24 मई 2017

आश्रम व्यवस्था [Asharama system] :: एक विश्लेषण

आश्रम व्यवस्था
 गुरु और शिष्य 

आश्रम का अर्थ :::



भारतीय जीवन पद्धति मनुष्य जीवन को 100 वर्षों का मानती हैं.और 100 वर्षों के जीवन चक्र को शरीर की ,समाज की उपयोगिता आवश्यकता के दृष्टिकोण से चार भागों में विभाजित करती हैं.

आश्रम का अर्थ भी श्रम यानि उघम हैं,अर्थात मनुष्य श्रम करता हुआ जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करें.

आश्रम का एक अन्य अर्थ ठहराव या पड़ाव भी हैं.ये वे ठहराव स्थल हैं जहाँ मनुष्य कुछ समय रूककर अपनी आगामी जीवन यात्रा की तैयारी करता हैं.

महाभारत के अनुसार जीवन के चार आश्रम व्यक्तित्व और समाज के विकास की चार सीढ़ीयाँ हैं,जिन पर चढ़कर व्यक्ति परम ब्रम्ह को प्राप्त करता हैं.

भारतीय संस्कृति के जो चार कर्तव्य (धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष ) हैं,इन कर्तव्यों के द्धारा समाज,परिवार,और व्यक्तित्व का विकास भी आश्रम व्यवस्था द्धारा ही संभव हैं.जब एक आश्रम में व्यक्ति सफल जीवन जीता हैं,तो उसका दूसरा आश्रम भी सफ़ल हो जाता हैं.

मनुष्य जीवन को 100 वर्षों का मानकर चार आश्रमों में विभाजन किया हैं. आईए जानते हैं आश्रम और आश्रम व्यवस्था की प्रासंगिकता और आश्रमों के बारें में 



#1.ब्रम्हचर्य आश्रम [Brahmacharya]




उपनयन के पश्चात बालक ब्रम्हचर्य आश्रम में प्रवेश करता हैं.ब्रम्हचर्य आश्रम का काल उम्र के 25 वर्ष तक माना जाता हैं.इस उम्र तक व्यक्ति गुरू के सानिध्य में रहकर इन्द्रियों पर संयम रखना और ग्यान तथा कौशल प्राप्त करना सीखता था.यही ग्यान,कौशल और इन्द्रीय संयम उसके भावी जीवन का आधार था.

आधुनिक दृष्टिकोण से देखें तो यह आश्रम पूर्णत: वैग्यानिक दृष्टिकोण पर आधारित हैं,क्योंकि यही वह अवस्था होती हैं,जब मनुष्य में सीखनें की ललक,जोश और स्फूर्ति होती हैं ,यदि इस अवस्था में व्यक्ति के व्यक्तित्व को विकसित कर दिया जावें तो समाज को एक उत्तम नागरिक प्राप्त होकर देश समाज को आगे ले जा सकता है.

यह आश्रम सामाजिक स्तरीकरण या राजा रंक की सामाजिक व्यवस्था पर भी करारा प्रहार कर सभी को बराबर मान संघर्ष करनें की ओर प्रेरित करता था.क्योंकि जंगल में गुरू के सानिध्य में रहकर प्रत्येक बालक  कंद मूल फल एकत्रित कर ,भिक्षाटन कर अपनी और गुरू की उदरपूर्ति करता था.

इसी प्रकार अनुशासित जीवन जीना,दूसरों की बुराई न करना ,वेदाध्ययन करना ,ब्रम्हचर्य व्रत का पालन करना भी इस आश्रम के अनिवार्य अंग थे.

आधुनिक मतानुसार 24 - 25 वर्ष तक जो व्यक्ति ब्रम्हचर्य व्रत का पालन कर इन्द्रिय नियत्रंण प्राप्त कर लेता हैं,उसका मानसिक विकास बहुत तीव्र गति से होता हैं,ऐसे लोग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी रहकर भूमिका निभातें हैं.




# 2.गृहस्थाश्रम [Grihasthashram]





इस आश्रम का कालखंड़ मनुष्य जीवन के 25 - 50 वर्ष तक निर्धारित हैं.इस कालखंड़ में मनुष्य पत्नि बच्चों के साथ रहकर अपनी वह भूमिका निभानें की कोशिश करता हैं,जिससे समाज गतिमान रहें यानि बच्चों की उत्पत्ति और उनका लालन पालन .

इसके अलावा यही एकमात्र आश्रम हैं,जिस पर आश्रित होकर ब्रम्हचर्य,वानप्रस्थ और सन्यास अपने को चलायमान रखतें हैं.ब्रम्हचर्यी वानप्रस्थी और सन्यासी अपनी उदरपूर्ति ग्रहस्थाश्रम से ही पूरी करतें हैं.

ग्रहस्थाश्रम समाज और अर्थव्यवस्था को गतिमान रखनें वाला आश्रम हैं,क्योंकि यही वह आश्रम हैं,जिसमें व्यक्ति अर्थ कमाकर अर्थव्यवस्था को गतिमान बनाता हैं.

ग्रहस्थाश्रम में रहनें वालें व्यक्ति के कुछ कर्तव्य निर्धारित हैं जिनको करने की एक ग्रहस्थ से अपेक्षा की जाती हैं.ये कर्तव्य हैं,अतिथि की सेवा,ब्राहम्ण यानि समाज और देश को आगे ले जानें वालें की सेवा,माता - पिता की सेवा,तथा प्रत्येक जीव की उसकी आवश्यकतानुसार सेवा.

यदि ग्रहस्थ इन कर्तव्यों को पूरा करता हैं,तभी उसका जीवन सफ़ल माना जायेगा आधुनिक दृष्टिकोण भी एक ग्रहस्थाश्रम के व्यक्ति से यही अपेक्षा करता हैं,कि वह दुनियादारी के कर्तव्यों को सही तरीके से निभाये.

डाँ.कापड़िया  जो कि प्रमुख समाजशास्त्री हैं का भी यही मानना हैं,कि समस्त जीवधारीयों के प्रति दया भाव का दृष्टिकोण हिन्दू आचारशास्त्र की गहराई को प्रदर्शित करता हैं.और मानवीय धर्म को प्रतिष्ठित करता हैं.

# 3.वानप्रस्थ आश्रम [Vanprastha Asharama] :::





जब व्यक्ति के बाल पक गये हों,त्वचा पर झुर्रियाँ पड़ गई हो ,नाती पोतो वाला हो गया हों,तथा ग्रहस्थी के दायित्वों से मुक्त हो गया हो तब उसे वानप्रस्थी का जीवन अपना लेना चाहियें. हिन्दू शास्त्राकारों के मुताबिक यह अवस्था उम्र के 50 वें वर्ष से लगाकर 75 वें वर्ष तक मानी गई हैं.



इस उम्र वाला व्यक्ति पत्नि सहित या बिना पत्नि के वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करता हैं,पत्नि सहित प्रवेश करनें का मुख्य कारण यह रहा हैं,कि इतने दिनों तक ग्रहस्थाश्रम मे रहे व्यक्ति के लिये पत्नि बच्चों नाती पोतों को छोड़ना दुखदायी होता हैं.



वानप्रस्थी व्यक्ति का यह कर्तव्य हैं,कि भोग विलास पर धिरें - धिरें नियत्रंण कर अपनें को समाज हित हेतू उपयोगी बनायें ,बच्चें जो कि समाज और देश का भविष्य हैं,को शिक्षित कर उनमें उचित संस्कारों का बीजारोपण करें.




प्राचीन काल में वानप्रस्थी का घर गुरूकुल कहलाता था,जो कि जंगल में स्थित होता था.जहाँ वह बच्चों को रखकर शिक्षा देता था.




वानप्रस्थी को धिरें - धिरें रस, रूप,गंध की और आकर्षित होना छोड़कर कठोर संयम और त्याग का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहियें.उसे वेदाध्ययन कर उसका ग्यान आगामी पीढी़ तक पहुँचाना चाहियें.उसे अब अपने शरीर के प्रति भी कठोर रहना चाहियें ताकि शरीर स्वस्थ रहकर कार्य कर सकें.



