30 दिस॰ 2019

क्या आप जानतें हैं हरसिंगार का संस्कृत नाम क्या हैं हरसिंगार शरीर के किन रोगों में फायदेमंद हैं

हरसिंगार या पारिजात के फायदे 

पारिजात का पेड़
 हरसिंगार

हरसिंगार का संस्कृत नाम क्या हैं ?

हरसिंगार को संस्कृत में पारिजात ,प्रजापत ,हारश्रृंगार ,नल कुंकुम और रागपुष्पी नामों से जाना जाता हैं ।


हरसिंगार का देशी नाम क्या हैं ?

हरसिंगार को देशी भाषा में सियारी,बिनारी, सिंगार और पारिजात के नाम से जाना जाता हैं ।


हरसिंगार का लेटिन नाम क्या हैं ?


हरसिंगार का लेटिन नाम निकटेथिस आरबेस्ट्रिटस   Nyctanthes arbortristis हैं।


हरसिंगार को इंग्लिश में क्या कहतें हैं ?

हरसिंगार को इंग्लिश में coral jasmine कहतें हैं।  
 

हरसिंगार का परिचय :::


हरसिंगार के वृक्ष की लम्बाई 5 से लेकर 12 फीट तक होती हैं । इसमें सफेद रंग के फूल आतें हैं जिनकी खुशबू  बहुत आनंदमय होती हैं ।

हरसिंगार के फूलों की डंडिया केसरिया रंग की होती हैं। 


हरसिंगार के औषधीय उपयोग :::


वातव्याधि में हरसिंगार के फायदे :::


गठिया, जोड़ों के दर्द जैसी वातव्याधि  वाली बीमीरियों में हरसिंगार के पत्तों और ताजें फूलों का क्वाथ  बनाकर पिलानें से रोगी ठीक हो जाता हैं ।


जीर्ण ज्वर में हरसिंगार के फायदे  :::


हरसिंगार के पत्तों का 10 ML  रस निकालकर शहद के  साथ सुबह शाम 7 दिनों तक चटानें से जीर्ण ज्वर समाप्त हो जाता हैं । 


पित्त विकार में हरसिंगार के फायदे :::

हरसिंगार के ताजे पत्तों का रस निकालकर छान ले यह रस लगभग 15 ML की मात्रा में लेकर इसमें इतनी ही मिश्री मिला ले सुबह शाम करके यह रस पीनें से पित्त विकारों की समस्या दूर हो जाती हैं ।

• वात पित्त और कफ प्रकृति के लक्षण

बवासीर में हरसिंगार के फायदे :::


हरसिंगार के सूखे  बीजों को कूटकर लगभग इतनी मात्रा हरड़ के बीजों को कूटकर  लेकर मिला लें यह मिश्रण भोजन के पश्चात सुबह शाम खानें से बवासीर से निजात मिलती हैं ।

 

चर्मरोगों में हरसिंगार के फायदे  :::

हरसिंगार के पत्तों को पीसकर दाद खाज खुजली में लगानें से आशातीत परिणाम मिलता हैं लेकिन ध्यान  रहे छोटें बच्चों पर यह प्रयोग नही करें क्योंकि  हरसिंगार के पत्तें बहुत जलन पैदा करतें हैं । 

•फंगल इन्फेक्शन कारण और प्रकार


अस्थमा में हरसिंगार के फायदे :::

हरसिंगार की छाल 10 ग्राम 250 ML पानी में तब तक उबालें जब तक यह पानी 50 ML न रह जावें अब इस क्वाथ को सुबह शाम 30 ML की मात्रा में सेवन करवानें से  अस्थमा में राहत मिलती हैं ।

टाइफाइड़ में हरसिंगार के फायदे :::

टाइफाइड़ में हरसिंगार के पत्तों का रस त्रिकटु  के साथ सेवन करवानें से बहुत जल्द टाइफाइड़ समाप्त हो जाता हैं ।  

गंजेपन में हरसिंगार के फायदे :::


इसके बीजों का चूर्ण बनाकर नहानें से पहले सिर पर लेप करें तथा 15 मिनिट बाद सिर धो लें इस प्रयोग से गंजें सिर पर नवीन बालों का निर्माण प्रारंभ होता हैं ।

थकान में हरसिंगार के फायदे :::


हरसिंगार की छाल का तेल शरीर पर मालिश करनें से थकावट दूर होकर शरीर की कांति बढ़ती हैं ।


साइटिका रोग में हरसिंगार के फायदे :::


हरसिंगार की छाल 30 ग्राम लेकर उसे 250 ML जल में तबतक उबाले जब तक की पानी 50 ML के करीब नही रह जायें ,इस क्वाथ का नियमित सुबह शाम सेवन करनें से साइटिका में आराम मिलता हैं ।

कृमि रोगों में हरसिंगार के फायदे :::


इसके पत्तों का थोडा रस निकालकर बतासे या शक्कर के साथ देनें से पेट़ के कृमि बाहर निकल जातें हैं । 


रक्तप्रदर में हरसिंगार के फायदे :::

हरसिंगार की दस ताजी कोपल और तीन चार काली मिर्च मिलाकर सेवन करनें से अधिक रक्तस्त्राव  बंद हो जाता हैं ।

बलगम निकालनें में हरसिंगार के फायदे :::


हरसिंगार के पत्तों का एक चम्मच रस लेकर उसमें थोड़ा सा नमक मिला लें इस तरह यह मिश्रण  रात को सोतें वक्त लेनें से फेफड़ों में जमा बलगम आसानी से निकल जाता हैं ।


नपुसंकता में हरसिंगार के फायदे :::

इसके फूलों की टहनी बहुत कामोत्तेजक होती हैं इसका चूर्ण या रस सेवन करनें से नपुसंकता में बहुत आराम मिलता हैं । साथ ही यह स्त्री और पुरूष नपुसंकता में समान रूप से फायदेमंद होती हैं । 


24 दिस॰ 2019

गिलोय के फायदे । GILOY KE FAYDE

 

गिलोय के फायदे GILOY KE FAYDE


गिलोय का संस्कृत नाम क्या हैं ?

गिलोय का संस्कृत नाम गुडुची,अमृतवल्ली ,सोमवल्ली, और अमृता हैं ।

गिलोय का हिन्दी नाम क्या हैं ?

गिलोय GILOY का हिन्दी नाम 'गिलोय,अमृता, संशमनी और गुडुची हैं ।


गिलोय के फायदे
गिलोय

गिलोय का लेटिन नाम क्या हैं ?

गिलोय का लेटिन नाम Tinospra cordipoolia (टिनोस्पोरा  कोर्ड़िफोलिया )

गिलोय की पहचान कैसें करें ?

गिलोय सम्पूर्ण भारत वर्ष में पाई जानें वाली आयुर्वेद की सुप्रसिद्ध औषधी हैं । Ayurveda ki suprasiddh oshdhi hai


यह बेल रूप में पाई जाती हैं, और दूसरें वृक्षों के सहारे चढ़कर पोषण प्राप्त करती हैं । गिलोय के पत्तें दिल के (Heart shape) आकार के होतें हैं। 


गिलोय का तना अंगूठे जीतना मोटा और प्रारंभिक   अवस्था में हरा जबकि सूखनें पर धूसर हो जाता हैं ।


गिलोय के फूल छोटे आकार के और हल्का पीलापन लियें गुच्छों में लगतें हैं ।

गिलोय के फल पकनें पर लाल रंग के होतें हैं यह भी गुच्छों में पाये जातें हैं ।


गिलोय में पाए जाने वाले पौषक तत्व


1.लोह तत्व : 5.87 मिलीग्राम

2.प्रोटीन : 2.30 मिलीग्राम

3.विटामीन सी :56 मिलीग्राम

4.कैल्सियम :85.247 मिलीग्राम

5.विटामीन ए : 303 MCG

6.रेशा : 11.32 ग्राम

7.कार्बोहाइड्रेट : 3.34 ग्राम

[प्रति 100 ग्राम गिलोय तना]


गिलोय की प्रकृति   


 आयुर्वेद मतानुसार according to Ayurveda गिलोय GILOY कसेली,कड़वी Bitter in test ,उष्णवीर्य,अग्निदीपक होती हैं ।

जो गिलोय नीम वृक्ष के सहारे चढ़ी रहती हैं उसे नीम गिलोय कहतें हैं ,आयुर्वेद में इस प्रकार की गिलोय को सर्वश्रेष्ठ गिलोय माना गया हैं ।
  

 गिलोय को अमृता क्यों कहतें हैं ?

