31 जुल॰ 2020

मोतियाबिंद क्या होता हैं । लक्षण ,और कारण । what is cataract in Hindi

मोतियाबिंद क्या होता हैं। what is cataract in Hindi


मनुष्य की आंखों के लेंस manusy ki  aankho ke lens प्रोटीन और फाइबर से बनी संरचना होती हैं। यह लेंस पारदर्शी और कांच के समान होती हैं । इस लेंस के माध्यम से होकर प्रकाश आंखों के पर्दे पर आता हैं , जिससे किसी वस्तु का साफ़ प्रतिबिंब दिखाई देता हैं । जब कभी किसी कारण से यह लेंस धुंधले हो जातें हैं तो प्रकाश इन लेंस से नहीं गुजर पाता है । लेंस के धुंधला होनें की यह अवस्था मोतियाबिंद cataract कहलाती हैं । 

मोतियाबिंद क्या होता हैं what is cataract in Hindi
मोतियाबिंद



भारत में अन्धत्व का बहुत बड़ा कारण मोतियाबिंद हैं । भारत में लगभग 65 प्रतिशत लोग में नेत्रहीनता का कारण मोतियाबिंद ही है । भारत में प्रतिवर्ष 20 लाख लोगों में मोतियाबिंद होता हैं ।


मोतियाबिंद के लक्षण motiyabind ke laxan


आंखों से धुंधला दिखाई देना


यदि किसी को मोतियाबिंद हो जाता हैं तो पढ़ने या कोई वस्तु देखने पर वह धुंधली दिखाई देती हैं । 


आंखें चोंधियाना


यदि मोतियाबिंद ग्रसित व्यक्ति टीवी देखता है या किसी साधारण से प्रकाश स्रोत जिसे सामान्य आंखों वाला देख सकता हैं को देखता है तो उसकी आंखें चोंधिया जाती हैं । ऐसा वाहन चलाते समय आंखों पर पड़ने प्रकाश के कारण भी होता हैं ।



रंग फीके दिखाई देना 



मोतियाबिंद से ग्रसित व्यक्ति को तीखे चटक रंग भी बहुत फीके दिखाई देते हैं । 


चश्में के नंबर बार बार बदलना


बार बार चश्में के नंबर बदल जातें हैं जिससे आंखों में भारीपन होता हैं। विस्तृत जांच में पता चलता हैं कि मोतियाबिंद हैं।


एक वस्तु दो दिखाई देती हैं


पास की और दूर की दोनों चीजें दो दिखाई देती हैं। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति सामने खड़ा है तो मोतियाबिंद ग्रसित व्यक्ति को उसकी दो छवि दिखाई देगी जिसमें यह पहचानना मुश्किल होता हैं कि कोंन सी छवि वास्तविक हैं ओर से कोंन सी आभासी हैं।


मोतियाबिंद हो जाने के बाद मोतियाबिंद के लक्षण प्रकट होते हैं 



मोतियाबिंद के बहुत से मामले तब तक प्रकट नहीं होते हैं जब तक की पूरा मोतियाबिंद पक नहीं जाता हैं। अतः ऐसे मामलों में नेत्ररोग विशेषज्ञ भी जब तक पूरा मोतियाबिंद नहीं हो जाता हैं तब तक कुछ भी स्पष्ट नहीं बता पाते हैं ।




० आयुर्वेद के अनुसार मूली खाने के फायदे




मोतियाबिंद के प्रकार  motiyabind ke prakar


Subcapsular cataract सबकेप्सूलर मोतियाबिंद



आंखों के लेंस aankho ke lens के पिछे बनने वाले मोतियाबिंद को सबकेप्सूलर मोतियाबिंद subcapsular cataract कहते हैं । सबकेप्सूलर मोतियाबिंद होने पर रोशनी के चारों ओर गोल चमकीला घेरा नज़र आता हैं और पढ़ने में परेशानी आती हैं। 


सबकेप्सूलर मोतियाबिंद subcapsular cataract अधिक उम्र वालों, मधुमेह ग्रसित व्यक्ति और स्टेराइड का इस्तेमाल करने वालों को अधिक होता हैं ।


कार्टिकल मोतियाबिंद cortical cataract



कार्टिकल मोतियाबिंद cortical cataract लेंस के आसपास पहिये के रूप में होता हैं जो धिरें धिरें पूरे लेंस में फैल जाता हैं । अधिक उम्र के व्यक्तियों में यह मोतियाबिंद बहुतायत में होता है ।


नाभिक मोतियाबिंद Nuclear sclerotic cataract



जो मोतियाबिंद लेंस के मध्य भाग में होता हैं उसे नाभिक मोतियाबिंद या Nuclear sclerotic cataract कहते हैं । Nuclear sclerotic cataract मोतियाबिंद का सर्वमान्य प्रकार हैं ।अधिकांश मामलों में यही मोतियाबिंद देखा जाता हैं । इस प्रकार के मोतियाबिंद में लेंस धुंधला और सख्त हो जाता हैं ।

Conginatal cataract जन्मजात मोतियाबिंद



कुछ नवजात शिशुओं में गर्भाशय संबंधी संक्रमण और आनुवांशिक बीमारी की वजह से जन्मजात मोतियाबिंद हो जाता हैं । नवजात शिशुओं में होने वाले मोतियाबिंद का यह सबसे प्रमुख प्रकार हैं ।


मोतियाबिंद का कारण


बढ़ती उम्र 

40 वर्ष की उम्र के बाद आंखों का लेंस जो कि प्रोटीन,फायबर और पानी से बना होता हैं के प्रोटीन में बदलाव आना शुरू हो जाता हैं । जिससे पारदर्शी लेंस धुंधला होना शुरू हो जाता हैं । 



भारत में मोतियाबिंद के सबसे ज्यादा केस बढ़ी उम्र के कारण ही हो रहें हैं ।

पराबैंगनी विकिरण या सूर्य प्रकाश


पराबैंगनी विकिरण या सूर्य के प्रकाश के सीधे संपर्क में आने से मोतियाबिंद होने की संभावना बहुत अधिक होती है क्योंकि पारदर्शी लेंस इन विकिरणों के सम्पर्क में आकर क्षतिग्रस्त और धुंधला हो जाता हैं । धिरें धिरें यह धुंधलापन मोतियाबिंद का रूप ले लेता है ।

उच्च रक्तचाप 


उच्च रक्तचाप के कारण आप्टिक नर्व और आंखों पर दबाव पड़ता है। जिससे लेंस धुंधला होने लग जाता हैं । 


मधुमेह

मधुमेह मोतियाबिंद का बहुत बड़ा कारण है। मधुमेह के कारण आंखों  का लेंस सबसे ज्यादा प्रभावित होता हैं जिससे व्यक्ति कम उम्र में ही मोतियाबिंद से ग्रसित हो जाता हैं। 


मोटापा 

विशेषज्ञों के मुताबिक मोटापा मोतियाबिंद का कारण बनता हैं लेकिन अभी इस पर विस्तृत शोध बाकि है कि मोटापा किस तरह से मोतियाबिंद का कारण बनता हैं । वैसे मोटापा बहुत सारी शारीरिक समस्याओं जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, ह्रदय रोग आदि का कारण है और इन्ही बीमारियों के साथ मोतियाबिंद जुड़ा हुआ है ।

शराब सेवन 


अत्यधिक शराब पीने से  लेंस का प्रोटीन अल्कोहल के प्रभाव से पारदर्शी से धुंधला पड़ जाता हैं । फलस्वरूप मोतियाबिंद हो जाता हैं ।


आनुवांशिक कारक 


यदि माता-पिता को मोतियाबिंद होता हैं तो संतानों में भी मोतियाबिंद का प्रभाव देखा गया है । उदाहरण के लिए यदि रूबेला बीमारी से मां ग्रसित है तो होने वाले बच्चे को मोतियाबिंद हो सकता हैं ।

खानपान


भोजन में पर्याप्त प्रोटीन,मिनरल और विटामिन सम्मिलित नहीं होते हैं तो आंखों के लेंस का प्रोटीन लेंस को धुंधला कर मोतियाबिंद का निर्माण कर देता हैं ।


मोतियाबिंद का ऑपरेशन 


आजकल मोतियाबिंद का ऑपरेशन बहुत सरल और कम जोखिम वाला आपरेशन होता हैं जिसे नेत्ररोग विशेषज्ञ रोबोट और हाथों से बहुत कम समय में संपन्न कर देता हैं । आपरेशन के दोरान धुंधला लेंस हटाकर उसकी जगह कृत्रिम लेंस प्रत्यारोपित कर दिया जाता हैं । 

