22 अप्रैल 2020

कोरोना वायरस रेपिड़ एंटीबाडी टेस्ट क्या हैं ? Corona virus rapid antibody test in hindi

कोरोना वायरस रेपिड़ एँटीबाडी टेस्ट क्या हैं । corona virus rapid antibody test in hindi



कोरोना वायरस की जाँच का तरीका
 रेपिड एंटीबाडी टेस्ट का तरीका



 रेपिड़ एँटीबाडी टेस्ट खून में कोराना वायरस की उपस्थिति का पता लगानें वाला टेस्ट हैं । इस टेस्ट में यह पता किया जाता हैं कि शरीर में कोराना वायरस के विरूद्ध कोई एंटीबाडी  निर्मित हो रही हैं या नही ।



कोरोना वायरस की जाँच कैसे करतें है
 कोरोना वायरस रेपिड एंटीबाडी टेस्ट

यह टेस्ट  immunoglobune M और Immunoglobune G के परीक्षण पर आधारित होता हैं । टेस्ट स्ट्रीप पर कन्ट्रोल लाईन C immunoglobune  IgM और Immunoglobune IgG यदि परीक्षण में दिखाई देती हैं तो इसका मतलब व्यक्ति कोरोना वायरस पाजीटिव हैं और यदि दोनों लाईन नही दिखाई दें सिर्फ कन्ट्रोल लाईन C दिखाई दे इसका मतलब परिणाम कोरोना वायरस नेगेटिव हैं ।





रेपिड़ कोरोना वायरस एंटीबाडी टेस्ट की आवश्यकता इसलिये महसूस हो रही हैं क्योंकि परपंरागत टेस्ट का परिणाम 12 से 24 घंटे में प्राप्त होता हैं जबकि कोरोना वायरस बीमारी की संक्रमण की दर बहुत तीव्र हैं । मात्र कुछ ही सप्ताह में यह बीमारी महामारी का रूप ले चुकी हैं ।




रेपिड़ कोरोना वायरस एंटीबाडी टेस्ट का परिणाम 15 से 20 मिनिट में प्राप्त हो जाता हैं जिससे मरीज की आगे की जाँच उपचार और उनके संपर्कों की पहचान बहुत तीव्रता से हो जाती हैं ।















21 अप्रैल 2020

होम्योपैथिक बायोकाम्बिनेशन नम्बर #1 से नम्बर #28 तक Homeopathic bio combination in hindi

 1.बायो काम्बिनेशन नम्बर 1 एनिमिया के लिये


होम्योपैथिक बायोकाम्बिनेशन नम्बर 1 का उपयोग रक्ताल्पता या एनिमिया को दूर करनें के लियें किया जाता हैं । रक्ताल्पता या एनिमिया शरीर की एक ऐसी अवस्था हैं जिसमें रक्त में हिमोग्लोबिन की सघनता कम हो जाती हैं । हिमोग्लोबिन की कमी होनें से रक्त में आक्सीजन कम परिवहन हो पाता हैं ।


होम्योपैथिक बायोकाम्बिनेशन नम्बर 1 का उपयोग रक्ताल्पता या एनिमिया को दूर करनें के लियें किया जाता हैं । रक्ताल्पता या एनिमिया शरीर की एक ऐसी अवस्था हैं जिसमें रक्त में हिमोग्लोबिन की सघनता कम हो जाती हैं । हिमोग्लोबिन की कमी होनें से रक्त में आक्सीजन कम परिवहन हो पाता हैं । 


W.H.O.के अनुसार यदि पुरूष में 13 gm/100 ML ,और स्त्री में 12 gm/100ML से कम हिमोग्लोबिन रक्त में हैं तो इसका मतलब हैं कि व्यक्ति एनिमिक या रक्ताल्पता से ग्रसित हैं ।



एनिमिया के लक्षण :::



1.शरीर में थकान


2.काम करतें समय साँस लेनें में परेशानी होना



3.चक्कर  आना 



4.सिरदर्द



5. हाथों की हथेली और चेहरा पीला होना



6.ह्रदय की असामान्य धड़कन



7.ankle पर सूजन आना



8. अधिक उम्र के लोगों में ह्रदय शूल होना



9.किसी चोंट या बीमारी के कारण शरीर से अधिक रक्त निकलना



बायोकाम्बिनेशन नम्बर  1 के मुख्य घटक




० केल्केरिया फास्फोरिका 3x



० फेंरम फास्फोरिकम 3x


० नेट्रम म्यूरिटिकम 6x



० काली फास्फोरिकम 3x



2.बायोकामबिनेशन नम्बर 2 अस्थमा  के लिये



बायोकाम्बिनेशन नम्बर 2 अस्थमा या दमा के लिये प्रयोग की जाती हैं । अस्थमा या दमा एक ऐसी अवस्था हैं जिसमें फेफड़ें की श्वास नलिकाओं में सूजन आ जाती हैं । जिससे साँस फूलता हैं।



अस्थमा के अनेक कारण होतें हैं जैसें आनुवाशिंकता,एलर्जी,संक्रमण,आदि



बायोकाम्बिनेशन नम्बर  2 के घटक 



० काली फास्फोरिकम 3x



० मैग्निशियम फास्फोरिकम 3x



० नेट्रम म्यूरिटिकम 6x



० नेट्रम सल्फ्यूरिकम 3x



3 .बायोकाम्बिनेशन नम्बर #3 पेटदर्द के लिये


बायोकाम्बिनेशन नम्बर 3 पेटदर्द के प्रयुक्त होम्योपेथिक दवा हैं । यह औषधि हर प्रकार के पेटदर्द के लिये उपयोगी हैं । 



बायोकाम्बिनेशन नम्बर 3 के घटक



० मैग्नेशियम फास्फोरिकम 3x



० केल्केरिया फास्फोरिका 3x




० नेट्रम सल्फ्यूरिकम 3x



० फेरम फास्फोरिकम 3x



4.बायोकाम्बिनेशन नम्बर  #4 कब्ज के लिये



यह औषधि पेट में बने रहनें वाले कब्ज के लिये प्रयुक्त की जाती हैं । जिसके प्रमुख लक्षण हैं 



० मल का कठोर रहना


० गैस का पेट में ही बने रहना


० हल्का सा पेटदर्द और मल त्यागतें समय पेट में चुभनें सा अहसास होना ।



बायोकाम्बिनेशन नम्बर 4 के घटक द्रव्य



० केल्केरिया फ्लोरिका 3x



० काली म्यूरिटिकम 3x



० नेट्रम म्यूरिटिकम 3x



० साइलिशिया 6x




5.बायोकाम्बिनेशन नम्बर 5 सर्दी जुकाम के लिये



सर्दी जुकाम एक प्रकार का वायरल इन्फेक्शन हैं जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक संक्रमण द्धारा फैलता हैं । इस वायरल इन्फेक्शन से नाक से पानी बहना,छींके आना ,खाँसी होना और हल्की ठंड लग कर बुखार आना जैसी समस्या होती हैं ।



सर्दी जुकाम की समस्या ऋतु परिवर्तन के समय अधिक होती हैं ।



बायोकाम्बिनेशन नम्बर 5 के घटक द्रव्य 



० फेरम फास्फोरिकम 3x



० काली म्यूरिटिकम 3x




० नेट्रम म्यूरिटिकम 6x


० काली सल्फ्यूरिकम 3x



6.बायोकाम्बिनेशन नम्बर 6 खाँसी जुकाम 



यह काम्बिनेशन खाँसी के लिये प्रयोग किया जाता हैं सूखी खाँसी,गीली खाँसी जिसके साथ नाक भी बह रही हो में यह दवा बहुत काम करती हैं ।


बायोकाम्बिनेशन 6 के घटक द्रव्य 



० फेरम फास्फोरिकम 3x



० काली म्यूरिटिकम 3x



० मैग्नेशियम फास्फोरिकम 3x



० नेट्रम म्यूरिटिकम 6x


० नेट्रम सल्फ्यूरिकम 3x




7.मधुमेह के लिये बायोकाम्बिनेशन नम्बर 7


बायोकाम्बिनेशन नम्बर 7 मधुमेह के लियें हैं । मधुमेह के कारण पेनक्रियाज से उत्सर्जित होनें वाला इंसुलिन हार्मोंन नही बनता हैं । यह इंसुलिन रक्त में शर्करा की मात्रा की मात्रा नियत्रिंत करता हैं । जब इंसुलिन के नहीं बननें से रक्त में शर्करा की मात्रा नियंत्रित नही होती हैं । तो मधुमेह हो जाता हैं ।



बायोकाम्बिनेशन नम्बर 7 के मुख्य घटक 



० केल्केरिया फास्फोरिका 3x


० फेरम फास्फोरिकम 3x


० काली फास्फोरिकम 3x


० नेट्रम फास्फोरिकम 3x



० नेट्रम सल्फ्यूरिकम 3x




8.बायोकाम्बिनेशन नम्बर 8 डायरिया के लिये


यह औषधि तीव्र और लम्बे समय से जारी पतले दस्त और उल्टी के लियें बहुत गुणकारी हैं ।