गिलोय GILOY में शामक गुण होनें के कारण यह औषधी प्रत्येक कुपित हुये दोषों को समानता पर ला देती हैं ।जिस दोष का प्रकोप  होता हैं उसको शांत कर देती हैं ,और जिसकी कमी हो जाती हैं उसको प्रदीप्त कर देती हैं ।


इस प्रकार  छोटें बड़े दोषों को समान स्थिति में लाकर निरोग बनानें का गुण गिलोय GILOY के अतिरिक्त अन्य किसी भी औषधी में नही हैं ।


गिलोय GILOY एकमात्र औषधी जो प्रत्येक प्रक्रति के मनुष्य को प्रत्येक रोग में दी जा सकती हैं ,यही कारण हैं कि यह औषधी "अमृता" के नाम से भी पहचानी जाती हैं ।

ज्वर होनें  पर गिलोय से फायदे :::


गिलोय में ज्वर नाशक गुण बहुत विशिष्ट होतें हैं, यह औषधी जीर्ण ज्वर और टाइफाइड़ में बहुत उत्तम  लाभ प्रदान करती हैं।


जीर्ण ज्वर और टाइफाइड़ ज्वर में  तुलसी ,वनकशा,खूबकला और गिलोय को समभाग में मिलाकर इसका क्वाथ  बनाकर पिलानें से शीघ्र आराम मिलता हैं ।

गिलोय GILOY का घनसत्व निकालकर त्रिफला चूर्ण के साथ सेवन करवानें से टाइफाइड़ ज्वर में उत्तम लाभ प्राप्त होता हैं ।

यकृत रोगों में गिलोय से फायदे :::


पीलिया,भूख की कमी, लीवर  पर सूजन होनें पर गिलोय के रस का सेवन पतासे या गन्नें के रस के साथ करवानें से आशातीत लाभ प्राप्त होता हैं । 

गिलोय यकृत में मौजूद विषैले तत्वों को शरीर से बाहर निकाल देती हैं । अत :इसके सेवन से पीलिया रोग में बहुत तीव्र गति से लाभ मिलता हैं ।

रक्तविकारों में गिलोय से फायदे ::: 

गिलोय के पत्तों या डंठल का सेवन करनें से अशुद्ध रक्त साफ होकर शुद्ध रक्त में परिवर्तित हो जाता हैं ।और अशुद्ध रक्त से होनें वाले फोड़े फुन्सी और खुजली नही होती हैं ।   

इसी प्रकार शरीर में लाल रक्त कणों के घनत्व को बढानें में गिलोय बहुत उत्तम लाभ प्रदान करती हैं ।


मूत्र विकारों  में गिलोय GILOY से फायदे ::: 

पेशाब में जलन, मूत्रमार्ग में संक्रमण तथा बार - बार पेशाब जानें की समस्या होनें पर गिलोय क्वाथ  या गिलोय घनवटी लेनें से आराम मिलता हैं ।

 मधुमेह में गिलोय से फायदे :::


गिलोय मधुमेह के उपचार की सबसे प्रभावी औषधी हैं । गिलोय का रस 5 - 5 ML सुबह शाम लेनें से मधुमेह नियंत्रण  में रहता हैं ।

गिलोय घनवटी या गिलोय के डंठल का सेवन करनें से इंसुलिन लेनें वाला व्यक्ति भी मधुमेह को शीघ्र नियंत्रित कर सकता हैं ।

विष के प्रभाव पर गिलोय से फायदे :::

विषैली वस्तु खा लेनें पर गिलोय GILOY के रस को पानी में मिलाकर बार - बार उल्टी करवानें से विष का प्रभाव उतर जाता हैं ।     

बिच्छू  के काटनें पर इसकी जड़ का काढ़ा प्राथमिक उपचार के तौर पर पीला सकतें हैं ।



गठिया रोगों में गिलोय के फायदे :::


इसके तनों का रस या क्वाथ बनाकर गठिया रोग में देनें से पुरानी और असाध्य गठिया की बीमारी ठीक की जा सकती हैं।


स्त्री रोगों  में गिलोय के फायदे :::


स्त्रीयों की आम समस्या जैसें श्वेत प्रदर में गिलोय का रस 30 ML और अश्वगंधा चूर्ण 2 ग्राम  के साथ मिलाकर स्त्री को सुबह शाम गाय के दूध के साथ सेवन करवानें से श्वेत प्रदर खत्म हो जाता हैं ।   


इसी प्रकार प्रसूती के बाद यदि प्रसूता को  गिलोय क्वाथ का सेवन करवाया जाये तो प्रसूति के बाद होने वाली कमजोरी, बुखार नहीं होता हैं ।

पागलपन का इलाज :::


गाय के दूध की बनी खीर में 5 - 5 ग्राम ब्राम्ही की जड़ और गिलोय चूर्ण मिलाकर पागल व्यक्ति को या मंदबुद्धी व्यक्ति को रात को सोतें समय सेवन करवातें हैं,तो व्यक्ति अतिशीघ्र पागलपन से निजात पा जाता हैं ।     

हिचकी में गिलोय से फायदे :::


गिलोय चूर्ण के साथ सौंठ का चूर्ण मिलाकर सूंघनें से हिचकी बंद हो जाती हैं ।

पाँव के तालुओ की जलन :::


गिलोय के और रतनजोत के पंद्रह बीस बीज कूटकर दही में मिलाकर तलुओं में लगानें से तलुओं की जलन तुरंत मिटती हैं।


कान के दर्द में गिलोय के फायदे :::


कान में दर्द रहनें पर गिलोय के पत्तों का  रस निकालकर गर्म कर ले  इस तरह यह रस थोड़ा कुनकुना रह जानें पर कान में 3 - 4 बूँद ड़ालें कान का दर्द और कान में मैल जमा हो जानें पर बहुत आराम मिलता हैं । 

रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ानें में गिलोय के फायदे :::


शरीर की रोग प्रतिरोधकता  बढ़ानें में गिलोय से अच्छी कोई दूसरी औषधी वनस्पती जगत में नही हैं, इसके लिये गिलोय के 10 -15 ऊंगली बराबर ताजे तनें को काटकर 10 -15 काली मिर्च ,25 - 30 तुलसी पत्तें ,आधी चम्मच  हल्दी और एक अदरक के टुकड़ें के साथ 500 Ml   पानी में मिलाकर तब तक उबालें जब तक की पानी आधा न रह जावें ।

इस काढ़े की 30ML की मात्रा प्रतिदिन  सुबह के समय नाश्ता करनें के बाद सेवन करें यह उपाय व्यक्ति की प्रतिरोधकता को बढ़ानें वाला रामबाण उपाय हैं ।

श्वास रोग में गिलोय के फायदे ::


गिलोय में मोजूद एंटीइन्फ्लेम्टरी तत्व श्वसन तंत्र की सूजन को कम करतें हैं जिससे अस्थमा,कोविड 19,टीबी ,खाँसी आदि बीमारियों में आराम मिलता हैं ।




गुडूची कटुका तिक्ता स्वादुपाका रसायनी कामलाकुष्ठवातास्त्रज्वरक्रिमिवमीन्हरेत्
 An rejuventor,anti-pyretic,astringent

Giloy or guduchi is a well known Indian bitter and prescribed mainly for fevers and diabetes. It is an astringent, anti-pyretic ,rejuventor,blood-purifier,antispasmodic and antiinflammatory. Highly digestible and nutritive starch obtained from the stem part is given to the patients with very poor digestion.


It checks successfully the microbes responsible for tuberculosis. In ayurveda the drug is given with black piper longum roots and ginger for improving the digestion.In migraine it is given with honey and for vaginal inflammation, its decoction in combination with triphla and baliospermum montanum in recommended. It is increasing body immunity.


Description::-

Large deciduous climbers with lenticellate,corky stems,branches sending down slender pendulous,fleshy roots,leaves deeply cordate with large basal lobes,inflorescence racemose male flowers clustered in the axils of small subulate bracts sepals 2 seriate,inner broadly elliptical petals 6,equal.female flowers usually solitary,similar to male,carpels3.fruits drupelets pisiform,deep red, marked with a sub basal stylar scar.


Active ingredients::-

Giloin,Giloinin.

Therapeutic uses::-


1.In the cure of arthritis, 

rheumatism,piles,leprosy, dyspepsia.
2.In fever and flu.

3.To inhibit hyper glycemia and reduce blood sugars.

4.As liver stimulant.

5.Memory enhancer.

6.Filaria Guduchi svarasa along with gingly oil is given orally.

Dosage::-

As directed by the physicians.
Svyas845@gmail.com




















23 दिस॰ 2019

एंकेलोसिंग स्पॉन्डिलाइटिस Ankylosing Spondylitis

   

*एंकेलोसिंग स्पॉन्डिलाइटिस*, जिसे कभी-कभी "स्पॉन्डिलोअर्थराइटिस" कहा जाता है, गठिया का एक रूप है जो आम तौर पर रीढ़ की हड्डी में होता है, हालांकि यह अन्य जोड़ों को भी प्रभावित कर सकता है। वास्तव में, "स्पॉन्डिलाइटिस" शब्द संबंधित बीमारियों के समूह से जुड़ा हुआ है जिनकी प्रगति और लक्षण तो समान हैं, लेकिन ये बीमारियां शरीर के विभिन्न क्षेत्रों को प्रभावित करती हैं।

यह कशेरुक (वर्टिब्रे: कई कशेरुक मिल कर रीढ़ की हड्डी बनाती हैं) की गंभीर सूजन का कारण बनती है जो अंततः गंभीर पीड़ा और अक्षमता का कारण बनती है। कई गंभीर मामलों में, सूजन के कारण रीढ़ की हड्डी पर एक नई हड्डी बन सकती है (बोन स्पर)। इससे शारीरिक विकृति भी हो सकती है। इसमें, पीठ में कशेरुक एक साथ फ्यूज हो जाते हैं जिससे कूबड़ होता है और लचीलेपन में कमी आती है। कुछ मामलों में, इससे पसलियां भी प्रभावित होती हैं जिससे सांस लेने में कठिनाई हो सकती है। स्पॉन्डिलाइटिस महिलाओं की तुलना में पुरुषों को अधिक प्रभावित करता है।

🔹 *Ankylosing Spondylitis के लक्षण


▪सुबह उठते ही कमर में अकड़न

खराब मुद्रा होना।

▪भूख में कमी, हल्का बुखार, वजन घटना।

▪कूल्हों के जोड़ों में दर्द, कंधों के जोड़ों में दर्द।

▪रीढ़ के आधार और श्रोणि (पेल्विस) के बीच के जोड़ में दर्द।

▪कमर के निचले हिस्से के कशेरुक में दर्द।

▪एड़ी के पीछे (जहां नसें और लिगामेंट जुड़ते हैं) दर्द

▪छाती की हड्डी और पसलियों के बीच उपास्थि (कार्टिलेज) में दर्द।

▪ऐसा दर्द जो आराम करते समय या सुबह उठते ही बढ जाता है और शरीरिक क्रियाओं और व्यायाम करने से कम हो जाता है।

