बुधवार, 28 दिसंबर 2016

Anidra prakar, karan aur prabhandhan [अनिद्रा प्रकार कारण और प्रबंधन]

अनिद्रा की समस्या:::



आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में अच्छी नींद भी एक सपना बन गई हैं.वे लोग वास्तव में ख़ुशनसीब होतें हैं,जिनकी रात को नींद लगनें के बाद सीधी सुबह ही होती हैं.नींद हमारें स्वास्थ के लियें उतनी आवश्यक हैं, जितनी की आँक्सीजन बगैर सोये हम ज्यादा दिनों तक जिंदा नहीं रख सकते ,यदि हम 24 घंटे नहीं सो पायेगें तो उसका नकारातमक प्रभाव हमारें शारीरिक और मानसिक स्वास्थ पर पड़ेगा.



आयुर्वेदाचार्यों ने निद्रा का वर्गीकरण कई प्रकार से किया हैं,आचार्य सुश्रुत के अनुसार जब ह्रदय तम से आवृत होता हैं,तो नींद आती हैं,और जब तम अल्प होकर सत्व प्रबल होता हैं,तो नींद खुल जाती हैं.


आधुनिक शोधार्थी और scientist नींद पर लगातार शोध कर रहे हैं,परन्तु उनका शोध आज तक नींद आनें को लेकर तर्कपूर्ण व्याख्या प्रस्तुत नहीं कर सका हैं.



उम्र के हिसाब से नींद की व्याख्या scientist द्धारा की गई हैं,जैसें


• 2 वर्ष तक 16 घंटे की नींद आवश्यक हैं.


• 3 से 12 वर्ष तक 10 घंटे.


• 13 से 18 वर्ष तक 10 घंटे.


• 19 से 55 वर्ष तक 8 घंटे.


• 55 से ऊपर उम्र के लोगों को 6 से 7 घंटे नींद लेनी आवश्यक हैं.




० गिलोय के फायदे



प्रकार :::



आधुनिक चिकित्सतको के मतानुसार अनिद्रा कई प्रकार की होती हैं,जैसें

1.Ideopethic insomnia



यह बीमारी गर्भ या बचपन से शुरू होकर वयस्क होनें तक बनी रहती हैं,इसमें व्यक्ति अधिक या कम सोता हैं.


2.Adjustment insomnia :::



यह बीमारी अत्यधिक तनाव की वज़ह से होती हैं.जिससे व्यक्ति बैचेनी में रातभर करवट बदलता रहता हैं.


3.psyco physiological :::



इस तरह के रोगी में यह ड़र बैंठ जाता हैं,कि नींद नहीं आयेगी.अत: वह रातभर  सो नही पाता हैं.


4.Behaviour insomnia:::



इस तरह की अनिद्रा की समस्या ऐसे लोगों में होती हैं,जिनको एक निश्चित जगह पर सोनें की आदत पड़ जाती हैं,या फिर कोई विशेष व्यक्ति पास में सोया हैं,तो ही व्यक्ति को नींद आती हैं,जैसें कि बच्चें अपनी माँ के उठते ही तुरन्त साथ में ही उठ जातें हैं.


कारण :::



नींद नहीं आनें या अनिद्रा के कई कारण हैं,जैसें


• उच्च रक्तचाप.


• मानसिक तनाव


• सोनें की अनियमित जीवनशैली


• कैफीन,तम्बाकू चाय जैसे उत्तेजना पैदा करनें वालें पदार्थों का सेवन.


• कोई शारीरिक समस्या होनें पर जैसें हाथ - पैरो,सिर,बदन,पेट आदि में दर्द या इनसे सम्बंधित कोई व्याधि होनें पर भी अनिद्रा की समस्या पैदा हो जाती हैं.


• डिजीटल डिसआर्ड़र की समस्या होनें पर भी नींद नहीं आती जैसें देर रात तक मोबाइल, लेपटाप,कम्प्यूटर को रात के अंधेरें में चलाना.


• सोशल साईट पर अत्यधिक सक्रिय रहेनें वालें तथा बार - बार अपनी पोस्ट ,लाईक्स,कमेंट़ जाँचनें वालों को भी नींद नहीं आनें की समस्या होती हैं.


• दवाईयों का अधिक सेवन करनें वालें व्यक्तियों को भी निद्रा की समस्या रहती हैं.


• खर्राटे लेनें वालें व्यक्तियों को भी अनिद्रा की समस्या रहती हैं.


• मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति को भी नींद नहीं आती हैं.




प्याज के औषधीय प्रयोग



धनिया के फायदे


प्रबंधन :::



अच्छी और गहरी नींद प्राप्त करना कोई मुश्किल काम नहीं हैं,एक बार भगवान बुद्ध से उनके शिष्य ने प्रश्न किया कि प्रभु मैं कई दिनों से देख रहा हूँ,कि आप जिस करवट़ सोतें हैं,उसी करवट़ सुबह उठतें हैं और मैं रात भर करवट़ बदलतें - बदलतें गुजार देता हूँ,तब बुद्ध ने शिष्य को कहा कि मैं सोतें समय बुद्धत्व को प्राप्त हो जाता हूँ,अर्थात मेरा मन पूर्णत:शून्य को प्राप्त हो जाता हैं,ऐसी अवस्था में मात्र नींद ही शेष रह जाती हैं,जो मेरें मस्तिष्क को प्राप्त हो जाती हैं.अत: सोने से पहले मस्तिष्क शांत और प्रशन्न होना आवश्यक हैं.





• सोनें का एक निश्चित समय निर्धारित कर लें उस निश्चित समय पर सोनें से मस्तिष्क उस निश्चित समय पर सोनें का विवश कर देगा.


• बिस्तर पर सिर्फ सोनें का काम करें,लेपटाप,मोबाइल चलाना या लेटे हुये टी.वी.देखना नही करें,क्योंकि इन डिवाइसों से निकलनें वाली कृत्रिम नीली रोशनी आँखों पर सीधा असर डालती हैं,फलस्वरूप लम्बें समय तक आँखों में चमक बनी रहती हैं.


• सोतें समय बिस्तर पर शवासन करें, पूरें शरीर को ढीला छोड़कर सोयें.


• सोनें से 3 घंटे पहलें भोजन करले इसके पश्चात कुछ भी खाना वर्जित करें.


• रात के समय चाय,काँफी या अन्य उत्तेजना पैदा करनें वालें पदार्थों का सेवन नहीं करें.


• यदि सुबह तथा शाम के वक्त हल्की फुल्की कसरत जैसें पैदल घूमना,प्राणायाम, ध्यान करेंगें तो नींद बहुत ही गहरी आयेगी.


• पेट के बल सोनें से परहेज करें क्योंकि पेट के बल सोनें से श्वसन प्रकिया में बाधा पँहुचती हैं.


• यदि प्रोस्टेट संबधित कोई समस्या हैं,और बार - बार पैशाब जानी पड़ रही हो तो चिकित्सक द्धारा बताईं गई दवाईयों का सेवन सोनें से 1 घंटे पहलें अवश्य करें.


• सोनें से पहलें हाथ,पाँव और मुँह पानी से अवश्य धो लें.


• बादाम,काजू,अलसी, अखरोट़ का नियमित सेवन करना चाहियें क्योंकि इसमें पाया जानें वाला विटामिन E और ओमेगा 3 फेटीएसिड़ दिमाग को चुस्त रखता हैं.


• सिर के निचें या तकिये के नीचें मोबाइल रखकर कभी नहीं सोयें क्योंकि इससे निकलनें वाली तरंगे मस्तिष्क की कार्यपृणाली को बाधित करती हैं.



• जब तक बहुत तेज़ नींद नहीं आती हो तब तक बिस्तर पर नही सोयें इसके बजाय वह काम करें जो आपको अरूचिकर लगें,ऐसा करनें से तुरन्त नींद आ जायेगी.

० हरसिंगार के औषधीय गुण

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

swasth samajik Jivan ke 3 pillar [स्वस्थ सामाजिक जीवन के 3 पीलर]

सामाजिक जीवन
 भगवान महावीर

दोस्तों,स्वस्थ जीवन जीनें के लिये के लियें दवाई,योग,व्यायाम के साथ स्वस्थ सामाजिक आचरण की भी बराबर आवश्यकता होती हैं,यह बात भारतीय प्राचीन शास्त्रों ने कई बार उद्घाटित की हैं,वर्तमान सामाजिक जीवन में भी इस बात को कई मोटिवेशन वक्ता स्वीकारतें हैं,कि स्वस्थ सामाजिक आचरण के बिना स्वस्थ जीवन की कल्पना करना नामुमकिन हैं.

