनाव से भी मुक्ति मिलती हैं ।

कानदर्द में बांस


कानों होने वाला तीव्र दर्द बांस के पत्तों का रस कानों में डालने से बंद हो जाता हैं । 

प्रतिदिन सुबह-शाम पांच बूंद बांस के पत्तों का रस कान में डालने से बहरापन भी दूर हो जाता हैं ।


टांसिलाइटिस Tonsillitis में बांस 



टांसिलाइटिस के कारण गले में तीव्र दर्द हो रहा हो तो बांस की पत्तियों का क्वाथ बनाकर गरारे करने से बहुत शीघ्रता से आराम मिलता हैं ।


यदि गला बैठ गया है तो बांस की पत्तियों से बने क्वाथ में चुटकी भर हल्दी और फिटकरी मिलाकर गरारे करने से आराम मिलता हैं ।

संक्रमण रोकने में बांस का प्रयोग


यदि शरीर में किसी भी जहरीली वस्तु का संक्रमण हो गया हो तो बांस बहुत प्रभावी तरीके से संक्रमण रोकता हैं । 

बांस की जड़ और पुनर्नवा समान मात्रा में मिलाकर क्वाथ बना लें यह क्वाथ सुबह शाम 5 - 5 मिली सेवन करने से संक्रमण के साथ शरीर की सूजन भी उतर जाती हैं ।

रेडिएशन का प्रभाव


बांस रेडिएशन के प्रभाव को समाप्त कर देता हैं । अतः ऐसी जगह जहां मोबाइल टावर हो, खतरनाक रेडिएशन उत्सर्जन करने वाले उघोग हो इनके आसपास बांस के पेड़ अवश्य लगाना चाहिए। 


इसी प्रकार यदि अस्पताल,CT SCAN सेंटरों, एक्स रे सेंटर आदि में काम करने वाले व्यक्ति खतरनाक रेडिएशन के दुष्प्रभाव से बचना चाहते हैं तो उन्हें कुछ समय बांस के पेड़ के नीचे अवश्य बैठना चाहिए ।


दस्त रोकने के लिए बांस


बांस की संधियों पर निकलने वाले अंकुर पीसकर खानें से दस्त बंद हो जातें हैं । 


बांस कैल्सियम का स्त्रोत


बांस के नव अंकुरों में प्रचुर मात्रा में कैल्शियम मोजूद रहता है । अतः कैल्सियम की कमी से ग्रसित व्यक्ति को बांस के नव अंकुरों का सेवन अवश्य करना चाहिए ।


बांस की कोंपलों में प्रचुर मात्रा में कैल्शियम मोजूद रहता है यदि बढ़ते बच्चों को इन कोंपलों से बना अचार, मुरब्बा या सब्जी नियमित रूप से खिलाई जाए तो बच्चे का कद प्रर्याप्त लम्बाई में बढ़ता है ।


पारा निगलने पर बांस

यदि किसी ने पारा निगल लिया हो तो बांस के पत्तों का रस पीलानें से पारें का विषैला प्रभाव समाप्त हो जाता हैं ।


प्रजनन क्षमता बढ़ाने में बांस का उपयोग


बांस के बीजों को पानी में उबालकर इस पानी को यदि संतानहीन पुरुष और महिला पीना शुरू करें तो कुछ ही समय में संतान उत्पन्न करने की क्षमता प्राप्त हो जाती हैं ।


ऊर्जा प्राप्त करने का उत्तम स्रोत


बांस के 100 ग्राम बीजों में 60 ग्राम के लगभग कार्बोहाइड्रेट और 265 किलो कैलोरी ऊर्जा प्राप्त की जा सकती हैं । इतनी ऊर्जा और कार्बोहाइड्रेट अन्य खाद्य पदार्थों से प्राप्त नहीं होती हैं। अतः शारीरिक श्रम और खेलों में हाथ आजमाने वालों को बांस के बीजों का सेवन अवश्य करना चाहिए ।

LDL कोलेस्ट्रॉल घटाने में बांस का उपयोग


बांस के नवीन अंकुरों में प्रचुर मात्रा में फायबर पाया जाता हैं । सौ ग्राम नव अंकुरों में 8 ग्राम तक फायबर होता हैं यह फायबर खून से low density lipoprotein या LDL कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम करता हैं । अतः LDL कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम करने के लिए बांस के नव अंकुरों का प्रयोग मुरब्बे के रूप में किया जाना चाहिए ।



वजन घटाते हैं बांस के बीज


बांस के बीज जिन्हें बांस के चावल भी कहा जाता हैं, में उच्च कैलोरी प्रदान करने की क्षमता होने के कारण इनके सेवन के बाद लम्बे समय तक भूख नहीं लगती हैं । अतः जिन लोगों का वजन अधिक होता हैं उन्हें बांस के बीजों से बनी रोटी का सेवन अवश्य करना चाहिए ।



IMMUNITY इम्यूनिटी बढ़ाता है बांस 


बांस की नव अंकरित कोपल एंटी ऑक्सीडेंट, फाइटोकेमिकल्स और मिनरल्स का उत्तम स्रोत होती हैं । इनके सेवन से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता IMMUNITY बढ़ती है । 


कामोत्तेजना sex power बढ़ाते है बांस के बीज


बांस के बीजों में मौजूद ऊर्जा लिंग और योनि की रक्त शिराओं में खून का प्रवाह बढ़ा देती हैं जिससे महिला और पुरुष दोनों में कामोत्तेजना बढ़ जाती हैं । 