बायोकाम्बिनेशन 8 के मुख्य घटक



० केल्केरिया फास्फोरिका 3x


० फेरम फास्फोरिकम 3x


० काली फास्फोरिकम 3x


० काली सल्फ्यूरिकम 3x


० नेट्रम सल्फ्यूरिकम 3x



9.बायोकाम्बिनेशन नम्बर 9 खूनी दस्त के लिये


दूषित खाद्य पदार्थों के सेवन से या आँतों में छालें हो जानें के कारण बार - बार खूनी दस्त होतें हैं । बायोकाम्बिनेशन 9 इस प्रकार के तीव्र और पुरानें दस्त में बहुत प्रभावकारी हैं।


बायोकाम्बिनेशन  नम्बर 9 के घटक 



० फेरम फास्फोरिकम 3x



० काली म्यूरिटिकम 3x


० काली फास्फोरिकम 3x


० मैग्नेशियम फास्फोरिकम 3x



10.बायोकाम्बिनेशन  नम्बर 10 बढे हुयें टांसिल के लिये



गले में दर्दयुक्त सूजन जिसमें निगलनें में परेशानी होती हैं । ऐसी अवस्था में बायोकाम्बिनेशन 10 दी जाती हैं ।


बायोकाम्बिनेशन 10 के घटक 



० केल्केरिया फास्फोरिका 3x



० फेरम फास्फोरिकम 3x


० काली म्यूरिटिकम 3x





11. बुखार के लियें बायोकाम्बिनेशन नम्बर 11


बायोकाम्बिनेशन नम्बर 11 बुखार की औषधि हैं । ऐसा बुखार जो मौसम में अचानक परिवर्तन से आ रहा हो । आपरेशन के बाद बुखार आ रहा हो । या अचानक से चढ रहा हो और उतर रहा हो । 


बायोकाम्बिनेशन 11 घटक द्रव्य 



० फेरम फास्फोरिकम 3x


० काली म्यूरिटिकम 3x


० काली सल्फ्यूरिकम 3x


० नेट्रम म्यूरिटिकम 3x


० नेट्रम सल्फ्यूरिकम 3x



12.बायोकाम्बिनेशन नंबर 12 सिरदर्द के लिये



तनाव ,अपच,बुखार,एनिमिया,अधिक शराब पीनें  (हेंगओवर) ,उच्च रक्तचाप ,की वजह से होनें वाले सिरदर्द की यह सर्वमान्य औषधि हैं ।


बायोकाम्बिनेशन 12 के घटक 



० फेरम फास्फोरिकम 3x



० काली फास्फोरिकम 3x



० मेग्नेशिया फास्फोरिका 3x



० नेट्रम म्यूरिटिकम 3x


13.बायोकाम्बिनेशन नम्बर 13 श्वेत प्रदर के लिये


श्वेत प्रदर जिसमें योनि से पतला,सफेद और मटमेला रंग का पदार्थ निकलता हैं । यह बीमारी बेक्टेरिया की वजह से होती हैं । बायोकाम्बिनेशन नम्बर 13 इसकी सर्वमान्य औषधि हैं ।


बायोकाम्बिनेशन नंबर 13 के घटक 



० केल्केरिया फास्फोरिका 3x



० काली फास्फोरिकम 3x



० काली सल्फ्यूरिकम 3x



० नेट्रम म्यूरिटिकम 3x




14.बायोकाम्बिनेशन 14 मीजल्स के लियें



मीजल्स एक वायरस जनित बीमारी हैं जो वायरस मोरबीली से होता हैं । इस बीमारी में सर्दी खाँसी बुखार के साथ नाक और आँख से पानी निकलता हैं। कुछ दिन बाद शरीर पर खुजली चालू हो जाती हैं ।


बायोकाम्बिनेशन 14 के घटक


०फेरम फास्फोरिकम 3x


० काली म्यूरीटिकम 3x


० काली सल्फ्यूरिकम 3x


15.बायोकाम्बिनेशन 15 मासिकधर्म की समस्या के लिये 


यह औषधि दर्दयुक्त ,अनियमित,बदबूदार मासिक धर्म के लिये है। किशोरी स्त्री में माहवारी के समय होनें वाला दर्द इस औषधि के सेवन से समाप्त हो जाता हैं ।


बायोकाम्बिनेषन 15 के घटक 



० केल्केरिया फास्फोरिका  3x


० फेरम फास्फोरिका 3x


० काली फास्फोरिकम 3x


० काली सल्फ्यूरिकम 3x


० मेग्नेशियम फास्फोरिकम 3x


16.बायोकाम्बिनेशन नंबर 16 स्नायु दौर्बल्यता के लिये


स्नायु दौर्बल्यता के कारण  कमज़ोरी,वजन कम होना,एकाग्रता की कमी, बेहोशी आना,जैसी समस्याओं में यह औषधि काम में ली जाती हैं ।


बायोकाम्बिनेशन 16 के घटक



० कैल्केरिया फास्फोरिका 3x



० फेरम फास्फोरिकम 3x



० काली फास्फोरिकम 3x



० मैग्नेशियम फास्फोरिकम 3x



० नेट्रम म्यूरिटिकम 3x


17. अर्श(piles)के लिये बायोकाम्बिनेशन नंबर 17


यह औषधि सभी प्रकार के आंतरिक और बाहरी अर्श के लिये उपयोगी हैं। 

बायोकाम्बिनेशन 17 के घटक 



० कैल्केरिया फ्लोरिका 3x



० फेरम फास्फोरिकम 3x



० काली म्यूरिटिकम 3x



० काली फास्फोरिकम 3x


18.बायोकाम्बिनेशन नंबर 18 पायरिया के लिये


मसूड़ों में संक्रमण की वजह से पीप या खून निकलता हैं और मुहँ से बदबू आती हैं । ऐसी अवस्था में बायोकाम्बिनेशन 18 दी जाती हैं ।


बायोकाम्बिनेशन 18 के घटक



० केल्केरिया फ्लोरिका 3x



० केल्केरिया सल्फ्यूरिका 3x



० साइलिशिया 6x


19.बायोकाम्बिनेशन नंबर 19 गठिया के लिये


सभी प्रकार के गठिया रोगों में उपयोगी हैं ।

बायोकाम्बिनेशन 19 के घटक



० फेरम फास्फोरिकम 3x



० काली सल्फ्यूरिकम 3x



० मेग्नेशियम फास्फोरिकम 3x



० नेट्रम सल्फ्यूरिकम 3x


20.बायोकाम्बिनेशन नंबर 20 त्वचा रोगों के लिये


त्वचा पर निकलनें वाले चकते,खुजली,दाद,अन्य संक्रामक त्वचा रोगों,मुहाँसे आदि पर प्रभावकारी हैं ।

बायोकाम्बिनेशन 20 के घटक


० केल्केरिया फ्लोरिका 6x



० केल्केरिया सल्फ्यूरिकम 6x



० काली सल्फ्यूरिकम 3x



० नेट्रम म्यूरिटिकम 6x



० नेट्रम सल्फ्यूरिकम 3x


21. बच्चों के दाँतों की समस्याओं के लिये बायोकाम्बिनेशन नंबर 21



बढ़ते हुये बच्चों की दाँतों से संबधित समस्याओं के लिये यह औषधि बहुत फायदेमंद हैं । इसमें दाँतों के विकास के लिये सभी आवश्यक खनिज विधमान होतें हैं ।


बायोकाम्बिनेशन नबंर 21 के घटक



० केल्केरिया  फास्फोरिका 3x



० फेरम फास्फोरिकम 3x



22.बायोकाम्बिनेशन नंबर 22 कंठमाला के लिये


सिर,मुहँ,गले और शरीर के अन्य भागों पर ऐसी गाँठे जो दर्दरहित हो के लिये यह औषधि काम आती हैं ।


बायोकाम्बिनेशन नंबर 22 के घटक



० केल्केरिया फास्फोरिका 3x



० फेरम फास्फोरिकम 3x



० काली म्यूरिटिकम 3x



० साइलिशिया 6x


23.बायोकाम्बिनेशन  नंबर 23 दाँतदर्द के लिये


बढ़ती उम्र के कारण दाँतों का क्षय,ठंडा गरम महसूस होना,दाँतों में संक्रमण होना आदि समस्याओं के लिये यह औषधि बहुत काम की हैं ।


बायोकाम्बिनेशन 23 के घटक



० फेरम फास्फोरिकम 3x



० केल्केरिया फ्लोरिका 3x



० मैग्निशियम फास्फोरिकम 3x



24.बायोकाम्बिनेशन 24 नस और दिमाग के लिये


यह एक जनरल टानिक दवाई हैं जो नसों और दिमागी कमज़ोरी के लिये उपयोग की जाती हैं । इसमें नसों और दिमाग के लियें ज़रूरी मिनरल्स होतें हैं ।

बायोकाम्बिनेशन नंबर 24 के घटक




० केल्केरिया फास्फोरिका 3x



० फेरम फासफोरिकम 3x



० काली फास्फोरिकम 3x




० मैग्नेशियम फास्फोरिकम 3x



० नेट्रम फास्फोरिकम 3x

25.बायोकाम्बिनेशन नंबर 25 एसिडिटी,अपच और अफारा के लिये




यह औषधि पेट की कार्यपरणाली को सुधारकर एसिडिटी,अपच और अफारा जैसी समस्याओं को दूर करती हैं।


