18 मई 2016

विश्व स्वास्थ संगठन । World health organization परिचय, क्षेत्रीय कार्यालय, संरचना और कार्यप्रणाली

विश्व स्वास्थ संगठन, डब्ल्यू एच ओ



#1.विश्व स्वास्थ संगठन परिचय :::


विश्व स्वास्थ संगठन (world health organisation) या W.H.O संयुक्त राष्ट्र संघ (U.N.O.) का आनुषंगिक अभिकरण हैं.


स्थापना ---7 अप्रेल 1948


मुख्यालय--- जेनेवा (स्विट्जरलेंड़)


सदस्य देश-- 194 अमेरिका ने जुलाई 2020 में विश्व स्वास्थ्य संगठन से अलग होने की घोषणा की है।



#2.क्षेत्रीय कार्यालय::-




विश्व के विभिन्न भागों में स्थित छ: क्षेत्रीय कार्यालय हैं,इनमें शामिल हैं:::-


1.दक्षिण-पूर्व एशिया ---- नई दिल्ली (भारत)


2.पूर्वी भू-मध्यसागर ---- अलेक्सजेन्ड्रिया (मिश्र)


3.पश्चिमी प्रशांत      ----  मनीला (फिलीपींस)


4.अमेरिका            ----   वाशिगंट़न डी.सी.


5.अफ्रीका             ----   ब्रेंजाविलें (कांगों)


6.यूरोप                 ----   कोपनहेगन (डेनमार्क)


#3.संरचना:::-



1.विश्व स्वास्थ महासभा.


2.कार्यकारी बोर्ड़.


3.क्षेत्रीय समितीयाँ.


4. सचिवालय.






#4.उद्देश्य:::-



विश्व के समस्त राष्ट्रों में निवासरत व्यक्तियों की बिना किसी जाति,प्रजाति, धार्मिक भेदभाव,राजनितिक भेदभाव ,तथा सामाजिक, आर्थिक,भेदभाव के बिना स्वास्थ दशा को उन्नतशील बनाना.


#5.विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्य:::-



संगठन अन्तरिम स्वास्थ कार्यों से संबधित समन्वयकारी प्राधिकरण के रूप में कार्य करता हैं.इनमें


1. स्वास्थ सेंवाओं का विकास.


2. रोग निवारण व नियंत्रण.


3. पर्यावरणीय स्वास्थ का संवर्धन.


4. स्वास्थ सेंवाओं से संबधित शोध,स्वास्थ कार्यक्रमों का विकास एँव प्रोत्साहन शामिल हैं.


5.दवाईयों तथा टीकों का उत्पादन और गुणवत्ता नियत्रंण.


6. समस्त विश्व के स्वास्थ आँकड़ों का संग्रहण,विश्लेषण और प्रसारित करना.


7. महामारीयों के सम्बंध में चेतावनी प्रसारित कर रोकथाम के उपाय करना.


ये स्वास्थ संगठन के कुछ महत्वपूर्ण कार्य हैं.

#6.मूल्याकंन::-



विश्व स्वास्थ संगठन संयुक्त राष्ट्र के अभिकरण के रूप में अपनी भूमिका निर्वाहित करनें में सफल रहा हैं.इसकी स्थापना के बाद से महामारीयों के रोकथाम का उल्लेखनीय प्रयास हुयें हैं.पूर्व में जहाँ महामारीयों से लाखों-- करोंड़ों लोग काल कवलित हो जातें थें,वहीं आज के परिदृश्य में यह सँख्या सिमटकर कुछ सेकड़ों  में रह गई हैं.



विश्व स्वास्थ संगठन के सामनें चुनोंतीयाँ भी लगातार बढ़ती जा रही हैं,संगठन जहाँ एक और पारपंरिक बीमारीयों  जैसे मलेरिया, एड्स, टी.बी.को पूर्णत: समाप्त करनें में असफल रहा हैं,वहीं नित नई बीमारीयों जैसें ज़ीका वायरस (zika virus),स्वाइन फ्लू (swine flu), कोरोनावायरस,संगठन के सामनें चुनोतीं प्रस्तुत कर रही हैं.



अत: आवश्यकता इस बात की हैं,की संगठन स्वास्थ से संबधित अनुसंधानों में विकासशील राष्ट्रों को और अधिक वित्तीय,तकनीकी,और मानवीय मदद मुहेया करवायें तभी संगठन अपने उद्देश्यों में सफल हो पायेगा. 