▪रीढ़ की हड्डी के लचीलेपन का लगातार घटते जाना और अकड़न महसूस होना।

▪हड्डियों का अत्यधिक बढ़ना, जिसे आमतौर पर बोनी फ्यूजन कहा जाता है, जो दैनिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है।

*डॉक्टर को कब दिखाएं



अगर आपको निचली पीठ या कूल्हों में दर्द होता है जो सुबह बढ़ जाता है और उससे रात सोने में भी परेशानी रहती है तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।

🔹 *Ankylosing Spondylitis के कारण


अधिकांश स्पॉन्डिलाइटिस से ग्रस्त लोगों में  *(HLA-B27)* नामक जीन पाया जाता है। यद्यपि इस जीन वाले लोगों को स्पॉन्डिलाइटिस होने की आशंका अधिक होती है, लेकिन यह ऐसे में भी पाया जाता है जिनमें ये जीन नहीं होता।

यह विकार अनुवांशिक होता है, इसलिए इसके होने में जेनेटिक्स भी एक भूमिका निभाते हैं। यदि किसी व्यक्ति के परिवार में इस बीमारी का इतिहास है तो उसे स्पॉन्डिलाइटिस से पीड़ित होने की अधिक आशंका रहती है।

*जोखिम कारक


▪ *आयु :* Ankylosing Spondylitis ज्यादातर किशोरों और युवा वयस्कों को होता है।
▪ *आनुवंशिकता :* स्पॉन्डिलाइटिस से ग्रस्त अधिकांश लोगों में *HLA-B27* (ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन) जीन पाया जाता है। हालांकि, कई मामलों में ये जीन न होने वाले लोगों को भी स्पॉन्डिलिटिस से ग्रस्त पाया गया है।
▪ *लिंग :* महिलाओं की तुलना में पुरुषों को ये बीमारी होने की अधिक आशंका रहती है।

🔹 *Ankylosing Spondylitis से बचाव


▪स्वस्थ आहार खाएं।

▪शरीर का वजन सामान्य बनाए रखें।

▪हमेशा चुस्त रहें।

▪व्यायाम करें क्योंकि उससे से लचीलापन बना रहता है।

🔹 *Ankylosing Spondylitis का परीक्षण


▪पीठ और श्रोणि (पेल्विस) का एक्स-रे

▪एमआरआई स्कैन

▪किसी भी सूजन का पता करने के लिए एरिथ्रोसाइट

सेडीमेंटेशन रेट (erythrocyte sedimentation rate) नामक रक्त परीक्षण भी किया जा सकता है।

▪प्रोटीन *एचएलए-बी 27* का पता करने हेतु रक्त परीक्षण भी किया जा सकता है। हालांकि, एचएलए-बी 27 परीक्षण का मतलब यह नहीं है कि आप स्पॉन्डिलाइटिस से ग्रस्त हैं। यह केवल ये निर्धारित करता है कि आपके शरीर में इस प्रोटीन का उत्पादन करने वाला जीन मौजूद है।

🔹 *Ankylosing Spondylitis के जोखिम और जटिलताएं


यदि स्पॉन्डिलाइटिस का इलाज नहीं किया जाता है, तो निम्न जटिलताएं हो सकती हैं :

▪गंभीर व अत्यधिक सूजन के कारण कशेरुका एक साथ फ्यूज हो सकती हैं।

▪कूल्हों और कंधों सहित सूजन पास के जोड़ों में फैल सकती है।

▪सूजन लिगमेंट और टेंडन (नसों) में फैल सकती है, जिस से लचीलापन प्रभावित हो सकता है।

▪सांस लेने मे तकलीफ होना।

▪दिल, फेफड़े, या आंत्र को क्षति होना।

▪रीढ़ की हड्डी में संपीड़न फ्रैक्चर भी हो सकता है।

दुर्लभ और गंभीर मामलों में, स्पॉन्डिलाइटिस महाधमनी (aorta), जो हृदय से जुड़ी बड़ी धमनी है, को भी प्रभावित कर सकता है। सूजी हुई महाधमनी दिल को क्षति पहुंचा सकती है।
♻♻♻♻♻♻♻♻♻♻♻♻


० निर्गुण्डी


19 दिस॰ 2019

धनिया के फायदे । DHANIYA KE FAYDE

धनिया के फायदे।Dhaniya ke fayde

#१.धनिया का संस्कृत नाम क्या हैं ?

धनिये को संस्कृत में धन्याक,धनिक, धन्य,कुस्तुम्बरू,तथा ध्यगन्धा नामों से जानतें हैं।
 

#२.धनिया का लेटिन नाम क्या हैं ?

coriandrum sativum

३.धनिया का अँग्रेजी नाम क्या हैं ?

Coriander 

४.धनिया की प्रकृति 

आयुर्वेद मतानुसार धनिया स्निग्ध,कसैला,उष्णवीर्य,जठराग्नि को बढ़ानें वाला और त्रिदोष नाशक होता हैं। 


धनिया विटामीन‌ ए, विटामीन C,विटामीन K,फोलेट पोटेशियम, मैंगनीज और बीटा केरोटिन का बहुत उत्तम स्रोत हैं ।



धनिया के फायदे
धनिया




धनिया के बारें संस्कृत  में श्लोक है -

धान्यकंचाजगन्धासुमुखाश्वेतिरोचना: ।सुगन्धानातिकटुकादोषानुत्क्लेशयन्तितु  ।।

अर्थात धनिया सुगन्धित और त्रिदोष को उखाड़ने वाला हैं।

५.आँखों के रोग में धनिया के  फायदे Dhaniya KE fayde :::


आँखों में जलन होनें और आँखें दर्द करनें पर साबुत धनिया के बीजों को कूट ले और इन्हें पानी में उबालकर कपड़ें से छान लें ।इस पानी से आँखों को धोयें इस प्रकार  आँखों को धोनें से उपरोक्त समस्या में बहुत आराम मिलता हैं ।

धनिया में विटामीन A प्रचुरता में मिलता हैं,इसकी हरी पत्तियों को कच्चा खानें से  आँखों की रोशनी बढ़ती हैं।

६.बवासीर में धनिया के फायदे :::


साबुत धनिया के बीजों को मिश्री मिलाकर खिलानें से बवासीर में निकलनें वाला खून बंद हो जाता हैं ।

७.दस्त में धनिया के फायदें :::


दस्त होनें पर धनिया बीज १०० ग्राम  की मात्रा में लेकर इन्हें भून लें ,इस तरह भूनें हुये धनियें को ३ - ४ बार तब तक दें जब तक दस्त में राहत न मिलें ।     

८.गले की खराश में धनिया के फायदें :::

साबुत धनिया के बीजों को चबानें और इसके बीजों को कूटकर मिश्री के साथ खानें से गले की खराश समाप्त हो जाती हैं ।

९.गंजापन में धनिया के फायदे :::

धनियें के सूखे  पत्तों का चूर्ण बनाकर इसे सिरके के साथ मिलाकर सिर पर लेपन करनें और सिर पर लेपन के १५ मिनिट बाद स्नान करने  से गंजापन की समस्या दूर होती हैं ।

१०. ज्वर में धनिया के फायदे :::

साबुत धनिया के बीजों को सादे पानी में डालकर कुछ घँटों के लियें रख दें और यह पानी ज्वर प्रभावित व्यक्ति को पीलायें ।ऐसा करनें से ज्वर  में होनें वाली शरीर की जकड़न दूर होती हैं ।और ज्वर में ली जानें वाली गर्म  दवाईयों का दुष्प्रभाव समाप्त होकर एँटासिड़ दवाईयों की जरूरत नहीं पड़ती हैं ।

• बुखार आने पर घबराएं नहीं :: सावधानी रखें और जिम्मेदार बनें


 ११. सिरदर्द में धनिया के फायदें ::: 

धनिया के बीजों और आँवलें के चूर्ण को भीगोंकर कपड़े से छान ले इस प्रकार इसका पानी थोड़ी - थोड़ी मात्रा में पीतें रहनें से पुरानें से पुराना सिरदर्द कुछ ही दिनों में बंद हो जाता हैं । 

१२.गर्भावस्था की उल्टी में धनिया के फायदें ::

१०० ग्राम  धनिया बीज को आधा लीटर पानी में तब तक उबालें जब तक की पानी एक चौथाई रह जायें ।इस मिश्रण में चावल का माँड़ और मिश्री मिलाकर थोड़ी - थोड़ी मात्रा में गर्भवती  स्त्री को पीलानें से गर्भावस्था की उल्टी में आराम मिलता हैं । 

१३.जोड़ों के दर्द में  धनिया के फायदे :::

धनिया बीजों के चूर्ण चार चम्मच  लेकर उसमें हल्दी एक चम्मच  मिलाकर रात को खानें से जोड़ों का दर्द समाप्त हो जाता हैं ।

१४.पाचनशक्ति बढ़ानें में धनिया के फायदे :::

३ चम्मच  धनिया और एक चम्मच   सोंठ पावड़र मिलाकर 250 मिलीलीटर  पानी में रातभर भीगों दे, इस मिश्रण को छानकर सुबह - शाम 50 - 50 मिलीलीटर लें । यह पाचनशक्ति बढ़ानें वाली अचूक   दवा हैं ।


१५.नकसीर में धनिया के फायदे :::

हरे धनिया की पत्तियों को पीसकर इसका रस निकाल लें इस तरह इस रस को नकसीर होनें पर एक दो बूँद नाक में टपकानें से नकसीर में राहत मिलती हैं ।


१६.पेट की गैस में धनिया के फायदें :::

धनिया की चटनी बनाकर इसमें सैंधा नमक मिलाकर खानें से पेट की गैस समाप्त हो जाती हैं । 

