20 जुल॰ 2016

LDH ,LACTATE DEHYDROGENASE

  1. #1.What is LDH.    

(source health screen),
LDH, IS A MEMBRANE BOUND RESPIRATORY ENZYME THAT'S PLAY AN IMPORTANT ROLE IN CELLULAR RESPIRATION. It exists in five isoenzyme forms viz.LDH1 to LDH5 distributed in different body tissues. Though, these isoenzyme differ in their amino acid sequences,and found extensively in all body tissues, they catalyze the same chemical reaction.LDH levels are usually very low in the blood stream and shows a sharp increase only when an episode of tissue damage occurs. Hence, it is used extensively as a marker to determine tissue damage and in some infections such as meningitis and cancer.

#2.ROLE OF LDH 


LDH; play an important role in glycolysis.During glycolysis there is conversion of glucose to pyruvate which further gets oxidized in citric acid cycle and electron transport cycle, to release large amount of ATP.which is utilized by the cell as a source of energy.if the cell lacks the ability to oxidize pyruvate due to insufficient oxygen or any problem in citric acid cycle. then the only alternative pathway for synthesis of ATP is the glycolytic pathway.Glycolytic pathway requires sufficient glucose along with ADP.inorganic phosphate and adenosine diphosphate,and nicotinamide adenine dinucleotide for synthesizing sufficient ATP.Glucose can be easily obtained from diet or any other stored forms,and ADP and inorganic phosphate can be obtained by hydrolysis of ATP.NAD is the only limiting factor in this cycle and hence LDH plays a significant role in converting NADH produced in glycolytic pathway back to NAD to continue the glycolytic pathway.

Whenever we exercise the need for energy increases and supply of oxygen in the skeletal muscles gets reduced. This leads to an increase in LDH level, which as described above plays an important role in glycolytic pathway. Hence, in cases of muscular fatigue, high levels of LDH are seen.

#3.PULMONARY DISEASE


High levels of serum LDH; are also indicative of pulmonary disease caused by cell damage or cell death like emphysema, pneumothorax and pulmonary disease. Bronchi pneumonia and inflammatory conditions like tuberculosis also show elevated LDH levels.

 #4.cancerous cells


High levels of LDH have also been detected in cancerous cells. The C -myc gene ( responsible for cell growth and apoptosis) is found linked to LDH A gene which increases the levels of LDH in cancer cells. As it is known that cancerous cells depend on anaerobic respiration for cell growth and metabolism, this is fuelled by the A form of LDH enzyme,and hence its levels are high in cancer. Thus LDH acts as a general marker to determine the prognosis of cancer cells.

#5.MENINGITIS


Elevated levels of  LDH were seen in cerebrospinal fluid of patients suffering from meningitis. High levels of LDH 3 are seen in cases of aseptic meningitis, while high levels of LDH 4 and LDH 5 are seen in bacterial meningitis (inflammation in the protective sheath of brain and spinal cord).










19 जुल॰ 2016

वृद्धावस्था और आयुर्वेद के अनुसार जीवन

वृद्धावस्था और आयुर्वेद


भारतीय शास्त्रों और ग्रन्थों में मनुष्य की औसत आयु की कामना 100 वर्ष की गई.इन सौ वर्षों को विभिन्न भागों में बाँटा गया हैं.जिन्हें जीवनयापन के चार आश्रम कहा गया हैं.ये चार आश्रम मुख्य रूप से इस प्रकार हैं --- 1.ब्रम्हचर्य आश्रम.2.ग्रहस्थ आश्रम 3. सन्यास आश्रम 4. वानप्रस्थ आश्रम.इन आश्रमों में अन्तिम दो आश्रम सन्यास और वानप्रस्थ मूल रूप से वृद्धावस्था से सम्बंधित हैं.जिनमें मनुष्य शारीरिक रूप थक जाता हैं,और समाज की उत्पादकता में अपना योगदान सीमित कर लेता हैं.


कोई कहे कि वृद्धावस्था क्या हैं तो इसका जवाब यह हैं,कि शरीर पर, इन्द्रियों पर,त्वचा आदि पर लगातार कार्यरत रहनें के कारण शरीर की कोशिकाओं, उत्तकों पर,समय के साथ और दबाव से जो क्षय होता हैं.इसके अलावा जो मानसिक परिवर्तन होता हैं,वह वृद्धावस्था कहलाता हैं.

वृद्धावस्था से संबधित समस्याएँ 



1.ह्रदय की कार्यपृणाली कमज़ोर हो जाती हैं,जिससे उच्च रक्तचाप, निम्न रक्तचाप जैसी बीमारींयाँ पैदा हो जाती हैं.


2. फेफडों से श्वसन गहरा नहीं हो पाता.


3. दांत कमज़ोर होकर गिरनें लगतें हैं.जिससे कठोर चीज़ें नहीं खा सकतें.


3. हार्मोंन असंतुलित हो जातें हैं,जिससे मधुमेह (Diabetes) hypothyroid, जैसे रोग उत्पन्न हो जातें हैं.


4.जबान (Tongue) की स्वाद कोशिकायें मरने लगती हैं जिससे खानें में स्वाद नहीं आता.


5.पाचन संस्थान कमज़ोर हो जाता हैं.जिससे भोजन लम्बें समय तक नहीं पचता.


6.जोंड़ों में से साइनोवियूल फ्लूड़ सूख जाता हैं,जिससे जोंड़ों में दर्द रहनें लगता हैं,जिससे उठनें बैठनें में समस्या रहती हैं.


7. रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर हो जाती हैं,फलस्वरूप बीमारी जल्दी जल्दी होती हैं.


8. आँखों से कम दिखाई देने की समस्या हो जाती हैं.


9. कानों से कम सुनाई देनें लगता हैं.


10. स्मरण क्षमता कम हो जाती हैं.


11. स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता हैं.जिसकी वज़ह से पीढ़ीयों में टकराव की समस्या जन्म ले लेती हैं.


12. महिलाओं में जनन क्षमता,तथा पुरूषों में सेक्स की इच्छा खत्म होनें लगती हैं.


13. नींद कम आती हैं.

14.चलते हुए संतुलन नहीं रहता जिससे आदमी फिसल कर गिर जाता हैं और चोटग्रस्त हो जाता हैं ।

15.वृद्धावस्था में प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ जाती हैं फलस्वरूप पूरी पेशाब नहीं निकल पाती हैं और मूत्राशय में संक्रमण और किडनी से संबंधित समस्या हो जाती हैं ।

क्या करना चाहियें 


1.भोज़न समय पर हो,संतुलित हो इसका विशेष ध्यान रखना चाहियें. भोजन में पर्याप्त मात्रा में हरी सब्जियाँ,सलाद होना चाहियें.


2. रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ानें हेतू योगिक क्रियायें,पैदल घूमना और अन्य शारीरिक गतिविविधियों में सक्रिय रहें.


3. अध्ययनों,और शोधों से ये बात साबित हुई हैं,कि युवावस्था से ही नियमित रूप से च्यवनप्राश का सेवन करनें वाला व्यक्ति बिना किसी विशेष शारीरिक परेशानी के अपने जीवन के सौ वर्ष पूरें करता हैं.अत:च्यवनप्राश का नियमित रूप से सेवन करें.


4. तेलीय पदार्थों, जंक फुड़,बर्गर ,पिज्जा का सेवन करनें से बचें इसके बजाय अंकुरित अनाजों,और फलों का सेवन करें.


5. पानी नियमित अंतराल से और पर्याप्त मात्रा में पीयें.


6.शरीर में चिकनाहट़ और त्वचा की देखभाल हेतू नियमित रूप से सरसों,तिल तेल की मालिश करें.


7. अपनी पसंद का काम अवश्य करें,जैसे किसी को बागवानी पसंद हैं,किसी को अध्यात्म में रूचि हैं यदि कुछ समय अपनी पसंद का कोई कार्य करेगें तो मस्तिष्क पर और स्वास्थ पर इसका सकारात्मक असर होगा.

8. नकारात्मक विचारों से दूरी बनाकर रखें.आध्यात्म नकारात्मक विचारों से दूर रहनें में मदद करता हैं.शोधों द्धारा यह बात स्पष्ट हुई हैं,कि जो व्यक्ति आध्यात्म में रूचि लेता हैं,वह दीर्घायु को प्राप्त होता हैं.


9. बच्चों संग खेलनें से शरीर में हार्मोंन का स्तर बढ़ जाता हैं,जो रोग प्रतिरोधकता बढ़ानें में मदद करता हैं,इसलिये खाली बैठनें की बज़ाय बच्चों संग बच्चें ज़रूर बनें.

10.बुजुर्गों को स्वयं आगे रहकर सामाजिक जीवन में सक्रिय रहना चाहियें ऐसा करने से एकाकीपन की समस्या से निजात तो मिलती ही हैं बल्कि समाज को एक अनुभवी व्यक्ति का साथ मिलता हैं ।


11. विटामिंस और मिनरल्स हमारे शरीर में कोशिकाओं का पुनर्निर्माण और टूटी हुई कोशिकाओं की मरम्मत करने का काम करते हैं वृद्धावस्था में कोशिकाओं की टूटने की प्रक्रिया बहुत तेज हो जाती हैं अतः उसी अनुपात में हमें विटामिन और मिनरल्स का सेवन भी करना पड़ता है आमतौर पर देखा गया है कि वृद्धावस्था में विटामिन d3 ,आयरन और विटामिन b12 की कमी हो जाती है इन विटामिन और मिनरल्स की कमी से मांसपेशियों में दर्द हड्डियों की समस्या मस्तिष्क संबंधी समस्या राधे ह्रदय संबंधी समस्या होने लगती है यदि नियमित रूप से विटामिन और मिनरल्स सप्लीमेंट्स का सेवन वृद्धावस्था में किया जाए तो इन बीमारियों का जोखिम कम किया जा सकता है।


वास्तव में वृद्धावस्था अनुभव का खज़ाना होती हैं,अत:युवाओं का भी दायित्व बनता हैं,कि उनके अनुभव का लाभ लेकर उन्हें विशिष्ठ होनें का आभास करवायें.



पलाश वृक्ष के औषधीय गुण



० कद्दू के औषधी गुण 


आयुर्वेद ग्रंथों के अनुसार वृद्धावस्था :::


हमारे प्राचीन चिकित्सा ग्रंथों में वृवृद्धावस्थाको रोककर चिरयोवन बनाने का वर्णन हैं । आयुर्वेद ग्रंथों में जिन उपायो के द्धारा वृद्धावस्था को रोककर चिरयोवन बने रहने के उपाय बताये हैं उन्हें "रसायन चिकित्सा" के नाम से जानते हैं । आचार्य सुश्रुत लिखते हैंअधिक 
रसायनतंत्रनाम वयस्थापनमायुर्मे धाबलकरं रोगहरण समर्थ च ।।

रसायन चिकित्सा सौ वर्षों तक आयु स्थिर रख ,सौ वर्षों से अधिक जीवित रहना,शरीर को सदा रोगों से मुक्त रखना और वृद्धावस्था को दूर कर नवयोवन प्राप्त करने में समर्थ चिकित्सा विज्ञान हैं ।


रसायन चिकित्सा और आधुनिक अध्ययनों का मत हैं कि वृद्धावस्था तब आती हैं जब शरीर में हार्मोन की कमी और धमनी (artery ) में कठोरता आ जाती हैं ।


आयुर्वेद ग्रंथों में लिखा हैं 

बाले विवध्दर्ते श्लेष्मा मध्यम पित्तमेवतु भूमिष्ठं वध्दर्ते वायु वृध्देस्तद्धोस्य योजयेत् ।।


अर्थात बचपन  में कफ प्रधान रहता हैं ,युवावस्था में पित्त प्रधान रहता हैं तथा वृद्धावस्था के समय वायु तत्व प्रधान रहता हैं । यदि शरीर में वायु की प्रधानता हो जाती हैं तो शरीर में कफ कम हो जाता है और धमनी में कठोरता आ जाती हैं। यह धमनी में कठोरता ही वृद्धावस्था का कारण हैं ।

आयुर्वेद में वयस्थापक औषधीयों के माध्यम से शरीर की पुरानी कोशिकाओं को शरीर से बाहर निकाला जाता हैं और नवीन कोशिकाओं का निर्माण किया जाता हैं । ऐसा करने से शरीर बलिष्ठ बन जाता हैं और शरीर के वृद्ध होनें की रफ्तार कम हो जाती हैं ।




18 जुल॰ 2016

आयुर्वेद ग्रंथों में वर्णित दही के औषधीय गुण

आयुर्वेद ग्रंथों में वर्णित दही के औषधीय गुण

भारतीय संस्कृति में दूध और दूध से बनें पदार्थों का स्थान ईश्वर के समतुल्य हैं,यही कारण हैं कि हमारी पूजा पाठ दूध (curd)दही बिना अधूरी मानी जाती हैं।

चरणामृत,प्रसाद अभिषेक आदि अनन्त कार्यों में दही का प्रयोग सदियों से होता आ रहा हैं.भगवान श्री कृष्ण का तो सम्पूर्ण जीवन गौ माता की सेवा और दूध दही के इर्द गिर्द घूमता हैं.


