गुरुवार, 30 मार्च 2017

जल प्रबंधन [WATER MANAGEMENT] आज की महती आवश्यकता

भेड़ाघाट
 नर्मदा नदी 

भारत सहित दुनिया के सभी विकासशील देश चाहें वह अफ्रीकी राष्ट्र हो,लेटिन अमरीकी हो या एशियाई सभी पानी की गंभीर कमी से जूझ रहें हैं,इस कमी का मूल कारण जल का प्रबंधन नही कर पाना हैं.


उदाहरण के लिये भारत में प्रतिवर्ष 4,000 अरब घन मीटर पानी प्राप्त होता हैं.जो कि भारत समेत तमाम एशियाई राष्ट्रों की ज़रूरतों के लियें पर्याप्त हैं,लेकिन बेहतर प्रबंधन के अभाव में लगभग 1500 अरब घन मीटर जल बहकर समुद्र में चला जाता हैं.यही 1500 अरब घन मीटर जल जब नदियों के माध्यम से बहता हैं,तो साथ में बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा भी लाता हैं जिससे भारत में प्रतिवर्ष 30 करोड़ आबादी,करोड़ों पशु एँव अरबों रूपये की फसल बर्बाद होती हैं.इसी तरह पानी की कमी यानि सूखे से प्रतिवर्ष 10 करोड़ लोग प्रभावित होतें हैं.

# बेहतर प्रबंधन कैसें हो :::


# 1.बाढ़ प्रबंधन :::


यदि हम बाढ़ के पानी को नदियों के माध्यम से सूखा प्रभावित क्षेत्रों में पहुँचाकर संचयित करनें की कार्यपृणाली को अपनायें तो न केवल सूखा प्रभावित क्षेंत्रों में पर्याप्त पानी की व्यवस्था हो जायेगी,बल्कि उन करोड़ों रूपयों की भी बचत होगी जो सरकार बाढ़ और सूखा राहत के नाम पर प्रतिवर्ष खर्च करती हैं.

# 2.पेड़ - पौधें बचायें नदियाँ :::


भारत में गंगा ,ब्रम्हपुत्र जैसी नदियों को छोड़ दे तो अधिकांश बढ़ी नदिया घनें जंगलों एँव पहाड़ों से निकलती हैं.ये घनें पेड़ पौधें वर्षा जल को मिट्टी में बांधकर उसे धिरें धिरें नालीयों के माध्यम से निचलें भागों की और रीसाते रहतें हैं,जब अनेक नालियाँ  एक जगह इकठ्ठी होती हैं,तो वही से नदियों का जन्म होता हैं,किन्तु पिछलें कुछ दशकों में इन नदी उद्गम स्रोतों के आसपास पेड़ - पौधों का कटाव इतना अधिक हुआ हैं,कि नदियों का प्राकृतिक जल प्रवाह लगभग समाप्त हो गया हैं,अब जो प्रवाह होता हैं,वह शहरों से निकलनें वालें गन्दें नालों के पानी का हैं,यदि नदियों के उद्गम स्रोतों के आसपास जंगलों का सफाया बंद नही हुआ तो ये नदियाँ गन्दें पानी के नालें ही बन जायेगी.

# 3.वर्षा जल पुन्रभंड़ारण :::

एक समय वर्षा जल को रोकनें की स्थाई पद्धति हमारें देश में काफी लोकप्रिय थी.और यह रूका हुआ जल वर्ष भर मानवीय प्रयोग में आता था.वर्षा जल को रोकनें वाली इन पद्धतियों में बावली काफी लोकप्रिय थी,किन्तु समय के साथ ये पद्धति विस्म्रत हो गई और इसका स्थान ट्यूबवेलों ने ग्रहण कर लिया इन ट्यूबवेलों से मनुष्य नें सिर्फ पानी उलीचना ही सीखा हैं,इन्हें वर्षाजल से रिचार्ज करनें का कोई विशेष प्रयत्न मनुष्य ने नही किया फलस्वरूप देश के लगभग 80% राज्यों में भूजल स्तर पाताल में पहुँच गया .
परंपरागत बावलियों की एक विशेषता यह हैं,कि इन्हें मानवीय प्रयत्नों से रिचार्ज नही करना पड़ता एक बावली जिसका मुहँ आसमान की ओर खुला हो वर्षाजल से स्वंय रिचार्ज होती रहती हैं.

इसी प्रकार छोटें - छोंट़ें तालाब ,पहाड़ीयों पर बनें चेकडेम,कन्टूर वर्षाजल को पृथ्वी में सहेजनें के बेहतरीन माध्यम हैं.

# 4.जल का पुन: उपयोग :::


आज से 2000 वर्ष पूर्व जितना जल प्रथ्वी पर उपलब्ध था,लगभग वही जल आज भी उपलब्ध हैं,किन्तु तब प्रथ्वी की आबादी आज के मुकाबलें मात्र 1% ही थी,उदाहरण के लिये भारत में सन् 1947 में जल की प्रतिव्यक्ति उपलब्धता 6000 घन मीटर थी,जो आज 1600 घन मीटर के आसपास ही बची हैं,ऐसे में जल का पुन्रउपयोग ही एकमात्र विकल्प बचता हैं,जो मनुष्य को पर्याप्त मात्रा में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करवा सकता हैं.इसके लिये ऐसी तकनीकों का उपयोग किया जाना उचित होगा जो औघोगिक पानी,मलमूत्र का पानी,सिवेज के पानी को स्वच्छ पानी में बदल सकें ताकि इसका उपयोग बाहरी कार्यों में किया जा सकें,इस तरह यदि हम पानी का पुन्रउपयोग सीख गये तो 25% तक पानी की ख़पत कम हो जायेगी.

ऐसी ही तकनीक व्यापक स्तर पर समुद्र के पानी को पीनें लायक बनानें के काम लाई जा सकती हैं.जिससे समुद्र किनारें रहनें वालें या टापूओं पर रहनें वालें मनुष्यों को पीनें का साफ पानी मिल सकें.

आश्रम व्यवस्था के बारें में पूरी जानकारी


#5. बेहतर सिंचाई तकनीक 

भारत में पानी का सबसे ज्यादा उपयोग सिंचाई के कार्यों में होता हैं,किन्तु हमारी सिंचाई तकनीक अत्यन्त पिछड़ी हुई हैं,इसी पिछड़ेपन की वज़ह से हमारी 60% जमीन बिना फसल उगायें पड़ी रहती हैं,यदि सिंचाई के क्षेंत्र में हम इजराइल का उदाहरण ले तो वहाँ मात्र 25 सेमी वार्षिक वर्षा होती हैं,किन्तु बेहतर तकनीकों की वजह से अधिकांश जमीन उपजाऊ हैं,जबकि भारत में इजराइल से चार गुना अधिक वर्षा होती हैं.
यदि ड्रीप पद्धति, स्प्रिंकिलर आदि के द्धारा सिंचाई की जायें तो पानी की बहुत बड़ी मात्रा बचाई जा सकती हैं,जिसका उपयोग बंजर भूमि में फसल उगाकर किया जा सकता हैं.
इसके अलावा क्षेंत्र आधारित फसलें उगाकर पानी की बचत की जा सकती हैं,क्षेत्र आधारित फसल से तात्पर्य जहाँ जितना अधिक पानी बरसता हैं,उतनें अधिक पानी की ज़रूरतों वाली फसल, इसके उलट कम वर्षा वालें क्षेंत्रों में कम पानी वाली फसलें उगाना चाहियें.

वास्तव में पानी की बेहतर उपलब्धता बेहतर प्रबंधन पर ही निर्भर करती हैं.इसीलिये कहा गया हैं,कि "जल हैं तो कल हैं"



100 साल जीनें के तरीके



शनिवार, 25 मार्च 2017

क्रिकेट cricketअतीत से वर्तमान तक का सफ़रनामा

sports
 Cricket
दुनिया में क्रिकेट खेलनें वाले जितनें राष्ट्र हैं,उनमें आधे एशियाई राष्ट्र हैं,और इन देशों में क्रिकेट़ की लोकप्रियता का आलम यह हैं,कि करोड़ों लोगों के लिये यह खेल धर्म हैं,और इसको खेलनें वाले खिलाड़ी भगवान .

भारत में यह खेल इस कदर लोकप्रिय हैं,कि जिस दिन भारत का कोई मैच किसी दूसरें देशों की टीम से होता हैं,उस दिन देश के स्कूल,कालेज,बाजार,और कार्यालयों में अघोषित अवकाश हो जाता हैं. 1990 के दशक में क्रिकेट अपने क्रिकेट केरियर की शुरूआत करनें वाले सचिन तेंडुलकर जैसें खिलाड़ी ने सपने में भी यह नही सोचा होगा कि एक दिन यह खेल उन्हें क्रिकेट का भगवान बना देगा.आईयें जानतें हैं इस भद्रपुरूषों के खेल के सफ़रनामें के बारें में

■ क्रिकेट की उत्पत्ति किस देश से हुई थी :::


क्रिकेट की उत्पत्ति इंग्लेड़ से मानी जाती हैं,जहाँ  13 वी शताब्दी से यह खेल गेंद और बल्ले के साथ खेला जा रहा हैं. सन्  1709 में यह खेल लंदन और केंट़ टीम के मध्य खेला गया.

इसके पश्चात 1730 के दशक तक यह खेल केम्ब्रिज और आक्सफोर्ड़ विश्वविधालय के छात्रों के बीच लोकप्रिय हो गया .

■ प्रथम क्रिकेट क्लब :::

दिनों दिन बढ़ती इस खेल की लोकप्रियता नें इग्लेंड़ में इसके संगठित प्रयासों को हवा दी और क्रिकेट खेलनें वालें कुछ लोगों ने 1760 में " हैम्बलड़न क्रिकेट क्लब "की स्थापना कर क्लब क्रिकेट खेलना शुरू किया .

1787 में क्लब कल्चर इंग्लेंड़ से बाहर निकलकर आस्ट्रेलिया जैसे सूदूर पूर्वी राष्ट्र जा पहुँचा,जहाँ मेलबार्न शहर में मेलबार्न क्रिकेट क्लब की स्थापना की गई.

