मंगलवार, 29 सितंबर 2015

गर्भ संस्कार ,pregnancy Care

आयुर्वैद चिकित्सा पद्धति यदि आज तक अपना अस्तित्व बनायें हुयें तो इसका सम्पूर्ण स्रेय आयुर्वैद के उन  महान आचार्यों  को जाता हैं, जिन्होनें बीमारीं को मात्र बीमारीं के रूप में न देखकर इसके सामाजिक, आर्थिक,मनोंवेञानिक,पर्यावरणीय कारको तक की चर्चा अपनें ग्रन्थों में की.एेसा ही एक महत्वपूर्ण मसला बच्चों की परवरिश को लेकर हैं.गर्भ संस्कार भी आयुर्वैद की इसी महान परंपरा का प्रतिनिधित्व करता हैं जिसकी चर्चा आधुनिकतम विञान भी करता हैं कि बच्चों की परवरिश बच्चें के दुनिया में आनें की बाद की प्रक्रिया नहीं है,बल्कि यह तो बच्चें के गर्भ में आनें के बाद ही शुरू हो जाती हैं.महाभारत में अभिमन्यु ने चक्रव्यू भेदनें का राज़ अपनी माँ के गर्भ में ही जान लिया था.आज के लोग पूछतें हैं,क्या यह संभव था ? और आज क्या यह संभव हैं ?इस सवाल का जवाब यही हैं कि यदि आपनें प्राचीन भारतीय आयुर्वैद ग्रन्थों और अन्य परंपरागत शास्त्रों का अध्ययन किया होता तो इस सवाल को पूछनें की ज़रूरत ही नहीं पड़ती फिर भी बताना चाहूँगा कि गर्भ संस्कार वही विधि हैं जिसके माध्यम मनचाहे व्यक्तित्व को ढाला (program)  जा सकता हैं.यह कपोल कल्पना नहीं बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों और आज के शास्त्रों द्वारा प्रमाणित बातें हैं. क्या कारण हैं कि रामायण काल के लव-कुश अपनें पिता के समान बलवान निकलें और उनकी समस्त सेना को धूल चटाकर अपना और अपनी माता का हक लेकर ही माने. इतनी छोटी उम्र में इतनें प्रतापी योद्धा निकलें तो इसका सम्पूर्ण स्रेय वाल्मिक को जाता हैं,जिन्होंनें सीता को गर्भ संस्कार के माध्यम से पिता को झुकानें वालें बालकों को जन्म देनें का पाठ पढाया था.आज तो विञान इतना उन्नत हो गया हैं,कि हर पिछली बातों का हर रूप चाहे लिखित हो या द्रश्य रूप में हो रिकार्ड मोजूद हैं,कभी प्रयोग करके देखें बच्चें के गर्भ में रहते हुये क्या संस्कार दिया गया था और बच्चा पैदा होनें के बाद किस तरह का व्यहवार प्रदर्शित करता हैं,यकिन मानियें यदि पूर्ण शास्त्र सम्मत गर्भ संस्कार हुआ तो परिणामों से आप भी हतभ्रत रह जावेंगें.
स्तनपान के फायदे जानियें

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श्री राम का चरित्र कैंसा था जानियें




रविवार, 27 सितंबर 2015

ALLERGIES TREATMENT

क्या हैं एलर्जी::-

एलर्जी एक प्रकार की शारिरीक और मानसिक प्रतिक्रिया हैं,जो शरीर के सम्पर्क में आनें वालें पदार्थों के प्रति शरीर पैदा करता हैं.
वास्तव में एलर्जी हमारें शरीर के बिगड़ी हुई रोग प्रतिरोधकता ( immune system) को रेखांकित करती हैं.जिसमें हमारा शरीर हानिकारक पदार्थों के साथ मित्र पदार्थों के प्रति भी अत्यधिक संवेदनशीलता  प्रदर्शित करता हैं.

कारण::-

१.खाद्य पदार्थों के कारण.
२.परफ्यूम,रंग,ड़ाई के इस्तेमाल से.
३.कीड़ों,मच्छर के काट़नें से.
४.पराग कणों,धुल,धुँए से.
५.आनुवांशिकता जन्य.
६.दवाईयों ,एन्टीबायोटिक के कारण.
७.मौसम में परिवर्तन की वज़ह से.

लछण::-

१.आँखों से पानी निकलना,खुजली, लाल होना,सुजन होना.
२.त्वचा में चकते निकलना, खुजली.
३.नाक में खुजली, पानी निकलना, लगातार छींकें आना.
४.अस्थमा, फेफडों में खीँचाव,गलें में खरास.
५.पेटदर्द ,डायरिया,पेट़ फूलना.
६.कानों में दर्द खुजली, सुनाई कम देना.

उपचार::-

आयुर्वैद चिकित्सा  में हमारें बिगड़े हुए इम्यून सिस्टम को प्रभावी बनानें की अद्भूत चिकित्सा हैं यदि कुशलतापूर्वक इसका लाभ रोगी को दिया जावें तो रोगी शीघृ स्वस्थ होता हैं आईयें जानतें है,उपचार

१.एलर्जी से पीड़ित व्यक्तिसितो सर्वपृथम पंचकर्म (panchkarma) करवाना चाहियें.
२.यदि श्वसन संस्थान से संबधित एलर्जी है,तो कालीमिर्च,तुलसी,लोंग,हल्दी, अजवाइन को उबालकर चाय की भाँति नियमित रूप से सेवन करें.
३.सोया दूध पीना शुरू करें.
४.आँवला,पुनर्नवा, द्राछा को समान मात्रा में मिलाकर सुबह दोपहर रात को दो -दो वटी लेना शरू करें.
५.त्वचा से सम्बंधित एलर्जी होनें पर हरिद्राखण्ड़ को  सितोपलादि चूर्ण के साथ मिलाकर सेवन करें.
६.गंधक रसायन तथा निम्बादि चूर्ण को मिलाकर एक-एक वटी सुबह शाम लें.
७.पेट से सम्बंधित एलर्जी होनें पर गिलोय, एलोवेरा रस का सेवन करें
८.शंख में रातभर पानी रख सुबह उठतें ही पीयें.
९.योगिक क्रिया जैसें कपालभाँति अवश्य करें.
११.धूप में तिल या सरसों तेल लगाकर पाँच से दस मिनिट बेठें.१०.सुबह कम से कम पाँच कि.मी.तक दोड़ लगायें.

वैघकीय परामर्श आवश्यक






शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

URINARY TRACT INFECTION CAUSE SYMPTOM

परिचय::-

सम्पूर्ण विश्व में मूत्र सम्बधी बीमारीयों का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है,इन बीमारीयों में एक महत्वपूर्ण बीमारीं है मूत्र मार्ग का संक्रमण (urinary tract infection) .इस संक्रमण का प्रभाव पुरूषों की अपेक्षा  महिलाओं  में अधिक देखा गया हैं.यह जीवाणुजनित(Bacteria) से उत्पन्न होनें वाला रोग है जो ई.कोलाई(E.coli) नामक बैक्टरिया से फैलता है.यदि संक्रमण मूत्र मार्ग से होते हुये गुर्दे तक फैल जाता है,तो इसे पाइलोनेफ्राइटिस कहा जाता हैं.

कारण::-

१.माहवारी के समय योनि की उचित देखभाल का अभाव
२.असुरक्षित योन संसर्ग.
३.कैथैटर के कारण.
४.पथरी # kidneystone के कारण.
५.पानी कम पीनें के कारण.

लक्षण::-

१.मूत्र करते समय पस का आना.
२.मूत्र करते समय खून का आना.
३.मूत्र के समय दर्द तथा जलन.
४.बुखार के साथ पीठ,पेडू व पेट के निचें तीव्र दर्द.
५.बार-बार मूत्र त्यागनें की इच्छा के साथ बूँद-बूँद मूत्र आना.
६.अजीब सी शारिरीक सुस्ती और चेहरा कांतिहीन होना.

उपचार::-

१.चन्द्रप्रभा वटी,त्रिभुवनकिर्ती रस,हल्दी को समान भाग में मिलाकर गोलीयाँ बना लें सुबह शाम दो दो गोली जल के साथ लें.
२.पाषाणभेद,गोखरू,नागरमोथा,सोंफ को समान भाग में मिलाकर रात को सोते समय जल के साथ लें.
३.पुनर्नवारिष्ट़ और अम्रतारिष्ट को दो दो चम्मच  समान जल के साथ मिलाकर सुबह शाम सेवन करें.
४.प्रोबायोटिक दही का नियमित सेवन करें.
५.बेल का गुदे में मिस्री मिलाकर सेवन करें.
६.धनिया के बीज को पीसकर मिस्री मिला लें इस मिस्रण को भोजन के बाद लें.