आईयें जानतें हैं,स्वस्थ जीवन के पीलरों को

# 1.अहंकार मुक्त जीवन :::


अपनें - अपनें क्षेत्रों में व्यक्ति सफल होकर शीर्ष मुकाम धारण करतें हैं,कुछ व्यक्ति सफल होकर भी विनम्र बनें रहतें हैं,ऐसे लोगों का शीर्ष पद पर बनें रहना वास्तव में सुखद और सन्तोष प्रदान करता हैं,भगवान राम अहंकाररहित जीवन के सर्वोत्तम उदाहरण हैं,सूर्यवंशी जितनें भी राजा हुए उन सब में उनका नाम ही सर्वपृथम जिव्हा पर आता हैं,क्यों ?क्योंकि राम में शक्ति के साथ अहंकारमुक्त आचरण भी था.तभी तो रावण को परास्त करनें के लियें उन्होनें मनुष्यों,जानवरों सभी का सहयोग लिया.जबकि रावण अपनें अहंकार और आत्ममुग्धि में परिवार का सहयोग भी न ले सका और भाई के कारण ही युद्ध भूमि में मारा गया.

नमन्ति फलनो वृक्षा : नमन्ति गुणनो जना:|
शुष्क काष्ठानि मुर्खाश्च न नमन्ति कदाचन ||

अर्थात फल देनें वाला वृक्ष और गुणवान व्यक्ति झुक जातें हैं,मूर्ख व्यक्ति और वृक्ष का सूखा ठूंठ हमेशा अकड़कर खड़े रहतें हैं.

scientific रूप से अंहकार का नकारातमक प्रभाव शरीर और मस्तिष्क पर पड़ता हैं,जो व्यक्ति विनम्र होकर अपना कार्य करता हैं,उसके मस्तिष्क से ऐसे हार्मोंन का उत्सर्जन अधिक होता हैं,जो रोगप्रतिरोधकता को बढ़ाकर मूड़ को खुशमिजाज रखते हैं.


जबकि अंहकारी व्यक्ति के मस्तिष्क से ऐसे हार्मोंन उत्सर्जित होतें हैं,जो व्यक्ति को तनाव देतें यही कारण हैं,कि सबसे ज्यादा तनाव में अंहकारी व्यक्ति ही रहता हैं,सचिन तेंडुलकर क्रिकेट के सबसे सफल खिलाड़ी मानें जातें हैं,जिनके प्रदर्शन को देखकर सुखद आश्चर्य होता हैं,क्या कभी आपनें इस खिलाड़ी को किसी से अहंकार प्रदर्शित करते देखा हैं,जबकि कई खिलाड़ी जिनकी प्रतिभा सचिन से भी उम्दा थी,विवादों और अंहकार के साथ ही गुमनाम हो गयें.


ऊँचाई पर चढ़नें वाला पर्वतारोही तभी चोंटी पर पहुचेगा जब पीठ और सिर आगे की ओर झुकाकर चलें.अत:


नर की और नलनीर की,गति एकै कर जोइ |
जेतो नीचो है चले,ते तो ऊँचो होय ||

# 2.ईर्ष्या का साथ छोडियें :::



मनुष्य जैसें - जैसें आगें बढ़ रहा हैं,प्रतिस्पर्धा भी उसी अनुपात में बढ़ रही हैं,पढाई के नाम पर ईर्ष्या,धर्म के नाम पर ईर्ष्या,कार्यस्थल पर एक दूसरें को नीचा दिखानें की होड़ ,शर्मा जी की नई गाड़ी की ईर्ष्या और भी न जानें कितनें प्रकार से मनुष्य एक दूसरें की प्रगति देखकर नाक भों सिकोड़ते रहतें हैं,क्या यह स्वस्थ समाज की निशानी हैं ? कदापि नही दूसरों से ईर्ष्या वही लोग करतें हैं,जिनके पास करनें के लिये कुछ भी नही होता.

● पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचार

• गिलोय के फायदे


एक बार भगवान बुद्ध से  भिक्षुक ने प्रश्न किया कि उनके प्रति हमारा नजरिया क्या हो जो हमारें प्रति दुर्भावना रखतें हो तब बुद्ध ने मुस्कुराते हुये कहा कि यदि उसके द्धारा की गई ईर्ष्या का तुमनें प्रति उत्तर नहीं दिया अर्थात उसके प्रति सदभाव रखा तो उसकी ईर्ष्या उसी के दिमाग में बनी रहकर उसका जीवन मुठ्ठी की रेत की तरह कम करती रहेगी.कहनें का तात्पर्य यही कि हम ईर्ष्या,राग देष जैसे विचारों को हमारें मन में न आनें दें तथा प्रेम,सदभाव जैसें गुणों को अपनें जीवन में अंगीकार करें.


परनिंदा रस में डूबें हुए विचार विचार प्रदूषण बनकर सम्पूर्ण वातावरण को कम्पायमान रख प्रदूषित करतें हैं.और व्यक्ति के भावनात्मक पक्ष को कमज़ोर करतें हैं.

# 3.क्रोध की धार कुन्द करें :::

सामाजिक जीवन
 Angry 
आपनें अनेक लोगों को बात - बात पर तुनकते हुये देखा होगा ऐसे व्यक्ति समाज का तो अहित करतें ही हैं,अपना भी सर्वनाश कर बेंठतें हैं.रावण बात - बात में क्रोध करता था किन्तु इस क्रोध का अन्तिम परिणाम क्या हुआ सब जानतें हैं,दूसरी और भगवान राम और परम प्रतापी हनुमान थें जिनके बास बल होतें हुये भी अक्ल थी.रामायण की अनेक पंक्तियों से हमें धेर्य धारण करनें व आवश्यकता होनें पर ही उचित रीति से क्रोध करनें की शिक्षा मिलती हैं.ऐसे ही जब राम नें समुद्र से बार - बार रास्ता देनें का आग्रह किया और समुद्र नें इस विनती को बार - बार ठुकराया तो राम को मज़बूरी के वश धनुष पर प्रत्यांचा चढ़ाकर समुद्र सुखानें की धमकी देनी पड़ी कहनें का अर्थ यही कि राम का क्रोध उचित अनुचित पर निर्णय करनें के पश्चात ही प्रकट़ हुआ था.अत: जब तक विनती और प्रार्थना से काम चलता हो वहाँ अनावश्यक क्रोध को प्राथमिकता नही देनी चाहियें.किसी ने कहा भी हैं,कि


क्रोध मूर्खता से शुरू होकर पश्चाताप पर समाप्त होता हैं.


क्रोध से अनेक शारीरिक और मानसिक पीढ़ा भी प्रकट होती हैं,जैसें क्रोध करनें वालें का रक्तचाप उच्च ही रहता हैं,उच्चरक्तचाप से अनेक शारीरिक परेशानी बिना बुलायें ही शरीर में आ जाती हैं,जैसें ह्रदय रोग,मधुमेह,ब्रेन स्ट्रोक आदि.अत: इन सभी शारीरिक समस्यायाओं से बचनें हेतू क्रोध पर नियत्रंण करना आवश्यक हैं.

० पलाश वृक्ष के औषधीय गुण


जिन व्यक्तियों को अधिक क्रोध आता हैं,उन्हें अनुलोम - विलोम,प्राणायाम जैसी योगिक क्रियाओं को अपनें जीवन का अभिन्न अंग बना लेना चाहियें,ऐसा करनें से मस्तिष्क में शांति, संतुलन स्थापित होता हैं.

 कर्म और भाग्य में से कोन बड़ा हैं


सोमवार, 19 दिसंबर 2016

13 अचूक गुण अरहर के [ 13 Great Benefit of pigeon pea ]

#1.परिचय :::

अरहर या तुवर (Tuvar) विश्वभर में खाई जानें वाली दलहन हैं,यह शाकाहारी लोगों के लियें प्रोटीन प्राप्ति का उत्तम स्रोंत हैं.



अरहर या तुवर शुष्क क्षेत्रों में बहुतायत में बोई जाती हैं,इसका पौधा भूमि के लिये नाइट्रोजन स्थिरीकारक हैं.अरहर की दाल से अनेक व्यंजन बनायें जातें हैं.



भारतीय अरहर के औषधिय गुणों को वर्षों से पहचानतें हैं,यही कारण हैं,कि भारतीय भोजन अरहर की दाल के बिना अधूरा हैं.


#2.पोषणीय संगठन :::

कार्बोहाइड्रेट.     कैल्सियम.       फाँस्फोरस

  57.3%.             178mg.       376mg.  