मोतियाबिंद आपरेशन के प्रकार

Extracapsular cataract extraction या रेगुलर फेको


इस आपरेशन में लेंस को अल्ट्रासाऊंड तरंगों से तोड़कर  एक खोखली नीडिल के माध्यम से  बाहर निकाल लिया जाता हैं । इस प्रक्रिया को फेकोइमल्सीफिकेशन कहते हैं । इस आपरेशन में मात्र 3 MM का चीरा लगाकर कृत्रिम लेंस प्रत्यारोपित कर दिया जाता हैं । आपरेशन के बाद मरीज कुछ ही घंटों में घर चला जाता हैं ।


भारत में लगभग 98% आपरेशन इसी प्रकार के होते हैं ।

Intracapsular cataract extraction 



इस पद्धति द्वारा लेंस और लेंस केप्सूल दोनों निकाल कर कृत्रिम लेंस प्रत्यारोपित किया जाता हैं । इस पद्धति में चीरा 2MM का लगाया जाता हैं ।


Laser cataract surgery 



लेजर केटरेक्ट सर्जरी पूर्णतः कम्प्यूटराइज्ड सर्जरी हैं , जिसमें मानवीय हस्तक्षेप बिल्कुल नहीं होता जिससे मानवीय चूक की संभावना नही होती हैं । इस विधि में चीरा नहीं लगाया जाता हैं । 


Zapto cataract surgery 



यह सर्जरी बहुत जटिल मोतियाबिंद में की जाती हैं। इस सर्जरी के साथ आंखों के अन्य आपरेशन संपन्न करें जा सकते हैं ।



मोतियाबिंद लेंस की कीमत 


मोतियाबिंद आपरेशन में जो लेंस प्रत्यारोपित किये जातें हैं उनकी कीमत लेंस के प्रकार के आधार पर कुछ सौ रुपए से लेकर हजारों रूपए तक हो सकती हैं । कुछ प्रमुख लेंसो के प्रकार निम्न हैं 


मोनो फोकल लेंस


भारत में 98 प्रतिशत मोतियाबिंद आपरेशन में मोनो फोकल। लेंस का प्रयोग किया जाता हैं । मोनो फोकल लेंस की एक ही फोकस दूरी होती हैं । 


मोनो फोकल लेंस में दूर की वस्तु स्पष्ट दिखाई देती हैं किन्तु पास की वस्तु देखने के लिए चश्मा लगाना पड़ता है ।


बाई फोकल लेंस 


बाई फोकल लेंस में दूर का और पास का स्पष्ट दिखाई देता हैं लेकिन बीच में रखी वस्तु धुंधली दिखाई देती हैं । बाई फोकल लेंस मोनो फोकल लेंस की अपेक्षा महंगा भी होता हैं ।


० एलर्जी क्या होती हैं



ट्राई फोकल लेंस 


इस लेंस में दूर का,पास का,और बीच का भी स्पष्ट दिखाई देता हैं । यह लेंस महंगा होता हैं। 


इस लेंस की एक बहुत बड़ी कमी यह है कि उम्र के साथ लेंस की क्षमता कम होकर पास का,और बीच का दिखाई देना बंद हो जाता हैं इसके अलावा रात में प्रकाश स्रोत के आसपास गोल और तेज चमकीला छल्ला दिखाई देता हैं । यही कारण है कि नेत्र विशेषज्ञ इस लेंस को बहुत कम मामलों में उपयोग करते हैं


टारिक लेंस


बाई फोकल और ट्राई फोकल लेंस की कमियों को दृष्टिगत रखते हुए इस लेंस का आविष्कार हुआ है । यह लेंस रात को प्रकाश स्रोत के आसपास दिखाई देने वाले छल्लो से बचाता है ।  लम्बी सर्विस देता हैं और आंखों को भारीपन,लाल होने से बचाता है ।


मोतियाबिंद आपरेशन से पहले क्या सावधानी रखी जानी चाहिए ?


 ० रक्तचाप नियंत्रित होना चाहिए 

० मधुमेह नियंत्रण में होना चाहिए

० आपरेशन के पूर्व हल्का नाश्ता कर लेना चाहिए

० यदि किसी दवाई से एलर्जी है तो इसकी सूचना नेत्ररोग विशेषज्ञ को आपरेशन से पहले अवश्य दें देना चाहिए 

० आपरेशन से पहले किसी भी प्रकार का नशा नहीं करना चाहिए 

मोतियाबिंद ऑपरेशन के बाद क्या सावधानी रखें

भारत में प्रति मोतियाबिंद के जितने आपरेशन होते हैं उनमें से लगभग 25 प्रतिशत लोग आपरेशन के बाद रखी जानें वाली सावधानी के अभाव में पुनः चिकित्सक के पास पंहुचते हैं, यदि पर्याप्त सावधानी रखी जाए तो इस स्थिति को टाला जा सकता है आईए जानते हैं मोतियाबिंद ऑपरेशन के बाद रखी जानें वाली सावधानी के बारें में

1.आपरेशन के बाद न्यूनतम 15 दिनों तक या नेत्ररोग विशेषज्ञ द्वारा बताए गए समय तक काला चश्मा अवश्य लगाएं ।

2.आपरेशन वाली आंख को हाथों से, रुमाल से,रुई से या किसी भी प्रकार से नहीं रगड़े

3.आंखों में काजल,सूरमा आदि न लगाएं

4.आंखों में पानी तब तक नहीं लगाएं जब तक कि डाक्टर ने बोले

5. नहाते समय साबुन आदि को आंखों से दूर ही रखें

6.आंखों में तेज हवा न लगने दें

7.चिकित्सक द्वारा बताए समय तक मोबाइल,टीवी का उपयोग नहीं करें

8.शराब, तम्बाकू धूम्रपान आदि का सेवन न करें ।

9.जिस तरफ की आंख का आपरेशन हुआ हैं उस तरफ करवट करके नहीं सोना चाहिए।

10.तेज नमक, मिर्च-मसाले वाला भोजन न करें 


मोतियाबिंद आपरेशन में क्या जोखिम हो सकता हैं ?


आधुनिक तकनीक ने मोतियाबिंद आपरेशन को पूर्णतः मानवरहित और जोखिम रहित बना दिया है किंतु फिर भी मोतियाबिंद आपरेशन में यदाकदा कुछ जोखिम सामने आ ही जाते हैं जैसे


१.आपरेशन के पहले और आपरेशन के बाद में यदि आंखों की साफ-सफाई का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया तो आंखों में संक्रमण होने की संभावना रहती हैं जिससे अंधापन भी हो सकता हैं ।


२.मोतियाबिंद आपरेशन के दौरान लेंस के टूकडे असावधानी के कारण आंखों में रह जाते हैं तो आंखों में दर्द, आंखों में सूजन और कम दिखाई देना जैसी समस्या हो सकती हैं ।



३.कुछ लोगों की आंखें  मोतियाबिंद आपरेशन के बाद कृत्रिम लेंस को सहज स्वीकार नहीं करती हैं अतः आंखें लाल होना, आंखों में दर्द होना आदि समस्या हो सकती हैं ।


मोतियाबिंद से बचाव के उपाय



१.मोतियाबिंद से बचाव के लिए 40 वर्ष की उम्र के बाद स्वस्थ आंखों वाले व्यक्ति को नेत्र रोग विशेषज्ञ से साल में दो बार आंखों की जांच करवाना चाहिए

2.शराब, धूम्रपान का सेवन से आंखों के लेंस का प्रोटीन खराब होता हैं अतः इनसे बचें ।


3.आंखों का व्यायाम नियमित रूप से करें उदाहरण के लिए यदि कम्प्यूटर या मोबाइल का इस्तेमाल कर रहें हैं तो हर 20 मिनिट में आंखों को कम्प्यूटर या मोबाइल स्क्रीन से हटाकर 20 फीट की दूरी को 20 बार देखें । 


4.आंखों में चोंट लगने पर किसी अच्छे नेत्ररोग विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए ।


5.तेज धूप, मोटरसाइकिल चलाने पर,अच्छे किस्म का चश्मा लगाना चाहिए 



6.भोजन में हरे पत्तेदार सब्जियां,पीले फल,बीटा कैरोटीन युक्त खाद्य पदार्थ जैसे बादाम, अखरोट आदि का इस्तेमाल करें ।


7.गर्भवती महिलाओं को अपने सभी टीकाकरण पूरे करवाना चाहिए।



8.उच्च रक्तचाप, मधुमेह , मोटापा को नियंत्रित रखना चाहिए



9.आंखों में रक्तसंचार सुचारू रखने के लिए प्रतिदिन सुबह शाम तेज़ क़दमों के साथ घूमना चाहिए