महत्वपूर्ण योगासन::-

१.मण्डूकासन--

इस आसन को करनें से मूत्र संस्थान मज़बूत बनकर रोग प्रतिरोधकता बढ़ती हैं,आईयें जानतें है कैसें होता हैं मण्डूकासन
अ).घुट़नों को मोड़कर सीधें नमाज़ियों की तरह बैठें.
ब).दोनों हाथ नाभि से निचें रखकर पर  एक हाथ से दूसरें हाथ की कलाई पकड़े.
स).अब सांस भरकर आगें की और घुट़नों तक धीरें धीरें झुकें तत्पश्चात पुन:सांस छोड़ते हुयें पहलें वाली अवस्था में आ जावें.
द).यह योगिक क्रिया नियमित रूप से धीरें बढा़यें.

परहेज::-

तम्बाकू, शराब,वसा युक्त भोजन.

क्या करें::-

१.पानी खूब पीयें. यथासंभव नारियल पानी पीते रहें.
२.भोजन में सलाद खूब लें.
नोट::-वैघकीय परामर्श आवश्यक.

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बुधवार, 23 सितंबर 2015

Giloy गिलोय



गुडूची कटुका तिक्ता स्वादुपाका रसायनी कामलाकुष्ठवातास्त्रज्वरक्रिमिवमीन्हरेत्
 An rejuventor,anti-pyretic,astringent

Giloy or guduchi is a well known Indian bitter and prescribed mainly for fevers and diabetes. It is an astringent, anti-pyretic ,rejuventor,blood-purifier,antispasmodic and antiinflammatory. Highly digestible and nutritive starch obtained from the stem part is given to the patients with very poor digestion.

It checks successfully the microbes responsible for tuberculosis. In ayurveda the drug is given with black piper longum roots and ginger for improving the digestion.In migraine it is given with honey and for vaginal inflammation, its decoction in combination with triphla and baliospermum montanum in recommended. It is increasing body immunity.

Description::-

Large deciduous climbers with lenticellate,corky stems,branches sending down slender pendulous,fleshy roots,leaves deeply cordate with large basal lobes,inflorescence racemose male flowers clustered in the axils of small subulate bracts sepals 2 seriate,inner broadly elliptical petals 6,equal.female flowers usually solitary,similar to male,carpels3.fruits drupelets pisiform,deep red, marked with a sub basal stylar scar.


Active ingredients::-

Giloin,Giloinin.

Therapeutic uses::-

1.In the cure of arthritis, rheumatism,piles,leprosy, dyspepsia.
2.In fever and flu.
3.To inhibit hyper glycemia and reduce blood sugars.
4.As liver stimulant.
5.Memory enhancer.
6.Filaria Guduchi svarasa along with gingly oil is given orally.

Dosage::-

As directed by the physicians.
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सोमवार, 21 सितंबर 2015

paralysis treatment लकवा उपचार




लकवा क्या हैं::-

यदि मस्तिष्क की रक्तवाहिनीयों में रक्त का थक्का जम जाता है या मस्तिष्क की रक्तवाहिनीयाँ फट़ जाती हैं या मस्तिष्क में रक्त का प्रवाह कम हो जाता हैं फलस्वरूप मस्तिष्क का नियत्रंण अंगों पर नहीं रहता और अंग काम करना बंद कर देतें हैं यही अवस्था लकवे के नाम से जानी जाती हैं. यदि मस्तिष्क का बाँया भाग प्रभावित होता है तो दाँया भाग और दाँया भाग प्रभावित होता हैं तो बाँया भाग लकवाग्रस्त हो जाता हैं.
आयुर्वैदानुसार जब वायु कुपित होकर दाँए या बाँए भाग पर आघात कर शारिरीक इच्छाओं का नाश कर अनूभूति को समाप्त कर देती हैं यही अवस्था लकवा के नाम से जानी जाती हैं.

प्रकार::-

१.मोनोप्लेजिया या एकांगघात -- इसमें एक हाथ या एक पैर कड़क हो जाता हैं.
२.ड़ायप्लेजिया --सम्पूर्ण शरीर में लकवाग्रस्त हो जाता हैं.
३.फेशियल पेरालिसीस या चेहरे का लकवा--इसमें चेहरा,नाक ,होंठ गाल पर नियत्रंण नहीं रहता हैं.
४.जीभ का लकवा

कारण::-

१.उच्च रक्तचाप लगातार २०० से अधिक रहना.
२.मस्तिष्क में गंभीर चोंट.
३.रीढ़ की हड्डी में चोंट.
४.पोलियो की वज़ह से.
५.मादक पदार्थों का अत्यधिक सेवन.
६.एक तरह की दाल जिसे खेसरी दाल कहतें है के कारण.
७.मस्तिष्क से सम्बंधित कोई गंभीर बीमारीं होनें पर.
८.रीढ़ की हड्डी से सम्बंधित कोई बीमारीं होनें पर.
९.अचानक कोई सदमा लग जानें के कारण.

उपचार::-

१.एकांगवीर रस,वृहतवातचिन्तामणि               रस,महायोगराज गुग्गुल,लाक्षादि गुग्गुल को समान मात्रा में मिलाकर ५ ग्राम सुबह शाम शहद के साथ दें.
२.सरसों तेल में या महामाष तेल में तेजपत्ता लहसुन कली और अजवाइन मिलाकर गर्म करलें इस तेल से प्रभावी  अंगों पर दो से तीन बार मालिश करें.
३.अर्जुन चूर्ण, दशांग लेप चूर्ण में अमर बैल का रस मिलाकर प्रभावी स्थानों लेपन करें.
४.यदि रक्तचाप सामान्य हो तो भाप स्नान करवाते रहना चाहियें.
५.रोज़ रात को सोते समय त्रिफला चूर्ण दो चम्मच लें
६.रक्तचाप की नियमित जाँच करवाते रहें और नियत्रिंत रखे.
७.ब्राम्हीवट़ी,सर्पगंधा वट़ी को मिलाकर सुबह शाम लें.
८.सारस्वतारिष्ट चार चार चम्मच सुबह शाम लें.
९. नियमित व्यायाम और योगिक क्रियायें करवाते रहना चाहियें.
१०.पर्याप्त मात्रा में जल का सेवन करें साथ में आंवला और पाइनापल रस का सेवन करे.
११.जवारें का रस आधा- आधा कप ज़रूर लेते रहें.

वैघकीय परामर्श आवश्यक



रविवार, 20 सितंबर 2015

HOW TO BOOST IMMUNITY POWER WITH AYURVEDA

इम्यूनिटी::-

हमारें शरीर में रोगों से लड़नें की प्राक्रतिक प्रतिरोधकता विधमान रहती है,यदि शरीर बीमार पड़ता हैं,तो यह प्रतिरोधकता हमारें शरीर की बीमारीयों से लड़ने में मदद करती हैं.किंतु पिछलें दशकों में हमारी जीवनशैली (lifestyle) में आये बदलाव ने हमारी प्रतिरोधकता को बुरी तरह से प्रभावित किया हैं. इसे इस प्रकार समझा जा सकता हैं कि शरीर बाहरी बीमारीयों से लड़नें के बजाय अपनें खुद के शरीर से लड़नें लगा हैं, यही कारण हैं कि आज हर दस व्यक्तियों में से चार व्यक्ति ऑटो इम्यून ड़िसीज़ जैसे एलर्जी, Rumetoid arthritis,asthma बार बार बीमार होना और अन्य इस तरह की बीमारीयों से जकड़ा हुआ हैं कि उसका डाँक्टर और केमिस्ट से मिलना रोज़ की बात हो गई हैं.किन्तु वास्तविकत में यदि हम आयुर्वैद और योग की सहायता से जीवन का प्रबंधन करें तो काफी खुशहाल और रोगमुक्त जीवन जी सकतें हैं.आईयें जानतें है,इम्यूनिटी बढ़ानें वाले उपाय

योग::-

१.सुबह उठते ही नित्यकर्मों से निवृत्त होकर योगिक क्रियाएँ अवश्य करें योग क्रियाओं में सबसे महत्वपूर्ण आसन सूर्य नमस्कार है जो इम्यून सिस्टम को मज़बूत बनाता है.सूर्य नमस्कार की बारह मुद्राँए होती हैं ये बारह मुद्रा शरीर को सूर्य जितना तेजोमय बना देती हैं.

