28 जुल॰ 2015

DR.ABUL PAKIR JANULLAUDDIN ABDUL KALAM

आयुर्वैद और योग मे गहन आस्था रखने वाले भारत माँ के लाड़ले स्वर्गीय डाँ.ए.पी.जे.कलाम को नम आँखों से नमन.

27 जुल॰ 2015

शारिरीक शक्ति और आयुर्वेद

आजकल की भागती दोड़ती जीवनशैली में व्यक्ति दिन भर काम करते-करते इतना थक जाता हैं, कि उसे अपने निजी सम्बंधों का सुख उठाने की ताकत ही नहीं बचती,फलस्वरूप पारिवारिक जीवन तनावों से घिर जाता हैं.इस पृकार की परिस्थितियों में व्यक्ति आत्महत्या तक कर लेता हैं .
आयुर्वैद ने हजारों वषों से व्यक्ति के जीवन को सदैंव मुश्किलों से उबारा हैं,और आज भी इस दिशा में पृयत्नशील हैं. आईयें जानते हैं उपचार-::

१.अश्वगंधा चूर्ण ,बबूल का गोदं,बबूल की फली,केसर,मुलेठी,धायफूल,कोंच बीज को विशेष अनुपात मे मिलाकर सेवन करनें से से केसा भी नामर्द हो चार माह मे मर्द बन जाता हैं.
२.अश्वगंधा तेल,महामाष तेल को मिलाकर सुबह शाम लिंग पर मालिश करने से व्यक्ति पारिवारिक जीवन का पूर्ण आनंद लेने के योग्य हो जाता हैं .
नोट-:वैघकीय परामर्श आवश्यक हैं.
शिलाजित के बारें में जानियें
Svyas845@gmail.com

26 जुल॰ 2015

EYE AND AYURVEDA

वर्तमान समय मे नेत्र विकार आधुनिक पीढी़ को बहुत तेज गति से अपनी गिरफ्त मे लेता जा रहा हैं, विश्व का हर युवा आँखों से सम्बंधित समस्या लेकर बहुत छोटी उमृ मे नेत्र रोग चिकित्सक के पास जानें लगा हैं, कम उमृ मे नेत्र रोग होनें का जो पृमुख कारण हैं, उनमें स्मार्टफोन, कम्प्यूटर, टी.वी. का घंटों तक लगातार इस्तेमाल पृमुख हैं.



लोग घंटों तक बेड़रूम की रोशनी बुझाकर लेटे-लेटे मोबाइल पर चेट करते रहते हैं, जिससे आँखों से सम्बंधित कई खतरनाक बीमारींयाँ होने लगी हैं, इनमें पृमुख रूप से शामिल हैं, आँखों का पानी सुखना,कम दिखाई देना, रेटिना मे तेज दर्द, ड्रायविंग करते वक्त सामनें से आने वाली दूसरे वाहन की रोशनी में आंखे चोंधिया जाना, और कभी-कभी तो आदमी अन्धा तक हो जाता हैं. आयुर्वैद में इस पृकार की परिस्थितियों में जो बातें बतायी गयी हैं उनमें:-




१.त्रिफला चूर्ण  चार चम्मच लेकर उसे 200ml पानी में रात भर भीगों दें, सुबह छानकर इस पानी से आँखों में छींटें डालें.



२. त्रिफला चूर्ण वयस्क दो चम्मच बच्चें एक चम्मच को रात को सोते समय गर्म जल से सेवन करवायें.



३.शहद को तिल तेल मे समानुपात मे मिलाकर आँखों में अंजन करें.



४.आंवला और गाजर का रस सेवन करें



५.घृतकुमारी(alo vera ) का गुदा निकालकर उसमें मुलतानी मिट्टी मिला ले इस पेस्ट को आँखों पर बांधें.




६.पके हुए पीले फलों जैसे आम, पपीता आदि में विटामिन ए पर्याप्त मात्रा में पाया जाता हैं अतः आंखों से संबंधित बीमारियों में पीले फलों का सेवन अवश्य करना चाहिए।






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24 जुल॰ 2015

MAHANARAYAN, AND MAHAMASH OIL,



Dear Friend's

Today we give information about  oils.

