शुक्रवार, 4 मई 2018

विभिन्न जल स्त्रोंतों से निकलनें वालें जल के अचूक फायदे ( jal ke achuk fayde)

पानी water
 जल

# जल का परिचय


हमारी प्रथ्वी का 71% भाग जल से आच्छादित हैं.यह जल समुद्र,भूगर्भ और हिम ग्लेशियरों के रूप में प्रथ्वी पर मोंजूद हैं.

पानी रासायनिक रूप में दो हाइड्रोजन अणु और एक आक्सीजन अणु से मिलकर बना होता हैं.इसका रासायनिक सूत्र H²O हैं.

शुद्ध जल का pH मान 7 होता हैं,जिसका मतलब हैं,कि जल उदासीन द्रव हैं.

हमारें शरीर में 65 से 80 प्रतिशत भाग पानी का होता हैं.

पानी बिना जीवन की कल्पना करना असंभव हैं.
मनुष्य भोजन के बिना 7 दिन जीवित रह सकता हैं,परंतु पानी के बिना 72 घंटे से ज्यादा जीवित नही रह सकता हैं.

पानी की इसी महत्ता को देखते हुये रहीम ने लिखा हैं

रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून पानी गये न उबरे मोती,मानुष,चून

 # विभिन्न स्त्रोत से मिलनें वाले जल के गुण :::


१.वर्षा का जल


चरकसंहिता में वर्षा जल के गुणों का वर्णन करतें हुये लिखा हैं कि

शितंशुचिशिवंमृष्टंविमलंलघुषड्गुणम ||प्रकृत्यादिव्यमुदकंभ्रष्टंपात्रमपेक्षते ||

आकाश से गिरा जल स्वभाव में शीतल,स्वच्छ,शुभ,हल्का होता हैं.यह जल प्रथ्वी के स्पर्श से मुक्त होता हैं.

वर्षा का जल सबसे शुद्ध माना जाता हैं यह जल मनुष्य की कई शारीरिक समस्याओं के लिये रामबाण औषधि के रूप में माना जाता हैं जैसें

#१.जिन व्यक्तियों को अपच की समस्या होती हैं उन्हें इस जल को वर्षाकाल में नियमित रूप से पीना चाहियें.

#२.एसीडीटी की समस्या होनें पर इस जल को   सुबह के समय पीना चाहियें .

#३.उच्च रक्तचाप में वर्षा जल को किसी पीतल के बर्तन में संग्रहित कर उपयोग लें यदि वर्षाकाल में यह प्रयोग कर लिया जायें तो उच्च रक्तचाप में शर्तिया फायदा मिलता हैं.

#४.वर्षाजल के नियमित सेवन करनें से शरीर का Ph लेवल संतुलित रहता हैं,ph के संतुलित रहनें पर व्यक्ति का शरीर बीमार होनें से बचा रहता हैं.

#५.जिन लोगों को कम दिखाई देता हो उन्हें वर्षाजल से अपनी आँखों को धोना चाहियें.

#६.ह्रदय रोग होनें पर वर्षाजल को ताम्र पत्र में संग्रहित कर 24 घंटे बाद उपयोग करना चाहियें. यह जल ह्रदय की धमनियों में आये अवरोध का खोलता हैं.

#७.बच्चों की स्मरण शक्ति बढ़ाना हो तो चाँदी के पात्र में 24 घंटे तक रखा जल बच्चों को पीलाना चाहियें.

#८.तीरंदाजी,शतरंज आदि खेलों में एकाग्रता की ज़रूरत होती हैं अत: इन खेलों के खिलाड़ियों को चाँदी या मिट्टी के पात्र में 24. घंटे से अधिक रखा जल वर्षाकाल में अवश्य पीना चाहियें.

#९.गर्भवती स्त्रीयों को वर्षाजल का सेवन करना चाहियें इसके सेवन से गर्भवती द्धारा सेवन किये गये भोजन का पाचन अच्छी तरह होता हैं और गर्भ में पल रहें शिशु का विकास अच्छे प्रकार से होता हैं.

#१०.वर्षाजल से स्नान करनें वालें व्यक्ति की रोगप्रतिरोधक क्षमता बहुत अधिक होती हैं.वर्षाजल में स्नान करनें के बाद भूख खुलकर लगती हैं.

#११.नियमित रूप से वर्षाकाल में वर्षा में स्नान करनें वाला व्यक्ति अपनें जीवन के 100 वर्ष पूरें करता हैं ऐसी प्राचीन भारतीय चिकित्सा ग्रंथों की दृढ़ मान्यता हैं.