आहार::-

२.सुबह नाश्तें में सूखें मेवे के साथ अंकुरित अनाज ज़रूर लें.
३.जवारें का रस प्रतिदिन आधा कप ज़रूर लेते रहें.
४.च्वयनप्राश एक चम्मच प्रतिदिन लें.
५.सोया दूध का सेवन सुबह शाम करें.
६.मैथी को पीसकर पेस्ट बना लें इस पेस्ट को चट़नी की भाँति भोजन में शामिल करें.
८.भोजन में हल्की सुपाच्य वस्तुओं का सेवन करें.

औषधि::-

आयुर्वैद चिकित्सा में कुछ महत्वपूर्ण औषधियों का वर्णन हैं जो रोग प्रतिरोधकता को बढाती हैं जैसे शिलाजित, अश्वगंधा,पुनर्नवा इनका नियमित सेवन करतें रहना चाहियें.

शंख चिकित्सा::-

रात को सोते समय शंख में जल भरकर रख दें सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर शंख में भरे जल को पीले और शंख को मुँह से बजायें रोज़ सुबह शाम दस मिनिट तक यह प्रक्रिया करतें रहनें से इम्यून सिस्टम बहुत मज़बूत हो जाता प्रयोगों से यह बात सिद्ध हो चुकी हैं.

मिट्टी लेपन::-

काली या मुलतानी मिट्टी में गोमूत्र मिलाकर इसे सम्पूर्ण शरीर पर लगाकर एक घंटे तक धूप स्नान करें फिर स्वच्छ जल से स्नान करें यह भी इम्यूनिटी बढ़ानें का सिद्ध नुस्खा हैं.

अग्नि स्नान::-

अग्नि स्नान चिकित्सा साधु सन्यासियों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं इसमें आग के बीचोंबीच घंटो तक एक मुद्रा में बैठकर साधना की जाती हैं यह चिकित्सा कई आँटो इम्यून बीमारीयों को जड़ मूल से समाप्त करनें का शर्तिया इलाज़ हैं.
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शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

CANCER AND AYURVEDA



कैंसर विश्व की सबसे प्रचलित और भयावह बीमारींयों में से एक हैं. आज यह बीमारीं महामारी के रूप में फैल रही है,अभी भी यह बीमारीं चिकित्सा शास्त्रीयों के लिये असाध्य बनीं हुई है.यदि आरम्भिक अवस्था में इसबीमारीं का पता लग जावें तब ही इसकी प्रभावीरोकथाम संभव है,अन्यथा यह बीमारीं मोत तक पीछा नहीं छोड़ती है.आज सौ से अधिक प्रकार का कैंसर चिकित्सा शास्त्रीयों ने खोज लिया है,कैंसर वास्तव में शरीर की कोशिकाओं का असामान्य रूप से बढ़ना हैं.

कारण::-

कैंसर के जितनें भी कारण है उनमें अधिकांशत: मानवजनित या जीवनशैली से  संबधित है जैसे
१.तम्बाकू --यह विश्व में कैंसर का सर्वप्रमुख कारक है,लगभग ३५ % कैंसर तम्बाकू के प्रयोग से ही होते है.
२.मोटापा, मोबाइल रेड़िएशन,खाद्य पदार्थों में प्रयुक्त कृत्रिम रंग.
३.आनुवांशिक कारणों से, प्रदूृषण,शारीरिक अक्रियाशीलता.
४.सूर्य से निकलनें वाली अल्ट्रावायलेट किरणों से.

लक्षण ::-

१.शरीर के किसी भी भाग में गांठ का होना जो लम्बें समय से ठीक नहीं हो रही हो.
२.रक्त कैंसर की दशा में खून न बनना,चक्कर, उल्टी होना.
३.त्वचा कैंसर में त्वचा निकलना, फट़ना,खुजली आदि अन्य कारण.
४.वज़न अचानक कम होना.

कैंसर का सर्वमान्य आधुनिक चिकित्सा में बहुत मँहगा और कष्टदायक हैं, यदि हम अन्य उपचार पद्धति के साथ आयुर्वैद चिकित्सा को समानांतर रख और जीवनशैली को नियमित रखकर कैंसर का प्रबंधन करें, तो निश्चित रूप से बेहतर जीवन जी सकते हैं.
१.कैंसर रोगी को हर रोज़ जवारें का जूस पीना बहुत रहता हैं.
२.लहसुन कली कच्ची रोज़ सुबह उठकर खाना चाहियें.जानकारों के मुताबिक रोज़ लहसुन खानें से कैंसर होनें की संभावना 80% कम की जा सकती हैं,क्योंकि लहसुन में अलिसन नामक रसायन होता हैं,जो कैंसर होनें की संभावना समाप्त करता हैं.

३.पुर्ननवा, शिलाजित, एकांगवीर रस को मिलाकर वटी बना ले इसे तीन समय दो दो वटी के हिसाब से लें.
४.शरीर के प्रतिरोधकता बढ़ानें के लिये च्वनप्राश दो चम्मच सुबह के समय दूध के साथ लें.
५.पानी रोज़ बारह से पन्द्रह गिलास पीना चाहियें.
६.भोजन में अस्सी प्रतिशत सब्जी और सलाद होना चाहियें शेष बीस प्रतिशत ही अनाज और दालें लें.
७.योग कैंसर में बहुत फायदेमंद होता है,कपालभाँति, प्राणायाम,भस्त्रिका के अलावा योग विशेषञ द्वारा सुझाई गई योग क्रियायें नियमित रूप से करतें रहें.
८.हँसना ईश्वर ने सिर्फ मनुष्य को दिया हैं अतः खूब हँसे प्रसन्नचित रहें.
९.जमीकंद कैंसर रोग में बहुत उपयोगी हैं,क्योंकि इसमें पाया जानें वाला एन्टीआक्सीडेन्ट,बीटा कैरोटीन,और विटामिन सी कैंसर का कारण बनने वाले फ्री रेडिकल्स से लड़ता हैं.
१०. कैंसर रोग में देशी गाय का दूध बहुत उपयोगी हैं,अत: इसका नियमित इस्तेमाल करना चाहियें.
११.अश्वगंधा में एक विशेष प्रकार का योगिक पाया जाता हैं,जो कैंसर कोशिकाओं को मारनें का काम करता हैं.अत: कैंसर होनें पर इसका सेवन अवश्य करना चाहियें.
१२.कैंसर कोशिकाओं की बढ़त रोकनें में आँवला बहुत प्रभावकारी माना जाता हैं,आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार इसमें उपस्थित एन्टी आक्सीडेन्ट तत्व शरीर की प्रतिरोधकता बढ़ानें के साथ शरीर से विषाक्तता को बाहर निकालता हैं.
१३.हल्दी में कुरकुमिन नामक तत्व पाया जाता हैं,यह तत्व कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करनें का कार्य करता हैं,अत: हल्दी का नियमित सेवन कैंसर में बहुत ही लाभकारी माना जाता हैं.
१४.कटहल के बीज,पत्तियाँ एँव फलों में कैंसर कोशिकाओं बढ़नें से रोकनें वालें गुण पाये जातें हैं,अत: कटहल का नियमित सेवन कैंसर रोग में बहुत फायदा पहुँचाता हैं.
१५.पूरी पकी हुई जंगली घास के दस बारह टुकड़ें कर एक गिलास पानी में उबालें जब पानी एक चौथाई रह जावें तो हल्दी डालकर सेवन करवायें,कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करनें वाला अद्भूत योग हैं.

इन बातों के अतिरिक्त पारिवारिक माहोल,अपने आस पड़ोस का माहोल सकारात्मक रखें कैंसर कोई छूत की बीमारीं नहीं है.मरीज़ को होसला दे हिम्मत दें ताकि बीमारीं का डटकर मुकाबला किया जा सकें.