वानप्रस्थ की वर्तमान युग में भी बहुत अधिक प्रासंगिकता हैं.और कई आर्थिक और पारिवारिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता हैं. व्यक्ति 50 की उम्र में कार्यों से सेवानिवृत्त हो जाता हैं,तो आगामी पीढ़ को रोज़गार का मोका मिलता हैं,फलस्वरूप बेरोजगारी नही पनपती.
पिता - पुत्र ,सास - बहू ,ससुर में सत्ता और  अधिकार को लेकर होनें वालें लड़ाई झगड़ों की संभावना समाप्त हो जाती हैं,जो राष्ट्र का समय और धन बर्बाद करतें हैं.



वानप्रस्थी का यह कर्तव्य हो जाता हैं,कि वह समाज का चरित्र निर्माण कर आगामी आश्रम के लिये अपने को तैयार करें.




# 4.संन्यास आश्रम [Sanyas Ashrama]




वनेषु च विहत्येवं तृतीयं भागमायुष|
चतुर्थामायुषों भापं त्यक्त्वासंगान परिव्रजेत ||
अर्थात आयु के तृतीय भाग में वनों में रहकर व्यक्ति चतुर्थ भाग में व्यक्ति परिव्राजक हो जायें और संसार के कल्याण के लिये कार्य करें.

संन्यास आश्रम उम्र के चौथे अर्थात 75 से 100 वर्ष के बीच माना गया हैं.

संन्यासी को चाहियें कि वह समस्त सांसारिक बंधनों को तोड़ते हुये मानव मात्र के प्रति समभाव रखें, और जीवन के रहस्यों और मोक्ष से संबधित तथ्यों के बारें में खोजकर समाज को बतायें.

सन्यासी का यह कर्तव्य हैं,कि वह जीवन और मृत्यु की परवाह किये बिना उन मार्गों की खोज कर आगामी पीढ़ी को बतायें जिससे समाज जीवन का वास्तविक उद्देश्य जान सकें.

कई लोग संन्यास का अर्थ संपूर्ण वैराग्य समझकर इधर उधर घूमना ही समझतें हैं,जो कि संन्यास का वास्तविक उद्देश्य कदापि नही हैं.

अनेक लोग आश्रम व्यवस्था की आलोचना इस रूप में करतें हैं,कि यह व्यक्ति को अकर्म की ओर प्रेरित करती हैं,किन्तु वास्तविकता में आश्रम व्यवस्था मनुष्य जीवन की नश्वरता से समाज को परिचित करवाकर प्रत्येक कार्य का समय निर्धारित कर उसे अपनें लक्ष्य को प्राप्त करवानें पर ज़ोर देती हैं. ताकि व्यक्ति निश्चित समय पर काम पूरें कर समाज को दिशा, शिक्षा और जीवन के गूढ़ रहस्यों की बात समझा सकें.


16 संस्कारों का परिचय







17 मई 2017

गर्मीयों में लू [Heat stroke] से बचाव के तरीके

गर्मी में सावधानियाँ
लू से बचाव
गर्मीयों की बात करतें ही कई लोगों को गांव के वो  दादी नानी के आंगन यादों में उतर आतें हैं,क्या जमाना था हैं ना पूरी गर्मीयों की छुट्टी वही बितती थी.साथ में पूरी की पूरी हमउम्र के बच्चों की  टीम हुआ करती थी,जिनमें मोसी के बच्चें, मामा के बच्चें, मामी के भाई के बच्चें और न जानें कितनें हमउम्र बच्चों का जमावड़ा नानी के ,दादी के आँगन में हुआ करता था.

आपको यह भी याद होगा जब आप सब बच्चें भरी दोपहरी में चुपके - चुपके  कच्ची केरी तोड़नें बागों में जाया करते थें,तो गर्म - गर्म हवा के थपेड़ों से कई बार बीमार भी पड़ें होंगें,तब दादी या नानी कहा करती थी,कि तुझे तो लू लगी हैं,चल उतार देती हूँ.


तब नानी केसें चुट़की में बिना किसी डाँक्टर के आपकी लू उतार कर फिर से भला चंगा कर देती थी,हैं,ना.


समय के साथ हमनें उन देशी तरीकों या दादी नानी के नुस्खों को विस्मृत कर दिया आईयें जानतें हैं,उन तरीकों के बारें में जो हमें लू से बचातें हैं.

 

परन्तु इससे पहलें लू के बारें में जान लेतें हैं.

# लू कैसें लगती हैं :::



मनुष्य के शरीर का तापमान 37° सेंण्टीग्रेट़ होता हैं.जब गर्मीयों में वातावरण का तापमान 47 - 48 तक पँहुच जाता हैं, और यदि हमारा शरीर लम्बें समय तक इस तापमान के सम्पर्क में रहता हैं,तो शरीर का तापमान भी वातावरण के तापमान के समान हो जाता हैं.


तब मस्तिष्क में स्थित हाइपोथैलेमस भाग शरीर को तापक्रम कम करनें का संकेत करता हैं.इसी क्रम में रक्त का प्रवाह तेज हो जाता हैं,और पसीनें की ग्रन्थियाँ शरीर से पसीना निकालकर शरीर का तापमान नियंत्रित करती हैं,किन्तु जब शरीर में पानी की कमी आ जाती हैं,तो यह प्रणाली फैल हो जाती हैं.और शरीर का तापमान अचानक बढ़नें लगता हैं,यह बढ़ा हुआ तापमान ही लू लगनें की निशानी हैं.


● ट्यूबरक्लोसिस


# लू लगनें पर लक्षण :::


# 01.शरीर से पसीना निकलना बंद हो जाता हैं.


# 02.त्वचा रूखी और खुश्क हो जाती हैं.


# 03.थकावट़ और कमजोरी महसूस होती हैं.


# 04.शरीर में पानी की कमी हो जानें पर उल्टी और दस्त लग जातें हैं.


# 05. सिरदर्द ,चक्कर आना शुरू हो जाता हैं, और नब्ज की गति  बढ़ जाती हैं.


# 06.आँखों के आगे अंधेरा छा जाता है.


# 07.नाक से नकसीर फूट़ना.


# 08.मतिभ्रम होना.


# 09.त्वचा तेज धूप की वज़ह से झुलसना.


# 10.शरीर में झट़के आना या शरीर अकड़ना.


# 11.लू की अत्यधिक घातक अवस्था में रोगी बेहोश हो जाता हैं.कभी - कभी मृत्यु तक भी हो जाती हैं.


# लू लगनें पर प्राथमिक उपचार :::


#_1. सबसे पहले रोगी के  शरीर का तापमान कम करनें का प्रयत्न करें,इसके लियें रोगी को लिट़ाकर उसके सिर,गर्दन दोनों हाथ की बांहों ,जांघों तथा तलुवों में बर्फ की मालिश करें.


यदि बर्फ उपलब्ध नही हैं,तो पानी की पट्टी रखें .इस विधि से रोगी के शरीर का तापमान तुरन्त ही कम हो जाता हैं.


#_2.यदि रोगी मुँह से आहार लेनें की क्षमता रखता हो,तो उसे तुरन्त जीवनरक्षक घोल [O.R.S.] शुरू कर दें.ठोस आहार एक दम से ना दें.

#_3.रोगी को हवादार कमरें में लिटायें.और हाथ पैरों की मालिश करतें रहें.


#_4.एक गीला कपड़ा लेकर रोगी के सिर से लेकर पैर तक उतारतें रहें.


#_5.यदि नकसीर चालू हो गई हैं,तो रोगी के सिर ठंडा पानी या बर्फ रखें,और सिर ऊपर की और रखकर करें,इस तरह खून का प्रवाह नाक की ओर कम करनें में मदद मिलेंगी.


#_6.रोगी यदि बेहोशी की अवस्था में हैं,तो उसे तुरंत चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध करायें.