बायोकाम्बिनेशन नंबर 25 के घटक 




० नेट्रम फास्फोरिकम 3x


० नेट्रम सल्फ्यूरिकम 3x


० साइलिशिया 12x




26.बायोकाम्बिनेशन नंबर 26 सुगम प्रसव के लिये


यदि सम्पूर्ण गर्भावस्था के दौरान यह औषधि लेते रहें तो प्रसव सुगमतापूर्वक और दर्दरहित होता हैं । महिला और बच्चें का स्वास्थ्य उत्तम बना रहता हैं । इस औषधी में मौजूद तत्व गर्भपात की संभावना समाप्त कर देते हैं ।


बायोकाम्बिनेशन 26 के घटक 



० केल्केरिया फ्लोरिका 3x




० केल्केरिया फास्फोरिका 3x



० काली फास्फोरिकम 3x



० मैग्नेशिया फास्फोरिका 3x


० Homeopathy emergency medicine in hindi


27.बायोकाम्बिनेशन नंबर 27 कमजोरी दूर करनें के लिये 


यह शक्तिवर्धक औषधि हैं जो शरीर के अँगों की कमज़ोरी दूर कर इनकी कार्यप्रणाली सुधारती हैं ।

बायोकाम्बिनेशन 27 के घटक



० केल्केरिया फास्फोरिका 6x



० काली फास्फोरिकम 3x



० नेट्रम म्यूरिटिकम 6x


28.बायोकाम्बिनेशन नंबर 28 सामान्य शक्तिवर्धक टानिक



यह एक जनरल health tonic हैं जो बीमारी,आपरेशन के बाद आई कमज़ोरी को दूर करती हैं । यह औषधि कमजोर और बुजुर्ग व्यक्तियों के लिये बहुत फायदेमंद हैं।

बायोकाम्बिनेशन 28 के घटक



० केल्केरिया फ्लोरिका 3x



० केल्केरिया फास्फोरिका 3x



० केल्केरिया सल्फ्यूरिका 3x



० फेरम फास्फोरिकम 3x



० काली म्यूरिटिकम 3x



० काली फास्फोरिकम 3x



० काली सल्फ्यूरिकम 3x



० मैग्नेशियम फास्फोरिकम 3x



 ० नेट्रम म्यूरिटिकम 3x




० नेट्रम फास्फोरिकम 3x




० नेट्रम सल्फ्यूरिकम 3x



० साइलिशिया 3x





० दशमूल क्वाथ के फायदे





० काला धतूरा के फायदे और नुकसान


19 अप्रैल 2020

कान्वलेसंट प्लाज्मा थैरेपी क्या हैं ? what is convalescent plasma therpy in hindi

कान्वलेसंट प्लाज्मा थैरेपी क्या हैं 

What is Convalescent plasma therpy in hindi

प्लाज्मा थैरेपी क्या हैं
convalescent plasma therapy


कान्वलेसंट प्लाज्मा थैरेपी plasma therapy रोग उपचार की एक पद्धति हैं । जिसमें संक्रामक बीमारी से पूर्ण स्वस्थ हो चुकें व्यक्ति के रक्त से एंटाबाडी निकालकर संक्रामक बीमारी से ग्रसित व्यक्ति के रक्त में प्रतिस्थापित कर उपचार किया जाता हैं ।



"कान्वलेसंट प्लाज्मा थैरेपी plasma therapy की खोज जर्मन वैज्ञानिक वान बेहरिंग ने की थी । इस पद्धति द्धारा उन्होनें टिटनस और डिप्थीरिया का इलाज किया था" ।



#कोरोना वायरस के उपचार में कान्वलेसंट प्लाज्मा थैरेपी किस प्रकार मददगार हो सकती हैं ?




लगभग एक शताब्दी पुरानी यह पद्धति फिर से चर्चा में तब आई जब कोरोना वायरस से जूझ रहें पूरे विश्व की सरकारों ने इस पद्धति से कोरोना वायरस संक्रमित मरीजों का उपचार करनें की अनुमति प्रदान की। भारत का ICMR indian council of medical research भी इस पद्धति से उपचार की अनुमति प्रदान कर चुका हैं ।




कान्वलेसंट प्लाज्मा थैरेपी में कोविड़ 19 बीमारी से पूर्णत : स्वस्थ हो चुके  और दो बार कोरोना वायरस से नेगेटिव व्यक्ति से 14 दिन बाद रक्त लिया जाता हैं । एक व्यक्ति से एक बार में एक यूनिट रक्त लिया जाता हैं। जिसमें 800 एंटीबाडी मोजूद रहतें हैं यह एँटीबाडी चार संक्रामक व्यक्ति को चढायें जातें हैं । 


चूंकि स्वस्थ्य हो चुके व्यक्ति के एँटीबाडी संक्रामक बीमारी से लडकर विजय हो चुके हैं अत: यह एंटीबाडी बीमारी से ग्रसित व्यक्ति के शरीर में पहुँचकर रोग प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर देतें हैं जिससे बीमारी खत्म हो जाती हैं ।


स्पेनिश फ्लू महामारी के समय एक मेडिकल बुलेटिन में यह दावा किया गया था कि संक्रामक बीमारी से बचे लोगों का प्लाज्मा बीमारी से ग्रसित व्यक्ति को चढ़ानें से मृत्यु दर में 50% कमी की जा सकती हैं ।


सन् 1934 में भी पैनिसिल्विया के बोर्डिंग स्कूल में एक छात्र खसरा से प्रभावित हुआ था जब इसके ब्लड़ सिरम को harvesr करके बोर्डिंग के अन्य 62 छात्रों को चढ़ाया गया तो मात्र तीन छात्रों में ही मामूली  खसरें के लक्षण दिखाई दिये थें ।


कोविड़ 19 के इलाज से पूर्व यह विधि सार्स,मर्स,इबोला और H1N1 बीमारी के उपचार में काम ली जा रही थी । और इन बीमारीयों के उपचार में यह पद्धति बहुत हद तक सफल भी रही लेकिन लगातार अपना स्ट्रेन बदल रहें कोविड़ 19 वायरस से प्रभावित व्यक्ति के उपचार में यह पद्धति कारगर होगी 



इस संबध में न्यूयार्क मेडिकल सेंटर के चीफ मेडिकल आँफिसर डाँ.ब्रूस रीड का मानना हैं कि यह थैरेपी कोविड़ 19 के उपचार में आपातकालीन व्यवस्था के रूप में प्रयोग की जा रही हैं लेकिन इसकी सफलता एक के बाद एक ठीक हो रहे मरीजों की प्रतिशतता के आधार पर ही निर्धारित होगी ।



कोविड 19 के इलाज में प्लाज्मा थैरेपी  के उपयोग के संबध में एक बड़ा प्रश्न यह भी उठ रहा हैं कि चीन में कोरोना वायरस से ठीक हो चुके कई मरीज फिर से कोरोना वायरस से संक्रमित हो  चुकें हैं । तो क्या ऐसे व्यक्ति के एँटीबाडी बीमारी से निपटनें में मददगार होंगें ?


वास्तव में यह गंभीर प्रश्न हैं जिसका उत्तर व्यापक चिकित्सकीय शोध के उपरांत ही दिया जा सकता हैं ।




० कांकायन वटी


15 अप्रैल 2020

how to start living a healthy lifestyle । स्वस्थ्य जीवनशैली के लिए टिप्स

How to start living a healthy lifestyle


 how to start living a healthy lifestyle । स्वस्थ जीवनशैली के लिए टिप्स


आजकल की lifestyle ऐसी बन गई हैं कि इसमें breakfast लेनें वाले समय पर  इंसान बिस्तर पर नींद निकाल रहा होता हैं । lunch लेनें वाले समय पर breakfast ले रहा होता हैं और जब रात को जब सोनें का समय होता हैं तब टीवी देखते देखते dinner ले रहा होता हैं । कहनें का तात्पर्य यही की स्वस्थ्य जीवनशैली Healthy lifestyle जिसकी व्याख्या हमारें प्राचीन आयुर्वेद शास्त्र में वर्णित हैं को अब पुरानें रीति रिवाज के रूप में प्रचारित किया जा रहा हैं । लेकिन वास्तविकता यही हैं कि आनें वाले समय में यदि प्राचीन आयुर्वेद शास्त्रों में वर्णित इस जीवनशैली को नही अपनाया तो रोग भी बहुत तेजी से अपनें पेर जमायेंगें और व्यक्ति की आयु को कम करेंगें । 



आईये जानतें है स्वस्थ्य जीवनशैली healthy lifestyle के लिये उपाय

1.दिनचर्या द्वारा स्वस्थ जीवनशैली कैसे अपनाएं


निरोगी जीवन की कामना करने वाले  बुद्धिमान व स्वस्थ्य व्यक्ति द्धारा प्रतिदिन किये जानें वाले आचरण को दिनचर्या कहतें हैं । स्वस्थ्य रहनें के लिये दिनचर्या इस प्रकार होनी चाहियें


