30 जन॰ 2017

Til Tail ke fayde [तिल तेल के फायदे]


# तिल के तेल के फायदे 
आयुर्वेदिक तेल
 तिल का तेल


यदि इस पृथ्वी पर उपलब्ध सर्वोत्तम खाद्य पदार्थों की बात की जाए तो तिल के तेल का नाम अवश्य आएगा और यही सर्वोत्तम पदार्थ बाजार में उपलब्ध नहीं है. और ना ही आने वाली पीढ़ियों को इसके गुण पता हैं. क्योंकि नई पीढ़ी तो टी वी के इश्तिहार देख कर ही सारा सामान ख़रीदती है.




और तिल के तेल का प्रचार कंपनियाँ इसलिए नहीं करती क्योंकि इसके गुण जान लेने के बाद आप उन द्वारा बेचा जाने वाला तरल चिकना पदार्थ जिसे वह तेल कहते हैं लेना बंद कर देंगे.



तिल के तेल में इतनी ताकत होती है कि यह पत्थर को भी चीर देता है. प्रयोग करके देखें.... आप पर्वत का पत्थर लिजिए और उसमे कटोरी के जैसा खडडा बना लिजिए, उसमे पानी, दुध, धी या तेजाब संसार में कोई सा भी कैमिकल, ऐसिड डाल दीजिए, पत्थर में वैसा की वैसा ही रहेगा, कही नहीं जायेगा... लेकिन... अगर आप ने उस कटोरी नुमा पत्थर में तिल का तेल डाल दीजिए, उस खड्डे में भर दिजिये.. 2 दिन बाद आप देखेंगे कि, तिल का तेल... पत्थर के अन्दर भी प्रवेश करके, पत्थर के नीचे आ जायेगा. यह होती है तेल की ताकत, इस तेल की मालिश करने से हड्डियों को पार करता हुआ, हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है. तिल के तेल के अन्दर फास्फोरस होता है जो कि हड्डियों की मजबूती का अहम भूमिका अदा करता है.




और तिल का तेल ऐसी वस्तु है जो अगर कोई भी भारतीय चाहे तो थोड़ी सी मेहनत के बाद आसानी से प्राप्त कर सकता है. तब उसे किसी भी कंपनी का तेल खरीदने की आवश्यकता ही नही होगी. तिल खरीद लीजिए और किसी भी तेल निकालने वाले से उनका तेल निकलवा लीजिए. लेकिन सावधान तिल का तेल सिर्फ कच्ची घाणी (लकडी की बनी हुई) का ही प्रयोग करना चाहिए.





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तैल शब्द की व्युत्पत्ति तिल शब्द से ही हुई है। जो तिल से निकलता वह है तैल। अर्थात तेल का असली अर्थ ही है "तिल का तेल".




तिल के तेल का सबसे बड़ा गुण यह है की यह शरीर के लिए आयुषधि का काम करता है.. चाहे आपको कोई भी रोग हो यह उससे लड़ने की क्षमता शरीर में विकसित करना आरंभ कर देता है. यह गुण इस पृथ्वी के अन्य किसी खाद्य पदार्थ में नहीं पाया जाता.




सौ ग्राम सफेद तिल 1000 मिलीग्राम कैल्शियम प्राप्त होता हैं। बादाम की अपेक्षा तिल में छः गुना से भी अधिक कैल्शियम है।




काले और लाल तिल में लौह तत्वों की भरपूर मात्रा होती है जो रक्तअल्पता के इलाज़ में कारगर साबित होती है।




तिल में उपस्थित लेसिथिन नामक रसायन कोलेस्ट्रोल के बहाव को रक्त नलिकाओं में बनाए रखने में मददगार होता है।




तिल के तेल में प्राकृतिक रूप में उपस्थित सिस्मोल एक ऐसा एंटी-ऑक्सीडेंट है जो इसे ऊँचे तापमान पर भी बहुत जल्दी खराब नहीं होने देता। आयुर्वेद चरक संहित में इसे पकाने के लिए सबसे अच्छा तेल माना गया है।




तिल में विटामिन  सी छोड़कर वे सभी आवश्यक पौष्टिक पदार्थ होते हैं जो अच्छे स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक होते हैं। तिल विटामिन बी और आवश्यक फैटी एसिड्स से भरपूर है।




इसमें मीथोनाइन और ट्रायप्टोफन नामक दो बहुत महत्त्वपूर्ण एमिनो एसिड्स होते हैं जो चना, मूँगफली, राजमा, चौला और सोयाबीन जैसे अधिकांश शाकाहारी खाद्य पदार्थों में नहीं होते।





ट्रायोप्टोफन को शांति प्रदान करने वाला तत्व भी कहा जाता है जो गहरी नींद लाने में सक्षम है। यही त्वचा और बालों को भी स्वस्थ रखता है। मीथोनाइन लीवर को दुरुस्त रखता है और कॉलेस्ट्रोल को भी नियंत्रित रखता है।



तिलबीज स्वास्थ्यवर्द्धक वसा का बड़ा स्त्रोत है जो चयापचय को बढ़ाता है।



यह कब्ज भी नहीं होने देता।




तिलबीजों में उपस्थित पौष्टिक तत्व,जैसे-कैल्शियम और आयरन त्वचा को कांतिमय बनाए रखते हैं।




तिल में न्यूनतम सैचुरेटेड फैट होते हैं इसलिए इससे बने खाद्य पदार्थ उच्च रक्तचाप को कम करने में मदद कर सकता है।




सीधा अर्थ यह है की यदि आप नियमित रूप से स्वयं द्वारा निकलवाए हुए शुद्ध तिल के तेल का सेवन करते हैं तो आप के बीमार होने की संभावना ही ना के बराबर रह जाएगी. जब शरीर बीमार ही नही होगा तो उपचार की भी आवश्यकता नही होगी. यही तो आयुर्वेद है.. आयुर्वेद का मूल सीधांत यही है की उचित आहार विहार से ही शरीर को स्वस्थ रखिए ताकि शरीर को आयुषधि की आवश्यकता ही ना पड़े.




एक बात का ध्यान अवश्य रखिएगा की बाजार में कुछ लोग तिल के तेल के नाम पर अन्य कोई तेल बेच रहे हैं.. जिसकी पहचान करना मुश्किल होगा. ऐसे में अपने सामने निकाले हुए तेल का ही भरोसा करें. यह काम थोड़ा सा मुश्किल ज़रूर है किंतु पहली बार की मेहनत के प्रयास स्वरूप यह शुद्ध तेल आपकी पहुँच में हो जाएगा. जब चाहें जाएँ और तेल निकलवा कर ले आएँ.