काला मोतियाबिंद Glucoma क्या होता है


काला मोतियाबिंद को ग्लूकोमा Glucoma कहते हैं। काला मोतियाबिंद आप्टिक नर्व पर दबाव ‌‌‌पड़ने से होता हैं । सफेद मोतियाबिंद की तुलना में काला मोतियाबिंद घातक होता हैं और इससे आंखों की रोशनी जा सकती हैं ।


काला मोतियाबिंद का कारण


आंखों में एक तरल पदार्थ मौजूद रहता है जिसे एक्यस ह्यूमर कहते हैं यह पदार्थ आंखों में नमी बनाए रखना है,जब किसी कारणवश इस तरल पदार्थ का उत्पादन बंद हो जाता हैं तो आप्टिक नर्व पर दबाव पड़ता है और आप्टिक नर्व में खून का प्रवाह बाधित हो जाता हैं फलस्वरूप आप्टिक नर्व को हानि पहुंचती हैं और ग्लूकोमा बन जाता हैं । एक्यूस ह्यूमर निम्न कारण से बनना बंद हो सकता है

1.लंबे समय से स्टेराइड का इस्तेमाल

2.आंखों में चोंट लगना

3.मधुमेह 

4.आनुवांशिक कारण

5.माइग्रेन 


काला मोतियाबिंद दो प्रकार का होता हैं

1.ओपन एंगल

2.एंगल क्लोजर 


काला मोतियाबिंद के लक्षण

1.अंधेरी जगह पर बहुत कम दिखाई देना।

2.बार बार चश्मा उतरना या नंबर बदलना।

3.देखने में काले काले धब्बें दिखाई देना ।

4.आंखों की नसों पर दबाव महसूस होना।

5.आंखे लाल होना।

6.आंखों में दर्द के साथ उल्टी और चक्कर आना ।


क्या मोतियाबिंद का कोई इलाज है ?


मोतियाबिंद न हो इसके लिए  इलाज है किंतु मोतियाबिंद हो जानें के बाद इसका एकमात्र इलाज आपरेशन ही है । मोतियाबिंद किसी भी प्रकार की दवाई, झाड़ फूंक या आई ड्राप से समाप्त नहीं होता हैं ।

मोतियाबिंद न हो इसके लियें संतुलित खानपान और विटामिन ए युक्त पूरक आहार का सेवन करना चाहिए जैसें पपीता,गाजर,अंकुरित अनाज,दालें आदि ।


मोतियाबिंद समाप्त करने के लिए सरकारी प्रयास राष्ट्रीय अन्धत्व निवारण कार्यक्रम


भारत सरकार ने देश में मोतियाबिंद से फैलने वाले अंधेपन को समाप्त करने के लिए सन् 1976 में राष्ट्रीय अन्धत्व निवारण कार्यक्रम शुरू किया था । जिसमें सरकारी अस्पतालों और गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से मोतियाबिंद के ऑपरेशन योग्य व्यक्तियों को चिन्हित कर निशुल्क आपरेशन किए जाते हैं ताकि देश  अन्धत्व निवारण में विश्व का अग्रणी राष्ट्र बन सके और नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण जीवन प्रदान कर सकें ।



देशभर में अलग राज्य सरकारों द्वारा भी मोतियाबिंद समाप्त करने के लिए अपने - अपने  स्तर पर निशुल्क आपरेशन किये जातें हैं ।


० आँखों का सुखापन








23 जुल॰ 2020

ब्रेन हेमरेज क्या होता हैं । WHAT IS BRAIN HEMORRHAGE IN HINDI

ब्रेन हेमरेज क्या होता हैं WHAT IS BRAIN HEMORRHAGE IN HINDI 

WHAT IS BRAIN HEMORRHAGE IN HINDI
 ब्रेन हेमरेज क्या होता हैं



ब्रेन हेमरेज BRAIN HEMORRHAGE मस्तिष्क आघात Brain stroke का एक प्रकार हैं। जिसमें मस्तिष्क की धमनी फट जाती हैं और खून आसपास के ऊतकों तक फैल जाता हैं। ऊतकों तक खून का फैलाव होनें से आक्सीजन का स्तर oxygen level कम हो जाता हैं और कोशिकाएं मरने लगती हैं। इस अवस्था को ब्रेन हेमरेज Brain hemorrhage
 कहते हैं ।



ब्रेन हेमरेज BRAIN HEMORRHAGE के दौरान जब रक्त स्त्राव होता हैं तो मस्तिष्क के आंतरिक भाग में सूजन आ जाती हैं जिससे आसपास के ऊतकों पर दबाव पड़ता हैं और मस्तिष्क कोशिकाएं मरने लगती हैं।





ब्रेन हेमरेज BRAIN HEMORRHAGE के क्या कारण हैं 





1.मस्तिष्क में लगी चोंट



दुर्घटना में लगी चोंट यदि गंभीर होती हैं तो ब्रेन हेमरेज हो सकता है । भारत में युवाओं में ब्रेन हेमरेज का सबसे बड़ा कारण सड़क दुघर्टना में लगी मस्तिष्क की चोंट ही हैं । BRAIN HEMORRHAGE ka sabse bada karan sadak durghatna me lagi mastishk ki chont hi hai


2.उच्च रक्तचाप 


लम्बे समय से बने रहने वाला उच्च रक्तचाप मस्तिष्क की धमनी को कमज़ोर हो जाती हैं जिसके कारण ब्रेन हेमरेज होता हैं । उम्रदराज व्यक्तियों में ब्रेन हेमरेज होने का कारण उच्च रक्तचाप ही होता हैं।




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3.एन्यूरिज्म

मस्तिष्क की धमनी की आंतरिक दीवारों में गुब्बारा बन जाता हैं,जिसे आर्टरी वेनस मालफार्मेशन (AVM) कहते हैं, यह AVM जब फटता है तो ब्रेन हेमरेज का कारण बनता हैं।




4.कैंसर‌


यदि मस्तिष्क कैंसर हो और यदि यह कैंसर भविष्य में मस्तिष्क के आंतरिक भाग में फैलता है तो ब्रेन हेमरेज होने की संभावना हो जाती हैं।



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5.बढ़ती उम्र 

उम्रदराज व्यक्तियों की रक्त शिराओं में एमलाइड़ नामक प्रोटीन जमा हो जाता हैं यह प्रोटीन रक्त धमनियों की आंतरिक दीवारों को कमज़ोर कर देता है फलस्वरूप ब्रेन हेमरेज होता हैं।

6.जन्मजात विकार


सिकल सेल एनिमिया और हिमोफिलिया जैसे जन्मजात आनुवांशिक विकारों के कारण रक्त प्लेटलेट कम हो जातें हैं फलस्वरूप यदि ब्रेन हेमरेज होता हैं तो रक्त का थक्का नहीं बनता और इस प्रकार यह आनुवांशिक जन्मजात विकार ब्रेन हेमरेज के लिए आदर्श परिस्थिति पैदा करते हैं।

वायु प्रदूषण air pollution

हाल ही में हुए शोध के मुताबिक उच्च रक्तचाप के बाद वायु प्रदूषण ब्रेन हेमरेज का दूसरा सबसे बड़ा कारण बनकर उभरा है । वायु प्रदूषण से होने वाले ब्रेन हेमरेज के पिछे मुख्य कारण कोयला, लकड़ी जैसे घरेलू ईंधन का इस्तेमाल हैं जो आज भी बहुत से भारतीय घरों में इस्तेमाल किया जाता हैं।

जोखिम वाली गर्भावस्था 

अधिक उम्र में गर्भधारण और इसके साथ मधुमेह, शरीर में इलेक्ट्रो लाइट का असंतुलन, ह्रदयरोग, उच्च रक्तचाप का जोखिम ब्रेन हेमरेज के खतरे को बढ़ा देता है ।


7. ब्रेन हेमरेज BRAIN HEMORRHAGE के लक्षण 


ब्रेन हेमरेज BRAIN HEMORRHAGE होने के बहुत सारे अलग-अलग लक्षण प्रकट होते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता हैं कि खून निकलने की जगह कोंन सी हैं। खून कितना निकल रहा है और इससेे मस्तिष्क के कितने ऊतक प्रभावित हो रहें हैं। 



ब्रेन हेमरेज के लक्षण BRAIN HEMORRHAGE ke laxan अचानक उभर सकते हैं या धिरे धिरे भी उभरते हैं । जिन्हें निम्न लक्षण के आधार पर सामान्य व्यक्ति भी पहचान सकता हैं।