दही में पर्याप्त मात्रा में विटामिन B 12,   फोलिक एसिड़, कैल्सियम,फास्फोरस,नियासिन और लेक्टिक एसिड़ और मानव हितेषी जीवाणु मोजूद होतें हैं.

दही में पाए जाने वाले पौषक तत्व

1.एनर्जी ---- 350 kcal

2.कार्बोहाइड्रेट --- 70 ग्राम

3.लिपीड फेट --- 5 ग्राम

4.शक्कर --- 70 ग्राम

5.प्रोटीन --- 11 ग्राम

6.फैटी एसिड ---5 ग्राम

7.सोडियम--- 50 ग्राम

[प्रति 100 ग्राम]

इसके अतिरिक्त दही में कैल्शियम, फास्फोरस, और विटामिन प्रचुरता से मिलते हैं।

दही के औषधीय गुण

दही
 दही


आयुर्वेद ग्रंथों में दही के निम्न गुण बताए गए हैं

रोचनंदीपनंवृष्यंस्नेहनंबलवर्द्धनम् । पाकेअम्लमुष्णंवातध्नंमग्लंबृंहणंदधि।।पीनसेचातिसारेचशीतकेविषमज्वरे।अरुचौमूत्रकृच्छेचकाश्येर्चदधिशस्यते।।

 अर्थात दही खाने में रुचिकर,भूख बढ़ाने वाला, वीर्य को बढ़ाने वाला,शरीर में तरावट लाने वाला,बल को बढ़ाने वाला, प्रकृति में गर्म,वात नाशक,और पुष्टिकारक होता है।

दही उल्टी दस्त,विषमज्वर, भोजन में अरुचि होने पर, मूत्र की जलन में,और दुबले पतले व्यक्ति को मोटा करने में बहुत लाभकारी होता हैं।



#१. मोटापे में ताजे दही को मथकर उसमें से छाछ निकालकर अलग कर लें इस छाछ में सेंधा नमक,सोंठ, काली मिर्च मिलाकर भोजन पश्चात लेते रहनें से मोटापा नियत्रिंत हो जाता हैं.

#२.हायपोथाँयराइड़ होनें पर १०० ग्राम दही में  पाँच लहसुन की कलिया पीसकर भोजन के साथ लेना चाहियें.

#३. दस्त लगनें पर दही चावल मिलाकर लेने से दस्त तुरन्त बन्द हो जातें हैं.

#४. पीलिया रोग में दही के साथ पान की पत्तियों का रस मिलाकर पीनें से आराम हो जाता हैं.

#५.अपच होनें पर तीन चार दिन पुराना दही मिश्री मिलाकर पीयें.

#६.एसीडीटी होनें पर दही में पुदिना रस मिलाकर पी सकतें हैं.

#७. दाद खाज में बासी दही नीम की पत्तियों के रस के साथ प्रभावित स्थान पर लगायें.

#८. पीलिया होनें पर लगातार ताजे दही का सेवन करें.

#९.कब्ज की समस्या होनें पर दही नियमित रूप से सेवन करना चाहियें.

#१०. बवासीर में दही के साथ ईसबगोल या त्रिफला चूर्ण मिलाकर लेने से शर्तिया आराम मिलता हैं.

#११.गठिया, वात रोग में खट्टा दही आंवला के साथ रामबाण औषधि माना जाता हैं.

#१२. पित्त रोगों में मिश्री मिला हुआ दही श्रेष्ठ माना गया हैं.

#१३. ह्रदय रोग में दूध की बजाय वसा निकले हुए ताजे दही का इस्तेमाल करें .

#१४. दही पाचन शक्ति को बढ़ाता हैं.

#१५. वीर्य संबधित विकार होनें पर दही को भोजन में अवश्य शामिल करें.

#१६. श्वेत कुष्ठ या lucoderma में गोमूत्र के साथ सेवन करें और लगायें.

#१७.कनाड़ा के शोधकर्ताओं के अनुसार दही में उपस्थित लेक्टोबेसिलस जीवाणु एन्टी कार्सिनोम हैं,और स्तन कैंसर में बहुत प्रभावी हैं.अत: स्तन कैंसर से बचाव हेतू महिलाओं को  अपनें भोजन में दही का नियमित इस्तेमाल करना चाहियें.

१८.जो लोग दुबले पतले होते हैं उन्हें मलाई युक्त दही का नियमित सेवन करना चाहिए।


#3.दही के बाह्य प्रयोग::-

#१. बालों की जड़ों में बासी दही लगाकर दो घंटे बाद सिर धोलें बाल कालें,चमकदार और मज़बूत बनें रहेंगें.


#२. बालों में रूसी होनें पर बासी दही में निम्बू का रस मिलाकर लगायें.

#३. दही में हल्दी मिलाकर चेहरें पर लगायें चेहरा चमकदार बना रहेगा.


#४. लू या heatstroke  होनें पर  दही पूरें शरीर पर लपेटकर एक घंटे बाद साफ करें.

#५. जले हुए स्थान पर दही लगातें रहें फफोलें नही पड़ेंगें.

आयुर्वेद के अनुसार दही का सेवन कब नहीं करना चाहिए

शरदूग्रीष्मवसन्तेषुप्रायशोदधिगहिर्तम्। रक्तपित्तकफोत्थेषुविकारेषुविकारेष्वहितज्चतत्।।

 

आयुर्वेद के अनुसार दही का सेवन शरद ऋतु, ग्रीष्म ऋतु और बसंत ऋतु में दही का सेवन नही करना चाहिए। कफ रोगों से ग्रस्त होने पर भी दही का सेवन आयुर्वेद के अनुसार उचित नही होता हैं।


दही हमेशा ताजा और सही तरीके से जमा ही खाना चाहिए जो दही पूरी तरह से जमा नही होता है, यदि उसका सेवन किया जाए तो वह त्रिदोषकारक होता है।

16 जुल॰ 2016

अलसी में हैं गुणों की भरमार (Miracle health benefits of linseed)

अलसी में  हैं गुणों की भरमार (Miracle health benefits of linseed)

अलसी परिचय ::: 


अलसी एक महत्वपूर्ण खाद्य तिलहन हैं.जो रबी के मोसम में बोई जाती हैं. यह सर्वगुण सम्पन्न होने के कारण आधुनिक जानकार इसे संतुलित आहार का  दर्जा देंतें हैं.


