सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

इमली के फायदे और इमली में पाये जानें वाले पौषक तत्व

इमली के बारें में सामान्य जानकारी

इमली
इमली


इमली का पेड़ पादप वर्ग के शिंबी कुल में आता हैं.यह उष्ण कटिबंधीय जलवायु का वृक्ष हैं. जो भारत में जन्मा हैं.
 
इमली के कई नाम प्रचलित हैं,जैसे संस्कृत में इसे अम्लिका,चुंचिका,दंतशठा,चिंचा बंगाली में तेतुल,गुजराती में आंवली तथा लेटिन में टेमरिण्डस इण्ड़िका लिन्न कहते हैं.

इमली के फल और पत्तियों का स्वाद खट्टा,चटपटा और स्वादिष्ट होता हैं.जिसकी वज़ह से यह भारतीय  रसोई का अभिन्न अँग हैं.


इमली में पाये जानें वाले पौषक तत्व :::


इमली के गुदे में कैल्सियम,आयरन,विटामिन बी ,सी,के साथ फास्फोरस बहुतायत में पाया जाता हैं.

इसमें टार्टरिक एसिड़ 18%,तक तथा,ग्लूकोज 20% तथा फ्रक्टोज 30% पाया जाता हैं.इसके अतिरिक्त अन्य अनेक तत्व पाये जातें हैं जैसे टरपीन,लिमोनिन,जेरा नियोल,फेनाइल,प्रोपेनाइड़स,सैफाल,सिनामिक अम्ल,इथिलसिनामेट़,मिथाइल,सैलिजिलेट,पेक्टीन,पाइजारीन,और अल्काइथाईजाल्स नामक एसिड़ भी सूक्ष्म मात्रा में पाये जाते हैं.


इमली के बीज बीज में पाए जाने वाले तत्व


इमली के बीज में अल्बूमिनयडस,वसा,कार्बोहाइड्रेट, फायबर,नाइट्रोजन और फास्फोरस की मात्रा पर्याप्त मात्रा में उपस्थित रहती हैं.


इमली की जड़ों में पाए जाने वाले पौषक तत्व


विटेक्सीन,आइसोविटेक्सीन,ओरियेटीन जैसे ग्लाइकोसाइड़ पाये जातें हैं. 

छाल और तनों में :::


एल्कालाइड़ हार्डिनिन पाया जाता हैं.

इमली के फायदे 

पेट़ रोगों में इमली के फायदे :::


कब्ज होनें पर इमली के फल के गुदे में दूध मिलाकर सेवन करने से कब्ज में आराम मिलता हैं.



० इमली के गुदे में कपूर मिलाकर सेवन करने से पतले दस्त आ जाते हैं,इस तरह यह मृदु विरेचक का काम करती हैं.


० इसमें पाया जानें वाला पाइजारिन एक उत्तम कृमिनाशक हैं .इसके लिये गुदे में मक्खन मिलाकर सेवन करवाते हैं.


० इमली के बीज के चूरें में गुड़ और जीरा मिलाकर सेवन करवानें से पुरानें से पुराना आँव और पेचिस का मरीज स्वस्थ हो सकता हैं.


० कच्ची इमली को नमक के साथ खानें से पेट़ की वायु बाहर निकल जाती हैं.



० इमली की चट़नी बनाकर खानें से भूख खुलकर लगती हैं,तथा भोजन आसानी से पच जाता हैं.



भाँग का नशा कैसे उतारे  :::


० इमली के गुदे का रस भांग खानें वाले व्यक्ति को थोड़े थोड़े अन्तराल पर पिलाया जावें तो नशा तुरन्त ही उतर जाता हैं.

० इमली का रस लगातार पीनें वाला व्यक्ति मादक दृव्यों की ओर आकर्षित नहीं होता हैं.

त्वचा संबधित रोगों में इमली के फायदे 


० खुजली होनें पर गुदे को पीसकर त्वचा पर लपेटनें से खुजली दूर हो जाती हैं.

० इमली की छाल को तिल के तेल के साथ जले स्थान पर लगानें से शीघृ आराम मिलता हैं, और फफोले नही पड़ते.

० इसके बीज का बारिक चूर्ण बनाकर पके घाव पर लगानें से घाव से पीप बाहर निकल जाता हैं.


नपुसंकता नाशक उपाय 


० इमली के बीजों को दूध के साथ उबालकर इसे बारिक पीस लें और घी शक्कर मिलाकर रात को सोते समय एक चम्मच सेवन करें इस विधि से न केवल नपुसंकता खत्म होती हैं,बल्कि धातु भी पुष्ट होती हैं.


गठिया रोग में इमली के फायदे


० इमली के गुदे को नमक के साथ मिलाकर घुट़नों,शरीर के जोंड़ों पर बांधनें से गठिया रोगों में आराम मिलता हैं.

० संधियों में सूजन आने पर इमली की पत्तियों को पीसकर गरम कर लें तत्पश्चात संधियों पर बांध ले बहुत आराम मिलेगा.

लू (heat stroke)लगनें पर क्या करना चाहिए


० इमली के गुदे  का रस बनाकर पीला दें,साथ ही हाथों,तलवों पर इमली के गुदे से मालिश करें.


आँखों के रोगों में  इमली के फायदे


० इमली के बीजों को पीसकर आँखों पर बाँधनें से Digital eye strain का खतरा कम हो जाता हैं.