# लू से बचाव के आसान तरीके ::



एक कहावत हैं,कि बचाव ही उपचार हैं,यदि हम इस कहावत को मानकर चलें और गर्मीयों में कुछ ज़रूरी कदम उठा लें,तो लू लगनें की संभावना खत्म हो जायेगी इसके लियें निम्न उपाय हैं.


#1.गर्मीयों में अधिक ठोस आहार लेनें की अपेक्षा तरल और ऊर्जा देंनें वालें आहार का सेवन प्राथमिकता से करें जैसें ग्लूकोज और फलों के रस.


# 2.छाछ का सेवन भोजन के बाद नियमित रूप से करें इसमें हल्का नमक,जीरा डालकर पीनें से शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बना रहता हैं.


# 3. दही का नियमित सेवन करनें से न केवल लू से बचाव होता हैं,वरन इसमें मोजूद लेक्टोबेसिलस दस्त रोकनें में मददगार होतें हैं,जो गर्मीयों में अक्सर पानी की कमी होनें से होनें वाली सामान्य बीमारी हैं.


# 4.गर्मीयों में शरीर का तापमान संतुलित करनें हेतू नियमित अंतराल पर कलाईयाँ,पेर और मुँह पानी से धोतें रहे.


# 5.कच्ची केरी का पना या झोलिया पीतें रहें,इसमें उपस्थित खनिज लवण जैसें मैग्नेशियम,फास्फोरस तथा ओमेगा 3 फेटीएसिड़ शरीर को लू से बचातें हैं.


# 6.यदि गर्मीयों में स्विमिंग पूल पर नहा रहें हो,तो पर्याप्त मात्रा में पानी पीकर ही पूल में उतरें.


# 7.जौ,चनें,बाजरा आदि से बना सत्तू शरीर को अत्यंत शीतल रखता हैं,इसके नियमित इस्तेमाल से शरीर का तापमान संतुलित रहता हैं.


# 8.दूध और पानी को समान मात्रा में मिश्री मिलाकर लेनें से पेशाब की जलन नही होती जो लू लगनें की सबसे आम समस्या हैं.


# 9.नारियल पानी में पोटेशियम पर्याप्त मात्रा में पाया जाता हैं,जो शरीर का ब्लड़ प्रेशर नियंत्रित रखता हैं.नारियल पानी में धनिया पावड़र मिलाकर पीनें से पेशाब की जलन तुरन्त ही समाप्त होती हैं.


# 10.तरबूज और खरबूजा पानी और खनिज लवणों का अति उत्तम स्रोत हैं,इसमें उपस्थित मेग्नेशियम शरीर को झट़को से बचाता हैं.साथ ही शरीर को ऊर्जा प्रदान करता हैं.


# 11.निम्बू में मोजूद विटामिन सी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर लू लगनें पर होनें वालें सिरदर्द और थकावट़ को ख़त्म करता हैं.


# 13.गर्मीयों में तेज लू और धूप से त्वचा झुलसनें का खतरा अधिक रहता हैं,इसके लियें मुलतानी मिट्टी में खीरा ककड़ी का पेस्ट मिलाकर पूरें शरीर पर लगा लें और दस मिनिट बाद नहा लें,खीरा ककड़ी और मुलतानी मिट्टी रोम छिद्रों को खोलकर उनका पोषण करती हैं,जिससे ये लू से ज्यादा प्रभावित नहीं होतें.


# 14.गर्मीयों में लू लगनें से आँखें भी लाल हो जाती हैं,जिसकी वज़ह से उनमें खुजली हो सकती हैं,इससे बचनें के लियें आँखों में गुलाब जल की दो - दो बूँद रात को सोतें समय ड़ालतें रहें.


# 15.गर्मीयों में शहद का सेवन तुरन्त ही थके शरीर को ऊर्जा प्रदान करता हैं,अत: शहद सेवन को प्राथमिकता दें.


● केला एक अनुपम फ़ल



# 16.मिस्री और सौंफ मिलाकर खानें से लू लगनें पर होनें वालें शरीर की दाह शांत होती हैं,अत: इसके सेवन करनें से धूप में शरीर दाह नही होता हैं.


# 17.भोजन में प्याज का नियमित प्रयोग कभी लू नहीं लगनें देता हैं,क्योंकि इसमें पाया जानें वाला एंटीआक्सीडेंट़ क्वरसिटिन शरीर के तापक्रम को 50° सेंण्टीग्रेट़ में भी सामान्य बनाये रखता हैं.


# 18.यदि गर्मीयों में बाहर जातें हो तो घर आनें के बाद ग्वारपाठा (एलोवेरा) का गुदा त्वचा और सिर पर लगानें से त्वचा की रंगत खिलती हैं,और सिर का तापमान नियंत्रित होता हैं.


# 19.गर्मी त्वचा के साथ - साथ तलुवों से भी शरीर में प्रवेश करती हैं,इसके लियें घर से निकलनें से पूर्व सेंड़ल या चप्पल के स्थान पर जूतें मोंजे पहनकर निकलना चाहियें.


# 20.शहतूत की प्रकृति शीतल होती हैं,जिससे यह गर्मीयों में ठंड़क देकर प्यास मिट़ाता हैं.


# 21.शोधकर्ताओं के अनुसार इमली में पाँलिफिनाल नामक तत्व पाया जाता हैं,जो गर्मीयों में पैदा होनें वालें बैक्टेरिया से लड़नें में मदद करता हैं.अत: इमली का सिमित मात्रा में सेवन लू लगनें से पैदा होनें त्वचा के संक्रमण या खुजली में आराम दिलाता हैं.


# 22.लीची में सूरज की गर्मी से त्वचा को बचानें की अद्भूत क्षमता होती हैं,अत: लीची का सेवन गर्मीयों में करना चाहियें.



#23.लू लगने के कारण यदि उल्टी हो रही हो तो शहद के साथ दो भूनी हुई इलायची खाना चाहिए ऐसा करने से उल्टी बंद हो जाती हैं ।



# 23. बैल फल का सेवन लू लगनें से होनें वाली पेट़ की समस्याओं का तुरन्त समाधान करता हैं.इसके लिये बैल फल का जूस गर्मीयों में सेवन करना चाहियें.


# 24.गर्मीयों में पुदीनें का किसी भी रूप में सेवन बहुत फायदे का सौदा हैं,यह थकावट़ दूर करता हैं,पेट़ की समस्याओं को दूर करता हैं तथा शरीर पर लू के प्रकोप को शांत करता हैं.


# 25.गर्मीयों में आंवलें का मुरब्बा पेट़ की गर्मी कम कर शीतलता प्रदान करता हैं.


# 26.गर्मीयों में सबसे बढ़कर कोई औषधि हैं,तो वो हैं मिट्टी के मट़के का पानी यदि इसमें भरे साफ स्वच्छ शीतल जल का भरपूर सेवन इन दिनों किया गया तो शरीर किसी भी प्रतिकूलता से निपट़ लेगा.

#27. 10 मिलीग्राम गिलोय के रस में थोडी सी शक्कर और थोडी सा नमक मिलाकर सुबह शाम लेने से लू नही लगती हैं ।


#28.अलसी तेल और शहद को मिलाकर घर से बाहर निकलनें पर लगाएँ ।


#29.तिल तेल और नारियल तेल को समान मात्रा में मिलाकर सिर में लगानें से लू के कारण नाक से खून नही आता हैं ।




० जल प्रबंधन


14 मई 2017

आम की खेती समस्याएँ और संभावनाँए [ mango crop ]

# 1.परिचय :::

आम की उन्नत प्रजाति
                            आम की उन्नत प्रजाति
आम को फलों का राजा कहा गया हैं.यह फल अत्यंत पोष्टिक और स्वाद में बेजोड़ होता है.जिसको कच्चे से लगाकर पकने तक बड़े चाव से भिन्न - भिन्न रूप में खाया जाता हैं.