17 मई 2016

TULSI ,THE MEDICINAL PLANTS FOR HUMAN BEINGS

     #1.परिचय::-



       हिन्दू धर्म विश्व का सबसे प्राचीन और वैग्यानिक        धर्म माना गया हैं,और इसको वैग्यानिक बनानें में        इस धर्म के प्रतीकों जैसें तुलसी ,पीपल का              विशिष्ठ स्थान हैं.तुलसी के बिना हिन्दू                      धर्मावलम्बीयों का आँगन सुना माना जाता                हैं.बल्कि यहाँ तक कहा जाता हैं,कि जहाँ              तुलसी का वास नहीं होता वहाँ देवता भी निवास        नहीं करतें हैं.बिना तुलसी के चढ़ाया हुआ प्रसाद        भी ईश्वर ग्रहण नहीं करतें हैं.
                     
Tulsi picture
 Tulsi plant
                        
    तुलसी की 6 से 7 प्रकार की किस्में होती हैं,परन्तु     मुख्य रूप से तीन प्रकार की ही तुलसी अधिक         अधिक प्रचलन में हैं.जो निम्न हैें::-


#1. राम तुलसी जिसका वानस्पतिक नाम (scientific name) आँसीमम ग्रेटिकम हैं.


#2.काली तुलसी या कृष्ण तुलसी जिसका वानस्पतिक नाम आँसीमम अमेरिकन हैं.


#3.पवित्र तुलसी इसे वानस्पतिक जगत में आँसीमम सेक्टम कहतें हैं.


भारतीय घरों में राम तुलसी जिसकी पत्तियाँ हरी (green) तथा कृष्ण तुलसी जिसकी पत्तियाँ बैंगनी रंग की होती हैं ,पायी जाती हैं.


   #2.संगठन (compositions)::-



    तुलसी की पत्तियों में 0.3 % तेल की मात्रा होती       हैं,जिनमें युजीनाँल 71% , युजीनाँल मिथाईल         ईथर 20%, तथा 3% काविकोल रहता हैं. इसमें       विटामिन सी प्रचुरता में पाया जाता हैं.एसिड़             (acid) के रूप में पामिटिक,औलिक तथा               लिनोलैनिक अम्ल उपस्थित रहतें हैं.जैव रसायनों       में ट्रेनिन,सेवेनिन ,एल्कोलाँइड़ तथा ग्लाइकोलाँइड़     उपस्थित रहतें हैं.


#3.तुलसी का औषधिगत उपयोग::-



   जहाँ तक तुलसी के औषधिगत प्रयोग की बात          हैं,वहाँ भारतीय धर्मग्रन्थ और आयुर्वैदिक ग्रन्थों में      इसके विषय में विस्तारपूर्वक लिखा गया                  हैं.भावप्रकाश निघण्टु में लिखा हैं::-


  तुलसी कटुका तिक्ता हृघोष्णा दाहपित्तकृत         दीपक कुष्ठकृच्द्दास्त्रपाश्व्र रूक्कफवातजित



   अर्थात तुलसी की पृकृति उष्ण स्वाद कड़वा होता      हैं,इसके सेवन से पित्त, दाह,रक्तविकार,वात जैसें      रोग शांत होकर रोग प्रतिरोधकता बढ़ती हैं.


   तुलसी पर अनेक शोध हो चुके हैं और इन शोधों के    द्धारा तुलसी अनेक रोगों पर प्रभावी सिद्ध हो चुकी    हैं,जैसें::-
#1.तुलसी कीटाणु और जीवाणुनाशक होती है,इसमें पाया जानें वाला ईथर ट्यूबरक्लोसिस (tuberculosis) के जीवाणु को बढ़नें से रोक देता हैं.इसके लिये तुलसी को विशेष अनुपात में मक्खन और शहद (honey) में मिलाकर रोगी को सेवन करवातें हैं.


#2. मलेरिया होनें पर तुलसी के पत्तों को 5:3:1 में काली मिर्च और लौंग के साथ पीस लें यह मिश्रण बराबर हिस्सों में बाँटकर सुबह शाम मरीज को देतें रहें एक हफ्तें तक देतें रहनें से मलेरिया (malaria) ,जड़ से खत्म हो जाता हैं,इसके साथ हल्दी,चिरायता,गिलोय मिश्रित कर देनें पर स्वाइन फ्लू (swine flu) की औषधि तैयार की जाती  हैं.