१७.थायराइड़ में धनिया के फायदे 

थायराइड़ आजकल की जीवनशैली की एक आम बीमारी हैं । थायराइड़ चाहें हाइपो हो या हाइपर दोनों प्रकार में धनिया आशातीत लाभ प्रदान करता हैं । धनिया थायराइड़ ग्रन्थी की कार्यप्रणाली को सुधारकर व्यक्ति को स्वस्थ्य बनाये रखता हैं ।


धनिये की चटनी बनाकर खानें से थायराइड़ ग्रंथि की कार्यप्रणाली सुधर जाती हैं ।


इसी प्रकार एक छोटा चम्मच साबुत धनिया बीज रात को पानी में भिगोकर रख दें सुबह खाली पेट इस पानी को पीनें से थायराइड़ ग्रंथि ठीक होकर सही मात्रा में थायराक्सिन हार्मोन का उत्सर्जन करती हैं ।


धनिया इसके अतिरिक्त शरीर से उत्सर्जित हार्मोन को नियंत्रित करने का काम करता हैं ।


  

11 वी शताब्दी से सन 2020 तक भारत पर शासन करनें वालें व्यक्तियों के नाम

  11 वी शताब्दी से सन 2020 तक भारत पर शासन करनें वालें व्यक्तियों के नाम  :::

सन् 2020 तक भारत पर शासन करनें वाले व्यक्ति
 Narendra modi

*गौरी शासन*

1.1193 मोहम्मद गौरी

2.1206 कुतुबुद्दीन ऐबक

3.1210 आराम शाह

4. 1211 अलतत्मिश

5.1236 रुकनुद्दीन फीरोज शाह

6. 1236 रज़िया सुल्तान

7 1240 मुईजुद्दीन बहराम शाह

8.1242 अलाउद्दीन मसूद शाह

9.1246 नासिरुद्दीन मोहम्मद

10.1266 ग़्यासुद्दीन बल्बन

11.1286 रंगखुसरु

12.1287 मजदुद्दीन

13..1290 शम्सुद्दीन

 गौरी शासन समाप्त

 (शासन काल 97 वर्ष लगभग)

*" ख़िलजी शासन

1.1290 जलालुद्दीन फीरोज शाह ख़िलजी

2.1292 अलाउद्दीन ख़िलजी

3 . 1316 शाहबुद्दीन उमर शाह

4.1316 क़ुतुबुद्दीन मुबारक शाह

5.1320 नासिरुद्दीन खुसरु शाह

(ख़िलजी शासन समाप्त)
( शासन काल 30 वर्ष लगभग)

*तुगलक़ शासन


1.1320 ग़्यासुद्दीन तुगलक़

2.1325 मोहम्मद पुत्र तुगलक़

3.1351 फीरोज शाह तुगलक़

4.1388 ग़्यासुद्दीन तुगलक़ ( द्धित्तीय)

5.1389 अबु बकर  शाह

6. 1389 मोहम्मद तुगलक़ (तृतीय)

7.1394 अलेक्जेंडर

8.1394 नासिरुद्दीन शाह

9.1395 नुसरत शाह

10.1399 नासिरुद्दीन मोहम्मद  (व्दितीय)

11.1413 दौलत शाह

* तुगलक़ शासन समाप्त*

(शासन काल 94 साल लगभग)

*सईद  शासन


1.1414 खिज्र ख़ान

2.1421 मुईजुद्दीन मुबारक शाह (
द्धित्तीय)
3.1434  मोहम्मद शाह (चतुर्थ)

4.1445  अलाउद्दीन आलम शाह

*सईद शासन समाप्त

 *लोधी शासन


1.1451 बहलाल  लोधी

2.1489 अलेक्जेंडर लोधी(
 द्धित्तीय)

3.1517 इब्राहिम लोधी

लोधी शासन काल समाप्त
(शासन काल 75 वर्ष लगभग)

*मुगल शासन


1.1526 जहीरुद्दीन बाबर

2.1530 हुमायूँ

( मुगल शासन काल समाप्त)

*सूरी शासन


1.1539 शेर शाह सूरी

2.1545 इस्लाम शाह सूरी

3.1552 महमूद शाह सूरी

4.1553 इब्राहिम सूरी

5.1554 परवेज़ शाह सूरी

6.1554 मुबारक खान सूरी

7.1555 अलेक्जेंडर सूरी

(सूरी शासन काल समाप्त)

(शासन काल 16 साल लगभग)

*मुगल शासन(द्धित्तीय काल)

1. 1555 हुमायूँ (द्धित्तीय समय)

2.1556 जलालुद्दीन अकबर

3.1605 जहाँगीर सलीम

4.1628 शाह जहां

5.1659 औरंगजे़ब

6.1707 शाह आलम

7.1712 बहादुर शाह

8.1712 जहां दार शाह

9.1219 फररूख शाह

10.1719 रफीउद दराजात
11.1719 शाह जहां ( द्धित्तीय)

12.1719 महमूद शाह

13.1748 अहमद शाह

14.1754 आलमगीर

15.1759 शाह आलम

16.1806 अकबर शाह

17.1837 बहादुर शाह ज़फर

( मुगल साम्राज्य समाप्त)

(शासन काल 315 वर्ष लगभग)

*बिर्टिश साम्राज्य

1.1858 लाँर्ड  केनिंग

2.1862 लाँर्ड जेम्स ब्रूस

3.1864 लाँर्ड जाँनलाँरेन्स

4.1869  लाँर्ड रिचर्ड्मेव

5. 1872 लाँर्ड नाँर्थब्रुक

6.1876  एडवर्ड  लिटृन

7. 1880 लाँर्ड जाँर्ज् रिपन

8.1884 लाँर्ड  डफरिन

9.1888 लाँर्ड हनी लेसिड्वन

10.1894 लाँर्ड ब्रूस

11.1899  लाँर्ड जाँज क्रिश्चन

12.1905 लाँर्ड गुल्डवर्ड मिन्टू

13.1910  लाँर्ड चार्लिस हर्ट्ज

14.1916 लाँर्ड फ्रीडरक

15.1921 लाँर्ड रक्स

16.1926 लाँर्ड एड्वर्ड आर वन

17.1931 लाँर्ड विलिंग्डन

18.1936 लाँर्ड विक्टर होप

19.1943 लाँर्ड अर क्वार्ल्ड विवेल

20.1947 लाँर्ड माउंटन बेटन

( ब्रिटिश साम्राज्य समाप्त)

🇮🇳🇮🇳*भारत प्रधानमंत्री🇮🇳🇮🇳

1.1947 जवाहरलाल नेहरू

2. 1964 गुलजारीलाल नंदा

31964 लाल बहादुर शास्त्री

4.1966 गुलजारीलाल नंदा

5 1966 इंदिरा गांधी

6.1977 मोरार जी देसाई

7.1979 चौधरी चरण सिंह

81980 इंदिरा गांधी

9.1984 राजीव गाँधी

10.1989 विश्व नाथ प्रताप सिंह

 11.1990 चंद्र शेखर

12.1991 नरसिंह राव

13.1996 अटल बिहारी वाजपेयी

14 1996 एच. डी. देवगौड़ा

15.1997 इंद्र कुमार गुज़राल

16.1998 अटल बिहारी वाजपेयी

17.2004 मनमोहन सिंह

18.2014 नरेंद्र मोदी

० क्रिकेट अतीत से वर्तमान


० अटल बिहारी वाजपेयी


० साम्प्रदायिक सद्धभाव भारत का मूलभाव


० मध्यप्रदेश सामान्य अध्ययन


17 दिस॰ 2019

नीम के औषधीय उपयोग

नीम के औषधीय उपयोग 

नीम सम्पूर्ण भारत में पाया जानें वाला महत्वपूर्ण औषधीय उपयोग वाला वृक्ष हैं ।यह जनसमाज के काम आनें वाली सबसे महत्वपूर्ण घरेलू दवा हैं ।नीम का औसत जीवन काल डेढ़ सौ से 200 वर्ष तक का होता है और औसत ऊंचाई 15 से 20 मीटर तक की होती है।प्राचीन आयुर्वेद शास्त्र में नीम का प्रयोग लगभग 5000 वर्ष पूर्व से ही हो रहा है।


नीम के औषधीय उपयोग
नीम


नीम का संस्कृत नाम क्या हैं Neem ka Sanskrit Nam kya hai :::


नीम का  संस्कृत  नाम निम्ब,नियमन,अरिष्ट,हिंगु,पीतसार और रविप्रिय  हैं ।
 

नीम का अँग्रेजी नाम Neem ka angreji Nam :::


नीम का अंग्रेजी या इंग्लिश नान Indian lilac हैं ।

नीम का लेटिन नाम क्या हैं  Neem ka Latin nam kya hai :::


 नीम का लेटिन नाम   Azadirachta Indica हैं ।

आयुर्वेदमतानुसार नीम की प्रकृति कैसी हैं ?