खेल के साथ इसके नियमों के बननें की शुरूआत भी हुई लंदन क्लब द्धारा खेल से संबधित अनेक नियम बनायें गये.

■ अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट संघ की शुरूआत :::


सन् 1877 तक आतें - आतें क्रिकेट नें अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर लिया और इसको खेलनें वालें राष्ट्रों नें एक दूसरे से की टीमों के मध्य मैंच करानें के उद्देश्य से अन्तर्राष्ट्रीय संगठन बनानें का विचार करना शुरू किया,और 1909 में इंग्लेंड़,दक्षिण अफ्रीका और आस्ट्रेलिया ने मिलकर एक अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट संगठन " इंम्पीरियल क्रिकेट कांफ्रेस" की स्थापना की जिसके सदस्य राष्ट्रों की संख्या समय के साथ लगातार बढ़ती गई जैसें 1926 में भारत ,वेस्टइण्डीज एँव न्यूजीलैण्ड़ तथा 1952 में पाकिस्तान इसका सदस्य बना.

सन् 1965 में इसका नाम बदलकर इन्टरनेशनल क्रिकेट कांफ्रेस कर दिया गया.जो आज का अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) कहलाता हैं.जिसका मुख्यालय दुबई में हैं.


■ अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट मेंचों की शुरूआत कब हुई थी :::


क्रिकेट में अन्तर्राष्ट्रीय मेंचों की शुरूआत टेस्ट मेंचों के साथ मानी जाती हैं,जब आस्ट्रेलिया एँव इग्लेंड़ के मध्य प्रथम टेस्ट मेंच खेला गया यह मेंच चार दिन का था.
इसी प्रकार एकदिवसीय मेंचों की शुरूआत भी इन्ही दो देशों के मध्य हुई जो कि 5 जनवरी 1971 को क्रिकेट के मक्का लार्डस के मेंदान पर खेला गया.

■ भारत में क्रिकेट की शुरूआत कब हुई थी :::


भारत में क्रिकेट की शुरूआत करनें का श्रेय अंग्रेजों और तत्कालीन राजें - रजवाड़ों को जाता हैं.जिनमें प्रमुख नाम महाराजा रणजीत सिंह का हैं.1792 में कलकत्ता (कोलकता) में क्रिकेट क्लब की स्थापना हुई.
भारत की ओर से विदेशी दोरा करनें के लिये प्रथम क्रिकेट टीम सन् 1866 में इंग्लेंड़ गई.किन्तु इन मेंचों को अधिकृत मेंचों का दर्जा हासिल नही हैं,क्योंकि इन मेंचों को रिकार्ड़ बुक में दर्ज करनें के लिये कोई अन्तर्राष्ट्रीय संस्था उस समय मोजूद नही थी.

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) की स्थापना सन् 1928 में हुई जिसके प्रथम अध्यक्ष श्री E.R.GRANT थें.इसकी स्थापना के पश्चात ही भारत नें अपना प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय अधिकृत टेस्ट मेंच 25 जून 1932 को इंग्लेंड़ के विरूद्ध लार्डस के मैंदान पर खेला था.

आस्ट्रेलिया और इंग्लेंड़ के राष्ट्रीय खेल क्रिकेट का जितना विस्तार और व्यावसायीकरण भारत में हुआ उतना विश्व के किसी भी राष्ट्र में नही हुआ यही कारण हैं,कि सम्पूर्ण विश्व के क्रिकेट बोर्डों में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड़ (BCCI) का दबदबा माना जाता हैं.अपने इस प्रभाव का इस्तेमाल कर भारतीय बोर्ड ने क्रिकेट में अनेक सुधार करवायें जैसे नये देशों को अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट में शामिल करनें की सिफारिश करना, मैंचों के छोटे संस्करण जैसें 20 -20 (ट्वटी-ट्वटी) को समर्थन देना,क्रिकेट को लोकप्रिय बनानें हेतू उभरते राष्ट्रों को तकनीकी सहायता उपलब्ध करवाना आदि.

■ क्रिकेट खेल से संबधित जानकारी :::


क्रिकेट खेलनें के लियें तीन तरह की प्रतियोगिता आयोजित होती हैं,जिसमें प्रत्येक टीम में 11 -11 खिलाड़ी सम्मिलित होतें हैं.

1.टेस्ट मेंच (Test match)

यह क्रिकेट का सबसे पुराना प्रारूप हैं,यह प्रारूप शुरूआत में चार दिवस तक खेल जाता था,किन्तु वर्तमान में यह पाँच दिनों तक खेला जाता हैं.
इसमें एकदिन में 90 ओवर (एक ओवर में छ: गेंदे फेंकी जाती हैं).प्रत्येक टीम को आऊट होनें तक दो पारिया खेलनें का मोंका मिलता हैं.

2.एक दिवसीय मेंच (one day match)::

जैसाकि नाम से विदित हैं,यह एकदिन के लिये खेला जाता हैं,प्रारंभ में यह 40 ओवर तक होता था जिसमें प्रत्येक टीम को 40 - 40 ओवर खेलनें को मिलते थे,किन्तु वर्तमान में यह खेल 50 - 50 ओवरों का हो गया हैं.

3.ट्वटी - ट्वटी :::


क्रिकेट का यह सबसे नया संस्करण हैं,जो बीस - बीस ओवर का होता हैं,इसकी रोमांचकता नें क्रिकेट को नई बुलंदियों तक पँहुचाया हैं.

कुछ सामान्य प्रश्न ::


१. क्रिकेट की गेंद किस चीज की बनी होती हैं और इसका वज़न कितना होता हैं ?

उत्तर ::: अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट के लिये लेदर या कोकाबूरा की गेंद इस्तेमाल होती हैं.जिसका वज़न 155.9 ग्राम से 163 ग्राम के बीच होता है.

२.बल्ले का अनुपात क्या होता हैं ?

उत्तर::: बल्ला लम्बाई में 96.5 सेमी से अधिक लम्बा नही होना चाहियें.जबकि चोड़ाई में 10.8 सेमी से अधिक नही होना चाहियें.

३.पिच की लम्बाई चोड़ाई क्या होती हैं ?

 उत्तर ::: 20.12 मीटर या 22 गज लम्बाई तथा 2.52 मीटर चोड़ाई
आ सब पे

४. क्रिकेट में आऊट कितनी तरह से होते हैं ?

उत्तर ::: १.  रन आऊट़
            २. केच आऊट़
            ३. स्टम्प आऊट़ 
            ४.हिट विकेट आऊट़. 
            ५ . बोल्ड़
            ६. टाइम आऊट़

  

          


गुरुवार, 23 मार्च 2017

महिलाओं की आम समस्या यूटेराइन फाइब्राइड्स [UTERINE FIBROIDI]

परिचय ::
महिलाओं की समस्या
Uterine fibroid

यूटेराइन फाइब्राइड (uterine fibroid) महिलाओं में गर्भाशय की आंतरिक दीवारों पर बननें वाली नरम माँसपेशियों की गांठे हैं,जिनका आकार अंगूर की तरह होता हैं.इन गांठों की वज़ह से महिलाओं में तीव्र रक्तस्त्राव और पेडू में बहुत तेज दर्द की समस्या सामनें आती हैं.
3 में सें हर दो महिला अपनें जीवनकाल में इस समस्या से जूझती हैं.

लक्षण ::

• माहवारी के समय अत्यधिक रक्तस्त्राव जो आठ से दस दिन या इससे भी अधिक समय तक चलता हैं।

• कमर और पेडू में तीव्र दर्द

• पेट के निचलें भाग में भारीपन महसूस होना साथ ही उभार निकलना

• बार - बार पैशाब जानें की इच्छा होना तथा पैशाब करते समय दर्द होना

• शरीर में अकडन होना

• कब्ज होना

• गर्भधारण में समस्या

• अधिक रक्तस्त्राव से शरीर में खून की कमी

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ट्यूबरकुलोसिस के बारें में जानकारी



कद्दू के औषधीय उपयोग


बैंगन के औषधीय उपयोग

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कारण :::

• अधिक उम्र की अविवाहित महिलाओं में फाइब्राइड बननें का जोखिम उन महिलाओं से दोगुना होता हैं,जो विवाहित होती हैं,क्योंकि जब शरीर बच्चें के जन्म के लिये तैयार होता हैं,उस दौरान बच्चें का जन्म नही हो पाता तो गर्भाशय की एक विशेष जरूरत पनपती हैं

  इस ज़रूरत के अनुसार हार्मोंनल परिवर्तन होता हैं,यह हार्मोनल परिवर्तन गर्भाशय में गांठे बनानें के लियें उत्तरदायी होता हैं.
• फाइब्राइड उन महिलाओं में होनें का खतरा अधिक होता हैं,जिनका पारिवारिक इतिहास इस बीमारी का रहा हैं.

• अत्यधिक वज़न वाली महिला में यह बीमारी अधिक देखी जाती हैं.

जानियें polycystic ovarian syndrome के बारें में

• शराब और धूम्रपान करनें वाली महिलाओं में भी इसका जोखिम अधिक होता हैं.

• तनाव रहने पर यह बीमारी बहुत तेजी से विकसित होती हैं.

• शारीरिक रूप से असक्रिय होनें पर यह बीमारी अधिक होती हैं.

उपचार ::


इस बीमारी के उपचार में अब तक सर्जरी बहुत प्रभावी सिद्ध हुई हैं.जिनमें शामिल हैं,लेजर से फाइब्राइड हटाना

(मयोलाएसिस), लेप्रोस्कोपिक मयोमेक्त्तमी तकनीक द्वारा ऑपरेशन ,इंजेक्सन द्धारा गांठों की खून सप्लाई को रोकना जिससे कि फाइब्राइड सूख जातें हैं.इसके अतिरिक्त कुछ खान पान के तरीको द्धारा फाइब्राइड को शुरूआती अवस्था में नियत्रिंत किया जा सकता हैं.जैसे

सूखे मेवे ::


सूखे मेवों जैसें बादाम,अखरोट,पिस्ता आदि  सेवन करते रहनें से फाइब्राइड होनें की संभावना को कम किया जा सकता हैं.