#3. Typhoid होनें पर तुलसी रस को पुनर्नवा के साथ मिलाकर देनें से तत्काल फायदा होता हैं.


#4.गठिया ( Rumetoid arthritis) में गाय के दूध में तुलसी के पत्तों को पीसकर एक घंटे के लियें रख दें,तत्पश्चात दूध पीयें.


 #5.स्मरण शक्ति कमज़ोर होनें पर रोज़ पाँच तुलसी पत्र मिस्री के साथ सेवन करें।

#6.फोड़े फुंसियों तथा रक्त सें संबधित विकारों में तुलसी बीज का सेवन गिलोय के साथ करें.

#7.नपुसंकता होनें पर तुलसी बीज का सेवन गाय के दूध के साथ करें.

#8.तुलसी जड़ को बारीक पीसकर पान के साथ मिलाकर खाते रहनें से बांझपन नहीं रहता हैं.


#9. सर्दी, खाँसी हो जानें पर तुलसी, अदरक,काली मिर्च,लोंग तथा अजवाइन मिलाकर काढ़ा बनाकर पीनें से तुरन्त आराम मिलता हैं.


#10. तुलसी पत्तियों, करी पत्तियों तथा महुआ पत्तियों को समान मात्रा में मिलाकर पीस लें इसे भोजन के साथ चट़नी की तरह खायें मधुमेह (Diabetes) का रामबाण इलाज हैं.


#11.आँखों से कम दिखाई देता हो तो तुलसी रस में सफेद प्याज (white onion) का रस 5:1 मात्रा में मिलाकर आँखों में डालें.


#12. यदि नाक की सूघंनें की क्षमता खत्म हो गई हो तो तुलसी पत्र को हाथों  से मसलकर सूँघना चाहियें.


#13.चेहरे पर झुर्रीया ,कील मुहाँसे हटानें तथा चेहरे का सोन्दर्य  बढ़ानें हेतू तुलसी रस को चंदन पावडर के साथ मिलाकर नहानें से पहलें चेहरे पर लगायें.


#14.तुलसी निम्न रक्तचाप के लिए जानी मानी औषधि हैं तुलसी के पत्तों का सुबह शाम सेवन न केवल निम्न रक्तचाप को ठीक कर सामान्य बनाता हैं बल्कि तुलसी शरीर का रक्तसंचार भी ठीक रखती हैं।


# तुलसी शरीर को प्रदूषण से बचाती हैं आधुनिक शोधों के अनुसार तुलसी के दो तीन पत्तें रोज खानें से व्यक्ति के शरीर पर पड़नें वाला प्रदूषण का प्रभाव बहुत कम हो जाता हैं और शरीर में मौजूद प्रदूषक कण शरीर से बाहर निकल जातें हैं। 


तुलसी की उपयोगिता को लेकर अनेक शोध हो रहें हैं,और अनेक हो चुके हैं.एक महत्वपूर्ण शोध के अनुसार जिस जगह तुलसी का पौधा लगा होता हैं,उसके पाँच मीट़र तक मच्छर नहीं रहतें हैं.

एक अन्य शोध के अनुसार जिस जगह तुलसी पौधा हरा भरा होता हैं वह जगह स्वच्छ मानी जाती हैं,यदि तुलसी पौधा किसी जगह पर पर्याप्त देखभाल के बाद भी नहीं पनप पाता हैं,तो वह जगह निश्चित रूप से प्रदूषित मानी जाती हैं.

हमारें आँगन में तुलसी लगानें का भी यहीं उद्देश्य रहा होगा तभी हम इस परंपरा को धार्मिक मानकर आज तक अपना रहें हैं.और यही परम्परायें हिन्दू धर्म को scientific धर्म बना रहीं है




15 मई 2016

आलू में पाए जाने वाले पौषक तत्वों का वर्णन और आलू के फायदे

आलू में पाए जाने वाले पौषक तत्वों का वर्णन और आलू के फायदे

  #1.परिचय::-


आलू वैश्विक,और संतुलित खाद्य  फसल हैं,जो कि चावल,गेंहूँ ,मक्का के बाद उपभोग के मामलें में चौथें स्थान पर हैं.आलू का वानस्पतिक नाम सोलेनम ट्यूबोरोसम हैं.यह सोलोनेसी परिवार का सदस्य हैं.आलू जमीन के अन्दर कंद रूप में मिलता हैं.आलू की फसल के लियें कम तापक्रम आवश्यक हैं.


