26 दिस॰ 2020

फंगल इन्फेक्शन। fungal infection। प्रकार, कारण, लक्षण और उपचार

फंगल इन्फेक्शन।fungal infection। प्रकार, कारण, लक्षण और उपचार

भारत समेत दुनियाभर के चिकित्सक और वैज्ञानिक इस समय फंगल इन्फेक्शन fungal infection के बदलते रूप और फंगल इन्फेक्शन fungal infection के घातक होते प्रभाव को लेकर बहुत चिंतित हो रहें हैं ।

 फंगल इन्फेक्शन का यह घातक रूप त्वचा,आँख,फेफडों,रक्त,हड्डी तक को निशाना बना रहा हैं । ऐसे समय में सबसे जरूरी हो जाता हैं कि fungal infection के प्रकार को समझकर फंगल इन्फेक्शन का इलाज fungal infection ka ilaj किया जावें ।

 तो आईयें फंगल इंफेक्शन के बारें में ,फंगल इन्फेक्शन के कारण,लक्षण, प्रबंधन और फंगल इन्फेक्शन के घरेलू उपचार के बारें में 

फंगल इन्फेक्शन fungal infection क्या होता हैं ?


फंगस जल,प्रथ्वी,आकाश में रहनें वाला अतिसूक्ष्म जीव हैं कुछ फंगस मानव,पशु,पौधों के लिए उपयोगी होतें हैं तो कुछ फंगस मनुष्य को नुकसान पहुँचानें वाले होतें हैं । 

यदि मनुष्य का प्रतिरोधक तंत्र हानिकारक फंगस से लड़नें में अक्षम हो जाता हैं तो फंगस मनुष्य को बीमार बना देतें हैं । ये फंगस प्रभावित व्यक्ति के भौतिक सम्पर्क,संक्रमित वस्तुओं के उपयोग से फैलतें हैं ।

फंगल इन्फेक्शन के प्रकार Types of fungal infection :::


 ब्लैक फंगस [Black fungus]  

ब्लैक फंगस बीमारी एक फफूंदजनित संक्रमण है जिसे म्यूकरमाइकोसिस या जाइगोमाइकोसिस के नाम से जाना जाता है। ब्लैक फंगस आमतौर पर बहुत कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले व्यक्तियों को प्रभावित करता है। ब्लैक फंगस आंख,नाक,और मस्तिष्क को अधिक प्रभावित करता है। मानव में होने वाला फंगल इंफेक्शन "राइजोपस ऐरिजुस" नामक म्यूकोरेसी परिवार के फंगस से फैलता है। 

कुछ अन्य प्रकार के फंगस भी है जैसे कनिंगमेला,बर्थोलेटिया,एपोफाइसोमाइसिस एलिगेंस,एबिसिडिया स्पेशीज,सकसेनिया स्पेशीज,राइजोम्यूकार प्यूसीलस,एंटोमोपेथोरा स्पेशीज,कंडिय़बोलस स्पेशीज,बेसिडियोबोलस जो कि फंगल इंफेक्शन के लिए जिम्मेदार होते है।

ब्लैक फंगस बीमारी क्या होती है। ब्लैक फंगस के लक्षण, कारण और बचाव
ब्लैक फंगस


ब्लैक फंगस के लक्षण

ब्लैक फंगस होने पर कुछ आम प्रकार के लक्षण उभरते हैं जैसे

नाक,आंख और मस्तिष्क में संक्रमण होने पर

• नाक से काला तरल पदार्थ निकलता है
• नाक के अन्दर और आंखों में काली पपड़ी जमना
• आंखों का लाल होना,पानी आना और सूजन आना
• नाक बंद होना
• नाक के आसपास साइनस में सूजन और दर्द

फेफड़ों में ब्लैक फंगस का संक्रमण होने पर लक्षण

• फेफड़ों में दर्द
• खांसी
• बुखार
• श्वास चलना

पेट में ब्लैक फंगस का संक्रमण होने पर लक्षण

• पेटदर्द होना
• उल्टी के साथ खून आना

त्वचा में ब्लैक फंगस का संक्रमण होने पर लक्षण

• फोड़े होने के कुछ समय बाद फोड़ा काला हो जाता है और इसका आकार बढ़ने लगता है।

इसके अतिरिक्त ब्लैक फंगस होने पर चक्कर आना, कमजोरी महसूस होना जैसे लक्षण प्रकट हो सकते है।

ब्लैक फंगस रोग होने के कारण

ब्लैक फंगस के spore मिट्टी, सड़ी हुई लकड़ी, पत्तों ,बडे़ हुए फल सब्जी आदि में मौजूद रहते है और यदि बेहद कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाला व्यक्ति इनके सम्पर्क में आ जाता हैं तो वह संक्रमित हो जाता हैं उदाहरण के लिए एड्स संक्रमित व्यक्ति, अनियंत्रित मधुमेह वाला व्यक्ति, अस्थमा या  टीबी का मरीज,अंगप्रत्यारोपण आपरेशन के बाद इससे उबर रहा व्यक्ति ,लम्बे समय तक ICU में रहा व्यक्ति

ब्लैक फंगस कभी भी व्यक्ति से व्यक्ति के संपर्क में आने से नहीं फैलता है।

आजकल कोविड 19 से संक्रमित होने के बाद ठीक हो रहें व्यक्ति ब्लैक फंगस के सबसे आम शिकार बन रहें हैं चूंकि कोविड़ 19 में प्रयोग किए जा रहे स्टेराइड व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता को दबा देते हैं अतः ब्लैक फंगस बहुत तेजी से फेफड़ों,आंख,नाक में पहुंचकर फैल जाता है और जानलेवा बन जाता है।

भारत में कुछ विशेषज्ञों ने पुराने अध्यनों के आधार पर ब्लैक फंगस होने के कुछ अन्य संभावित कारणों का पता लगाया है जिसके अनुसार ब्लैक फंगस उन लोगों को अधिक प्रभावित करता है जिन्होंने इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए जिंक सप्लीमेंट और आयरन सप्लीमेंट का अधिक इस्तेमाल करते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक ब्लैक फंगस को पनपने के लिए जिंक और आयरन सप्लीमेंट एक आदर्श वातावरण प्रदान करता है ।

ब्लैक फंगस से बचाव कैसे करें 

ब्लैक फंगस बहुत आम बीमारी नहीं है बल्कि यह बहुत कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले व्यक्तियों को ही प्रभावित करती हैं अतः ऐसा बिल्कुल भी नही है कि यह बीमारी उन सभी व्यक्तियों को हो सकती है जो कोविड 19 से ठीक होकर बाहर निकलें हैं ।

ब्लैक फंगस को शुरुआती स्तर पर पहचानना बहुत आवश्यक है, नहीं तो यह बाद में जानलेवा साबित हो सकती हैं इस बीमारी की शुरूआती स्तर पर पहचान नही होने का सबसे बड़ा कारण व्यक्ति को होने वाली अन्य बीमारी भी है चूंकि व्यक्ति अन्य बीमारी जैसे कोविड 19 से जूझ रहा होता हैं और उसी दौरान ब्लैक फंगस के कोविड समान लक्षण उभरते हैं जिसे पोस्ट कोविड सिंड्रोम मानकर इलाज किया जाता है कुछ दिन के बाद जब लक्षण गंभीर हो जातें हैं तो जांच शुरू होती हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती हैं।