तिल में मोनो-सैचुरेटेड फैटी एसिड (mono-unsaturated fatty acid) होता है जो शरीर से बैड कोलेस्ट्रोल को कम करके गुड कोलेस्ट्रोल यानि एच.डी.एल. (HDL) को बढ़ाने में मदद करता है। यह हृदय रोग, दिल का दौरा और धमनीकलाकाठिन्य (atherosclerosis) के संभावना को कम करता है।





कैंसर से सुरक्षा प्रदान करता है


तिल में सेसमीन (sesamin) नाम का एन्टीऑक्सिडेंट (antioxidant) होता है जो कैंसर के कोशिकाओं को बढ़ने से रोकने के साथ-साथ है और उसके जीवित रहने वाले रसायन के उत्पादन को भी रोकने में मदद करता है। यह फेफड़ों का कैंसर, पेट के कैंसर, ल्यूकेमिया, प्रोस्टेट कैंसर, स्तन कैंसर और अग्नाशय के कैंसर के प्रभाव को कम करने में बहुत मदद करता है।


तनाव को कम करता है-



इसमें नियासिन (niacin) नाम का विटामिन होता है जो तनाव और अवसाद को कम करने में मदद करता है।




हृदय के मांसपेशियों को स्वस्थ रखने में मदद करता है-


तिल में ज़रूरी मिनरल जैसे कैल्सियम, आयरन, मैग्नेशियम, जिन्क, और सेलेनियम होता है जो हृदय के मांसपेशियों को सुचारू रूप से काम करने में मदद करता है और हृदय को नियमित अंतराल में धड़कने में मदद करता है।





शिशु के हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है-






तिल में डायटरी प्रोटीन और एमिनो एसिड होता है जो बच्चों के हड्डियों के विकसित होने में और मजबूती प्रदान करने में मदद करता है। उदाहरणस्वरूप 100ग्राम तिल में लगभग 18 ग्राम प्रोटीन होता है, जो बच्चों के विकास के लिए बहुत ज़रूरी होता है।



गर्भवती महिला और भ्रूण (foetus) को स्वस्थ रखने में मदद करता है-




तिल में फोलिक एसिड होता है जो गर्भवती महिला और भ्रूण के विकास और स्वस्थ रखने में मदद करता है।



शिशुओं के लिए तेल मालिश के रूप में काम करता है-





अध्ययन के अनुसार तिल के तेल से शिशुओं को मालिश करने पर उनकी मांसपेशियाँ सख्त होती है साथ ही उनका अच्छा विकास होता है। आयुर्वेद के अनुसार इस तेल से मालिश करने पर शिशु आराम से सोते हैं।




अस्थि-सुषिरता (osteoporosis) से लड़ने में मदद करता है-






तिल में जिन्क और कैल्सियम होता है जो अस्थि-सुषिरता से संभावना को कम करने में मदद करता है।




मधुमेह के दवाईयों को प्रभावकारी बनाता है-





डिपार्टमेंट ऑफ बायोथेक्सनॉलॉजी विनायक मिशन यूनवर्सिटी, तमिलनाडु (Department of Biothechnology at the Vinayaka Missions University, Tamil Nadu) के अध्ययन के अनुसार यह उच्च रक्तचाप को कम करने के साथ-साथ इसका एन्टी ग्लिसेमिक प्रभाव रक्त में ग्लूकोज़ के स्तर को 36% कम करने में मदद करता है जब यह मधुमेह विरोधी दवा ग्लिबेक्लेमाइड (glibenclamide) से मिलकर काम करता है। इसलिए टाइप-2 मधुमेह (type 2 diabetic) रोगी के लिए यह मददगार साबित होता है।




दूध के तुलना में तिल में तीन गुना कैल्शियम रहता है। इसमें कैल्शियम, विटामिन बी और ई, आयरन और ज़िंक, प्रोटीन की भरपूर मात्रा रहती है और कोलेस्टरोल बिल्कुल नहीं रहता है। तिल का तेल ऐसा तेल है, जो सालों तक खराब नहीं होता है, यहाँ तक कि गर्मी के दिनों में भी वैसा की वैसा ही रहता है.




तिल का तेल कोई साधारण तेल नहीं है। इसकी मालिश से शरीर काफी आराम मिलता है। यहां तक कि लकवा जैसे रोगों तक को ठीक करने की क्षमता रखता है। इससे अगर आप महिलाएं अपने स्तन के नीचे से ऊपर की ओर मालिश करें, तो स्तन पुष्ट होते हैं। सर्दी के मौसम में इस तेल से शरीर की मालिश करें, तो ठंड का एहसास नहीं होता। इससे चेहरे की मालिश भी कर सकते हैं। चेहरे की सुंदरता एवं कोमलता बनाये रखेगा। यह सूखी त्वचा के लिए उपयोगी है।




 तिल का तेल- तिल विटामिन ए व ई से भरपूर होता है। इस कारण इसका तेल भी इतना ही महत्व रखता है। इसे हल्का गरम कर त्वचा पर मालिश करने से निखार आता है। अगर बालों में लगाते हैं, तो बालों में निखार आता है, लंबे होते हैं।




जोड़ों का दर्द हो, तो तिल के तेल में थोड़ी सी सोंठ पावडर, एक चुटकी हींग पावडर डाल कर गर्म कर मालिश करें। तिल का तेल खाने में भी उतना ही पौष्टिक है विशेषकर पुरुषों के लिए।इससे मर्दानगी की ताकत मिलती है!




हमारे धर्म में भी तिल के बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता है, जन्म, मरण, परण, यज्ञ, जप, तप, पित्र, पूजन आदि में तिल और तिल का तेल के बिना संभव नहीं है अतः इस पृथ्वी के अमृत को अपनायें और जीवन निरोग बनायें।
                         (Whatsapp पोस्ट से साभार )
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GAJAR GHAS गाजर घास का उन्मूलन कैसे करें

खरपतवार
 गाजरघास
गाजर घास का वानस्पतिक नाम gajar ghas ka vansptik nam पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस [ parthenium hysterophorus ] हैं.यह एस्टेरेसी कुल का सदस्य हैं.



इसकी पत्तियाँ गाजर के समान होनें के कारण इसे गाजर घास के नाम से जाना जाता हैं.गाजरघास के अन्य नाम भी  हैं Gajarghas KE an anay Nam  जैसे गजरी, गांधी बूटी,अमेरिकन फीवर फ्यू .

इसके फूल सफेद रंग के होनें से इसे चटक चांदनी भी कहा जाता हैं.यह मूल रूप से अमेरिका और वेस्टइंडीज का पौधा हैं,जो पूरे विश्व में आयातित पदार्थों के माध्यम से विश्व में फैल गया.

भारत में यह पौधा लगभग 35 लाख हेक्टेयर में अनचाहे रूप से उगा हुआ हैं ।

मनुष्यों पर गाजर घास के हानिकारक प्रभाव 


गाजर घास के बहुत ही हानिकारक प्रभाव मानव स्वास्थ पर देखे गये हैं.इसमें घातक एलिलो रसायन जैसें एम्ब्रोसीन ,पार्थेनिन , कोरोनोपीलिन,फेरुलिक अम्ल,वेनिलीक अम्ल, कैफीन अम्ल ,पेरा - हाइड्राँक्सी बेन्जोइक अम्ल, तथा पेरा - काउमेरिक अम्ल पाये जातें हैं.ये घातक रसायन इसके सम्पर्क में आनें व्यक्ति वालें व्यक्तियों की त्वचा में खुजली ,एलर्जी , एक्जिमा जैसे घातक रोग पैदा करते हैं.