आलू में पाए जाने वाले पौषक तत्वों का वर्णन और आलू के फायदे
 आलू (potato)

#2.आलू में पाए जाने वाले पौषक तत्व



प्रति 100 ग्राम आलू में पायें जानें वाले पौषक तत्व


नमी    प्रोटीन.     वसा.     खनिज़ पदार्थ.  रेशा.

7.5g. 1.6gm.   0.1g.        0.6 gm.    0.4g



कार्बोहाइड्रेट.    कैलोरी.   कैल्सियम. मैग्निशियम


22.6 gm.         17 gm.   10 gm.  20 gm. 



आक्जैलिक अम्ल.  निकोटिनिक अम्ल.  विटा.c


      20 gm.                 1.2 gm.         17 mg



फास्फोरस.     लोहा.    सोड़ियम.   पोटेशियम.

    44 mg.     0.7.         1.9 mg.    247 mg 



कापर.   सल्फर.   थायमिन.  क्लोरिन. राइबोफ्ले.

0.02mg.3.0.       10 mg.    0.1 mg.   0.01


3.आलू खाने से फायदे क्या होता है


आलू में पायें जानें वालें उपरोक्त पौषक तत्व इसके महत्व का स्वंय वर्णन करतें हैं,यदि आलू के उपरोक्त गुणों का आमजन को पता हो तो यह बड़ी सँख्या लोग इसके व्यापक उपयोग की अग्रसर हो सकतें हैं. आईयें जानतें हैं,इसके कुछ महत्वपूर्ण उपयोग के बारें में


1. आलू के छीलकें को पीसकर उसमें समान मात्रा में शहद मिला लें इस मिश्रण को सुबह शाम एक-एक चम्मच ऐसे बच्चें के दें जो बोलनें में तुतलाता हों.


2.आलू के छिलकों को फेंकनें की बजाय उपयोग की हुई चाय पत्तियों के साथ मिलाकर गार्डन में उपयोग करें आर्गेनिक खाद ( organic) तैयार हैं.


3.आलू को पीसकर  नीम तेल मिला लें तथा चर्म रोगों में प्रयोग करें.इसमें मोजूद गंधक (sulphur) चर्म रोगों की उत्तम दवा हैं.


4.आलू में रेशा (fibre) बहुतायत में पाया जाता हैं,जो कब्ज (constipation) का रामबाण इलाज हैं,इसके लियें आलू को उबालकर उसमें काला नमक मिलाकर प्रयोग करें.


5. कच्चें आलू का रस निकालकर चेहरें पर लगायें  और दस मिनिट़ बाद चेहरा धो लें ये नुस्खा उत्तम सौन्दर्यवर्धक और आँखों के निचें का कालापन मिट़ानें वाला माना जाता हैं.


6.आलू में पाया जानें वाला vitamin c इसें सम्पूर्ण खाद्य पदार्थ बनाता हैं,जो कि अन्य खाद्य फसलों जैसें गेंहू,चावल,मक्का में नहीं पाया जाता हैं.अत: आलू का समुचित प्रयोग कुपोषण (malnutrition) को समाप्त करता हैं.


7. आलू में पाया जानें वाला vitamin c पायरिया और मुख दुर्गंध में अत्यधिक लाभदायक हैं,इसके लियें कच्चें आलू को खूब चबा-चबाकर खाना चाहियें.


8.बाल काले करनें का प्राकृतिक तरीका :::यदि आपके बाल असमय सफेद हो रहें हों तो आलू के छिलके उतारकर उन्हें 10 - 12 मिनिट़ पानी में उबालें,उबालनें के बाद पानी निकाल दे और इन छिलकों का पेस्ट बनालें.


नहानें के आधा घंटें पहलें इस पेस्ट को बालों में गहराई तक लगाकर मसाज करें,इसके पश्चात बाल धो लें.यह उपाय हफ्तें में दो या तीन बार करनें से बाल फिर से कालें होनें लगेगें.