० मुंह का टेढ़ा होना 


० एक तरफ का चेहरा लकवाग्रस्त हो जाना

० अचानक बहुत तेज सिरदर्द


० बांहों या टांगों में बहुत ज्यादा कमजोरी

० चक्कर आना

० उल्टी होना

० एकाग्रता में कमी

० आंखों में कमजोरी

० बोलने और समझने में परेशानी

० निगलने में परेशानी

० पढ़ने और लिखने में परेशानी

० शरीर को संतुलित करने में परेशानी

० जीभ का स्वाद समाप्त होना

० साधारण रोशनी से भी आंखें चौंधिया जाना


F.A.S.T.TEST FOR STROKE ब्रेन हेमरेज की पहचान के लिए करें F.A.S.T. TEST



F.A.S.T.TEST सन् 1998 में अस्तित्व में आया था जिसका मुख्य उद्देश्य मस्तिष्क आघात या ब्रेन हेमरेज होने पर व्यक्ति इसकी तीव्रता से पहचान कर सकें ताकि बिना समय गंवाए व्यक्ति को शीघ्र उपचार दिया जा सके । 


F.A.S.T. TEST में प्रत्येक शब्द का अलग-अलग अर्थ होता हैं जैसे


F मतलब FACE या चेहरा , यदि व्यक्ति के चेहरे का एक हिस्सा निचें गिरा हुआ लगें तो इसका मतलब यह है कि यह संभावित ब्रेन हेमरेज या स्ट्रोक का लक्षण है ।



A मतलब ARM या बांह ,व्यक्ति को अपनी दोनों बांहों को उठाकर चेहरे के बराबर लानें को कहें यदि व्यक्ति ऐसा करने में असमर्थ रहता है तो यह ब्रेन हेमरेज या मस्तिष्क आघात का एक ओर संभावित लक्षण होता हैं।



S मतलब SPEECH या बोलना, व्यक्ति को कोई सरल वाक्य बोलने को कहें यदि व्यक्ति बोलने में कठिनाई महसूस करता है तो यह एक अन्य लक्षण है।



T मतलब TIME , यदि उपरोक्त तीनों टेस्ट का परिणाम पाज़िटिव positive हैं तो इसका मतलब है कि बिना समय गंवाए व्यक्ति को आपातकालीन चिकित्सा के लिए अस्पताल में ले जायें या आपातकालीन एंबुलेंस को फोन लगायें।



ब्रेन हेमरेज के प्रकार BRAIN HEMORRHAGE ke prakar


1.इंट्राक्रेनियल हेमरेज 


खोपड़ी के आंतरिक भागों में कहीं पर भी रक्त स्त्राव इंट्राक्रेनियल हेमरेज कहलाता हैं।


प्री मेच्योर डिलेवरी वाले बच्चों में इंट्राक्रेनियल हेमरेज की संभावना बहुत अधिक होती है क्योंकि इनके मस्तिष्क में अतिरिक्त तरल पदार्थ जमा होता हैं जो बाद के जीवन में ब्रेन हेमरेज होने की संभावना को जन्म देता है।



2.सुब्राकेनाइड़ हेमरेज


मस्तिष्क के ऊपरी खोल और आंतरिक ऊत्तकों के मध्य खून का निकलना सुब्राकेनाइड़ हेमरेज के नाम से जाना जाता हैं।



3.SubDural HEMORRHAGE 

मस्तिष्क की आंतरिक दीवार dura और मस्तिष्क के ऊपरी भाग के मध्य रक्तस्राव को subdural hemorrhage के नाम से जाना जाता हैं।

4.epidural hemorrhage


आंतरिक मस्तिष्क और skull के मध्य रक्तस्राव को epidural hemorrhage कहते हैं।


ब्रेन हेमरेज से बचने के उपाय 


1.विशेषज्ञों के मुताबिक दुनियाभर में 80% ब्रेन हेमरेज का कारण उच्च रक्तचाप होता हैं। अतः ब्रेन हेमरेज से बचने के लिए यदि व्यक्ति की family history उच्च रक्तचाप की हो तो 35 वर्ष की उम्र के बाद नियमित अंतराल पर अपने रक्तचाप की जांच करवाना चाहिए ।

उच्च रक्तचाप पर नियंत्रण रखने से ही ब्रेन हेमरेज का बचाव हो जाता हैं ।



जिन व्यक्तियों को उच्च रक्तचाप की समस्या रहती हैं उन्हें आवश्यक रूप से घर पर रक्तचाप मानिटर घर पर रखना चाहिए।


2.धूम्रपान,खैनी गुटखा, कोकीन, शराब आदि मादक पदार्थों का सेवन खून का संचार मस्तिष्क की ओर तेज कर देता है। जिससे ब्रेन हेमरेज की संभावना बढ़ जाती है अतः इन पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।


3.युवावस्था में ब्रेन हेमरेज yuvavastha me brain HEMORRHAGE का बहुत बड़ा कारण सड़क दुघर्टना में मस्तिष्क में लगी चोंट होती हैं अतः दोपहिया वाहन चलाते वक्त हेलमेट और चार पहिया वाहन चलाते समय सीट बेल्ट अनिवार्य रूप से पहनना चाहिए और वाहन निर्धारित स्पीड में ही चलाना चाहिए।


4.यदि एन्यूरिज्म या मस्तिष्क संबंधी कोई न्यूरोलाजिकल डिसआर्डर है तो इसका समुचित इलाज विषय विशेषज्ञों से अवश्य करवाना चाहिए।


5.मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग का बहुत घनिष्ठ संबंध होता हैं और इन बीमारियों के साथ ब्रेन हेमरेज साइलेंट किलर की तरह आता है। अतः ऐसे लोग अपनी Healthy lifestyle को बनाये रखें।


6.सेक्स उत्तेजना प्रदान करने वाली औषधि का प्रभाव मस्तिष्क की धमनी को कमज़ोर बनाता है अतः इन औषधियों का सेवन चिकित्सक के परामर्श के अनुसार ही करें।

7.रोजमर्रा की दिनचर्या में तनाव का स्तर बिल्कुल भी न बढ़ने दें।


8.ऐसे मानसिक व्यायाम करें जिससे मस्तिष्क की गतिविधि तेज़ हो जैसे क्रास पजल हल करना, गणितीय पहेलियां हल करना आदि

9.योग को जीवन का अनिवार्य हिस्सा बना लें, ऐसे व्यक्ति जिनके परिवार में ब्रेन हेमरेज की हिस्ट्री हैं, उन्हें नियमित रूप से सुबह शाम अनुलोम-विलोम, भ्रामरी, प्राणायाम करना चाहिए।

10.यदि जन्मजात आनुवांशिक विकारों जैसे सिकल सेल एनिमिया और हिमोफिलिया से ग्रसित है तो नियमित रूप से न्यूरोलाजिस्ट को दिखाये जिससे कि मस्तिष्क संबंधी कोई समस्या हो तो उसे शुरुआत में ही पकड़ा जा सके ।


ब्रेन हेमरेज का इलाज



यदि ब्रेन हेमरेज हुआ हैं तो ब्रेन हेमरेज का उपचार बहुत तेजी के साथ किया जाना चाहिए। मरीज को अस्पताल में भर्ती करने के बाद CT scan, MRI द्वारा शीघ्रता से पता किया जाना चाहिए कि मस्तिष्क के किस भाग में खून का कितना रिसाव हैं। 


न्यूरो सर्जन स्थिति की गंभीरता को समझते हुए मरीज को उपचार देते हैं जिससे मरीज का रक्तचाप स्थिर बना रहे और मस्तिष्क में आक्सीजन का लेवल बना रहे। 


मरीज को बाटल और इंजेक्शन के माध्यम से मस्तिष्क का आंतरिक सूजन कम करने वाली दवाईयां दी जाती है और यदि मस्तिष्क सर्जरी की आवश्यकता हुई तो न्यूरो सर्जन सर्जरी करता हैं।



क्या ब्रेन हेमरेज के बाद मनुष्य की जान बच सकती हैं

ब्रेन हेमरेज के बाद मनुष्य जिंदा रहेगा या नहीं ये इस बात पर निर्भर करता है कि ब्रेन हेमरेज के दोरान कितना रक्तस्राव हुआ है, मस्तिष्क के कितने  ऊतक क्षतिग्रस्त हुए हैं। उपचार के दौरान मरीज दवाईयां पर कितनी सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करता हैं। ब्रेन हेमरेज के बाद के गोल्डन आवर में क्या संबंधित उपचार शुरू हो गया है।

वैसे अधिकांश मामलों में ब्रेन हेमरेज बहुत घातक साबित होता हैं और व्यक्ति की जान बचने के बाद भी लकवा और विकलांगता के साथ व्यक्ति को जीवन गुजारना पड़ता हैं।