क्योंकि इनमें ओमेगा 3 फेटीएसिड़ पर्याप्त मात्रा में पायें जातें हैं,जो गर्भाशय को मज़बूत करतें हैं.

भारतीय मसाले :::

भारतीय मसालें जैसे हल्दी, अदरक,काली मिर्च आदि में लीवर की सफाई करनें वाले तत्व प्रचुरता में पाये जातें हैं.

जो लीवर की सफाई कर एस्ट्रोजन हार्मोंन निकालनें में मदद करते हैं.जिससे हार्मोंन असंतुलित नही होता और फाइब्राइड बनने की संभावना समाप्त हो जाती हैं.

अंकुरित अनाज और सब्जीयाँ :::


अंकुरित अनाज विटामिन E और फायबर का बहुत अच्छा स्रोंत होता हैं,जो शरीर में बनने वाली किसी भी प्रकार की गांठों को रोकता हैं.

इसी प्रकार लहसुन की कच्ची कलियों का सेवन करनें से गांठे नही बनती हैं.

निम्बू का रस शहद के साथ मिलाकर पीनें से शरीर से अशुद्धी बाहर निकलकर हार्मोंन स्तर सही बना रहता हैं.

योगिक क्रियाएँ जैसें कपालभाँति, मत्स्याआसन,करनें से गर्भाशय की दीवार मज़बूत बनती हैं.

यदि बचपन से ही महिलाओं में शारीरिक कार्यों,व्यायाम की आदत डाली जावें तो बीमारी की संभावना को नगण्य किया जा सकता हैं.


लेप्रोस्कोपिक मयोमेक्टमी 


लेप्रोस्कोपिक मायमेक्टमी तकनीक द्वारा गर्भाशय की गांठें या फाइब्राइड निकालना आज कल बहुत लोकप्रिय होता जा रहा हैं इसके कई फायदे हैं जैसे

1 . शरीर पर मात्र 2 से 3 मिलीमीटर का चीरा लगाया जाता हैं, जिससे दर्द और रक्तस्राव बहुत कम होता हैं।

2.कम चीरा लगने से मरीज को अस्पताल में बहुत कम भर्ती रहना पड़ता हैं,और मरीज़ मात्र 24 घन्टे में घर चला जाता हैं 

3. सबसे बड़ा फायदा महिलाओं को मातृत्व सुख का हैं क्योंकि इस तकनीक द्वारा गर्भाशय सुरक्षित रहता हैं जबकि परम्परागत चीरे लगाने वाली तकनीक से ऑपरेशन करवाने के बाद रजोनिवृति के लक्षण प्रकट हो जाते हैं।

4. फाइब्राइड या गाँठो का आकार 20 सेंटीमीटर तक होंने पर भी यह तकनीक कारगर हैं।





# polycystic ovarian syndrome ::

PCOS का परिचय :::

pcos या polycystic ovarian syndrome महिलाओं से संबधित समस्या हैं,जिसमें हार्मोंन असंतुलन की वज़ह से pco में एक परिपक्व फॉलिकल बननें के स्थान पर बहुत से अपरिपक्व फॉलिकल्स बन जातें हैं.

सम्पूर्ण विश्व में इस बीमारी का ग्राफ तेज़ी से बड़ रहा हैं,विश्व स्वास्थ संगठन (W.H.O) के अनुसार 13 से 25 उम्र की हर 10 में से 2 स्त्रीयाँ pcos से पीड़ित होती हैं.

लक्षण :::



० अण्ड़ेदानी में कई गांठे बनना.

० बार - बार गर्भपात .

० बालों का झड़ना,बाल पतले होना.

० चेहरें पर पुरूषों के समान दाड़ी मुंछ आना.

० चेहरें पर मुहाँसे, तैलीय त्वचा

० आवाज का भारी होना.

० स्तनों [Breast]का आकार घट़ना.

० पेट के आसपास चर्बी का बढ़ना.

० माहवारी के समय कमर ,पेडू में तीव्र दर्द,मासिक चक्र का एक या दो दिन ही रहना.

०मधुमेह, उच्च रक्तचाप होना,ह्रदय रोग और तनाव होना.


urinary tract infection के बारे में जानियें


कारण :::



० आनुवांशिक रूप से स्थानांतरित होता हैं.

० अनियमित जीवनशैली जैसें कम शारीरिक श्रम,देर रात तक सोना सुबह देर तक उठना,फास्ट फूड़ ,जंक फूड़ का अत्यधिक प्रयोग.

० लेपटाप ,मोबाइल का अत्यधिक प्रयोग.

० मधुमेह का पारिवारिक इतिहास होना.


प्रबंधन :::


० खानें पीनें में अत्यन्त सावधानियाँ आवश्यक हैं,एेसा भोजन ले जिसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, ओमेगा 3 फेटीएसिड़, विटामिन ओर मिनरल भरपूर हो जैसें काजू,बादाम,अखरोट़,सोयाबीन उत्पाद,हरी सब्जियाँ ,दूध ,फल ,अंड़े आदि.


० डाँक्टर ऐसी दवाईयाँ देतें हैं,जो हार्मोंन संतुलित रखें,कोलेस्ट्रॉल कम करें,मासिक चक्र नियमित रखे,किन्तु यह दवाईयॉ लम्बें समय तक लेना पड़ सकती हैं,अत : आयुर्वैदिक दवाईयों का सेवन करें ये दवाईयाँ शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं छोड़ती हैं.


० व्यायाम और योग उतना ही ज़रूरी हैं,जितना दवाईयाँ अत : नियमित रूप से तेरना,दोड़ना,नृत्य करना आदि करतें रहें.


० कपालभाँति, भस्त्रिका, सूर्यासन,मत्स्यासन करतें रहें.
० जवारें का जूस लेना चाहियें.


० पानी का पर्याप्त सेवन करनें से हार्मोंन लेवल संतुलित रहता हैं.

० अपनें स्वभाव को सकारात्मक चिंतन से सरोबार रखें .


० शांत, प्रशन्नचित्त और हँसमुख बनें ,प्रतिदिन ध्यान को अपनें जीवन का अंग बना लें.

० नीम के औषधीय उपयोग


० गिलोय के फायदे


० तुलसी


० पलाश वृक्ष के औषधीय गुण


० हरसिंगार के औषधीय उपयोग



० सिंघाड़े के फायदे


मंगलवार, 21 मार्च 2017

अनियमित धड़कन यानि अरिदमिया (Arrhythmia) को बिना चिकित्सकीय जाँच के कैसे पहचाना जा सकता हैं


अरिदमिया(Arrhythmia) ह्रदय से जुड़ी समस्या हैं. हमारा ह्रदय औसतन रूप से एक मिनिट में 50 से 85 बार धड़कता हैं।

जब ह्रदय की  धड़कन heart  ki dhadkan इस स्तर से कम या ज्यादा होती हैं,तो व्यक्ति अरिदमिया से ग्रसित हो जाता हैं.जब ह्रदय की धड़कन 50 बीट्स प्रति मिनिट से कम होती हैं,तो यह अवस्था BradyArrhythmias कहलातीहैं. इसकेविपरीत  100 बीट्स प्रति मिनिट से अधिक होनें पर यह TachyArrhythmias कहलाती हैं.
सम्पूर्ण विश्व में ह्रदय से जुड़ी यह सबसे आम समस्या हैं,जो लगातार बढ़ती जा रही हैं.

० लक्षण ::


• धड़कनों का तेज या धीमा होना.

• ह्रदय की माँसपेशियों में खिंचाव या फड़फड़ाहट

• सिर में भारी या हल्कापन

• बेहोशी

• चक्कर

० कारण ::


इस बीमारी में धड़कनों को नियमित करनें वाले विधुतीय आवेग ठीक प्रकार से अपना काम नही करते हैं,ये समस्या निम्न कारणों से हो सकती हैं

• ह्रदय की धमनियों में कोलेस्ट्राल का जमाव होना जिससे धमनिया ब्लाक हो गई हो.

• उच्च रक्तचाप की समस्या होनें पर

• पेसमेकर लगा होनें पर

• मोबाइल रेडियेशन की वजह से

• हाइपर या हाइपोथाइराइडिज्म

• तनाव होनें पर

• शराब का अत्यधिक सेवन

• तम्बाकू का धूम्रपान,गुट़खा आदि किसी भी रूप में सेवन

• कार्ड़ियोमायोपेथी की समस्या होनें पर

• ह्रदय की बनावट में बदलाव होनें पर

• पूर्व में ह्रदय संबधित कोई आपरेशन होनें पर

• कुछ विशेष प्रकार की दवाईयों जैस गर्भनिरोधक सेली या इंजेक्सन के प्रयोग से

• अत्यधिक मोटापे की वजह से

० प्रबंधन ::


अरिदमिया की समस्या को जीवनशैली को नियमित कर काबू पाया जा सकता हैं जिसमें शामिल हैं :::-

१.योगाभ्यास जिसमें साँसो को नियंत्रित किया जाता हो.

२.ह्रदय को मज़बूत करनें वाले योग जैसे अनुलोम विलोम ,कपालभाँति किये जानें चाहियें.

३.ह्रदय को पोषण प्रदान करनें वाले आहार जैसे सूखे मेवे,दही,सलाद,ग्रीन टी,केला,अनार, आदि का सेवन करना चाहियें.

४. तेरना इस रोग में बहुत फायदा पहुँचाता हैं.परन्तु इसके लिये चिकित्सक की सलाह आवश्यक हैं.

५.अंकुरित अनाज दालो का सेवन करें.

  1. ० सावधानियाँ ::


• आरामदायक जीवनशैली की बजाय सक्रिय जीवनशैली रखे.

• धूम्रपान,तम्बाकू का सेवन नही करे.