इसमें पाया जानें वाला पार्थेनिन मनुष्य की तंत्रिका     तंत्र को को प्रभावित कर डिमेंशिया,डिप्रेशन,अवसाद,सिरदर्द ,माइग्रेन जैसे रोग पैदा करता हैं.

गाजर घास के फूलो से निकलनें वाले परागकण श्वास के माध्यम से फेफडों में जाकर अस्थमा जैसे रोग पैदा करते हैं.

गाजर घास के बहुतायत क्षेत्रों के आसपास रहनें वालें व्यक्तियों को भूख की कमी ,आँखों से पानी आना,आँखों में खुजली होना जैसी समस्या पायी जाती हैं.
यदि गलती से इसकी पत्तियाँ मुहँ ,पेट में चली जाती हैं,तो मुहँ  और आंत में छाले  हो सकते हैं.

इसमें एक प्रकार का कैफीन अम्ल पाया जाता हैं,जो नींद नही आनें की समस्या पैदा कर सकता हैं.

गाजर घास प्रभावित जलसत्रोत का जल पीनें से डायरिया,पेचिस,और किड़नी से संबधित घातक रोग उभरतें हैं.

पशुओं के स्वास्थ पर प्रभाव


गाजर घास के विषेले प्रभाव से मनुष्य ही नही बल्कि पशु भी बहुत हानिकारक प्रभाव झेलतें हैं.यदि दुधारू पशु गाजर घास खा लेते हैं,तो उनके दूध का स्वाद कड़वा होकर मनुष्य के लिये बहुत हानिकारक हो जाता हैं,जिससे पेट संबधित बीमारी पनपती हैं.
गाजर घास के सेवन से पशुओं की जीभ पर छाले,आंतों पर छाले हो जातें हैं.


जैवविविधता पर प्रभाव 


गाजर घास को पर्यावरणविद "पारिस्थितिक आतंकवादी " कहते हैं,क्योंकि यह एलिलो रसायन उत्सर्जित कर अपने आसपास के पौधो की वृद्धि को रोक देता हैं.और स्वंय फलता फूलता रहता हैं. इस पौधे पर विपरीत मौसम का कोई विशेष प्रभाव नही पड़ता हैं.
गाजर घास के अत्यधिक फैलाव की वजह से पारम्परिक भारतीय जड़ी-बूटीयों का उन्मूलन हो रहा हैं.

गाजर घास का उन्मूलन


गाजर घास को नष्ट करना बड़ी महत्वपूर्ण चुनोतीं बन चुकी हैं,क्योंकि यह आसानी से नष्ट नहीं होता हैं,यदि पौधा 30 - 35 दिनों का हो गया तो यह अपना जीवनचक्र पूर्ण करता ही हैं.इसको नष्ट करनें की कुछ महत्वपूर्ण विधियाँ जानकारों द्धारा बताई गई जिसके अनुसार पौधे की शुरआती अवस्था में 2- 4 D नामक खरपतवारनाशी का छिड़काव इस पर कर देना चाहियें.

इसके अलावा एक अन्य विधि हैं,जिसमें गाजर घास को उखाड़कर गोबर के साथ सड़नें के लिये छोड़ दिया जाता हैं,व एक वर्ष पश्चात इस सड़ी हुई खाद का खेतो में प्रयोग किया जा सकता हैं.

इस सड़ी हुई खाद में नाइट्रोजन 2.5 %,फाँस्फोरस 1.38%,एँव पोटेशियम 1.29% प्रतिशत पाया जाता हैं,जो किसी भी फसल के लिये महत्वपूर्ण खाद हैं.

यदि गाजर घास में बीज आ गये हो तो इस पौधे से खाद नही बनाना चाहियें बल्कि इस पौधे को उखाड़कर बायोगैस संयत्र में ड़ाल देना चाहियें. इस प्रकार की विधि से पर्याप्त मात्रा में बायोगैस मिलती हैं।

एक अन्य विधि गेंदा और चकोडा से इसको विस्थापित करने से सम्बंधित हैं यदि गेंदा और चकोडा के बीजों को बरसात से पूर्व जहाँ गाजरघास होती हैं वहाँ छिड़क दिया जाये तो ये दोनों पौधें बहुत तेजी से बढ़कर गाजरघास को विस्थापित कर देते हैं ।

●जैविक खेती बिना किसानों की आय दोगनी नहीं होगी


बीटल कीट


सन 1989 में मेक्सिको से एक कीट भारत सरकार ने आयात किया था । जिसका नाम बीटल कीट हैं । एक वयस्क बीटल कीट 1 से डेढ़ माह में गाजरघास के एक पौधे को खा जाता हैं । इस कीट की एक महत्वपूर्ण विशेषता हैं की यह सिर्फ गाजरघास को ही खाता हैं । दूसरी फसलों को इससे कोई नुकसान नहीं होता हैं ।


गाजर घास के प्रकोप से बचने हेतू सावधानियाँ 

• गाजर घास को नंगे हाथों से नही उखाड़ना चाहियें.

• बच्चों द्धारा गाजर घास वाली जगह पर खेलने पर गाजर घास का स्पर्श शरीर पर न हो ऐसी सावधानी रखनी चाहियें.

• घरो के आसपास गाजर घास होनें पर इसका उचित निस्तारण अवश्य करना चाहियें.

• इस पौधे को घर पर किसी भी रूप में नही लाना चाहियें.



20 जन॰ 2017

MAHILAYE SAMAJ AUR PARIVAR [महिलायें समाज और परिवार]

MAHILAYE SAMAJ AUR PARIVAR महिलायें,समाज और परिवार

पूरी दुनिया की 7 अरब 48 करोड़ आबादी में से आधी आबादी का प्रतिधिनिधित्व महिलाएँ करती हैं.

किन्तु 193 देशों में महज ऊंगलियों पर गिनने लायक देश ऐसे हैं,जहाँ महिलायें पुरूषों के साथ समाज के अग्रिम पायदान पर हैं.बाकि के देशों में महिलायें किसी न किसी रूप में दोयम दर्जें की नागरिक ही समझी जाती हैं.महिलाओं के प्रति होनें वाले भेदभावों की अंतहीन सीमा हैं जैसें

लैंगिक भेदभाव [Sexual Discrimination]



विश्व के अधिकांश विकसित और विकासशील देश महिलाओं को लैंगिक समानता दिलानें में असफल साबित हुये हैं,कुछ महिलायें अपवाद बनकर जरूर आगें बढ़ी हैं,परन्तु उनकी आबादी के मान से यह संख्या उँट के मुहँ मे जीरे के समान हैं.स्त्रीयों को शारीरिक रूप से कमज़ोर मानकर उनको घरेलू कामो बर्तन,झाडू जैसे कामों तक सीमित रखना ,व्यापार  सुरक्षा जैसें घर के बाहरी कामों में पुरूषों का वर्चस्व होना.इसी प्रकार यदि  को बाहर पढ़ने - लिखने खेलकूद प्रतियोगिता में भाग लेनें जाना हो तो परिवार की रोक लड़कियों के लिये ही होती हैं.