० सुबह ब्रम्ह मुहर्त यानि प्रात : 4 से 6 बजें के बीच बिस्तर से उठ जाना चाहियें । और प्रथ्वी को प्रणाम कर 
ताम्बें के पात्र में रखा जल पीना चाहियें । यदि चाय काफी या दूध लेतें हो तो एक कप पीना चाहियें ।

दैनिक क्रिया से निवृत होकर 2 से 3 किलोमीटर खुली हवा में पैदल चलना चाहियें ।

सुबह 15 से 20 मिनिट नियमित रूप से योगासन और प्राणायाम करना चाहिये । जिससे मधुमेह, उच्च रक्तचाप ह्रदयरोग होनें की संभावना समाप्त हो जाती हैं । और मानसिक संतुलन ठीक बना रहता हैं ।

सुबह 8 से 9 बजे के बीच भरपूर पोष्टिक नाश्ता करें जिसमें अंकुरित दालें,फल ,दूध,उपमा, जैसे पदार्थ सम्मिलित हो । 


भोजन प्रतिदिन 12 से 1 के बीच होना चाहियें जिसमें हरी सब्जी,दाल,सलाद,दही,आदि का समावेश होना चाहियें ।


शाम 4  से 5 के बीच चाय,काफी या फलों का रस लेना चाहियें । 

शाम 6 से 7 के बीच 2 से 3 किलोमीटर पैदल चलना चाहिये जिससे शरीर के समस्त अँगों की कार्यप्रणाली सुचारू रूप में चलती रहें ।


Healthy lifestyle tips
 Health


रात्रि का भोजन यदि जल्दी कर लिया जायें तो यह बीमारी होनें की संभावना 30% तक कम कर देता हैं अत: रात का भोजन जल्दी करें और भोजन में तली हुई ,ज्यादा मिर्च मसाले और गरिष्ठ चीजें न लें । इसके बजाय धुली,खिचड़ी आदि ले सकतें हैं ।

 रात्रि के भोजन और शयन में दो तीन घंटें का अंतराल जरूर होना चाहियें । 


प्रतिदिन सुबह से रात तक 10 से 12 गिलास पानी जरूर पीयें ।

सोनें का एक निश्चित समय बना लें इसी समय समस्त चिंताओं को त्यागकर कुछ समय शांत मुद्रा में बैठ ईश्वर का स्मरण करें और सो जायें । 

हमेशा अपनी बाँयी करवट सोनें की आदत डालें ।


2. भोजन के द्वारा स्वस्थ जीवनशैली कैसे प्राप्त करें


भोजन का केवल 1/3 भाग ही अन्न और दाले होना चाहियें बाकि 2/3 भाग हरी सब्जी । 20 % पके हुये अन्न के साथ 80% अपक्व पदार्थ लें ।


3.सीमित करें 

अधिक नमक, अधिक मिर्च मसालें, अधिक शक्कर , अधिक तेल घी ।

• नमक के फायदे

4.आराम 


दोनों समय भोजन के बाद 10 से 15 मिनिट वज्रासन में बैंठे। और इसके पश्चात ही कुछ काम करें ।


5.दूर रहें

शराब,धूम्रपान,बुराई,चोरी,क्रोध,घंमंड़,आदि जैसी व्यक्तित्व को विघटित करनें वाली चीजों से दूर रहें ।

मांसाहारी भोजन को त्याग दें ।

• आत्म विकास के 9 मार्ग

7.दाँतों के लियें 


सुबह शाम दाँतों को साफ करें ।जीभ और मसूड़ों को दोनों समय भोजन के बाद पानी से साफ करें ।

आयुर्वेद में दांतों की सफाई के लिए बबूल,नीम,खैर,करंज,पीपल की टहनियों का उपयोग किया जाता हैं । आजकल इनसे बनें दंतमंजन [toothpaste ]भी बाजार में उपलब्ध हैं ।


प्रतिदिन कुछ साबुत जड़ें जैसें मूली,गाजर,गन्ना आदि खायें ताकि दाँत मज़बूत बनें रहें ।


गर्म पानी लेकर दिन में दो बार गरारें करें ताकि गलें में जमा हानिकारक जीवाणु बाहर निकल जायें ।


हाथों में पानी लेकर आँखों में छिंटे डाले ताकि आँख स्वस्थ्य बनी रहें ।

8.जरूरी बात


गहरी साँस ले ,हमेशा तनकर बैठें । स्नान करनें से पूर्व शरीर पर तिल या सरसो तेल की मालिश करें । मालिश करने से त्वचा और मांसपेशियों में लचीलापन बढ़ता है । 

मालिश करने से शरीर में खून का परिसंचरण अच्छा रहता हैं।


नाक के नथूने में प्रतिदिन गाय का देशी घी या अणु तेल तीन चार बूंद डाले ऐसा करनें से प्रदूषक कण फेफडों में नहीं जाकर नाक में ही चिपक जातें हैं ।

नाक में तेल डालनें या नस्यकर्म करने से सिरदर्द,माइग्रेन,लकवा आदि बीमारीयाँ नहीं होती हैं ।


शौच जानें के बाद और भोजन करनें से पहले हाथों को जरूर कीटाणुनाशक से साफ करें ।

भोजन शाँतचित्त होकर और अच्छी तरह चबाकर करें ।

•आलू के फायदे

9.हमेशा सजग रहें 

अपने कर्तव्यों और दोषों के प्रति सजग रहें । निष्काम कर्म को जीवन का आधार बनायें । 

अपने अपने परिवार में बीमारी के प्रति सचेत रहें  । बीमारी आनें पर उसका समुचित उपचार करें और समय समय पर दियें गयें चिकित्सकीय निर्देशों का पालन करें ।






14 अप्रैल 2020

हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन सल्फेट क्या हैं ,यह कोरोना वायरस के उपचार में किस तरह से प्रयोग की जा रही हैं। Hydroxychloroquine SULFATE in hindi

हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन सल्फेट क्या हैं Hydroxychloroquine SULFATE in hindi  


हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन सल्फेट  मलेरिया के उपचार या बचाव के लियें उपयोग की  जानें वाली आधुनिक दवाई हैं । हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन की खोज सन् 1940 के विश्व युद्ध के समय की गई थी । 



हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन सल्फेट मलेरिया के उपचार या बचाव के लियें उपयोग की  जानें वाली आधुनिक दवाई हैं । हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन की खोज सन् 1940 के विश्व युद्ध के समय की गई थी ।
हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन सल्फेट

जब वैज्ञानिको को यह मालूम पड़ा की मलेरिया के उपचार में प्रयोग की जा रही परंपरागत दवा chlroquine मलेरिया को रोकनें में असफल सिद्ध हो रही हैं तो उन्होनें मलेरिया रोधी एक नई दवा हाइड्राक्सीकलोरोक्विन सल्फेट को इसके विकल्प के रूप में खोजा था ।

Hydroxychlroquie SULFATE अमेरिका जैसें देशों में गठिया और ल्यूपस बीमारी के उपचार में भी प्रयोग की जाती हैं । यह दवा शरीर के सूजन के विरूद्ध भी उपयोग में लाई जा रही हैं ।

Hydroxychlroquine SULFATE मुहँ से ली जानें वाली दवाई हैं जो चिकित्सकीय निर्देंशों के अनुसार prescribed की जाती हैं ।

हाइड्राक्सीकलोरोक्विन के संबध में कई अपुष्ट अध्ययन यह भी हैं कि यह वायरस से लड़नें हेतू शरीर की प्रतिक्रिया की  अधिक क्रियाशीलता को घटाती हैं जिससे कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली  सही प्रतिक्रिया सही समय पर कर शरीर के वायरस को खत्म कर सकें ।



Hydroxychlroquine SULFATE के मानव शरीर में होनें वालें दुष्प्रभाव  


० आँखों से कम दिखाई देना या आँखों से काला पीला नीला दिखाई देना

० त्वचा पर फुंसिया होना

० त्वचा का रूखा होना

० त्वचा का ढ़ीला पड़ना

० छाती में जकडाहट महसूस होना

० छाती में दर्द होना

० खाँसी होना या गले में खराश

० पैशाब का रंग बदलना

० पैशाब कम बनना

० सांस लेनें में परेशानी

० उल्टी दस्त लगना

० रात को देखनें में समस्या पैदा होना

० सिरदर्द होना

० अत्यधिक कमजोरी महसूस होना

० चक्कर आना

० ठंड के साथ या बिना ठंड के बुखार आना

० आँखों की पलक पर सूजन या पलकों के झपकनें की दर में वृद्धि

० सुनने की क्षमता में कमी

० आँखे लाल होना

० मानसिक स्थिति में परिवर्तन

० मुहँ या होंठों पर छाले होना

० पेटदर्द

० पैरो के निचले हिस्से पर सूजन

० मुहँ सूखना

० बार बार प्यास लगना

० भूख नही लगना

० कानों में घंटी सुनाई देना


Hydroxychlrouine SULFATE आजकल कोविड़ - 19 के उपचार के लिये पूरे विश्व में चर्चा में हैं क्यों ?