कोरोनावायरस और ब्रेन हेमरेज के बीच कोई संबंध है

पिछले कई दिनों से इस बात पर जोरदार बहस चल रही हैं कि क्या कोरोनावायरस ब्रेन हेमरेज जैसी समस्याओं को जन्म दे रहा है ।

विशेषज्ञ इस बात पर विस्तृत अध्ययन कर रहे हैं जिनके आरंभिक नतीजों के मुताबिक कोरोनावायरस के कारण मनुष्य अत्यधिक तनाव में जीवन व्यतीत कर रहा है । इस वजह से उसके मस्तिष्क संबंधी बीमारियों जैसे अवसाद,ब्रेन हेमरेज, सिरदर्द, माइग्रेन आदि से ग्रसित होने की संभावना दोगनी हों रही हैं । 

 यूनिवर्सिटी ऑफ लीवरपूल कोरोनावायरस के कारण होने वाली न्यूरोलाजिकल समस्याओं के बारे में विस्तृत अध्ययन कर रहा है ।


लेसेंट साइकेट्री जनरल में प्रकाशित शोध के शोधकर्ता बेनेडिक्ट ने महामारी और न्यूरोलाजिकल डिसआर्डर का विस्तृत अध्ययन कर यह साबित किया कि कोरोनावायरस से संक्रमित व्यक्ति संक्रमित होने के साथ न्यूरोलाजिकल और मानसिक समस्याओं से ग्रसित हो जाता हैं । उन्होंने 125  कोरोनावायरस संक्रमित व्यक्तियों का अध्ययन किया जिसमें से 77 मरीजों को स्ट्रोक stroke की समस्या पाई गई ।


भारत में ब्रेन हेमरेज से ग्रसित लगभग 70% लोग अपनी जान गंवा देते हैं । यदि ब्रेन हेमरेज से मरने वालों की बात की जाए तो साफ लाख मौंत प्रतिवर्ष के साथ भारत विश्व में दूसरे स्थान पर है ।

स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता अभियान चलाकर ब्रेन हेमरेज से मरने वालों की संख्या को घटाया जा सकता हैं और इस काम में समाज के प्रबुद्ध वर्ग का सहयोग लिया जा सकता हैं। इसके साथ ही स्वास्थ्य कर्मी को ब्रेन हेमरेज BRAIN HEMORRHAGE  के संदर्भ में अनिवार्य रूप से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।



ठंड में बाथरूम ब्रेन स्ट्रोक का खतरा क्यों बढ़ जाता हैं ?


भारत में ठंड के दिनों में बाथरूम में नहाने के दौरान ब्रेन स्ट्रोक के मामले बहुत अधिक बढ़ जाते हैं ऐसा ठंडे पानी से नहाने के कारण होता हैं जब वातावरण का तापमान शरीर के तापमान से कम हो जाता हैं तो ठंडा पानी शरीर और सिर पर डालने से मस्तिष्क में एड्रिनल हार्मोन बहुत तेजी से बनता हैं इस वजह से रक्तचाप एकाएक बहुत बढ़ जाता हैं और मस्तिष्क की धमनी पर दबाव पड़ता है फलस्वरूप ब्रेन स्ट्रोक का खतरा पैदा हो जाता हैं । 

बाथरूम स्ट्रोक का सबसे ज्यादा खतरा बुजुर्गों को होता हैं। क्योंकि वृद्धावस्था में मस्तिष्क की नसें कमज़ोर हो जाती हैं ।











21 जुल॰ 2020

काला धतूरा के फायदे और नुकसान kala dhatura ke fayde aur nuksan

धतूरा भगवान शिव का प्रिय पौधा है। भगवान शिव धतूरा अपने मस्तिष्क पर धारण करते हैं और जो लोग धतूरा भगवान शिव को अर्पण करते थे वे उन्हें मनचाहा आशीष प्रदान करते हैं। धतूरा भी कई प्रकार का होता है जैसे काला धतूरा, सफेद धतूरा, पीला धतूरा आदि। आज हम आपको "काला धतूरा के फायदे और नुकसान kala dhatura ke fayde aur nuksan" के बारे में बताएंगे।
Kala dhatura ke fayde aur nuksan
 काला धतूरा के फायदे और नुकसान




आयुर्वेद आयुर्वेद चिकित्सा में काला धतूरा बहुत महत्वपूर्ण औषधि के रूप में बहुत लंबे समय से इस्तेमाल हो रहा है । धतूरा बहुत ही जहरीला फल होता है , प्रकृति में गर्म और भारी होता है।


काला धतूरा का वैज्ञानिक नाम


काला धतूरा का वैज्ञानिक नाम धतूरा स्ट्रामोनियम DHATURA STRAMONIUM है ।


अंग्रेजी में इसे डेविल्स एप्पल Devil's apple, डेविल्स ट्रम्पेट Devil's trumpet के नाम से जाना जाता है।


संस्कृत में इसे दस्तूर, मदन, उन्मत्त ,शिव प्रिय महामोधि, कनक आदि नाम से जानते हैं।


काला धतूरा की पहचान कैसे करें 


काला धतूरा के पत्ते नोक दार ,डंठल युक्त और बड़े आकार के होते हैं। काला धतूरा के फूल घंटी के आकार के होते हैं इनका रंग सफेद होता है। काला धतूरा का फल गोल और ऊपर से कांटेदार होता है । काला धतूरा का बीज काले रंग के और बहुत अधिक मात्रा में फल में मिलते हैं।

काला धतूरा के बीज गंध रहित होते हैं।

काला धतूरा के पत्तों का उपयोग अस्थमा में 

काला धतूरा के पत्तों का उपयोग अस्थमा के निवारण में बहुत प्राचीन काल से किया जा रहा है, उसके पत्तों को चिलम में भरकर अस्थमा पीड़ित व्यक्ति को धूम्रपान कराया जाता है लेकिन यह धूम्रपान पूरी तरह से चिकित्सक की देखरेख में कराया जाता है।


धतूरा के पत्तों का प्रयोग धूम्रपान के रूप में करने से श्वास नली में जमा बलगम पतला होकर बाहर निकल जाता है और श्वास नलिका की सूजन कम हो जाती है।


धतूरे के पत्तों पर सरसों का तेल लपेटकर गर्म कर लें,अब इन पत्तों को शरीर पर निकलने वाले फोड़ों, जोड़ों मेंं होने दर्द, पीठ दर्द, पेट के अंदरूनी हिस्सों मेंं सूजन, पसलियोंंं में सूजन आदि में बांधने से बहुत आराम मिलता है।


धतूरे के पत्तों का रस सिर दर्द में लगाने से सिर दर्द बंद हो जाता है।

बच्चों में होने वाला निमोनिया बहुत ही खतरनाक बीमारी है जो बच्चों की जान ले सकती हैं यदि धतूरे के पत्तों को गर्म कर फेफड़ों पर रख दिया जाए तो निमोनिया में बहुत आराम मिलता है।

बदन दर्द में धतूरे का प्रयोग


पूरा शरीर अकड़ गया और दर्द अधिक हो तो काले धतूरे के बीजों को दही के साथ सेवन कराने से बदन दर्द खत्म हो जाता है लेकिन इन बीजों का प्रयोग चिकित्सकीय निर्देशों के अनुसार ही किया जाना चाहिए।


पथरी के दर्द में धतूरे का प्रयोग


धतूरे की जड़ पीसकर इसमें गोमूत्र मिला है यह लेप उस जगह पर लगाएं जहां से पथरी का दर्द उठ रहा हो कुछ समय के पश्चात पथरी के दर्द में आराम मिलता है।


गंजापन दूर करने के लिए धतूरे का प्रयोग


गंजापन दूर करने के लिए धतूरे के फूलों का रस गंजे सिर पर सप्ताह में एक बार लगाए ।


पागलपन दूर करने के  लिए धतूरे का प्रयोग


पागलपन दूर करने के लिए धतूरे के कुछ अनुभूत प्रयोग है यदि हम इसका प्रयोग विधि पूर्वक करें तो पागल व्यक्ति बहुत  शीघ्र ठीक हो जाता है। 

धतूरे का रस और शहद के साथ मिलाकर पागल व्यक्ति को चटाने से पागल व्यक्ति ठीक हो जाता है।

चर्म रोगों में धतूरे का प्रयोग


धतूरे के बीजों को कुचलकर सरसों तेल के साथ गर्म कर ले यह तेल चर्म रोग पर लगाने से दाद खाज खुजली जैसे गंभीर समस्याएं समाप्त हो जाती है।