अतः ऐसे व्यक्ति गंभीर बीमारी से उबर रहे हो, जिन्होंने हाल ही में स्टेराइड की अधिक मात्रा ली हो लक्षणों को शुरुआती स्तर पर ही पहचान कर उपचार शुरू करें।

ब्लैक फंगस से बचाव हेतू सुबह शाम नीम,से मंजन करें,फिटकरी,नमक या हल्दी को गर्म पानी में डालकर गरारे करें। 

नाक में नारियल तेल या अणु तेल की दो बूंद डालें।



आज मानव जाति के सामने सबसे बड़ी चुनौती नित नई बीमारियों से पार पाने की बन गई है लेकिन सवाल भी बहुत अधिक खड़े
 हो रहे हैं क्या वायरस,बेक्टेरिया, फफूंद अभी नये नये इस प्रथ्वी पर आये हैं, नहीं ना ,अरे ये तो तब से मानव के साथ है जब से मानव का प्रथ्वी पर अस्तित्व है और तब तक मानव के साथ प्रथ्वी पर रहेंगे जब तक कि मानव का अस्तित्व प्रथ्वी पर है इनमें से कुछ मनुष्य के लिए लाभकारी रहें हैं तो कुछ हानिकारक,अब ये मनुष्य को तय करना है कि वह हानिकारक वायरस,बेक्टेरिया और फफूंद से किस प्रकार निपटना चाहता है। यदि हम वायरस बेक्टेरिया और फफूंद द्वारा मनुष्य को संक्रमित करने के बाद इसका उपचार करने की विधि से निपटेंगे तो हो सकता है कुछ जीवन हमें कुर्बान करना पडे़ और हो सकता है इस विधि में संपूर्ण मानवजाति को खतरा पैदा हो जाए। 

दूसरी विधि है मनुष्य की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को इतना उन्नत रखा जाये जैसा कि प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथों में वर्णित है और हमारे पूर्वजों ने भी इसका समर्थन करते हुए कहा है कि प्रथ्वी पर मानवजाति को लम्बे समय तक जिंदा रहना है तो सूक्ष्मजीवों के बीच रहकर "योग्यत्तम की उत्तरजीविता"वाला सिद्धांत अपनाना होगा। जिसमें हार हमेशा हानिकारक वायरस, बेक्टेरिया और फफूंद की ही हो ।

० एथलीट फूट फंगल Athletic foot fungal ::


फंगल इंफेक्शन
फंगल इंफेक्शन



एथलीट फूट बहुत प्रचलित और आम प्रकार का फंगल इन्फेक्शन हैं । जो विश्व की बहुत बड़ी आबादी में फैला हुआ हैं ।

इस फंगल इन्फेक्शन को फैलानें वाले फंगस का नाम टीनिया पेडिस Tinea pedis हैं ।यह फंगस गर्म नमी वाले स्थानों,जूतों मोजों और पांवों की उंगलियों में बहुत तेजी से फैलता हैं ।

एथलीट फूट के लक्षण :::


० फंगल प्रभावित अंग का लाल होना ।

० त्वचा पर सफेद परत जमना जो धीरें धीरें त्वचा को तोडना शुरू कर देती हैं ।

० खुजली चलना 

० त्वचा की परत निकलना।

० प्रभावित भाग में जलन होना ।

० फंगल प्रभावित भाग में सूजन आना ।

एथलीट फूट का इलाज और रोकथाम :::


० फंगल इन्फेक्शन होनें पर प्रभावित भाग को अच्छे एंटीफंगल साबुन या फिटकरी से साफ करना चाहियें ।

० फंगस प्रभावित जगह को सूखा रखें क्योंकि गीली त्वचा या नमी वाली त्वचा फंगस को बजनें की आदर्श जगह होती हैं ।

० इस्तेमाल से पूर्व जूतों,मोजों को गर्म पानी में धोकर अच्छी धूप में सूखा लें ।

० जूतों की बजाय चप्पल या सेंडल पहनें ।

० फंगल इंफेक्शन होनें पर अच्छे एंटीफंगल क्रीम या डस्टिंग पावड़र का प्रयोग प्रभावित भाग पर लगानें हेतू करें ।

यीस्ट फंगल इंफेक्शन Yeast fungal infection



फंगल इंफेक्शन




यीस्ट फंगल इंफेक्शन yeast fungal infection केंडिडा एलबिकंस candida albicans नामक फंंगस से फैैैैलता हैं । 

यीस्ट फंगल इन्फेक्शन महिलाओं के जननांगों में ,बच्चों के जननांगों के आसपास और नाखूनों में अधिक तेजी से फैलता हैं । महिलाओं में यह इंफेक्शन होनें से योनि का सामान्य PH level प्रभावित होता हैं ।

यीस्ट फंगल इन्फेक्शन फैलनें का प्रमुख कारण हैं ।

• एंटीबायोटिक्स का अत्यधिक इस्तेमाल ।

• अत्यधिक तनाव ।

• हार्मोनल असंतुलन होना ।

• असंतुलित भोजन ।


यीस्ट फंगल इन्फेक्शन लक्षण :::


० योनि मार्ग से बदबूदार सफेद स्त्राव होना ।

० योनि में खुजली होना ।

० योनि के आसपास लाल होना ।

० योनि में सूजन होना ।

० intercourse सहवास के दौरान दर्द होना ।

० पैशाब करते समय दर्द होना ।

० बच्चों में जांघों और कमर के निचले भाग में लालिमा होना ।

० नाखून भद्दे दिखाई देना । 


• 9 नेचुरल सुपरफूड फार हेल्दी वेजाइना


यीस्ट फंगल इन्फेक्शन का इलाज और रोकथाम


प्रारंभिक अवस्था में पहचान होनें पर यीस्ट फंगल इंफेक्शन का इलाज और रोकथाम बहुत आसान हैं । इस बीमारी के प्रभावी उपचार के लिए एंटीफंगल वेजाइन क्रीम, एंटीफंगल दवाई आदि का प्रयोग किया जाता हैं । और बीमारी को फैलनें से रोकनें के लिए निम्न उपाय करें 

० योनि मार्ग की साफ सफाई का समुचित ध्यान रखना चाहिए इसके लियें फिटकरी, नीम,साबुन आदि का प्रयोग करना चाहियें।

० महिलाओं को अंतवस्त्र अच्छे तरीके से गर्म पानी में धोकर और धूप में सुखाकर प्रयोग करना चाहिए ।

० भोजन संतुलित होना चाहिए जिसमें पर्याप्त मात्रा में फल,सब्जी और दालें हो ।

० पानी पर्याप्त मात्रा में पीये ।

० नाखूनों की साफ सफाई का ध्यान रखें और इनकी नियमित सफाई करतें रहें ।


जोंक इच Jock itch


जोंक इच जननांगों के आसपास,जांघो पर बगल में और ऐसे भाग जहाँ नमी बनी रहती हैं में बहुत तेजी से फैलता हैं ।

