मंगलवार, 29 सितंबर 2015

गर्भ संस्कार ,pregnancy Care

आयुर्वैद चिकित्सा पद्धति यदि आज तक अपना अस्तित्व बनायें हुयें तो इसका सम्पूर्ण स्रेय आयुर्वैद के उन  महान आचार्यों  को जाता हैं, जिन्होनें बीमारीं को मात्र बीमारीं के रूप में न देखकर इसके सामाजिक, आर्थिक,मनोंवेञानिक,पर्यावरणीय कारको तक की चर्चा अपनें ग्रन्थों में की.एेसा ही एक महत्वपूर्ण मसला बच्चों की परवरिश को लेकर हैं.गर्भ संस्कार भी आयुर्वैद की इसी महान परंपरा का प्रतिनिधित्व करता हैं जिसकी चर्चा आधुनिकतम विञान भी करता हैं कि बच्चों की परवरिश बच्चें के दुनिया में आनें की बाद की प्रक्रिया नहीं है,बल्कि यह तो बच्चें के गर्भ में आनें के बाद ही शुरू हो जाती हैं.महाभारत में अभिमन्यु ने चक्रव्यू भेदनें का राज़ अपनी माँ के गर्भ में ही जान लिया था.आज के लोग पूछतें हैं,क्या यह संभव था ? और आज क्या यह संभव हैं ?इस सवाल का जवाब यही हैं कि यदि आपनें प्राचीन भारतीय आयुर्वैद ग्रन्थों और अन्य परंपरागत शास्त्रों का अध्ययन किया होता तो इस सवाल को पूछनें की ज़रूरत ही नहीं पड़ती फिर भी बताना चाहूँगा कि गर्भ संस्कार वही विधि हैं जिसके माध्यम मनचाहे व्यक्तित्व को ढाला (program)  जा सकता हैं.यह कपोल कल्पना नहीं बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों और आज के शास्त्रों द्वारा प्रमाणित बातें हैं. क्या कारण हैं कि रामायण काल के लव-कुश अपनें पिता के समान बलवान निकलें और उनकी समस्त सेना को धूल चटाकर अपना और अपनी माता का हक लेकर ही माने. इतनी छोटी उम्र में इतनें प्रतापी योद्धा निकलें तो इसका सम्पूर्ण स्रेय वाल्मिक को जाता हैं,जिन्होंनें सीता को गर्भ संस्कार के माध्यम से पिता को झुकानें वालें बालकों को जन्म देनें का पाठ पढाया था.आज तो विञान इतना उन्नत हो गया हैं,कि हर पिछली बातों का हर रूप चाहे लिखित हो या द्रश्य रूप में हो रिकार्ड मोजूद हैं,कभी प्रयोग करके देखें बच्चें के गर्भ में रहते हुये क्या संस्कार दिया गया था और बच्चा पैदा होनें के बाद किस तरह का व्यहवार प्रदर्शित करता हैं,यकिन मानियें यदि पूर्ण शास्त्र सम्मत गर्भ संस्कार हुआ तो परिणामों से आप भी हतभ्रत रह जावेंगें.
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