आयुर्वैद चिकित्सा में इमली को रूक्ष मलसारक,उष्ण और कफ वात शामक माना गया हैं.इससे अनेक औषधियों का निर्माण भी होता हैं,जैसे अम्लिकासव,चिंचा फल्लातक वटी आदि.

० प्याज के औषधीय प्रयोग

० बायोकाबिनेशन नंबर 1 से 28 तक







टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गेरू के औषधीय प्रयोग

गेरू के औषधीय प्रयोग गेरू के औषधीय प्रयोग   आयुर्वेद चिकित्सा में कुछ औषधीयाँ सामान्य जन के मन में  इतना आश्चर्य पैदा करती हैं कि कई लोग इन्हें तब तक औषधी नही मानतें जब तक की इनके विशिष्ट प्रभाव को महसूस नही कर लें । गेरु भी उसी श्रेणी की   आयुर्वेदिक औषधी   हैं। जो सामान्य मिट्टी   से   कहीं अधिक   इसके   विशिष्ट गुणों के लिए जानी जाती हैं। गेरु लाल रंग की मिट्टी होती हैं। जो सम्पूर्ण भारत में बहुतायत मात्रा में मिलती हैं। इसे गेरु या सेनागेरु कहते हैं। गेरू आयुर्वेद की विशिष्ट औषधी हैं जिसका प्रयोग रोग निदान में बहुतायत किया जाता हैं । गेरू का संस्कृत नाम  गेरू को संस्कृत में गेरिक ,स्वर्णगेरिक तथा पाषाण गेरिक के नाम से जाना जाता हैं । गेरू का लेटिन नाम  गेरू   silicate of aluminia  के नाम से जानी जाती हैं । गेरू की आयुर्वेद मतानुसार प्रकृति गेरू स्निग्ध ,मधुर कसैला ,और शीतल होता हैं । गेरू के औषधीय प्रयोग 1. आंतरिक रक्तस्त्राव रोकनें में गेरू शरीर के किसी भी हिस्से में होनें वाले रक्तस्त्राव को कम करने वाली सर्वमान्य औषधी हैं । इसके लिय

काला धतूरा के फायदे और नुकसान kala dhatura ke fayde aur nuksan

धतूरा भगवान शिव का प्रिय पौधा है। भगवान शिव धतूरा अपने मस्तिष्क पर धारण करते हैं और जो लोग धतूरा भगवान शिव को अर्पण करते थे वे उन्हें मनचाहा आशीष प्रदान करते हैं। धतूरा भी कई प्रकार का होता है जैसे काला धतूरा, सफेद धतूरा, पीला धतूरा आदि। आज हम आपको "काला धतूरा के फायदे और नुकसान kala dhatura ke fayde aur nuksan" के बारे में बताएंगे।  काला धतूरा के फायदे और नुकसान आयुर्वेद आयुर्वेद चिकित्सा में काला धतूरा बहुत महत्वपूर्ण औषधि के रूप में बहुत लंबे समय से इस्तेमाल हो रहा है । धतूरा बहुत ही जहरीला फल होता है , प्रकृति में गर्म और भारी होता है। काला धतूरा का वैज्ञानिक नाम काला धतूरा का वैज्ञानिक नाम धतूरा स्ट्रामोनियम DHATURA STRAMONIUM है । अंग्रेजी में इसे डेविल्स एप्पल Devil's apple, डेविल्स ट्रम्पेट Devil's trumpet के नाम से जाना जाता है। संस्कृत में इसे दस्तूर, मदन, उन्मत्त ,शिव प्रिय महामोधि, कनक आदि नाम से जानते हैं। काला धतूरा की पहचान कैसे करें  काला धतूरा के पत्ते नोक दार ,डंठल युक्त और बड़े आकार के होते हैं। काला धतूरा के फूल घंटी

टीकाकरण चार्ट [vaccination chart] और संभावित प्रश्न

 टीकाकरण चार्ट # 1.गर्भावस्था के समय टीकाकारण ::: गर्भावस्था की शुरूआत में Titnus का पहला टीका टी.टी - 1. टी.टी -1 के चार सप्ताह बाद टी.टी.-2 यदि पिछली गर्भावस्था में टी.टी - 2 दिया गया हैं,तो केवल बूस्टर दीजिए. # टीके की मात्रा ,कैसें और कहाँ दें 0.5 ml.मात्रा प्रशिक्षित व्यक्ति द्धारा ऊपरी बांह की मांसपेशी में. # महत्वपूर्ण गर्भावस्था के 36 सप्ताह हो गयें हो तो मात्र टी.टी.- बूस्टर देना चाहियें.  टीकाकरण का दृश्य # 2.शिशुओं के लियें टीकाकरण  #जन्म के समय ::: 1. B.C.G.  =     0.1 ml बाँह पर त्वचा के निचें. 2.हेपेटाइटिस बी.=  0.5 ml मध्य जांघ के बाहरी हिस्सें पर मांसपेशी में 3.o.p.v.या oral polio vaccine = दो बूँद मुहँ में . ०  जानिये पोलियो क्या होता हैं ? #6 सप्ताह पर ::: 1.हेपेटाइटिस बी. = 0.5 ml 2.D.P.T. = 0.5 ml मध्य जांघ का बाहरी हिस्सें में माँसपेशियों में. 3.o.p.v.या oral polio vaccine. #10 सप्ताह पर ::: 1.हेपेटाइटिस बी. 2.D.P.T. 3.o.p.v. #14 सप्ताह पर ::: 1.हेपेटाइटिस बी. 2.D.P.T. 3.o.p.v.   #9 से 12 माह