अमेरिकी राष्ट्रपति डाँनाल्ड़ ट्रम्प ने भारत से hydroxychlroquine माँगी हैं । इसके संबंध में यह दावा किया जा रहा हैं कि यह दवा एक अन्य दवा Azithromycine के साथ मिलकर covid - 19 के खिलाफ प्रभावी साबित होती हैं ।

 वास्तव में यह दावा कि hydroxychlroquine और Azithromycine covid - 19 के खिलाफ उपचार में प्रयोग की जा सकती हैं । चीनी अध्ययन का नतीजा हैं । जिसमें बताया गया कि इन दोनों दवाईयों का combination वायरस के प्रभाव को कम करता हैं । लेकिन यह बात वैज्ञानिक कसौटी पर पूर्णत: साबित नही की जा सकी हैं । क्योंकि अमेरिका में ऐसी खबर पढ़नें के बात कई लोग अपनें मन से इस combination का प्रयोग कर गंभीर रूप से बीमार हो गये और  अस्पताल पहुँच चुकें हैं ।

Hydroxychlrquine के संबध में एक अन्य प्रयोगशाला परीक्षण सिद्धांत यह कहता हैं कि यह दवाई alkline प्रकृति की हैं जबकि कोविड़ - 19 वायरस acidic प्रकृति का हैं ।

कोरोना वायरस एक गुच्छें के रूप में होता हैं, श्वसन संस्थान में प्रवेश करनें पर यह वायरस श्वसन संस्थान की कोशिकाओं में अपनी प्रतिकृति प्रवेश कराता हैं और इसके लियें acidic वातावरण की जरूरत होती हैं अब चूंकि hydroxychlrquune की प्रकृति alkline होती हैं अत : यह दवा श्वसन संस्थान में स्थित कोशिकाओं के ph को alkline कर देती हैं और वायरस वहाँ अपनी नई प्रतिलिपी नही बना पाता हैं । इस तरह कोरोना वायरस अपना प्रभाव नही दिखा पाता या मानव शरीर पर यह बहुत कम असर दिखा पाता हैं ।


एक अन्य प्रयोगशाला अध्ययन में जब मानव कोशिकाओं को वायरस से संक्रमित कर hydroxychlroquine से इन कोशिकाओं को धोया गया तो सार्स वायरस,इन्फ्लुएँजा ,सार्स कोविड़ -2 जैसे वायरस समाप्त हो गयें ।


इस परीक्षण के सन्दर्भ में डाँ.ओट्टों यंग जो कि डेविड़ गाफमेन इंस्टीट्यूट में माइक्रोबयलाजी और इम्यूनालाजी विभाग में कार्यरत हैं का मानना हैं कि "जरूरी नही जो लेब में घटित हो वही परिणाम वास्तविक बीमार मानव पर घटित हो " इसमें कुछ बदलाव भी हो सकता हैं ।


इन सब के अलावा एक बात यह भी हैं कि क्या hydroxychlroquine और Azithromycine का combination ऐसे कोविड़ वायरस से संक्रमित व्यक्ति को दिया जा सकता हैं जो पहले से ही उच्च रक्तचाप ,मधुमेह ,और ह्रदय रोग जैसी गंभीर बीमारी से संक्रमित हो। क्योंकि कई बार इन दवाईयों के combination का परिणाम आशानुरूप नही आये हैं ।

जो भी हो आपदा चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न रही हो मानव इतिहास यही हैं कि मानव ने आपदाओं की प्रभावी रोकथाम की थी ,कर रहा हैं और करता रहेगा ।


कोराना वायरस की प्रभावी रोकथाम भी मानव बहुत जल्द करेगा इसी आशा के साथ ।







13 अप्रैल 2020

आयुर्वेद के अनुसार ज्वर कितने प्रकार के होते हैं :: ज्वर के प्रकार । Type of fever in hindi

  आयुर्वेद के अनुसार ज्वर jvar कितने प्रकार के होते हैं :: ज्वर के प्रकार Type of fever in hindi

बुखार
 ज्वर के प्रकार 


आयुर्वेद मतानुसार शरीर में ज्वर jvar ka mul karan का मूल कारण वात,पित्त और कफ का कुपित होना हैं ,तदानुसार ज्वर भी इसी तरह वात,पित्त और कफ से संयोजित होकर उत्पन्न होतें हैं । जैसें


१.वातज ज्वर vataj jvar


२.पित्तज ज्वर pittaj jvar


३.कफज ज्वर kafaj jvar


४.वातज पित्तज ज्वर vataj pittaj jvar 


५.पित्तज कफज ज्वर pittaj kafaj jvar


६.वातज कफज ज्वर vataj kafaj jvar


७.वातज पित्तज ज्वर vataj pittaj jvar


८.आगन्तुक ज्वर  aagantuk jvar


चरक संहिता में वर्णित उपरोक्त आठ प्रकार के ज्वर को विस्तारपूर्वक समझाकर इन ज्वरों के निदान का उपाय jvaro ke nidan ka upay भी बताया हैं । आईयें जानतें हैं इनके बारें में विस्तारपूर्वक



१.वातज ज्वर 

तद्घथारूक्षलघुशीतव्यायामनविरेचनास्थापनशिरोविरेचनातियोगवेगसन्धारणानजगतवयवायोद्धेगशोकशोणितातिसेकजागरणविषमशमनसेभ्योंअतिसेवितेभ्योवायु:प्रकोमापघते ।।


श्लोकानुसार यदि रूक्ष ,लघु,शीतल पदार्थों के सेवन से ,परिश्रम ,वमन,विरेचन और आस्थापन के अतियोग से ,मलादि वेगों को रोकनें से ,उपवास करनें से,चोट लगनें से,मैथुन करनें से,उद्धेग और शोच होनें से, रक्त के अत्यधिक  स्त्राव से ,रात्रि जागरण से,शरीर को ऊँचा,निचा ,तिरछा करनें से शरीर में वायु का कोप हो जाता हैं ।

इस प्रकार यही कुपित वायु अमाशय में प्रवेश कर अमाशय की गर्मी से मिल जाती हैं। फिर वह आहार के सारभूत रस नामक धातु का आश्रय लेकर रस और स्वेद के बहनें वाले छिद्रों को बंद कर देती हैं । फिर पाचकअग्नि को हनन करके पंक्ति स्थान की गर्माई को बाहर निकाल देती हैं। यह वायु शरीर को यथोचित अग्निबलहीन देखकर बल पा जाती हैं यह बल पाई हुई वायु ही वातज ज्वर का कारण होती हैं ।

वातज ज्वर की पहचान कैसे करें vataj jvar ki pahchan kese kre



वातज ज्वर की पहचान इसके लक्षणों के आधार पर करतें हैं जैसें


१.ज्वर के चढ़ते और उतरते समय शरीर का तापमान बदल जाता हैं । उदाहरण के लिये  कभी शरीर का तापमान अधिक होना कभी कम होना ।


२.भोजन करनें और पच जानें के बाद ज्वर का चढ़ना ।

३.सांयकाल में ज्वर चढ़ना


४.बरसात में ज्वर अधिकता से चढ़ना


५.आँख,नाक,कान,त्वचा और मल मूत्र का सूखना और कठोर हो जाना ।


६.शरीर के अँगों में इधर उधर घूमनें वाली पीड़ा होना ।


७.संधियों में दर्द होना ।

८.पैरों का सूजना

९.जीभ का स्वाद कसैला होना 

१०.सूखी खाँसी होना

११.डकार न आना

१२.जंभाई अधिक आना

१३. शरीर में कंपन होना 


१४.अधिक वाचाल होना 


१५.नींद नही आना 


१६.रोमांचित होना


१७.चित्त का एकाग्र  नही रहना

२.पित्तज ज्वर 


उष्णाम्ललवणक्षारकटुकाजीर्णभोजनेभ्योंतिसेवितभ्यस्तथातितीक्ष्णातपाग्निसन्तापश्रमक्रोधविषमाहारेभ्यपित्तप्रकोपमापघते।।

गर्म,अम्ल,लवण,क्षार चरपरे पदार्थों के सेवन से,अजीर्णकर्ता भोजन का अधिक सेवन करनें से,अति तेज धूप ,अग्नि,और संताप के सेवन से पित्त प्रकोपित हो जाता हैं ।


यह प्रकोपित पित्त कुपित होकर अमाशय की गर्मी को बढ़ा देता हैं और रस धातु में मिलकर स्वेद और रस के बहानें वाले छिद्रों को रोक देता हैं ।फिर अपने द्रव्य से जठराग्नि को हनन कर पाचक स्थान की गर्मी को बाहर निकाल देता हैं । इस प्रकार अपना अधिकार पाकर यह पित्त पीड़न करता हुआ पित्त ज्वर को उत्पन्न करता हैं ।


पित्तज ज्वर के लक्षण


१.शरीर में एकदम वेग से ज्वर आना

२.दिन के मध्य में ,आधी रात्रि में ज्वर की वृद्धि होना ।

३.मुहँ में कड़वापन

४.नाक,कान,कंठ,मुख,होंठ और तालु का पकना 

५.बुखार के दोरान मूर्च्छा

६.दस्त होना 

७.शरीर में चकते होना

८.भोजन में अरूचि

९.शरीर में जलन होकर ज्वर आना 

१०.शीतल वस्तुओं से आराम मिलना 


११.उष्ण वस्तुओं से रोग का बढ़ना 

१२.मुख,त्वचा,मूत्र आदि का पीला होना 


१३.मस्तिष्क भ्रमित होना 


३.कफज ज्वर 


स्निग्धमधुरगुरूशीतपिच्छिलाम्ल लवण दिवास्वप्नहर्षव्यायामेभ्योंअतिसेवितेभ्य:श्लेष्माप्रकोपमापघते ।।