जोंक इच के लिए उत्तरदायी फंगस का नाम Tinea cururis हैं ।

जोंक इच भी सीधे सम्पर्क से फैलता हैं ।

लक्षण 

० जांघों ,जननांगों के आसपास, जोडों पर लालिमा युक्त सूजन होना ।

० खुजली चलना ।

० त्वचा पर गोल घेरेयुक्त उभरी हुई संरचना उभरना ।

० त्वचा फटना ।

० त्वचा से पपडी निकलना ।

रिंगवर्म Ringworm


Tinea corperis


त्वचा,सिर,तथा शरीर के अन्य भागों में फैलनें वाला यह बहुत आम इन्फेक्शन हैं । इस फंगल इंफेक्शन के लिए उत्तरदायी फंगस का नाम Tinea corperis हैं । 

टीनिया कार्पेरिस मृत त्वचा Dead skin,नमी वाले स्थानों,मिट्टी आदि पर पाया जानें वाला फंगस हैं । यह फंगल इंफेक्शन पालतू जानवरों को भी प्रभावित करता हैं ।

रिंगवर्म के लक्षण 


० रिंगवर्म ringworm बहुत आसानी से पहचाना जानें वाला फंगल इन्फेक्शन हैं यह शरीर के विभिन्न भागों पर गोल उभरे हुए घेरे के रूप दिखाई देता हैं ।

० रिंगवर्म फंगल इंफेक्शन के आसपास खुजली चलती हैं और त्वचा लाल हो जाती हैं ।

प्रबंधन 


० रिंगवर्म फंगल इंफेक्शन को फैलनें से रोकनें के लिए संक्रमित व्यक्ति के तौलिये, साबुन,कपडे आदि का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए ।

० प्रभावित भाग की साफ सफाई और संतुलित भोजन का प्रयोग करना चाहिए जिससे प्रतिरोधक क्षमता बनी रहें ।

म्यूकर  माइकोसिस फंगल इंफेक्शन  या ब्लैक फंगस



कोविड़ -19 पीड़ित व्यक्ति के बीमारी से उभरनें के बाद होनें वाला यह फंगल इंफेक्शन नाक कान गला आँख और मस्तिष्क तक फैल रहा हैं । 

संक्रमण घातक होनें पर व्यक्ति की मृत्यु तक हो जाती हैं । इसे ब्लेक फंगल इंफेक्शन Black fungal infection के नाम से भी जाना जाता हैं ।

• मोतियाबिंद के बारे में जानकारी

म्यूकर माइकोसिस फंगल इंफेक्शन का लक्षण


० म्यूकर माइकोसिस फंगल इंफेक्शन से प्रभावित नाक के अंदरूनी भाग पर पपड़ी जम जाती हैं । नाक बंद होती हैं ।

० गालों पर सूजन आना और गालों का सुन्न होना ।

० आँख लाल होना ।

० प्रभावित भाग की त्वचा का गलना ।

म्यूकर माइकोसिस फंगल इंफेक्शन का कारण 


० प्रतिरोधक क्षमता में कमी होना ।

० स्टेराइड दवाई का अधिक प्रयोग

० ह्रदय रोग,डायबिटीज़ का उच्च स्तर 

प्रबंधन 

० म्यूकर माइकोसिस फंगल इंफेक्शन को रोकने के लिए बीमारी की शुरूआत से ही पहचान कर उपचार शुरू कर देना चाहिए ।

० इन्फेक्शन गंभीर होनें पर प्रभावित भाग को सर्जरी कर निकालना पड़ता हैं ।

मधुमेह, ह्रदयरोग का नियत्रंण संक्रमण की रोकथाम के लिए अति आवश्यक हैं ।


कैंडिडा आँरिस candida oris या व्हाईट फंगस



कैंडिडा आँरिस या व्हाईट फंगस जापान से पैदा हुआ फंगस का एक प्रकार हैं जो क्लोरोहैक्सीडीन और ब्लीच जैसें ताकतवर कीटाणुनाशक के प्रयोग के बाद भी जीवित रहता हैं । 

कैंडिडा आँरिस त्वचा के साथ साथ खून में भी विधमान रह सकता हैं । यह बहुत घातक और जानलेवा फंगल इंफेक्शन हैं । इस फंगल इंफेक्शन से ग्रसित 100 में से 50 मरीजों की मृत्यु हो जाती हैं ।

कैंडिडा आँरिस त्वचा पर, अस्पतालो के ICU में बहुत लम्बें तक जीवित रह सकता हैं ।

कैंडिडा आँरिस कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वालों,बच्चों,मधुमेह रोगीयों,और अत्यधिक एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल करनें वालों को बहुत तेजी से अपनी चपेट में लेता हैं। 


कैंडिडा आँरिस फंगल इंफेक्शन के लक्षण 



० प्रभावित त्वचा का लाल होना ।

० बुखार आना ।

० थकान होना ।

० बदन दर्द होना ।

कैंडिडा आँरिस का कारण 


० कैंडिडा आँरिस फंगल इंफेक्शन साधारण फंगस का बहुत उन्नत प्रकार हैं जो एंटीबायोटिक्स और एंटीफंगल दवाओं के अत्यधिक इस्तेमाल से इस प्रकार के वातावरण में अपने आप को जीवित रखनें का आदी हो जाता हैं ।और व्यक्ति को अपनी चपेट में लेकर बीमार कर देता हैं ।

० कैंडिडा आँरिस फंगल इन्फेक्शन का दूसरा कारण फसलों में बहुत अधिक प्रयोग होनें वाला फंगीसाइड हैं ,फंगीसाइड की अधिकता के कारण यह फंगल ऐसे वातावरण प्रतिरोधी हो जाता हैं । और मानव में फैलकर उन्हें बीमार बना रहा हैं ।

प्रबंधन


० कैंडिडा आँरिस की शुरूआती स्तर पर पहचान होना बहुत आवश्यक हैं यदि शुरूआत में इसका उचित उपचार कर लिया जाए तो यह ठीक हो जाता हैं स्थिति गंभीर होनें पर प्रभावित अँग काटना पड़ता हैं । यदि संक्रमण मस्तिष्क तक पहुँत जाता हैं तो मृत्यु तक हो सकती हैं ।


एस्पेरिगिल्स फ्यूमिंगटस फंगल इंफेक्शन 


एस्पेरिगल्स फ्यूमिंगटस फंगस भी कैंडिडा आँरिस प्रकार फंगस हैं । जो दवाओं के खिलाफ बहुत आक्रामक प्रतिरोधकता दर्शाता हैं । इस प्रकार के फंगल इंफेक्शन से दुनियाभर में प्रतिवर्ष दो लाख लोगों की मृत्यु हो जाती हैं ।

एस्पेरिगल्स फ्यूमिंगटस फंगस सडें गले खाद,खराब सब्जियों से मानव में फैलता हैं ।


फंगल इंफेक्शन का घरेलू उपचार home remedy for fungal infection


फिटकरी

फिटकरी अति उत्तम फँगसरोधी घरेलू दवा हैं । फिटकरी का प्रयोग त्वचा पर फँगस को रोकने के लिए किया जा सकता हैं । दिन में दो तीन बार फिटकरी को फंगस प्रभावित त्वचा पर पानी के साथ मिलाकर लगाना चाहिए ।