मैं ऐसे ही एक परिवार को जानता हूँ,जिसकी होनहार बिटिया ने एम्स जैसे मेड़िकल कालेज की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण कर ली परन्तु उसके परिवार ने उसे इसलिये रोक दिया की दिल्ली जैसे शहर में लड़की अकेली केसे रहेगी,इसके बनिस्बत उस परिवार ने उस लड़की का एड़मिशन अपने ही शहर के अपेक्षाकृत कमज़ोर रेंकिंग वाले मेडिकल कालेज में कराना उचित समझा.जबकि वही परिवार अपने लड़के को दूसरे प्रान्त में भेजकर IIT की शिक्षा दिलाना उचित समझता हैं.और नाते रिश्तेदारी में में बडे गर्व के साथ अपने बच्चें के बाहर रहकर पढ़ाई करनें की बात करता हैं. क्या इस सोच के साथ बेहतर समाज का निर्माण कर पायेंगे ?




स्त्री और पुरूष समाजरूपी शरीर के हाथ और पांव हैं,इनमें से यदि शरीर में हाथ या पांव किसी एक का अभाव हो तो क्या हम शरीर को स्वस्थ मान सकते हैं.नही ना ! तो फिर समाज में एक का विकसित होना और दूसरें का अविकसित होना स्वस्थ समाज का निर्माण कैसें कर सकता हैं.



महिलाओं के प्रति भेदभाव मात्र यही तक सीमित नही हैं,बल्कि वे कामकाजी महिलाएँ जिनके परिवार ने उन्हें कामकाज की आजादी दी हैं से पूँछे तो हकीक़त और ज्यादा बेपर्दा होती हैं.


गिलोय के फायदे



शारीरिक शोषण 




कार्यस्थल पर महिलाओं का शोषण आजकल आम बात हो गई हैं,जिसे सरकार हो या समाज कोई गंम्भीरतापूर्वक लेने के मूड़ मे नही हैं बल्कि यदि इस प्रकार की बातें जनसंचार माध्यमों में आ जाती हैं तो शक की ऊँगली महिला के नाते - रिशतेदारों और सहयोगीयों द्धारा पीड़ित महिला की ओर ही उठती हैं.



कार्यस्थलों,यात्रा के दोरान बसो,रेलगाडियों,भीड़भाड़ वाली जगहों पर पुरूषों द्धारा गलत नियत से महिलाओं को स्पर्श करना या स्पर्श करने का भरसक प्रयत्न करना ये सब वही पुरूष वर्ग करता हैं,जो किसी स्त्री का भाई,बेटा,पति या पिता हैं.



सरकारों द्धारा महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर सैंकड़ो कानून,आयोग और संहिताएँ बनाई गयी हैं,क्या ये व्यवस्थाएँ स्त्रीयों से होनें वाली छेड़छाड़ को रोक पाई हैं ? नही ना ! क्योंकि कानून किसी समस्या का सम्पूर्ण समाधान नही हैं.
यदि महिलाओं के प्रति होनें वाली छेड़छाड़ को रोकना हैं, तो उस सोच को बदलना होगा उस समाज को बदलना होगा जहाँ यह सोच विकसित होती हैं. सोच कहाँ से विकसित होती हैं ? 
समाज कहाँ से बनता हैं ?



निश्चित रूप से परिवार से सोच और समाज बनतें हैं.यदि हमनें परिवार मे ही लड़के - लड़की मे भेद का स्वांग रचा तो निश्चित है समाज में यही मानसिकता पलेगी बढेगी.







बलात्कार [Rape]


पूरी दुनिया में हर एक मिनिट में दस महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनायें घट रही हैं,आखिर क्या वज़ह हैं,इन समस्याओं की ? कई लोग पुरूष वर्ग के समर्थन मे खडे होकर कहते हैं,कि स्त्रीयाँ ही कामुक वस्त्र पहनकर पुरूष को उत्तेजित करती हैं.मैं पूछना चाहता हूँ तो फिर दूधमुँही बच्ची के साथ बलात्कार क्यों होता हैं क्या वह बालिका भी बलात्कारी को उतनी ही कामुक लगती हैं.



वास्तव में बात फिर वही घूम फिरकर आती हैं,कि समाज की सोच ही निम्नस्तर की है.

मैंनें कई स्कूल - कालेजों के ड्रेसकोड़ की अनिवार्यता सम्बधी नियम - कानून  पढ़े-सुने हैं.जिसमें स्त्रीयों को सिर से पाँव तक ढँकने वाली ड्रेस पहनना अनिवार्य हैं.इस प्रकार की व्यवस्था पर समाज,कानून और अग्रिम पंक्ति के लोग क्यों खामोश रहकर मोन समर्थन देते हैं ? सवाल फिर वही आकर टीकता हैं,कि क्या कोई ड्रेस कामुक होती हैं ? अरे श्री मान आपकी सोच ही कामुक हैं.जो स्त्री ,बालिका में काम प्रवृत्ति खोजती हैं,जिसे तब तक नही ठीक किया जा सकता जब तक कि पारिवारिक मूल्यों को परिवर्तित नही कर दिया जाता इसके लिये प्रयास भी माता - पिता को लड़के - लड़कियों को समान स्वतंत्रता,समान सोच,देकर करनें होगें.

16 जन॰ 2017

चने की खेती और उपयोग [CHANE KI KHETI AUR UPYOG]


भारत एक कृषि प्रधान राष्ट्र  हैं,जहाँ लगभग 72% ग्रामीण आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती किसानी से जुड़ी हुई हैं.किन्तु आज देश का 80 फीसदी किसान कोई अन्य रोजगार मिलनें पर कृषि कार्य छोड़नें को राजी बैठा हैं,एक ज़मानें में खेती के बारें में कई किवंदंतिया प्रचलित थी जैसें
 
 चने की फसल
उत्तम खेती ,मध्यम व्यापार और निकृष्ट चाकरी
किन्तु आज खेती को सबसे निकृष्ट माना जाता हैं.क्योंकि खेती आज जीवन निर्वाह जीतना भी पैसा परिवार को नही दे पाती उल्टा खेती करने वाला किसान खेती करतें - करतें इतना कर्जदार हो जाता हैं,कि अंत में सिर्फ आत्महत्या ही उसके अधिकार में रह जाती हैं,किसानों की आत्महत्या में बड़ा योगदान घट़िया बीजों का भी रहता हैं,यदि किसान थोड़ी सावधानी रखकर उचित समय पर उचित बीज और परिस्थितियों के अनुसार खेती करें तो निश्चित रूप से मुनाफा कमा सकता हैं,इन्ही परिस्थितियों के अनुसार आज हम चने की खेती और उसके बीजों के विषय में किसानों को जागरूक करना चाहतें हैं.