फंगल इन्फेक्शन कारण, प्रकार और फंगल इन्फेक्शन का इलाज

मच्छर भगाने में धतूरे का प्रयोग


धतूरे के पत्तों को सुखाकर जलाने से मच्छर , कीट पतंगे आदि दूर भाग जाते हैं । धतूरे के पत्ते बंद कमरे में नहीं जलाना चाहिए।

पैरों की सूजन में धतूरे का प्रयोग


धतूरे के बीज पीसकर  सरसों का तेल मिला लें इस मिश्रण  से पैरों की मालिश करने से पैरों की सूजन दूर होती हैं।

बेहोशी दूर करने के लिए धतूरे का प्रयोग


यदि व्यक्ति बेहोश हो जाता है तो धतूरे के पत्तों का रस निकालकर चार पांच बूंद नाक में टपका दे, बेहोशी दूर हो जाती ।

माइग्रेन में धतूरे का प्रयोग

धतूरे के फूलों का ताजा रस तीन चार बूंद नाक में डालने से माइग्रेन का दर्द बंद हो जाता है।

चक्कर आने पर धतूरे का प्रयोग


चक्कर बहुत अधिक आ रहे हो और कुछ समझ नहीं आ रहा तो धतूरे के फूलों को सूंघ ले, तीन चार बार सूंघने से चक्कर आना बंद हो जाते हैं।

अंडकोष की सूजन में धतूरे का प्रयोग


धतूरे के बीजों को बांटकर शहद में मिला ले यह लेप अंडकोष पर बांधने से अंडकोष की सूजन तुरंत ही मिट जाती है।


कानदर्द में धतूरे का प्रयोग 


धतूरे के रस को गाढ़ा होने तक गर्म कर ले और  गुनगुना होने पर कान के आसपास लगाएं कुछ समय के पश्चात कान दर्द में आराम मिलने लगता है।

बार बार गर्भपात होने पर धतूरे का प्रयोग

यदि स्त्री को बार बार गर्भपात हो रहा हो तो धतूरे की जड़ स्त्री की कमर में बांध देना चाहिए । इस प्रयोग से बार बार गर्भपात होने की संभावना समाप्त हो जाती है।

उच्च रक्तचाप में धतूरे का प्रयोग


उच्च रक्तचाप यदि दवाई लेने के बाद भी नियंत्रण में नहीं आ रहा हूं तो धतूरे की 3 से 4 इंच मोटी जड़ बारीक बारीक काट लें इस तरह 4 -5 जड़ रोगी व्यक्ति की  बाहों  में धागे की सहायता से बांध दें। इस प्रयोग से उच्च रक्तचाप में बहुत तेजी से आराम मिलता है।

तनाव दूर करने में धतूरे का प्रयोग


धतूरा तनाव दूर करने की एक बहुत ही उत्तम औषधि है । धतूरे में मौजूद एट्रोपिन नामक तत्व तनाव को दूर कर दिमाग को शांत और प्रसन्न चित्त रखता है। इसके लिए धतूरे के बीज पीसकर शहद मिला लें। इस मिश्रण को रात को सोते समय दोनों कनपटी और सिर पर लगा ले तनाव दूर करने का बहुत ही उत्तम प्रयोग है।

• तनाव प्रबंधन के उपाय

धतूरा की जड़ के टोटके


किशोरी स्त्री को माहवारी के समय यदि पेडू में दर्द हो रहा है तो धतूरे की जड़ तीन चार अंगुल काटकर माहवारी आने के दो तीन दिन पूर्व कमर में बांध दें, माहवारी के समय होने वाला दर्द समाप्त हो जाता हैं।

धतूरे के तेल का प्रयोग


धतूरा अधिक गर्म प्रकृति का होता है और इसका तेल भी इसी गर्म प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है अत्यधिक शीतल स्थानों जैसे कश्मीर, उत्तरी ध्रुव , दक्षिण ध्रुव, रूस साइबेरिया, अमेरिका, यूरोप अंटार्कटिका आर्कटिक आदि स्थानों पर रहने वाले व्यक्ति यदि धतूरे के तेल का प्रयोग शरीर पर मालिश के लिए करें तो शरीर में ठंड लगने की संभावना बहुत कम रहती है और शरीर गर्म बना रहता है।

मधुमेह में धतूरे का प्रयोग



काले धतूरे के बीजों को पानी में उबालकर उबले हुए पानी की एक या दो सेकंड तक वाष्प  लेने से रक्त में उपस्थित ज्यादा शर्करा नियंत्रित होती है। लेकिन इसके प्रयोग से पूर्व चिकित्सक का परामर्श अवश्य कर लें ।

स्तंभन शक्ति बढ़ाने में धतूरे का प्रयोग


काले धतूरे के बीज को पीसकर नाभि के आसपास लगाने से पुरुष और स्त्री दोनों की स्तंभन शक्ति में अभूतपूर्व वृद्धि होती है ।

बवासीर में धतूरे का प्रयोग


काले धतूरे की जड़ को पीसकर गुदा के बाहरी भागों में लगाने से बवासीर में बहुत आराम मिलता है लेकिन जड़ लगाने के दौरान ध्यान रहे लेप का स्पर्श गुदा से ना हो।

दांत दर्द में धतूरे का प्रयोग


काले धतूरे के बीजों को पीसकर छोटी-छोटी गोलियां बना लें जब कभी दांत दर्द हो तो दर्द वाले दांत पर गोलियों का रखें लेकिन ध्यान रहे लार थूंक दें। इस तरह गोली रखने से दांत दर्द में आराम मिलता है।

खिलाड़ीयों के लिए धतूरे का प्रयोग


धतूरे में scopolamine तत्व पाया जाता हैं, यह तत्व उत्तेजना पर नियंत्रण रखने और एकाग्रता प्राप्त करने के लिए आधुनिक चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। जिन खेलों में एकाग्रता और मन पर नियंत्रण रखने की जरूरत होती हैं जैसे निशानेबाजी, शतरंज, आदि के खिलाड़ियों को काला धतूरा के पत्तों,बीज या फूल को मसलकर सूंघना चाहिए। और यह खिलाड़ी के लिए किसी प्रतिबंधित श्रेणी में भी नहीं आता है ।


scopolamine का उपयोग आपरेशन और किमोथेरेपी के बाद होने वाली उल्टी और चक्कर को रोकने में भी किया जाता है ।

पेट संबंधी बीमारीयों में धतूरे का प्रयोग


धतूरे में Hysciamine नामक तत्व पाया जाता हैं जो कि पेट के अल्सर,IBS (irritable bowel syndrome) ,और फूड़ एलर्जी में बहुत फायदेमंद होता है ।

मांसपेशियों की ऐंठन में धतूरे का प्रयोग


यदि किसी व्यक्ति की मांसपेशियों में खिंचाव या ऐंठन आ जाये तो धतूरे के पत्तों को पानी में उबालकर उसकी भाप लेनी चाहिए। इससे मांसपेशियों में खिंचाव या ऐंठन की समस्या समाप्त हो जाती है क्योंकि धतूरे में मौजूद Norhyosciamine नामक तत्व ऐंठन और मांसपेशियों के खिंचाव की आधिकारिक आधुनिक चिकित्सा है।

धतूरे के नुकसान


धतूरा बहुत ज़हरीला पौधा होता है Dhatura bahut jahrila podha hota hai जिसमें atropine ,meteolodine जैसे खतरनाक तत्व पाए जाते हैं। इन तत्वों के सेवन से मनुष्य की मौत तक हो जाती हैं। 

धतूरे का बाह्य रूप में प्रयोग त्वचा संबंधी समस्या जैसे खुजली, एलर्जी, त्वचा का जलना आदि पैदा करता हैं।


धतूरे के बीज भी बहुत जहरीले होते हैं अतः बिना वैघकीय परामर्श के इनका प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।

धतूरे का प्रयोग चिकित्सक द्वारा एक विशेष अनुपात में रोगी की स्थिति देखकर किया जाता है अतः बिना चिकित्सक की सलाह धतूरे का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।

ह्रदय रोगियों, मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति,या अन्य किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति,  को कच्चे धतूरे का प्रयोग आयुर्वेद चिकित्सक के परामर्श के बाद ही करना चाहिए


2 जुल॰ 2020

हर्ड इम्यूनिटी । herd immunity क्या है ? । क्या कोरोनावायरस से बचाव का सही तरीका यही है

हर्ड इम्यूनिटी herd immunity :: क्या कोरोनावायरस से बचाव का सही तरीका यही है ? Herd immunity kya hoti hai

हर्ड इम्यूनिटी
 हर्ड इम्यूनिटी


भारत समेत पूरी दुनिया कोरोनावायरस से पीड़ित हैं,दिन प्रतिदिन कोविड़ 19 बीमारी से निपटने के लिए नयी नयी औषधियों का अविष्कार करने का प्रयास किया जा रहा है वहीं अनेक विशेषज्ञों ने हर्ड इम्यूनिटी द्वारा भी कोरोनावायरस से निपटने की सलाह दी है। आईये जानतें हैं हर्ड इम्यूनिटी क्या होती हैं 