भारतीय संस्कृति में आम इस कदर

रचा है कि हर सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रम में आम के पत्तों का उपयोग सजावट और पूजा में किया जाता है।

आम का वानस्पतिक नाम aam ka vansptik nam मैंगीफेरा इंडिका हैं.इसकी प्रजातियों में भिन्नता के कारण लगभग हर जलवायु और मिट्टी में इसकी खेती की जा सकती हैं.


# 2.आम की विभिन्न किस्में :::



आम की सेैंकड़ो किस्में प्रचलित हैं,जिसमें कुछ नियमित फल देनें वाली हैं,तो कुछ 2 साल में फल देती हैं.इनमें से कुछ के नाम इस प्रकार हैं.

# 3.नियमित फल देनें वाली :::


• आम्रपाली

• मल्लिका

• नीलम

• बैंगनपल्ली


# 4.एकान्तरिक फल देनें वाली :::



जो किस्में 1 वर्ष के अन्तराल में फल देती हैं,उन्हें एकान्तरिक किस्में कहतें हैं जैसें

• दशहरी

• रानीरमन्ना

• लंगड़ा

• चौंसा


• हापुस




# 5.आम का पौधा लगानें की विधि :::



आम के पौधें लगानें का सर्वोंत्तम समय जून - जुलाई रहता हैं,इसके लियें अप्रेल माह में 1.5 फीट़ चोड़ें और 1.5 फीट़ गहरे गड्डें 3 - 3 मीटर के अंतराल में खोद लें,एक माह तक इन गड्डों को खुला छोड़ दें तत्पश्चात जुलाई माह में पौधारोपण करतें समय गोबर खाद आधी मात्रा में मिट्टी के साथ मिलाकर पौधे के आसपास भर दें.ध्यान रखें


• पोलिथीन की थैली यदि पौधे के साथ हैं,तो उसे सावधानीपूर्वक काट़ कर अलग कर दें,तत्पश्चात गड्डें के बीचों बीच पौधा रख उसके आसपास मिट्टी गिरा दें.


• ध्यान रहें पौधे की सिंचाई शाम के वक्त ही करें.


• नये पौधे को बांस की टहनी से बांधकर सहारा दें.


• पौधे के आसपास की घास हटाकर मिट्टी की सतह हल्की हल्की गेंती से खोद दें.


• पौधे की एक से दो वर्ष तक हल्की छँटाई करतें रहें.



• यदि मिट्टी में दीमक की समस्या हो तो पौधे के आसपास 10 सेमी के छेद करके उसमें क्लोरोपायरीफास दवा 50 मिली प्रति 15 लीटर की दर से प्रति पौधा 250 ml छेद में भरकर छेद मिट्टी से बंद कर दें.

# 7.आम की प्रमुख समस्या एकान्तरिक फलन :::



भारत में आम की फसल प्रति दूसरें वर्ष आनें से किसान भाईयों को काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा हैं,इस विषय पर शोधपरांत स्पष्ट हुआ कि जिन पौधों में जिब्रेलिन जैसें उत्तेजक पदार्थों की मात्रा अधिक पाई गई उनमें पेड़ की वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती हैं फलस्वरूप फलन नही हो पाता  इसके लिये शोधकर्ताओं ने किसानों को कल्टार विधि की अनुशंसा की हैं.



# 8.कल्टार विधि :::



कल्टार 25% पेक्लोब्यूट्राझोल मुख्य तत्व वाला वृद्धि निरोधक हार्मोंन हैं,जो कि वर्ष में एक बार या दो वर्ष में उपयोग करने की अनुशंसा की जाती हैं.



इसके लियें पेड़ की प्रति एक वर्ष उम्र पर एक मिली पेक्लोब्यूट्राझाल आधा लीटर पानी में मिलाकर  10 सेमी के पतलें सरियों से निर्मित गड्डों में भर देतें हैं.इन गड्डों को मिट्टी से भरकर सिंचाई कर दी जाती हैं,ताकि दवा का शोषण जड़ों द्धारा कर लिया जावें.



कुल्टार विधि के प्रयोग का सही समय अक्टूबर नवम्बर के मध्य होता हैं.कुल्तार विधि का प्रयोग प्रत्येक वर्ष या पेड़ पर फलन की दशा देखकर किया जाना चाहियें.



# 9.आम के प्रमुख कीट़ व बीमारियाँ :::



# एन्थ्रोक्नोज :::



यह बीमारी फंफूद (कोलेटोट्राइकम) से पैदा होती हैं,जो फल तोड़ने के बाद  जब नये प्ररोह विकसित होतें हैं,तब होती हैं,इसके प्रभाव से नये प्ररोह नष्ट हो जातें हैं.

# उपचार


इस बीमारी से बचाव हेतू नीम तेल 100 ग्राम प्रति लीट़र पानी में मिलाकर नये प्ररोह बनते समय छिड़काव करना चाहियें, तत्पश्चात पन्द्रह बीस दिनों के अन्तराल पर पुन: इस घोल का छिड़काव करना चाहियें.
जब फल मक्का के दानें बराबर होतें हैं,तब भी इस घोल का छिड़काव करना चाहियें.

# आम का भुनगा :::



जब आम पर फूल आये हो तब इस बीमारी का प्रकोप आम पर होता हैं,इस बीमारी से बचाव हेतू जैविक कीट़नाशक का प्रयोग 100 ग्राम प्रति दस लीट़र पानी में मिलाकर करना चाहियें.

# बैक्टेरियल केंकर



यह रोग एक प्रकार के बैक्टेरिया जेन्थोमोनास मैंजिफेरी से होता हैं.

इसमें पत्तियों पर छोट़े अनियमित तथा कोणीय जलयुक्त घाव बनतें हैं.तथा पत्तीयाँ पीली होकर गिरनें लगती हैं.


# उपचार 



इस बीमारी से बचाव हेंतू काँपर फँफूदनाशक का प्रयोग नियमित अंतराल पर करना चाहियें, तथा आम की नियमित साफ सफाई करना चाहियें.



# पत्ती धब्बा रोग (अल्टनेर्या)




यह रोग भी फंफूद के कारण होता हैं,इसमें पत्तियाँ पर गोलाकार धब्बें बनतें हैं जो कि बाद में पूरी पत्ती पर फैल जातें हैं.बाद में यह पत्तियाँ असमय गिर जाती हैं.



#उपचार



रोगग्रस्त भाग को काटकर इकठ्ठा करलें और जला दें,रोग से बचाव हेतू काँपर फफंदनाश का छिड़काव करें.


# सफेद रतुआ या Powdering mildue


यह रोग भी फफूंद के कारण होता हैं,इस रोग में आम की पत्तियाँ, फूलों,फल और डंठलों पर सफेद पावड़र सा पदार्थ जम जाता हैं.

इस रोग से ग्रसित फल,फूल गिर जातें हैं.और पत्तियाँ बैंगनी - गुलाबी रंग की हो जाती हैं.

# उपचार


रोगी पौधें पर 5 किलों प्रति पौधे की दर से सल्फर पावड़र का छिड़काव करें.

फूल आनें पर कार्बेंडाजिम 0.1% या नीम तेल 500 मिली प्रति 5 लीटर पानी या ट्रायेडमार्फ 0.1% का छिड़काव करें.

# कुरचना रोग



यह रोग ग्राफ्टिंग वालें पौधों में होनें की संभावना अधिक होती हैं.इस रोग से संक्रमित पौधा अधिक शाखाएँ उत्पन्न करता हैं,फलस्वरूप पौधें की सीमित वृद्धि होती हैं.

# उपचार


इस रोग का प्रामाणिक उपचार अभी तक अनुपलब्ध हैं.यदि ग्राफ्टिंग के समय उत्तम किस्म के पौधें का चयन किया जायें तो रोग होनें की संभावना समाप्त की जा सकती हैं.

पौधे के संक्रमित भाग को काटकर जला देंना चाहियें.