आयुर्वेदमतानुसार नीम हल्का ,शीतल, और कटु(कड़वा) होता हैं ।


नीम के औषधीय उपयोग :::

१.मलेरिया ज्वर ::

३० ग्राम नीम की छाल कूटकर २५० मिलीलीटर  पानी में तब तक उबालें जब तक पानी १०० मिलीलीटर के करीब रह जायें ।इस प्रकार उबले काढ़े को दिन में 3 बार पीलानें से मलेरिया ज्वर बहुत लाभ मिलता हैं ।

२.चर्म रोगों में नीम के औषधीय उपयोग ::: 

० लम्बें समय से न भरनें वाले घावों पर नीम की छाल को घीसकर घावों पर लगानें से घाव अतिशीघ्र भरता हैं।   

० नीम की पत्तियों  का रस ,सरसो का तेल और हल्दी  मिलाकर गर्म करले ठंड़ा होनें पर इस मिश्रण में कर्पूर थोड़ी मात्रा में    यह मिश्रण सोरायसिस,दाद वाली खुजली और पित्ती उछलनें का प्रभावी उपचार हैं ।

० नीम के पत्तों का रस और देशी गोमूत्र समभाग मिलाकर सफेद दाग पर लगा लें,और १५ मिनिट धूप में बैंठ जायें बहुत ही आशातीत परिणाम मिलेंगें ।  

० नीम के कोपल खानें से दूषित रक्त के कारण होनें वाले फोड़े फुन्सी नही होतें हैं ,और रक्त शुद्ध होता हैं ।   

३.बालों की समस्या में नीम के औषधीय उपयोग ::


० सिर में रूसी ,जुएँ होनें पर नीम के तेल में कर्पूर  मिलाकर बालों में हल्के हाथों से मालिश करें कुछ दिन यह प्रयोग लगातार करनेें से सिर में रूसी खुश्की और जुएँ होनें की समस्या समाप्त हो जाती हैं ।


४.दमा होनें पर नीम का औषधीय उपयोग :::


० नीम का शुद्ध तेल पान के पत्तों पर ५० - ६० बूँद लगाकर खानें से गर्मी के मौसम में होनें वाली  दमें की समस्या में राहत मिलती हैं ।    

५.कर्ण रोगों में नीम के औषधीय उपयोग :::


० नीम के तेल में शहद मिलाकर कान में डालनें से बहरापन,टीनीटस और कान के बहनें में आराम मिलता हैं ।

 ६.रूके हुयें मासिक धर्म को खोलनें का नीम का औषधीय उपयोग :::



० नीम की छाल १०० ग्राम  ,पुराना गुड़ १०० ग्राम  और जल आधा लीटर इस मिश्रण  को  तब तक उबाले जब तक की मिश्रण एक चौथाई न रह जायें।


इस मिश्रण को दिन में दो बार पीलानें से मासिक धर्म खुलकर आता हैं । 

७.लकवे में नीम का औषधीय उपयोग :::


० नीम के तेल को लकवा प्रभावित भाग पर दिन में ३ बार मालिश करनें से लकवा रोगी अतिशीघ्र ठीक होता हैं ।

 ०८.दाँतों की समस्या होनें पर नीम के औषधीय उपयोग :::


० नीम की नर्म मुलायम टहनियों से दातुन करनें वाले व्यक्ति के दाँत सुंदर,ताकतवर और सदैव कीड़े रहित होतें हैं ।     



०९.पेट के कीड़े होनें पर नीम के औषधीय उपयोग :::


० बच्चों या बड़ों के पेट में कीड़ें हो गयें हो तो नीम की पत्तियों का रस निकालकर २ - ३ चम्मच खाली पेट पीलानें से पेट के कीड़े बाहर आ जातें हैं ।


१०.सौन्दर्य प्रसाधन  के रूप में नीम के औषधीय उपयोग :::

० मुलतानी मिट्टी multani mittiके साथ मिलाकर नीम की पत्तियों के चूर्ण को चेहरें पर लगानें से चेहरें की झाइयाँ,साँवलापन ,और कील मुहाँसे दूर होकर चेहरा कांतिमय बन जाता हैं । 


० नीम में विटामिन और फैटी एसिड पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं जो त्वचा को नाम रखते हैं। सर्दियों में त्वचा यदि फट रही हो तो नीम का तेल और खोपरे का तेल मिलाकर लगाने से त्वचा नहीं फटती है


११.लू लगनें पर नीम का औषधीय उपयोग :::


० लू लगनें या शरीर में दाह उत्तपन्न होनें पर नीम की पत्तियों  का रस ३ -४चम्मच मिश्री के साथ मिलाकर पिलानें से अतिशीघ्र आराम मिलता हैं ।

इसी प्रकार   मूत्र मार्ग की जलन रोकनें में नीम की पत्तियों का रस ,सौंफ और मिश्री   मिलाकर पिलानें से मूत्र मार्ग की जलन समाप्त हो जाती हैं ।   

इसके अलावा नीम जनसामान्य के प्रतिदिन काम आनें वाला अनुपम Health प्रदान  करनें वाला चमत्कारिक औषधीय वृक्ष हैं।

गाँवों में आज भी वर्षभर  अनाज भँडारण हेतू नीम की पत्तियों का प्रयोग बहुतायत में होता हैं,नीम की पत्तियों से सुरक्षित अनाज स्वास्थ्यप्रद ,रासायनिक प्रभावों  से मुक्त और अपने मूल स्वरूप  का होता हैं ।

आजकल नीम की बनी हुई खाद,दवाईयाँ किसानों की जेब और मिट्टी की सेहत को उपजाऊ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं ।  


13 दिस॰ 2019

प्याज (ONION) खानें के फायदे। pyaj khane ke fayde

प्याज खाने के फायदे pyaj khane ke fayde 


प्याज खाने के फायदे pyaj khane ke fayde
प्याज 



 

प्याज का संस्कृत नाम :::



प्याज का संस्कृत नाम pyaj ka sanskrit name पलांडु ,भवनेष्ट,मुखदुषक,कृमिघ्न



प्याज का हिन्दी नाम :::

प्याज को हिंदी में प्याज,कांदा,लाल प्याज आदि नामों से जानतें हैं ।



प्याज का लेटिन नाम pyaj ka Latin Nam :::



Allium cepa प्याज का लेटिन नाम "एलियन सीपा" हैं।

प्याज खाने के फायदे pyaj Khane ke fayde  :::



आयुर्वेदानुसार प्याज चरपरी,बलकारक,पित्तनाशक,भारी,रोचक,स्निग्ध और वमन के दोष को शांत करने वाला हैं ।


प्याज  स्वादिष्ट ,ठंडा,कफ कारक, वातनाशक,बलकारक,वीर्यवर्धक और भारी रहता हैं ।


लाल प्याज  ठंड़़ा,पित्तशामक, और अत्यंत निद्राकारक, होता हैं ।

प्याज के बीज pyaj ke bij प्रमेह ( मधुमेह )दाँतों के कीड़े,श्वास को दूर करने वाले होतें हैं ।


पूर्णत: पका हुआ प्याज आँतों की कार्यप्रणाली में सुधार लाकर खुलकर दस्त लाता हैं । और पाचनशक्ति मज़बूत करता हैं ।


प्याज का सलाद pyaj ka salad khane se  खानें से कब्ज,अर्श,भगंदर की समस्या जड़ से समाप्त हो जाती हैं ।


प्याज का रस pyaj ka ras निकालकर पीनें से मूत्र की जलन ,प्यास  और शरीर की जलन पूरी तरह समाप्त हो जाती हैं ।


पित्त रोगों में  प्याज का सेवन करने से pyaj ka sevan karne se दूषित पित्त दस्त के साथ शरीर से बाहर निकल जाता हैं ।और नवीन शुद्ध पैदा होकर शरीर को बल प्रदान   करता हैं ।


चर्म रोग जैसें गाँठ,फोड़े फुन्सी,आदि में प्याज  का रस गर्म कर लगानें या प्याज  को घी में सेंककर प्रभावित स्थान  पर बाँधनें से बहुत आराम मिलता हैं ।


प्याज की गाँठ में पाया जानें वाला वाष्पशील प्याज का तेल pyaj ka tel ज्वर नाशक,श्वास कास नाशक ,और सिरदर्द नाशक होता हैं ।


प्याज का रस पेट दर्द,वात रोग आदि में प्रभावकारी साबित होता हैं ।


कच्चा प्याज  खानें से  माहवारी नियमित होती हैं।


जहरीले कीड़े के काटनें पर प्याज का रस मलने से जलन शांत हो जाती हैं ।


कर्णशूल में प्याज  का रस गर्म कर कान में डालनें से कर्णशूल मिट़ जाता हैं । और बहरापन दूर हो जाता हैं ।


 सफेद प्याज safed pyaj का रस आँखों में डालने से नेत्रज्योति बढ़ती हैं और रतौंधी समाप्त हो जाती हैं । 

सफेद प्याज में एंटी इन्फ्लेमेटरी गुण होते हैं और यह शरीर की सूजन दूर करता है, सफेद प्याज खाने से हड्डियों में होने वाला दर्द शीघ्रता से दूर हो जाता है।

सफेद प्याज में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स हमारी कोशिकाओं को नष्ट होने से बचाता है जिससे व्यक्ति जल्दी बुढ़ा नहीं होता हैं।
 

प्याज के रस को नाक में टपकानें से बैहोश व्यक्ति की बैहोशी समाप्त हो जाती हैं । 


नकसीर में प्याज को काटकर बार - बार सूघंनें से नकसीर बँद हो जाती हैं ।


प्याज का रस लू लगनें पर पीलानें और शरीर पर मलनें से लू उतर जाती हैं ।


प्याज का रस पीलानें से गुर्दें की पथरी निकल जाती हैं ।


प्याज का रस pyaj ka ras और सरसों का तेल मिलाकर गठिया रोगी की मालिश करनें से आशातित लाभ प्राप्त होता हैं ।


प्याज का रस और कलोंजी का तेल समान मात्रा में मिलाकर  मसूड़ों और दाँतों पर मलनें से दाँत दर्द,पायरिया,आदि की समस्या समाप्त हो जाती हैं ।


शरीर में किसी ज़गह गाँठ होनें पर प्याज के बीच वाले कंद को निकालकर घी और हल्दी मिलाकर गर्म कर गाँठ पर बाँधनें से गाँठ बैठ जाती हैं ।


 सफेद प्याज safed pyaj बलवर्धक ,वीर्यवर्धक  और बाजीकरण प्रदान करता हैं,इसका नियमित भोजन के साथ सेवन करनें से उपरोक्त लाभ प्राप्त होतें हैं ।  




12 दिस॰ 2019

माँ अन्नपूर्णा जयन्ति कब मनाई जाती हैं जानोगे तो माँ अन्नपूर्णा का आशीर्वाद मिलेगा