Mahanarayan oil::-


This oil is very effective in rheumatoid arthritis,paralysis, gout,lock jaw and trismus,tetanus ,deepnessdeepness and osteoarthritis
It is very effective in sterility male and women.
It acts as a rejuventor .
This oil can be used both internally and externally.

Note-:doctor advice is essential.

Svyas845@gmail.com.

kasisadi oil,somraj oil,sadbindu oil


Mahamash oil::-


Contents::-

Shodhit til Tel,Ashwgandha,kachur,Devdaru,bala mool,Rasna,Prasarni,kooth,phalsa,Bharangi,vidarikand,Punarnava,satvari,vijora nimbu,safed jeera,sahajeera,Hong,sound,Gokhuru,piplimool,chitrakmool,sendha namak,jevaneeyagan,urad,Bala mool ,Ashtwarg and other.

Action::-

Mahamash oil is one of the main oils used in panchkarma therapy in india. This compound herbal oil has many herbal.

Therapeutic uses::-

Joint pain,inflammation, paralysis, stiffness, poor circulation of blood in joints and muscle, arthritis, all type of vata disorders, lamp vata .
It is useful in urdhajatrugat vata disease in the form of nasya,karna tarpan.
In panchkarma this oil is roadly use in Abhyanga and shirodhara.
In kampvata (parkinsanism) this oil is very effective use as a form of Nasya.

Dosage::-

As directed by the physician.




MENTAL PROBLEM AND AYURVEDA

मानसिक तनाव ऐसी अवस्था हैं, जो हर एक व्यक्ति के जीवन को कभी न कभी पृभावित करती हैं. आधुनिक जीवनशैली ने तो तनाव को उस चरम अवस्था तक पहुँचा दिया है कि विश्व अाज नयी-नयी बीमारीं के आगोश मे जा रहा हैं,आज की आधुनिक चिकित्सा पद्ति के सामनें  भी मानसिक रोगों का उपचार एक चुनोतीं बनकर उभरा हैं. क्योंकि आधुनिक चिकित्सा पद्ति  के सामने मस्तिष्क की कार्यपृणाली आज तक अनसुलझी हुई हैं.भारत को इस मामले मे अपने आप को भाग्यशाली मानना चाहिये कि यहाँ हजारों वर्षों पूर्व हमारें रिषि मुनियों ने मानसिक रोगो का न केवल सटीक वर्णन किया बल्कि सटीक उपचार भी दिया इस  बात के साझ्य अनेक पृाचीन चिकित्सा गृंथ हैं. आइये जानतें हैं इसका आयुर्वैद उपचार:-

१.बृाम्ही वटी पृभाकर ,आवँला चूर्ण, बादाम,शंख भस्म,जटामासी ,सर्पगंधा, को मिलाकर सेवन करवाते रहने से केसा भी मानसिक विकार हो समाप्त हो जाता हैं.
२.चाय की हरी पत्तियाँ, तुलसी पत्र,गाजर पत्र, तेज पत्र, को पानी मे उबालकर उसमे शहद या गुड़ मिलाकर सेवन करने से जटिल मानसिक रोगो मे भी आराम मिलता हैं.
३.योगिक कृियाएँ जैसें भसतिृका, भृामरी,पृाणायाम, कपालभाँति, ध्यान,ऊँ उच्चारण बीमारीं को समाप्त कर देता हैं.

विशेष-:वैघकीय परामर्श आवश्यक है

Svyas845@gmail.com

20 जुल॰ 2015

पाईल्स या बवासीर या अर्श के कारण ,प्रकार और बीमारी का प्रबंधन

पाईल्स या बवासीर या अर्श के कारण ,प्रकार और बीमारी का प्रबंधन

आयुर्वैद चिकित्सा जिन बीमारींयों के उन्मूलन का दावा करती हैं, उनमें अर्श अर्थात (Piles) पृमुख हैं .अर्श वास्तव में गुदा मार्ग में होने वाली बीमारीं हैं  जिसमें गुदा मार्ग में शोच के वक्त ज्यादा दबाव पड़ने से गुदा मार्ग की रक्त नलिकाएं फूल जाती हैं. और इनमें जलन व खून भी निकलता हैं.