 प्रोटीन.             खनिज लवण.      फायबर 

20.2%.               3.8%.                8.1%

  वसा              पानी                  आयरन

1.5%.            10.2%.               16.6%

 एनर्जी

383 mg.                               [प्रति १०० ग्राम]

तुवर
अरहर पर लदी फलियाँ

चने की खेती और उपयोग के बारें में जानें


#3.अरहर के गुण :::



१.कब्ज होनें पर छिलकेयुक्त अरहर को  उबालकर  रात के समय सेवन करते रहना चाहियें. इसमें उपस्थित फायबर आंतों की गहरी सफाई कर दूषित मल को बाहर निकाल देता हैं.



२.अर्श रोग में साबुत अरहर को उबालकर छाछ या दही के साथ कद्दूकस कर खानें से अर्श खत्म हो जाता हैं.



३. जब अरहर पौधे पर हरी अवस्था में होती हैं,उस समय इसे खानें से कुपोषण समाप्त होता हैं.



४.अरहर की दाल बनातें वक्त निकला छिलका उबालकर प्रसूता को खिलानें से दूध पर्याप्त मात्रा में आता है.



५.इसकी फलियों के छिलके में आयोडीन उपस्थित रहता हैं,अत :हायपोथाइराड़िज्म (hypothyroidism) से पीड़ित व्यक्ति को इसकी फली को चूसना चाहियें.



६.इसमें उपस्थित पानी डायरिया रोग की उत्तम रोकथाम करता है,साथ ही शरीर को  ऊर्जा प्रदान करता हैं.तुवर की दाल में घी मिलाकर सूप की तरह पीनें से रोगी जल्दी ठीक होता हैं.



७.हड्डीयों से संबधित समस्या जैसे हड्डी कमज़ोर होना,अस्थिभग्न होना आदि में तुवर दाल का सेवन फायदेमंद होता हैं.



८.अरहर की पत्तियों का पेस्ट बनाकर रोज मुहँ पर लगाते रहनें से रूखी त्वचा पर नमी आ जाती हैं.गोरी सुन्दर त्वचा हो जाती हैं.



९.गठिया रोग में अरहर खानें से हड्डीयों का दर्द कम हो जाता हैं.



१०.त्वचा रोगों में अरहर के पोधें को पीसकर उसमें नीम तेल मिलाकर लगानें से आराम मिलता हैं.



११.इसमें उपस्थित लोहा गर्भवती स्त्रीयों तथा एनिमिया ग्रसित व्यक्तियों के लियें बहुत फायदेमंद होता हैं,अत: तुवर दाल का सेवन इन लोगों को अवश्य करना चाहियें.



१२.मेनोपाँज की अवस्था में साबुत अरहर का सेवन शरीर में कैल्सियम का स्तर बनायें रखता हैं.



१३.अरहर रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती हैं,इसके लिये अरहर की दाल में अश्वगंधा पावड़र मिलाकर प्रतिदिन पीना चाहियें.



 ं० निर्गुण्डी के औषधीय प्रयोग


० निम्बू के फायदे


० नीम के औषधीय उपयोग


० एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन


० कद्दू के औषधीय उपयोग


० बैंगन के औषधीय उपयोग


० पलाश वृक्ष के औषधीय गुण


सोमवार, 12 दिसंबर 2016

बथुआ [chinopodium album]

#1.बथुआ [Chenopodium album]



बथुआ रबी के मोसम में फसलों के साथ उगनें वाला अनचाहा पौधा हैं,जो कही भी सहजता से उग सकता हैं.



इसका scientific नाम चिनोपोडियम एलबम हैं.और यह चिनोपोडिएसी परिवार का सदस्य हैं.



भारत के अलग - अलग भागों में इसके अलग  - अलग नाम है जैसें गुजरात में चिलनी भाजी,मध्यप्रदेश में चिला,बंगाली में बेटू साग कहतें हैं.


चरक संहिता में इसे वास्तुक नाम से पुकारा गया हैं.और इसके दो प्रकार गौड़वास्तुक और यवशाक बतायें गये हैं

 सब्जी बथुआ
                    बथुआ [chenopodium album]

#2.प्रकृति 


आयुर्वैदानुसार बथुआ त्रिदोषनाशक होकर ,वात,पित्त और कफ का संतुलन करता हैं.

#3.संघटन 


  नमी                कार्बोहाइड्रेट.            प्रोटीन      89.5%.              3%.                    3.6%



खनिज पदार्थ.        वसा                       फायबर    2.6%.               0.4%.                     0.8%


             
  कैल्शियम.         फाँस्फोरस.             आयरन

 150 mg.          80 mg.             4.2mg



 केरोटीन.            राइबोफ्लेविन.           नायसिन
1740 micro.     0.14 mg.               0.6mg



विटामिन c.       ऊर्जा
80 mg.           30 kcal.                               
                                             [per 100 gm]



 #4.औषधि के रूप में बथुआ


# कुपोषण [malnutrition] में :::


बथुए में प्रचुरता में आयरन,कैल्सियम,थायमिन,नायसिन और राइबोफ्लेविन पायें जातें हैं.

यदि नियमित रूप से बथुए का किसी भी रूप में सेवन किया जावें तो मातृ - शिशु कुपोषण को समाप्त किया जा सकता हैं,जो आज विकासशील और अल्पविकसित राष्ट्रों की विकट समस्या बनी हुई हैं.

# सफेद दाग [Lucoderma] में :::


बथुए के पत्तियों में शरीर में मेलोनिन  को बढ़ानें वालें तत्व प्रचुरता में पायें जातें हैं,अत: सफेद दाग की समस्या से पीड़ित व्यक्ति को बथुए का रस सफेद दाग पर नियमित रूप से लगाना चाहिये.

 इसके अलावा इसकी उबली हुई पत्तियों में हल्दी, मेथी बीज और धनिया पावड़र डालकर सेवन करना चाहियें.

# नेत्र रोगों में :::


बथुआ विटामिन ए का अच्छा स्त्रोत माना जाता हैं,इसके सेवन से आँखों की ज्योति बढ़ती हैं.रंतोधी होनें पर इसका सेवन बहुत फायदेमंद माना जाता हैं.

# कब्ज और पेट दर्द में :::



बथुए में पाया जानें वाला फायबर कब्ज को नष्ट कर खुलकर पाखाना लाता हैं.इसके अलावा यदि पेटदर्द की शिकायत हो तो बथुए का रस गर्म कर दो - तीन चम्मच पीलानें से पेटदर्द बंद हो जाता हैं.

बच्चों को पेट में कीड़ों की समस्या हो तो रोज रात को दो से पाँच चम्मच बथुए का रस पीलाना फायदेनंद साबित होता हैं.

 एसीडीटी में इसका रस मिस्री मिलाकर सेवन करनें से पेट़ की जलन शांत होती हैं.


अरहर के औषधीय प्रयोग


० नीम के औषधीय उपयोग


# एनिमिया में :::


बथुआ में पाया जानें वाला आयरन खून की कमी को समाप्त करता हैं.इसके लिये बथुए का सेवन सब्जी के रूप में या उबालकर किया जा सकता हैं.

# गठान और फोड़ें फुंसियों पर :::


फोड़ें फुंसियों पर हल्दी के साथ बथुए को बाटकर लगानें से फोड़ें जल्दी सुख जातें हैं.इसके अलावा शरीर पर गांठ हो तो नमक और अदरक के साथ बथुए को गर्म कर गांठ पर रात को बांधनें से गठान गल जाती हैं.

सिर में जुँए होनें पर बथुए को पानी में उबालकर इस उबले हुये पानी से सिर धोयें ,जुँए होनें पर मर जायेगी.


# स्तभंक और वीर्यवर्धक :::


बथुए की सब्जी घी के साथ बनाकर खानें से व्यक्ति की स्तभंन शक्ति और वीर्य की वृद्धि होती हैं.बथुए का रायता बनाकर खानें से वीर्य गाढ़ा होता हैं.

# पीलिया में :::


बथुए के बीजों को पीसकर सुबह - शाम 5 ग्राम के अनुपात में शहद मिलाकर खानें से पीलिया समाप्त हो जाता हैं,तथा लीवर की कार्यपृणाली सुधरती हैं.

# दर्द निवारक के रूप में :::


बथुए को 300 ml पानी में तब तक उबालें जब तक पानी 50 ml न रह जावें तत्पश्चात इस पानी को सूप की भाँति पीनें से सभी प्रकार के दर्द में आराम मिलता हैं.

# बुखार में


बथुये के 100 ग्राम रस में हल्दी आधी चम्मच और चार पाँच पीसी हुई काली मिर्च मिलाकर पीनें से मलेरिया और संक्रामक बुखार में फायदा होता हैं.और चिकनगुनिया बुखार में होनें वाला जोंड़ों का दर्द नियत्रिंत होता हैं.इसके रस से बुखार की गर्मी भी शांत होती हैं.

#रोग प्रतिरोधक क्षमता में


बथुआ रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ानें में बहुत उपयोगी साबित हुआ हैं.इसके लियें बथुए को सब्जी या उबालकर नियमित सेवन करना चाहियें.