अलसी के फायदे
अलसी

अलसी में पाए जाने वाले पोषक तत्व


1. कार्बोहाइड्रेट ---------- 28.9 mg



2.  प्रोटीन       ---------- 18.3 



3.   वसा        ---------- 42.3 mg



 ओमेगा -- 3 अल्फा लेनोलेनिक एसिड़

                          ----------- 18.1


 ओमेगा -- 6 अल्फा लेनोलेनिक एसिड़

                        ------------  7.7


4.रेशा (fibre) ----------- 27.3


5.थायमिन.       ------------ 1.64 mg


6.राइबोफ्लेविन ------------- 0.161 mg


7.नायसिन.      ------------- 3.08 mg


8. विटामिन B- 5 ----------- 0.985 mg


9.विटामिन. C.  ------------ 0.6 mg


10.कैल्सियम.   ------------- 255 mg


11. लोहा          ------------- 5.73 mg


12. मैग्निशियम ------------- 392 mg


13 फास्फोरस   -------------- 642 mg


14 पोटेशियम.   ------------- 813 mg


15 जिंक.          ------------- 4.34 mg


16 ओमेगा 3 फेटीएसिड़ ---18 प्रतिशत


इसके अलावा इसमें anti oxidant जैसे लिगनेन,लाइकोपिन,ल्यूटिन ,जियाजोन्थिन पर्याप्त मात्रा में पायें जातें हैं.


अलसी के फायदे


::: मस्तिष्क के लिये --- अलसी में पाया जानें वाला ओमेगा 3 फेटीएसिड़ मानव शरीर में प्राकृतिक रूप में नही बनता हैं.जो कि मस्तिष्क के विकास के लिये अति आवश्यक हैं.


::: ह्रदय रोग में --- अलसी का नियमित रूप से भूनकर उपयोग किया जावें तो धमनियों में खून का धक्का बननें से रोकती हैं.इसके अलावा रक्त में अच्छे कोलेस्ट्राँल (H.D.L.) का स्तर बढ़ाती हैं.जबकि खराब कोलेस्ट्राँल (L.D.L.) तथा ट्राइग्लिसराइड़ का स्तर घटाती हैं.

::: मधुमेह में  ---  इसमें पाया जानें वाला जियाजोन्थिन नामक तत्व मधुमेह के शरीर पर होनें वाले दुष्प्रभावों को नियत्रिंत करता हैं.इसके लिये अलसी को चपाती बनाने वाले आटे में मिलाकर इस्तेमाल करें.


::: त्वचा रोगों में --- दाद,खाज,खुजली या फंगल इन्फेक्शन  होनें पर अलसी का प्रयोग काफी प्रभावशाली रूप में इन समस्याओं को नियत्रिंत करता हैं,क्योंकि इसमें पाया जानें वाला लिगनेन नामक तत्व जीवाणुरोधी,फंफूदरोधी,और वायरसरोधी होता हैं.इसके लिये इसका प्रयोग खाद्य के साथ बाह्य रूप में करें.


:::: कब्ज में --- अलसी में रेशा पर्याप्त मात्रा में होता हैं,जो कब्ज, अपच,एसीडीटी को समाप्त कर देता हैं.

::: बालों की समस्या में ---

 यदि बाल बहुत अधिक झड़ रहे हैं तो सुबह शाम आधा आधा चम्मच अलसी के बीज गर्म पानी के साथ लेना चाहिए ऐसा करने से बाल झड़ना बंद हो जाते है।


अलसी का काढ़ा पीनें से असमय सफेद होने वाले बाल फिर से काले होने लगते है। 

अलसी का तेल सिर पर लगाने से बाल चमकदार,काले और घने बनते हैं।

::: कुपोषण में --- अलसी में वे सभी तत्व जैसे,विटामिन,प्रोटीन, खनिज लवण पाये जातें हैं,जो कुपोषण को खत्म करते हैं.यदि गर्भवती स्त्री अलसी का सेवन करती हैं,तो स्वस्थ, सुँदर और सुपोषित संतान का जन्म होता हैं.व माता के दूध में पर्याप्त पोष्टीकता बनी रहती हैं.


सूजन कम करनें में

अलसी में सूजन कम करनें वालें तत्व प्रचुरता में पाए जाते हैं ये सूजन पैदा करनें c reactin protein की मात्रा शरीर में कम करता हैं जिससे शरीर का सूजन कम होता हैं । 


अलसी में पाया जानें वाला तेल सम्पूर्ण स्नायुमण्ड़ल को मज़बूत बनाकर रोग प्रतिरोधकता बढ़ाता हैं.

::: कैंसर की संभावना कम करती है ---अलसी का 
काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीनें से शरीर में कैंसर कोशिकाओं के बनने की संभावना समाप्त हो जाती हैं,इसी प्रकार यदि शरीर में कोई गांठ हो तो वह अलसी का काढ़ा पीने से पिघल जाती है। 


::: 
मोटापा कम करती है अलसी --- अलसी का  
काढ़ा पीने से शरीर में मौजूद अतिरिक्त चर्बी पिघल जाती है इस तरह से यदि शरीर मोटा हो तो वह कुछ समय पश्चात दुबला होने लगता है। 


::: थाइराइड में --- सुबह 
खाली पेट अलसी का सेवन करने से हाइपोथायरायडिज्म और हाइपरथाइराइड दोनों नियंत्रित हो जातें हैं ।


अलसी के नुक़सान क्या है


वैसे तो अलसी हर परिस्थिति में फायदा ही पंहुचाती है किन्तु अलसी खाने से कुछ नुक़सान भी हो सकतें हैं जैसे

० अलसी आयुर्वेद मतानुसार गर्म प्रकृति की होती हैं अतः गर्भावस्था,नकसीर की समस्या में,अलसी का सेवन न करें।

० अलसी में फायबर प्रचुरता से पाया जाता हैं अतः जिन लोगों को पतले दस्त हो उन्हें अलसी सेवन नहीं करना चाहिए।

० अलसी से कुछ लोगों में एलर्जी की समस्या हो जाती हैं अतः ऐसे लोग अलसी का सेवन नहीं करें ।

० जिन महिलाओं को मासिक धर्म में अनियमितता होती हैं वे भी अलसी का सेवन न करें ।

० जिन लोगों को आंतों से सम्बंधित बीमारी है वे भी अलसी का सेवन न करें ।

स्वास्थ और पर्यावरण

स्वास्थ और पर्यावरण :::


बिना पर्यावरण के मानवीय जीवन असंभव हैं.हमारें आसपास मोजूद पेड़ - पौधें न केवल हमें प्राणवायु आक्सीजन देतें हैं,बल्कि भोजन से लेकर वस्त्र और अन्य मानवीय ज़रूरत जंगल ही प्रदान करतें हैं,कुल मिलाकर कहनें का यहीं तात्पर्य हैं,कि पैड़-पौधों के बिना मानवीय अस्तित्व संभव नहीं हैं. मनुष्यों की प्रकृति के प्रति बढ़ती हुई लालची प्रवृत्ति ने पर्यावरण का क्षरण तो किया ही हैं,उससे कहीं अधिक मानव नें अपना स्वंय का नुकसान कर लिया हैं,जो स्वस्थ जीवनशैली healthy lifestyle के सिद्धान्तों के पूर्णत: विपरीत हैं,आईयें जानतें हैं,मनुष्यों के स्वास्थ पर पर्यावरणीय क्षरण का क्या नुकसान होता हैं.