• वसायुक्त पदार्थों,मैदायुक्त पदार्थों एँव जंक फूड़ से बचें.
• तनाव से बचें

• चालीस वर्ष की उम्र पश्चात नियमित रूप से ह्रदय की जाँच करायें.

० गिलोय के फायदे


० पलाश वृक्ष के औषधीय गुण



सोमवार, 20 मार्च 2017

राज्यपाल (Governor) लोकतंत्र के परिरक्षक या केन्द्र के एजेंट़

भारत की संविधानिक व्यवस्था केन्द्र में राष्ट्रपति की तरह राज्यों में भी राज्यपाल पद की व्यवस्था करती हैं.संविधान निर्माण के समय अनेक सदस्यों ने इस पद के सृजन से पूर्व गहन विचार किया था.

कुछ संविधान निर्माताओं ने इस पद को प्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति से भरनें का सुझाव दिया था,परन्तु मुख्यमंत्री और मंत्रीपरिषद के साथ होनें वाले संभावित टकराव को देखते हुये इस पद को अप्रत्यक्ष रीति से राष्ट्रपति द्धारा मनोनयन से भरने  का फैसला लिया गया .
आईयें जानतें हैं राज्यपाल के बारें में विस्तारपूर्वक कि यह पद पिछले वर्षों में लोकतांत्रिक व्यवस्था में कितना फिट़ बैठा हैं.


० नियुक्ति ::

• राज्यपाल की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 153 के अनुसार की जाती हैं,इस अनुच्छेद में कहा गया हैं,कि एक ही राज्य के लिये एक राज्यपाल होगा लेकिन एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों के लिये राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता हैं.
• राज्यपाल का कार्यकाल अपनी नियुक्ति तारीख़ से पाँच वर्ष तक होता हैं.
• अनुच्छेद 155 के अनुसार राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्धारा की जाती हैं,यह नियुक्ति राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर तथा पदमुद्रा के साथ करता हैं.
• राष्ट्रपति राज्यपाल का स्थानांतरण एक राज्य से दूसरे राज्य में कर सकता हैं.
• राज्यपाल अपनें पद पर राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त रह सकता हैं.

० राज्यपाल नियुक्त होनें के लिये योग्यताएँ :

• अनुच्छेद 157 के अनुसार राज्यपाल नियुक्ति होनें वाला व्यक्ति भारत का नागरिक हो तथा 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका होना चाहियें.
• संसद या राज्य विधानमंड़ल का सदस्य होनें पर शपथ ग्रहण वाली तिथि से सदस्यता समाप्त हो जावेगी.

भगवान श्री राम का चरित्र कैंसा था ? यहाँ जानियें

० शपथग्रहण ::

राज्यपाल का पद ग्रहण करने से पूर्व संबधित राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश समक्ष पद की शपथ लेना पड़ती हैं.
यदि उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश अनुपस्थिति हैं,तो उच्च न्यायालय के अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीश के समक्ष पद और गोपनीयता की शपथ ली जाती हैं.

० शक्तियाँ :::

राज्यपाल को भारत के राष्ट्रपति के समान अनेक शक्तियाँ प्राप्त हैं,जिनका प्रयोग वह मंत्रीपरिषद की सलाह और सहयोग से करता हैं.

० क्रिकेट अतीत से वर्तमान

० कार्यपालिक शक्ति ::

• अनुच्छेद 154 के अनुसार राज्य की कार्यपालिक शक्ति राज्यपाल में निहित हैं,जिसका प्रयोग वह अधीनस्थ अधिकारीयों के माध्यम से करता हैं.
• राज्यपाल विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता हैं.तथा मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रीयों की नियुक्ति करता हैं.
• राज्य के महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल ही करता हैं.
• राज्य के अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति राज्यपाल द्धारा की जाती हैं.उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के समय राष्ट्रपति राज्यपाल से परामर्श करता हैं.
• कार्य सुविधा के दृष्टिकोण से राज्यपाल राज्य के मंत्रीयों के बीच कार्यविभाजन के नियम बना सकता हैं.
• राज्यपाल राज्य प्रशासन तथा विधायन के प्रस्तावों के संबध में मुख्यमंत्री से सूचना प्राप्त कर सकता हैं.
• राज्य के विश्वविधालयों का कुलाधिपति राज्यपाल होता हैं,तथा कुलपतियों की नियुक्ति करता हैं.

० विधायी शक्तियाँ :::

• अनुच्छेद 174 के अनुसार राज्यपाल समय समय पर किसी भी सदन का अधिवेशन बुलायेगा,सत्रावसान करेगा तथा केवल विधानसभा का विघटन कर सकेगा.
• किसी विलम्बित विधेयक के संबध में राज्यपाल संदेश भेज सकता हैं.[अनु.175]
• अनु.176 के अनुसार वह विधानसभा या दोनों सदनों में संयुक्त रूप से सत्र के प्रारंभ में तथा नवनिर्वाचित विधानसभा के प्रथम सत्र में अभिभाषण करता हैं.
•  अनु.213 के अनुसार जब राज्य विधानमंड़ल का सत्र नही चल रहा हो तब राज्यपाल अध्यादेश प्रख्यापित कर सकता हैं,इस अध्यादेश का वही प्रभाव रहता हैं,जो राज्य विधानमंड़ल के नियम का रहता हैं,किन्तु इस अध्यादेश को छ: मास के भीतर राज्य विधानमंड़ल से अनुमोदित होना आवश्यक हैं,अन्यथा यह अपना प्रभाव समाप्त कर देगा.
• राज्यपाल विधानमंड़ल द्धारा पारित विधेयको पर चार प्रकार से अपनी प्रतिक्रिया प्रदान करता हैं :-
1.उस पर अपनी सहमति प्रदान करता हैं.
2.सहमति नही प्रदान करता हैं.
3.राष्ट्रपति के विचार हेतू आरक्षित करता हैं.
4.पुनर्विचार हेतू विधानमंड़ल के पास भेजता हैं.
• धन विधेयक राज्यपाल की पुर्वानुमति के पश्चात ही विधानसभा में प्रस्तुत होते हैं.अत: विधानमंड़ल द्धारा पारित होनें पर स्वीकृति देना अनिवार्य हैं.

० वित्तीय शक्तियाँ :::

• प्रत्येक वर्ष राज्य का वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) विधानसभा में वित्तमंत्री के माध्यम से राज्यपाल ही रखवाता हैं.
• अनुदान की मांग और धन विधेयक राज्यपाल की पूर्वानुमति से ही विधानसभा में प्रस्तुत किये जाते हैं.

० न्यायिक शक्ति ::

राज्यपाल को उस विषय संबधित जिस पर राज्य कार्यपालिक शक्ति का विस्तार हैं,किसी अपराधी के दण्ड़ को क्षमा,उसका प्रविलम्बन,विराम या परिहार करने की अथवा दण्डादेश के निलम्बन,परिहार या लघुकरण की शक्ति हैं.

० लोकतंत्र का परिरक्षक या केन्द्र का एजेंट 

राज्यपाल संविधान के परिरक्षण की शपथ लेता हैं,किन्तु राज्यपाल के कुछ स्वविवेकी कार्यों पर सदा सवाल उठते रहें हैं,तथा कुछ विपक्षी दल राज्यपाल को केन्द्र सरकार का एजेंट कहतें आये हैं,यह स्थिति तब पैदा होती हैं,जब केन्द्र और राज्यों में भिन्न - भिन्न दलों की सरकार हो.
राज्यपाल पर केन्द्र का ऐजेंट़ होनें का ठप्पा 1977 के बाद लगना शुरू हुआ जब केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार और राज्यों में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी यह क्रम आज के दोर में भी जारी हैं.
एक चर्चित विवाद बिहार सरकार और राज्यपाल रोमेश भंड़ारी के बीच का हैं,जिसमें राज्यपाल भंड़ारी ने अभिभाषण के दोरान अपनी पार्टी और केन्द्र की भाजपा सरकार के विरूद्ध आरोप पढ़नें से इंकार कर दिया था.
अभी हाल ही में अरूणाचल प्रदेश, उत्तराखंड़ में भी राज्यपाल द्धारा सुझाये गये राष्ट्रपति शासन को लेकर सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा और राज्य में पुन: पूर्व की सरकारों ने कामकाज संभाला.
गोवा,मणिपुर के विधानसभा सभा चुनावों में भी राज्यपाल की भूमिका विपक्षी दलों के निशानें पर रही जब राज्यपाल ने त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में सबसे बड़े दल की अनदेखी कर कम सीटो वाली पार्टी को सरकार बनानें का मोका दिया.
समय - समय पर सरकारीया आयोग और प्रशासनिक सुधार आयोग ने राज्यपाल पद को लेकर अनेक सुझाव दिये हैं,जैसें
1.राज्यपाल गैर राजनितिक होना चाहियें.

2.राज्यपाल की नियुक्ति के समय संबधित राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श लिया जाना चाहियें.

3.इस पद पर योग्य,अनुभवी व्यक्ति को नियुक्त किया जाना चाहियें.

4.केन्द्र में सरकार बदलनें के बाद त्यागपत्र देने या राज्यपाल बर्खास्त करनें की बजाय राज्यपाल को एक निश्चित कार्यकाल की गारंटी दी जावें.

वास्तव में वर्तमान व्यवस्था में राज्यपाल का पद सेवानिवृत राजनेताओं के लिये आरामगाह बन गया हैं,जो समय आनें पर अपनी पार्टी के प्रति निष्ठा प्रदर्शित करनें में कोई कसर नही छोड़ते हैं.अत: आवश्यकता इस बात की हैं,कि इस पद की गरिमा को बुद्धिजीवीयों और संविधान की मंशानुरूप बनाया जावें.जहाँ फैसले स्वविवेक के स्थान पर संविधानिक प्रावधानों से संचालित हो .