#मूत्र की जलन में


रोज रात को बथुए के रस में नमक,जीरा,और निम्बू का रस मिलाकर पीनें से मूत्र की जलन शांत हो जाती हैं.


टीकाकरण चार्ट [vaccination chart] और संभावित प्रश्न

child vaccination
 टीकाकरण चार्ट

# 1.गर्भावस्था के समय टीकाकारण :::

गर्भावस्था की शुरूआत में Titnus का पहला टीका टी.टी - 1.

टी.टी -1 के चार सप्ताह बाद टी.टी.-2

यदि पिछली गर्भावस्था में टी.टी - 2 दिया गया हैं,तो केवल बूस्टर दीजिए.



# टीके की मात्रा ,कैसें और कहाँ दें

0.5 ml.मात्रा प्रशिक्षित व्यक्ति द्धारा ऊपरी बांह की मांसपेशी में.

# महत्वपूर्ण

गर्भावस्था के 36 सप्ताह हो गयें हो तो मात्र टी.टी.- बूस्टर देना चाहियें.
टीकाकरण करतें हुये
 टीकाकरण का दृश्य

# 2.शिशुओं के लियें टीकाकरण 

#जन्म के समय :::

1. B.C.G.  =     0.1 ml बाँह पर त्वचा के निचें.

2.हेपेटाइटिस बी.=  0.5 ml मध्य जांघ के बाहरी हिस्सें पर मांसपेशी में

3.o.p.v.या oral polio vaccine = दो बूँद मुहँ में .



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० आँखों का सूखापन क्या बीमारी हैं ? जानियें इस लिंक पर

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#6 सप्ताह पर :::

1.हेपेटाइटिस बी. = 0.5 ml
2.D.P.T. = 0.5 ml मध्य जांघ का बाहरी हिस्सें में माँसपेशियों में.
3.o.p.v.या oral polio vaccine.

#10 सप्ताह पर :::

1.हेपेटाइटिस बी.
2.D.P.T.
3.o.p.v.

#14 सप्ताह पर :::

1.हेपेटाइटिस बी.
2.D.P.T.
3.o.p.v.

#9 से 12 माह तक :::

1.खसरा या measles.= 0.5 ml दाईं ऊपरी बांह पर त्वचा के निचें.

2.Japanese encephalitis.= 0.5 ml बाँयी ऊपरी बांह पर त्वचा के निचें.

#16 से 24 माह के बीच :::

1.D.P.T.

2.o.p.v.

3.measles.

4. Japanese encephalitis.

#5 से 6 वर्ष :::

1.D.P.T.

#10 और 16 वर्ष पर :::

1.Titnus = 0.5 ml ऊपरी बांह पर माँसपेशी में.



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स्तनों का आकार कैसें बढायें

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#3.विटामिन A खुराक 

  • 9 माह होनें पर measles के टीके के साथ 1 ml [1 लाख यूनिट].

  • 16 माह पर,इसके पश्चात प्रत्येक 6 माह के अन्तराल पर बच्चें के 5 वर्ष का होनें तक प्रत्येक बार 2 ml [2 लाख यूनिट]

# 4.पालन करनें योग्य मुख्य बिंदु 

  • दो खुराक के बीच 6 माह का अंतराल होना चाहियें.

  • बोतल के साथ दियें गये चम्मच से हीप्रतिरक्षात
  • .
  • विटामिन ए की बोतल को खोलनें के पश्चात दो माह तक ही उपयोग करें तथा बोतल छाँव में रखें.



#5.प्राय: पूछें जानें वालें सवाल 

प्रश्न १.टीकाकरण प्रतिरक्षण क्या हैं ? यह कैसें कार्य करता हैं ?

उत्तर = टीकाकरण बाहरी रूप से शरीर की प्रतिरक्षातंत्र को विकसित करनें की तकनीक हैं.
टीकाकरण के द्धारा शिशुओं या मनुष्यों में होनें वाली कई जानलेवा बीमारीयों का बचाव किया जाता हैं.

प्रश्न २.शिशुओं में टीकाकरण इतनी जल्दी क्यों शुरू किया जाता हैं ?

उत्तर = नवजात शिशु बीमारीयों के प्रति अति संवेदनशील होते हैं.जिसके कारण उन्हें कई ख़तरनाक बीमारियाँ हो सकती हैं.

प्रश्न ३.क्या टीकाकरण पूरी तरह से सुरक्षित होता हैं ?

उत्तर = हाँ,टीकाकरण पूर्णत: सुरक्षित हैं,कभी - कभी टीकाकरण के पश्चात मामूली प्रतिकूल प्रभाव हो सकतें हैं,जो टीकाकरण नहीं करवानें पर होनें वाली बीमारीयों के मुकाबले कुछ भी नही हैं.
सभी नवजात शिशुओं का टीकाकरण अनिवार्य रूप से किया जाना चाहियें केवल 3 परिस्थितियों को छोड़कर जैसे किसी टीके के पश्चात ऐनाफिलैक्सिस या अत्यधिक एलर्जी, ऐंठन या एनसेफिलाइटिस हुआ हो या अभी तेज बुख़ार हैं.
दस्त या खाँसी में शिशु का टीकाकरण किया जा सकता हैं.



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प्रश्न ४.टीकाकरण के पश्चात प्रतिकूल प्रभाव क्या हो सकते हैं ?

उत्तर = किसी - किसी बच्चें में टीकाकरण के बाद सुई लगने वाली जगह लाल  और सूजी हुई हो जाती हैं तथा हल्का बुखार आ जाता हैं.

प्रश्न ५. यदि बच्चा टीकाकरण के लिये देर से लाया गया,तो क्या बच्चें को पुन : टीकाकरण के लिये प्रथम डोज दिया जायेगा ?

उत्तर = नही, प्रथम डोज नही वरन जहाँ से टीकाकरण छूटा था वही से टीकाकरण पुन : शुरू करें.

प्रश्न ६. यदि 9 माह के शिशु का टीकाकरण पहले कभी नही हुआ हैं,तो क्या उसे सभी टीके लगाये जा सकतें हैं ?

उत्तर =हाँ,टीके एक ही सत्र में दिये जा सकतें हैं,यदि अभिभावक सहमति नही प्रदान करतें हैं,तो एक दिन में एक टीका देकर फिर अगले दिन अगला टीका लगाया जा सकता हैं,परन्तु शुरूआत measles के टीके के साथ की जाती हैं,साथ में o.p.v.और विटामीन A की खुराक दी जाती हैं.

प्रश्न ७.1 से 5 वर्ष के बच्चें जिनका पहले कभी टीकाकरण नही हुआ हैं,क्या टीकाकरण किया जा सकता हैं,और शुरूआत किन टीको से की जाती हैं ?

उत्तर = हाँ,किया जा सकता हैं.सबसे पहले D.P.T.1,o.p.v.1,खसरा और 2 ml विटामिन A दिया जाता हैं.फिर एक माह पश्चात D.P.T.2,o.p.v.2 दिये जातें हैं.खसरे का दूसरा टीका एक माह पश्चात लगाया जाता हैं.D.P.T.3,o.p.v.3,के कम से कम 6 माह बाद D.P.T.और o.p.v.बूस्टर डोज दिया जाता हैं.विटामिन ए की खुराक हर छ: माह के अंतराल पर बच्चें के 5 वर्ष का होनें तक दें.
5 से 7 वर्ष के बच्चें में जिसका टीकाकरण पहलें कभी नही हुआ उसे D.P.T.1,2,3 टीका एक माह के अंतराल पर दिया जाता हैं.7 साल की आयु तक D.P.T.3 के कम से कम 6 माह बाद D.P.T.बूस्टर दिया जाता हैं.

प्रश्न ८. D.P.T और हेपेटाइटिस बी जाँघ के बाहरी भाग पर ही क्यों दिया जाता हैं ?

उत्तर= कूल्हे पर टीका लगानें से सियाटीका नर्व क्षतिग्रस्त हो जाती हैं.इसके अलावा वेक्सीन कूल्हे की वसा में एकत्रित हो जाती हैं,फलस्वरूप प्रतिरोधक क्षमता विकसित नही हो पाती.


प्रश्न ९. टीकाकरण पोलियो की खुराक की तरह घर--घर जाकर क्यों नही किया जा सकता ?

उत्तर=चूंकि टीके इंजेक्सन द्धारा दिये जातें हैं,अत: एक निश्चित, सुरक्षित,और स्वच्छ वातावरण की आवश्यकता होती हैं,जहाँ टीके से सम्बंधित जोखिम को कम किया जा सके.

प्रश्न १०.क्या बड़े व्यक्तियों जिनका टीकाकरण छूट गया था,उनमें टीकाकरण किया जा सकता हैं?