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बुधवार, 16 सितंबर 2015

MALARIA मलेरिया उपचार



मलेरिया परिचय::-

मलेरिया विश्व की दस सबसे प्रचलित बीमारींयों मे से एक है,मलेरिया संक्रामक रोग है जो प्रतिवर्ष विश्व के साठ करोड़ लोगों को अपनी  चपेट़ में लेता है.यह रोग मादा एनाफिलिज़ मच्छर के काटने से फैलता है,जब यह मच्छर  किसी बीमार व्यक्ति को काटता है तो व्यक्ति के रक्त में मोजूद प्रोट़ोजोआ मच्छर के काटने से उसके पेट में चला जाता है ,और जब किसी स्वस्थ व्यक्ति को  यह मच्छर काटता है तो वह प्रोटोजोआ स्वस्थ व्यक्ति को बीमार बना देता है.मलेरिया के मुख्यत: चार परजीवी होते है.

१.प्लाज्मोडियम वायवेक्स::-

मलेरिया को फैलाने वाली यह सर्वप्रमुख प्रजाति है,यह प्रजाति लीवर और रक्तकणों में प्रवेश कर जाती है और वही विकसित होती रहती है.

२.प्लाज्मोडियम फेल्सिफेरम::-

यह मलेरिया परजीवी सबसे गंभीर किस्म का होता है, जिसमें रोगी अचेतावस्था मे चला जाता है,और
स्थिति  गंभीर होनें पर रोगी की मौत भी हो जाती है.

३.प्लाज्मोडियम ओवल::-

मलेरिया के यह परजीवी मनुष्य के लिये उतने घातक नहीं होते जितने की फेल्सिफेरम.

४.प्लाज्मोडियम मलेरी::-

मलेरिया के यह परजीवी भी मनुष्य के लिये उतने घातक नहीं जितने ऊपर के दो परजीवी होते है.

लछण::-

१.कंपकंपी लगकर तेज़ बुखार आता है,जो पसीना निकलनें पर उतर जाता है
२.सिरदर्द
३.शरीर में तेज़ ,असहनीय पीड़ा होती है.
४.उल्टी होना चक्कर आना.
५.खून की कमी.

उपचार::-

आयुर्वैद चिकित्सा में मलेरिया का वर्णन विषम ज्वर के रूप में किया गया है.मिथ्या आहार के कारण दोष प्रकुपित होकर अमाशय में स्थित हो जाती है,तो ज़ठराग्नि दुर्बल होकर भोजन का आम बना देती है,जिससे आमदोष उत्पन्न होकर ज्वर बना देता है.
१.त्रिभुवनकिर्ती रस,आनंद भैरव रस, महासुदर्शन चूर्ण को समान भाग में मिलाकर तीन समय जल के साथ लें.
२.गिलोय ,चिरायता,नीम,तुलसी,अदरक को एक एक अनुपात में मिलाकर काढ़ा बना ले व इसे तीन दिनों तक सुबह शाम १०० मि.ली.के हिसाब से लें
३.वत्सनाभ का चूर्ण रोज़ रात को सोते समय एक चम्मच दूध के साथ लें.
४.त्रिफला २ ग्राम प्रतिदिन गर्म जल के भोजन उपरान्त लें.

सावधानी::-

१.घर के आसपास पानी इकठ्ठा न होनें दे,यदि पानी में लार्वा दिखे तो केरोसिन ड़ालकर नष्ट कर दें.
२.घरों के अन्दर साफ सफाई के लिये गोमूत्र से घर का पोछा लगायें.
३.पीनें के पानी में तुलसी पत्तियाँ ज़रूर ड़ालें.
नोट- वैघकीय परामर्श आवश्यक

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मंगलवार, 15 सितंबर 2015

HYPOTHYROIDISM TREATMENT

क्या है हाइपोथाइराँड़िज्म ::-

हमारें गले में स्वर यंत्र के ठीक निचें व साँस नली के दोनों तरफ तितली के समान संरचना होती हैं यही संरचना थायराँइड़ के नाम से पहचानी जाती है.इससे निकलनें वालें हार्मोंन रक्त में मिलकर शरीर की गतिविधियों को नियत्रिंत करते है.इस ग्रंथि को मस्तिष्क में मोजूद पिट्यूटरी ग्रंथि नियत्रिंत करती है,जब इस ग्रंथि से निकलने वाले हार्मोंन जैसें टी - 3  यानि ट्रायोडोथायरोनीन और टी -4 या थायराँक्सीन कम मात्रा मे निकलते है तो शरीर मे कई तरह की समस्या उत्पन्न हो जाती हैं इस अवस्था को हायपोथाइराँइडिज्म कहते है.

कारण::-

१. कम मात्रा में आयोड़िन का सेवन.
२.दवाओं का व सर्जरी का दुष्प्रभाव.
३.आँटो इम्युन डिसआर्डर (इसमें शरीर का रोग प्रतिरोधी तंत्र थायराँइड ग्रंथि पर आक्रमण कर देता है,के कारण .
४.अन्य हार्मोंनों का असन्तुलन.
५.पारिवारिक इतिहास होने पर हाइपोथायराँडिज्म की समस्या हो जाती है.

लक्षण::-

१.वज़न बढ़ना
२.थकान व कमज़ोरी
३. उदासी ,माँसपेशियों मे खिचाँव, पैरों मे सूजन
४.याददाश्त में कमी,आँखों में सूजन.
५.त्वचा का रूखा व मोटा होना.
६.कब्ज, बालों का झड़ना,माहवारी का अनियमित होना.
७.आवाज में भारीपन,नाखून मोटे होकर धीरें धीरें बढ़तें है.
८.सर्दी लगना व कम पसीना आना.
९.शरीर में केल्सियम की कमी होना.

उपचार::-

१.काँचनार गुग्गल, त्रिफला गुग्गल को मिलाकर सुबह शाम रोग की तीव्रतानुसार १ से ५ ग्राम लें.
२.ब्राम्ही, कालीमिर्च,पीपली, मुनुक्का,दशमूल,को मिलाकर ५ से ७ ग्राम जल के साथ ले इससे हार्मोंन असंतुलन की समस्या दूर हो जावेगी.
३.एलोवेरा, लोकी जूस का नियमित सेवन करें.
४.गोमूत्र ५  से १० मि.ली.सेवन करें.
५.पुर्ननवा मन्डूर, सुदर्शन चूर्ण को मिलाकर सुबह शाम ५ ग्राम जल के साथ लें.
६.आँवला,गोखरू,व गिलोय को मिलाकर सुबह शाम आधा चम्मच जल के साथ सेवन करें.
७.पंचकोल चूर्ण भोजन के बाद रात को सोते समय एक चम्मच लें.

क्या सेवन करें::-

१.भोजन मे काला नमक सेवन करें.
२.दूध, दही की लस्सी,सिघांड़ा,चुकंदर का सेवन करें.
३.बाजरे,ज्वार के आटे से बनी रोटी का सेवन करें.
४.मेथीदाने व सूखे धनिये का चूर्ण बनाकर भोजन के बाद मुख शुद्धि की तरह इस्तेमाल करें.

योग::-

योगिक किृयाएँ अनुलोम-विलोम, कपालभाँति, शून्य मुद्रा का नियमित अभ्यास करें.
नोट- वैघकीय परामर्श आवश्यक
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सोमवार, 14 सितंबर 2015

MALNUTRITION AND AYURVEDA

#कुपोषण::-

कुपोषण
 कुपोषित बच्चा

विश्व के विकासशील देशो में कुपोषण एक गंभीर समस्या के रूप में विधमान हैं,जो बच्चों के जीवनीय छमता और विकास पर प्रतिकूल प्रभाव ड़ालता हैं.
सरल भाषा में बाल कुपोषण बच्चों में उस विकार का नाम हैं जिसमें या तो शरीर के पोषण,विकास एँव स्वास्थ संरछण के लिये आवश्यक पर्याप्त संतुलित आहार बच्चें को प्राप्त नहीं होता या बच्चें का शरीर लिये गये आहार का सम्यक् उपयोग करनें में सछम नहीं होता हैं. कुपोषण के कारण बच्चों मे कृशता,दुर्बलता व अन्य अनेक लछण उतपन्न हो जाते हैं.