9.फंगल इन्फेक्शन होनें पर कच्चे आलू को फंगल प्रभावित भाग पर गंधक के साथ मिश्रण बनाकर लगानें से फंगल इंफेक्शन में आराम मिलता हैं ।


#4.आलू के सम्बंध में आमजन में व्याप्त भ्रान्तियाँ                                        



1.आलू खानें से मोटापा बढ़ता हैं:- यह पूर्णत: भ्रामक और मिथ्या बात हैं,क्योंकि आलू में मात्र 0.1 प्रतिशत fat होता हैं,जो किसी भी रूप में मोटापा बढ़ानें में सहायक नहीं होता हैं,बल्कि वास्तविकता में आलू को पकानें में जो तेल या घी उपयोग किया जाता हैं,वहीं मोटापे के लिये उत्तरदायी होता हैं.


2.ह्रदय रोगी ( heart patient) और ड़ायबीटीज (Diabetes) के मरीज़ को आलू नहीं खाना चाहियें:- आलू में कैलोरी (calorie) की मात्रा प्रति 100 gm आलू में मात्र 17 gm होती हैं,जो इसे low calorie खाद्य पदार्थ बनाती हैं,इस दृष्टिकोण से आलू उपरोक्त रोगीयों के लियें सुरक्षित खाद्य पदार्थ हैं.



० पलाश वृक्ष के औषधीय गुण



० पारस पीपल के औषधीय गुण



3. आलू खानें से दिमाग कम काम करता हैं:-आलू में पर्याप्त मात्रा में विटामिन,खनिज़ और दूसरें महत्वपूर्ण पदार्थ पायें जातें जो मस्तिष्क को पर्याप्त मात्रा में पोषण प्रदान करतें हैं.

4.आलू खानें के बाद गैस बहुत बनती हैं:- चूँकि आलू में रेशा पाया जाता हैं,अत: यह रेशा आंतों में स्थित कुपित वायु को शरीर से बाहर निकाल देता हैं,अत: जिन लोगों की पेट़ की सफाई नहीं होती हैं,उन लोगों में यह समस्या होती हैं.वास्तव में यह समस्या नहीं होकर आँतों की सफाई हैं,जिसे आलू करता हैं.

#5.आलू में पाया जाने वाला हरा तत्व

आलू के हरें भाग में सेलोनिन ,alkaloid पाया जाता हैं,अत: इन आलूओं का प्रयोग खानें में नहीं करना चाहियें.


० यूटेराइन फाइब्राइड़



० बरगद पेड़ के फायदे






5 मई 2016

महापुरूषों की स्वस्थ विचारधारा,



भारत भूमि पर प्राचीन काल से ही ऐसें विद्धान जन्म लेते रहें हैं,जिन्होनें समाज का पतन होनें पर समाज को अपनें कर्मों और विचारों से आगें बढ़ाया.चाहे वह भगवान राम हो,कृष्ण हो,स्वामी विवेकानंद हो,या महात्मा गांधी रहे हो.




स्वामी विवेकानंद



स्वामी विवेकानंद का जन्म भारत में ऐसे समय में हुआ था,जब 1857 की क्रांति असफल हो गई थी,भारतीय दर्शन,वैदिक परपंरा और धर्म की खुलकर बात भी करनें वाला कोई नहीं था,क्योंकि अंग्रेंजी पाशविकता चरम पर थी.पश्चिमी विद्धान भारत को अपनें धर्म प्रचार की उर्वरा भूमि के तोर पर देख रहे थें.


ऐसे समय में भारतीय धर्म और दर्शन को प्रतिष्ठित करनें वाले स्वामी विवेकानंद ही थें.जिन्होनें शिकागो धर्मसभा 1893 में जब उद्भोदन देना शुरू किया " मेरें अमेरिकी भाई और बहनों" तो सम्पूर्ण सभासद अवाक् रहकर लम्बें समय तक सिर्फ तालिया ही बजातें रह गयें.इसके पश्चात अनेक जगह घूमकर स्वामी जी नें वेद,भारतीय दर्शन,साहित्य की जो व्याख्या प्रस्तुत की उसे सुनकर अनेक अमेरिकी विद्धानों को कहना पड़ा था कि " उनके देश में पाश्चात्य धर्म प्रचारकों को भेजना कितनी बड़ी मूर्खता हैं"



स्वामी जी कहा करते थें,कि मात्र सौ कर्मठ युवा मेरें पास हो तो में भारत को पुन: उसका गौरवशाली अतीत वापस दिला सकता हूँ.किन्तु अफसोस मात्र 36 वर्ष ही स्वामी जी हमारें बीच रह पायें.किन्तु यदि हम विवेकानंद के विचारों को अपने जीवन में उतारते चलें तो हमें विश्व सिरमोर बननें से कोई नहीं रोक सकता .