आयुर्वेद ग्रन्थों में अर्श का वर्णन करतें हुए लिखा हैं 


अरिवतप्रणानहिंस्ति 

 बवासीर अर्थात अर्श [Piles] वह बीमारी हैं जो प्राणों को इतना कष्ट पहुंचाती है कि व्यक्ति का पूरा ध्यान अपने सामान्य कामकाज से हटकर दुश्मन की भाँति उसी पर लग जाता हैं ।




पाईल्स कैसे ठीक करे
 बवासीर या अर्श

# बवासीर या अर्श के प्रकार :::



बवासीर मुख्यत : दो तरह के होते हैं ::

#1. अंदरूनी बवासीर या अर्श



इस अवस्था में रोगी को रोग की तीव्रता का अंदाज़ा बहुत बाद में चलता हैं ।अंदरूनी बवासीर की भी चार अवस्था होती हैं जो निम्न हैं 




1.प्रथम अवस्था :::



इस अवस्था में गुदामार्ग के अंदर रक्त नलिकाओं पर सूजन होती हैं ,किन्तु दर्द नहीं होता हैं ।कभी मल त्यागते समय मल के साथ रक्त आता हैं ।

यदि समय पर इस अवस्था को पहचानकर इलाज शुरू कर दिया जाये तो ओषधियों द्वारा आसानी से इस बीमारी को ठीक किया जा सकता हैं ।





2.द्वितीय अवस्था :::



इस अवस्था में रक्तनलिकाओं के अंदर सूजन के साथ दर्द भी होता हैं । मल त्यागते समय मस्से बाहर निकलते हैं जो मल त्याग के बाद वापस अंदर चले जाते हैं ।इस अवस्था का भी ओषधियों द्वारा सफलतापुर्वक इलाज किया जा सकता हैं ।




3.तृतीय अवस्था :::


इस अवस्था में मस्से मल त्यागते समय बाहर आ जाते हैं जिन्हें बाहरी दबाव लगाकर ही अंदर किया जा सकता हैं । मस्सों में अत्यधिक तीव्र वेदना होती हैं । साथ ही आँतों में तनाव महसूस होता हैं । 

इस अवस्था की चिकित्सा क्षारकर्म या अग्निकर्म द्वारा सफलतापुर्वक की जा सकती हैं ।



4.चतुर्थ अवस्था :::


इस अवस्था में मल त्यागते समय असीम दर्द होता हैं । मस्से बाहर निकलते हैं जो अंदर नही जा पाते । रक्त भी अधिक निकलता हैं जिससे रोगी के शरीर में खून की कमी हो जाती हैं । रोगी शोच के बाद ठीक से बैठ भी नही पाता हैं ।

इस अवस्था को एक या अधिक बार क्षारसूत्र और लम्बे समय तक ओषधि सेवन के द्वारा ठीक किया जा सकता हैं ।


2.बाहरी बवासीर 



इस प्रकार के बवासीर में मलद्वार के समीप छोटी छोटी गांठे बन जाती हैं जिनमें असीम दर्द होता हैं । ये गांठे रक्त के जमने से बनती हैं । कभी कभी इनसे रक्त भी निकलता हैं जिसके बाद रोगी को तीव्र दर्द महसूस होता हैं ।


बवासीर या अर्श के कारण :::


1.कब्ज :::



पेट में रहने से शोच के लिये अधिक दबाव लगाना पड़ता हैं । फलस्वरूप गुदामार्ग की रक्त नलिकाएँ फूलकर शोच में रुकावट पैदा करती हैं और दर्द के साथ खून निकलता हैं।


2.खराब जीवनशैली :::



लम्बें समय तक बैठकर काम करना। पैदल चलने का आभाव इस रोग को पैदा करने वाले सबसे प्रमुख कारक हैं ।


3.खराब खान - पान :::



भोजन करने की अनियमित जीवनशैली ,खाने में अधिक तीखा,मसालेदार और फास्टफुड लेना । सलाद,रेशेदार पदार्थों का भोजन में अभाव बवासीर के प्रमुख कारक हैं ।

अधिक अल्कोहल शीतल पदार्थों और तम्बाकू का सेवन भी इस रोग का प्रमुख कारण हैं ।




4.मंदाग्नि 



आयुर्वेद मतानुसार अर्श का मूल कारण मंदाग्नि हैं जब खाया हुआ भोजन अमाशय में पड़ा रहता हैं और इसमें स्थित रसो का पाचन अमाशय द्धारा नही हो पाता हैं तो यह भोजन अमाशय की चिकनाई खत्म कर कब्ज पैदा करता हैं । 