कुलदेवी माँ अन्नपूर्णा
 माँ अन्नपूर्णा 
माँअन्नपूर्णा जन्मोत्सव विशेष

〰〰🌼〰〰🌼〰〰

माँ अन्नपूर्णा जन्मोत्सव मागर्शीष मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि के दिन मनाई जाती है। 


जब पृथ्वीं पर लोगों के पास खाने के लिए कुछ नहीं था तो मां पार्वती ने अन्नापूर्णा का रूप रखकर पृथ्वीं को इस संकट से निकाला था। अन्नपूर्णा जयन्ती का दिन मनुष्य के जीवन में अन्न के महत्व को दर्शाता है।


 इस दिन रसोई की सफाई और अन्न का सदुपयोग बहुत जरूरी होता है। माना जाता है कि इस रसोई की सफाई करने और अन्न का सदुपयोग करने से मनुष्य के जीवन में कभी भी धन धान्य की कमीं नही होती। इसलिए अन्न का सदुपयोग अवश्य करना चाहिए।

आज गुरुवार 12-12-19को मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष पूर्णिमा के उपलक्ष में मां अन्नपूर्णा के पूजन व अनुष्ठान का विशेष महत्व है।

ब्रह्मवैव‌र्त्तपुराण के काशी रहस्य अनुसार भवानी अर्थात पार्वती ही अन्नपूर्णा हैं। मार्गशीर्ष माह में इनका व्रत सर्व मनोकामना पूर्ण करने वाला है व इस का वैज्ञानिक महत्व भी है।

इस समय कोशिकाओं के जेनेटिक कण रोग निरोधक होकर चिरायु व युवा बनाने में प्रयत्नशील होते हैं। इन दिनों किया गया षटरस भोजन वर्ष उपरांत स्वास्थ्य वृद्घि करता है।

माँ अन्नपूर्णा
〰〰️〰️〰
अन्नपूर्णा देवी हिन्दू धर्म में मान्य देवी-देवताओं में विशेष रूप से पूजनीय हैं। इन्हें माँ जगदम्बा का ही एक रूप माना गया है, जिनसे सम्पूर्ण विश्व का संचालन होता है। इन्हीं जगदम्बा के अन्नपूर्णा स्वरूप से संसार का भरण-पोषण होता है। 

अन्नपूर्णा का शाब्दिक अर्थ है- 'धान्य' (अन्न) की अधिष्ठात्री। सनातन धर्म की मान्यता है कि प्राणियों को भोजन माँ अन्नपूर्णा की कृपा से ही प्राप्त होता है।

शिव की अर्धांगनी, कलियुग में माता अन्नपूर्णा की पुरी काशी है, किंतु सम्पूर्ण जगत् उनके नियंत्रण में है। बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी के अन्नपूर्णाजी के आधिपत्य में आने की कथा बडी रोचक है। 

भगवान शंकर जब पार्वती के संग विवाह करने के पश्चात् उनके पिता के क्षेत्र हिमालय के अन्तर्गत कैलास पर रहने लगे, तब देवी ने अपने मायके में निवास करने के बजाय अपने पति की नगरी काशी में रहने की इच्छा व्यक्त की।

 महादेव उन्हें साथ लेकर अपने सनातन गृह अविमुक्त-क्षेत्र (काशी) आ गए। काशी उस समय केवल एक महाश्मशान नगरी थी। माता पार्वती को सामान्य गृहस्थ स्त्री के समान ही अपने घर का मात्र श्मशान होना नहीं भाया।

 इस पर यह व्यवस्था बनी कि सत्य, त्रेता, और द्वापर, इन तीन युगों में काशी श्मशान रहे और कलियुग में यह अन्नपूर्णा की पुरी होकर बसे। इसी कारण वर्तमान समय में अन्नपूर्णा का मंदिर काशी का प्रधान देवीपीठ हुआ।

स्कन्दपुराण के 'काशीखण्ड' में लिखा है कि भगवान विश्वेश्वर गृहस्थ हैं और भवानी उनकी गृहस्थी चलाती हैं। अत: काशीवासियों के योग-क्षेम का भार इन्हीं पर है। 'ब्रह्मवैव‌र्त्तपुराण' के काशी-रहस्य के अनुसार भवानी ही अन्नपूर्णा हैं।

 परन्तु जनमानस आज भी अन्नपूर्णा को ही भवानी मानता है। श्रद्धालुओं की ऐसी धारणा है कि माँ अन्नपूर्णा की नगरी काशी में कभी कोई भूखा नहीं सोता है। अन्नपूर्णा माता की उपासना से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। ये अपने भक्त की सभी विपत्तियों से रक्षा करती हैं।

 इनके प्रसन्न हो जाने पर अनेक जन्मों से चली आ रही दरिद्रता का भी निवारण हो जाता है। ये अपने भक्त को सांसारिक सुख प्रदान करने के साथ मोक्ष भी प्रदान करती हैं। तभी तो ऋषि-मुनि इनकी स्तुति करते हुए कहते हैं-

शोषिणीसर्वपापानांमोचनी सकलापदाम्।दारिद्र्यदमनीनित्यंसुख-मोक्ष-प्रदायिनी॥

काशी की पारम्परिक 'नवगौरी यात्रा' में आठवीं भवानी गौरी तथा नवदुर्गा यात्रा में अष्टम महागौरी का दर्शन-पूजन अन्नपूर्णा मंदिर में ही होता है। अष्टसिद्धियों की स्वामिनी अन्नपूर्णाजी की चैत्र तथा आश्विन के नवरात्र में अष्टमी के दिन 108 परिक्रमा करने से अनन्त पुण्य फल प्राप्त होता है। 

सामान्य दिनों में अन्नपूर्णा माता की आठ परिक्रमा करनी चाहिए। प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन अन्नपूर्णा देवी के निमित्त व्रत रखते हुए उनकी उपासना करने से घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती है।

 भविष्यपुराण में मार्गशीर्ष मास के अन्नपूर्णा व्रत की कथा का विस्तार से वर्णन मिलता है। काशी के कुछ प्राचीन पंचांग मार्गशीर्ष की पूर्णिमा में अन्नपूर्णा जयंती का पर्व प्रकाशित करते हैं।

अन्नपूर्णा देवी का रंग जवापुष्प के समान है। इनके तीन नेत्र हैं, मस्तक पर अ‌र्द्धचन्द्र सुशोभित है। भगवती अन्नपूर्णा अनुपम लावण्य से युक्त नवयुवती के सदृश हैं। बन्धूक के फूलों के मध्य दिव्य आभूषणों से विभूषित होकर ये प्रसन्न मुद्रा में स्वर्ण-सिंहासन पर विराजमान हैं।

 देवी के बायें हाथ में अन्न से पूर्ण माणिक्य, रत्न से जडा पात्र तथा दाहिने हाथ में रत्नों से निर्मित कलछूल है। अन्नपूर्णा माता अन्न दान में सदा तल्लीन रहती हैं।

 देवीभागवत में राजा बृहद्रथ की कथा से अन्नपूर्णा माता और उनकी पुरी काशी की महिमा उजागर होती है। भगवती अन्नपूर्णा पृथ्वी पर साक्षात कल्पलता हैं, क्योंकि ये अपने भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करती हैं।

 स्वयं भगवान शंकर इनकी प्रशंसा में कहते हैं- "मैं अपने पांचों मुख से भी अन्नपूर्णा का पूरा गुण-गान कर सकने में समर्थ नहीं हूँ। यद्यपि बाबा विश्वनाथ काशी में शरीर त्यागने वाले को तारक-मंत्र देकर मुक्ति प्रदान करते हैं, तथापि इसकी याचना माँ अन्नपूर्णा से ही की जाती है। गृहस्थ धन-धान्य की तो योगी ज्ञान-वैराग्य की भिक्षा इनसे मांगते हैं-

अन्नपूर्णेसदा पूर्णेशङ्करप्राणवल्लभे।
ज्ञान-वैराग्य-सिद्धयर्थम् भिक्षाम्देहिचपार्वति॥

मंत्र-महोदधि, तन्त्रसार, पुरश्चर्यार्णव आदि ग्रन्थों में अन्नपूर्णा देवी के अनेक मंत्रों का उल्लेख तथा उनकी साधना-विधि का वर्णन मिलता है। मंत्रशास्त्र के सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'शारदातिलक' में अन्नपूर्णा के सत्रह अक्षरों वाले निम्न मंत्र का विधान वर्णित है-

"ह्रीं नम: भगवतिमाहेश्वरिअन्नपूर्णेस्वाहा"

मंत्र को सिद्ध करने के लिए इसका सोलह हज़ार बार जप करके, उस संख्या का दशांश (1600 बार) घी से युक्त अन्न के द्वारा होम करना चाहिए। जप से पूर्व यह ध्यान करना होता है-

रक्ताम्विचित्रवसनाम्नवचन्द्रचूडामन्नप्रदाननिरताम्स्तनभारनम्राम्।नृत्यन्तमिन्दुशकलाभरणंविलोक्यहृष्टांभजेद्भगवतीम्भवदु:खहन्त्रीम्॥

अर्थात 'जिनका शरीर रक्त वर्ण का है, जो अनेक रंग के सूतों से बुना वस्त्र धारण करने वाली हैं, जिनके मस्तक पर बालचंद्र विराजमान हैं, जो तीनों लोकों के वासियों को सदैव अन्न प्रदान करने में व्यस्त रहती हैं, यौवन से सम्पन्न, भगवान शंकर को अपने सामने नाचते देख प्रसन्न रहने वाली, संसार के सब दु:खों को दूर करने वाली, भगवती अन्नपूर्णा का मैं स्मरण करता हूँ।'