महात्मा गांधी 



गांधी जी भारत के ऊन सपूतों में शुमार हैं,जिनकी गणना विश्व के महापुरूषों में होती हैं.भारत को आजाद करवानें के लियें जिस तरह से अहिंसात्मक गतिविविधियों का सहारा लिया वह अपनें आप में अनूठा होनें के साथ सम्पूर्ण विश्व को प्रेरणा देनें वाला हैं.



गाँधी जी के कार्यों को देखते हुये आंइस्टीन ने भी आश्चचर्यचकित होकर कहा था कि "आने वाली सदियों के लोगों को यह विश्वास करना मुश्किल होगा कि बिना अस्त्र शस्त्र के एक हाड़ मांस के पुतले ने ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंका था.



गाँधी जी के अहिंसा दर्शन को यदि आज का विश्व समुदाय अपना ले तो न आतंकवाद होगा न अस्त्र शस्त्र की अँधी दोड़ होगी फलस्वरूप अरबों ड़ालर का रक्षा बज़ट़ मानव  कल्याण पर खर्च होगा, भूखमरी,गरीबी ,अशिक्षा जैसी समस्या अतीत की बात होगी ,क्या हम ऐसी व्यवस्था के लिये कृतसंकल्पित हैं.जो आने वाली पीढ़ीयों के लिये मिसाल बन सकें.


भगवान राम 




राम का जन्म भी  ऐसे समय में हुआ था जब मानवता रावण के रूप में व्यभिचार,पाप,अधार्मिकता ,पाशविकता में फँसी हुई थी.राम ने अपनें कर्मों द्वारा मर्यादा की नई रेखायें खींची चाहे वह पति धर्म का पालन हो,शबरी के बैर खाकर समानता को प्रोत्साहन,रावण का अंत कर लोभ ,व्यभिचार ,अत्याचार को नष्ट करना हो.राम भी हमें एक आदर्श समाज की स्थापना का संदेश प्रदान करते हैं,जो न कैवल भारत बल्कि विश्व के लिये प्रेरणास्पद हैं.



कृष्ण 




कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन उपदेशो और मानव को दिशावान बनानें से भरा हुआ हैं.आज की जीवनशैली में जहाँ हर व्यक्ति कर्म करनें के पूर्व ही परिणामों के प्रति आशंकित रहता हैं,कर्तव्यों की अपेक्षा हक के प्रति ज्यादा संवेदनशील रहता हैं,भगवान कृष्ण का मात्र यह कहना कि


कर्मण्ये वाधिकारवस्ते मा फलेषु कदाचन
सम्पूर्ण विश्व समाज को बिना फल की आशा किये कर्म करनें को प्रेरित करता हैं.







 ॉॉॉॉॉ















4 मई 2016

Rabies रेबीज एक घातक रोग

 रेबीज(Rabies)


रैबीज (Rabies) एक संक्रामक रोग हैं.जो जानवरों जैसें कुत्ता (Dog),बिल्ली (Cat), बंदर,नेवला,गाय घोड़ा आदि के द्धारा मनुष्यों में फैलता हैं. विश्व स्वास्थ संगठन (world health organisation) के मुताबिक प्रति वर्ष इस रोग से मरनें वालें लोगों में लगभग 95  प्रतिशत रोगी विकासशील और अल्पविकसित राष्ट्रों के होतें हैं.

Rabies
 पागल कुत्ता


रेबीज का कारण::-



इस रोग का प्रमुख कारक "रहैब्डो़ " (Rehbdo) वायरस हैं.पागल कुत्तें या अन्य जानवरों में इस रोग के विषाणु मोजूद रहतें हैं,जब इस रोग से ग्रसित जानवर इंसानों को काटता हैं,तो विषाणु तंत्रिका तंत्र ( nervous system)  को क्षतिग्रस्त कर देता हैं.
चोट़ लग जानें पर पशु के चाट लेनें पर भी लार के माध्यम से ये विषाणु मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट़ कर जातें हैं


रेबीज के लक्षण::-



इस रोग के लक्षण प्रभावित व्यक्ति में एक से तीन माह में प्रकट होतें परन्तु यह कोई मान्य समय सीमा नहीं हैं,यदि काटा गया स्थान मस्तिष्क के निकट़ हैं,तो लक्षण जल्दी दिखाई देतें हैं,जबकि काटा गया स्थान मस्तिष्क से दूर होनें पर लक्षण देर से या कई सालों के बाद भी प्रकट होतें हैं.इसके प्रमुख लक्षण निम्न हैं--



1. सांस लेनें में कठिनाई.