ग्रीन टी Green Tea 

ग्रीन टी में मोजूद एंटीऑक्सीडेंट Antioxidant शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर फंगस का सफाया कर देतें हैं । इसके लिए ग्रीन टी को खाली पेट दिन में दो बार पीना चाहियें। 

ग्रीन टी की पत्तियों को पीसकर फंगल प्रभावित भाग पर लगानें से भी संक्रमण रोका जा सकता हैं ।

रतनजोत

रतनजोत रेल की पटरियों, खेतों की मेड पर ,जंगलों में उगनें वाला विषैला पौंधा हैं जिसके बीज बहुत जहरीलें होतें हैं । 

रतनजोत के बीजों का तेल फंगल इंफेक्शन से प्रभावित भाग पर लगानें से फँगल इन्फेक्शन बहुत जल्दी समाप्त होता हैं ।

रतनजोत के पौधों से निकला दूध भी बहुत अच्छा फंफूदरोधी होता हैं । रतनजोत का दूध फंगस प्रभावित भाग पर लगानें से बहुत जल्दी फंगस समाप्त हो जाती हैं । 

रतनजोत के पौधें का दूध और तेल लगानें में सावधानी रखना चाहिए और इन पदार्थों से  संवेदनशील त्वचा होनें पर प्रयोग नहीं करना चाहिए ।

चाय पत्ती 

घरों में बनने वाली चाय की पत्तियाँ फंगस प्रभावित सिर की त्वचा पर लगानें से फंगस समाप्त हो जाता हैं । इसके लिए चार चम्मच चाय पत्ती को आधा लीटर पानी में उबालकर इस उबले हुये पानी से सिर धोना चाहिए ।

एलोवेरा 

ऐलोवेरा जेल फंगस से प्रभावित कटी फटी त्वचा की मरम्मत करता हैं । ऐलोवेरा से गुदा निकालकर इसमें थोडा सा नारियल तेल मिलाकर त्वचा पर लगानें से कटी फटी त्वचा की मरम्मत होकर फँगस संक्रमण नियंत्रित होता हैं ।

नारियल तेल coconut oil

नारियल तेल फंगल इंफेक्शन से प्रभावित त्वचा की खुजली ,सूजन और त्वचा के लालपन में बहुत तीव्र आराम प्रदान करता हैं ।

नारियल तेल को सीधे फंगल इंफेक्शन से प्रभावित त्वचा पर दिन में दो बार लगाना चाहियें ।

हल्दी 

हल्दी बहुत उत्तम एंटीसेप्टिक, एँटीफँगल और रक्त शोधक होती हैं । प्रतिदिन एक चम्मच हल्दी सुबह शाम गुनगुने जल के साथ लेनें से रक्त साफ होकर त्वचा में निखार आता हैं और फंगल इंफेक्शन बहुत तेजी से खत्म होता हैं ।

हल्दी रक्त में फैलें फंगस को भी समाप्त कर देती हैं ।

हींग 

हींग उत्तम रक्तशोधक मानी जाती हैं। हींग को भोजन में शामिल करने से फंगल इंफेक्शन होनें की संभावना नहीं होती हैं ।

दही


दही में मौजूद लैक्टिक एसिड़ lactic acid फंगल इंफेक्शन को समाप्त कर देता हैं । यदि फंगल इंफेक्शन से प्रभावित त्वचा,नाखून और सिर की त्वचा पर दही लगाया जाए तो फंगल इंफेक्शन जड़ से समाप्त हो जाता हैं ।

लहसुन Garlic


लहसुन में सल्फर नामक तत्व पाया जाता हैं यह यौगिक खुजली,फंगल इंफेक्शन और त्वचा संबधित बीमारी में बहुत शीघ्र आराम प्रदान करता हैं ।
लहसुन के पत्तों को फंगल इंफेक्शन से प्रभावित नाखून,त्वचा पर लगानें से शीघ्र राहत मिलती हैं ।

नीम


नीम की छाल,पत्ती,फल एंटीसेप्टिक गुणों से युक्त होतें हैं । नीम का तेल फंगल इंफेक्शन पर लगाना चाहिए।

० पंचनिम्ब चूर्ण 


नीम की छाल पानी में घीसकर फंगल इंफेक्शन पर लगानें से बहुत शीघ्र आराम मिलता हैं ।

नीम की पत्तियों से बना चूर्ण सुबह शाम एक एक चम्मच लेनें से रक्त साफ होकर त्वचा निरोगी बनी रहती हैं ।

अदरक 

अदरक एंटीइंफ्लेमेटरी गुणों से संपन्न होता हैं । अदरक के दैनिक प्रयोग से डायबिटीज भी नियंत्रित होती हैं । अत: ऐसे फंगल इंफेक्शन से पीड़ित मरीज जिन्हें डायबिटीज़ भी हो को अदरक का सेवन करना चाहिए ।

अदरक को चाय में डालकर या इसका अचार बनाकर दैनिक जीवन में प्रयोग करना चाहिए।

शहद 

शहद एंटीसेप्टिक के साथ एंटीऑक्सीडेंट पदार्थ हैं जो कि फंगस के विरूद्ध प्रभावी प्रतिरोधकता प्रदान करता हैं ।

सुबह शाम शहद मिश्रित पानी पीनें से फंगस के विरूद्ध शरीर में प्रतिरोधकता बढती है ।


आंवला


आयुर्वेद चिकित्सा में सर्वोत्तम महत्व रखता हैं । नियमित आँवला सेवन करने वाला व्यक्ति कभी बीमार नही होता हैं । 

फंगल इंफेक्शन से बचने के लिए नियमित रूप से आँवलें का सेवन करना चाहिए ।

० बाकुची के फायदे






22 दिस॰ 2020

कोरोनावायरस नई नस्ल Corona virus new strain जानियें ब्रिटेन में वायरस किस तरह बदला

 कोरोनावायरस नई नस्ल Corona virus new strain :::




भारत में एक ओर कोरोनावायरस फैलनें की रफ्तार धीरें धीरें कम हो रही हैं । वहीं सूदूर यूरोप के देशों जैसें इटली, डेनमार्क ,नीदरलैंड और आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका में कोरोनावायरस के नए स्ट्रेन Corona virus new strain नें आमजनों के साथ चिकित्सा विशेषज्ञों को गंभीर चिंता में डाल दिया हैं । क्योंकि कोरोनावायरस का यह नया स्ट्रेन corona virus new strain पहले के कोरोनावायरस से 70 प्रतिशत अधिक संक्रामक है । तो आईयें जानतें हैं कोरोनावायरस के स्ट्रेन में बदलाव किस प्रकार का आया हैं ।
कोरोनावायरस के नए स्ट्रेन Corona virus new strain नें आमजनों के साथ चिकित्सा विशेषज्ञों को गंभीर चिंता में डाल दिया हैं ।
कोरोनावायरस



कोरोनावायरस का नया स्ट्रेन Corona virus new strain




कोरोनावायरस के नए स्ट्रेन में बदलाव मुख्यत: वासरस के स्पाइक प्रोटीन spike protien से जुड़ा हुआ हैं । स्पाइक प्रोटीन वायरस की बाहरी संरचना होती हैं जो मनुष्य की स्वस्थ्य  कोशिकाओं से चिपककर उन्हें संक्रमित कर देती हैं । 


ब्रिटेन के शोधकर्ताओं नें कोरोनावायरस वायरस के इस नए बदलाव को या म्यूटेशन को N 501 Y नाम दिया हैं । जो ब्रिटेन के 11 सौ लोगो में पाया गया है । 



कोरोनावायरस में बदलाव क्यों हो रहा हैं ?