जल प्रबंधन के बारें में विस्तारपूर्वक जानियें

#.चने का परिचय :::

चना रबी की फसल हैं,जो अक्टूबर- नवम्बर माह में बोया जाता हैं.यह सूखा प्रभावित क्षेत्रों में आसानी से उगती हैं.यह दलहनी फसलों में सर्वाधिक बोई और खायी जानें वाली फसलों में से एक हैं.

#.चने की  उन्नत किस्में :::


#1.PUSA - 327 


यह भारतीय कृषि और अनुसंधान परिषद द्धारा विकसित किस्म हैं,जो सम्पूर्ण भारतवर्ष में बुवाई के लिये अनुशंसित हैं.इसके दाने बारीक,हल्के पीले होते हैं,और यह देशी किस्म की प्रजाति हैं.यह प्रजाति देर से बोने पर भी उपयुक्त पैदावार देती हैं.क्योंकि इसकी जड़े गहराई में जाती हैं,जिससे सूखा के प्रति प्रतिरोधकता इस प्रजाति में होती हैं.

#पैदावार :::

18 से 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

175 से 180 दिन

#2.PUSA - 362


यह किस्म राजस्थान,उत्तरप्रदेश,मध्यप्रदेश सम्पूर्ण उत्तर भारत के लिये अनुशंसित की गई हैं.इसके दानें मध्यम आकार के होतें हैं,और इसकी जड़ गलन के प्रति प्रतिरोधी होती हैं.

#पैदावार :::

25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

185 से 190 दिन

CHANE KI KHETI

#3.PUSA - 391 

यह मध्यप्रदेश,राजस्थान उत्तरी महाराष्ट्र के लिये अनुशंसित किस्म हैं,जिसके दानें मध्यम आकार के और हल्के भूरे किस्म के होतें हैं.यह असिचिंत क्षेत्रों के लिये उपयुक्त प्रकार की किस्म मानी जाती हैं.

#पैदावार:::

20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि:::

185 से 190 दिवस

#4.PUSA - 1003 

यह काबुली प्रजाति का चना हैं,जो जो उकठा रोग के प्रति प्रतिरोधक दर्शाता हैं,इसकी जड़ी अधिक पानी में भी गलती नही हैं.यह सम्पूर्ण भारत के लिये अनुशंसित किस्म हैं.

#पैदावार :::

20 से 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
 

#अवधि :::

180 से 185 दिन

#5. B.G.D - 72 

यह मध्य भारत जैसें मध्यप्रदेश, पूर्वी राजस्थान, उत्तरी महाराष्ट्र,दक्षिणी उत्तर प्रदेश के लिये अनुशंसित किस्म हैं.इसके दानें हल्के भूरे किस्म के होतें हैं.यह सूखा प्रतिरोधी किस्म हैं.

#पैदावार :::

22 से 28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

170 से 180 दिन

#6.B.G.D.- 128

यह सिंचाई वाले क्षेत्रों के लिये सर्वाधिक उपयुक्त किस्म हैं,जो कि मध्य भारत के लिये अनुशंसित की जाती हैं.

#पैदावार:::

25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

180 से 185 दिन

#7.PUSA - 1053

इस प्रजाति के दानें मोट़े काबुली प्रकार के होतें हैं.यह सिंचित क्षेत्रों के लिये अति उत्तम प्रजाति हैं.इसकी जड़े उकठा और गलन के प्रति प्रतिरोधक होती हैं.यह उत्तर भारत के लिये अनुशंसित की गई हैं.

#पैदावार :::

20 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

180 से 185 दिन.

#8.PUSA - 1088 

बीमारींयों के प्रति प्रतिरोधी किस्म हैं.यह काबुली प्रजाति की किस्म हैं,इसके दानें सुड़ोल होकर मोटे और चमकीले होते हैं.इसकी बुवाई की अनुशंसा उत्तरी भारत में की जाती हैं.

#पैदावार:::

25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि:::

180 से 185 दिन

#9.B.G.-1105

यह दिल्ली ,हरियाणा के लिये अनुशंसित किस्म हैं,जो देर से बुवाई के लिये उपयुक्त मानी गई हैं.इसके दाने मोटे काबुली प्रकार के होतें हैं.

#पैदावार :::

25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

180 से 185 दिन.

#10.B.G. - 1103 

यह किस्म भी देर से बुवाई के लिये उपयुक्त मानी जाती हैं.तथा दिल्ली तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में बुवाई के लिये उपयुक्त हैं.

#पैदावार :::

20 से 24 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

180 से 185 दिन.

#11.PUSA - 256

सिंचाई की सुविधा वालें क्षेत्रों हेतू अत्यन्त उन्नत किस्म हैं.यह खानें और पकवान हेतू अति आदर्श किस्म हैं.यह सम्पूर्ण भारत के लिये अनुशंसित की गई हैं.

#पैदावार :::

25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

180 से 185 दिन.


#12.वैभव 

यह किस्म सुखा और तापमान निरोधक किस्म हैं । इसका दाना बड़ा व कत्थई रंग का होता हैं।

#पैदावार :::

15 क्विंटल प्रति हेक्टयर (देर से बोने पर 13 क्विंटल तक) तक उपज देती हैं ।

#अवधि :::

110 से 115 दिन 

#13. जे जी 74 


इस किस्म का दाना मध्यम आकार का होता हैं ।

# पैदावार :::

15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टयर

# अवधि :::

110 से 115 दिन

#14.उज्जैन 21 :::


यह किस्म मध्यप्रदेश के पश्चिमी भाग के लिये अनुसंशित हैं। इसमें लगभग 18% प्रोटीन पाया जाता हैं।


# पैदावार :::

08 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टयर

# अवधि :::


115 दिन 


#15.राधे :::


# पैदावार :::

13 से 17 क्विंटल

अवधि :::

120 से 125 दिन 


#16.जे जी 315 :::

पछेती बुवाई हेतू यह उपयुक्त किस्म मानी गयी हैं ।इसका दाना बादामी रंग का होता हैं।

# पैदावार :::

12 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टयर

# अवधि :::


120 से 125 दिन 

#17.जे जी 11 :::


यह रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली किस्म हैं ।इसके दाने कोणीय और बड़े आकर के होते हैं ।

# पैदावार :::

15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टयर

# अवधि :::


15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#18.जी जे 130 :::

इसका पोधा कम  फैलाव वाला होता हैं ।

# पैदावार :::

18 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

# अवधि :::

110 दिन

# BG 391 :::

यह देशी चने की किस्म हैं।इसका दाना ठोस और मध्यम होता हैं।

# पैदावार :::

14 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टयर

# अवधि :::

110 से 115 दिन

# विशाल :::

चने की यह किस्म किसानों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हैं। क्योंकि इसका दाना बड़ा और उच्च गुणवत्ता वाला होता हैं ।  साथ ही अधिक ऊपज देने वाला होता हैं । इसके दानों से प्राप्त दाल सर्वाधिक स्वादिष्ट होती हैं।