2. काटें गये स्थान पर जलन और झुनझुनी होना.


3. मस्तिष्क ज्वर.


4. स्वभाव में चिड़चिड़ापन, उत्तेजना.


5. सिरदर्द.


6. रीढ़ की हड्डी के आसपास जकड़न.


7. रोग की चरम अवस्था में रोगी कुत्तों की तरह भोंकनें लगता हैं,मुँह से लार टपकती हैं,पानी से ड़र लगनें लगता हैं( hydrophobia).


8.मुहँ से झाग आनें लगतें हैं. 


उपरोक्त अन्तिम दो अवस्था में रोगी की शीघृ मौत हो जाती हैं.

रेबीज का उपचार::-


 इस रोग का कोई उपचार उपलब्ध नहीं हैं.किन्तु रोग से बचाव के टीके उपलब्ध हैं.यह टीके दो प्रकार के होतें हैं,पहला एहतियात के रूप में लगाया जाता हैं,जबकि दूसरा पशु के काटनें के बाद लगाया जाता हैं.पहला टीका  0--7--21 दिनों के अन्तराल से लगता हैं,इसके बाद booster dose लगतें हैं.दूसरा टीका 0--7--14--28 दिनों के अन्तराल से लगता हैं.टीका लगनें के बाद 99 प्रतिशत रोग की प्रभावी रोकथाम हो जाती हैं.



रेबीज से बचाव के तरीके::-



पशु के काट़नें के पश्चात यदि सही तरीकें से प्राथमिक उपचार दे दिया जावें तो लगभग 80 प्रतिशत मामलों में रोग की आंशका या वायरस फैलनें की सम्भावना को खत्म किया जा सकता हैं,आईयें जानतें हैं कैसा हो प्राथमिक उपचार


A. काटें हुयें स्थान को तेज बहाव वाले पानी में साबुन या किसी antiseptic से तीन - चार बार धो लें.


B. घाव पर antiseptic लगाकर खुला छोड़ दे बाँधे कदापि नहीं.


यदि antiseptic उपलब्ध नहीं हो तो नीम के पत्तों को तोड़कर उसका रस निकाल लें इस रस से प्रभावित स्थान को धो दे.

सावधानियाँ



यदि कुत्तें द्धारा आपकों काटा गया है,तो तुरन्त उस पर नज़र रखनी शुरू कर दें,यदि कुत्ता दस दिनों के अन्दर मर जाता हैं,असामान्य हरकतें करता हैं,काटनें के लियें दोड़ता हैं,तो तुरन्त टीकाकरण (Vaccination) करवा लें.

भ्रातियाँ::-

भारत सहित दुनिया भर के विकासशील देशों में अनेक भ्राँतियाँ प्रचलित हैं,जिसकी वज़ह से लोग टीकाकरण नहीं करवातें फलस्वरूप जिन मोतों को रोका जा सकता हैं,वे भी लापरवाही की वज़ह से होती हैं.इन भ्राँतियों में
1. कुत्तें के काटनें वाली जगह को लोहे की गरम सलाखों से दागनें पर कुत्तें के काट़नें का असर समाप्त हो जाता हैं.


2. पीर,हकीम,औझा मंत्र तंत्र और झाड़ फूँक कर ठीक करतें हैं.

3. विशेष पानी पीलाकर रोग नहीं होनें का दावा किया जाता हैं.

रैबीज को रोकनें का एकमात्र प्रभावी तरीका टीकाकरण हैं,अत: अपनें परिचितों को इस बारें में अवश्य बतायें.और Comment box में प्रतिक्रिया अवश्य Post करें.


० मधुमक्खी पालन एक लाभदायक व्यवसाय



० पारस पीपल के औषधीय गुण


० धनिया के फायदे


० हरसिंगार के फायदे






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