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एकीकृत पोषक तत्व प्रबन्धन क्या हैं जानियें इस लिंक पर

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# 10.आम की सघन बागवानी :::



आम की सघन बागवानी से किसान अधिक उपज के साथ मुनाफा भी दुगना तिगुना कर सकतें हैं,इस विधि में एक हजार से डे़ढ़ हजार पौधे प्रति हेक्टेयर की दर से रोपे जातें हैं.सघन बागवानी से पेड़ की अनियत्रिंत वृद्धि पर भी विराम लगता हैं,और नियमित फलन प्राप्त होता हैं.

# 11.आम की छंटाई :::



सघन बागवानी में पेड़ की शाखाँए एक दूसरें से न उलझे और पेड़ बेहतर फल देता रहें,इस उद्देश्य से पेड़ की कमज़ोर टहनीयों और शाखाओं को काट देना चाहियें. इससे पेड़ों के बीच अन्तरवर्तीय फसलें जैसें हल्दी, अदरक ,प्याज,आलू आदि भी ली जा सकती हैं.

# 12.सिंचाई :::



नये पौधों के लिये टपक सिंचाई पद्धति सर्वोत्तम होती हैं,यदि यह पद्धति उपलब्ध नही हो तो गर्मीयों में प्रति सप्ताह और सर्दियों में पन्द्रह से बीस दिनों के अन्तराल पर पारपंरिक विधि से  सिंचाई करते रहना चाहियें.


# 13.संभावनाँए :::


भारत विश्व का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश हैं,भारत में उत्पादित आम गुणवत्ता,स्वाद और पौष्टिकता के मामलें में बेजोड़ होता हैं,यही कारण हैं,कि भारत में उत्पादित आमों की मांग लगातार अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में बनी हुई हैं.
भारत में वर्तमान में फलों के अन्तर्गत आनें वाले कुल क्षेत्रफल के 36% भाग पर आम की खेती की जाती हैं,इसमें भी उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश प्रमुख उत्पादक राज्य हैं.


म.प्र.में  नर्मदा, चम्बल, शिप्रा,बेतवा,आदि नदियों के किनारें वाला क्षेत्र अाम उत्पादन के दृष्टिकोण से असीम संभावनाओं वाले क्षेत्र हैं.इसके अलावा जो किसान आम की बागवानी करना चाहतें हैं,उनके लिये निम्न सुझाव हैं.



• किसान यदि बेहतर उपज और दाम देनें वाली किस्मों का चयन कर आम की खेती करें,तो कुछ ही सालों में भारी मुनाफा कमा सकता हैं.


• यदि आम की उपज के साथ इसके पोधें तैयार कर नर्सरी बना ली जायें तो पौधें की बिकवाली से भी लाभ कमाया जा सकता हैं.


• आम के बाग से निकलनें वालें पत्तों से कम्पोस्ट और वर्मी कम्पोस्ट़ बनाकर भी किसान आर्थिक लाभ हासिल कर सकतें हैं.इसके अलावा आम के बाग में मधुमक्खी पालन करनें से आम का फलन भी अच्छा होता हैं,और अतिरिक्त आमदानी भी मिलती हैं.


आम के इन फायदों से परिचित होनें के कारण ही शायद हमारें पूर्वजों ने कहा हैं "आम तो आम गुठलियों के भी दाम "



० कद्दू के औषधीय उपयोग



5 मई 2017

जैविक खेती क्या हैं क्या खेती बिना किसानों की आय दोगुनी नही होगी [organic farming]

Satish Vyas - Organic Farming, Organic, What Is Organic Food

# 1.जैविक खेती क्या हैं jevik kheti kya hair:::


जैविक खेती jevik kheti  कृषि  करनें की पद्धति हैं.इस पद्धति में रासायनिक उर्वरकों,कीट़नाशकों के स्थान पर जैविक अवशेषों जैसें गोबर की खाद,केंचुआ खाद,हरी खाद ,फसल अवशेषों से बनी खाद तथा जैविक कीट़नाशकों का उपयोग कर फसल पैदा की जाती हैं.


जैविक खेती jevik kheti भारत की वैदिक कृषि पद्धति हैं,जिसके दम पर भारतीय लोग 100 वर्षों तक जीवित रहतें थें. और उत्पादन भी अधिक होकर स्वास्थ्यप्रद होता था.किन्तु कालांतर में कम मेहनत व अधिक उत्पादन के चक्कर में फँसकर किसान रासायनिक खेती rasaynik kheti की ओर अग्रसर होता गया परिणामस्वरूप ज़मीन बंजर होती गयी,उत्पादन घट़ता गया तथा  स्वास्थ्य और उम्र भी धट़ती गई.
जैविक खेती
 जैविक फसल

स्वास्थ्य और मनुष्य की औसत उम्र कम होनें के मूल कारणों में रासायनिक खेती rasaynik kheti ही हैं,क्योंकि रासायनिक कीट़नाशकों और उर्वरकों के लगातार इस्तेमाल से धरती में मोजूद सूक्ष्म पौषक तत्वों जैसें लोहा,जस्ता,मैगनीज,बोरान,मालीब्डेनम और क्लोरिन मिट्टी से नष्ट हो रहे हैं,और इन नष्ट हुयें सूक्ष्म पौषक तत्वों की मिट्टी में पैदा हुआ अनाज और फल मनुष्य खा रहा हैं.

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यह अनाज और फल  मात्र यूरिया,डी.ए.पी.और वृद्धि कारक रासायनिक दवाईयों के दम पर ही पैदा हो रहे हैं.जिनमें सूक्ष्म पोषक तत्वों का नितांत अभाव होता हैं,जबकि जैविक खाद में  पौषक तत्वों नाइट्रोजन,फाँस्फोरस,पोटेशियम के अतिरिक्त सभी सूक्ष्म पौषक तत्व मोजूद रहते हैं.


रासायनिक उर्वरकों,rasaynik urvrko कीट़नाशकों और वृद्धि नियंत्रकों के फसलों पर अत्यधिक प्रयोग नें मृदा स्वास्थ्य को भी गंभीरतम रूप से प्रभावित करना शुरू कर दिया हैं,जिससे मिट्टी की पारपंरिक संरचना बदलकर चिकनी,कठोर और चिपचिपी हो गई हैं.



इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण पारपंरिक बेलचलित हल के स्थान पर ट्रेक्टरचलित हल का प्रयोग हैं.किसानों पर कियें गये एक सर्वेक्षण यह बात पता चली कि रासायनिक खेती करने वालें जो किसान बैलचलित हल का उपयोग करते थे,वे अब इसके स्थान पर ट्रेक्टरचलित प्लाऊ को महत्व देनें लगें हैं,क्योंकि बैलचलित प्लाऊ से मिट्टी पलट़ना बहुत मुश्किल हो गया हैं,जबकि जैविक खेती करनें वालें किसान अब भी बैलचलित हल से खेत की जुताई कर रहें हैं.

एक अन्य सर्वेक्षण में एक ओर जानकारी मिली कि जिन किसानों को रासायनिक खेती करतें - करतें लम्बा वक्त हो गया हैं और जो लम्बें समय से  खेती में ट्रेक्टर का प्रयोग कर रहें हैं उन्हें अपनें खेतों की जुताई हेतू अधिक हार्स पावर के ट्रेक्टर की आवश्यकता महसूस हो रही हैं क्योंकि पुराना ट्रेक्टर खेतों की जुताई हेतू कम शक्तिशाली साबित हो रहा हैं जबकि इन्ही किसानों का यह कहना हैं कि दस साल पहले तक खेतों की जुताई हेतू यही ट्रेक्टर पर्याप्त था.

विशेषज्ञों के मुताबिक फसल में डालें गये यूरिया का मात्र 30% ही पौधे द्धारा अवशोषित होता हैं,बाकि का 70% यूरिया  मिट्टी में जमा रह जाता हैं,जो बाद में वर्षा द्धारा नदीयों और जलस्त्रोंतों में पहुँचकर मनुष्य और दूसरें जीव जंतुओं के स्वास्थ को गंभीरतम रूप में प्रभावित कर रहा हैं. 

#2. जैविक खेती से होनें वालें लाभ ::


#1. जैविक खेती से मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ती हैं.फलस्वरूप अधिक जल में पैदा होनें वाली फसल जैसें गन्ना,चावल,केला,प्याज आदि में कम जल की आवश्यकता पड़ती हैं.