प्रात:काल नित्य 108 बार अन्नपूर्णा मंत्र का जप करने से घर में कभी अन्न-धन का अभाव नहीं होता। शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन अन्नपूर्णा का पूजन-हवन करने से वे अति प्रसन्न होती हैं। करुणा मूर्ति ये देवी अपने भक्त को भोग के साथ मोक्ष प्रदान करती हैं। 

सम्पूर्ण विश्व के अधिपति विश्वनाथ की अर्धांगिनी अन्नपूर्णा सबका बिना किसी भेद-भाव के भरण-पोषण करती हैं। जो भी भक्ति-भाव से इन वात्सल्यमयी माता का अपने घर में आवाहन करता है, माँ अन्नपूर्णा उसके यहाँ सूक्ष्म रूप से अवश्य वास करती हैं।

विशेष पूजन विधि: शिवालय जाकर देवी अन्नपूर्णा अर्थात माता पार्वती का विधिवत पूजन करें। गौघृत का दीप करें, सुगंधित धूप करें, मेहंदी चढ़ाएं, सफ़ेद फूल चढ़ाएं। धनिया की पंजीरी का भोग लगाएं तथा किसी माला से इन विशेष मंत्रों का १-१ माला जाप करें।

पूजन मुहूर्त: प्रातः 09:20 से 10:45 तक।

पूजन मंत्र: ह्रीं अन्नपूर्णायै नम॥

विशेषउपाय
〰〰〰〰
यश व किर्ति में वृद्धि हेतु देवी अन्नपूर्णा पर चढ़े मूंग गाय को खिलाएं।

विपत्तियों से रक्षा हेतु देवी अन्नपूर्णा पर चढ़ा नवधान पक्षियों के लिए रखें।

अन्न-धान्य की कमी से बचने हेतु देवी अन्नपूर्णा पर चढ़ा सूखा धनिया किचन में छुपाकर रखें।
पं. संतोष नागर,उज्जैन
9406645446
〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

10 दिस॰ 2019

निर्गुण्डी (INDIAN PRIVETE ) परिचय निर्गुण्डी की पहचान गुण दोष और प्रकृति

 निर्गुण्डी परिचय ::

निर्गुण्डी का संस्कृत नाम ::


 संस्कृत में निर्गुण्डी को नीलपुष्पा, इन्द्राणी  नील निर्गुण्डी,शैफाली,सुरसा सुवाध और श्वेत सुरसा के नाम से जाना जाता हैं । 
Vitex nigundo
 निर्गुण्डी के फूल  




 हिन्दी नाम ::

इसका हिन्दी नाम "निर्गुण्डी" हैं। 



निर्गुण्डी का  लेटिन नाम ::


Vitex Negundo (विटेक्स नेगुण्डों )



 निर्गुण्डी की पहचान कैसे करें  ::    


निर्गुण्डी के वृक्ष ८ से लेकर १० फीट तक ऊँचें होते हैं। इसमें से बहुत सी पतली - पतली शाखाएँ निकली हुई होती हैं। ये शाखाएँ फीकी,सफेद और भस्मी रंग की होती हैं। इसके पत्तें जुड़वाँ और तीन से पाँच पत्तों के समूह में लगे रहते हैं। ये पत्तें सिरों की ओर थोड़े - थोडें रोंऐदार होतें हैं। 



इसके पौधे में से एक तरह की तीव्र और अरूचिकारक गंध आती हैं।


निर्गुण्डी के फूल  एक सीधी रेखा में लगते हैं,इनका रंग नीला सफेद होता हैं।



निर्गुण्डी के फल छोटें -  पकने पर काले हो जाते हैं।    



निर्गुण्डी की दो जातियाँ होती हैं एक सादे पत्ते वाली और दूसरी कंगूरेदार पत्ते वाली । निरगुण्डी की कंगूरेदार पत्ते वाली जाति अधिक प्रभावकारी   और  गुणकारी होती हैं। औषधि के रूप में कंगूरेदार निर्गुण्डी  के पत्ते अधिक उपयोगी होते हैं । 



निर्गुण्डी के गुण दोष और प्रकृति  :::



आयुर्वेद मतानुसार निर्गुण्डी कड़वी,तीखी,कसेली,हल्की ,गर्म, दीपन ,वात नाशक ,वेदनाशामक,कुष्ठघ्न,व्रण  शोधक ,व्रण रोपक,शोधघ्न,कफ निस्सारक,ज्वर नाशक,खाँसी को दूर करने वाली,मूत्रल,आर्तव प्रवर्तक,कृमि नाशक,मज्जा तंतुओं को शक्ति देने वाली,बलवर्धक और रसायन हैं।


निर्गुण्डी का सूजन नष्ट करने वाला वेदनानाशक और वातनाशक गुण बहुत प्रभावशाली हैं। 


किसी भी प्रकार की सूजन चाहे वह शरीर के बाहर हो या अन्दर इस औषधि के सेवन से समाप्त हो जाती हैं।


 नारू रोग में निर्गुण्ड़ी ::


नारू रोग में निर्गुण्ड़ी के पत्ते का स्वरस पिलानें और घाव पर निर्गुण्ड़ी के पत्ते बाँधकर सिकाई करने से लाभ मिलता हैं।



@ कर्ण रोगों में निर्गुण्डी ::  


कान में मवाद पड़ने पर निर्गुण्ड़ी पत्र का स्वरस सिद्ध किये हुये तेल और शहद के साथ मिलाकर कान में ड़ालने से मवाद बनना बंद होकर आराम मिलता हैं।  


कान के बहरेपन में निर्गुण्ड़ी के पत्तों का रस कान में डालनें एँव निर्गुण्डी के पत्तों के रस में शिलाजित मिलाकर देनें से कान का बहरापन समाप्त करने में मदद मिलती है।     


@  चर्म रोगों में ::: 


दाद,खाज़,खुजली,कोढ़ आदि में निर्गुण्ड़ी के पत्तों का काढ़ा बनाकर पिलानें से बहुत आराम मिलता हैं ।



@ फेफड़ों की सूजन में :::


फेफड़ों की सूजन में निर्गुण्डी का स्वरस पिलानें एँव इसके पत्तों को सरसों तेल के साथ गर्म कर फेफड़ों पर बांधनें से बहुत आराम मिलता हैं ।


गले में सूजन होनें या गलगंड में इसका काढ़ा छोटी पीपल और चन्दन के साथ मिलाकर पिलाया जाता हैं।

@ ज्वर में :::



मलेरिया,सामान्य ज्वर  और सूतिका ज्वर में इसके पत्तों का काढ़ा बनाकर पिलातें हैं । साथ ही इस काढ़े से रोगी को स्नान  करातें हैं । इससे बुखार के बाद शरीर से आनें वाली दुर्गंध दूर होती हैं ।



मलेरिया ज्वर में यदि यकृत (Liver) या तिल्ली बढ़ जाता हैं तो निर्गुण्ड़ी के पत्तों का रस निकालकर  काली कुटकी और रसौंत के साथ मिलाकर देंनें से अतिशीघ्र आराम मिलता हैं ।



बुखार के समय होनें वाली उल्टी में निर्गुण्ड़ी के फूलों को शहद के साथ मिलाकर देनें उल्टी आना बंद हो जाती हैं ।

 गर्भावस्था के बाद होनें वाले सूतिका रोग में निर्गुण्ड़ी क्वाथ  देनें से गर्भाशय संकुचित होकर अपनें मूल रूप में आ जाता हैं ।और भीतरी गंदगी साफ़ हो जाती हैं ।


@ रक्त प्रदर  में :::


महिलाओं को होनें वाले अत्यधिक रक्तस्राव में निर्गुण्ड़ी की जड़ को मिश्री और अश्वगंधा  के साथ मिलाकर सेवन करानें बहुत शीघ्र आराम मिलता हैं ।

@ बिच्छू काटनें का इलाज :::

बिच्छू काटनें पर अत्यधिक दर्द और बदन में ऐंठन होती हैं ऐसी अवस्था में निर्गुण्डी की जड़ को पीसकर प्रभावित  जगह पर लेप करनें से बिच्छू का जहर उतरता हैं। लेकिन ध्यान रहे प्रभावित स्थान  पर यह लेप हर आधे घंटें में लगाते रहें ।  और पुरानाा लेप उतार दें ।

@ बेहोशी का उपचार :::


निर्गुण्डी रस को बेहोश व्यक्ति की नाक में डालनें से बेहोशी समाप्त हो जाती हैं ।


 @ सिरदर्द का इलाज :::

निर्गुण्डी के  पत्तों को पीसकर सिर पर लगानें और आधे सिरदर्द में प्रभावित स्थान  की तरफ़ के नथूनें में निर्गुण्डी के पत्तों के  रस की चार पाँच बूँद  डालनें से आराम मिलता हैं ।  


@ निर्गुण्डी के अन्य उपयोग :::

निर्गुण्डी या Indian privete आयुर्वेद  की महत्वपूर्ण औषधि हैं जिसके उपयोग का वर्णन आयुर्वेद शास्त्र में हर जगह पर किया गया हैं ।


निर्गुण्डी के सेवन से दस्त आना बंद हो सकते हैं अत : इस बात का ध्यान  रखते हुये निर्गुण्डी के साथ त्रिफला  ,नागदन्ती लेना चाहिये ।     


स्वस्थ्य रहने के ऐसे तरीके जिन्हें बहुत कम लोग जानतें हैं

स्वस्थ्य रहने के तरीके :::
 Healthy lifestyle
सामाजिक मानसिक और शारिरीक स्वास्थ्य उन्नत करते लेख
 Healthy lifestyle

*बन्दर कभी बीमार नहीं होता।।*

किसी भी चिड़िया को डायबिटीज नहीं होती। 
किसी भी बन्दर को हार्ट अटैक नहीं आता ।
कोई भी जानवर न तो आयोडीन नमक खाता है और न ब्रश करता है, फिर भी किसी को थायराइड नहीं होता और न दांत खराब  होता है ।

बन्दर शरीर संरचना में मनुष्य के सबसे नजदीक है, बस बंदर और आप में यही फर्क है कि बंदर के पूँछ है आप के नहीं है, बाकी सब कुछ समान है। 

तो फिर बंदर को कभी भी हार्ट अटैक, डायबिटीज , high BP , क्यों नहीं होता है?