संतुलित आहार के बारें में रोचक जानकारी

#कुपोषण का आयुर्वैदिक उपचार::-

१.शतावरी चूर्ण ५ ग्राम, अश्वगंधा चूर्ण ५ ग्राम को रात को ५० मि.ली.पानी में गला दे सुबह इसे छलनी लगाकर अच्छे से दबाकर छान लें इस पानी में १०० मि.ली.दूध मिलाकर १० मिनिट़ तक उबालें तत्पश्चात ठंडा कर बच्चों को पिलायें.यह औषधि सन्धि,शिरा,स्नायुओं को मज़बूत कर शरीर में दृढ़ता,बल और रोग प्रतिरोधकता को बढ़ाता हैं.
२.गोघ्रत को १० ग्राम अश्वगंधा चूर्ण के साथ मिलाकर रोटी के साथ बालक को खिलायें .
३.बला तेल,महामाष तेल, को समान मात्रा में मिलाकर बच्चों को मालिश करवायें.
४.यष्टीमधु,शुंठी का चूर्ण सुबह शाम दूध के साथ बच्चों को सेवन करवायें.
यहाँ एक महत्वपूर्ण ध्यान देनें वाली बात यह हैं कि बच्चों में कुपोषण न केवल संतुलित आहार की कमी से होता हैं बल्कि धात्री माता के दूध की दुष्टि से भी होता हैं अत:धात्री माता के दूध की दुष्टि दूर करनें के लिये शतावरी चूर्ण को प्रवाल पिष्टि में सम भाग में मिलाकर माता को सुबह -शाम घ्रत से सेवन करवायें.
५.धात्री माता को च्वनप्राश सुबह शाम दूध के साथ एक चम्मच देनें से दूध सुपुष्ट़ बनता हैं.
वैघकीय परामर्श आवश्यक

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शनिवार, 12 सितंबर 2015

ASHOKARISTH,DASMULARISTH,KHADIRARISTH

परिचय::-

अशोकारिष्ट़::-


भैषज्यरत्नावली में इस औषधि का परिचय देते हुये लिखा हैं
मासादूध्वेच्च पीत्वैनमसृग्दररूजां जयते ज्वरच्च रक्तापित्तार्शोमन्दाग्नित्वमरोचकम् मेहशोथदिकहरस्त्वशोकारिष्ट संञित:
 अर्थात यह अशोकारिष्ट रक्त प्रदर, रक्त पित्त, ज्वर,रक्तातिसार(खूनी बवासीर) मन्दाग्नि,प्रमेह, अरूचि, शोथ को नष्ट़ करने वाला उत्तम अरिष्ट हैं.
यह अरिष्ट रसायन और उत्तेजक हैं.

घट़क द्रव्य::

अशोक छाल, को पानी मिलाकर तब तक उबाला जाता हैं जब तक एक चोथाई पानी शेष नहीं रह जाता तत्पश्चात गुड़ मिलाकर सेवन योग्य बनाया जाता है.

स्वाद::

तिक्त ,कसेला

सेवन वैघकीय परामर्श से
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दशमूलारिष्ट::-

भैषज्य रत्नावली के अनुसार
वातव्याधिं छयं छर्दि पाण्डुरोगच्च कामलाम् शर्करामश्मरीं मूत्रकृच्छं धातुछयंजयेत्छं कृशानां पुष्टिजननो बन्ध्यानां पुत्रद: पर:अरिष्टो दशमूलाख्यस्तेज: शुक्रबलप्रद:
अर्थात इस आरिष्ट के सेवन करनें से वातव्याधि, वमम,कामला,मूत्र में शर्करा,मूत्र में धातु जाना,महिलाओं का बन्ध्यापन जैसी बीमारीं शीघृ नष्ट हो जाती हैं साथ ही पुरूषों के शुक्र में वृद्धि होती हैं.

यह अारिष्ट स्त्रीयों के गर्भाशय का शुद्धिकरण करता हैं ,एँव गर्भवती के गर्भ को बल देता हैं.

वातज श्वास रोगो में यह अम्रत के समान लाभकारी हैं.

मात्रा::-

वैघकीय परामर्श से
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खदिरारिष्ट::-

घटक::
           देवदारू,बावची,दारूहल्दी,त्रिफला,खेर की छाल,शहद,धाय फूल,पीपल,लौंग,शीतलमिर्च,नागकेशर,इलायची,दालचीनी, और तेजपान.

उपयोग::-

१. इसका विशेष प्रभाव रक्त, त्वचा और आंत्र पर होता हैं.
२.इसके सेवन से कुष्ठ,कामला,केंसर,श्वास, कृमि ,पाण्डुरोग (anaemia), कास,tumour नष्ट हो जातें हैं.
३. यह औषधि ह्रदय को बलशाली बनाती हैं.
४. यह रक्त   शोधक और लसिका को बल देती हैं.
५.पाचन तंत्र को सबल कर आँतो को मज़बूती देती हैं.

सेवन विधि :: वैघकीय परामर्श से.






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शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

SANJIVANI VATI ,CHANDRAPRABHA VATI,SHANKH VATI

१.संजीवनी वटी::- 


 संजीवनी वटी का वर्णन रामायण में भी मिलता हैं. जब मेघनाथ के साथ युद्ध में लक्ष्मण मूर्छित हुए तो  संजीवनी  बूटी ने लक्ष्मण को पुन: जीवन दिया था शांग्रधर संहिता में वर्णन हैं कि  "वटी संजीवनी नाम्ना संजीवयति मानवम" अर्थात संजीवनी वटी नाना प्रकार के रोगों में मनुष्य का संजीवन करती हैं.आधुनिक शब्दों में यह वटी हमारें बिगड़े मेट़ाबालिज्म को सुदृढ़ करती हैं.तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता (immunity)  बढ़ाती हैं.

घटक द्रव्य::

विडंग,शुंठी,पीप्पली,हरीतकी,विभीतकी,आमलकी,वच्च,गिलोय,शुद्ध भल्लातक,शुद्ध वत्सना

उपयोग::-

सन्निपातज ज्वर,सर्पदंश,गठिया,श्वास, कास,उच्च कोलेस्ट्रोल, अर्श,मूर्छा,पीलिया,मधुमेह,स्त्री रोग ,भोजन में अरूचि.

मात्रा::-

वैघकीय परामर्श से
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२.चन्द्रप्रभा वटी::-

चन्द्रप्रभेति विख्याता सर्वरोगप्रणाशिनी
उपरोक्त श्लोक से स्पष्ट हैं,कि चन्द्रप्रभा वटी समस्त रोगों का शमन करती हैं.

घट़क द्रव्य::-

कपूर,वच,भू-निम्बू, गिलोय,देवदारू,हल्दी,अतिविष,दारूहल्दी,पीप्पली,चितृक, धनिया,हरड़,बहेड़ा, आंवला, चव्य,बायबिडंग, गजपीपली,सौंठ, कालीमिर्च,स्वर्ण माछिक भस्म, यवछार,सज्जीखार,काला नमक,सेंधा नमक,विड़ नमक,निसोंठ,दन्तीमूल,तेज़पत्र,दालचीनी,छोट़ी ईलायची,वंसलोचन,लोह भस्म, मिस्री,शिलाजित और शुद्ध गुग्गुल.

रोगों में उपयोग विधि::-

१.प्रमेह-:गिलोय या त्रिफला स्वरस या दारूहल्दी,नागरमोथा क्वाथ.
२.मधुमेह::-नीम पत्तियाँ, बेल पत्तियाँ, और जामुन पत्तियों के रस के साथ या गुड़मार पत्तियों के रस के साथ.
३.अर्श (piles)::-छाछ, दही और चितृक मूल रस के साथ.
४. गुर्दे की पथरी (kidney stones)::-पुनर्नवाष्टक के साथ.
५.शुक्राणु दोष होनें पर वंग भस्म के साथ.
६. प्रोस्टेट संबधित समस्यओं में गोछरादि गुग्गल के साथ.
७.urinary tract infection होनें पर अशोकारिष्ट तथा अम्रतारिष्ट़ के साथ.
८.गर्भाशय संम्बधी अन्य विकारों में बोल पर्पट़ी के या शतावरी चूर्ण के साथ.
९.अल्पमूत्रता में पनविरलादि भस्म के साथ.
१०.रक्त प्रदर में बोल पर्पटी और अशोक घ्रत के साथ.
११.बांझपन में पलाशपुष्पासव के साथ.
मात्रा::-वैघकीय परामर्श से.

३.शंखवटी::-

भैषज्य रत्नावली के अनुसार यह शंख शीतल होनें से अग्निमान्घादिचिकित्सा में इसका विशेष महत्व हैं.यह औषधि पित्त सम्बंधित रोगों के लियें उत्तम औषधि हैं.