हर्ड इम्यूनिटी क्या है Herd immunity kya hai


हर्ड (Herd) का हिंदी अनुवाद Herd immunity ka hindi anuvad झुंड होता है। इसी हर्ड से हर्ड  का प्रादुर्भाव हुआ है । इसी प्रकार इम्यूनिटी ( IMMUNITY ) का अर्थ शरीर विज्ञान के सन्दर्भ में रोग प्रतिरोधक क्षमता से है । अर्थात हर्ड इम्यूनिटी या झुंड प्रतिरोधक क्षमता चिकित्सा विज्ञान की वह अवधारणा है जिसमें जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा या तो टीकाकरण द्वारा या किसी महामारी द्वारा प्राकृतिक रुप से संक्रमित होकर उस बीमारी के प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है ‌। 


अलग-अलग बीमारियों के लिए हर्ड इम्यूनिटी का स्तर अलग-अलग होता है जैसे मीजल्स के लिए 90 से 95 प्रतिशत , डेंगू के लिए 50 प्रतिशत और कोविड़ 19 के लिए 60 से 92 प्रतिशत है ।

स्तर से तात्पर्य आबादी के अनुपात से है जिसमें आबादी बीमारी से संक्रमित होकर  उस बीमारी के प्रति इम्यूनिटी प्राप्त करती हैं ।

हर्ड इम्यूनिटी द्वारा बीमारी का फैलाव नियंत्रित और जनसंख्या के बड़े भाग की जान को बचाया जा सकता है ।

हर्ड इम्यूनिटी कैसे प्राप्त होती हैं 


हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करने के दो तरीके हैं प्रथम टीकाकरण और दूसरा प्राकृतिक रूप से

टीकाकरण 

बड़ी आबादी का टीकाकरण करके हर्ड इम्यूनिटी को प्राप्त किया जाता है। इस तरह की इम्यूनिटी चेचक, पोलियो,खसरा आदि बीमारियों का टीकाकरण कर प्राप्त की जा चुकी हैं ।

प्राकृतिक रुप से


प्राकृतिक रुप से हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करने का सीधा सरल तरीका अनलॉक से जुड़ा है अर्थात सम्पूर्ण आबादी को बीमारी से संक्रमित होने दिया जाये जब यह  आबादी संक्रमित होकर ठीक होगी तो  संक्रमण के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने से संक्रमण की श्रृंखला टूट जायेगी । 

क्या हर्ड इम्यूनिटी द्वारा किसी बीमारी का फैलाव रोका जा सकता है ?


पूरी दुनिया में इस बात को लेकर ज़ोरदार बहस चल रही है कि क्या वास्तव में प्राकृतिक हर्ड इम्यूनिटी द्वारा महामारी के प्रसार को रोका जा सकता है ? या महामारी का टीकाकरण ही एकमात्र विकल्प है। प्राकृतिक हर्ड इम्यूनिटी के समर्थकों का तर्क है कि यदि मानव जाति को बार बार महामारी की विभीषिका से बचाना है तो प्राकृतिक हर्ड इम्यूनिटी ही एकमात्र विकल्प है क्योंकि वायरस जनित बीमारीयां लगातार अपना स्ट्रेन बदलकर टीकाकरण अभियान को फैल करती रहेगी,सार्स,H1N1,इबोला ‌,और अब कोरोनावायरस,एक का टीका बना तो दूसरी वायरस जनित बीमारी अपना स्ट्रेन बदलकर नये रुप में मानवता के समक्ष चुनौती प्रस्तुत कर रही हैं। 

पैदा होने के बाद से ही टीकाकरण चालू होता है और किशोर अवस्था तक मनुष्य कई प्रकार के टीके लगवाता हैं और आजकल तो वयस्क टीकाकरण भी होने लगा है। क्या मनुष्य का शरीर इतने टीकाकरण के दुष्प्रभाव नहीं झेलता है ?

दूसरी ओर टीकाकरण अभियान के समर्थकों का कहना है कि प्राकृतिक तरीके से हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करने का सीधा सा मतलब है डार्विन के योग्यतम की उत्तरजिवीता सिद्धांत का अनुपालन करना यानि कमज़ोर प्रतिरोधक क्षमता वाले को मरने के लिए छोड़ दिया जाये। क्या 21 सदी के उन्नतशील चिकित्सा वैज्ञानिक समुदाय के लिए यह धारणा उचित है । और क्या यह अवधारणा मनुष्य के जीवन जीने की स्वतंत्रता और उसके मानवाधिकार का अतिक्रमण नहीं है ।

वैसे भी हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करने के लिए न्यूनतम 60% आबादी का संक्रमित होना आवश्यक है । लेकिन भारत जैसे देश में जहां 85% महिलाएं और किशोरियां रक्ताल्पता से ग्रसित है, तथा आबादी का बड़ा हिस्सा मधुमेह, ह्रदय रोग, उच्च रक्तचाप जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहा है। ऐसे में क्या इनकी जान जोखिम में डालकर प्राकृतिक हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करना उचित होगा ।

अब तक कितनी बीमारियों के प्रति हमनें प्राकृतिक हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त की है ? और इस दौरान कितना जनविनाश हुआ है ? महामारीयों में जिंदा बचे लोगों के अनुभव सुनें तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। एक बुजुर्ग ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि हैजा महामारी के दौरान 700 की आबादी वाला मेरे पूरे गांव में 200 से ज्यादा मौतें हुई थी । 

दूसरी ओर टीकाकरण समर्थक विचारधारा का मानना है कि अब तक जितनी भी बीमारियों के प्रति हर्ड इम्यूनिटी विकसित हुई हैं वह टीकाकरण अभियानों की वजह से ही हुई हैं,चाहे वह पोलियो हो या चेचक,खसरा हो या काली खांसी।

कोरोनावायरस महामारी के दौरान हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करने वाला देश कोंन है ?



कोरोनावायरस महामारी के दौरान चीन, ब्रिटेन आदि देशों ने हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करने का दावा किया लेकिन बाद में जब हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करने के बाद भी कई लोग फिर से संक्रमित हो गये तो इस पर विवाद भी खूब हुआ ।

अभी हाल ही में स्वीडन ने दावा किया कि उसकी राजधानी स्टाकहोम ने हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त कर ली हैं ।


डॉ.सोम्या स्वामीनाथन हर्ड इम्यूनिटी के बारें में क्या विचार रखती हैं 

डॉ.सोम्या स्वामीनाथन जो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रमुख वैज्ञानिक हैं का मानना है कि दुनिया को कोरोनावायरस महामारी से प्राकृतिक हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करने में बहुत लम्बा वक्त लगेगा क्योंकि अभी पूरी दुनिया में मात्र 5 से 10 प्रतिशत आबादी ही कोरोनावायरस से संक्रमित हुई हैं और जब तक प्राकृतिक हर्ड इम्यूनिटी का स्तर प्राप्त होगा तब तक कोरोनावायरस कमज़ोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लाखों लोगों को कालकलवित कर चुका होगा । 

डॉ.सोम्या स्वामीनाथन के मुताबिक हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करने का सबसे उत्तम तरीका टीकाकरण ही हैं । 

बीटा वायरस 


अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में फैला कोरोनावायरस बीटा किस्म का है जो कि पश्चिमी देशों, अमेरिका, यूरोप आदि में फैले वायरस के मुकाबले कम शक्तिशाली है अतः इस वायरस के विरुद्ध हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करना ज्यादा आसान है।

हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करने का नया तरीका क्या हो सकता हैं ?


हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करने का एक नया तरीका भी हो सकता हैं , यदि हम जनसंख्या को विभिन्न आयु वर्गों में बांट दें और उसके बाद अनलॉक की प्रक्रिया शुरू करें तो प्राकृतिक हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करने में बहुत आसानी होगी, उदाहरण के लिए  18 से 35 आयु वर्ग को काम भेजा जाये और संक्रमित होने दिया जाये तो यह वर्ग बहुत जल्दी प्राकृतिक हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त कर लेगा । 

35 से ऊपर आयु वर्ग को उसी दशा में काम पर भेजा जाये जब इस वर्ग का सदस्य पूर्णत स्वस्थ हो अस्वस्थ होने पर इस वर्ग के सदस्यों को काम पर नहीं भेजा जाये । इस वर्ग के सदस्यों द्वारा हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त कर लेने का सीधा अर्थ होगा हर्ड इम्यूनिटी का स्तर प्राप्त हो गया। भारत जैसे देश में जहां 35 वर्ष से कम आयु की 65 प्रतिशत आबादी निवास करती हो यह तकनीक बहुत कारगर साबित हो सकती हैं । और इस तकनीक से अस्पतालों, स्वास्थ्यकर्मी और सरकारों पर कोरोनावायरस से ग्रसित गंभीर मरीजों का दबाव भी कम हो सकता हैं ।

प्रिंसटन यूनिवर्सिटी और सेंटर फॉर डिजीज डायनामिक्स एंड पालिसी के शोधकर्ताओं ने भी भारत में प्राकृतिक हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करने की इस तकनीक पर भरोसा जताया है।

क्या चीन के अनुभव से सीखा जा सकता हैं 


करोनावायरस चीन के वुहान शहर से पूरी दुनिया में फैला था, दिसम्बर 2019 से जुलाई 2020 तक यह शहर कोरोनावायरस को बहुत हद तक नियंत्रित कर चुका था। इस नियंत्रण के पिछे मुख्यत: सोशल डिस्टेंसिंग और लाकडाउन का ही हाथ रहा है । 

इसके अलावा मास टेस्टिंग के द्वारा भी समुदाय में वायरस फैलने की गति को पहचान कर उचित स्वास्थगत कदम उठाए जा सकते हैं।

लम्बा लाकडाउन किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए उचित नहीं है लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग और मास टेस्टिंग के द्वारा भारत कोरोनावायरस से आसानी से निपट सकता हैं ‌।

क्या भारत वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त कर सकता हैं ?


Indian counsil of medical research ( ICMR) का कहना है कि भारत में कोरोनावायरस महामारी के फैलने के चार चरण है ।

पहले चरण में विदेश से भारत आए लोगों द्वारा संक्रमण फैलाने वाले लोग सम्मिलित हैं

दूसरे चरण में वे लोग शामिल हैं जिन्हें विदेश से आए लोगों ने संक्रमित किया है और वे अपने समुदाय में संक्रमण फैलाते हैं।


तीसरे चरण में वे लोग सम्मिलित हैं जिनके संक्रमित होने के स्त्रोत का पता नहीं चल पाता है। अर्थात संक्रमण सामुदायिक स्तर तक पहुंच गया है ।

चौथे चरण में संक्रमण समुदाय स्तर आगे निकल कर आबादी के बहुत बड़े वर्ग को संक्रमित कर दें और व्यक्ति में बीमारी से लड़कर प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाए ।

ICMR के अनुसार यही चोथै चरण का संक्रमण स्तर हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करने के लिए आदर्श होता है लेकिन बात फिर वही आ जाती हैं की इंसान की जान इतनी सस्ती नहीं है कि कम प्रतिरोधक क्षमता वाले को मरने के लिए छोड़ दिया जाए।


विशेषज्ञ डॉक्टरों का मानना है कि हर्ड इम्यूनिटी herd immunity प्राप्त करने के लिए भारत को युवा आबादी पर फोकस करना चाहिए और सीनियर सेकेंडरी स्कूल ,और कालेज खोल देना चाहिए ताकि युवा आबादी संक्रमित होकर हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त कर सकें ।

लेकिन इस सिद्धांत पर भी प्रश्न खड़े हो रहे हैं अनेक वैज्ञानिक संस्थान कह रहे हैं कि भारत बहुत बड़ी आबादी वाला देश है जहां अब तक 15% आबादी भी संक्रमित नहीं हुई हैं और बड़ी आबादी का संक्रमित होने का मतलब है बड़ा जोखिम जो कि भारत की स्वास्थ्य सुविधाओं को देखते हुए बहुत ख़तरनाक साबित हो सकता हैं। 
हर्ड इम्यूनिटी का सिद्धांत कम आबादी वाले देशों के लिए उपयुक्त हो सकता हैं लेकिन भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश के लिए नहीं।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हर्ड इम्यूनिटी प्राप्त करने का सीधा सरल रास्ता टीकाकरण अभियान ही हैं । और यह रास्ता कारगर भी है ।

सीरो सर्वे


दिल्ली में 27 जून से 14 जुलाई 2020 के मध्य सीरो सर्वे हुआ जिसके मुताबिक दिल्ली की 23% आबादी यानि 40 लाख लोगों में एंटीबाडी विकसित हो चुकी हैं । 

बड़ी आबादी में एंटीबाडी antibody विकसित होने का मतलब यह माना जाए कि कोरोनावायरस के खिलाफ शरीर में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो चुकी हैं । 

 आंकड़ों के मुताबिक जून 2020 में दिल्ली में 4000 केस रोज आ रहें थे लेकिन जुलाई 2020 तक यह संख्या 2000 प्रतिदिन से भी कम हो गई। 


महामारी विशेषज्ञों का कहना है कि मनुष्य में एंटीबाडी विकसित होने का यह बिल्कुल मतलब नहीं है कि महामारी समाप्त हो गई है क्योंकि कोरोनावायरस अपना रुप लगातार बदलकर उन लोगों को भी दोबारा संक्रमित कर रहा है जो कोरोनावायरस से संक्रमित हो चुके हैं।

कोरोनावायरस के आंकड़ों में कमी आनें का एक महत्वपूर्ण कारण लाकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का कड़ाई से पालन भी है।

कोरोनावायरस नई नस्ल Corona virus new strain :::


भारत में एक ओर कोरोनावायरस फैलनें की रफ्तार धीरें धीरें कम हो रही हैं । वहीं सूदूर यूरोप के देशों जैसें इटली, डेनमार्क ,नीदरलैंड और आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका में कोरोनावायरस के नए स्ट्रेन Corona virus new strain नें आमजनों के साथ चिकित्सा विशेषज्ञों को गंभीर चिंता में डाल दिया हैं । क्योंकि कोरोनावायरस का यह नया स्ट्रेन corona virus new strain पहले के कोरोनावायरस से 70 प्रतिशत अधिक संक्रामक है । तो आईयें जानतें हैं कोरोनावायरस के स्ट्रेन में बदलाव किस प्रकार का आया हैं ।

कोरोनावायरस का नया स्ट्रेन Corona virus new strain


कोरोनावायरस के नए स्ट्रेन में बदलाव मुख्यत: वासरस के स्पाइक प्रोटीन spike protien से जुड़ा हुआ हैं । स्पाइक प्रोटीन वायरस की बाहरी संरचना होती हैं जो मनुष्य की स्वस्थ्य  कोशिकाओं से चिपककर उन्हें संक्रमित कर देती हैं । 


ब्रिटेन के शोधकर्ताओं नें कोरोनावायरस वायरस के इस नए बदलाव को या म्यूटेशन को N 501 Y नाम दिया हैं । जो ब्रिटेन के 11 सौ लोगो में पाया गया है । 

कोरोनावायरस में बदलाव क्यों हो रहा हैं ?


कोरोनावायरस सार्स कोविड 2 सिंगल आरएनए वायरस हैं ।  इस वायरस में बदलाव तब होता हैं जब वायरस अपनी कापी बनानें में गलती करता हैं । इस वायरस के स्ट्रेन में बदलाव की वजह अन्य वायरस की तरह ही बहुत सामान्य हैं जिसमें वायरस कुछ समय बाद अपना स्वरूप बदलकर सामनें आता हैं ।

क्या इस समस्या के बाद कोरोनावायरस वैक्सीन निष्प्रभावी हो जाएगी ?


जी नहीं, माडर्न,फाइजर,और आक्सफोर्ड यूनिवर्सटी की एस्ट्रोजेनेका वैक्सीन स्पाइक प्रोटीन को Target करते हुए बनी हैं । इन वैक्सीन के लगने के बाद जो एँटीबाडी Antibody बनती हैं वह स्पाइक प्रोटीन को नष्ट कर वायरस को बढ़ने से रोकती हैं । अत: यह कहना की वायरस की संरचना में बदलाव के बाद वैक्सीन निष्प्रभावी हो जाएगी बहुत जल्दबाजी होगी । हाँ,इतना जरूर हैं कि कोरोनावायरस का नया स्ट्रेन पुरानें वायरस के मुकाबले बहुत अधिक संक्रामक है ।


वैज्ञानिकों का मत हैं कि चाहें कोरोनावायरस हो या अन्य वायरस इनमें बदलाव या म्यूटेशन की प्रक्रिया चलती रहेगी हमारा प्रतिरक्षा तंत्र नए वायरस के प्रति सक्रिय होकर वायरस को खत्म कर देगा या फिर वैक्सीन वायरस को फैलने से रोकेगी ।

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