#2.मिट्टी की गुणवत्ता सुधरती हैं,जिससे उर्वराशक्ति बढ़ती हैं.

#3.जैविक खेती करनें से किसान की उत्पादन लागत घट़ती हैं,फलस्वरूप किसानों की आय दोगुनी हो जाती हैं.

#4.जैविक खेती से पर्यावरण और जल प्रदूषित नही होता क्योंकि रासायनिक कीट़नाशक वर्षाजल के साथ बहकर जल स्त्रोंतों को दूषित नही करतें.

#5.जैविक खेती से उच्च पौषकता वाली ,हानिरहित फसल प्राप्त होती हैं,जिससे मानव स्वास्थ्य उत्तम होकर गंभीर बीमारीयों जैसें कैंसर,त्वचा रोग आदि की संभावना कम होंती हैं.
#6.भारत अपनें रासायनिक उर्वरकों और पेट्रोलियम उत्पादों की आवश्यकता का तीन तिहाई आयात द्धारा पूरा करता हैं.

 जैविक खेती से विदेशी उर्वरकों जैसें डी.ए.पी.,एन.पी.के.,पर निर्भरता कम होगी , जिससे बहुमूल्य मुद्रा विदेशियों के हाथ जानें से बची रहेगी व राष्ट्र आर्थिक गुलामी के दौर से बाहर निकल जायेगा.इसी प्रकार पेट्रोलियम उत्पादों के खेती में कम प्रयोग से गोवंश का संरक्षण होकर पर्याप्त मात्रा में जैविक खाद की प्राप्ति होगी.

#7.जैविक खेती से प्राप्त फसल की अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में बहुत अधिक मांग हैं,यदि जैविक फसल उत्पादों को निर्यात करतें हैं,तो काफी अधिक दाम मिलेंगें जिससे किसानों की आय दुगुनी तिगुनी हो जायेगी.
#8.जैविक खेती से यहाँ वहाँ पड़े रहनें वालें कूड़े करकट़ के ढ़ेरों से मुक्ति मिलकर स्वच्छता आती हैं,क्योंकि इनका समुचित रूप से प्रबंधन कर जैविक खाद बनानें मे उपयोग होता हैं.

#9.जैविक खाद एँव कीट़नाशकों के प्रयोग से मृदा में लाभदायक जीवाणुओं की सक्रियता बढ़ जाती हैं.

#10.रासायनिक कीटनाशकों के फसलों पर छिड़काव से समस्त प्रकार के कीटनाशक समाप्त हो जातें हैं,जबकि वास्तविकता में बेहतर फसल उत्पादन के लियें तितली,भँवरों और अन्य कीटों द्धारा फसल का परागण आवश्यक होता हैं.

जैविक कीटनाशकों के प्रयोग से फसल के हानिकारक कीट  नियत्रिंत होतें हैं समाप्त नही, फसल के यह हानिकारक कीट पा्रकृतिक संतुलन के लिये बहुत आवश्यक होतें हैं. ़

# 3.जैविक खेती के लिये उपयोगी खाद :::


# कम्पोस्ट या घूरें की खाद :::


घर के कूड़ा करकट़,सब्जीयों के अवशेषों, पशुओं के मल मूत्र आदि को एक साल तक गड्डे में डालकर रखा जाता हैं,जिनमें सूक्ष्मजीव विघट़न करते रहतें हैं.और यह खाद भूरभूरी होकर मिट्टी के लिये अत्यंत उपयोगी बन जाती हैं.इस प्रकार की खाद मिट्टी के सभी आवश्यक तत्वों की पूर्ति करती हैं. यदि एक एकड़ में दस ट़न गौबर की खाद का बुरकाव प्रत्येक वर्ष किया जावें तो किसी भी प्रकार के रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता नही पड़ती हैं.

# हरी खाद :::


भूमि में मूंग,उड़द,लोबिया,सनई जैसी फसलें उगाकर उसे मिट्टी में दबाकर सड़नें हेतू छोड़ दिया जाता हैं. ऐसी खाद मृदा के लिये आवश्यक तत्वों से समृद्ध होती हैं,और पौधा इसे तीव्र अवशोषित करता हैं.यह खाद  सस्ती और कम मेहनत में तैयार हो जाती हैं.

# वर्मी कम्पोस्ट (केंचुआ खाद) :::


 घर से निकले हुये सब्जी फल के छिलकों,चाय पत्ती तथा अवशिष्टों को केंचुए खाकर पुन: मल के माध्यम से बाहर निकालतें हैं.यह ह्यूमस कहलाता हैं.जो पौषक तत्वों के अलावा विटामिनों और वृद्धि हार्मोनों से समृद्ध होता हैं.वर्मी कम्पोस्ट में गोबर खाद की तुलना में नाइट्रोजन 3 गुना,फाँस्फोरस 1.5 गुना तथा पोटाश 2 गुना होता हैं.यह खाद मिट्टी की वायु संचार क्षमता में तीव्र सुधार लाती हैं.साथ ही इसमें विट़ामीन और वृद्धि हार्मोंन होनें से पौधे की रोग प्रतिरोधकता बढ़ती हैं.




1 मई 2017

16 संस्कार न केवल हिन्दुओं के बल्कि मानव मात्र के - एक वृहद विश्लेषण [16 Sanskar ]

 1.संस्कार एक परिचय :::

भारतीय सभ्यता एँव संस्कृति में सदियों से संस्कार को विशिष्ट स्थान प्राप्त रहा हैं.संस्कार के कारण ही मनुष्य पशुओं से प्रथक होकर संस्कारित हुआ हैं.यदि शाब्दिक दृष्टिकोण से विचार करें तो संस्कार वह हैं जो मनुष्य को निराकार से साकार बनाकर समाज के लिये उपयोगी बना दें.

संस्कार के माध्यम से ही मनुष्य शारिरीक,मानसिक,सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से परिष्कृत होता हैं.

# 2.संस्कार क्यों ? :::

संस्कार के बिना भी मनुष्य जिन्दा रह सकता हैं,फिर संस्कार की आवश्यकता क्यों पड़ी ?

इसका सीधा जवाब यह हैं कि प्राण तो प्रत्येक जीव जगत में मोजूद हैं,परन्तु भारतीय संस्कृति में विकसित संस्कार ने मनुष्य को खानें पीनें और मेथुन की क्रिया से परें हटकर आत्म विकास और समाज विकास हेतू प्रेरित और प्रोत्साहित किया ताकि मनुष्य आगामी पीढ़ी को बेहतर बना सकें.संस्कार ही मनुष्यों को दया,क्षमा,उचित ,अनुचित,में भेद करना सीखाते हैं.

भारतीय जीवन दर्शन कुल 16 संस्कारों को व्यक्ति के विकास हेतू जीवन में क्रियान्वित करनें पर बल देता हैं.

जो इस प्रकार है.

# 1.गर्भाधान संस्कार :::

यह संस्कार पति - पत्नि द्धारा विवाह के पश्चात संपन्न किया जाता हैं.

शाखायन ग्रहसूत्र के अनुसार गर्भाधान संस्कार विवाह की चौथी रात्री को किया जाना चाहियें यदि इस विधि पर हम आधुनिक रूप से सोचें तो पता चलता हैं,कि विवाह की चौथी रात्री सहवास के लिये आदर्श मानी जाती हैं.

क्योंकि इस समय तक स्त्री पुरूष विवाह संस्कार से पूर्ण निवृत्त होकर शांतवृत्ति से शारीरिक सम्पर्क स्थापित कर सकतें हैं.

शांतवृत्ति, पूर्ण मनोंयोग और अच्छी भावना के साथ किया गया मेथुन (Intercourse) सुंदर,सुशील,निरोगी,और बुद्धिमान संतान उत्पन्न करता हैं,इस बात को आज का आधुनिक चिकित्साशास्त्र भी मानता हैं.
इस संस्कार का भी यही उद्देश्य हैं,कि स्त्री पुरूष शांतचित्त,प्रशन्न होकर सहवास करें ताकि बुद्धिमान और निरोगी संतान पैदा होकर समाज के विकास में योगदान दे सकें.