घट़क द्रव्य::-

शुद्ध शंख,भूनी हींग,सोंठ,काली मिर्च,पीपल,सैन्धा नमक,समुद्र नमक,विड़ नमक,सोंचल नमक,खनिज नमक,शुद्ध पारा,शुद्ध गंधक,शुद्ध वत्सनाभ,इमली रस व निम्बू   स्वरस

उपयोग::-

१.यह वटी अजीर्ण,ग्रहणी, और पेटदर्द को दूर करती हैं.
२.कण्ठ दाह,खट्टी डकार,पेट में जलन भोजन के बाद अन्न का नहीं पचना में इसका उपयोग अत्यन्त लाभकारी हैं.
३.इस औषधि के उपयोग से आँत की क्रियाँ बढ़ जाती हैं,फलस्वरूप कब्ज नहीं होता और अन्न पचानें की ताकत बढ़ती हैं.

विशेष उपयोग::-

१.ग्रहणी में छाछ के साथ सेवन करनें से शीघृ लाभ देती हैं.
२.अम्लपित्त में अनार रस या मावे से बनी मिठाई के साथ.
३.अजीर्ण में अदरक रस या लहसुन पेस्ट के साथ.
४.पेटदर्द में अजवाइन रस के साथ.
५.कुष्ठ में मंजिष्ठादि कसाय के साथ.
६.अर्श में चितृक मूल के साथ.

सावधानी::-

इस औषधि का प्रयोग मुखपाक( mouth ulcers)तथा दाँतों के दर्द में नहीं करें.




ARJUNARISTH ,ABHYARISTH

अर्जुनारिष्ट़::-

 ह्रदय रोग  चिकित्सा में अर्जुनारिष्ट अपना विशेष स्थान रखता हैं.भैषज्य रत्नावली में वर्णित श्लोकानुसार
मासमात्रं स्थितो भाण्डे भवेत्पार्थाघरिष्टक:ह्रत्फुफ्फसगदान् सर्वान् ह्नत्ययं बलवीर्यक्रत

 घटक का नाम

अर्जुन छाल, मुनुक्का,महुए के फूल,गुड़ एँव धायफूल

उपयोग

यह अरिष्ट उत्तम ह्रदय रोग नाशक हैं.पित्तप्रधान ह्रदय रोग और फेफड़ों की सूजन से फूली हुई शिथिल नाड़ियों को संतुलित और द्रढ बनाकर निर्बलता को दूर करता है तथा शरीर में बल लाता हैं.ह्रदय- शूल,ह्रदय शैथिल्य ,शरीर में पसीना अधिक आना,मुँह सूखना,नींद कम आना,शरीर में रक्त संचार ठीक नहीं होना आदि विविध रोगों में उत्तम लाभकारी औषधि हैं.

 मात्रा

वैघकीय सलाह से
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अभयारिष्ट::- ़

अस्याभ्यासादरिष्टस्य नस्यन्ति गुदजा द्रुतम ग्रहणीपाणडुहद्रोगप्लीहगुल्मोदरापह:कुष्ठशोफारूचिहरो बलवर्णाग्निवर्धन

भैषज्य रत्नावली के अनुसार रोग और रोगी का बल,अग्नि और कोष्ठ का विचार करके यदि उचित मात्रा में इसका सेवन किया जावें तो सब प्रकार के उदर रोग नष्ट होतें है.यह मल मूत्र की रूकावट को दूर कर अग्नि को बढाता हैं.

घट़क द्रव्य:: 

हरड़,मुनुक्का,वायविड़ंग,महुवे के फूल,गुड़,गोखरू, निसोंठ, धनिया, धायफूल,इन्द्रायणा जड़,चव्य, सौंफ, दन्तीमूल,मोचरस.

उपयोग::-

१.इसका विशेष उपयोग अर्श रोग (piles)में हैं.अर्श के दर्द को शान्त करनें के लियें अर्शकुठार, बोलबद्ध रस,कामदूधा रस,सूरण वट़क आदि के सेवन से किसी एक दवा का सेवन करनें के उपरान्त जब दर्द का जोर कम हो,तब अभयारिष्ट के सेवन से बहुत फायदा होता हैं.
२.अभयारिष्ट के सेवन पश्चात जो दस्त होतें हैं उससे आँतें कमज़ोर न होकर सबल बनी रहती हैं,जिससे दूषित मल आँतों में संचित नहीं होता.
३.अभयारिष्ट के सेवन से heart problem नहीं होती हैं.
४.अभयारिष्ट में बराबर मात्रा में कुमार्यासव मिलाकर लेनें से अतिशीघ्र लाभ मिलता हैं.
५.यह उदर में पाचक रस बनानें में मदद करता हैं.

मात्रा::-

वैघकीय परामर्श से.
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गुरुवार, 10 सितंबर 2015

YOGA AND HEALTHY LIFESTYLE

दिनचर्या::

निरोगी जीवन की कामना करनें वाले बुद्धिमान व स्वस्थ व्यक्ति द्वारा प्रतिदिन किये जानें वाले आचरण को दिनचर्या कहते हैं
आयुर्वैद ग्रन्थों में स्वस्थ शरीर के लिये सही और नियमित दिनचर्या पर विशेष ज़ोर दिया हैं.आईयें जानते हैं कैसी हो दिनचर्या

सुबह::

सुबह ब्रम्ह मूहूर्त मे उठना(समय प्रात: 4.30 बजे से 6.00 बजे तक) प्रथ्वी को प्रणाम कर ताम्र पात्र में रखा जल पीना व अपने इष्ट देव का  स्मरण करना.फिर दैनिक क्रिया से निवृत होकर 2 से 3 कि.मी.प्रतिदिन खुली हवा में पैदल चलना स्वास्थकर हैं.कपालभाँति,सूर्य नमस्कार ,अनुलोम-विलोम जैसी योग क्रियाएँ करें.सुबह नीम,तुलसी,पुदीना  की २ से ३ पत्तियाँ जल से लेने पर ह्रदय ,मधुमेह, उच्च रक्तचाप,व अन्य खतरनाक बीमारीयों से बचाव होता हैं.



१० से १५ मिनिट नियमित रूप से योग एवँ प्राणायाम करें सप्ताह में तीन दिन नहानें से पहलें तिल या सरसों तेल की मालिश कर धूपसेवन करना चाहियें. प्रतिदिन स्नान के लिये मोसमानुसार जल ले.
सुबह ८ से ९ बजे के बच नाश्ता करें नाश्ते में अंकुरित चना,मूंग,गेंहू व मोसमी फलों को रखें.

दोपहर::

१२ से १ बजे के बीच दोपहर का भोजन लेवें भोजन में १/३ भाग ही अन्न और दालेंं होनी चाहियें,बाकि २/३ भाग हरी सब्ज़ी और सलाद होना चाहियें .भोजन सादा  हो यानि ज्यादा तीखा,मिर्च मसालों और चटपटा नहीं होना चाहिये.

शाम::

शाम के वक्त थोड़ी देर खुली हवा में टहले तत्पश्चात हाथ मुँह धोकर हल्की योग क्रियाएँ करें .

रात::

रात का भोजन सोने से दो घंटे पहले करें भोजन में दलिया,खिचड़ी,और हल्के पदार्थों का सेवन करें जो पचनें में आसान हो.
भोजन के बाद दस से पंद्रह मिनिट वज्रासन में बेठें.
सोने से पहलें ध्यान मुद्रा में पन्द्रह मिनिट बेठें,तत्पश्चात शांतचित्त होकर बाँयी करवट लेटे.

जो व्यक्ति उपरोक्तानुसार आचरण कर जीवन जीता हैं,आयुर्वैद के अनुसार उसे वैघों या डाँक्टर की ज़रूरत बहुत कम पड़ती हैं.