० भगवान श्री राम का प्रेरणाप्रद चरित्र


रविवार, 19 मार्च 2017

प्रदूषित होती नदिया(River) कही सभ्यताओं के अंत का संकेत तो नही


विश्व की तमाम सभ्यताएँ नदियों के किनारें पल्लवित हुई हैं,चाहे मेसोपोटोमिया हो या हड़प्पा यदि नदिया नही होती तो न ये सभ्यताएँ होती और ना ही प्रथ्वी पर जीवन,आज भी  नील,अमेजान,गंगा,यमुना ,   नर्मदा,कृष्णा,कावेरी,गोदावरी,ब्रम्हपुत्र,क्षिप्रा,प्रणहिता,बेनगंगा जैसी नदिया मानव सभ्यताओं को विकसित करनें में अपना अमूल्य योददान दे रही है.


भारत में नदियों की महत्ता ने इन नदियों को माता के समान पूजनीय बनाया हैं,और इनकी स्तुति कई प्रकार के श्लोकों के साथ की गई हैं.


कही गंगे हर के उद्घघोष के साथ तो कही नमामि देवी नर्मदें त्वदीय पाद पंकजम् के साथ यह बतानें का प्रयत्न किया गया हैं,कि नदियों का हमारें जीवन में माँ के समान महत्व हैं.

नदी
 प्रदूषित नदी

नदियों के किनारें लगनें वालें कुम्भ मेलों एँव इनके किनारें अवस्थित तीर्थों के माध्यम से भी यही कल्पना की गई हैं,कि व्यक्ति जीवन में कम से कम एक बार इन तीर्थों एँव मेलों में जाकर इन माँ समान नदियों का हालचाल जान लें कि क्या इनका जल वास्तव में आनें वाली पीढ़ी के जीवन की संभावना को बढ़ानें वाला हैं.

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होली पर्व स्वास्थ्य का पर्व

बाघ बचायें जंगल

० क्रिकेट अतीत से वर्तमान

० मधुमक्खी पालन एक लाभदायक व्यवसाय


० नीम के औषधीय उपयोग

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यदि हम नदियों के प्रदूषण की बात करें तो आंकड़े बहुत ही भयावह तस्वीर प्रस्तुत करतें हैं,यदि स्थिति यही रही तो कुछ शताब्दियों में मानव भी अन्य जंतुओं के समान इस प्रथ्वी से विलुप्त हो जायें तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी.


नदियों के प्रदूषित होनें का सबसे बड़ा कारण मानव मल मूत्र का इन नदियों में विसर्जन हैं,लगभग 80% नदिया इनमें मिलनें वाले सीवेज की वज़ह से गन्दे नालें में बदल गई हैं,और ये नदिया बहुत पूजनीय मानी गई हैं,इनमें शामिल हैं,गंगा,यमुना,क्षिप्रा,नर्मदा आदि.


केन्द्रीय प्रदूषण नियत्रंण बोर्ड़ के अनुसार भारत की लगभग सभी नदियों में घुलनशील आक्सीजन [DO] की मात्रा तय सीमा से काफी कम होती जा रही हैं,जैसे यमुना में यह 0 से 3 mg/litre तक तो गंगा में 0 से 15.5mg/L हैं.जबकि नियमानुसार इसका स्तर 20 mg/L होना आवश्यक हैं,तभी पानी मे जलीय जीव जन्तु जीवित रह सकतें हैं


Dissolved oxygen की कमी से पानी में बेक्टेरिया अधिक पनपते हैं और पानी गर्म हो जाता हैं.


घुलनशील आक्सीजन कम होनें का एक प्रमुख कारण औघोगिक अपशिष्ट,सीवेज और खेती में प्रयोग किये जानें वाले जहरीले रासायनिक पदार्थ हैं.


जल प्रबंधन के बारें में विस्तारपूर्वक जानियें




BOD (Biochemical oxygen demand) भी भारत की नदियों में काफी ख़तरनाक स्तर पर पँहुच गया हैं,इसका तय स्तर 3 mg/L माना गया हैं,जबकि यह भारत की सभी नदियों में 9 से 97 mg/L पाया गया हैं,



यह स्तर इन नदियों के जल को हाथ लगानें के भी खिलाफ हैं,यदि इस BOD स्तर वालें जल को खेती के कार्यों में उपयोग कर लिया जावें,तो जमीन बंजर होनें के साथ इससे पैदा होनें वाली फसलें खानें वाला व्यक्ति कैंसर, मस्तिष्क संबधित बीमारीयों,त्वचा संबधित बीमारियों,अस्थमा, से ग्रसित हो जाता हैं.


भारत में बहनें वाली प्रमुख नदियों जैसें गंगा,यमुना,खान,क्षिप्रा ,चम्बल के किनारें की औघोगिक ईकाईयाँ इतना जहरीला अपशिष्ट इन नदियों में में छोड़ रही हैं,कि इन नदियों का पानी पीनें वालें दुधारू पशुओं का दूध भी लेड़,आर्सेनिक,अमोनिया,जैसे ख़तरनाक तत्वों से संक्रमित पाया गया हैं.


एक अन्य महत्वपूर्ण स्तर टोट़ल कोलिफार्म की बात करें तो इसमें भी भारतीय नदिया ख़री नही उतरती इन नदियों में यह स्तर 500mpn/100 ml जल होना आवश्यक हैं,परन्तु यमुना,गंगा,कावेरी,चम्बल समेत तमाम नदियों में यह 5000 से 43000 mpn/100ml पाया गया हैं.इसी कोलिफार्म की वज़ह से जलजनित बीमारियाँ डायरिया,पेचिस,पीलीया,टायफाइड़ ,पेट़ संबधित बीमारीयाँ भारत में सर्वाधिक हैं.और सरकार प्रतिवर्ष करोड़ों रूपये इन बीमारीयों को नियत्रिंत करनें में ही खर्च कर देती हैं,जो धन के साथ के साथ मानव कार्यदिवसों का क्षरण करती हैं.



अमोनिया (NH3) मान्य स्तर नदियों के जल में 1.2mg/l होना चाहियें. इस मापदंड पर भारत की एक दो नदियों को छोड़कर कोई खरी नही उतरती जो नदिया इस मापदंड़ पर खरी उतरती हैं,इसका मूल कारण इन नदियों का बारहमासी बहाव नही होना और छोटे क्षेत्रफल पर बहना हैं.अन्यथा गंगा,यमुना,ब्रम्हपुत्र जैसी प्रमुख नदियों में यह स्तर 24.7mg/l तक हैं.



परिस्थितियाँ और आंकड़े गवाही खुद बयान कर रहें कि यदि अब नदियों को पुनर्जीवित नही किया गया तो हिरोशिमा नागाशाकी से भी बद्तर स्थिति में भारतीय सभ्यता पँहुच जायेगी,जिसका दोष सिर्फ और सिर्फ हमारा रहेगा.

० प्याज के औषधीय प्रयोग


० भगवान श्री राम का प्रेरणाप्रद चरित्र


० गिलोय के फायदे


० कद्दू के औषधीय उपयोग


० तुलसी


० तेल के फायदे

मंगलवार, 14 मार्च 2017

बीमार हो कोई बात नही होली मना लो ? [Holi festival]

• होली 

हमारें प्राचीन ऋषी  मुनि वैज्ञानिक थें,यह अतिश्योक्ति नहीं हैं,बल्कि अनेक ऐसे पर्व हैं,जो उनकी इन बातों का समर्थन करतें हैं.
होली Holi
रंग


इन प्राचीन रिषी मुनियों ने अनेक पर्व एँव त्योहारों के माध्यम से आमजनों को स्वस्थ एँव निरोगी रहनें का संदेश  दिया साथ ही इन पर्वों ,त्योहारों को धार्मिक जीवनशैली के साथ जोड़कर सदैंव अविस्मरणीय बनानें का प्रयत्न किया.


होली भी एक ऐसा त्योहार हैं,जो स्वास्थ और प्रशन्नता को समर्पित हैं,होली पर्व holi parv  फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा से चैत्र कृष्ण पंचमी तक मनाया जाता हैं,चैत्र कृष्ण पंचमी को रंगपंचमी rangpanchami  भी कहा जाता हैं.


भारतीय मोसमानुसार होली उस समय आती हैं,जब ठंड़ समाप्त होकर गर्मी शुरू होनें वाली होती हैं,यह संक्रामक मौसम हवा में पनपनें वाले हानिकारक  बेक्टेरिया और वायरस  को यकायक बढ़ानें वाला होता हैं,इस बात की पुष्टि scientist भी करतें हैं.
होलीका की परिक्रमा करते लोग
 बाबा महाकाल के आंगन की होली

होली के दिन पूर्णिमा होती हैं,इस दिन महिलायें,और पुरूष होली की पूजा holi ki puja कर इसे जलानें के बाद इसकी परिक्रमा करतें हैं,क्योंकि होलीका दहन holika dahan के समय होलीका के आसपास का तापमान 300 - 400 डिग्री सेंटीग्रेट तक पँहुच जाता हैं,यह उच्च तापमान सभी प्रकार के बेक्टेरीया ( Bacteria) को नष्ट कर देता हैं.जब हम होलीका के आसपास परिक्रमा करतें हैं,तो हमारें शरीर से लगे सभी ख़तरनाक बेक्टेरिया और वायरस नष्ट हो जातें हैं.

# बच्चों का स्वास्थ्य और होली :::


एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी हैं, की बच्चें चूंकि किसी भी प्रकार के संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित होतें हैं,अत:उन्हें भी इस पर्व से विशेष रूप से जोड़ा गया ताकि वे स्वस्थ रहें इसके लियें बच्चों को गोबर के विशेष खिलोंनें बनाकर उन्हें जलती होलीका में ड़ालनें हेतू प्रेरित किया गया ताकि उनके शरीर के घातक बेक्टेरिया भी आग के सम्पर्क में आकर नष्ट हो जावें.


# पशुओं का स्वास्थ्य और होली ::::



भारत पशु प्रधान अर्थव्यवस्था वाला देश हैं,अत: पशुओं के स्वास्थ को भी होली के माध्यम से उन्नत बनानें की व्यवस्था की गई इसके लिये किसान खड़ा  या साबुत नमक लेकर होली पर सेकते हैं.चूंकि होली के बाद गर्मी का मौसम शुरू हो जाता हैं.