जब व्यक्ति मल बाहर निकालने के लिए जोर लगाता है तो मल द्धार और अमाशय की रक्तनलिकाओं में सूजन आ जाता हैं फलस्वरुप ये नलिकाएँ मलद्वार से बाहर लटकनें लगती हैं। 





लक्षण :::



१. गुदा मार्ग के आसपास और अंदर खुजली।


२.मलत्याग के समय खून निकलना और तीव्र वेदना ।


३.मल के साथ चिपचिपा स्त्राव।


४.मल त्यागते समय मस्से बाहर निकलना ।


५.बार बार शोच जाने की इच्छा के साथ गुदा में दर्द ।




# प्रबन्धन::-



१.अर्श कुठार रस, निसोठं,हरड.,चव्य, पिपली,सनाय पत्ती,चितृक को विशेष अनुपात मे मिलाकर रोगी को लगातार 6 माह तक सेवन करवाने से अर्श समाप्त हो जाता हैं.


२.अभयारिष्ट क्वाथ को चार चम्मच समान जल के साथ सुबह शाम भोजन के बाद सेवन करवाएँ.


३.कांकायन वटी ,अशोकवघ्न वटी को दो-दो के अनुपात मे मिलाकर रात को सेवन करवाएँ .


४.त्रिफला गुग्गल रात को सोते वक्त दो गोली उष्ण जल के साथ सेवन करें.


५.मधुयाष्ठि तेल दिन मे दो बार पृभावित स्थान पर लगाएँ.


६.कब्ज (constipation)न होनें दे.


७.छाछ में जीरा और नमक डालकर भोजन उपरांत पिने से बहुत लाभ मिलता हैं ।

• आयुर्वेद ग्रंथों के अनुसार नमक

८.नारियल की जटा निकालकर उसे जला ले ,इसे मक्खन के साथ मिलाकर सेवन करने से प्रथम अवस्था और द्वितीय अवस्था के रोगी को शतप्रतिशत आराम मिलता हैं ।


९.किशमिश को रातभर भिगोकर सुबह उसका जूस बनाकर सेवन करें ।


१०.भोजन में सलाद को अनिवार्य बनाने से यह बीमारी नही होती हैं ।


११.इस बीमारी से प्रभावितों को कपालभांति,पवनमुक्तासन,वज्रासन आदि अनिवार्य रूप से योगाचार्य के निर्देशन में करना चाहियें ।


१२.एलोवेरा,आँवला जूस का सेवन करने से रोग नहीं होता हैं ।


###कांकायन वटी (kankayan vati) :::


# घट़क (content) :::


० हरीतिकी (haritiki).

० कालीमिर्च (black pepper).

० जीरा (cumin).

० बड़ी इलायची (large cardamom).

० पीपरामूल (pepramul).

० चव्य (chavya).

० चित्रकमूल (chitrakmul).

० सौंठ (dry ginger).

० शुद्ध भिलावा (pure bhilava).

० जिमीकंद (jimikand).

० यवक्षार (yavkshar).

# रोगाधिकार (indication) :::


० खूनी बवासीर (piles).

० पीलिया (jaundice).

० पेटदर्द (abdominal pain).

० भूख में कमी या अपच (indigestion).

# मात्रा (Dosage) :::


छाछ या गर्म जल से वैघकीय परामर्श से.



14 जुल॰ 2015

Ayurveda and jaundice

आज हम आयुर्वैद उपचार के अन्तर्गत कामला अर्थात पीलिया (jaundice) की चर्चा करेंगें आयुर्वैद में स्वस्थ शरीर के लिये वात, पित्त एँव कफ का संतुलित रहना आवश्यक है. इन तीनों का असन्तुलन रोग उत्पन्न करता हैं.

पीलिया पित्त का असन्तुलन हैं, यह रोग लीवर यानि यकृत को पृभावित करता हैं, और रक्त निर्माण बाधित करता हैं, आयुर्वैद में पीलिया का बहुत सटीक उपचार वर्णित हैं,


१.पुर्ननवा मन्डूर, नवायस लोह, दृाछा, अश्वगंधा, शिलाजित ,हल्दी ,बायबिडंग को विशेष अनुपात मे मिलाकर रोगी को लगातार चार हफ्तों तक सेवन करवाने से बीमारीं समाप्त हो जाती हैं.