पर्यावरण क्षरण के नुकसान :::

वैश्यावृत्ति के बारें में जानियें


1.विश्व में ब्राजील अपनें घनें जंगलों, विविधतापूर्ण वनस्पतियों और सदा नीरा रहनें वाली नदियों (river) के कारण विश्व पर्यावरण (world environment) का फेफड़ा कहलाता हैं,लेकिन जबसे इन जंगलों,नदियों और वनस्पतियों पर मनुष्य की लालची निगाह पड़ी हैं,तभी से ये लगभग लुप्त होनें की कगार पर खड़ें हैं.सदा आक्सीजन (oxygen) से संतृप्त रहनें वाली पुण्य सलिला पृथ्वी (earth) पर अब आक्सीजन मशीन पर खड़ा होकर शुद्ध वायु  प्राप्त करनें की कोशिश में लगा हुआ हैं,लेकिन क्या कुछ घंटे के लिये आक्सीजन की उपलब्धता से स्वस्थ जीवनशैली (healthy lifestyle) प्राप्त की जा सकती हैं,निश्चित रूप से कदापि नहीं यदि मानव चाहता हैं,कि ईश्वर का दिया हुआ शरीर स्वस्थ और दीर्घायु बना रहें तो यह समुचित पैड़-पौधों और पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन के संभव नहीं हैं.

● मांडव के बारे में जानिए

2. जीव जन्तु भी स्वस्थ पर्यावरण को बनानें में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करतें हैं,लेकिन लगातार बढ़ रही मांसाहार की प्रवृत्ति ने जीव जन्तुओं के सामनें संकट़ खड़ा कर दिया हैं,शेर,गिद्ध,ओलिव रिड़ले कछुए, घरेलू गौरेया,तथा गंगा के पानी को साफ करनें वाले बैक्टेरिया लगभग विलुप्ती के कगार पर हैं.गिद्ध जो सड़े गले मांस को खाकर पर्यावरण को साफ रखते थे,एक विशेष दवा जो पशुओं के उपचार में काम आती हैं से प्रभावित मांस खाकर विलुप्त हो रहे हैं.इसी प्रकार की अनेक खतरनाक औषधियों का प्रयोग मांस उत्पादक मांस उत्पादन में करते हैं जिससे स्वाईन फ्लू (swine flu) h1N1 flu ,जैसी बीमारींयाँ  पैर पसारकर स्वस्थ जीवनशैली में बाधा बन रही हैं.

3. गर्माता हुआ वायुमंड़ल  पर्यावरणीय के साथ अनेक मानवीय नुकसान पहुँचा रहा हैं.जिनमें बाढ़,सुखा,जैसी पर्यावरणीय समस्याओं के अतिरिक्त हिम ग्लेसियरों (glacier) का तेजी से पिघलना शामिल हैं,इनके तेज़ी से पिघलनें से स्वच्छ जल के स्रोंत सिमट रहें फलस्वरूप प्रदूषित जल से होनें वाली मोंतों की सँख्या लगातार बढ़ रही हैं.हिमालय से निकलनें वाली नदियाँ गंगा,ब्रम्हपुत्र आदि विश्व की सबसे ज्यादा प्रदूषित नदियाँ बन गयी हैं,यदि जल्द इन नदियों को नहीं बचाया गया तो मानव सभ्यता सिँधु घाटी सभ्यता की तरह नष्ट हो जावेगी.


आईयें इस विश्व पर्यावरण दिवस (world environment day)पर संकल्पित होकर पर्यावरण को बचानें व स्वस्थ जीवनशैली (healthy lifestyle) के लियें एक पौधा रोपकर उसे पेड़ बनायें.

13 जुल॰ 2016

बाजरा खाने के फायदे [Benifit of bajra in hindi ]

बाजरा खाने के फायदे

बाजरे का परिचय :::


बाजरा मोटे अनाज के अन्तर्गत आता हैं.यह दिखनें में गोल रंग में हल्का सफेद होता हैं.भारत और दुनिया के अनेक देशों की यह प्रमुख खाद्य फसल हैं.जिसे मनुष्य और जानवर बड़े चाव से खातें हैं.बाजरा एक संतुलित आहार हैं.

बाजरा की पोषणीय महत्ता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र की साधारण सभा ने सन् 2023 को "अन्तरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष"घोषित किया है । अन्तरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष घोषित करने का मुख्य उद्देश्य यही हैं कि आमजन बाजरा को अपने खाद्य सुरक्षा में शामिल करें ताकि बाजरे की खेती को प्रोत्साहन मिल सकें ।




अन्तरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष 2023
 बाजरा





बाजरे की प्रकृति :::



यह शीतल,स्वाद में मधुर ,पचनें में आसान होता हैं



बाजरे में पाए जाने वाले पौषक तत्व



प्रोटीन.  वसा     रेशा     फास्फोरस

  11.6gm.   5gm.     1.2gm.            296mg




पोटेशियम.       कैल्सियम.    मैग्निशियम

   307mg.                45 mg.                          137 mg




 सल्फर.            लोहा.             सोड़ियम. 

 147mg          8.0mg.          10.9 mg






 कापर.        जिंक.      मैगनीज. 

1.06 mg.           3.1 mg.           1.15 m





मालिब्ड़ेनम.       कैलोरी        कैरोटीन.  