अत: इस मौसम में अतिसार जैसी बीमारी पशुओं को कमज़ोर बनाकर पशुओं के शरीर में ख़निज और लवण की कमी कर देती हैं.


यह सिका नमक पूरी गर्मी पानी में डालकर पशुओं को पीलाया जाता हैं,ताकि भीषण गर्मी में भी पशुओं के शरीर में पानी की कमी नही हो,और पशु स्वस्थ रहकर खेतों में काम करता रहें.


• रंगों के माध्यम से स्वास्थ्य


होली के दूसरें दिन holi KE dusre din जिसे धूलेंड़ी कहतें हैं,सभी लोग सुबह होलीका के पास एकत्रित होकर एक दूसरें को रंग लगातें हैं,वास्तव में यह परंपरा होली का सुधरा रूप हैं,क्योंकि धूलेंड़ी का शाब्दिक अर्थ धूल + एड़ी होता हैं,अर्थात धूल को सिर से एड़ी तक लगाना.


जली हुई होलीका की ठंड़ी हुई राख या धूल को सिर से लगाकर एड़ी तक लगानें से चर्म रोग की संभावना लगभग समाप्त हो जाती हैं.


शरीर पर लगी इस राख को पलाश के फूलों से बनें रंगो से धोया जाता था,क्योंकि पलाश के रंगो में वह प्राकृतिक गुण होतें हैं,जो शरीर के रोम छिद्रों को खोलकर मन को प्रफुल्लित करतें हैं.और जब यह रंग  स्वंय नही ड़ालकर दूसरों द्धारा डाला जाता तो मनुष्य वैमनस्यता को भूलकर आपसी प्रेमऔर भाईचारें के सूत्र में बंध जातें.


होली के साथ एक परंपरा और जुड़ी हुई हैं,वह यह कि इस दिन जिस घर में पिछलें एक वर्ष में किसी की मृत्यु हुई हैंं,उस घर जाकर उनके परिवार के सदस्यों पर रंग लगाकर उन्हें उस गम को भूलकर पुन: प्रशन्नचित्त रहनें का संदेश दिया जाता हैं,ताकि वह परिवार पुन: संजीवनी लेकर समाज की प्रगति में योगदान दे सकें.

राधा और कृष्ण भी इस त्योहार के साथ जुड़कर समाज को प्रेम और भाईचारें का सन्देश देनें में कामयाब रहें यही कारण हैं,कि उनका नाम सदैव इस पर्व के साथ अमर हो गया.
राधा कृष्ण कन्हैया
राधा और कृष्ण

इस प्रकार स्पष्ट़ हैं,कि होली के  इस पाँच दिवसीय पर्व के पिछें की भावना मनुष्य को शारीरिक,मानसिक और सामाजिक रूप से स्वस्थ बनानें की हैं. 



० पलाश वृक्ष के औषधीय गुण


० जवान होता भारत बुढ़ाता जनस्वास्थ्य

बुधवार, 8 मार्च 2017

भारत का राष्ट्रपति [The president of india] ये लेख नही पढा तो फिर प्रतियोगिता परीक्षा में सफ़लता नही मिलेगी

दोस्तों,आज में आपको भारत के राष्ट्रपति के बारें में विस्तारपूर्वक बताना चाहूँगा कई लोग मुझसें पूछतें हैं,health blog में सामान्य जानकारीयों का क्या काम ? मैं उनसे यही कहना चाहता हूँ, कि स्वस्थ जीवनशैली के लिये न केवल शारीरिक स्वास्थ्य बल्कि मानसिक स्वास्थ्य भी ऐसा होना चाहियें जो अपने आसपास के परिवेश की समझ रखता हो,तभी एक बेहतर समाज के निर्माण की कल्पना को साकार किया जा सकता हैं.
दोस्तों आईंयें जानतें हैं,भारत के राष्ट्रपति के बारें में

ramanath kovind
 President of India



• राष्ट्रपति की नियुक्ति ::


भारत के राष्ट्रपति का पद ब्रिटेन के संविधान से प्रभावित हैं.इस व्यवस्था में वास्तविक कार्यपालिक शक्ति मंत्रीपरिषद में निहित होती हैं,जिसका प्रधान प्रधानमंत्री  होता हैं.

राष्ट्रपति इन शक्तियों का प्रयोग मंत्रीपरिषद (council of minister's) की सहायता से ही करता हैं.

भारतीय संविधान (Indian constitution) के अनुच्छेद (Article) 53 राष्ट्रपति के बारें में कहा गया हैं,कि संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित हैं.किन्तु अनुच्छेद 74 में राष्ट्रपति को अपनी इन शक्तियों का प्रयोग करनें हेतू मंत्रीपरिषद की सहायता लेना अनिवार्य किया गया हैं,साथ ही बाध्य भी किया गया हैं.

• कौंन भारत का राष्ट्रपति बन सकता हैं 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 58 राष्ट्रपति बननें के लिये कुछ योग्यताएँ निर्धारित करता हैं जो हैं :--
1.ऐसा भारतीय नागरिक जो 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हों.
2.वह लोकसभा का सदस्य बननें की योग्यता रखता हो.
3.वह राज्य या केन्द्र सरकार में किसी लाभ के पद पर आसीन नही हो.किन्तु यदि वह राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति,राज्यपाल,किसी संघ या राज्य का मंत्री हो तो अयोग्य नही माना जावेगा.

• राष्ट्रपति का निर्वाचन 

A.भारत के राष्ट्रपति का चुनाव ऐसे निर्वाचक मण्ड़ल द्धारा किया जाता हैं जिसमें संसद (लोकसभा और राज्यसभा) और राज्य की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य सम्मिलित हो ,उल्लेखनीय हैं,कि संसद, विधानसभाओं के मनोनीत सदस्यों तथा विधान परिषदों के निर्वाचित तथा मनोनीत दोंनों प्रकार के सदस्यों को मत देनें का अधिकार नही होता हैं.

B.राष्ट्रपति का निर्वाचन एकल संक्रमणीय (first past the post) मत पद्धति से किया जाता हैं,जिसमें मतदाता को चुनाव में खड़े उम्मीदवार के नाम के सामनें अपना वरीयता  क्रम जैसें 1,2,3 लिखना पड़ता हैं.

C.राष्ट्रपति के निर्वाचन हेतू ड़ाले गये मतो का अलग - अलग मूल्य निर्धारित रहता हैं,जैसें विधायक के एक मत का मूल्य निम्न होता हैं :::---
              
                 राज्य की कुल जनसंख्या
              ------------------------------------
            विधानसभा के कुल निर्वाचित सदस्य
                       
 संसद सदस्य के मत का मूल्य ::::

       राज्य विधानसभाओं की कुल मत संख्या
   -------------------------------------------------------
    संसद के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या


• मतों की गणना विधि

मतों की गिनती के समय सर्वपृथम पहली पसंद के उम्मीदवार के मतों की गिनती की जाती हैं,यदि पहली पसंद के उम्मीदवार ने कुल मतों का 50% से अधिक प्राप्त कर लिया हैं,तो उसे निर्वाचित घोषित कर गणना रोक दी जाती हैं.

भगवान श्री राम के प्रेरणाप्रद चरित्र के बारें में जानियें इस लिंक पर

० क्रिकेट अतीत से वर्तमान

यदि प्रथम दोर में किसी उम्मीदवार का स्पष्ट बहुमत नही मिलता तो सबसे कम मत पानें वाले प्रत्याशी को प्राप्त मतों की दूसरी पसंद देखी जाती हैं,और दूसरी वरीयता के मतों को अन्य उम्मीदवार में वितरीत कर दिया जाता हैं.
दूसरें दोंर में में भी बहुमत प्राप्त नही करनें पर तीसरें दोर की गणना की जाती हैं,जिसमें पुन: सबसे कम मत प्राप्त करनें वालें उम्मीदवार के मतों को अन्य उम्मीदवारों में वितरीत कर दिया जाता हैं,यह प्रक्रिया तब तक अपनाई जाती हैं,जब तक की किसी प्रत्याशी द्धारा बहुमत नही प्राप्त कर लिया जाता हैं.

• राष्ट्रपति का कार्यकाल 

• राष्ट्रपति अपनें पद पर पद ग्रहण से पाँच वर्षों की अवधि के लिये कार्य करता हैं.किन्तु वह इससे पूर्व भी उपराष्ट्रपति को अपना इस्तीफ़ा देकर पदमुक्त हो सकता हैं.
• महाभियोग प्रक्रिया द्धारा हटाया जा सकता हैं,यह महाभियोग संविधान के उल्लंखन हेतू चलाया जाता हैं. 


• महाभियोग की प्रक्रिया 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 61 राष्ट्रपति पर महाभियोग प्रक्रिया का वर्णन करता हैं.
जब राष्ट्रपति संविधान का अतिक्रमण करता हैं,तो संसद का कोई भी सदन महाभियोग प्रक्रिया शुरू कर सकता हैं.

किसी भी सदन के कम से कम एक चौथाई सदस्य अपनें हस्ताक्षर वाला सूचना पत्र राष्ट्रपति को भेजते हैं.इस सूचना पत्र पर 14 दिनों के बाद वही सदन विचार करता हैं.

यदि विचारोपरांत वही सदन अपने दो तिहाई बहुमत से संकल्प पारित कर दे तो महाभियोग का पहला चरण पूर्ण हो जाता हैं.

इस संकल्प को दूसरें सदन मे भेजा जाता हैं,जहाँ संकल्प में लगाये आरोपों की जाँच की जाती हैं,यह जाँच उस सदन द्धारा स्वंय की जाती हैं,या किसी न्यायालय को ऐसी जाँच करने को कहा जा सकता हैं.इस प्रकार की जांच में राष्ट्रपति स्वंय या अपनें वकील के माध्यम से अपना पक्ष रख सकता हैं.

यदि जांच उपरांत दूसरा सदन अपनी सदस्य संख्या के दो तिहाई बहुमत से संकल्प पारित कर देता हैं,तो राष्ट्रपति को संकल्प पारित करनें की तिथी से पद छोड़ना पड़ता हैं.

