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रविवार, 20 जनवरी 2019

8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और महिला सशक्तिकरण के भारतीय मूल्य




दोस्तों आज मैं आपको 8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और महिला सशक्तिकरण के भारतीय मूल्य से से सम्बंधित विचारों से परिचित कराना चाहता हूँ। तो आईये जानते हैं 8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और महिला सशक्तिकरण के भारतीय मूल्य के बारे मे 

वैदिककालीन भारतीय साहित्य गार्गी और मैत्रयी जैसी दार्शनिक महिला विद्वानों द्वारा अपने पुरुष समकक्ष विद्वानों के साथ किये जाने वाले उच्च कोटि के शास्त्रार्थ से भरा हुआ है ।

रानी लक्ष्मी बाई  जैसी वीरांगना ने अपनी नेतृत्व क्षमता ओर साहस से अंग्रेजों को परिचित करवाकर महिला को कमतर नहीं आंकने को विवश किया। 

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स्वंत्रता संग्राम में भी महात्मा गांधी के आह्वान पर महिलाएं ऐसे समय में घर से निकलकर आगे आयी जब उनकी बिरादरी मात्र 2 प्रतिशत शिक्षित थी,साथ ही महिलाओ पर पुरूष प्रधान समाज की कई वर्जनाएं कठोरतम रूप में प्रचलित थी।

लेकिन महिला सशक्तिकरण की परिकल्पना आजादी के बाद जिस तेजी से परवान चढ़नी थी । वह नहीं चढ़ पायी क्योंकि पुरूष प्रधान समाज की वर्जनाओं का अंधा समर्थन खुद नारी शक्ति ने ही कर महिला सशक्तिकरण की धार को कुंठित किया । उदाहरण के लिये किसी की बेटी जब दूसरे के घर बहू बन कर जाती हैं तो सबसे पहले अतार्किक और अवैज्ञानिक मर्यादा की लकीर  सास या ननद द्वारा ही खींची जाती हैं ।

भारतीय सविंधान निर्माताओं ने महिला समानता को सविंधान में यथोचित स्थान दिया लेकिन शासन प्रशासन की कार्यप्रणाली ने सविंधान निर्माताओं की भावना आगे बढ़ाने में  बहुत लचीला रुख अपनाया यही कारण हैं कि सविंधान में समानता मिलने के बावजूद महिला सशक्तिकरण के कई अधिनियम बनाने पड़े। 

कई पढ़ी लिखी और प्रशासन के उच्च पदों पर बैठी महिलाएं भी पुरुष प्रधान वर्चस्व को आगे बढ़ाने का काम कर रही हैं । मैंने कई महिला प्रशासकों को देखा हैं जो रात में काम करने से मात्र इस आधार पर छूट चाहती हैं और शासन भी इस कदम में उनके साथ खड़ा रहता हैं, क्योंकि वह महिला हैं क्या यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में महिला प्रशासकों की सही भूमिका हैं ? इसके स्थान पर इन जिम्मेदार पदों पर बैठी महिलाओं को समाज में महिला सशक्तिकरण का आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए जिससे समानता का सही सन्देश समाज मे संचारित हो।

कई लोग महिला सशक्तिकरण का बहुत संकीर्ण अर्थ निकाल कर बैठे हैं 

जो पुरुष करता हैं वह महिला करें क्या यही महिला सशक्तिकरण हैं ? 

जो पुरुष पहने वह महिला पहने क्या यह महिला सशक्तिकरण कहा जायेगा ?

जो पुरुष सेवन करें वह महिला करें क्या यह महिला सशक्तिकरण हैं ?

क्या पुरुष महिला के वस्त्र पहनकर सशक्त बन जायेगा ?

नहीं ना बल्कि जो महिला करती हैं वह पुरुष करेगा तो वह हास्यपद और उपहास का पात्र बन जाता हैं । तो फिर महिला पुरुष के समान दिखकर सशक्त कैसे ?

 आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता, और आत्मविश्वास ही महिला सशक्तिकरण के 3 स्तम्भ हैं ।जिस पर टिक कर ही महिला सशक्त हो सकती हैं ,इन स्तम्भों पर टीका महिला सशक्तिकरण न केवल महिलाओं को बल्कि देश और दुनिया को नई ऊंचाइयों पर ले जायेगा ।

यह बात सही हैं कि भारत में पिछले 10 - 15 वर्षों के दौरान महिला सशक्तिकरण का नया दौर शुरू हुआ हैं पंचायत से लेकर विधानसभा और संसद महिला प्रतिनिधियों की साक्षी बन रही हैं लेकिन इस दौर को और आगे ले जाना होगा और यह काम भी खुद उन्हें ही अपने बलबूते करना होगा । क्योंकि पुरुषवादी मानसिकता और उनके अधिकार में रहकर प्राप्त किया गया सशक्तिकरण वास्तव में अधूरा सशक्तिकरण ही माना जायेगा । स्त्री का सशक्तिकरण, उसके जीवन का आकर्षण उसके अपने निज पहचान में छिपा हैं न कि पुरुषों की प्रतिलिपि बनने में ।


भारत और यूरोप में महिला सशक्तिकरण की तुलना करें तो पायेंगे की भारत में स्त्री सशक्तिकरण समाज का अभिन्न अंग रहा हैं, वेद की ऋचाओं से लेकर वर्तमान आदिवासी समुदायों की समाज व्यवस्था इसका जीता जागता प्रमाण हैं। जबकि यूरोप का स्त्री सशक्तिकरण  18 वी शताब्दी में 'मैरी' के फ्राँस की क्रांति से प्रभावित स्वतन्त्रता ,समानता और भातृत्व से जुड़ा हैं।

 लेकिन इसके बावजूद वर्तमान भारत का स्त्री सशक्तिकरण यूरोप के स्त्री सशक्तिकरण से बहुत पीछे हैं।बल्कि यह कहा जा सकता हैं कि भारत का स्त्री सशक्तिकरण भारतीयता से प्रभावित होने के बजाय यूरोप के स्त्री सशक्तिकरण की प्रतिलिपि बनने की ओर अग्रसर हैं। यदि यह सशक्तिकरण भारतीयता से विलग होगा तो इसकी खूबसूरती खत्म हो जायेगी।

यदि यह सशक्तिकरण भारतीयता से भिन्न हुआ तो इसकी आत्मा मर जाएगी ।

यदि यह सशक्तिकरण भारतीयता की सुंगध को विश्व मे नहीँ फैला पाया तो ऐसे जीवन मूल्यों का पतन होगा जो स्वामी विवेकानंद, महात्मा गाँधी, मदर टेरेसा, देवी अहिल्याबाई,मैत्रयी, गार्गी आदि ने विश्व को दिये थे ।






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