चिकने,मधुुर ,भारी,शीतल,अम्लीय, एँव लवण पदार्थों के खानें से ,दिन में सोनें से ,ज्यादा हर्ष से ,कफवर्द्धक पदार्थों के अधिक सेवन करनें से कफ का प्रकोप हो जाता हैं ।

यह प्रकोपित कफ जठराग्नि का हनन करके पाचक अग्नि को बाहर निकाल देता हैं और अपना अधिकार पाकर शरीर को पीडित कर कफज ज्वर उत्पन्न करता हैं ।


कफज ज्वर के लक्षण kafaj jvar ke laxan


१.शरीर में भारीपन के साथ ज्वर 

२.अत्यधिक बलगम निकलना

३.मुहँ का स्वाद  मीठा होना

४.भोजन में अरूचि

५.नींद अधिक आना

६.श्वास चलना 

७.खाँसी होना

८.सर्दी होना 

९.गर्मी नही लगना

१०. त्वचा,नाखून,मुख,मल मूत्र का सफेद होना 

११.चिकने और कफ कारक पदार्थों से रोग का बढ़ना 

१२.रूक्ष और गर्म पदार्थों से आराम मिलना 


यदि ये तीनों दोष एक दूसरें के साथ मिलकर ज्वर पैदा करतें हैं तो यह वातज पित्तज,पित्तज कफज और वातज कफज ज्वर होतें हैं । इन ज्वरों के लक्षण भी तदनुरूप होतें हैं ।


आगन्तुक ज्वर 


अभिघाताभिषगांभिचाराभिशापेभ्यआगन्तुव्र्यथापूर्वोज्वरोंष्टमोभवतिसकन्जितकालमागन्तु:केवलोभूत्वापश्चाद्धोषैरेनुबध्यते अभिघातजोवायुनादुष्टशोणिताधिष्ठानेनअभिषगंज:पुनर्वातपित्ताभ्याम्अभिचाराभिशापजौतुसन्निपातेनउपनिबध्यते सप्त विधाज्ज्वराद्धिशिष्टलिगोंपक्रमसमुत्थित्त्वाद्धिशिष्टोंवेदितव्य :।कर्मणासाधारणेनचोपक्रम्येतिअष्टविधाज्वरप्रकृतिरूक्ता ।।



आगन्तुक  ज्वर  पहलें स्वंय प्रकट होकर पीछे वात,पित्त,कफ की सहायता करता हैं। अर्थात आगन्तुक ज्वर में पहले ज्वर उत्पन्न होकर बाद में वातादि दोष कुपित होतें हैं ।



चोट लगनें,काम क्रोध,अविचार की अधिकता से आगन्तुक ज्वर उत्पन्न होता हैं ।

बुखार (FEVER) आनें पर क्या करें :: घबरायें नहीं समझदारी दिखाएं और जिम्मेंदार बनें


 आजकल कोरोना वायरस का दौर चल रहा हैं ऐसे माहोल में बुखार आना न केवल रोगी को बल्कि परिवार और आसपड़ोस को चिंतित कर रहा हैं । सर्दी, खाँसी और बुखार आना शरीर से संबधित बहुत ही common problem हैं । जिसमें शरीर का तापमान 98 फैरेनहाइट या 37 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाता हैं  ऐसा निम्न कारणों से हो सकता हैं :-


बुखार आने पर क्या करना चाहिए
बुखार


मौसमी बदलाव 

भारत में बुखार आनें का सबसे common कारण मौसम में बदलाव होना हैं । जब सर्दी के बाद गर्मी,और गर्मी के बाद बरसात आती हैं तो वातावरण का तापमान ज्यादा और कम होता हैं तापमान में होनें वालें इस उतार चढाव के कारण शरीर का तापमान भी कम या ज्यादा होता हैं यदि शरीर का Immune system थोड़ा भी कमज़ोर हुआ तो शरीर बुखार में जकड़ जाता हैं । ऐसा बुखार, बुखार के घरेलू नुस्खों और   बुखार का इलाज करवानें से ठीक हो जाता हैं । किंतु यदि बुखार 3 दिनों से अधिक रहता हैं तो चिकित्सकीय सलाह आवश्यक हो जाती हैं ।

Immunity कमज़ोर होना ::


समुचित संतुलित आहार का सेवन नहीं करनें से ,या कोई बीमारी के कारण शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र कमज़ोर हो जाता हैं जिसकी वज़ह से बैक्टीरिया या वायरस का हमला होनें पर या मौसमी बदलाव होनें पर शरीर उसका सामना नहीं कर पाता हैं और बुखार आ जाता हैं । इस प्रकार का बुखार आनें पर चिकित्सकीय सलाहनुसार बुखार की दवाई लेना चाहिए ।

अत्यधिक श्रम करना :::

यदि किसी व्यक्ति को अधिक श्रम करनें की आदत नहीं हैं और यदि अचानक से अधिक श्रम कर लेता हैं तो उसके शरीर का तापमान  सामान्य तापमान से अधिक हो जाता हैं। इस प्रकार बुखार आ जाता हैं ।

यह बुखार भी एक प्रकार का सामान्य बुखार हैं जो कि सामान्य घरेलू उपचार से ठीक हो जाता हैं। 

Bacteria ,मच्छर के काटनें और Virus के संक्रमण से

यदि कोई हानिकारक Bacteria या वायरस virus शरीर के संपर्क में आ जाता हैं मलेरिया,डेंगू का मच्छर काट लेता हैं तो हमारा शरीर प्रतिक्रिया स्वरूप उस वायरस या बैक्टीरिया से लड़ता है जब शरीर का प्रतिरोधक तंत्र कमज़ोर पड जाता हैं तो इस  कारण शरीर का तापमान सामान्य तापमान से अधिक हो जाता हैं ,इस प्रकार का बुखार विशिष्ट प्रकार के Antiboitc बैक्टेरियारोधी ,मलेरिया रोधी और Antivirus वायरसरोधी के द्धारा नियंत्रित होता हैं ।

टीकाकरण के बाद बुखार आना

टीकाकरण के बाद बुखार आना बहुत ही सामान्य सी बात होती हैं जो कि टीका लगनें के दो से चार घंटे बाद आता हैं । उदाहरण के लिए कोरोना वैक्सीन लगने के बाद बुखार आना, बच्चों को टीकाकरण के बाद बुखार आना। इस प्रकार का बुखार साधारण पैरासीटामोल टैबलेट Paracetamol Tablet देनें से उतर जाता हैं ।

टीकाकरण के बाद बुखार की यह समस्या बच्चों के साथ बड़ों को भी प्रभावित करती हैं ।

कैंसर के कारण

कैंसर के कारण भी बुखार आता हैं यदि कैंसरग्रस्त कोशिकाएं सामान्य कोशिकाओं को प्रभावित करना शुरू कर देती हैं तो शरीर का प्रतिरोधी तंत्र इसका विरोध शुरू कर देता हैं फलस्वरूप शरीर का तापमान बढ जाता है । कभी कभी कीमोथेरपी के बाद भी बुखार आ जाता हैं ।


आटो इम्यून बीमारी


यदि कोई आटो इम्यून बीमारी जैसें Rhumetoid arthritis ,Lupus disease, Allergy आदि होती हैं तो इन बीमारीयों के साथ बुखार भी आ जाता हैं । इस प्रकार का बुखार आटो इम्यून बीमारी के इलाज के साथ ही कम होता हैं । 


बुखार आनें के कुछ अन्य कारण


• बुखार आनें के उपरोक्त कारणों के अलावा कुछ अन्य कारण भी होतें हैं जैसें 

• कुछ दवाईयों का साइड़ इफेक्ट,

• फूड पाइजनिंग,

• रक्त का धक्का जमनें की वजह से,

• शरीर में कुछ चुभ जानें की वजह से,

• चोंट लग जानें या शरीर पर कोई फोड़ा हो जानें की वज़ह से 

• आपरेशन के बाद,आदि


बुखार से बचनें का उपाय


बुखार का इलाज करनें से बेहतर हैं दिनचर्या में कुछ ऐसे परिवर्तन किये जाये जिससे कि मौसमी बदलाव के साथ शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र इतना मज़बूत हो जाये कि व्यक्ति को बुखार आये ही नहीं इसके लियें प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले कुछ खान पान को दिनचर्या में सम्मिलित किया जावें जैसें ठंड की शुरूआत से पहलें अदरक ,हल्दी, सूखें मेवे खाना शुरू कर दिया जावें । 

बरसात का मौसम शुरू होनें के साथ ठंडी बासी खाद्य सामग्री  उपयोग में न लें ।

गरमी के मौसम में भारी खानपान को त्यागकर हल्का सुपाच्य भोजन किया जावें और पर्याप्त मात्रा में पानी पीया जावें ।