• राष्ट्रपति के विशेषाधिकार 

राष्ट्रपति को पद पर रहनें के दोरान अनेक विशेषाधिकार प्राप्त होतें हैं जैसें ::

1.अपनी शक्तियों के प्रयोग और अपनें कर्तव्यों के पालन के लिये किसी न्यायालय में उत्तरदायी नही होगा.
2.राष्ट्रपति पद पर आसीन किसी व्यक्ति के खिलाफ भारत के किसी भी न्यायालय में दांड़िक कार्यवाही नही की जा सकती और ना ही चालू रखी जा सकती हैं.


• भारत के राष्ट्रपति को प्राप्त शक्तियाँ 


                • कार्यपालिक शक्ति •


• आम चुनाव मे बहुमत प्राप्त दल के नेता को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त करता हैं.तथा प्रधानमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रीयों की नियुक्ति करता हैं.

• उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों,राज्यों के राज्यपालों,संघ क्षेत्रों के प्रशासकों,उपराज्यपालों,महान्यायवादी ,नियत्रंक तथा महालेखा परीक्षक,संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों को,विदेशों में राजदूतों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता हैं.

• अनेक आयोग जैसें पिछड़ा वर्ग आयोग,अनुसूचित जाति आयोग,जनजाति आयोग,महिला आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता हैं.

• 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम के अनुसार राष्ट्रपति अपनें कर्तव्यों की पालना मंत्रीपरिषद के सहयोग से ही कर सकता हैं,इस प्रकार 42 वां संविधान संशोधन अधिनियम राष्ट्रपति को इस हेतू बाध्य करता हैं.

                      • विधायी शक्ति •


• संसद द्धारा पारित कानून राष्ट्रपति की स्वीकृति से ही कानून बनता हैं.

• संसद के सत्रावसान की दशा में राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकता हैं.इस अध्यादेश की वही शक्ति और प्रभाव होता हैं,जो संसद द्धारा पारित कानूनों का होता हैं.

• प्रत्येक आम चुनाव तथा वर्ष के आरंभ में  राष्ट्रपति संसद के संयुक्त अधिवेशन में अभिभाषण देता हैं,जिसमें सरकार की नितियों की रूपरेखा प्रस्तुत की जाती हैं.

• राष्ट्रपति को यदि ये समाधान हो कि लोकसभा में आंग्ल इंड़ियन समुदाय का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नही हैं,तो वह इस समुदाय के दो सदस्यों का मनोनयन कर सकता हैं.

• राज्यसभा में कला,विग्यान,संस्कृति,खेल आदि क्षेत्रों से 12 सदस्यों का मनोनयन राष्ट्रपति द्धारा किया जाता हैं.

• संसद द्धारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के पश्चात ही कानून बनता हैं.

• कुछ विधेयक जैसें धन विधेयक,नये राज्यों का निर्माण,सीमाओं में परिवर्तन से संबधित विधेयक राष्ट्रपति की पूर्वानुमति के पश्चात ही संसद में प्रस्तुत कीये जा सकतें हैं.

                  • सैनिक शक्ति •


• भारत का राष्ट्रपति तीनों सेनाओं का सर्वोच्च कमांड़र होता हैं.उसे युद्ध की घोषणा और शांति स्थापित करनें का अधिकार प्राप्त होता हैं.

• राष्ट्रपति की यह शक्तियाँ मंत्रीपरिषद के अधीन हैं,जिनका प्रयोग राष्ट्रपति मंत्रीपरिषद की सलाह से ही करता हैं.

                 • कूटनितिक शक्ति •


राष्ट्रपति राष्ट्र का राष्ट्राध्यक्ष होता हैं,इस रूप में समस्त संधिया तथा अंतर्राष्टरीय समझोतें राष्ट्रपति के नाम से ही सम्पन्न होतें हैं.

               • न्यायिक शक्ति •


• राष्ट्रपति को संविधान के अनुच्छेद 72 के अन्तर्गत भारत के सभी न्यायालयों में दोषसिद्ध ठहरायें व्यक्ति के दण्ड़ को क्षमा,लघुकरण,प्रविलम्ब,विराम या परिहार करनें की शक्ति प्राप्त हैं.

• अनुच्छेद 143 राष्ट्रपति को यह अधिकार प्रदान करता हैं,कि विधि का कोई प्रश्न खड़ा होनें पर वह उच्चतम न्यायालय की राय मांग सकता हैं.किन्तु राष्ट्रपति ऐसी किसी राय को मांगनें के लिये बाध्य नही हैं.

              • आपातकालीन शक्ति •


• राष्ट्रपति अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत युद्ध,बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की अवस्था में राष्ट्रीय आपातकाल  की घोषणा कर सकता हैं.

• अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता में आपात स्थिति की घोषणा राष्ट्रपति करता हैं.

• राष्ट्रपति वित्तीय आपातकाल की घोषणा अनुच्छेद 360 के अन्तर्गत करता हैं.

• राष्ट्रपति की बदलती भूमिका


42 वें संविधान संशोधन द्धारा राष्ट्रपति को मंत्रीपरिषद की सलाह माननें हेतू बाध्य किया गया हैं.जबकि 44 वें संविधान संशोधन द्धारा राष्ट्रपति को आपातकाल लगानें के लियें मंत्रीपरिषद की लिखित सलाह लेनें के लिये बाध्य किया गया.

 इन संविधान संशोधन के अतिरिक्त कई ऐसे राष्ट्रपति हुये जिन्होंनें अपनें कार्यों से राष्ट्रपति पद की गरिमा को बढ़ाया ,ऐसे ही राष्ट्रपति हुये थे,डाँ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम जिन्हें जनता " पीपुल्स राष्ट्रपति" के रूप में याद करती हैं.इन्होंनें देश को विकसितत करनें हेतू "विजन - 2020" दिया.ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधायें उपलब्ध करवानें हेतू "प्यूरा" माडल की कल्पना की. इसके अलावा कलाम साहाब नें पंड़ित जवाहरलाल नेहरू की तरह बच्चों में भारत का भविष्य देखा और बच्चों को बड़ा सपना देखनें और उसे पूरा करनें हेतू कठिन परिश्रम करनें हेतू प्रेरित किया.

कलाम साहाब स्वंय सादगी और कठिन परिश्रम की प्रतिमूर्ति थें,जिन्होंनें राष्ट्रपति भवन में हर खा़सो - आम को प्रवेश दिया.



सोमवार, 6 मार्च 2017

गैर परपंरागत ऊर्जा भारत का भविष्य

विगत दिनों अनेक शोधों से यह स्पष्ट़ हुआ की प्रथ्वी पर पारंपरिक ऊर्जा स्रोत जैसे तेल,गैस,कोयला अत्यन्त सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं.और आनें वालें कुछ दशकों में ये समाप्त हो जायेगें.ऐसे में मनुष्य अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को कैसें बनाये रखे इस प्रश्न का उत्तर गैर - परंपरागत ऊर्जा स्रोतों पर आकर टीकता हैं.आईयें जानतें हैं,कि वे कौन से ऊर्जा स्रोत हैं,जो भविष्य में हमारी ताकत बन सकतें हैं.


• बायोगैस [Biogas] 


बयोगैस मुख्यत: पादप कचरें,मानव मलमूत्र,जानवरों के मलमूत्र का वायुरहित अवस्थाओं में जीवाणुओं द्धारा अपघट़न होनें से निर्मित होती हैं.यह गैस ज्वलनशील होती हैं.जिसमें 65% मिथेन पाई जाती हैं.


भारत पशु और मानव जनसँख्या के मामले में विश्व का अग्रणी राष्ट्र हैं.यदि मानव,पशु मलमूत्र और पादप कचरें का समुचित प्रबंधन कर इसका उपयोग बायोगैस बनानें में किया जावें तो न केवल भारत की ऊर्जा ज़रूरतों का समुचित निदान होगा बल्कि अरबों रूपयें की मुद्रा की भी बचत होगी,जो भारत तेल गैस आयात पर खर्च करता हैं.एक अनुमान के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष 13000 टन गोबर प्रतिवर्ष होता हैं.जिससे 1 अरब 43 करोड़ किलो केलोरी ऊर्जा आसानी से प्राप्त की जा सकती हैं.



इसके अलावा बायोगैस से महत्वपूर्ण अपशिष्ट भी बनता हैं,जो खेतों में खाद के रूप में प्रयोग किया जा सकता हैं,इस आर्गनिक खाद में यूरिया,पोटाश,फास्फोरस और जिंक जैसे महत्वपूर्ण तत्व विघमान होतें हैं,जो रासायनिक खादों से बंजर होती धरती को पुन: हरा - भरा करनें की क्षमता रखतें हैं.
बायोगैस बनानें के अन्य स्रोत पेड़ों के पत्तियाँ, पुआल,जलकुम्भी ,कुड़ा करकट आदि हैं.


इस प्रकार स्पष्ट हैं,कि बायोगैस स्वच्छ ऊर्जा का ऐसा स्रोत हैं,जो धुंआ रहित हैं.तथा इसके अपघट़न में आक्सीजन का उपयोग भी नही होता अत: इसके बनने पर वातावरण में आक्सीजन की कमी भी नही होती.

०भगवान श्री राम

० क्रिकेट अतीत से वर्तमान


पवन ऊर्जा [Wind energy] 


वेकल्पिक ऊर्जा स्त्रोंत
 पवन ऊर्जा

भारत में विश्व की सबसे बड़ी पर्वत श्रंखला हिमालय मोजूद हैं,इसके अलावा सतपड़ा,विघ्यांचल,अरावली,नीलगीरी पर्वत और विशाल सागरतट़  हैं,जहाँ अबाध रूप से पवन बहती रहती हैं,यहाँ पवन की गति भी 8 मीटर प्रति सेंकंड़ हैं,जो पवन से ऊर्जा उत्पादन की आदर्श दशा हैं.