# पैदावार :::

30 से 35 क्विंटल प्रति हेक्टयर 

#अवधि :::

110 से 115 दिन

# जे ए के आई - 9218 :::

यह किस्म उच्च गुणवत्ता के साथ उच्च अपने बड़े दानों के लिये प्रसिद्ध हैं ।

# पैदावार :::

15 से 20 क्विंटल

# अवधि :::

110 से 115 दिन

# काक 2 :::

काबुली चने की यह उन्नत किस्म है। 

पैदावार

काक 2 की औसत पैदावार 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हैं।

अवधि

काक 2 की पैदावार अवधि 120 से 125 दिन हैं।

# श्वेता 

श्वेता भी काबुली चने की उन्नत किस्में हैं। इसका दाना मध्यम किस्म का होता है। श्वेता सूखे और असिंचित क्षेत्रों के लिए अनुशंसित है।




#चने की खेती के लिये उपयुक्त जलवायु :::

चना 60 से 90 सेमी.वार्षिक वर्षा वाले क्षत्रों में आसानी से उगाया जाता हैं.भारत में चनें की अधिकांश खेती वर्षा के पश्चात की सुरक्षित नमी पर की जाती हैं.अधिक सर्दी और पाले कारण चने की पैदावार और अवधि प्रभावित होती हैं.

• चने की खेती के लिये उपयुक्त भूमि :::

हल्की से भारी दोमट मिट्टी चने की खेती के लिये उपयुक्त मानी जाती हैं.यदि मिट्टी भारी ,अधिक उपजाऊ होती हैं,तो पौधे की वानस्पतिक बढ़वार अधिक होती हैं,फलस्वरूप उत्पादन प्रभावित होता हैं.क्षारीय और लवणीय भूमि में चना पैदा करने से पूर्व भूमि को उपचारित करना चाहियें.चना ऐसी भूमि मे अधिक पैदा होता हैं,जो कल्टिवेटर से हांका जाता हैं.रोटावेटर से भूमि समतल करने पर चने की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं.

• चने की बुवाई का उपयुक्त समय :::

राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश सहित सम्पूर्ण मध्य भारत में चना अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में जब दिन का औसत तापमान 25 से 28 डिग्री सेल्सियस हो बोना उचित माना जाता हैं.जबकि जहाँ सिचांई के पर्याप्त साधन हो वहाँ इसकी बुवाई नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक की जा सकती हैं.

• बीज :::

अगेती बुवाई के लिये प्रति हेक्टेयर 70 - 80 कि.ग्रा.चना जबकि पछेती बुवाई के लिये 90 से 100 कि.ग्रा.चना बोना चाहिये.

• बीजोपचार :::

बीज बोने से पूर्व उपचारित करना उतना ही आवश्यक हैं,जितना भोजन करनें से पहले हाथ धोना.यदि किसान भाई बीज उपचारित नही करेंगें तो इसका उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा फलस्वरूप किसान को आर्थिक क्षति होगी.

चने को गलन व उकठा रोग से बचानें हेतू कार्बेडिजेम अथवा थाइरम से उपचारित करना चाहियें.ये कवकनाशी हैं,और 2 ग्राम प्रति किलो की दर से इन्हे बीज मे मिलातें हैं.
राइजोबियम से बीज उपचारित करनें से पौधे द्धारा वायुमंड़लीय नाइट्रोजन एकत्रीकरण प्रक्रिया तेज हो जाती हैं,जिससे उत्पादन अधिक होता हैं,इस हेतू दो 200 ग्राम प्रति हेक्टेयर राइजोबियम पर्याप्त होता हैं.

राइजोबियम से बीज उपचार हेतू एक लीटर पानी में 150 ग्राम गुड़ और तीन ग्राम गोंद मिलाकर उबाला जाता हैं,इसके पश्चात घोल को ठंडा कर इसमें राइजोबियम जीवाणु मिलाकर इसे बीज पर छिड़क दे.छांव में बीज सुखाकर बुवाई करें.इस विधि से 30% उत्पादन अधिक लिया जा सकता हैं.

• बुवाई :::

चने की बुवाई हल या सीडड्रील से करनी चाहियें. पंक्ति से पंक्ति के मध्य की दूरी 30 सेमी. तथा गहराई सिंचित क्षेत्रों 8 से 10 सेमी.तथा असिंचित क्षेत्रों में 5 से 7 सेमी.होनी चाहियें.

बीज बुवाई के समय पर्याप्त मात्रा मे नमी होना आवश्यक हैं.जिससे बीज का अंकुरण जल्दी हो सकें.बुवाई पूरब से पश्चिम दिशा की ओर होनी चाहिये जिससे पर्याप्त मात्रा में सूर्य प्रकाश पोधें को मिलता रहें.

• उर्वरक प्रबंधन :::

चने की बेहतर पैदावार प्राप्त करने के लिये मिट्टी परीक्षण उपरांत खाद और उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिये.

गोबर की खाद का प्रयोग 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिये और इसे अच्छी तरह खेत में मिलाकर बुवाई करनी चाहियें.

चूंकि चना दलहनी फसल हैं,अत: वायुमंड़लीय नाइट्रोजन का स्थरिकरण करती हैं,किन्तु मृदा का स्थरीकरण बुवाई के 20 दिनों के बाद शुरू होता हैं,अत: शुरूआत की बढ़वार के लिये 20 किलो ग्राम यूरिया और 50 किलो ग्राम फास्फोरस का प्रयोग खेत तैयार करतें वक्त करना चाहियें.

कुछ सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग कर चने की पैदावार कई गुना बढ़ाई जा सकती हैं,जैसे गंधक के उपयोग से फसल की गुणवत्ता के साथ उत्पादन पर सकारात्मक असर पड़ता हैं.

क्लोरोसिस नामक रोग लोह तत्व की कमी से होता हैं,जिससे नई पत्तियाँ पीली पढ़कर सूख जाती हैं,और पौधे की वृद्धि रूक जाती हैं.इस प्रकार की समस्या होनें पर फेरस सल्फेट 5 ग्राम 1 लीटर पानी की दर से फसलों पर छिड़काव करें.

• सिंचाई 

चना वैसे तो असिंचित क्षेत्र में अधिकांशत: बोया जाता हैं,किन्तु चने की मांग बढ़नें , नयी - नयी किस्मों के आ जानें व इन किस्मों से बेहतर उत्पादन देने की वज़ह से सिंचित क्षेत्रों में भी चने का बहुत उत्पादन होने लगा हैं.

चने की उपज बढ़ाने हेतू दो बार सिंचाई की आवश्यकता पड़ती हैं,प्रथम बार बोवाई के 45 दिन बाद जब फूल नही आये हो तथा दूसरी बार पौधे में फलियाँ बेठने पर इस विधि से सिंचाई करनें पर बीमारी भी बहुत कम चने को प्रभावित करती हैं.