खानपान के अतिरिक्त किसी भी मौसम में बीमारी से बचनें का एक रामबाण उपाय साफ सफाई पर ध्यान देना हैं । व्यक्तिगत के साथ सामूहिक स्वच्छता के नियमों का पालन करनें,बीमार व्यक्ति से पर्याप्त दूरी बनाकर रखनें,मुंह पर मास्क रखनें से व्यक्ति अपने और अपने परिवार को बीमारी से बचा सकता हैं। 

बुखार का इलाज

बुखार से बचनें के उपरोक्त कदमों का पालन न किया जावें तो व्यक्ति बुखार से पीड़ित हो जाता हैं अत : बुखार आनें पर निम्न औषधि का सेवन करनें से बुखार उतर जाता हैं और फिर नहीं आता हैं ।

• गिलोय का सेवन करनें से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती हैं अत : हर प्रकार के बुखार में गिलोय का काढ़ा बनाकर   सेवन करना चाहिए ।

गिलोय का काढ़ा बनाने के लिए सबसे पहले गिलोय के अंगूठे बराबर चार पाँच टुकडे़ लें, और चटनी की तरह हल्के हाथों से कूट लें,  इसमें आधा चम्मच सौंठ और दस गिलास पानी मिलायें । इस मिश्रण को तब तक उबालें जब तक की तीन गिलास काढ़ा शेष नहीं रह जावें। इस काढ़े का ठंडाकर 50 मिली लीटर रोगी को दिन में दो तीन बार पिलायें ।

•  अदरक,शहद और तुलसी का रस लेकर इन्हें मिला लें ,इस मिश्रण को बुखार आनें पर तीन से चार बार उपयोग करें ।

• चार चम्मच तुलसी के रस में आधा चम्मच काली मिर्च पावड़र मिलाकर गर्म कर लें इस मिश्रण को दिन में दो बार दें ।

• 1 चम्मच धनिया चूर्ण और चुटकी भर सौंठ चूर्ण एक गिलास गर्म पानी में मिलाकर रख दें,सुबह इस पानी को छानकर पीयें ।


• त्रिभुवनकीर्ति रस,लक्ष्मी विलास रस विषम ज्वर की सर्वमान्य औषधि हैं ।


• बुखार आनें पर शरीर का तापमान कम करनें के लिए सिर,हाथों और पैरों पर आइस पैक या ठंडे पानी की पट्टी रखना चाहिए ।

• यदि बुखार तीन दिनों  से अधिक रहता हैं तो बिना लापरवाही करें चिकित्सकीय परामर्श प्राप्त करें ।


11 अप्रैल 2020

मुहँ का कैंसर कारण,लक्षण और बचने के उपाय। oral cancer in hindi

 मुहँ का कैंसर कारण, लक्षण और बचने के उपाय। oral cancer in hindi 


ओरल कैंसर या मुहँ का कैंसर जबड़ें,तालु,जीभ,और गले में होनें वाला कैंसर का एक प्रकार हैं। ओरल कैंसर में इन भागों में गठान या छाला हो जाता हैं । यह छाला या गठान लम्बें समय तक सामान्य उपचार से ठीक नही होता हैं । 


मुंह का कैंसर
मुंह का कैंसर


मुहँ के कैंसर का लक्षण



०१. मुहँ के अन्दर के भागों पर लाल या सफेद धब्बे होना।


०२.आवाज का भारीपन ।


०३. मुहँ पर सूजन लम्बें समय तक रहना ।


०४.खानें पीनें या थूक निगलनें में दर्द होना ।


०५.मुहँ,जीभ,गला,और तालू पर छाला या गठान होना जो लम्बें समय तक ठीक नहीं हो रहा हो ।


०६.मसूड़े या दाँतों में दर्द रहना ।



०७.आवाज में भारीपन या गला बैठना ।


०८.जबडें में दर्द जो कि लम्बे समय से ठीक नही हो रहा हो ।


०९. जीभ से स्वाद का अहसास न होना ।



१०.पायरिया की समस्या ।



मुहँ के कैंसर का कारण



कैंसर चाहे वह शरीर के किसी भी भाग में हो का मुख्य कारण कोशिकाओं का बिना किसी नियत्रंण के लगातार बढ़ना हैं । कोशिकाओं की यह अनियंत्रित वृद्धि  किस कारण से होती हैं इसकी 100 प्रतिशत व्याख्या अब तक नही हो पाई हैं । किंतु मुहँ के कैंसर से ग्रसित लोगों का इतिहास ज्ञात करनें पर पता चलता हैं कि कुछ सामान्य जोखिम कारक हैं जो कैंसर की दर को बढा देतें हैं जैसें 



०१.तम्बाकू का सेवन चाहें वह किसी भी रूप में हो जैसें धूम्रपान,खैनी,नकसर,जर्दा आदि की वजह से मुहँ का कैंसर होनें की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती हैं ।



०२.जो लोग सुपारी खातें हैं वे भी मुहँ के कैंसर के उच्च जोखिम वाले व्यक्तित्व होतें हैं ।



०३.शराब का सेवन करनें से मुहँ का कैंसर होनें की संभावना आठ गुनी तक बढ़ जाती हैं ।



०४.बत्तीसी लगानेें और मुँह द्धारा बत्तीसी को अस्वीकार करनें की दशा में मुँह का कैंसर होनें की संभावना बढ़ जाती हैं ।



०५.माँस विशेषकर रेड़ मीट का अत्यधिक सेवन



०६.दाँतों द्धारा बार बार जीभ के कटनें से मुहँ के कैंसर का जोखिम बढ़ जाता हैं ।


ब्रेस्ट कैंसर कैसे रोकें महिलाएं जरुर जानें



०७.ह्यूमन पेपिलोमा वायरस से संक्रमण होना ।



०८.अत्यधिक एसिडीटी जो कि गले तक फैल जाती हो ।


०९.अत्यधिक बिगड़ी हुई lifestyle जिससे body clock प्रभावित हो रही हो ।



१०. जंक फूड़ का अत्यधिक सेवन।



११.पराबैंगनी किरणों का मुहँ से अत्यधिक सम्पर्क होनें से कैंसर का जोखिम अत्यधिक बढ़ जाता हैं ।



१२.आनुवांशिक कारक मुहँ के कैंसर का जोखिम कई गुना बढ़ा देते हैं । उदाहरण के लिये घर में माता,पिता में से किसी को मुहँ का कैंसर हैं तो पुत्र मुहँ के कैंसर के जोखिम वालें क्षेत्र में हैं ।


१३.खाने में प्रयुक्त होने वाले कुछ खास प्रकार के रंग और खाने को सुरक्षित रखने वाले रंग भी मुंह के कैंसर के लिए उत्तरदायी होते हैं ।





मुहँ के कैंसर होनें के जोखिम को कम करनें के उपाय




०१.जीवनशैली को नियमित रखना चाहियें भोजन,सोना आदि दैनिक कार्यों को नियमित समय पर ही रखना चाहियें ताकि bodyclock का एक निश्चित चक्र बना रहें ।



०२.तम्बाकू,शराब और जंक फूड़ का सेवन नही करें इसके बजाय अंकुरित अनाज ,दूध दही,सलाद,फल और हरी सब्जियों का सेवन करें ।



०३ .नियमित व्यायाम को दिनचर्या का अंग बना लें ।




०४.योग की कुछ विशेष क्रियाएँ मुहँ के कैंसर के जोखिम को कम कर देती हैं इन क्रियाओं को अवश्य करें उदाहरण के लिये कपालभाँति और भ्रामरी बहुत महत्वपूर्ण योगिक क्रिया हैं ।




०५.मुहँ की नियमित जाँच करवाना चाहियें ।


०६.यदि बायोप्सी में कैंसर का पता लगता हैं तो तुरंत चिकित्सा शुरू की जानी चाहियें ।


०७. मुहँ के किसी हिस्सें में कोई गठान या छाला या कोई सूजन हैं जो लम्बें समय से ठीक नही हो रही हैं ,तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेना चाहियें ।



०८. मुहँ के कैंसर यदि प्रारंभिक अवस्था में उपचार शुरू कर दिया जायें तो बहुत शीघ्रता से ठीक हो जाता हैं और यदि इलाज में देरी कर दी तो कैंसर का इलाज बहुत मुश्किल होता जाता हैं ।


०९ मुहँ का कैंसर न हो इसके लियें भोजन में antioxidant और minarals समावेश होना चाहियें ।


१० हल्दी में पाया जानें वाला तत्व करक्यूमिन कैंसर की कोशिकाओं को बढ़नें से रोक देता हैं अत : हल्दी का नियमित सेवन जरूर करना चाहियें ।


११ मुहँ के कैंसर से बचाव हेतू ऐसे स्थान जहाँ विकिरण उत्सर्जन निर्धारित मानको से अधिक हो ऐसे स्थान को छोंड़ देना चाहियें ।


१२ सेब के छिलके में ट्राइटरपेनाइड नामक तत्व पाया जाता हैं,यह तत्त्व शरीर में मौजूद कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करता हैं ।


१३. इस्राइल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के अनुसार ग्रीन टी में मौजूद पालीफेनाल्स नामक एक एंटीऑक्सीडेंट तत्व मुंह में पनप रही कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार जो लोग नियमित रूप से एक कप ग्रीन टी पीतें हैं वे लोग मुंह के कैंसर से बचें रह सकते हैं ।