 0.069 mg.                 361 kc.              13micro mg





थायमिन.    राइब्लोफ्लेविन.   नायसिन

0.33 mg.            0.25 mg.                       2.3 mg





फोलिक एसिड़

  14.7 mg.                              (प्रति100gm)






बाजरा के फायदे



:::  बाजरा भारत के कई हिस्सों जैसे राजस्थान,गुजरात ,मध्यप्रदेश हरियाणा आदि राज्यों में बड़े चाव से खाया जाता हैं.कई ज़गह ये खाद्य  पदार्थ से बढ़कर सांस्कृतिक,धार्मिक रिति रिवाज का अंग बन चुका हैं,जैसे राजस्थान में शादी,पारिवारिक आयोजनों में इसके बने व्यंजन ही कुल देवता को अर्पित कर आयोजन सम्पन्न होता हैं


बाजरा वसा का बहुत अच्छा स्रोंत हैं,अत: कुपोषण से ग्रस्त शिशुओं को बाजरे की थूली (porridge) बनाकर उसमें घी मिलाकर सेवन करवानें से कुपोषण मिट़ जाता हैं.

::: दूधारू पशुओं,भारवाही पशुओं के लिये बाजरा या इसकी चरी विशेष और महत्वपूर्ण हैं,क्योंकि इसके सेवन से दूधारू पशुओं को दूध अधिक उतरता है.वहीं भारवाही पशुओं को बल प्राप्त होता हैं.



 •गर्भवती स्त्रीयों को प्रसव पूर्व और प्रसव पश्चात इसका अवश्य सेवन करना चाहियें क्योंकि इसमें मोजूद आयरन,प्रोटीन, कैल्सियम, और फास्फोरस माँ और शिशु को खून,हड्डीयों की कमज़ोरी, और प्रोटीन की कमी से बचाता हैं.


::: यह रक्त को साफ करता हैं.इसमें उपस्थित सल्फर त्वचा संबधित समस्या जैसे फोड़े फुंसियाँ, और मुहाँसे को समाप्त कर देता हैं.


::: आँखों को स्वस्थ मज़बूत और सुड़ोल बनानें में बाजरा बहुत उपयोगी होता हैं.अत:अंकुरित बाजरा सुबह के नाश्ते में अवश्य शामिल करें.


::: बाजरे का आटा,जौ का आटा,चावल का आटा 4:3:1 में मिलाकर इसे गर्मीयों में पानी मिलाकर सेवन करनें से लू ( heat stroke) में बहुत आराम मिलता हैं.चाहे तो स्वादानुसार नमक शक्कर मिला सकते हैं.


:::  यदि हड्डीयों से संबधित समस्या हो तो बाजरा की रोटी दूध के साथ सेवन करें.


::: आपरेशन के पश्चात स्वास्थ लाभ ले रहे हो तो इसकी थूली (porridge) सम्पूर्ण आहार के रूप ली जा सकती हैं.
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• बाजरे में पाए जाने वाला जिंक खनिज दस्त की रोकथाम करता है यदि दसरत लम्बे समय से बंद नहीं हो रहें हैं तो बाजरे की रोटी दही के साथ सेवन करें बहुत जल्दी दस्त बंद हो जाएंगे।

• जिन लोगों को टेकीकार्डिया यानि ह्रदय की धड़कन अनियमित हो ,ऐसा लगता हो कि ह्रदय बहुत तेजी से धड़क रहा हो तो ऐसे लोग  बाजरा का आटा और छाछ मिलाकर राबड़ी बना लें और सुबह शाम सेवन करें ।

• जिन लोगों को निम्न रक्तचाप की समस्या हो और सुबह उठते से ही चक्कर आते हो,उल्टी जैसा महसूस होता हो,ऐसे लोग रात के भोजन में बाजरा अवश्य शामिल करें। क्योंकि बाजरे में मौजूद उच्च पोटेशियम, सोडियम रक्तचाप सही रखने में मदद करता हैं ।

• बाजरा त्वचा को मुलायम और चमकदार बनाता हैं इसमें मौजूद सल्फर क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की मरम्मत करता हैं । इसके लिए बाजरा के आटे का पेस्ट बनाकर चेहरे और शरीर पर लगाना चाहिए।

• बाजरे में पाए जाने वाला कापर या तांबा शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता में बढ़ोतरी करता हैं । बाजरे को अंकुरित कर सुबह के नाश्ते में शामिल करें,रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती हैं ।


• बाजरे में पाए जाने वाला मालिब्डैनम नामक सूक्ष्म पोषक तत्व मस्तिष्क के विकास के लिए बहुत आवश्यक होता हैं इसके कमी से मानसिक विकलांगता और आंखों के दोष उत्पन्न हो जातें हैं अतः बाजरा खाने से इन बीमारियो से बचाव होता हैं ।


• जो लोग कोमा में चले जाते हैं उनके लिए बाजरा बहुत ही उपयोगी माना जाता हैं क्योंकि इसमें मौजूद मालिब्डेनम मस्तिष्क को सक्रिय रखने का काम करता हैं । अतः बाजरे के आटे की राबड़ी बनाकर कोमा में चले गए व्यक्ति को पीलांए ।

• बाजरे में पाए जाने वाला जिंक मनुष्य की स्वाद और सूंघने की क्षमता को प्रभावित करता हैं, जिंक की कमी होनें पर मनुष्य को भोजन का स्वाद और सुगंध नहीं महसूस होती हैं। अतः बाजरे का सेवन करने से स्वाद और सूंघने की शक्ति बढ़ती हैं ‌।

• बाजरा में सोडियम बहुत ही उच्च मात्रा में मौजूद रहता है, यह सोडियम मांसपेशियों के स्वास्थ लिए एक उत्तम पदार्थ है जिसके सेवन से मांसपेशियों में खिंचाव की समस्या नहीं होती हैं। 

• सोडियम रक्त में खनिज और पानी का संतुलन बनाकर रखता है इसके लिए बाजरे की रोटी दूध के साथ सेवन करें।





० बरगद पेड़ के फायदे

10 जुल॰ 2016

बढ़ती जनसँख्या बढ़ती चुनौतियाँ

दुनिया 11 जुलाई को प्रतिवर्ष "विश्व जनसँख्या दिवस " world population day  मनाती हैं.वास्तव में यह तारीख विश्व के नागरिकों को मात्र यह याद दिलानें के लिये ही हैं,कि पिछले वर्ष के मुकाबलें इस वर्ष विश्व की जनसँख्या में कितना परिवर्तन हुआ.पिछले दो दशकों के दोरान विश्व की जनसँख्या में अत्यधिक तेजी परिलक्षित हुई, सन् 2000 में जहाँ हम 5 अरब थे.