यदि सिंचाई की व्यवस्था एक ही बार हो तो बुवाई के 60 दिन बाद सिंचाई करनी चाहियें.
यदि असिंचित क्षेत्रों में चने की फसल लेनी हैं,तो खरीफ फसल के तुरंत पश्चात खेत मे नमी देखकर फसल बोनी चाहिये.

• चने मे खरपतवार प्रबंधन

चने में पाये जानें वाले खरपतवार के नियत्रंण हेतू समय - समय पर निराई - गुडाई करते रहना चाहिये जिससे की भूमि में वायु संचार बेहतर तरीके से हो.

यदि रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण करना हो तो 1 kg सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर के हिसाब से पेंड़ीमेथालिन {30 E.C.} को 650 लीटर पानी मे घोलकर बुवाई के तुरंत बाद परन्तु अंकुरण से पूर्व छिटकाव करें.

फ्लूक्लोरोलिन {45 E.C.} 1 kg सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर सतही मिट्टी पर छिडकाव करे तत्पश्चात बोवनी करें.

• चने के प्रमुख कीट 


चने की फसल मे अनेक प्रकार के कीट नुकसान पँहुचाते हैं जैसे :

• कटुवा 

यह कीट चने के उगते पौधो को काटकर जमीन पर गिरा देता हैं, जिससे किसान भाईयों को काफी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता हैं.

• बचाव 

1.कटुवा से बचाव हेतू किसान भाई गर्मीयों मे खेत में हल से गहरी जुताई करें. 
2.सरसो,गेँहू और अलसी को सह - फसली रूप में चने के साथ बोये.
3.फसल चक्र अपनायें.
4.रासायनिक प्रबंधन हेतू 25 kg डाइक्लोरोफोन 5% प्रति हेक्टेयर की दर से शाम के समय फसल पर बुरकाव करें.

• दीमक 

खडी फसल में दीमक का प्रकोप अधिक देखनें मे आता हैं,जिसे किसान नजरअन्दाज अधिक करतें हैं,फलस्वरूप फसल नष्ट हो जाती हैं.क्योंकि दीमक सीधे फसल की जड़़ पर हमला कर उसे सूखा देती हैं.

• बचाव

1.गर्मीयों में गहरी जुताई आवश्यक रूप से करनी चाहियें जिससे दीमक के बिल नष्ट हो जावें.
2.खडी फसल में दीमक का प्रकोप होनें पर चार लीटर क्लोरोपाईरोफास (20 E.C.) प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचाई के पानी के साथ करें.

• फली छेदक कीट

यह कीट प्रारंभ मे पत्तियाँ को खाता हैं,पश्चात फली आनें पर फली को खाकर उसे नष्ट कर देता हैं.

• बचाव

इसका निंयत्रण करनें के लिये फलियाँ बनते समय 1.25 लीटर एंडोसल्फान (35 EC) प्रति हेक्टेयर की दर से घोल बनाकर छिड़कना चाहियें.

• चने की प्रमुख बीमारी


• उकठा 

इस बीमारी में पौधे की जड़ सड़ जाती हैं,तथा धिरें - धिरें सम्पूर्ण पौधा पीला पड़कर नष्ट हो जाता हैं.यह बीमारी फसल उगने के 15 - 20 दिनों बाद होती हैं.

• बचाव

1.बीजों को उपचारित करनें के पश्चात ही बोना चाहियें.
2.फसल चक्र का पालन करें अर्थात बार - बार एक ही खेत मे एक ही फसल बोने की बजाय बदलकर फसल बोना चाहिये. सरसो व गेंहू बोकर इस बीमारी से बचा जा सकता हैं.
3.बीमारी से बचाव के लिये अगेती बुवाई न करें.

• अंगमारी 

यह बीज से फैलने वाली बीमारी हैं.इस बीमारी में पत्तियों, फूल,तने, और फलियों पर गोल ,छोटे - छोटे भूरे रंग के चकते बन जातें हैंं.जिससे फूल ,पत्तियाँ और फलियाँ सूखकर गिर जातें हैं.

• बचाव

1.मेंकोजेब के 0.2 % घोल का छिड़काव करें.
2.बीजो की बुवाई से पूर्व कैप्टान 3 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें.

• पाला गिरने पर बचाव

यदि फसल पर पाला गिरने की संभावना हो तो 45 लीटर पानी में 1 - 1 किलो की दर से सल्फर,यूरिया,पोटाश और बोरान मिलाकर फसल पर छिड़काव करनें से फसल पाले से पूर्णत: सुरक्षित रहती हैं.

• कटाई 

जब पत्तियों और फलियों का रंग सुनहरा होने लगे तब काटकर एक सप्ताह तक धूप में अच्छी तरह सुखा लें,तत्पश्चात मडाई करें.
चने की खेती
 चने की फलियाँ

• चने की पोषणीय महत्ता 

कार्बोहाइड्रेट.               प्रोटीन.               वसा

  56.5%.                    19.4%.            4.5%

फायबर.                  खनिज़ लवण.      पानी

7.4%.                       3.4%.             10.2%

कैल्सियम.               फास्फोरस.       आयरन

280 mg.                   301mg.       12.3mg

   एनर्जी

 396 kcal.            (प्रति 100 gm हरा चना)

CHANE KI KHETI

• चने की औषधिगत उपयोगिता

• चना कैल्सियम और फास्फोरस का अच्छा स्रोत हैं यदि हड्डीयों से संबधित समस्या जैसे fracture, गठिया ,मोच, हो तो भूने चने नियमित रूप से खाना चाहिये.

• चना कुपोषण मिटाने का बहुत अच्छा स्रोत हैं,क्योंकि इसमें आयरन और प्रोटीन पर्याप्त मात्रा मे पाया जाता हैं ,अत: कुपोषण की समस्या होनें पर चना रात को भीगोंकर सुबह खायें.

• इसमें लोहा और खनिज लवण पाया जाता हैं,यदि गर्भवती स्त्रीयाँ नियमित रूप से देशी चने का सेवन करें तो रक्ताल्पता की समस्या नही होती हैं,तथा संतान भी स्वस्थ और सुंदर उत्पन्न होती हैं.

• हरे चने मे पानी की मात्रा भी बहुत होती हैं,जो ठंड के दिनों मे पानी की पूर्ति का उत्तम स्रोत हैं.

• चने से बनने वाला बेसन एक उत्तम सौन्दर्यवर्धक पदार्थ हैं,जिसका इस्तेमाल हल्दी और दूध के साथ मिलाकर उबटन के रूप में किया जावें तो सौन्दर्य निखर जाता हैं,यही कारण है,कि दुल्हन का सौन्दर्य बेसन से निखारा जाता हैं.

• चना भारतीय रसोई का अभिन्न अंग हैं,जिससे बहुत सारे व्यंजन बनायें जातें हैं और चने से बने व्यंजन बहुत स्वादिष्ट होते हैं,यदि बच्चों को मैदा से बने नूडल्स,पिज्जा,बर्गर आदि के स्थान पर बेसन से बनी चीजों को रोचकता से परोसा जावें तो पोषणता और स्वास्थ बच्चों को दिया जा सकता हैं.