कोरोनावायरस सार्स कोविड 2 सिंगल आरएनए वायरस हैं ।  इस वायरस में बदलाव तब होता हैं जब वायरस अपनी कापी बनानें में गलती करता हैं । इस वायरस के स्ट्रेन में बदलाव की वजह अन्य वायरस की तरह ही बहुत सामान्य हैं जिसमें वायरस कुछ समय बाद अपना स्वरूप बदलकर सामनें आता हैं ।




क्या इस समस्या के बाद कोरोनावायरस वैक्सीन निष्प्रभावी हो जाएगी ?



जी नहीं, माडर्न,फाइजर,और आक्सफोर्ड यूनिवर्सटी की एस्ट्रोजेनेका वैक्सीन स्पाइक प्रोटीन को Target करते हुए बनी हैं । इन वैक्सीन के लगने के बाद जो एँटीबाडी Antibody बनती हैं वह स्पाइक प्रोटीन को नष्ट कर वायरस को बढ़ने से रोकती हैं । अत: यह कहना की वायरस की संरचना में बदलाव के बाद वैक्सीन निष्प्रभावी हो जाएगी बहुत जल्दबाजी होगी । हाँ,इतना जरूर हैं कि कोरोनावायरस का नया स्ट्रेन पुरानें वायरस के मुकाबले बहुत अधिक संक्रामक है ।



वैज्ञानिकों का मत हैं कि चाहें कोरोनावायरस हो या अन्य वायरस इनमें बदलाव या म्यूटेशन की प्रक्रिया चलती रहेगी हमारा प्रतिरक्षा तंत्र नए वायरस के प्रति सक्रिय होकर वायरस को खत्म कर देगा या फिर वैक्सीन वायरस को फैलने से रोकेगी ।




० लहसुन के फायदे और नुकसान













20 दिस॰ 2020

गर्भावस्था के प्रथम तीन माह में किये जानें वाले योगासन और गर्भावस्था में खानपान pregnancy yoga in hindi and Diet plan for pregnancy in hindi

 "गर्भावस्था के प्रथम तीन माह में किये जानें वाले योगासन pregnancy yoga in hindi" :::



गर्भावस्था किसी भी स्त्री के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता हैं । भारत के सभी समाजों में गर्भावस्था के साथ स्त्री को संपूर्ण माना जाता हैं


माँ बनने के इस चरण में या गर्भ धारण करनें के दौरान स्त्री के शरीर में कई हार्मोनल बदलाव होतें हैं । शरीर में थकावट, चेहरा निस्तेज,जी मचलाना,उल्टी होना,भूख नहीं लगना जैसी समस्या गर्भावस्था के दौरान बहुत ही आम बन जाती हैं । कुछ समय तक तो ये समस्याए ठीक मानी जाती हैं किंतु लम्बें समय तक गर्भवती को यह समस्या बनी रहती हैं तो स्त्री के साथ उसके गर्भस्थ शिशु का स्वास्थ भी नकारात्मक रूप से प्रभावित होता हैं। किंतु यदि हम गर्भावस्था की शुरूआत से कुछ योगाभ्यास करना शुरू कर दें तो उपरोक्त समस्याए तो कम होती हैं इसके अलावा नार्मल डिलेवरी Normal delivery ,जी मचलाना, उल्टी होना जैसी समस्या भी कम होकर जच्चा बच्चा स्वस्थ रहता हैं ।

गर्भावस्था के प्रथम  माह में किये जानें वालें योगासन

गर्भावस्था का प्रथम माह स्त्री के शरीर में महत्वपूर्ण हार्मोनल बदलाव का समय होता हैं । इस दौरान निम्नलिखित योगासन करनें से स्त्री स्वस्थ प्रसन्न और तनावमुक्त रहती हैं ।



मार्जुरी आसन :::

मार्जुरी आसन
मार्जुरी आसन




1.सर्वप्रथम चार पैरों वालें जानवर जैसी मुद्रा बना लें ।


2.सांस भरकर पीठ को और गर्दन को धीरें धीरें ऊपर उठाएँ ।


3.कुछ सेकेंड सांस रोककर धिरें धिरें सांस छोडें और वापिस पहलें की मुद्रा में आनें का प्रयास करें ।



4.मार्जुरी आसन दो से तीन मिनिट तक करें ।



5.गर्भावस्था के प्रथम माह तक यह आसन करें ।



मार्जुरी आसन के लाभ :::



गर्भावस्था के प्रथम माह में यह आसन करनें से रीढ़ की हड्डी,पीठ की मांसपेशी लचीली और मजबूत बनती हैं । जिससे बढ़ते हुये गर्भस्थ शिशु का दबाव माँ को परेशान नही करता हैं ।


इस आसन से फेफड़ो में आँक्सीजन का स्तर बढ जाता है । जिससे मूड स्विंग होना,चक्कर आना ,और उल्टी होना जैसी समस्या में आराम मिलता हैं ।



 वीरभद्रासन :::

वीरभद्रासन



चित्रानुसार दोंनों पाँवों को फैलाकर हाथ ऊपर की और ले जाएँ और गहरी साँस भरें ।


धीरें धीरें सांस छोडकर पुन:सावधान की मुद्रा में आ जाँए । 


यह आसान दो तीन बार प्रथम एक माह तक करनें से कमर,पीठ,जांघ,और पेडू का क्षेत्र मजबूत होता हैं । जिससे गर्भावस्था के प्रथम माह में होनें वाला हाथ पाँवों का खिंचाव नहीं होता ।



बद्ध कोणासन :::

बद्ध कोणासन



1.सबसे पहलें शांतिपूर्वक दो तीन मिनिट बैठें ।


2.अपनें पैरों को बाहर की ओर निकालकर तितली वाली मुद्रा में बैठ जाँए दोनों पैर की एडी को आपस में चित्रानुसार मिला लें ।



3.दो तीन बार पाँवों को ऊपर निचें पिलायें ।



बद्ध कोणासन के  लाभ ::: 



इस आसन के करने से जांघें और गर्भवती स्त्री का पेडू मजबूत होता हैं । जिससे गर्भपात नहीं होता हैं ।


गर्भावस्था के प्रथम तीन माह में किये जानें वाले योगासन pregnancy yoga in hindi

ताडासन :::

ताडासन



1.सबसे पहले सावधान की मुद्रा में खड़ें हो जाँए ।


2. दोंनों टांगों को 10 सेंटीमीटर की दूरी पर रखें ।


3.दोंनों हाथों को सिर के ऊपर ले जाकर आपस में बाँघ लें ।


4.धिरें धिरें श्वास परतें हुयें पंजो के बल खडे़ हो जांए और एडी को ऊपर उठा लें ।


5.30 सेकेंड तक इसी मुद्रा में खडें रहें  ।


6.दो तीन बार यह आसन करें ।




ताडासन के लाभ :::