वही 2016 तक विश्व जनसँख्या 7.45 करोड़ हो गई.यही हाल भारत और दक्षिण एशिया के दूसरे विकासशील राष्ट्रों का हैं.आजादी के वक्त भारत ,बांग्लादेश,पाकिस्तान की सम्मिलित आबादी 33 करोड़ थी.आज अकेला भारत 1 अरब 30 करोड़ आबादी के साथ  चीन के बाद दूसरा बड़ी आबादी वाला राष्ट्र हैं.जो विश्व के मात्र 2.4 भोगोलिक क्षेत्रफल में विश्व की 17.5 आबादी का निवास स्थल बना हुआ हैं.


भीड़भाड़ वाला रेलवे स्टेशन
 भीड़ भाड़ वाला रेलवे स्टेशन

बढ़ती आबादी से बढ़ती चुनौतियाँ 



कृषि क्षेत्र में---- यदि वैश्विक खाद्य परिस्थितियों पर नज़र ड़ालें तो  बढ़ती आबादी ने खाद्य सुरक्षा को गंभीर चुनोंती प्रस्तुत की हैं.जिस तरह से खेतों की ज़मीन पर कांक्रीट के जंगल खड़े हो रहे हैं,उससे विश्व खाद्य और कृषि संगठन (F.A.O.) का अनुमान  सही निकलने वाला हैं,कि यदि इसी तरह खेती की ज़मीन का आवासीय परियोजना के लिये उपयोग होता रहा और आबादी इसी रफ़्तार से बढ़ती रही तो हमें हमारी खाद्य आवश्यकता दूसरे ग्रहों पर अनाज उगाकर पूरी करनी होगी.


आज विश्व के विकासशील और अल्पविकसित देश अपनी खाद्य आवश्कताओं के लियें विकसित राष्ट्रों की और देख रहे हैं,क्योंकि बढ़ती आबादी के अनुपात में प्रति हेक्टेयर उत्पादन न्यूनतम हैं.हाल ही में भारत ने दालों की कमी को आयात के जरिये पूरा करने का फैसला किया हैं.क्योंकि भारत में तमाम प्रयासों के बाद भी दाल का उत्पादन उसकी ज़रूरत के मुताबिक नही बढ़ाया जा सका ,ज़मीन के उत्पादन करने की भी एक सीमा होती हैं.एक स्तर के बाद इसमें चाहे कितनी भी टेक्नोलाजी इस्तेमाल करले उत्पादन स्थिर हो जाता हैं.


स्वास्थ क्षेत्र में ----- बढ़ती जनसँख्या नें स्वास्थ सेंवाओं तक लोगों की पहुँच को सीमित कर दिया हैं विश्व के अनेक राष्ट्र जैसे भारत,चीन, अपनी विकासदर में आशातीत वृद्धि के बावजूद स्वास्थ से सम्बंधित बुनियादी ज़रूरत मुहैया करवाने में असफल हैं.क्योंकि बढ़ती आबादी संसाधनों का दोहन शीघ्रता से करके संसाधनों की आपूर्ति में बाधा उत्पन्न करती हैं.


भारत में लगभग दस हज़ार की आबादी पर एक डाँक्टर उपलब्ध हैं,इस अंतर को कम करने के लिये हर वर्ष औसतन 10 मेड़िकल कालेज खोले जा रहे हैं परन्तु बढ़ती आबादी इस अंतर को यथावत रखे हुयें हैं.


मोलिक सुविधाओं के क्षेत्र में ----- विश्व की बढ़ती हुई आबादी ने मोलिक सुविधाओं में ज़बरजस्त वंचना पैदा की हैं.भारत तथा अन्य विकासशील राष्ट्रों में जहाँ जनाधिक्य की समस्या हैं वहाँ आधी आबादी खुले में शोच करनें को अभिशप्त हैं.स्वंय भारत में लगभग 44 प्रतिशत आबादी खुले में शोच के लियें मज़बूर हैं.यही हाल सड़को,बिजली,और पीने के पानी का हैं.


शिक्षा की बात करे तो लगभग एक तिहाई वैश्विक जनसँख्या क,ख,ग,से मिलों दूर हैं. विकसित राष्ट्र जहाँ आबादी संसाधनों के अनूकूल हैं वहाँ बच्चों को औपचारिक शिक्षा से आगे बढ़कर कम्प्यूटर ,टेक्नोलाजी का अध्ययन प्राथमिक कक्षा में ही करवा दिया जाता हैं,वही जनाधिक्य से जूझ रहे राष्ट्र में यह उच्च कक्षाओं में ही उपलब्ध हो पाती हैं.

वास्तव में विश्व की बढ़ती आबादी प्रथ्वी के अस्तित्व को भी गंभीर चुनौती हैं.अत:यदि हमें इस ग्रह को बचाना हैं,तो आईये इस विश्व जनसँख्या दिवस को संकल्प ले कि हम हमारी जनसंख्या को उपलब्ध संसाधनों के अनूकूलतम रखेगें.


कर्म और भाग्य का रोचक विश्लेषण



० यूटेराइन फाइब्राइड़

2 जुल॰ 2016

HAPPY HORMONES



दुनिया में हँसना और हँसाना सिर्फ मनुष्यों की किस्मत में नसीब हैं.लेकिन आज की तनाव भरी जिन्दगी में कई लोगों के चेहरें से हँसी खुशी गायब सी हो गई हैं.लेकिन क्या आप जानतें हैं आपके खुश रहनें के पिछे कुछ विशेष हार्मोंन उत्तरदायी होतें हैं ,यदि आप खुश रहना चाहतें हो तो आसानी से इन हार्मोंन को शरीर में बढ़ाकर तनावमुक्त जीवन का आनंद ले सकते हैं,आईयें जानते हैं ऐसें हार्मोंन और उनकों बढ़ानें के प्राचीन तरीकों के बारें में

डोपामाईन  ::

यह सामाजिक, पारिवारिक जीवन में व्यक्ति को शांत,संयमित और अच्छा महसूस करवानें वाला न्यूरोट्रांसमीट़र हैं.यदि आप अपनें लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पा रहें हैं या आपनें ऐसें बड़े लक्ष्य निर्धारित कर लियें हैं जो आपकी कार्यक्षमता से अधिक हैं तो डोपामाईन का स्तर शरीर में घट़नें लगता हैं. और मनुष्य चिड़चिड़ा ,गुस्सेल और हिंसक हो जाता हैं.लेकिन कुछ यौगिक क्रियाओं को करनें से शरीर में इसका स्तर पर्याप्त बना रहता हैं.जैसें

भ्रामरी प्राणायाम ::

इस प्राणायाम को करनें से डोपामाईन का स्तर पूर्णत:संतुलित हो जाता हैं.इसके अलावा तनाव अनिद्रा,जैसी समस्या जड़ से समाप्त हो जाती हैं.विचार और व्यहवार सकारात्मक बनता हैं.एकाग्रता बढ़ती हैं.
प्राणायाम

विधि ::


::: सर्वप्रथम तर्जनी ऊँगली को दोंनों भोंहों के मध्य लगाते हैं.