२.रोगी को दिन में दस बारह बार एक गिलास गन्नें का रस दाडिमाष्टक चूर्ण स्वादानुसार मिलाकर पिने से रोग जड़ मूल से नष्ट हो जाता हैं और भविष्य मे दुबारा वापस नहीं होता हैं.


३.योग की अनेक किृयाएँ जैसे कपालभांति, सू्र्यनमस्कार ,शीर्षासन ,पद्मासन और पृाणायाम इस रोग को समाप्त करता हैं.
Email-Svyas845@gmail.com

12 जुल॰ 2015

उच्च रक्तचाप का आयुर्वेदिक इलाज

आज  भारत और विश्व के सामने जिन बीमारींयों  ने चुनोंती पृस्तुत की हैं उनमें उच्च रक्तचाप का नाम पृथम पंक्तिं में लिया जाता हैं .उच्च रक्तचाप वास्तव में जीवनशैली (LIFESTYLE) से जुडा रोग माना जाता हैं. आधुनिक चिकित्सा पद्ति इस रोग पर अनुसधांन करते- करते आयुर्वैद और योग चिकित्सा पद्ति की शरण मे आ चुकी हैं., आज विश्व पृसिद् संस्थान एम्स  नासा, इसरो, अमेरिका के सैंकडों अस्पताल  ये मान चुकें है कि उच्च रक्तचाप और  जीवनशैली से जुडीं  अन्य बीमारींयों मे  पृाकृतिक चिकित्सा पद्ति आयुर्वैद और योग का कोई सानी नहीं हैं.आईयें जानते हैं.



१. पंचकर्म आयुर्वैद मे उच्च रक्तचाप को नियतिृंत कर उसे जड़ से समाप्त करता हैं.

२.आयुर्वैदिक औषधियां जैसें अर्जुन छाल पृभाकर वटी, सर्पगंधा,जटामासी , मालकांगनी और लहसुनादि वटी को  विशेष अनुपात मे मिलाकर उच्च रक्तचाप रोगी को लगातार  सेवन कराया जाता हैं, तो उच्च रक्तचाप जड़ से समाप्त हो जाता हैं.

३.योग की पारपंरिक  पद्तियां जैसें प्राणायाम,भस्त्रिका, शवासन  रोग को समाप्त करने वाली हैं.



४.मूंग में पोटेशियम,मैग्नेशियम और फायबर पर्याप्त मात्रा में पाये जातें हैं जोकि रक्तचाप सामान्य रखनें के अनिवार्य तत्व हैं ।अत: मूंग का सेवन नियमित अँतराल से करते रहना चाहियें ।

० नीम के औषधीय उपयोग


० गिलोय के फायदे



० पारस पीपल के औषधीय गुण








10 जुल॰ 2015

ASTHMA TREATMENT अस्थमा का घरेलू इलाज

आज हम अस्थमा के आयुर्वैदिक उपचार के बारे मे चर्चा करेंगें अस्थमा आधुनिक चिकित्सा जगत के सामने सबसे जटिल व्याधि के रूप मे विधमान हैं आज आधुनिक चिकित्सा पद्ति या एलोपैथी अस्थमा को पू्र्णत: समाप्त करने मे सझम नहीं हैं किन्तु आयुर्वैद हजारों वषों   वषों पूर्व से इसको समूल  समाप्त करने का विधान करता हैं हमारें  रिषि - मुनियों ने पृाचीन गृन्थों मे मे इसे कफजनित बीमारीं के  रूप वर्णित किया हैं यदि इसके उपचार की बात करें तो

१.श्वास पृणाली में शोथ (inflammation) खत्म करने वाली औषधि दी जाती हैं जिससे रोगी खुलकर श्वास ले सके.

२. बलगम बाहर निकालने वाली औषधि का पृयोग किया जाता हैं .

३.इसके अलावा कुछ विशेष जडीं- बूटियां और आयुर्वैदिक औषधि जैसे  चंदृकांत रस श्वास कुठार रस पुर्ननवा को विशेष अनुपात मे मिलाकर रोगी को दिया जाता हैं.


यदि इन औषधियों को लगातार ३-४ महिनों तक पृयोग किया जाता हैं तो अस्थमा का पूर्ण रोकथाम    सभंव है.