मुहँ में कैंसर फैलनें के चार चरण होतें हैं जिसके द्धारा हम कैंसर फैलनें की स्थिति को समझ सकतें हैं जैसें



१. प्रथम चरण



प्रथम चरण में मुहँ के कैंसर की गठान या ट्यूमर विकसित होना शुरू ही होता हैं । इस अवस्था में यह निकट की ग्रंथियों तक नही पहुँचता हैं । यही वह अवस्था होती हैं जब कैंसर को पहचानकर आसानी से ठीक किया जा सकता हैं ।



२.द्धितीय चरण 


इस चरण में ट्यूमर निकटतम लसिका ग्रंथियों तक तो नही पहुँचता लेकिन ट्यूमर का इलाज  किमोथेरपी ,रेडियोथेरेपी तक चला जाता हैं और यदि उचित चिकित्सकीय परामर्श  मिले और मरीज पूर्ण चिकित्सा कोर्स पूर्ण कर लें तो  मरीज ठीक हो जाता हैं ।



३.तृतीय चरण 




तृतीय चरण का कैंसर निकटतम लसिका ग्रंथियों तक फैलकर उनको प्रभावित करना शुरू कर देता हैं । यह अवस्था मरीज के लिये बहुत कष्टमय और चिकित्सक के लियें बहुत कठिन होती हैं।  





४.चतुर्थ चरण 



इस चरण में कैंसर आसपास के ऊतकों और अँगों तक फैल जाता हैं । और इसका इलाज करना बहुत मुश्किल होता हैं। मरीज वेंटीलेटर के सहारें रहता हैं और खाना पीना पूर्णत: बंद हो जाता हैं ।











०दशमूल क्वाथ के फायदे



० आयुर्वेद मतानुसार ज्वर के प्रकार


० सर्दीयों में खानपान




० फंगल इंफेक्शन

9 अप्रैल 2020

बबूल के औषधीय गुण अनेक । Benefit of acacia tree in Hindi

बबूल के औषधीय गुण Benefit of acacia tree in Hindi




बबूल पेड़ के फायदे
बबूल पेड़


बबूल का पेड़ वैसे तो सम्पूर्ण भारत मेें पाया जानें वाला उष्णकटिबंधीय वृक्ष हैं ।किन्तु पश्चिमी भारत विशेेेेषकर राजस्थान ,मध्यप्रदेश उत्तरप्रदेश  आदि  प्रदेशों में यह वृृक्ष बहुतायत में  मिलता है ।

बबूल का पेड़ मध्यम कद का  होता हैं । बबूल के पत्ते छोटें छोटें आँवले के पत्तो के समान होतें हैैं ।

बबूल के कांटे  बहुत तीक्ष्ण और मज़बूत होतें हैं बबूल के कांटें दो - दो के जोड़े मेंं लगतें हैं । 


बबूल के फूल पीले रंग के होतें हैं। बबूल की फलियाँ इमली के समान लम्बाई वाली होती हैं ।


बबूल के पेड़ से गोंद भी प्राप्त होता हैं ।  बबूल की लकड़ी बहुत कठोर और लम्बे
समय तक  टीकाऊ होती हैैं ।

बबूल का संस्कृत नाम 



बबूल को संस्कृत में बर्बूर ,बब्बूल ,कफांतक ,स्वर्णपुष्प ,और मालाफल कहतें हैं।

बबूल का हिन्दी नाम acacia tree in hindi


बबूल को हिन्दी मेें बबूल ,बबूर और कीकर नाम से पुकारतें हैं ।


बबूल का लेटिन नाम 


बबूल को लेटिन भाषा मेें माइमोसा अरेबिका कहतें हैं ।


आयुर्वेद मतानुुुुसार बबूल की प्रकृति 

 आयुर्वेद मतानुसार बबूल कड़वा ,स्निग्ध ,शीतल होता हैं ।


बबूल का औषधीय उपयोग 


1.दस्त  में 



बबूल के गोंद को 30 ग्राम की मात्रा में लेकर इसे 100 मिलीलीटर पानी मेंं गला देें । इस पानी को दिन में तीन चार बार पीलायें । दस्त बंद करने की घरेलू दवा इससे उत्तम नही हैं ।

2.दाँतदर्द 

बबूल बहुत उत्तम दाँतदर्द निवारक औषधी हैं । बबूल की टहनी से दातुन करनेें वाले व्यक्ति के दाँतदर्द मेें तुरंत आराम मिलता हैं । और दांत मजबूत और चमकदार बनतें हैैं । 


यदि दाँत सड़ रहे हो तो बबूल की फली को जलाकर इसे राख बना ले और इसमें नमक मिलाकर मंजन करनें से सड़़े दाँत का और अधिक क्षरण नही होता हैं ।

3.नेत्रपीड़ा 


बबूल के पत्तें जो नरम हो ऐसे आठ दस पत्तें लेकर उनका रस निकाल ले इस रस में इतना  ही शहद मिलाकर आँखों पर अंजन करें आँखों के दर्द में बहुुुत तेेेजी से आराम मिलता हैं ।


4.बाजीकारक 


बबूल की छाल ,फल और गोंद बहुत उत्तम बाजीकारक औषधी हैं । 

यदि बबूल केे गोंद को प्रतिदिन चने के दाने बराबर लेकर चूसा जायें  तो इंसान कुुछ ही दिनों मेंं  घोडे जैसा शक्तिशाली बन जाता हैं । उसकी मैथुन करनेें की क्षमता दुगनी हो जाती हैैं । वीर्य स्खलन  का समय  लम्बा हो जाता हैं ।


5.शुक्राणुओं की वृद्धि 


बबूल की फली 500 ग्राम और 300 ग्राम अश्वगंधा चूर्ण आपस में मिला लें यह चूर्ण आधा चम्मच प्रतिदिन केे हिसाब से रात्रि में सोते वक्त सेवन करनें से व्यक्ति के वीर्य मेें शुक्राणुओं की सँख्या बढ जाती हैं ।


6.श्वेत प्रदर


बबूल की छाल का क्वाथ बनाकर इसमें थोडी सी फिटकरी डाल ले और इस क्वाथ से योनि को धोंये।
श्वेत प्रदर मेें आराम मिलता हैं ।


7.टूटी हड्डी जोडनें में


बबूल टूटी हड्डी जोड़नें की सर्वमान्य आयुर्वेदिक औषधी हैं जो लम्बेेे समय से वनवासीयों द्धारा उपयोग की जा रही हैं ।

बबूल के बीजों का चूर्ण बनाकर 3 ग्राम चूर्ण के साथ शहद मिलाकर सुबह शाम चाटनें से टूटी हड्डी जुूूूड़़ जाती हैं ।

8.चर्म रोंग मेें

बबूल के गोंद को पानी में पीसकर दाद खाज पर लगानें से दाद खाज में आराम मिलता हैं ।


9.बिच्छू कााटनें पर

बबूल के गोंंद को गरम कर बिच्छू काटनें वाले डंक पर चिपका दे इस  विधि से  बिच्छछू का जहर कुुछ ही क्षण में उतर जाता हैं ।


 10.मुुँह के छाले


बबूल के पत्तों का रस मुहँ में भरकर कुल्ला करनें से मुँह के छालेंं ठीक हो जातें हैंं।

बबूल के गोंंद को मुंह में लेकर चूसनें से मुँह के छाले की जलन कम होकर बहुत शीीघ्रता सेे ठीक होतेें हैं ।

11. रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ानें में


बबूल की छाल को रातभर पानी में भिगोकर सुबह इस पानी से स्नान करनें से रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़़ती हैं ।

12.कुपोषण 

बबूल की फली ,गोंद ,पत्तियाँ छाल सभी पोषण से भरपूर होतें हैं इनकोो खानें कुुुपोषण बहुत शीीघ्रता सेे दूर होताा हैं ।

13.रक्तस्त्राव  रोकने में

बबूल के फूल रक्तस्त्राव रोकने की बहुत उत्तम आौैषधि हैं । यदि कटनें से रक्त नह
 रूक रहा हैैं तो बबूल के फूलों का रस कटे हुये स्थान पर लगा दें रक्तस्त्राव रूूूक जावेगा
 किन्तु इस विधि का उपयोग तभी करें जब आकस्मिक चिकित्सा का कोई साधन उपलब्ध नही हो ।

14.गर्भपात मेंं


यदि स्त्री को बार बार गर्भपात  की शिकायत हो तो बबूल के गौंद को घी में तलकर प्रतिदिन 5 ग्राम गोंद गर्भावस्थथा के प्रथम मास से तीन चार माह तक खिलायें गर्भपात की संभावना समाप्त हो जाती हैं ।


15.बालों को मज़बूत बनाता हैं


बालों यदि अकारण टूटकर गिरतें हो तो बबूल की फली को रात को पानी में भिगोकर छोड़ दें । सुबह इस पानी से बाल धों लें बाल मज़बूत और टीकाऊ बने रहेंगें ।

16.चोंट लगने पर

चोंट लगने पर बबूल के पत्तों को पीसकर घाव पर लगाने से घाव बहुत तेजी से ठीक होता हैं ।

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