पवन से ऊर्जा प्राप्त करनें का एक महत्वपूर्ण लाभ यह हैं,कि यह सस्ती,और कम जगह घेरकर  24 घंटे उत्पादन प्रदान कर सकती हैं.

• सौर ऊर्जा [SOLAR ENERGY]



सौर ऊर्जा पेनल
 solar photovoltaic panel


विश्व का ऐसा अनोखा राष्ट्र हैं,जहाँ  सूरज साल के 300 दिन चमकता हैं,इस चमकीलें सूर्य की रोशनी की बदोलत हम न केवल हमारी बल्कि विश्व के लगभग सभी राष्ट्रों की ऊर्जा ज़रूरतों को आसानी से पूरा कर सकतें हैं.



फोट़ोवोल्टिक सेलो के माध्यम से ऊर्जा बेटरीयों में संचय कर हम ऊर्जा एक जगह से दूसरी जगह आसानी से पहुँचा सकते हैं,सौर फोटोवोल्टिक सेलो की स्थापना के लिये भी हमारे यहाँ विशाल रेगिस्तान से सटा इलाका मोजूद हैं,जहाँ कृषि क्रियाकलाप नही होतें हैं.


• जल ऊर्जा 



आपनें पतित पावन गंगा की उद्गम की कहानी अवश्य सुनी होगी जिसमें गंगा को प्रथ्वी पर लाने के लिये उसके असीम वेग को शिवजी ने अपनी जटाओं में धारण कर उसे प्रथ्वी पर बहनें लायक बनाया ताकि वह प्रथ्वीवासियों का कल्याण कर सकें.वास्तव में यह बात पूर्ण सत्य हैं,शोधकर्ताओं के मुताबिक गंगा के जल में इतनी ऊर्जा विधमान हैं,कि यह सम्पूर्ण भारत की ऊर्जा ज़रूरत को पूरा कर सकें.



इसी प्रकार नर्मदा,झेलम,ब्रम्हपुत्र जैसी विशाल बारहमासी नदियाँ हैं,जिनका जल पहाड़ी क्षेत्रों में अत्यन्त तीव्र गति से बहता हैं,इस जल में अपार ऊर्जा संभावनाएँ विधमान हैं.इन वेगवती नदियों पर टरबाइन स्थापित कर ऊर्जा उत्पादन में आत्मनिर्भता हासिल कर सम्पूर्ण दक्षिण एशिया की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा किया जा सकता हैं.


इसी प्रकार ओर भी परंपरागत ऊर्जा स्रोंत जैसें भूतापीय,समुद्रीय लहरों से आदि हैं,जो परंपरागत ऊर्जा के मुकाबले बेहतर ,स्वच्छ और पर्यावरण मित्र हैं.



० जल प्रबंधन


शनिवार, 4 मार्च 2017

बाघ बचाये जंगल [The tiger save forest]

Indian Tiger
 बाघ (Tiger)
एक बच्चा मुझसे प्रश्न पूछता है.सर,क्या मैं अपनें "मन की बात" पूँछू ? मैनें कहा पूछों उसनें शुरू किया दुनिया के बड़े - बड़े देश,कई अन्तर्राष्ट्रीय संगठन जैसें विश्व पर्यावरण संगठन ,पेटा आदि बाघ को क्यों बचा रहें हैं ? मैनें कहा क्योंकि वह विलुप्त हो रहा हैं.उसनें फिर प्रश्न दागा तो उसको बचानें में हमारा क्या फायदा ? इतना सारा पैसा कही और लगातें तो शायद कई लोगो के लिये अच्छे घर ,भरपेट़ भोजन की व्यवस्था की जा सकती थी ? बाघ तो मजे से जंगल में रहकर शिकार करता हैं,और आराम करता हैं ?
मैनें बच्चें के बालमन को विस्तारपूर्वक उत्तर देने के लिये उसे अपनें पास बिठाया और फिर समझाना शुरू किया.

"जानतें हो जब 18 वीं शताब्दी में विश्व में लगभग 50,000 हजार बाघ थें.तब धरती के 50% भाग में घनें जंगल थें.और आज 21 वी सदी में जबकि विश्व में 1400 बाघ हैं,धरती पर मात्र 14% ही जंगल बचे हैं,जबकि पर्यावरण संतुलन के दृष्टिकोण से सम्पूर्ण धरती के 33% भाग पर जंगल होना चाहियें."


                     ● मधुमक्खी पालन एक लाभदायक व्यवसाय


बाघ (Tiger) मांसाहारी जन्तु हैं,जो अपनें पेट़ की आग शिकार करके ही बुझाता हैं,चाहे मांस किसी प्राणी का हो या फिर जन्तु का .ऐसी अवस्था में कोई भी प्राणी बाघ के आसपास भी फटकना पसंद नही करता फलस्वरूप बाघ के रहवास स्थल मानवीय हस्तक्षेप से दूर ही रहतें हैं.यँहा पैड़-पौधों को फलनें फूलनें का पर्याप्त अवसर मिलता हैं.ये घनें पेड़ हमें बहुत अधिक मात्रा में जीवनदायी आक्सीजन उपलब्ध कराकर प्रथ्वी पर जीवन सरल बनातें हैं.

घनें जंगल वर्षादायी बादलों को अपनी और खींचकर धरती पर बारिश करवाते हैं.जो मानव की मूलभूत आवश्यकता हैं,क्योंकि पानी बीना सब सून
यही पेड़ धरती को अपनी जड़ों से बांधकर रखते हैं,जिससे कि मिट्टी का कटाव नही होता और धरती बंजर होनें से बची रहती हैं.

बाघों की एक और विशेषता उन्हें पर्यावरण मित्र बनाती हैं और वह यह कि बाघ  झुंड़ की अपेक्षा अकेला रहना पसंद करतें हैं.ये अपना एक बड़ा क्षेत्र बनाकर उसमें घूमता रहता हैं.इस क्षेत्र में किसी दूसरें बाघ का हस्तक्षेप इन्हें स्वीकार नही होता ,एक बड़े क्षेत्र में एक बाघ,दूसरे बड़े क्षेत्र में दूसरा बाघ इसका मतलब एक विशाल घना जंगल जो पारिस्थिक संतुलन बनाकर प्रथ्वी को जीवन के अनूकूल बनाता हैं.

तो दोस्तों है ना बाघ (Tiger) पर्यावरण मित्र जानवर आपके विचार ज़रूर बताइएगा.




बुधवार, 1 मार्च 2017

आवाज से चिढ़ कही मीजोफोनिया तो नही [MEZOFONIA]

स्थिति क्रमांक १ :::

"चेतना अपनी इकलोती बेट़ी से बहुत प्यार करती हैं,और उसके स्कूल से लोट़ने पर उसे प्यारपूर्वक खाना खिलाती हैं.किन्तु पिछले एक महिनें से चेतना के व्यहवार में अजीब - सा परिवर्तन देखा जा रहा हैं,कि चेतना जब भी अपनी इकलोती बेट़ी को खाना खिलाती तो उसकी बेट़ी द्धारा खाना चबातें समय निकलनें वाली आवाज को सुनकर अपनी बेट़ी को जोर - जोर से चिल्लाकर डाँट़नें लगती कभी - कभी तो वह अपनी बेट़ी को जोर - जोर से थप्पड़ मारनें लगती चेतना के इस व्यहवार को देखकर उसकी सास बहुत परेशान हो गई और उसकी इस हरकत की शिकायत अपनें बेटे से कर दी,जब चेतना का पति उसे मनोचिकित्सक के पास ले गया तो पता लगा चेतना एक प्रकार की मानसिक बीमारी से ग्रसित हैं,जिसे मीजोफोनिया कहते हैं."

 परिचय :::


मीजोफोनिया एक मानसिक बीमारी हैं,जिससे प्रभावित व्यक्ति कुछ विशेष आवाजों के प्रति इतनें संवेदनशील हो जातें हैं,कि उन आवाजों के प्रति हिंसक व्यहवार से लेकर चिड़चिड़ापन प्रदर्शित करते हैं.इन आवाजों में शामिल हैं कम्प्यूटर प्रिंटर या की बोर्ड़ की आवाज़,दरवाजें खिड़की के बंद या खुलनें की आवाज ,खर्राटे लेनें की आवाज,होंठों से चपचप की आवाज, जूतों की आवाज, गला साफ करना,बर्तनों की आवाज आदि.

लक्षण :::


मीजोफोनिया से ग्रसित व्यक्ति जैसे ही व्यक्ति कुछ विशेष आवाज या ट्रिगर्स को सुनता हैं निम्न लक्षण उसमें उभरतें हैं.

१.चिड़चिड़ापन


२.हिंसा या मारपीट़ पर उतरना.


३.सामाजिक रूप से अपनें को अलग - थलग कर लेता हैं.


४.ट्रिगर्स को सुनकर चक्कर आना या बेहोश होना.


५.रोना


६.भयभीत रहना की कही से आवाज या ट्रिगर्स नही सुनाई दे जायें.

उपचार (Treatment) :::

१.इस बीमारी की पहचान होतें ही मनोचिकित्सक के पास रोगी की कांउसलिंग शुरू करवा देनी चाहियें .


२.योग ,ध्यान और मस्तिष्क की एकाग्रता से संबधित व्यायाम इसमें बहुत फायदेमंद होतें हैं.


३."ऊँ" का आधे घंटे नियमित उच्चारण करनें से बहुत फायदा मिलता हैं.


४.ब्राम्ही वटी सुबह शाम दो - दो शहद के साथ लेनें से मस्तिष्क शाँत रहता हैं.


५.यदि कही से ऐसी आवाज आ रही हैं,जिससे की चिड़चिड़ापन हो रहा हैं,तो उस आवाज को सुननें की अपेक्षा अपना ध्यान अन्य ऐसे कामों की ओर लगायें जो आपको बहुत पसंद हो.

● यह भी पढ़े


● विभिन्न जल स्त्रोतों से निकले जल के फायदे


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• पलाश वृक्ष के औषधीय गुण


• धनिया के फायदे


• आयुर्वेदिक औषधी सूचि

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