शहद और पिप्लली एक एक चम्मच सुबह दोपहर शाम लेनें से अस्थमा में आराम मिलता हैं ।


• तीन चम्मच कटेरी के रस में एक एक चुटकी सौंठ,काली मिर्च और पिप्पली मिलाकर सुबह शाम सेवन करनें से खाँसी के साथ होनें वाले अस्थमा में आराम मिलता हैं ।


• एक चम्मच बहेड़ा का चूर्ण एक चम्मच शहद मिलाकर लेनें से पेट में गैस के साथ होनें वाले अस्थमा में आराम मिलता हैं ।

• अडूसा पत्र, हल्दी,गिलोय और कटेरी का फल इन तीनों को समान मात्रा में लेकर काढ़ा बनाकर सुबह दोपहर रात में गरम गरम 20 मिलीलीटर पीयें । अस्थमा में बहुत फायदा होगा ।

• अस्थमा के तीव्र दौरे में एक चम्मच लहसुन का रस गर्म पानी के साथ मिलाकर पीनें से अस्थमा के दौरो में राहत मिलती हैं ।


• हल्दी को तवे पर सेंक ले और इसे मुंह में रखकर चूलें इससे अस्थमा के दोरें  कम हो जातें हैं ।



•  एक चम्मच सैंधा नमक 100 मिलीलीटर सरसों तेल में गर्म कर छाती पर मालिश करें इससे अस्थमा नियत्रिंत होता हैं और श्वास नलिकाओं की सूजन समाप्त होती हैं ।



• अस्थमा के तीव्र दौरो में तीन चार चम्मच यूकेलिप्टस तेल को गर्म पानी में डालकर भाप लें । और इस गर्म पानी से निचोकर एक तौलिया सीने पर रखें,इससे छाती की मांसपेशयों में लचीलापन आकर श्वसन प्रणाली सुचारू बनती हैं ।


अस्थमा होनें पर क्या नहीं करना चाहिए



 अस्थमा रोगी को रोग को बढानें वाली चीजों जैसें दही,केला,आइस्क्रीम, खट्टे पदार्थ आदि के सेवन नहीं करना चाहिए ।


• अस्थमा रोगी को उन चीजों से बचने का प्रयास करना चाहिए जिनसे कि अस्थमा होनें की संभावना होती हैं जैसें धूल,धुँआ,फूलों के परागकण,तीव्र खूशबू,आदि ।



• अधिक प्रदूषण में यदि घर के बाहर निकल रहें हो तो मुंह पर मास्क अनिवार्य रूप से पहनकर निकलें ।






9 जुल॰ 2015

स्वाईन फ्लू SWINE FLU TREATMENT

 स्वाईन फ्लू SWINE FLU TREATMENT ::-


स्वाइन फ्लू आज वि्श्व की सर्वाधिक चुनौतीपू्र्ण बीमारी बन कर आधुनिक  चिकित्सा विञान के समझ खडी है जिसका पू्ूूू्र्ण उपचार आधुनिक चिकित्सा पद़़ति के पास नहीं है किन्तु आयुर्वैद चिकित्सा जौ कि विश्व की सबसे पुरानी पद्ति है मे स्वाइन फ्लू  का वर्णन पृतिश्या़य चिकित्सा के रूप मे हुअा है साथ ही इसके पूर्ण उपचार का भी वर्णन हैं।


 अब सवाल उठता हैं यदि किसी को स्वाइन फ्लू हो जाए तो सर्व पृथम आयुर्वैद उपचार क्या हो आईए जानते हैं

१-अमृता या गिलोय कि ऊगंली बराबर गीली लकडी लेले.


२.एक चम्मच हल्दी पावडर ले.


३.एक छोटा टुकडा अदरक का ले.

४.दस पत्ते तुलसी  के ले.


इन चारों को एक गिलास पानी मे मिलाकर तब तक उबाले जब तक पानी १ चोथाई रह जावे
इस काडे को लगातार ३ दिनों तक सुबह शाम खाली पेट पीनें से स्वाइन फ्लू की रोकथाम होती हैं।

सेवन विधि=  बच्चों को १/२ 

० नीम के औषधीय उपयोग


० गिलोय के फायदे


० गौमुखासन




० फिटनेस के लिये सतरंगी खान पान



टाप स्मार्ट हेल्थ गेजेट्स इन हिंदी। Top smart health gadgets

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