1.कूल्हों की मांसपेशी मज़बूत होती हैं ।


2.स्तनों के आसपास की मांसपेशी मज़बूत होती हैं ।जिससे स्तनों खिंचाव नही होता हैं ।



3.हार्मोनल बदलाव के कारण मूड स्विंग की समस्या नहीं होती हैं ।



गर्भावस्था के दूसरें महिनें के दौरान किये जानें वाले योगासन :::



गर्भावस्था के द्धितीय माह में गर्भस्थ शिशु का विकास होना शुरू हो जाता हैं । इस दोरान अधिक रक्त की आवश्यकता गर्भवती को होती हैं । अधिक रक्तसंचार शरीर के लिए आवश्यक हो जाता हैं । शरीर को अधिक मेटाबालिज्म की आवश्यकता होती हैं जिससे भोजन अधिक मात्रा में ग्रहण हो सकें और गर्भस्थ शिशु का विकास हो सकें ।

इन आवश्यक्ताओं की पूर्ति के लिए महत्वपूर्ण योगासन निम्न हैं ।



वज्रासन :::

वज्रासन


1.सबसे पहले दोंनों पाँवों को मोड़कर घुटनों के बल बैठ जाँए ।


2.शरीर का सारा वजन दोनों पैरों पर समानरूप से होना चाहिए ।


3.दोनों हाथों को जांघों पर रखें ।



4.पीठ एक दम सीधी रखें ।


5.इस अवस्था में चार पाँच मिनिट तक बैठे रहें ।


वज्रासन के लाभ :::




1.यह आसन शरीर की मेटाबालिज्म दर को सुधारता हैं जिससे भोजन जल्दी पचता हैं । और गर्भस्थ शिशु को अधिक पोषण प्राप्त होता हैं ।


2.यह एकमात्र योगासन हैं जिसे भोजन के बाद किया जा सकता हैं ।





नमन आसन :::



नमन का अर्थ हैं मोड़ना शरीर के सभी जोडों को बारी बारी से मोड़कर घुमाना चाहिए । जैसें पैरों के पंजें,हथेली, घुटनें,बांहें आदि ।


लाभ :::


यह आसन शरीर के रक्तसंचार को सुधारता हैं और शरीर में लचीलापन लाता हैं ।


प्राणायाम :::


1.सुखपूर्वक आलथी पालथी मारकर बैंठ जांए ।


2.कुछ देर ध्यान की मुद्रा में बैठें रहें ।


3.ऐसा महसूस करें आपका शरीर ऊर्जा से भरा हुआ हैं ।


4.नकारात्मक विचारों को दूर करनें का संकल्प लें ।


लाभ :::


इस आसन से शरीर और मन मजबूत होकर गर्भस्थ शिशु पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता हैं ।




गर्भावस्था के तीसरें माह में किये जानें वालें योगासन :::



सुखासन :::



1.आलथी पालथी मारकर सीटें सुखपूर्वक बैठ जांए ।


2.दोंनों हाथों की हथेलिंयों को एक दूसरें पर रखकर गोद में रख लें ।


3.अब आँखें बंदकर अपनें आराध्य ईश्वर को मन ही मन याद करें ।


5.ऐसा महसूस करें कि समस्त ब्रम्हांड से ऊर्जा निकलकर शरीर के अलग अलग भागों जैसें आँख,नाक,कान आदि से आप में प्रवेश कर रही हैं।


6.पाँच सात मिनिट यह योगासन करें ।



सुखासन के लाभ :::



इस व्यायाम को करनें से गर्भवती का मन शांत रहता हैं । गर्भवती का रक्तचाप नियत्रिंत रहता हैं । और ऊर्जा का प्रवाह संपूर्ण शरीर में बना रहता हैं ।



शवासन :::

शवासन


1.सबसे पहले पीठ के बल सीधें  लेट जाँए ।


2.पूरें शरीर को ढ़ीला छोड दें ।


3.आँखें बंदकर बिना हिले डूले लेटे रहें ।


4.रात को बिस्तर पर सोनें से पूर्व यह योगासन करें ।


शवासन के लाभ :::



इस योगासन से नींद बहुत अच्छी आती हैं जिससे शरीर में होनें वाले हार्मोनल बदलाव के दौरान गर्भवती को कोई समस्या नहीं होती हैं । 


पर्वतासन :::


पर्वतासन



आम व्यक्ति इस आसन को खडे़ होकर करता हैं किंतु गर्भावस्था pregnancy में इस आसन को बैठकर करना चाहियें ।


1.आलथी पालथी मारकर बैंठ जाँए ,यदि आलथी पालथी मारकर बैठन
 संभव नहीं हो तो कुर्सी पर भी बैठ सकतें हैं ।



2.दोनों हाथ सांस भरते हुये उठाकर सिर के ऊपर प्रणाम या नमस्कार की मुद्रा बनाइए ।


3.सांस छोडते हुये हाथों को धिरें धिरें छाती के समीप लाकर नमस्कार की मुद्रा रखें ।



4.तीन चार बार यह प्रक्रिया दोहराँए ।



पर्वतासन के लाभ :::



1.शरीर में रक्तसंचार बेहतर होता हैं ।



2.स्तनों का आकार सही बनता हैं ।


3.शरीर में अनावश्यक फेट जमा नहीं होता हैं ।



बुद्धासन :::

बुद्धासन



बुद्ध के समान मुद्रा में आँख बंदकर कुछ मिनिट बैंठें रहें ।

साँस लेते और छोडतें समय यह महसूस करें कि आप दुनिया के सबसे खुशनसीब इंसान हैं जिन्हें जीवन देनें का ईश्वरीय सामर्थ्य प्राप्त हुआ हैं ।



लाभ :::


गर्भावस्था के दौरान होनें वाली मूड स्विंग की समस्या इस आसन से नहीं होती हैं ।


मन मजबूत बना रहता हैं जिसका सकारात्मक असर गर्भ में पल रहें शिशु पर पड़ता हैं ।


बुद्धासन,शवासन,सुखासन,प्राणायाम जैसें आसन गर्भवती नवें महिनें तक भी कर सकती हैं। यदि योगासन किसी योग गुरू के निर्देशन पर कियें जाँए तो बहुत उत्तम परिणाम मिलता हैं ।



गर्भावस्था के दौरान योगाभ्यास करतें समय कुछ सावधानी जरूर बरतें जैसें



० उबड खाबड असमतल जगहों पर योगासन न करें ।



० कोई बीमारी जैसे ह्रदयरोग,मधुमेह,उच्चरक्तचाप आदि होनें पर योगासन किसी योगाचार्य के परामर्श के बाद ही करें ।



० गर्भावस्था में लेनें वाली दवाईयों के तत्काल बाद योगासन नहीं करें ।




० योगासन करते समय ऐसे कपडे़ पहनें जो ढ़ीले ढाले और आरामदायक हो 



गर्भावस्था के प्रथम तीन माह में किये जानें वाले योगासन pregnancy yoga in hindi



० बरगद के फायदे




० MR खसरा टीकाकरण




गर्भावस्था में खानपान कैसा होना चाहिए ?