• चना वसा (fat) का बहुत उत्तम स्रोत हैं,अत: दूध देने वाली गाय,भैंस को इसकी खली बनाकर खिलानें से दूध की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती हैं,इसी प्रकार यदि दूध पीलानें वाली स्त्रीयाँ चने का सेवन करें तो दूध की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती हैं.


• चने का साग खानें से शरीर का मेटाबॉलिज्म सक्रिय रहता हैं फलस्वरुप पाचन संस्थान से संबधित रोग नहीं होतें हैं ।

• मध्यप्रदेश के लिए अनुशंसित गेंहू की उन्नत किस्में

7 जन॰ 2017

SINGHADE [WATER CHESTNUT] KE FAYDE

SINGHADE [WATER CHESTNUT] KE FAYDE

परिचय :::

Waterchestnut, सिंघाड़े
 Singhade 

सिंघाडा जलाशयों में पैदा होनें वाला एक अत्यन्त पोष्टिक,शाकाहारी फल हैं,इसकी बाहरी त्वचा कठोर होती हैं,जबकि अन्दर का फल मुलायम,स्वादिष्ट,और सफेद रंग का होता हैं.भारतीयों समाज में सिंघाड़ा अनुपम स्थान रखता हैं, क्योंकि इसके बने आटे की रसोई उपवास जैसे पवित्र तप में उपयोग लाई जाती हैं.

प्रकृति :::


सिंघाड़ा शीत प्रकृति का फल हैं.

सिंघाड़े में पाये जानें वालें पोषक तत्व :::


  पानी                    प्रोटीन.                 फायबर

70 Gm.                 4.7 gm.              0.6mg


  वसा                   शुगर.               खनिज तत्व

0.3 gm.             23.3 gm.            1.1 gm


कैल्सियम.            फास्फोरस.           आयरन

020.0mg.              150 mg.            0.8 mg


पोटेशियम.             मैग्नीशियम.           काँपर

650 mg.                   72 mg.          1.31mg


मैगनीज.                  जिंक               क्रोमियम

0.85 mg.             1.56 mg          0.011mg


थायमिन.              राइबोफ्लेविन.      नियामिन

0.50 mg.               0.07 mg.         0.50mg


विटामिन सी                         एनर्जी

   9.0 mg.                            115 kcal

                                              [प्रति 100 ग्राम]


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० गिलोय के फायदे


० कद्दू के औषधीय उपयोग


० तुलसी


० च्वनप्राश


० बिल्वादि चूर्ण

                  

सिंघाड़े के फायदे :::


• सिंघाड़ा जल का अति उत्तम स्रोत हैं,अत:जल की कमी होनें पर सिंघाड़े का सेवन अति लाभप्रद हैं,सफर के दोरान या पर्वतारोहण के समय सिंघाड़े को खानें से थकावट़ महसूस नहीं होती हैं.

• अतिसार [Dysentery] में सिंघाड़े का सेवन बहुत लाभदायक होता हैं,इसमें उपस्थित जिंक पतले दस्त में शीघ्र आराम देता हैं.

• कब्ज होनें पर इसका सेवन रात को भोजन के पश्चात किया जावें तो सुबह खुलकर पाखाना आता हैं.

• इसमें उपस्थित फायबर आंतों की गहराई से सफाई करता हैं,और उन्हें मज़बूत बनाता हैं.

• पायरिया या दाँतो से संबधित कोई अन्य समस्या होनें पर सिंघाड़े के छिलके पीसकर मंजन की तरह इस्तेमाल करें.इसके फल को खानें से भी बहुत फायदा होता हैं,क्योंकि यह विटामिन सी का उत्तम स्रोत हैं,जो कि स्वस्थ दांतों और मसूड़ो के लिये आवश्यक हैं.

• कुपोषण से ग्रसित किशोरों और बच्चों को यदि नियमित रूप से 100 gm सिंघाड़े खिलायें जायें तो तीन मास की अवधि में कुपोषण समाप्त हो जावेंगा.

• इसके आट़े से बनी रोटी गर्भवती स्त्रीयाँ खायें तो न केवल बच्चा तंदुरूस्त पैदा होगा,बल्कि प्रसव पश्चात माताओं को दूध भी पर्याप्त मात्रा में और लम्बें समय तक आयेगा.

• हड्डीयों से संबधित समस्या होनें जैसें fracture, हड्डी का अपनी जगह से खिसकना आदि में इसका सेवन बहुत लाभदायक होता हैं.साथ ही इसके गुदे को पीसकर fracture वाली जगह बांधनें से दर्द कम हो जाता हैं,तथा पेनकिलर लेनें की आवश्यकता नहीं पड़ती हैं.

• बच्चों के दाँत निकलते समय इसका सेवन करवानें से बच्चों को होनें वाली शारीरिक परेशानी नहीं होती और दाँत आसानी से निकलतें हैं.

• टाँफी,चाकलेट आदि पदार्थों के सेवन से बच्चों के दाँत बहुत जल्दी ख़राब होतें ऐसे में सिंघाड़े का सेवन अत्यन्त लाभकारी हैं,क्योंकि इसमें उपस्थित कैल्सियम और फास्फोरस दाँतों को खराब नही होनें देता.


० शास्त्रों में वर्णित है तेलों के फायदे


• पथरी की समस्या होनें पर सिंघाड़े के आटे़ में हल्का नमक मिलाकर रोटी बनाकर खायें बहुत आराम मिलेगा.

• सिंघाड़ा रक्तचाप नियत्रिंत करता हैं.अत : रक्तचाप को नियमित करनें के लिये इसका सेवन बहुत चमत्कारिक परिणाम देता हैं.

• सिंघाड़े में शर्करा पर्याप्त मात्रा में उपस्थित होती हैं,जो मधुमेह रोगीयों के लिये भी अहानिकारक होती हैं.

• मिरगी रोग की समस्या होनें पर इसके आट़े का हलवा गाय के दूध में बनाकर खिलाना चाहियें.

• सिंघाड़ा " मस्तिष्क आहार" हैं,इसमें उपस्थित खनिज़ पदार्थ मस्तिष्क का सम्पूर्ण विकास करनें में मदद करतें हैं.

• सिंघाड़ा शरीर से विषैलें पदार्थों को बाहर निकालकर कैंसर जैसें रोग से बचाता हैं.

• इसमें पानी पर्याप्त मात्रा में होता हैं,जो त्वचा में नमी का स्तर बनायें रखता हैं,फलस्वरूप त्वचा मुलायम और कांतिमय बनी रहती हैं.इसके लियें सिंघाड़े का सेवन और इसके आटे का उबटन शरीर पर लगाया जाता हैं.

• इसमें पोटेशियम होता हैं,जो किड़नी की कार्यपृणाली को सुचारू रूप से चलाता हैं,अत : किड़नी रोगीयों के लियें सिंघाड़ा वरदान हैं.

तो दोस्तों हैं,ना सिंघाड़ा अनुपम फल.
SINGHADE [WATER CHESTNUT] KE FAYDE

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