                        अनुलोम विलोम

बुधवार, 9 सितंबर 2015

OBESITY AND AYURVEDA

मोटापा क्या हैं::-

मोटापा हमारें शरीर की एक विशेष अवस्था हैं,जिसमें शरीर का वज़न निर्धारित बाँडी मास इन्डेक्स (BMI) से अधिक हो जाता हैं.आम तोर पर स्वस्थ शरीर का बाड़ी मास इन्ड़ेक्स २३ से २५ तक होता हैं,यदि बाड़ी मास इन्ड़ेक्स २९ से अधिक होता हैं,तो माना जाता हैं कि व्यक्ति मोटापे से ग्रसित हैं. मोटापे से ग्रसित व्यक्ति के पेट ,कमर, जांघों, और शरीर के अन्य हिस्सों पर अतिरिक्त चर्बी का जमाव हो जाता हैं .
वजन कम कैसे करे
 मोटापा

मोटापे से होने वाली परेशानी::-

मोटापा समस्त बीमारीयों की जड़ हैं,मोटापे से ग्रसित व्यक्ति का सामाजिक, पारिवारिक जीवन गहराई से प्रभावित होता हैं.मोटापे से ह्रदय रोग,मधुमेह,ब्लड़ प्रेशर,श्वसन सँस्थान के रोग,घुट़नों से सम्बंधित रोग गहराई से सम्बंधित हैं.


 मोटापा कैसें कम करें ::-

१. मेदोहर गुग्गल सुबह शाम दो-दो वटी लेने से मोटापा कम होता हैं.

२. सुबह उठते ही गर्म पानी कर उसमें शहद,अदरक रस,एलोवेरा, और निम्बू रस मिलाकर पीयें.

३. ग्रीन टी में नीम रस मिलाकर पीनें से मोटापा कम होता हैं.

४.छाछ में सोंठ, जीरा मिलाकर भोजन से पहलें एक गिलास पीनें से मोटापा कम होता हैं.

५.वासा त्रिभुवनकिर्ती रस और महारास्नासप्तक क्वाथ मिलाकर सुबह शाम गिलोय रस के साथ लें.

६. भोजन में सलाद का हिस्सा २०   प्रतिशत होना चाहिये

७.मेदा , बेसन ओर जंक फूड़ से बचें.

८.भोजन को कई हिस्सों में बाँटे उदाहरण के लियें सुबह के नास्ते के बाद दोपहर के भोजन से एक घंटे पूर्व फलों का सेवन करें पश्चात चाय के समय ग्रीन टी और रात का भोजन ऊबला हुआ.

९.योगिक क्रियाँ कपालभाँति करें.

१०. गर्म पानी की भाप हर तीसरें दिन पूरें  शरीर पर लें

११.पेट साफ रखे इस हेतू रोज़ सोते समय त्रिफला चूर्ण एक चम्मच गर्म जल से लें.

१२. वसा युक्त पदार्थों का सेवन पूर्णत:  बंद करें

१३.अलसी को भूनकर स्वादानुसार सेवन करें.

१४.सोने की अनियमित शैली मोटापा बढ़ाने में बहुत मददगार मानी जाती हैं अत: सोने की निश्चित समय सीमा जरुर निर्धारित होना चाहिये ।

१५.व्यायाम में रनिंग को प्राथमिकता दे अनेक रिसर्च से ये प्रमाणित हुआ हैं की यदि व्यक्ति सुबह शाम आधा घंटा रनिंग करता हैं तो उसका बॉडी मास इंडेक्स संतुलित रहता हैं ।

१६.दिल्ली विश्वविद्यालय की टीम द्वारा मोटापे पर किये गये एक अध्ययन में सामनें आया की दालचीनी की 3 ग्राम के बराबर मात्रा भोजन में नियमित रूप से शामिल करने से मोटापे में उल्लेखनीय कमी प्रदर्शित होती हैं ।



जानिये पालक और मेथी के फायदे

# इंट्रागेसट्रिक बलून तकनीक [Inragestric balloon techniques] :::

कभी - कभी बहुत मोट़े लोगों का वज़न नियत्रिंत करना बहुत बड़ी चुनोतीं बन जाता हैं,ऐसे में कुछ विशेष तकनीकों का सहारा लेना पड़ता हैं,इंट्रागेसट्रिक बलून तकनीक भी उन्हीं तकनीकों में से एक हैं,इस तकनीक में सिलिकान का बना एक बलून फुलाकर पेट़ में स्थापित कर दिया जाता हैं,जिससे व्यक्ति को हमेशा पेट़ भरनें सा अहसास होता हैं.इस तकनीक में किसी भी प्रकार के आपरेशन की आवश्यकता नहीं पड़ती हैं,इसलियें ये तकनीक उन लोगों में विशेष फायदेमंद हैं,जो आपरेशन नही कराना चाहतें.

यह बलून अधिकतम एक वर्ष तक पेट़ में रखा जा सकता हैं.
कई लोग सवाल पूछतें हैं,कि क्या पेट़ में बलून का अहसास नही होता इसके जवाब में कई लोगों पर किया अध्ययन यह कहता हैं,कि शुरूआत में कुछ दिन असामान्य लग सकता हैं,जिसमें उल्टी होना,पेट़ दर्द होना,पेट़ फूला होना जैसें अहसास होता हैं,किन्तु कुछ दिन बाद शरीर सामान्य हो जाता हैं.

# भोजन घड़ी (food clock) :::

वजन कम करनें में भोजन घड़ी का बहुत अहम रोल होता जा रहा हैं,भोजन घड़ी के अनुसार 12 घंटे ऐसे निर्धारित किये जानें चाहियें जब शरीर मे अन्न का एक भी दाना नही जाए,यह समय यदि शाम से लेकर सुबह तक हो तो बेहतर रहता हैं.उदाहरण के लिये शाम को 7 से सुबह 7 बजे तक .

नोट- वैघकीय परामर्श आवश्यक


शिलाजित ,SHILAJIT HERBAL CORTICOSTEROID

शिलाजित::-

शिलाजित हिमालय,तिब्बत और काकेसस पहाड़ी के 1000 से 5000 मीट़र ऊँचाई पर पायी जानें वाली दुर्लभ औषधि हैं.यह औषधि चट्टानों पर पायी जाती हैं.इसका रंग धूसर काला से लगाकर हल्का पीलापन लियें होता हैं, गर्मीयों में यह औषधि चट्टानों से पिघलकर गिरती रहती हैं. हमारें रिषी मुनियों ने पाँच हजार वर्ष पूर्व से ही इसकी महत्ता को प्रमाणित करते हुये लिखा हैं
शिलाजं कटु तिक्तोष्णं कटुपाकं रसायनम् छेदि योगवहं हन्ति कफमे हाश्मशर्करा मूत्रकृच्छ छयं श्वासं वाताशार्सि च पाण्डुताम् अपस्मारं तथोन्मादं शोथकुषटोदरक्रिमीन.

घट़क द्रव्य::

शिलाजित का मुख्य घट़क फिलविक एसिड़ हैं,इसके अलावा इसमें ह्यूमिक एसिड़, फास्पोलिपिड़, पाँलीफिनोल समूह, अनेक खनिज़ पदार्थ विटामिन ए,बी,सी,और पी पाया जाता हैं.इसके अलावा गोण खनिज़ पदार्थ जैसे कोबाल्ट,निकल,कापर,जिंक,मेंगनिज़,और लोह तत्व प्रचुरता में पाये जातें हैं.

उपयोग::-

चायना आज खेल दुनिया की महाशक्ति हैं इसके पिछे उनकी कठोर मेहनत के अलावा शिलाजित का भी महत्वपूर्ण योगदान हैं.और चायना ने आज तक इस बात को राज़ बनाकर रखा हैं ,प्रतिवर्ष करोड़ों टन शिलाजित तिब्बत से चीनी खेल सँस्थानों के होस्टलो मे भेजा जाता हैं,जँहा से ये खिलाड़ियों के रोज़ की खुराक में सम्मिलित होता हैं.आईयें जानतें हैं इसके उपयोग
१.यदि दस ग्राम शिलाजित को प्रतिदिन गाय के दूध के साथ किसी खिलाड़ी को दिया जावें तो इस बात में कोई संन्देह नहीं कि वह खिलाड़ी अपनी विधा में सर्वोच्च प्रदर्शन करेगा.
२. शिलाजित बेहतरीन उम्ररोधी औषधि हैं, शरीर पर यदि उम्र का प्रभाव कम करना हो तो पुर्ननवा के साथ इसका सेवन करें चमत्कारिक परिणाम मिलेगें.
३.पुरूष नपुसंकता, वीर्य में शुक्राणु की कमी,शुक्राणु विक्रति में इसे कोंच बीज,बबूल फल चूर्ण के साथ सेवन करें.
४.स्त्रीयों से सम्बंधित समस्या जैसे श्वेत प्रदर, अंड़ाणु का कम बनना,रक्त प्रदर में परंपरागत औषधियों के साथ सेवन करवानें से लाभ कई गुना बढ़ जाता हैं.
५. शिलाजित एक बेहतरीन antiinflammatory औषधि हैं. यदि इसे तीन ग्राम प्रतिदिन गर्म जल के साथ सेवन करवाते हैं, तो केसा भी सूजन हो समाप्त हो जावेगा.
६.इसके सेवन से ब्लड़ प्रेशर,कोलेस्ट्रोल नियत्रिंत रहता हैं.
७.हड्डीयों से सम्बंधित समस्यों जैसे arthritis, fracture, में इसका सेवन परंपरागत औषधियों के साथ करें लाभ कई गुना बढ़ जावेगा.
८.मूत्रविकारों जैसे बहुमूत्रता, प्रोस्टेट का बढ़ना में इसक सेवन लाभदायक हैं.
९.किड़नी, लीवर की कार्यप्रणाली को शिलाजित मज़बूत बनाता हैं.
वास्तव में शिलाजित की विशेषता के बारें मे ये उदाहरण भर है यदि विस्तारपूर्वक कहा जावें तो सही अनुपात, सही मात्रा में दिया जाये तो यह हर मर्ज़ की दवा हैं.