गर्भावस्था में पौष्टिक आहार लेनें से माता और शिशु दोनों का स्वास्थ उत्तम बना रहता हैं । लेकिन बहुत कम माताओं को पौष्टिक आहार के बारें में जानकारी होती हैं । तो आईयें जानतें हैं गर्भावस्था के प्रथम माह से गर्भावस्था के नोवे माह तक लिए जानें वाले पौष्टिक आहार के बारें में 


गर्भावस्था का पहला माह first month of pregnancy diet plan ::



• गर्भावस्था के पहले माह में प्रतिदिन सुबह शाम मिलाकर 500 मिलीलीटर दूध का सेवन करें ।



• हल्का और सुपाच्य भोजन जो मौसम अनूकूल हो का सेवन करें ।



• उल्टी होनें की अवस्था में तरल पदार्थों जैसें पानी,मौसमी फलों का रस,दलिया का सेवन अधिक करें ताकि शरीर में पानी की कमी न हो ।


• मुलेठी ,अश्वगंधा और देवदारू का चूर्ण समान मात्रा में मिला लें और प्रतिदिन एक समय सुबह या शाम  3 ग्राम की मात्रा में एक गिलास दूध में मिलाकर लें । 




गर्भावस्था का दूसरा माह second month of pregnancy diet plan 




• हल्का और आसानी से पचने वाला भोजन भूख के अनुसार दिन में चार पाँच बार करें ।



• अंगूर,अनार,चुकंदर, हरी पत्तेदार सब्जी,फ्रूट सलाद का सेवन नियमित रूप से करें ।



• खजूर या खारक ,शतावरी चूर्ण, अश्वगंधा, मुलैठी चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर 3 ग्राम दूध एक गिलास दूध में मिलाकर रात को लें ।




गर्भावस्था का तीसरा माह pregnancy diet plan third month of pregnancy



• हरी पत्तेदार सब्जियों,मौसमी फलों के साथ सुबह के नाश्ते में अंकुरित अनाज का भी सेवन करना चाहिए ।



• दूध में एक चम्मच देशी घी और एक चम्मच शहद मिलाकर प्रतिदिन एक समय पीयें ।



• स्वादनुसार भोजन के अतिरिक्त खिचड़ी का भी सेवन करें ।


• लौह तत्व से भरपूर अनाज जैसें लोबिया,सेम और  गुड का सेवन भी करें ।





गर्भावस्था का चौथा माह Pregnancy diet plan fourth month of pregnancy



• नियमित रूप से दिन में तीन बार भोजन करें ।भोजन में दाल,सब्जी के अतिरिक्त दही चावल लें ।



• भोजन के अतिरिक्त 5 ग्राम मक्खन नियमित रूप से दिन में एकबार लें ।





• दूध में केशर ,खजूर,किशमिश, बादाम,अंजीर,काजू आदि सूखे मेवे मिलाकर पीयें ।





गर्भावस्था का पाँचवा माह Pregnancy diet plan for fifth month of pregnancy





• भोजन के अतिरिक्त दिन में फल और सूखे मेवे का सेवन करें ।



• पानी अतिरिक्त मात्रा में पीयें ताकि कब्ज न हो ।


• ब्राम्ही, दालचीनी,और अश्वगंधा चूर्ण दूध में मिलाकर दिन में दो बार लें ।





गर्भावस्था का छठा माह Pregnancy diet plan for six month of pregnancy





• गोक्षरू चूर्ण को घी में सेंककर 5 से 10 ग्राम प्रतिदिन सेवन करें ।



• भोजन के बाद थोड़ा बहुत मीठा लें ।



• विभिन्न अनाजों से बना सत्तू दिन में दो बार पानी मिलाकर सेवन करें ।




गर्भावस्था का सातवां महिना pregnancy diet plan for seventh month of pregnancy




• भोजन में जल्दी पचने वाली और बिना तेल वाली चीजों को अधिक शामिल करें । 



• तिल,गुड ,और अलसी को दिन में दो तीन बार लें ।



• मौसमी फलों के अतिरिक्त सूखे मेवे दूध में उबालकर लें ।




गर्भावस्था का आंठवा माह Diet plan for eighth month of pregnancy




• घी ,दूध और मक्खन का सेवन भरपूर मात्रा में करें ।


• मौसमी फल, सब्जी और दालों का सेवन भरपूर मात्रा में करें ।




गर्भावस्था का नवा माह Diet plan for ninth month of pregnancy




• पेट में कब्ज न हो इसके लिए रेशेदार खाद्यान्नों को जरूर भोजन में शामिल करें ।



• पैरो में या शरीर पर सूजन हो तो चिकित्सक के परामर्श से दूध में हल्दी मिलाकर सेवन करें ।


• दही चावल मिलाकर लें ।


• पानी खूब सारा पीयें ।



सिंघाड़ा,गन्ना ,अंजीर,चुकंदर आदि का सेवन करें ।





गर्भावस्था के दौरान क्या नही करना चाहिए





• ठंडा और बासी भोजन नहीं करें ।


• अधिक मसालेदार,तीखा,अत्यधिक मीठा, भोजन नहीं करें ।


• एक साथ अधिक भोजन नहीं करें ।


• अत्यधिक चाय ,काफी का सेवन नहीं करें ।


• उपवास नहीं करें ।


• भोजन करनें के बाद तुरंत सोना नहीं चाहिए ।












17 दिस॰ 2020

ozone therapy : ओजोन थेरेपी क्या होती हैं, इसका उपयोग किन बीमारियों में होता हैं

Ozone therapy : ओजोन थेरेपी क्या होती हैं ? 

ओजोन थेरेपी क्या होती हैं
Ozone therapy




ओजोन गैस हमारें वायुमंडल के ऊपरी भाग के stratosphere यानि समताप मंडल में पाई जाती हैं । यह गैस प्रथ्वी पर आनें वाली खतरनाक पराबैंगनी किरणों को प्रथ्वी पर आनें से रोकती हैं । ओजोन आक्सीजन के तीन अणु से मिलकर बनती हैं । जब आक्सीजन के अणु पर वायुमंडलीय तड़त
 झंझा (बिजली) गिरती हैं तो आक्सीजन के अणु संयुक्त होकर ओजोन गैस का निर्माण करतें हैं । ओजोन गैस रंगहीन गैस होती हैं ।



 ओजोन थेरेपी ozone therapy चिकित्सा विज्ञान के लिए नई तकनीक हैं । जिसनें हाल ही के वर्षों में बहुत अधिक लोकप्रियता अर्जित की हैं ।


ozone therapy ओजोन थेरेपी  कैसें काम करती हैं 



विशेषज्ञों द्धारा नियत्रिंत मात्रा में शरीर में दी गई ओजोन आँतरिक या बाहरी अंगों के सम्पर्क में आती हैं तो शरीर में आक्सीजन की आपूर्ति बड़ा देती हैं जिससे विषाक्त पदार्थ बाहर निकल जातें हैं और संबंधित अंग स्वस्थ्य हो जाता हैं। ओजोन थेरेपी ozone therapy के माध्यम से निम्नलिखित बीमारीयों का इलाज सफलतापूर्वक किया जाता हैं ।