कामोत्तेजना बढ़ाने के लिए बांस के बीजों की खीर बनाकर पीना चाहिए ।



रात में आक्सीजन देता हैं बांस का पेड़


बांस रात के समय अन्य पेड़ों के विपरीत कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण कर आक्सीजन वातावरण में छोड़ता है । अतः इसके आसपास निवास करने वालों को पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन मिलती रहती हैं जिससे अस्थमा, ह्रदय रोग , आदि समस्याएं नहीं होती हैं और इसके आसपास रहने वाले निवासियों का स्वास्थ उत्तम बना रहता हैं ।


तनाव दूर करता हैं बांस का मुरब्बा



बांस के मुरब्बे में ऐसे फ्लेवेनाइड होते हैं जो तनाव दूर कर मस्तिष्क को शांत रखते हैं । और उत्तम नींद प्रदान करते हैं ।


वंशलोचन क्या है ?




वंशलोचन सुप्रसिद्ध शास्त्रोक्त आयुर्वेदिक औषधि हैं जो मादा जाति के खोखले बांस के अंदर से मिलती हैं । इस जाति के बांस का लैटिन नाम है बैब्यूसा अरंडिनेसी (Bambusa arundinacea) 

असली वंशलोचन सफेद रंग का ठोस, नीले रंग की आभा लिए होता है । वंशलोचन को लकड़ी या पत्थर पर घिसने से किसी भी प्रकार का निशान नहीं पड़ता हैं ।

वंशलोचन को बांस कपूर ,त्वकक्षीरी,पिंगा, वंश शर्करा,तबाशीर आदि नामों से भी जाना जाता हैं ।



वंशलोचन की प्रकृति 

आयुर्वेद मतानुसार वंशलोचन रुक्ष,कसैला, शीतल और पित्त का शमन करने वाला होता हैं ।



वंशलोचन के फायदे vanshloshan ke fayde

सूखी खांसी की दवा 


3 ग्राम वंशलोचन शहद के साथ मिलाकर सुबह शाम चटाने से सूखी खांसी बंद हो जाती हैं । 

मूत्र मार्ग की जलन


गोखरु, मिश्री और वंशलोचन तीन तीन ग्राम मिलाकर आधा दूध और आधा जल मिले पानी के साथ सेवन करें । इससे मूत्र मार्ग की जलन शांत होती हैं ।


पुराने ज्वर में वंशलोचन


ऐसा ज्वर जो लम्बे समय से आ रहा हो और जो शरीर की गर्मी बढ़ाता हो के लिए वंशलोचन रामबाण दवा है । ऐसे ज्वर की पहचान कर 5 ग्राम वंशलोचन और 5 ग्राम गिलोय चूर्ण मिलाकर प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करवाना चाहिए ।

• ज्वर के लिए आयुर्वेदिक औषधि


पागलपन की दवा

पित्त प्रकृति का रोगी यदि पागल हो जाता हैं तो वंशलोचन और ब्राम्ही घृत मिलाकर प्रतिदिन सेवन करवाना चाहिए ।

अमाशय के दोषों का निवारण

वंशलोचन को प्रतिदिन शीतल जल के साथ तीन ग्राम की मात्रा में लेने से अमाशय के सभी दोष दूर होकर अमाशय स्वस्थ्य बना रहता हैं ।


वीर्य के दोषों में


वंशलोचन को एक पोटली में भरकर पानी से भरे बर्तन में रख दें,इस पानी को दिन में तीन चार बार पीने से वीर्य के दोषों जैसे कम शुक्राणु, कमज़ोर शुक्राणु आदि समस्या दूर होती हैं ।

इसी प्रकार इस पानी के सेवन से नींद में वीर्य निकलने nightfall की समस्या समाप्त हो जाती हैं ।


शरीर में कैल्शियम की पूर्ति करता हैं


वंशलोचन प्राकृतिक कैल्शियम का विपुल भंडार होता हैं । अतः शरीर में कैल्शियम की कमी होने पर इसकी थोड़ी थोड़ी मात्रा रोज पानी या शहद के साथ लेना चाहिए ।

बच्चा यदि मिट्टी खाता है तो उसे वंशलोचन की छोटी छोटी गोलियां बनाकर खिलाना चाहिए इससे बच्चा मिट्टी खाना बंद कर देता हैं।

 गर्भावस्था में 


यदि गर्भावस्था में महिलाओं में कैल्सियम की कमी हो जाती हैं तो वंशलोचन को शहद के साथ मिलाकर सेवन करवाना चाहिए इससे होने वाला बच्चा हष्ट पुष्ट होता हैं ।

हाथ पैरों में जलन होने पर 


यदि हाथ पैरों में जलन होती हो और हथेली और पांव के पंजे गर्म रहते हो तो एक ग्राम वंशलोचन और एक ग्राम शहद मिलाकर खाने से हाथ पैरों की जलन बंद हो जाती हैं ।



प्रदर रोगों में वंशलोचन


 पांच ग्राम वंशलोचन और पांच ग्राम मिश्री मिलाकर प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करने से प्रदर रोगों जैसे रक्त प्रदर और श्वेत प्रदर में लाभ होता है ।


० नीम के औषधीय गुण

० बबूल के औषधीय गुण

० फंगल इंफेक्शन

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