::: मध्यमा से आँखों को बन्द करें.

::: अंगूठे से कानों को बंद करके गहरे श्वास के साथ 
"ऊँ" का उच्चारण करतें हैं जिससे भँवरें के मंडरानें के समान आवाज निकालती हैं.

:::  शुरूआत तीन से चार बार करके धिरें -  धिरें बीस से इक्कीस बार तक बढा सकतें हैं.

एस्ट्रोजन :::

महिलाओं का प्रमुख हार्मोंन हैं.इसकी कमी से तनाव,सिरदर्द, और छोट़ी--छोटी़ बातों में घबराहट़,बैचेनी बढ़ जाती हैं.माहवारी अनियमित हो जाती हैं, जिससे मानसिक तनाव हो जाता हैं.आत्मविश्वास में कमी हो जाती हैं.एस्ट्रोजन को नियमित और संतुलित करनें वाला प्राणायाम निम्न हैं-

उद्गीथ प्राणायाम:::

इस प्राणायाम को नियमित रूप से करते रहनें से एस्ट्रोजन का स्तर संतुलित रहता हैं.आत्मविश्वास बढ़ता हैं.माहवारी नियमित आती हैं.

विधि:::

::: सुखासन में बैठकर आँखें बंद करलें.

::: गहरा श्वास भरकर "ऊँ" का उच्चारण करें.

::: अन्त में दोंनों हथेलियों को रगड़कर आँखों से स्पर्श करें.

आक्सीटोसीन :::

यह हार्मोंन प्यार हार्मोंन भी कहलाता हैं.इसकी कमी सम्बंधों को बिगाढ़ देती हैं,व्यक्ति परिवार ,जीवनसाथी आदि के प्रति निष्ठुर हो जाता है फलस्वरूप तलाक अलगाव जैसी समस्या जन्म लेती हैं.मनपंसद काम नही होनें से भी इसका स्त्राव कम हो जाता हैं.इसको बढ़ानें वाला प्राणायाम निम्न हैं ::
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अनुलोम -- विलोम ::

यह प्राणायाम आक्सीटोसीन का स्तर बढ़ाकर व्यक्ति में प्रेम,ममता और संतुष्टी का स्तर बढ़ाता हैं.और काम में रूचि पैदा करता हैं.

विधि :::

::: सर्वपृथम दाहिनें हाथ के अंगूठे से दाहिनी नासिका का छिद्र बन्द करते हैं और बांयी नासिका से श्वास गहरा श्वास लेतें हैं.

::: अब बांयी नासिका को तर्जनी और मध्यमा से बंद कर दाहिनी नासिका से श्वास छोड़तें हैं.

::: यह योगिक क्रिया दस से पन्द्रह मिनिट तक कर सकतें हैं.धिरे धिरे समय में इच्छानुसार बढ़ोतरी कर सकतें हैं.

इस प्राणायाम से ह्रदय रोग भी दूर होतें हैं.इसके अलावा कुड़लिनी जागरण,नेत्र ज्योति बढ़ती हैं.इसको नियमित रूप से करनें से शरीर से समस्त विषेैले पदार्थों बाहर निकल जातें हैं.


सिरोटोनिन :::

 यह मनुष्य को अच्छा,खुशमिजाज रखनें वाला न्यूरोट्रांसमीटर हैं.इसका स्तर घट़नें पर मनुष्य आलसी,बेपरवाह और आत्महत्या करने वाला तक हो सकता हैं.इस हार्मोंन को बढ़ानें वाला आसन निम्न हैं.

कपालभाँति :::


इस योगिक क्रिया से सिरोटोनिन का स्तर बढ़नें के अतिरिक्त वज़न नियत्रिंत होता हैं.श्वास रोग,एलर्जी, पेट़ के समस्त रोग नष्ट हो जातें हैं.

विधि :::

:::  सुखासन में बैठकर मध्यम गति से श्वास बाहर की और निकालते हैंं.श्वास लेते नहीं हैं,बल्कि श्वास अपने आप अन्दर चला जाता हैं.

::: शरूआत दस बारह बार से करके धिरें धिरें बढ़ायें.

::: इस आसन को खाली पेट़ ही करें.

प्रोजेस्ट्रोन :::

मनुष्यों को लंबी बाधारहित नींद सुलानें के लियें यही हार्मोंन जिम्मेदार माना जाता हैं..इसके अलावा स्त्रियों में मासिक धर्म से संबधित परेशानियों के लिये यही हार्मोंन उत्तरदायी होता हैं.इसका स्तर संतुलित रखनें के लिये प्राणायाम हैं::::

शवासन ::: 

यह समस्त प्रकार की मानसिक समस्या और तनावों को दूर कर शरीर के समस्त हार्मोंन को संतुलित रखनें वाला आसन हैं.

विधि :::

::: जमीन पर लेट जावें और दोनों पावों ,दोनों भुजाओं को फैला लें.

::: शरीर को शव के समान ढीला छोड़ दें.तत्पश्चात आँखे बंद कर गहरा श्वास लें और धिरें धिरें छोड़ें.

::: यह आसन पन्द्रह मिनिट से अपनी सामर्थ्यानुसार बढ़ाते रहें.

यह कुछ योगिक क्रियाएँ हैं जो शरीर में हार्मोंन का स्तर संतुलित करती हैं,इसके अलावा मनपसंद संगीत सुनने,मनपसंद जगह घुमनें,मनपसंद व्यक्ति के साथ समय गुजारनें  तथा स्वस्थ खानपान की आदतों से भी शरीर में हार्मोंन संतुलित रहकर बीमारी दूर रहती हैं.अत: हमें हर समय सकारात्मक चिंतन करते हुये अपनें आसपास के माहोल को भी हँसी ठहाकों से लबरेज रखना चाहियें. किसी ने कहा भी हैं....जीनें के है चार दिन बाकि सब बेकार दिन......... ॉॉॉ

० गिलोय के फायदे

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टाप स्मार्ट हेल्थ गेजेट्स इन हिंदी। Top smart health gadgets

Top smart health gadgets।टाप स्मार्ट हेल्थ गेजेट्सस इन हिंदी  कोरोना काल में स्वास्थ्य सुविधाओं पर जितना दबाव पैदा हुआ उतना शायद किसी भी काल...