# 2.पुंसवन :::

पुंसवन शब्द के साथ पुत्र जन्म को संबध जोड़ा जाता हैं,भारतीय समाज में पुत्र को सदैव महत्वपूर्ण स्थान दिया गया हैं,जिसके अनुसार पहली संतान में पुत्र प्राप्ति को वरीयता दी गई हैं.किन्तु इसके इस पक्ष को छोड़ हम स्वास्थ के दृष्टिकोण से इस संस्कार पर दृष्टि डालें तो यह संस्कार स्त्री के गर्भ को सुरक्षित रखने के दृष्टिकोण से किया जानें वाला महत्वपूर्ण संस्कार हैं.

जिसमें औषधि और बरगद की छाल के दूध को स्त्री के नथूनों में ड़ालनें का रिवाज हैं.

आयुर्वैद के दृष्टिकोण से देखें तो बरगद का दूध शीत प्रकृति का होकर गर्भ को बल प्रदान करता हैं,जिससे गर्भपात होनें की संभावना समाप्त हो जाती हैं.स्त्री के गर्भ पर शीतल जल का घड़ा रखनें का भी यही उद्देश्य रहा हैं.किन्तु कालांतर में इसके साथ पुत्र जन्म की कामना की परिपाटी प्रचलित हो गई जो समाज में पुरूषों की समाज में महत्ता को इंगित करता हैं.

# 3.सीमन्तोन्नयन :::

सीमन्तोंन्नयन का तात्पर्य हैं,केशों को ऊपर उठाना .ग्रहसूत्रों में इस संस्कार का समय गर्भ के चौथा या पाँचवा मास निर्धारित हैं.गर्भवती स्त्री  और आनें वाली संतान के स्वास्थ के दृष्टिकोण से यह समय अत्यन्त महत्व का होता हैं,जिसमें माता और शिशु के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहियें.
केशों को ऊपर उठानें का सांकेतिक संदेश यही रहता हैं,कि स्त्री अब सोते वक्त,बैठते वक्त,और खाते वक्त विशेष ध्यान रखें.इस संस्कार के पश्चात स्त्री को नदी में नहानें,यात्रा करनें आदि की मनाही थी इसी प्रकार पुरूषों के लियें भी सहवास ,विदेश यात्रा और तीर्थाट़न की मनाही होकर स्त्री के साथ समय व्यतीत करनें पर जोर था.
आधुनिक चिकित्सा का भी यही मानना हैं,गर्भस्थ शिशु और माता के स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से पांचवें माह के पश्चात स्त्री के साथ सहवास बंद कर दिया जाना चाहियें, इसी प्रकार यदि पुरूष गर्भावस्था का अन्तिम समय पत्नि के साथ बिताता हैं,तो पत्नि को शारिरीक और मानसिक संबल मिलता हैं.

पश्चिमी देशों ने भारतीय संस्कृति के इस रूप को शोध उपरांत बहुत तीव्रता के साथ ग्रहण किया हैं,इसका सबसे अच्छा उदाहरण  प्रसव के समय अस्पतालों में पति का पत्नि के बगल में खड़ा रहकर उसे संबल प्रदान करना हैं.

# 4.जातकर्म :::

यह संस्कार बच्चें के जन्म के तुरन्त बाद किया जाता हैं,जिसमें पिता की उपस्थिति में कुछ क्रियाएँ करनें के उपरांत शिशु की गर्भनाल अलग की जाती हैं.पिता की उपस्थिति से पता चलता हैं,कि प्राचीन समय में पिता प्रसव के समय पत्नि के पास उपस्थित रहता था.

इस संस्कार के एक भाग में पिता प्रसूता के कक्ष में अग्नि प्रज्वलित करता हैं,इस क्रिया के चिकित्सकीय दृष्टिकोण पर नज़र ड़ाले तो इसका उद्देश्य बच्चें और माता के आसपास शुचिता सुनिश्चित करना रहा हैं,अग्नि अपनें आसपास के जीवाणुओं को जलाकर नष्ट कर कर देती हैं.फलस्वरूप शिशु और माता अनिष्ट से बचें रहतें हैं.

इस क्रिया के एक भाग में शिशु को शहद चट़ानें का रिवाज हैं,किन्तु आधुनिक चिकित्साशास्त्र इसके पक्ष में नही हैं.किन्तु यदि विभिन्न ग्रंथों का अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला जावें तो शहद चटानें के मूल में भी सुचिता और बच्चें को संक्रमण से बचानें की भावना थी.
चूँकि शहद एंटी बेक्टेरियल गुणों से समृद्ध होता हैं,अत:इसके सिमित मात्रा में बच्चें के मुँह में फेरनें से गर्भ के समय बच्चें के मुँह में गया गंदा पानी और मुँह में पनपनें वालें बेक्टेरिया नष्ट हो जातें हैं.किन्तु समय के साथ इस रिती को खीर और दही से जोड़ दिया गया जो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अनुचित हैं.

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# 5. नामकरण :::

संस्कार के माध्यम से बच्चें का नामकरण हिन्दु धर्म की अन्य धर्मों को देन हैं,बच्चें का नामकरण करनें का मूल उद्देश्य उसे व्यक्तित्व के दृष्टिकोण से परिपूर्ण बनाना रहा हैं.
कहा जाता हैं,कि नाम व्यक्तित्व को निर्धारित करनें में महत्वपूर्ण भूमिका निभातें हैं.यही कारण हैं,कि हिन्दू धर्म ऐसे नामों को वरियता देता हैं,जिन नामों के व्यक्तियों ने अपनें कार्यों से समाज में एक विशिष्ठ स्थान अर्जित किया हैं.

ग्रहसूत्रों के अनुसार नामकरण के समय नक्षत्र,वार,तिथि,लग्न का विचार किया जाता हैं तदनुरूप राशिनुसार नाम निर्धारित कियें जातें हैं.आधुनिक विग्यान इस बात का समर्थन करता हैं,कि राशि,नक्षत्रानुसार जन्म लेनें वाले व्यक्ति का स्वभाव उस राशि के अनुसार ही होता हैं.

# 6.निष्क्रमण :::

निष्क्रमण का शाब्दिक अर्थ हैं,बाहर निकालना इस संस्कार का उद्देश्य शिशु को घर से बाहर निकालकर खुली वायु और धूप में विचरण कराना हैं,ताकि वह बाहरी वातावरण के अनुरूप अपनें को ढ़ाल सकें.और धूप में उसकी हड्डीयाँ मज़बूत हो सकें .

ग्रन्थों में शिशु को बाहरी वातावरण में प्रवेश करानें का समय बारह दिन से चार मास तक निर्धारित हैं.
इस संस्कार के माध्यम से शिशु बाहरी समाज से भी परिचित होता हैं.

इस संस्कार में बच्चें को गोबर लेपित आंगन में जहाँ सूर्य की रोशनी पड़ती हो बिठाकर मंत्रों के उच्चारण और बच्चें को उपहार देकर संपन्न किया जाता हैं.

# 7.अन्नप्राशन :::

अन्नप्राशन संस्कार
 अन्नप्राशन

हिन्दू धर्म कितना वैग्यानिक और स्वास्थ्य अनूकूल हैं,इसका सबसे सटीक उदाहरण अन्नप्राशन संस्कार हैं. आधुनिक चिकित्साशास्त्रीयों के मतानुसार बच्चें के 6 माह का होनें पर ठोस पूरक आहार शुरू कर दिया जाना चाहियें ताकि बच्चा माँ के दूध से विलग होकर सही रूप में शारिरीक और मानसिक विकास कर सकें.
याग्वल्क स्मृति भी यही कहती हैं,कि बच्चें के 6 माह का होनें पर खीर,शहद आदि ठोस आहार बच्चें को एक निश्चित समय पर देना शुरू कर देना चाहियें ताकि बच्चें की पाचन शक्ति विकसित हो सकें.यह क्रिया मंत्रोच्चार के बीच बच्चें की इंद्रीय विकसित हो ऐसी कामना के साथ संपन्न की जाती हैं.