श्वसनतंत्र की समस्याओं में ओजोन थेरेपी ozone therapy


हमारें फेफडे शरीर में आक्सीजन की आपूर्ति सुनिश्चित करतें हैं । स्वस्थ फेफड़े निर्धारित
 मात्रा में आक्सीजन समस्त अँगों तक पहुँचातें हैं किन्तु यदि अस्थमा,c.o.p.d.कोविड़ -19,जैसी बीमारी हो जाती हैं तो फेफडें निर्धारित मात्रा में आक्सीजन अँगों तक नहीं पँहुचा पातें हैं । ओजोन थेरेपी ozone therapy द्धारा ओजोन देनें से फेफड़ो का सूजन कम हो जाता हैं फेफड़ों की कार्यक्षमता सुधरती हैं। और रक्त में आक्सीजन का स्तर सुधरता हैं । ओजोन थेरेपी ozone therapy द्धारा अस्थमा,c.o.p.d.,कोरोनावायरस से खराब हुये फेफड़ो की कार्यक्षमता सुधरती हैं ।


मधुमेह में ओजोन थेरेपी ozone therapy :::


मधुमेह रोगीयों पर ओजोन थेरेपी ozone therapy देनें के बाद हुये अध्ययनों से नतीजा निकला हैं कि ओजोन थेरेपी ozone therapy देनें के बाद Diabetic neuropathy की समस्या नहीं होती हैं । और स्वस्थ व्यक्ति को ओजोन थेरेपी ozone therapy देनें से मधुमेह होनें की संभावना बहुत कम हो जाती हैं ।


प्रतिरोधक क्षमता immunity बढ़ाने में ओजोन थेरेपी ozone therapy :::



 ओजोन थेरेपी ozone therapy के द्धारा शरीर का प्रतिरोधक तंत्र सक्रिय होता हैं । जिससे खतरनाक वायरस और बेक्टेरिया से हमारें शरीर की रक्षा होती हैं ।

एड्स पीड़ित मरीज के अध्ययन के द्धारा यह निष्कर्ष निकाला गया कि ओजोन थेरेपी ozone therapy देनें से वायरस की नई कालोनी विकसित होना बंद हो जाती हैं। जिससे रोगी के स्वस्थ्य होनें की रफ्तार बड़ जाती हैं ।


कोरोनावायरस के रोगी में भी वायरस की नई कालोनी फेफड़ो में विकसित होती हैं अतः ओजोन थेरेपी ozone therapy के द्धारा वायरस की कालोनी का विकास रोका जा सकता हैं ।



कैंसर में ओजोन थेरेपी ozone therapy :::


रक्त मिश्रित ओजोन जब कैंसर प्रभावित कोशिका में जाती हैं तो कैंसर पैदा करनें वाली कोशिकाओं की बढत रोकती हैं और शरीर में ए.टी.पी Adinosin triphosphate का निर्माण करती है जिससे शरीर में  जमा विषाक्त पदार्थ  बाहर निकल जातें हैं ।


दर्द निवारण में ओजोन थेरेपी ozone therapy ::: 


ओजोन थेरेपी ozone therapy में वेरिकोज वेन्स,स्लिप डिस्क, कमर,घुटनों आदि के दर्दों का सफलतापूर्वक निवारण किया जाता हैं । इस तकनीक में ओजोन का इंजेक्शन प्रभावित भाग में दिया जाती हैं जिससे प्रभावित भाग में आक्सीजन सप्लाई बढ जाती हैं और दर्द समाप्त हो जाता हैं । 


ओजोन थेरेपी कैसें दी जाती हैं।


ओजोन गैस यदि सीधे श्वसन तंत्र द्धारा ले ली जाए तो यह श्वसन प्रणाली और फेफड़ो को गंभीर क्षति पहुँचाती हैं जिससे व्यक्ति की मौंत भी हो सकती हैं ।

ओजोन थेरेपी ozone therapy में रोगी को ओजोन देनें का तरीका बिल्कुल ही भिन्न होता हैं ।


1.सीधे रक्त में Intravenous


इस प्रकार की ओजोन थेरेपी ozone therapy में शरीर से रक्त निकालकर उसमें सीमित मात्रा में ओजोन मिलाई जाती हैं और रोग प्रभावित भाग में प्रविष्ट करा दी जाती हैं ।


2.मांसपेशियों में Intramascular


ओजोन में आक्सीजन का मिश्रण करके मांसपेशियों में लगाई जाती हैं ।


सीधे प्रभावित भाग पर


ओजोन को सीधे प्रभावित भाग पर भी लगाया जाता हैं उदाहरण के लिए फोडे को ठीक करनें के लिए,सौन्दर्य निखारने और दर्द मिटानें के लिए सीधे लगाई जाती हैं ।

क्या वास्तव ओजोन थेरेपी प्रभावी हैं ? 


आजकल ओजोन थेरेपी ozone therapy तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं । और इसी कारण यूरोप समेत अमेरिका और भारत में इस पद्धति को मान्यता प्राप्त हो चुकी हैं । 


भारत में ओजोन फोरम आँफ इंडिया चिकित्सकों को प्रशिक्षित कर ओजोन थैरेपी को जनसामान्य तक पहुचानें का कार्य कर रहा हैं ।

सन् 2018 -19 के अध्ययनों के अनुसार ओजोन थेरेपी ozone therapy देनें के बाद रूमेटाइड़ अर्थराइटिस के रोगियों के चलने फिरनें की कार्यक्षमता सुधरती हैं। 

इसी प्रकार ओजोन मिश्रित पानी रूट केनाल के दोरान बेहतर संक्रमणरोधी साबित हुआ हैं ।

ozone therapy ओजोन थेरेपी के दुष्प्रभाव :::

ओजोन गैस तीन आक्सीजन परमाणुओं के मिलनें से बनती हैं जो इसे अस्थिर बनाता हैं इस कारण इसके इस्तेमाल के दौरान बहुत सावधानी की आवश्यकता होती हैं । 

ओजोन गैस हमेशा चाही गई मात्रा में ही इस्तेमाल की जानी चाहिए और निश्चित जगह पर ही प्रयोग की जानी चाहिए । ओजोन सीधे श्वसन तंत्र द्धारा प्रयोग नही की जानी चाहिए ।

ओजोन थेरेपी ozone therapy विशेषज्ञों की देखरेख में ही दी जानी चाहिए और इसके दुष्प्रभाव से निपटनें का पूर्व प्रबंध होना चाहिए ।

ओजोन थेरेपी ozone therapy चिकित्सा विज्ञान के लिए नई तकनीक हैं और इस पर  विस्तृत शोध की आवश्यकता हैं । जिससे आमजन  इस सस्ती चिकित्सा पद्धति से लाभान्वित हो सकें ।








टाप स्मार्ट हेल्थ गेजेट्स इन हिंदी। Top smart health gadgets

Top smart health gadgets।टाप स्मार्ट हेल्थ गेजेट्सस इन हिंदी  कोरोना काल में स्वास्थ्य सुविधाओं पर जितना दबाव पैदा हुआ उतना शायद किसी भी काल...