एक पुरानी कहावत है बंदर कभी बीमार नहीं होता और यदि बीमार होगा तो जिंदा नहीं बचेगा मर जाएगा! 
बंदर बीमार क्यों नहीं होता?

हमारे एक मित्र  बताते हैं कि एक बहुत बड़े , प्रोफेसर हैं, मेडिकल कॉलेज में काम करते हैं । उन्होंने एक बड़ा गहरा रिसर्च किया कि बंदर को बीमार बनाओ। तो उन्होने तरह - तरह के virus और वैक्टीरिया बंदर के शरीर में डालना शुरू किया, कभी इंजेक्शन के माध्यम से कभी किसी और माध्यम से । वो कहते है, मैं 15 साल असफल रहा , लेकिन बंदर को कुछ नहीं हुआ ।

*मित्र  ने प्रोफेसर से कहा कि आप यह कैसे कह सकते है कि बंदर को कुछ नहीं हो सकता ? तब उन्होंने एक दिन यह रहस्य की बात बताई वो आपको भी बता देता हूँ कि बंदर का जो RH factor  है वह सबसे आदर्श है । कोई डॉक्टर जब आपका RH factor नापता है, तो वह बंदर के ही RH Factor से तुलना करता है , वह डॉक्टर आपको बताता नहीं यह अलग बात है*।

उसका कारण यह है कि, उसे कोई बीमारी आ ही नहीं सकती । उसके ब्लड में कभी कॉलेस्टेरॉल नहीं बढ़ता , कभी ट्रायग्लेसराइड नहीं बढ़ती , न ही उसे कभी डायबिटीज होती है । शुगर को कितनी भी बाहर से उसके शरीर में इंट्रोडयूस करो, वो टिकती नहीं । तो वह प्रोफेसर साहब कहते हैं कि यही चक्कर है , कि *बंदर सबेरे सबेरे ही भरपेट खाता है। जो आदमी नहीं खा पाता है , इसीलिए उसको सारी बीमारियां होती है ।*

 *सूर्य निकलते ही सारी चिड़िया , सारे जानवर खाना खाते हैं ।* 

जब से मनुष्य इस ब्रेकफास्ट , लंच , डिनर के चक्कर में फंसा तबसे मनुष्य ज्यादा बीमार रहने लगा है ।

प्रोफेसर रवींद्रनाथ शानवाग ने अपने सभी मरींजों से कहा कि  *सुबह सुबह भरपेट खाओ* । उनके मरीज बताते है कि, *जबसे उन्हांने सुबह भरपेट खाना शुरू किया तबसे उन्हें डायबिटीज यानि शुगर कम हो गयी, किसी का कॉलेस्टेरॉल कम हो गया, किसी के घुटनों का दर्द कम हो गया , किसी का कमर का दर्द कम हो गया गैस बनाना बंद हो गई, पेट मे जलन होना बंद हो गया ,नींद अच्छी आने लगी* ….. वगैरह ..वगैरह । 
और यह बात बागभट्ट जी ने 3500 साल पहले कहा, कि सुबह का किया हुआ भोजन सबसे अच्छा है ।

*सुबह सूरज निकलने से ढाई घंटे तक यानि 9.30 बजे तक, ज्यादा से ज्यादा 10 बजे तक आपका भरपेट भोजन हो जाना चाहिए* । और ये भोजन तभी होगा जब आप नाश्ता बंद करेंगे । यह नाश्ता का प्रचलन हिंदुस्तानी नहीं है , यह अंग्रेजो की देन है , और रात्रि का भोजन सूर्य अस्त होने से पहले आधा पेट कर लें । तभी बीमारियों से बचेंगे । सुबह सूर्य निकलने से ढाई घंटे तक हमारी जठराग्नि बहुत तीव्र होती है । 

हमारी जठराग्नि का सम्बन्ध सूर्य से है ।हमारी जठराग्नि सबसे अधिक तीव्र स्नान के बाद होती है । स्नान के बाद पित्त बढ़ता है , इसलिए सुबह स्नान करके भोजन कर लें । तथा एक भोजन से दूसरे भोजन के बीच ४ से ८ घंटे का अंतराल रखें बीच में कुछ न खाएं, और दिन डूबने के बाद बिल्कुल न खायें।। 

चूंकि यह पक्षियों और जंगली जानवरों की दिनचर्या में सम्मिलित है, अत: वे अमूमन बीमार नहीं होते।।

० प्याज के औषधीय उपयोग


० हाइपोसलाइवेशन का कारण


० गिलोय के फायदे


० पारस पीपल के औषधीय गुण


० अश्वगंधा


० मधुमेह



० योग क्या है




० शास्त्रों में लिखे तेल के फायदे

1 दिस॰ 2019

आज का प्रेरक प्रसंग ::-पति-पत्नी का खूबसूरत संवाद...✍👌👍*

सामाजिक,मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य उन्नत  करते लेख Healthy lifestyle 

आज का प्रेरक प्रसंग 

*पति-पत्नी का खूबसूरत संवाद...✍👌👍*

प्रेरक प्रसंग
 पति - पत्नि 

*मैंने एक दिन अपनी पत्नी से पूछा- क्या तुम्हें बुरा नहीं लगता कि मैं बार-बार तुमको कुछ भी बोल देता हूँ, और डाँटता भी रहता हूँ, फिर भी तुम पति भक्ति में ही लगी रहती हो, जबकि मैं कभी पत्नी भक्त बनने का प्रयास नहीं करता..??*

*मैं भारतीय संस्कृति के तहत वेद का विद्यार्थी रहा हूँ और मेरी पत्नी विज्ञान की, परन्तु उसकी आध्यात्मिक शक्तियाँ मुझसे कई गुना ज्यादा हैं, क्योकि मैं केवल पढता हूँ और वो जीवन में उसका अक्षरतः पालन भी करती है।*

*मेरे प्रश्न पर जरा वह हँसी और गिलास में पानी देते हुए बोली- यह बताइए कि एक पुत्र यदि माता की भक्ति करता है तो उसे मातृ भक्त कहा जाता है, परन्तु माता यदि पुत्र की कितनी भी सेवा करे उसे पुत्र भक्त तो नहीं कहा जा सकता ना!!!*

*मैं सोच रहा था, आज पुनः ये मुझे निरुत्तर करेगी। मैंने फिर प्रश्न किया कि ये बताओ, जब जीवन का प्रारम्भ हुआ तो पुरुष और स्त्री समान थे, फिर पुरुष बड़ा कैसे हो गया, जबकि स्त्री तो शक्ति का स्वरूप होती है..?*

*मुस्कुरातें हुए उसने कहा- आपको थोड़ी विज्ञान भी पढ़नी चाहिए थी...*

*मैं झेंप गया और उसने कहना प्रारम्भ किया...दुनिया मात्र दो वस्तु से निर्मित है...ऊर्जा और पदार्थ।*

*पुरुष ऊर्जा का प्रतीक है और स्त्री पदार्थ की। पदार्थ को यदि विकसित होना हो तो वह ऊर्जा का आधान करता है, ना की ऊर्जा पदार्थ का। ठीक इसी प्रकार जब एक स्त्री एक पुरुष का आधान करती है तो शक्ति स्वरूप हो जाती है और आने वाले पीढ़ियों अर्थात् अपने संतानों के लिए प्रथम पूज्या हो जाती है, क्योंकि वह पदार्थ और ऊर्जा दोनों की स्वामिनी होती है जबकि पुरुष मात्र ऊर्जा का ही अंश रह जाता है।*

*मैंने पुनः कहा- तब तो तुम मेरी भी पूज्य हो गई ना, क्योंकि तुम तो ऊर्जा और पदार्थ दोनों की स्वामिनी हो..?*

*अब उसने झेंपते हुए कहा- आप भी पढ़े लिखे मूर्खो जैसे बात करते हैं। आपकी ऊर्जा का अंश मैंने ग्रहण किया और शक्तिशाली हो गई तो क्या उस शक्ति का प्रयोग आप पर ही करूँ...ये तो सम्पूर्णतया कृतघ्नता हो जाएगी।*

*मैंने कहा- मैं तो तुम पर शक्ति का प्रयोग करता हूँ फिर तुम क्यों नहीं..?*

*उसका उत्तर सुन मेरे आँखों में आँसू आ गए...उसने कहा- जिसके साथ संसर्ग करने मात्र से मुझमें जीवन उत्पन्न करने की क्षमता आ गई और ईश्वर से भी ऊँचा जो पद आपने मुझे प्रदान किया जिसे माता कहते हैं, उसके साथ मैं विद्रोह नहीं कर सकती। फिर मुझे चिढ़ाते हुए उसने कहा कि यदि शक्ति प्रयोग करना भी होगा तो मुझे क्या आवश्यकता...मैं तो माता सीता की भाँति लव-कुश तैयार कर दूँगी, जो आपसे मेरा हिसाब किताब कर लेंगे।*

*🙏सहस्त्रों नमन है सभी मातृ शक्तियों को, जिन्होंने अपने प्रेम और मर्यादा में समस्त सृष्टि को बाँध रखा है...🙏*

टाप स्मार्ट हेल्थ गेजेट्स इन हिंदी। Top smart health gadgets

Top smart health gadgets।टाप स्मार्ट हेल्थ गेजेट्सस इन हिंदी  कोरोना काल में स्वास्थ्य सुविधाओं पर जितना दबाव पैदा हुआ उतना शायद किसी भी काल...