उत्तर= यह परिस्थितियों पर निर्भर करता हैं,जिसके अन्तर्गत चिकित्सतक टीका लगानें वालें व्यक्ति की स्वास्थ परिस्थितियों का विश्लेषण कर टीकाकरण की सलाह दे सकता हैं,कभी - कभी ऐसा भी होता हैं, कि बचपन में लगनें वाले टीके बडे़ होनें तक अप्रभावी हो जातें हैं,ऐसे में बूस्टर की ज़रूरत होती हैं.टिटनस और पर्टुसिस के टीके इसी श्रेणी में आतें हैं.

कई देशों द्धारा अपनें यहाँ आनें वालें लोगों के लिये टीकाकरण अनिवार्य किया जाता हैं,ऐसे में समुचित टीकाकरण करवानें पर ही उस देश की यात्रा करनें दी जाती हैं.

प्रश्न ११. क्या स्वास्थ क्षेत्र में कार्य करनें वाले तथा जोखिम वालें क्षेत्रों में कार्य करनें वालों को टीकाकरण करवाना चाहियें ?

उत्तर= जी,हाँ हेल्थ प्रोफेशन [health profession] से जुड़े व्यक्तियों तथा स्वास्थ जोखिम वालें क्षेत्रों में काम करनें वाले व्यक्तियों को टीकाकरण करवाना अनिवार्य होता हैं,क्योंकि इससे वे गंभीर बीमारीयों की सम्भावना से बच जातें है.
यदि कोई health professional अस्थमा, ह्रदय रोग,ड़ायबीटीज जैसी बीमारीयों से पीड़ित हैं, तथा जिसकी प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर हैं,उसे डाँक्टर[Doctor]की सलाह से तुरन्त ही vaccination करवा लेना चाहियें.

# याद रखनें योग्य बिंदु :::

१.B.C.G.एक वर्ष की आयु तक लगाया जा सकता हैं,यदि टीकाकरण के बाद निशान न पड़े तो दुबारा टीका लगवानें की आवश्यकता नही होती हैं.

# टीकाकरण के बाद होनें वाली प्रतिकूल घट़नाए

गंभीर ऐंठन या ऐनाफिलैक्सिस की घट़नाएँ होनें पर तुरंत बच्चें को सीधा सुनिश्चित करें बच्चें को पर्याप्त आक्सीजन मिलती रहे.स्थति की गंभीरता के आधार पर ज़रूरी चिकित्सा विशेषग्यों की देखरेख में तुरन्त शुरू करें.





# रोटावायरस टीकाकरण [Rota virus]



प्रश्न १. रोटावायरस (Rota virus) क्या हैं ?


उत्तर = रोटावायरस अत्यधिक संक्रामक प्रकार का विषाणु होता हैं.यह बच्चों को प्रभावित कर उनकों अपनी चपेट में ले लेता हैं,फलस्वरूप बच्चों में दस्त शुरू हो जातें हैं.
रोटावायरस
                        रोटावायरस (Rota virus)

प्रश्न २.रोटावायरस प्रभावित बच्चें में दस्त के क्या लक्षण होतें हैं ?

उत्तर = शुरूआत में हल्के दस्त होतें  हैं,जो धिरें - धिरें गंभीर रूप धारण कर लेते हैं.फलस्वरूप बच्चें के शरीर में नमक और पानी की कमी हो जाती हैं.उचित इलाज नहीं मिलनें पर बच्चें की मृत्यु हो सकती हैं.

प्रश्न ३. क्या रोटावायरस दस्त गंभीर रूप धारण कर सकता हैं ?

उत्तर = भारत में दस्त के कारण अस्पताल में भर्ती होनें वालें 40% बच्चें रोटावायरस से संक्रमित होतें हैं.यही कारण हैं,कि 8,72000 बच्चें जो कि अस्पताल में भर्ती होतें हैं उनमें से प्रतिवर्ष लगभग 78000 बच्चों की मृत्यु हो जाती हैं.

प्रश्न ४. रोटावायरस दस्त होनें का खतरा किन बच्चों को रहता हैं ?

उत्तर = रोटावायरस दस्त से संक्रमित होनें का खतरा 0 से 1 वर्ष के बच्चों को अधिक होता हैं.यदि बच्चा कुपोषित हैं,और रोटावायरस से संक्रमित हैं,तो मृत्यु की संभावना बढ़ जाती हैं.

प्रश्न ५.रोटावायरस कैसे फेलता हैं ?

उत्तर = रोटावायरस प्रभावित बच्चें के स्वस्थ बच्चें के सम्पर्क में आनें से.
दूषित पानी,दूषित खानें एंव गन्दे हाथों के सम्पर्क में आनें से.
यह वायरस कई घंटो तक हाथों और खुली जगहों पर जीवित रह सकता हैं.

प्रश्न ६.रोटावायरस दस्त किस मोंसम में अधिक होता हैं ?

उत्तर = रोटावायरस संक्रमण और दस्त पूरें साल में कभी भी हो सकता हैं,किन्तु सदियों में इसका खतरा अधिक होता हैं.




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प्रश्न ७. रोटावायरस दस्त की पहचान कैसे होती हैं ?

उत्तर = लक्षणों द्धारा रोटावायरस दस्त की पहचान संभव नही हैं,केवल मल का लेबोरेटरी परीक्षण ही बीमारी का पता लगा सकता हैं.

प्रश्न ८. रोटावायरस दस्त का उपचार क्या हैं ?

उत्तर = रोटावायरस दस्त की अन्य दस्तों की भांति लाक्षणिक चिकित्सा ही की जाती हैं.जैसे जिंक की गोली 14 दिनों तक खिलाना,ओ.आर.एस का सेवन करवाना आदि.
दस्त की गंभीरता को देखते हुये बच्चें को अस्पताल में भी भर्ती करना पड़ सकता हैं.

प्रश्न ९.एक बार रोटावायरस दस्त होनें के बाद क्या ये बच्चें को दूसरी बार भी हो सकता हैं ?

उत्तर = हाँ,रोटावायरस बच्चें को बार - बार हानि पहुँचा सकता हैं.हालांकि दुबारा होनें वालें दस्त ज्यादा खतरनाक नही होतें हैं.

प्रश्न १०.रोटावायरस दस्त होनें से केंसें बचें ?

उत्तर = रोटावायरस टीकाकरण रोटावायरस दस्त के विरूद्ध एकमात्र सटीक विकल्प हैं.
अन्य कारणों से होनें वालें दस्त की रोकथाम स्वच्छता रखने से,बार - बार हाथ धोनें से ,साफ पानी पीनें से,साफ और ताजा खानें से,बच्चों को भरपूर स्तनपान करवानें से,तथा विटामिन ए युक्त पूरक आहार देने से की जा सकती हैं.

प्रश्न ११.क्या रोटावायरस वैक्सीन सभी तरह के दस्त की रोकथाम करता हैं ?

उत्तर = नहीं, रोटावायरस वैक्सीन सिर्फ उस दस्त की रोकथाम करनें में सक्षम जो रोटावायरस से हुआ हैं.जो कि बच्चों में दस्त का बड़ा कारण हैं.रोटावायरस वैक्सीन लगने के बाद भी बच्चों को अन्य कारणों से दस्त हो सकते हैं,जिनमें जीवाणुजनित कारण प्रमुख हैं.

प्रश्न १२.रोटावायरस वैक्सीन किस प्रकार दी जाती हैं ?

उत्तर = रोटावायरस वैक्सीन की खुराक पाँच बूँद मुँह द्धारा बच्चों को पीलाई जाती हैं.यह वैक्सीन छह,दस,और चौदह सप्ताह के अंतराल से बच्चों को दी जाती हैं.
टीकाकरण
 रोटावायरस टीकाकरण का दृश्य

प्रश्न १३. क्या रोटावायरस की बूस्टर खुराक की ज़रूरत बच्चों को होती हैं ?

उत्तर = बूस्टर खुराक की ज़रूरत नहीं होती हैं,केवल 6,10,14 सप्ताह की खुराक ही पर्याप्त हैं.

प्रश्न १४.रोटावायरस और पोलियों वैक्सीन में क्या अंतर हैं ?

उत्तर = १.दोंनों ही वैक्सीन का रंग गुलाबी से लगाकर हल्का पीला या नारंगी हो सकता हैं.
२.रोटावायरस की पाँच बूँदें बच्चों को पीलायी जाती हैं,जबकि पोलियो की दो बूँदें पीलाई जाती हैं.
३.रोटावायरस की तीन खुराक 6,10,14 सप्ताह में बच्चों को पीलायी जाती हैं,जबकि पोलियो की खराक खुराक जन्म से लेकर पाँच वर्ष के बच्चों को बार - बार पीलायी जा सकती हैं.

