मंगलवार, 17 मई 2016

TULSI ,THE MEDICINAL PLANTS FOR HUMAN BEINGS

     #1.परिचय::-

       हिन्दू धर्म विश्व का सबसे प्राचीन और वैग्यानिक        धर्म माना गया हैं,और इसको वैग्यानिक बनानें में        इस धर्म के प्रतीकों जैसें तुलसी ,पीपल का              विशिष्ठ स्थान हैं.तुलसी के बिना हिन्दू                      धर्मावलम्बीयों का आँगन सुना माना जाता                हैं.बल्कि यहाँ तक कहा जाता हैं,कि जहाँ              तुलसी का वास नहीं होता वहाँ देवता भी निवास        नहीं करतें हैं.बिना तुलसी के चढ़ाया हुआ प्रसाद        भी ईश्वर ग्रहण नहीं करतें हैं.
                     
Tulsi picture
 Tulsi plant
                        
    तुलसी की 6 से 7 प्रकार की किस्में होती हैं,परन्तु     मुख्य रूप से तीन प्रकार की ही तुलसी अधिक         अधिक प्रचलन में हैं.जो निम्न हैें::-

#1. राम तुलसी जिसका वानस्पतिक नाम (scientific name) आँसीमम ग्रेटिकम हैं.

#2.काली तुलसी या कृष्ण तुलसी जिसका वानस्पतिक नाम आँसीमम अमेरिकन हैं.

#3.पवित्र तुलसी इसे वानस्पतिक जगत में आँसीमम सेक्टम कहतें हैं.

भारतीय घरों में राम तुलसी जिसकी पत्तियाँ हरी (green) तथा कृष्ण तुलसी जिसकी पत्तियाँ बैंगनी रंग की होती हैं ,पायी जाती हैं.

   #2.संगठन (compositions)::-

    तुलसी की पत्तियों में 0.3 % तेल की मात्रा होती       हैं,जिनमें युजीनाँल 71% , युजीनाँल मिथाईल         ईथर 20%, तथा 3% काविकोल रहता हैं. इसमें       विटामिन सी प्रचुरता में पाया जाता हैं.एसिड़             (acid) के रूप में पामिटिक,औलिक तथा               लिनोलैनिक अम्ल उपस्थित रहतें हैं.जैव रसायनों       में ट्रेनिन,सेवेनिन ,एल्कोलाँइड़ तथा ग्लाइकोलाँइड़     उपस्थित रहतें हैं.

#3.तुलसी का औषधिगत उपयोग::-

   जहाँ तक तुलसी के औषधिगत प्रयोग की बात          हैं,वहाँ भारतीय धर्मग्रन्थ और आयुर्वैदिक ग्रन्थों में      इसके विषय में विस्तारपूर्वक लिखा गया                  हैं.भावप्रकाश निघण्टु में लिखा हैं::-
  तुलसी कटुका तिक्ता हृघोष्णा दाहपित्तकृत         दीपक कुष्ठकृच्द्दास्त्रपाश्व्र रूक्कफवातजित
   अर्थात तुलसी की पृकृति उष्ण स्वाद कड़वा होता      हैं,इसके सेवन से पित्त, दाह,रक्तविकार,वात जैसें      रोग शांत होकर रोग प्रतिरोधकता बढ़ती हैं.

   तुलसी पर अनेक शोध हो चुके हैं और इन शोधों के    द्धारा तुलसी अनेक रोगों पर प्रभावी सिद्ध हो चुकी    हैं,जैसें::-
#1.तुलसी कीटाणु और जीवाणुनाशक होती है,इसमें पाया जानें वाला ईथर ट्यूबरक्लोसिस (tuberculosis) के जीवाणु को बढ़नें से रोक देता हैं.इसके लिये तुलसी को विशेष अनुपात में मक्खन और शहद (honey) में मिलाकर रोगी को सेवन करवातें हैं.

#2. मलेरिया होनें पर तुलसी के पत्तों को 5:3:1 में काली मिर्च और लौंग के साथ पीस लें यह मिश्रण बराबर हिस्सों में बाँटकर सुबह शाम मरीज को देतें रहें एक हफ्तें तक देतें रहनें से मलेरिया (malaria) ,जड़ से खत्म हो जाता हैं,इसके साथ हल्दी,चिरायता,गिलोय मिश्रित कर देनें पर स्वाइन फ्लू (swine flu) की औषधि तैयार की जाती  हैं.

#3. Typhoid होनें पर तुलसी रस को पुनर्नवा के साथ मिलाकर देनें से तत्काल फायदा होता हैं.

#4.गठिया ( Rumetoid arthritis) में गाय के दूध में तुलसी के पत्तों को पीसकर एक घंटे के लियें रख दें,तत्पश्चात दूध पीयें.
 #5.स्मरण शक्ति कमज़ोर होनें पर रोज़ पाँच तुलसी पत्र मिस्री के साथ सेवन करें.

#6.फोड़े फुंसियों तथा रक्त सें संबधित विकारों में तुलसी बीज का सेवन गिलोय के साथ करें.

#7.नपुसंकता होनें पर तुलसी बीज का सेवन गाय के दूध के साथ करें.

#8.तुलसी जड़ को बारीक पीसकर पान के साथ मिलाकर खाते रहनें से बांझपन नहीं रहता हैं.

#9. सर्दी, खाँसी हो जानें पर तुलसी, अदरक,काली मिर्च,लोंग तथा अजवाइन मिलाकर काढ़ा बनाकर पीनें से तुरन्त आराम मिलता हैं.

#10. तुलसी पत्तियों, करी पत्तियों तथा महुआ पत्तियों को समान मात्रा में मिलाकर पीस लें इसे भोजन के साथ चट़नी की तरह खायें मधुमेह (Diabetes) का रामबाण इलाज हैं.

#11.आँखों से कम दिखाई देता हो तो तुलसी रस में सफेद प्याज (white onion) का रस 5:1 मात्रा में मिलाकर आँखों में डालें.
#12. यदि नाक की सूघंनें की क्षमता खत्म हो गई हो तो तुलसी पत्र को हाथों  से मसलकर सूँघना चाहियें.

#13.चेहरे पर झुर्रीया ,कील मुहाँसे हटानें तथा चेहरे का सोन्दर्य  बढ़ानें हेतू तुलसी रस को चंदन पावडर के साथ मिलाकर नहानें से पहलें चेहरे पर लगायें.

तुलसी की उपयोगिता को लेकर अनेक शोध हो रहें हैं,और अनेक हो चुके हैं.एक महत्वपूर्ण शोध के अनुसार जिस जगह तुलसी का पौधा लगा होता हैं,उसके पाँच मीट़र तक मच्छर नहीं रहतें हैं.

एक अन्य शोध के अनुसार जिस जगह तुलसी पौधा हरा भरा होता हैं वह जगह स्वच्छ मानी जाती हैं,यदि तुलसी पौधा किसी जगह पर पर्याप्त देखभाल के बाद भी नहीं पनप पाता हैं,तो वह जगह निश्चित रूप से प्रदूषित मानी जाती हैं.

हमारें आँगन में तुलसी लगानें का भी यहीं उद्देश्य रहा होगा तभी हम इस परंपरा को धार्मिक मानकर आज तक अपना रहें हैं.और यही परम्परायें हिन्दू धर्म को scientific धर्म बना रहीं है





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