# 8.चूड़ाकरण :::

चूड़ाकरण या मुण्ड़न संस्कार हिन्दुओं का सबसे प्रमुख संस्कार हैं.मनुस्मृति में इस संस्कार की उम्र एक से तीन वर्ष निर्धारित की हैं,वही पाराशर ग्रहसूत्र में इस संस्कार के लियें एक से सात वर्ष निर्धारित हैं.

इस संस्कार का मूल उद्देश्य सफाई और सौन्दर्य हैं.चरक के अनुसार गर्भ के केश शरीर से अलग करनें से शुचिता बढ़ती हैं,जिससे सौन्दर्य निखरता हैं.कालान्तर में इस संस्कार के साथ बलि प्रथा जैसे अनेक कर्मकांड़ प्रचलित हो गये जो इस संस्कार की मूल भावना से विरत करतें हैं.




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# 9.कर्णबेधन :::

विश्वामित्र ने इस संस्कार के लिये पाँच वर्ष की आयु निर्धारित की हैं.इस संस्कार में बालक का कर्णछेदन सोनें से किया जाता हैं.इस संस्कार के मूल में भी सौन्दर्य और आरोग्य की भावना हैं.

आधुनिक एक्यूप्रेशर चिकित्सानुसार कर्णछेदन से अस्थमा,खाँसी जैसी बीमारींयाँ नहीं होती और फेफडों को बल मिलता हैं.ज्योतिषशास्त्र भी कहता हैं,कि कर्णछेदन से निर्भयता आती हैं.

भारत की अनेक जनजातियों में भी कर्णछेदन की परम्परा हैं और इनके पिछें भी भावना आरोग्य और निर्भयता की ही हैं.

# 10.विधारम्भ :::


विधारम्भ संस्कार से पता चलता हैं,कि भारतीय संस्कृति न केवल शरीर के विकास को महत्व देती हैं,बल्कि मानसिक विकास के प्रति भी बहुत सवेंदनशील हैं.

आधुनिक बाल विकास सलाहकारों के मत में बच्चा अपनी उम्र के पाँचवें वर्ष से शिक्षा ग्रहण करनें योग्य बन जाता हैं.हमारें प्राचीन गुरू विश्वामित्र का भी यही
 मानना हैं,कि विधारम्भ संस्कार बच्चें के पाँचवें वर्ष से शुरू होना चाहियें.

इसके पूर्व बच्चें को माता - पिता के सानिध्य में रहकर शिक्षा ग्रहण करना चाहियें. इस संस्कार की शुरूआत में बच्चें को "ऊँ" उच्चारण करवाकर स्लेट पर बारहखड़ी लिखना सीखाया जाता हैं.

# 11. उपनयन :::

बालक का उपनयन
 बालक का उपनयन
उपनयन का शाब्दिक अर्थ हैं तीसरी आँख अर्थात अब बच्चें से आशा की जाती हैं,कि वह दुनिया को देखनें का अपना नजरिया विकसित करें अब तक जो माता पिता ही उसके लिये सबकुछ थे.अब उन्हें छोड़कर वेदाध्ययन के लियें उसे गुरू के सानिध्य में  जाना चाहियें.

उपनयन में उसे धागे के तीन तारों वाली जनेऊ पहनाई जाती हैं,जिसका तात्पर्य हैं,कि अब उसे माता,पिता और गुरू के रिण को चुकाना हैं.

उपनयन के पश्चात बालक भिक्षाटन के लियें गुरू की आग्यानुसार समीप की बस्तियों में जाता हैं,यह कर्म राजा के बालक के लिये भी अनिवार्य रहता था,जिसका तात्पर्य हैं,कि जीवन के सुचारू संचालन के लिये उधम करना सभी के लिये आवश्यक हैं.भिक्षाटन के पश्चात भोजन बनाना और मिल बैठकर खाना सामाजिक समरसता और समभाव का प्रतीक था.

उपनयन ब्राहम्ण, क्षत्रिय, और वैश्य के लिये अनिवार्य था,इसका तात्पर्य हैं,कि वेदाध्ययन में किसी भी प्रकार का भेदभाव नही होता था,ना ही इस संस्कार में छूआछूत जैसी किसी सामाजिक बुराई का पता चलता हैं,बस उपनयन संस्कार की उम्र में अंतर हैं,जैसें ब्राहम्ण बालक का उपनयन आठवें वर्ष में,क्षत्रिय का ग्यारहवें वर्ष में,और वैश्य का बारहवें वर्ष में,होना चाहियें.

उम्र संबधी अंतर का मूल कारण यह था कि ब्राहम्ण बालक शुरू से अपनें आचार्य पिता के संरक्षण में बहुत से ग्यान का अर्जन उम्र की शुरूआती अवस्था में ही कर लेता था.अत : उसे कम उम्र में कठिन वेदाभ्यास करवाना आसान था.

# 12.समावर्तन :::

यह संस्कार वेदाध्ययन के अंत को सूचित करता हैं,इस संस्कार को करनें की आयु 24 वर्ष निर्धारित हैं.वेदाध्ययन के पश्चात गुरू की आग्या लेकर ग्रहस्थाश्रम में प्रवेश करता हैं.आधुनिक काल में भी व्यक्ति 24 वर्ष तक अपना विध्याध्यन समाप्त कर लेता हैं.और आगे के जीवन की तैयारी शुरू कर देता हैं.

# 13.विवाह :::

संस्कार
 विवाह संस्कार

भारतीय संस्कृति विवाह को भी संस्कार मानती हैं,जो वेदाध्ययन के पश्चात प्रारंभ होना चाहियें, इस बात से यह जानकारी पुष्ट होती हैं,कि प्राचीन समय में बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई नही विधमान थी,विवाह के लिये व्यक्ति का शारीरिक और मानसिक समाजीकरण आवश्यक था.

विवाह संस्कार से दीक्षित व्यक्ति के लिये यह आवश्यक था कि वह समाज की उन्नति और निरन्तरता के लिये सन्तान उत्पन्न कर उनका पालन पोषण करें,माता,पिता,गुरू का कर्ज अदा करें,इन कर्जों को चुकानें हेतू उसे सप्तपदी,होम,पाणिग्रहण जैसें अनुष्ठान करके उसके उत्तरदायित्व की याद दिलाई जाती हैं.

विवाहदेव संसृष्टि संसृष्टयैव जगत्नयम् चतुवर्ग : फल प्राप्ति: तस्मात् परिणय शुभ:

विवाह से ही सृष्टि उत्पन्न होती हैं,
विवाह के माध्यम से ही व्यक्ति धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष प्राप्त कर सकता हैं,इसीलिये इसे सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक संस्कार माना गया हैं.

विवाह दो व्यक्तियों के साथ दो परिवारों का मिलन भी होता हैं,अत:इसमें अग्नि को साक्षी मानकर इस बंधन को आजन्म निभानें की शपथ ली जाती हैं.

# 14. अन्त्येष्टि :::

यह संस्कार व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात उसके सगे संबधी और पुत्र द्धारा किया जाता हैं.इस संस्कार में व्यक्ति को लकड़ियों पर लिटाकर अग्नि से जला दिया जाता हैं,ताकि उसका शरीर जलकर राख बन जायें और जल,वायु को प्रदूषित नही करें.कालांतर में मृत्यु के पश्चात के अनेक कर्मकांड़ों का प्रचलन हो गया जो मृतक के आश्रितों पर आर्थिक बोझ बन गया हैं.

वास्तव में कुछ कर्मकांड़ों का सांकेतिक महत्व था,जिससे मनुष्य शिक्षा लेकर जीवन को क्षणभंगुर मानें और हमेशा सद्कार्यों की और प्रेरित रहें.

० भगवान राम का चरित्र कैसा था ?


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