प्रश्न १५.रोटावायरस वैक्सीन पीलानें के बाद क्या स्तनपान कराया जा सकता हैं ?

उत्तर = जी हाँ,न केवल बाद में बल्कि पीलानें के पहले भी स्तनपान कराया जा सकता हैं.

प्रश्न १६.रोटावायरस वैक्सीन किन्हें नहीं दी जाना चाहियें ?

उत्तर = 1.यदि बच्चें की उम्र 6 सप्ताह से कम हो.
           2.गंभीर रूप से किसी बीमारी से पीड़ित हो.
           3.यदि बच्चें को रोटावायरस से एलर्जी हो
           4.यदि पहले से रोटावायरस पीलाया जा चुका हो.

प्रश्न १७.पहली रोटावायरस वैक्सीन की खुराक देनें की अधिकतम उम्र क्या हैं ?

उत्तर = पहली रोटावायरस वैक्सीन देनें की अधिकतम उम्र एक वर्ष हैं.यदि एक वर्ष तक के बच्चें को रोटावायरस टीके की पहली खुराक मिल गई हो तो बाकि दो खुराक दी जा सकती हैं.दो खुराक के बीच चार सप्ताह का अंतराल रखना आवश्यक हैं.

प्रश्न १८.जिन बच्चों को पेंटावेलेट और ओरल पोलियो वैक्सीन की दूसरी खुराक दी जा चुकी हो क्या उन्हें रोटावायरस की पहली खुराक दी जा सकती हैं ?

उत्तर = नही, रोटावायरस की खुराक उन बच्चों को नही दी जाना चाहियें जिनकों पहलें पेंटावेलेट और ओरल पोलियो वैक्सीन दो बार दी जा चुकी हैं.

स्तनपान के बारें में रोचक जानकारी


० पशुओं तथा कुक्कुटों हेतू टीकाकरण




रोटावायरस की पहली खुराक सिर्फ पहली बार  पेंटावेलेट और  opv के साथ दी जाना चाहियें.

प्रश्न १९.क्या रोटावायरस टीकाकरण समय से पूर्व जन्म लेने वाले बच्चों को दिया जा सकता हैं ?

उत्तर = रोटावायरस टीकाकरण बच्चों की उम्र के अनुसार किया जाना चाहियें जिसका हिसाब उसके जन्म समयानुसार होना चाहियें,न कि उसकी गर्भ की उम्रानुसार.

प्रश्न २०.क्या रोटावायरस वैक्सीन के कोई दुष्प्रभाव हैं ?

उत्तर = रोटावायरस वैक्सीन एक सुरक्षित वैक्सीन हैं.इसके कुछ सामान्य लक्षण उभर सकतें हैं,जैसें उल्टी,दस्त,खाँसी,नाक बहना,बुखार,चिड़चिड़ापन और शरीर पर दानें निकलना.
रोटावायरस वैक्सीन देनें के बाद एक दुर्लभ शिकायत जिसे इंटससेप्सन (आंत का मुढ़ जाना) के नाम से जाना जाता हैं,के बारें में बताया गया हैं.इससे ग्रसित बच्चों में अत्यधिक पेट दर्द और बार - बार उल्टी के साथ मल में खून की शिकायत हो सकती हैं.इन लक्षणों के दिखते ही तुरन्त बच्चें को अस्पताल में भर्ती करवा देना चाहियें.

प्रश्न २१.क्या होगा यदि बच्चा रोटावायरस की खुराक मुँह से बाहर निकाल दे या फिर उल्टी कर दें ?

उत्तर = यदि बच्चा खुराक निकाल दें तो बच्चें को नई खुराक तुरंत उसी वक्त दें.

प्रश्न २२.रोटावायरस वैक्सीन का भंड़ारण कैसें करें ?

उत्तर = रोटावायरस वैक्सीन को - 20 डिग्री से + 8 डिग्री तापमान तक संग्रहित कर रखा जा सकता हैं.वैक्सीन का इस्तेमाल करनें से पूर्व इसे पिघला लेना चाहियें.

happy Harmon's


(यह जानकारी भारत सरकार द्धारा समय - समय पर स्वास्थ कार्यकरताओं के लिये जारी निर्देशों के अनुसार हैं.विस्तारपूर्वक जानकारी के लिये नजदीकी स्वास्थ केन्द्र पर सम्पर्क करे.)

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

karma aur bhagya [ कर्म और भाग्य ]

# 1 कर्म और भाग्य 

कर्म और भाग्य
 कर्म आगे और भाग्य पिछे रहता हैं

अक्सर लोग कर्म और भाग्य के बारें में चर्चा करतें वक्त अपनें - अपनें जीवन में घट़ित घट़नाओं के आधार पर निष्कर्ष निकालतें हैं,कोई कर्म को श्रेष्ठ मानता हैं,कोई भाग्य को ज़रूरी मानता हैं,तो कोई दोनों के अस्तित्व को आवश्यक मानता हैं.लेकिन क्या जीवन में दोनों का अस्तित्व ज़रूरी हैं ? गीता में श्री कृष्ण अर्जुन को कर्मफल का उपदेश देकर कहतें हैं.

    " कर्मण्यें वाधिकारवस्तें मा फलेषु कदाचन "

अर्थात मनुष्य सिर्फ कर्म करनें का अधिकारी हैं,फल पर अर्थात परिणाम पर उसका कोई अधिकार नहीं हैं,आगे श्री कृष्ण बतातें हैं,कि यदि मनुष्य कर्म करतें करतें मर  जाता हैं,और इस जन्म में उसे अपनें कर्म का फल प्राप्त नहीं होता तो हमें यह नहीं मानना चाहियें की कर्म व्यर्थ हो गया बल्कि यह कर्म अगले जन्म में भाग्य बनकर लोगों को आश्चर्य में ड़ालता हैं,



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● आत्मविकास के 9 मार्ग

● स्वस्थ सामाजिक जीवन के 3 पीलर

●साम्प्रदायिक सद्भाव भारत का मूल भाव

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यही कारण हैं,कि आज भी लोग किसी उच्च पदासीन व्यक्ति के घर जन्म लेनें वालें व्यक्ति के विषय में यही राय रखतें हैं,कि ज़रूर पूर्व जन्म के कर्म श्रेष्ठ रहें होगें तभी ऐसे घर जन्म मिला अब ये अलग बात हैं,कि अपनें पूर्वजन्मों के कर्म को कोई व्यक्ति कायम नहीं रख पाता और अपनें कदाचरण के द्धारा अपना आगें का जीवन बर्बाद कर लेता हैं,जबकि कुछ लोग पूर्वजन्मों के कर्म को आगें बढ़ाकर और श्रेष्ठ जीवन व्यतित करतें हैं,किसी कहा भी हैं,कि  "भाग्यवान को वही मिलता हैं,जो कर्मवीर छोड़कर गया था "  और फिर भाग्य चमकता भी कितनें का हैं, लाखों में किसी एक का जबकि कर्मवीर का तो भाग्योदय तय होता हैं.





# 1."कर्मप्रधान विश्व रचि राखा"


कर्म के भी कई रूप माने गयें हैं - 

# १.कायिक कर्म ::: 

जो कर्म शरीर द्धारा होता हैं वह कायिक या शारीरिक कर्म होता हैं,अपनें शरीर द्धारा किसी मनुष्य जीव - जन्तु को कोई चोट़ या आघात नही हो बल्कि सदैव शरीर दूसरों की भलाई के लिये तत्पर रहे यही कायिक कर्म होता हैं.

#२ वाचिक कर्म :::

वाणी सदैंव मीठी सुभाषित रहनी चाहियें क्योंकि " "बाण से निकला तीर और मुहँ से निकली बोली कभी वापस नहीं आती " दुर्योधन के प्रति द्रोपदी का यह कथन कि " अन्धों के अन्धे होतें हैं" ने महाभारत कि रचना कर दी और भारत भूमि की सभ्यता संस्कृति को बदल दिया,दूसरी और मीठे बोलों ने कितनें ही क्रोध को शांत किया हैं.कहा गया हैं :
कागो काको धन हरै,कोयल काको देय ?मीठे वचन सुनाइ के,जग अपनो कर लेई ||
जब श्री राम ने परशुराम के आराध्य शंकर का धनुष प्रत्यांचा चढ़ानें के लिये झुकाया तो धनुष टूट गया इस पर आगबबूला परशुराम फरसा लेकर राम के पास गये और कहा कि किसनें मेरें आराध्य का धनुष तोड़ा हैं,वो मेरा सामना करें इस पर श्री राम ने कहा प्रभु में तो सिर्फ राम ही हूँ आप तो "परशुराम" हैं,मैं आपसे कैसें युद्ध कर सकता हूँ,इतना कहतें ही परशुराम का गुस्सा सातवें आसमान से सीधें जमीन पर आ गया और उन्होनें राम को गले लगाकर कहा राम तुम वास्तव में धनुष पर प्रत्यांचा चढ़ानें के अधिकारी हो,कहनें का तात्पर्य यही कि मधुरवाणी वीरो का आभूषण हैं.