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मंगलवार, 8 सितंबर 2015

HOW TO INCREASE BREAST SIZE



सुँदर और सुड़ोल स्तन हर नारी का सपना होता हैं, क्योंकि यहीं नारीत्व को निखारतें हैं. कई बार देखनें में आता हैं, कि कम उभार की वज़ह से स्त्रीयाँ हीन भावना की शिकार हो जाती हैं.कई बार यह भी देखनें में आता हैं, कि मँहगे कास्मेंटिक इस्तेमाल के बावजूद स्तनों का पूर्ण विकास नहीं हो पाता ,तो आईयें जानतें हैं कुछ सरल,प्रभावी आयुर्वैदिक उपचार

उपचार::

१.बादाम गिरी,  को बारीक पीस लें और तिल तेल को मिलाकर स्तनों के आसपास नहानें से एक घंटा पहलें लगायें स्तनों में दो महिनों मे उभार आ जावेगा.

२.तिल तेल,में चंदन घीसकर मिला दें इस घोल को बारह घंटे बाद स्तनों पर लगायें .ढीलें स्तनों में कसावट का अच्छा उपाय हैं.

३.शतावरी चूर्ण को सुबह शाम एक-एक चम्मच तीन माह तक लेने से स्तनों के विकास के साथ दूध में बढोतरी होती हैं.

४.अशोक छाल चूर्ण को रात में पानी में भीगोंकर रख दें सुबह पानी निकाल कर चूर्ण में मुलतानी मिट्टी मिलाकर स्तनों के आसपास लगायें .

५.तिल तेल से स्तनों की दस मिनिट़ तक हल्के हाथों से मालिश करें.

६.कपास तेल को दूध में मिलाकर रात को सोते समय सेवन करें स्तनों के विकास के साथ दूध में बढोतरी होगी.

७.भोजन में  गोभी, चुकन्दर का प्रयोग करें.


सोमवार, 7 सितंबर 2015

DENGUE and AYURVEDA

#1.सामान्य जानकारी::-

डेँगू वायरस जनित रोग  हैं,जो कि एडिज एडिप्टि  मच्छर के संक्रमित व्यक्ति को काटने के पश्चात स्वस्थ व्यक्ति को काटनें से फैलता हैं. डेँगू की विकास अवधि हमारें शरीर में सात से चोदह दिन होती हैं. इसका मच्छर मुख्यत: दिन के समय और शरीर के निचले हिस्सों मे काटता हैं
डेँगू का प्रकोप उष्णकटिबंधीय देशों मे अधिक होता हैं.इस बीमारी का अभी तक कोई मान्यता प्राप्त ईलाज़ नहीं हैं.मात्र लाक्षणिक चिकित्सा ही की जाती हैं


#2.लक्षण::

१.बुखार लगातार १०४ डिग्री फेरेनाइट से अधिक चिकित्सा के बाद भी बनें रहना.
२. आँखों के निचें लगातार तेज़ दर्द  जिससे देखने की समस्या हो जाती हैं.
४.शरीर में चकते होना.
५.उल्टी.
६.रक्त में स्थित प्लेटलेट्स का अचानक कम होना

७. ब्लड़ प्रेशर का अचानक से कम होना.

#3.उपचार::-

१. रोगी को तनाव मुक्त रखनें का प्रयास करें निर्जलीकरण से बचानें के लिये पानी का पर्याप्त सेवन करवायें,इसके लिये ओ.आर.एस.का घोल बना के पीलावें.
२. खानें में दलिया ,चावल,दही, माँस रस दे सकते हैं.
३. गिलोय रस को दो से तीन चम्मच दिन में तीन से चार बार पीलायें
४. पुर्ननवारिष्ट चार से पाँच चम्मच सुदर्शन चूर्ण के साथ दें.
५. रोगी को पपीता के पत्तों का रस निकाल कर पीलायें.
६. खून पतला करनें वाली दवाईयाँ न दें.
७. हल्दी, लोंग,काली मिर्च,वत्सनाभ,और तुलसी को समान मात्रा में मिलाकर वटी बना ले इसे सुबह शाम दो-दो वटी ले.
८.बकरी का दूध पीनें से इस रोग की रोकथाम में मदद मिलती है.
९.कद्दू और ककड़ी के बीज 100 - 100 ग्राम लेकर उन्हें पीसकर रोगी को सुबह शाम एक-एक चम्मच देनें से डेँगू में रोग प्रतिरोधकता बढ़ती हैं.

#4.सावधानियाँ::-

१. मच्छरों से बचाव के लिये घर के आस-पास साफ़ सफ़ाई का विशेष ध्यान रखें .घर की छत पर बरसात के पानी को एकत्रित न होनें दे.
२.पानी के खुले स्रोतों पर केरोसिन का तेल ड़ालें.
३. पूरी बाँहो के वस्त्र पहनकर रखें.
४. डेँगू प्रभावित जगहों से दूरी बनाकर रखें.

सलाह के लियें लिखें

Svyas845@gmail.com

नोट- वैघकीय परामर्श आवश्यक 






रविवार, 6 सितंबर 2015

OMEGA 3 FATTY ACID

Omega three fatty acid
Omega 3 fatty acids

               omega 3 fatty acid

#What are omega 3 fatty acid

Omega 3 fatty acid belong to polyunsaturated fatty Acids ( PUFA).The position of double bonds found in omega 3 fatty acids is different from other fatty acids which makes them unique. omega 3 fatty acids include eicosa pentaenoic acid (EPA) and Docosa Hexeanoic acid (DHA).The simplest omega 3 fatty acid is called Alapha linolenic acid (ALA).ALA can't be made in the body.plant and animal food which are very common comprise of ALA.

#Sources of omega 3 fatty acids

The primary dietary sources of omega 3 fatty acids include fishes,plants,and but oils.fishes such as samon,trout,herring,sardines and tuna contain large amounts of omega 3 fatty acids. Soyabean,pumpkin seeds,walnuts flaxseed and its respective oil extracts oil rich sources of ALA.Algae and krill are also good sources of omega 3 fatty acids.

#Symptoms of deficiency of omega 3 fatty acids

Fatigue

                         fatigue
Dry skin
Mood swings and depression
                         Depression
Acne
Immune dysfunction
Kidney Deterioration
Heart problems
Alzheimer's disease
Poor memory

#Health benefits of omega 3 fatty acids

Reduce high cholesterol, Reduce high blood pressure, prevent cardiovascular disease, prevent cancer, essential for normal function and growth of the brain

#Metabolism of omega 3 fatty acids

Dietary ALA is absorbed in the gut.After absorption of ALA in the gut,it can undergo several metabolic fate,such as:
#1.Undergoing beta oxidation of fatty acids.
#2.can act as a substrate for ketogenesis.
#3.can be incorporated in to phospholipids of cell membranes.
#4.can be stored in adipose tissue.

Finally we should always remember that not all kinds of fats are harmful for the body and some do aid in maintaining good health too.








प्रदूषित होती नदिया(River) कही सभ्यताओं के अंत का संकेत तो नही

विश्व की तमाम सभ्यताएँ नदियों के किनारें पल्लवित हुई हैं,चाहे मेसोपोटोमिया हो या हड़प्पा यदि नदिया नही होती तो न ये सभ्यताएँ होती और ना ही...