# ३ मानसिक कर्म ::

तीसरा कर्म मानसिक कर्म हैं,मन में हम जो सोचतें हैं,विचार करतें हैं वही कायिक और वाचिक कर्म का आधार हैं,कहतें हैं,कि विचारों की शक्ति दूर बैठें व्यक्ति को भी प्रभावित करती हैं,यही कारण हैं,कि लोग प्रार्थना को ईश प्राप्ति का साधन मानतें हैं.वास्तव में हम सर्वाधिक कर्म मानसिक रूप में ही करतें हैं,इसिलियें भारतीय मनीषी कहतें हैं,कि आदमी जैसा सोचता हैं,वैसा बन जाता हैं.
अत : स्पष्ट हैं,कि भाग्य के छत पर चढ़नें के लिये कर्म की सीढ़ी चढ़ना आवश्यक और अपरिहार्य हैं.

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

#11 wonders of colour for life

# 1 yellow 


yellow is sacred and represent the balance of life. Yellow share the same healing qualities as the sun,emanating warmth, optimism and light. Yellow is the color of spring and is worn to celebrate the Hindu festival Vasant panchami.

 # 2 RED 

Red Rose
Red Rose

Red is dynamic and constantly breathing fire in the eyes of the beholder.It is associated with one of the most revered goddesses in Hindu mythology Durga.Red also stands for nobility and is the preferred colour for a bride's garment. Red has a deep meaning in the Indian psyche.


 # 3 Saffron :::


Saffron represents fire and as impurities are burnt by fire.this colour symbolises purity. It also represents religious abstinence. saffron connotes a sacred meaning. wearing saffron symbolizes the quest for light.


# 4 BLUE :::

Blue represent power of life, it is also the colour of water.water is a vital resource for an agricultural nation like india as it sustains all life on earth.Anything infinite is represented by blue,such the ocean and sky,this is also why Krishna is depicted in blue.


 # 5 Purple :::


purple relates to the imagination and spirituality. it stimulates the imagination and inspires high ideals.it is an introspective colour, allowing us to get in touch with our deeper thoughts.


# 6 GOLD :::

Gold is the colour of success, achievement and triumph. gold adds richness and warmth to everything with which it is associated it illuminates and enhances other things around it.


 #  7 silver :::


Silver opens the mind and lights the way forward. This colour is very versatile shiny,modern and hitech on one hand and alluring, sparkling and elegant on the other. 

# 8 GREEN :::

lush green
 Green 

In India, the green of harvest signifies happiness and new beginnings,Green appears in innumerable shades.The seamless presence of many hues mirrors mother nature's love for harmony and tolerance for differences .Therefore green is manifestation of greatness.


# 9 BLACK :::


In India, though black is often associated with darkness, surprisingly the same colour is used as an antidote to ward of evil. Hence people use objects made of black and hang them outside their homes to prevent evil from entering the house. Even Black cotton strings are tied on the wrist to fight negativity. 

# 10 BROWN :::



  • Brown is a serious, down to earth colour signifying stability, structure and support. Brown is associated with wholesome, natural and organic produce and anything related to the great outdoors, agriculture and farming

# 11 white :::

white
 white flower 

white stands for serenity. it is pure and soothes the eye and hence spreads the message of peace

 



गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

polycystic ovarian syndrome पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम

#PCOS का परिचय :::

pcos या polycystic ovarian syndrome महिलाओं से संबधित समस्या हैं,जिसमें हार्मोंन असंतुलन की वज़ह से pco में एक परिपक्व फॉलिकल बननें के स्थान पर बहुत से अपरिपक्व फॉलिकल्स बन जातें हैं.सम्पूर्ण विश्व में इस बीमारी का ग्राफ तेज़ी से बड़ रहा हैं,विश्व स्वास्थ संगठन (W.H.O) के अनुसार 13 से 25 उम्र की हर 10 में से 2 स्त्रीयाँ pcos से पीड़ित होती हैं.

#लक्षण :::

० अण्ड़ेदानी में कई गांठे बनना.

० बार - बार गर्भपात .

० बालों का झड़ना,बाल पतले होना.

० चेहरें पर पुरूषों के समान दाड़ी मुंछ आना.

० चेहरें पर मुहाँसे, तैलीय त्वचा

० आवाज का भारी होना.

० स्तनों [Breast]का आकार घट़ना.

० पेट के आसपास चर्बी का बढ़ना.

० माहवारी के समय कमर ,पेडू में तीव्र दर्द,मासिक चक्र का एक या दो दिन ही रहना.

०मधुमेह, उच्च रक्तचाप होना,ह्रदय रोग और तनाव होना.

urinary tract infection के बारे में जानियें


#कारण :::

० आनुवांशिक रूप से स्थानांतरित होता हैं.
० अनियमित जीवनशैली जैसें कम शारीरिक श्रम,देर रात तक सोना सुबह देर तक उठना,फास्ट फूड़ ,जंक फूड़ का अत्यधिक प्रयोग.
० लेपटाप ,मोबाइल का अत्यधिक प्रयोग.
० मधुमेह का पारिवारिक इतिहास होना.

#प्रबंधन :::

० खानें पीनें में अत्यन्त सावधानियाँ आवश्यक हैं,एेसा भोजन ले जिसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, ओमेगा 3 फेटीएसिड़, विटामिन ओर मिनरल भरपूर हो जैसें काजू,बादाम,अखरोट़,सोयाबीन उत्पाद,हरी सब्जियाँ ,दूध ,फल ,अंड़े आदि.

० डाँक्टर ऐसी दवाईयाँ देतें हैं,जो हार्मोंन संतुलित रखें,कोलेस्ट्रॉल कम करें,मासिक चक्र नियमित रखे,किन्तु यह दवाईयॉ लम्बें समय तक लेना पड़ सकती हैं,अत : आयुर्वैदिक दवाईयों का सेवन करें ये दवाईयाँ शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं छोड़ती हैं.

० व्यायाम और योग उतना ही ज़रूरी हैं,जितना दवाईयाँ अत : नियमित रूप से तेरना,दोड़ना,नृत्य करना आदि करतें रहें.

० कपालभाँति, भस्त्रिका, सूर्यासन,मत्स्यासन करतें रहें.
० जवारें का जूस लेना चाहियें.

० पानी का पर्याप्त सेवन करनें से हार्मोंन लेवल संतुलित रहता हैं.

० अपनें स्वभाव को सकारात्मक चिंतन से सरोबार रखें .
० शांत, प्रशन्नचित्त और हँसमुख बनें ,प्रतिदिन ध्यान को अपनें जीवन का अंग बना लें.


रविवार, 27 नवंबर 2016

Donate for better world

पूरी दुनिया में भारत सहित विकासशील राष्ट्रों के गरीब नागरिक बेहतर स्वास्थ सेंवाओं के लियें प्रतीक्षारत हैं.बेहतर स्वास्थ सेंवाएँ मात्र प्रायवेट अस्पतालों में उपलब्ध हैं,जो इन गरीबों के बस की बात नहीं हैं,फलस्वरूप ये गरीब अकाल मोंत के आगोश में समा जातें हैं,एक सर्वे के मुताबिक लगभग 63% कैंसर,एड्स, टी.बी.ह्रदय रोग और अन्य रोगों के मरीजों के पास दवाईयों के लियें पैसें नही होतें दवाईयों की उपलब्धता में इनका सबकुछ बिक जाता हैं ,आईयें  इन ज़रूरतमंद लोगों के साथ खड़े होकर इनकी तक़लीफों को कम करने में उनकी मदद करें.यदि आप मदद करना चाहतें हैं,तो सम्पर्क करें.

Email - svyas845@gmail.com

शनिवार, 26 नवंबर 2016

सिकल सेल sickle cell में ज़रूरत जागरूकता की

#1.बीमारी का परिचय :::



सीकल सेल (sickle cell) रक्त से सम्बंधित बीमारी हैं,जिसमें रक्त में उपस्थित हिमोग्लोबीन (Haemoglobin) जो रक्त में स्वतंत्र रूप से घूमता हैं,असामान्य रूप में आपस में गुच्छा बना लेता हैं.फलस्वरूप लाल रक्त कणिकाएँ (RBC) अपना रूप गोल से बदलकर सिकल (sickle) या हँसिया के शेप में परिवर्तित हो जाती हैं.

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

तनाव प्रबंधन Stress management

 


आजकल की भागती दोड़ती जीवनशैली में हर व्यक्ति इतना तनाव में जी रहा हैं,कि व्यक्ति का सामाजिक, पारिवारिक जीवन संकट़ग्रस्त सा हो गया हैं.यह तनाव कई कारणों से पैदा हो रहा हैं, जैसें असफलता,व्यापार में घाटा,प्रतिस्पर्धा,किसी प्रियजन का बिछड़ना आदि कहनें का तात्पर्य यही कि तनाव हर आमो - ख़ास के जीवन का अभिन्न अंग बन चुका हैं.एक सर्वेक्षण के मुताबिक दुनिया की 33% आबादी गंभीर तनाव से गुजर रही हैं,और इसमें उन लोगों का प्रतिशत एक तिहाई हैं,जो समाज के शीर्ष पर हैं.




 लोग तनाव से निपट़ने के लिये तरह - तरह की गोली दवाईयों को भी आजमातें हैं,किन्तु तनाव आनें पर उसका प्रबंधन करना सीख लिया जावें तो शायद मनुष्य बिना दवा गोली के बेहतर और लम्बा जीवन जी सकता हैं.

 

#1.ऊँ के उच्चारण द्धारा तनाव प्रबंधन :::



अमेरिका भारत सहित अनेक देशों में ऊँ ध्वनि उच्चारण के मन मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया गया हैं,और इसके नतीजें उत्साह जनक रहें.अमेरिका में 2500 तनावग्रस्त व्यक्तियों को सुबह - शाम 20 बार गहराई से ऊँ उच्चारण करवाया गया ऐसा लगभग 6 माह तक लगातार किया गया 6 माह पश्चात इनके मस्तिष्क की मेंपिंग की गई जिसमें पाया गया कि ऊँ उच्चारित करनें वालें प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क में आक्सीजन का स्तर बढ़ गया जिससे उन हार्मोंनों के सक्रिय होनें में मदद मिली जो मूड़ को बेहतर बनातें हैं.



अत: तनाव दूर करनें में ऊँ का उच्चारण किसी चमत्कार से कम नहीं हैं,यह बात हमारी रिषी - मुनि वर्षों से कहतें आयें हैं.ऊँ का उच्चारण तनाव को घट़ाने के अलावा हमारें आसपास के वातावरण को स्पंदित कर सकारात्मक बनाता हैं.
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#2.रंगों के द्धारा तनाव प्रबंधन :::




भारतीय समाज और संस्कृति रंगों के बिना अधूरी हैं,और इसका scientific कारण भी हैं,कि रंग मनुष्य को प्रफुल्लित कर मस्तिष्क को तरोताजा रखतें हैं.जैसें



० सफेद रंग असीम शांति प्रदान करता हैं.



लाल रंग ऊर्जा का संचार करता हैं.



हरा जीवन में खुशियों के संचार का रंग हैं.



केशरिया त्याग और बलिदान सीखाता हैं.



तो जब भी जीवन तनाव में हो इन रंगों को अपनें पहनावें में सम्मिलित कर इन रंगों से प्रेरणा अवश्य ग्रहण करें.



स्वस्थ सामाजिक जीवन के 3 पीलर



#3.ख़ुशबू द्धारा तनाव प्रबंधन :::



हर आदमी ख़ुशबू पसंद करता हैं,चाहे वह किसी भी धर्म,जाति,समाज या सम्प्रदाय को मानता हो अत: तनाव की स्थिति में अपनी मनपसंद प्राकृतिक ख़ुशबू को अपनें कपड़ो ,घरों और अपनी मनपसंद वस्तुओं में रखकर देखिये तनाव छूमतंर हो जायेगा.

#4.सकारात्मक चिंतन द्धारा तनाव प्रबंधन :::



तनाव के समय मनुष्य का मन - मस्तिष्क सबसे ज्यादा नकारात्मक होता हैं.ऐसी हालात में चिंतन भी नकारात्मक ही होगा ,वास्तव में नकारात्मक चिंतन से आयु,स्वास्थ, तेज क्षीण हो जातें हैं.अत: कहा जाता हैं,कि दुख : में भगवत स्मरण करना चाहियें, अर्थात सकारात्मक चिंतन करना चाहियें."महात्मा गाँधी" कहा करते थे कि यदि मेंरा मन उदास होता हैं, तो में हमेशा उस व्यक्ति की कल्पना करता हूँ जो दीन - हीन हैं,और समाज के अन्तिम छोर पर खड़ा हैं.ऐसा सोचनें से मैं पुन: उस व्यक्ति के कल्याण में जुट़ जाता हूँ.



'हरिवंशराय बच्चन' अपनी कविता के माध्यम से संदेश देतें हैं,कि " कोशिश करनें वालों की कभी हार नहीं होती " अत : इन महापुरूषों के जीवन से प्रेरणा ग्रहण कर सकारात्मक चिंतन करें.


#5.ख़ान पान द्धारा तनाव प्रबंधन :::



कुछ खाद्य पदार्थ हमारे मस्तिष्क में शांति और स्फूर्ति का संचार करते हैं जैसे काजू,बादाम,अखरोट,अंजीर,अलसी हरी सब्जिया और ताजा मौसमी फल इन्हें अपनें खानें की आदतों में जरूर शामिल करें साथ ही नशा और तम्बाकू से दूर रहे.नशा करने और तम्बाकू के सेवन से शरीर में आक्सीजन का स्तर घटता हैं,जो अंतत : तनाव बढ़ानें में मदद करता हैं.


#6.पर्यटन के द्धारा तनाव प्रबंधन :::



कुछ जगह ऐसी होती हैं,जहाँ पहुँचते ही मस्तिष्क तरोताजा होकर सारें तनाव दूर हो जातें हैं,जैसे हील स्टेशन या कोई समुद्री किनारा या फिर कोई धार्मिक स्थान ,वैसे भी देखा गया हैं,कि जो लोग नियमित रूप से घूमनें जातें हैं उनका स्वास्थ और आयु सदैव उनका साथ लम्बें समय तक निभातें हैं.




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#7.योग द्धारा तनाव प्रबंधन :::




योगिक क्रियाएँ जैसें कपालभाँति, अनुलोम - विलोम,प्राणायाम और भ्रामरी करनें से तनाव कभी भी मनुष्य के साथ नही रहता हैं.यह बात अनेक शोधों द्धारा साबित हो चुकी हैं.


गहरी श्वास लेकर यदि हम अपना ध्यान उन आती जाती श्वास पर केन्द्रित कर कल्पना करें की प्रत्येक अन्दर जानें वाली श्वास हमारी रगो में जाकर असीम शांति प्रदान कर रही हैं, साथ ही प्रत्येक बाहर जानें वाली श्वास जीवन से निराशा दुख को बाहर निकाल रही हैं.यह प्रयोग तनाव घटानें का अचूक उपाय हैं.



# 8. गेंद द्धारा तनाव प्रबंधन :::




रबर की छोटी बाल जो कि कई शारीरिक कसरतों में प्रयोग की जाती हैं,तनाव से निपट़नें का सबसे सरल और सुरक्षित तरीका हैं,हाथ से बाल को बार - बार दबानें से नसों पर दबाव पड़ता हैं,जिससे नसे फैल जाती हैं,और आक्सीजन का अधिक प्रवाह नसों में होता हैं,यह आक्सीजन मस्तिष्क में जाकर तनाव को कम करनें में मदद करती हैं.



बाल को दबानें से एक्यूप्रेशर भी हो जाता हैं,क्योंकि ये हथेली के कई पाइंट पर दबाव डालकर आंतरिक आराम दिलाती हैं.



# 9.संगीत द्धारा तनाव प्रबंधन ::




संगीत की खोज मानव ने अपने खाली समय में मनोरंजन के लिये ही की थी,और वास्तव में संगीत ने मानव मन को सदैंव प्रफुल्लित ही किया हैं.यदि तनाव की अवस्था में मनपसंद संगीत सुना जाये तो शरीर से कार्टीसोल हार्मोंन का स्तर कम हो जाता हैं,जो तनाव उत्पन्न करने वाला प्रमुख हार्मोंन हैं.


जापान के शोधकर्ताओं के मुताबिक यदि आप तनाव में हैं,ओर कोई भावनात्मक फिल्म देखतें हैं,तो तनाव के स्तर में जबर्दस्त कमी दर्ज होती हैं.



प्रदूषित होती नदिया(River) कही सभ्यताओं के अंत का संकेत तो नही

विश्व की तमाम सभ्यताएँ नदियों के किनारें पल्लवित हुई हैं,चाहे मेसोपोटोमिया हो या हड़प्पा यदि नदिया नही होती तो न ये सभ्यताएँ होती और ना ही...