#१२.शरीर के किसी भी भाग में दर्द रहनें पर  वर्षाजल को सीधे आकाश से गिरनें के दोंरान किसी स्वच्छ पात्र में ग्रहण कर लेना चाहियें.तत्पश्चात शीघ्र ग्रहण करना चाहियें.

#१३.वर्षाजल के सेवन से शरीर की समस्त शारीरिक क्रियाएँ संतुलित अवस्था में रहकर संचालित होती हैं.



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# २.पीली मिट्टी का जल



पीली मिट्टी से निकला जल या पीली मिट्टी से युक्त नदी का जल स्वाद में तीखा ,भारी,और चिकना होता हैं.इस जल के चिकित्सकीय उपयोग निम्न प्रकार से हैं

#१.निम्न रक्तचाप में यह जल अति उत्तम माना जाता हैं.इसके सेवन से व्यक्ति के निम्न रक्तचाप को सामान्य रक्तचाप में परिवर्तित किया जा सकता हैं.

#२.जिन लोगों को बार - बार दस्त लगतें हो उन्हें यह जल अवश्य सेवन करना चाहियें.

#३.इस जल के सेवन से हिचकी रोग की रोकथाम की जा सकती हैं.

#४.यदि किसी व्यक्ति को उच्च रक्तचाप हैं,तो इस जल का सेवन मिट्टी के घड़े में 2-3 घंटें रखनें के पश्चात ही करना चाहियें.

#५.शरीर के किसी हिस्से पर सूजन होनें या सम्पूर्ण शरीर पर बिना किसी विशेष बीमारी के सूजन होनें पर इस जल को हल्का गर्म करके सेवन करना चाहियें.

#६.पीली मिट्टी के स्त्रोंत से निकला जल व्यक्ति को फुर्तीला,और मेहनती बनाता हैं.

# ३.काली मिट्टी से निकला जल


काली मिट्टी से निकला हुआ जल शीतल,मीठा और हल्का होता हैं.इसको पीनें वालें लोग शाँतचित्त,और प्रशन्न रहतें हैं.

#१.कब्ज, अपच तथा पेट की गड़बडियों में काली मिट्टी के बनें घड़ें में रखा जल बहुत उत्तम माना गया हैं.

#२.बालों की समस्याओं जैसें बाल झड़ना,असमय सफेद होना आदि में इस जल से बाल धोना चाहियें.

#३.काली मिट्टी का जल वीर्य का वृद्धिकारक,शरीर को संपुष्टी देनें वाला और नपुंसकता नाशक होता हैं.

#४.यह जल चिकना होता हैं अत: इसके सेवन से हड्डीयों से संबधित समस्या और नसों से संबधित समस्या नही होती हैं.

#५.पेट़ में छालें होने पर इस जल का सेवन बहुत फायदेमंद होता हैं.

#६.मधुर होनें से काली मिट्टी का जल लम्बें समय तक पात्र में संग्रहित नही किया जाना चाहियें .

#७.काली मिट्टी के जल को 24 घंट तक ही संग्रहित कर उपयोग में लेना चाहियें.

#८.ग्रीष्म ऋतु में काली मिट्टी से निकला जल शरीर की गर्मी को शाँत करता हैं और लू लगनें से बचाता हैं.

# ४.रेगिस्तानी भूमि या ऊसर भूमि से निकला जल


रेगिस्तानी या ऊसर भूमि से निकला जल स्वाद में लवणयुक्त,हल्का और गर्म प्रकृति का होता हैं.इस जल के निम्न उपयोग हैं.

#१.निम्न रक्तचाप में इस जल का सेवन करनें से बहुत फायदा मिलता हैं.

#२.गठिया, वात,या जोंड़ों में दर्द रहनें पर इस जल का सेवन तांबें के पात्र में संग्रहित कर करना चाहियें.

#३.उसर भूमि से निकला जल गर्म प्रकृति का होनें से कास,श्वास में आराम दिलाता हैं,इसके लिये इसे उचित विधि से सेवन करना चाहियें.

#४.इस जल के सेवन से मोटापे की समस्या से निजात मिल जाती हैं.

# ५.ग्लेशियरों से निकला जल


ग्लेशियरों से प्रवाहित जल इसके स्त्रोंत के निकट शीतल,मधुर और भारी होता हैं.इसके चिकित्सकीय गुण निम्न प्रकार हैं.

#१.यह जल शरीर को बलशाली बनाता हैं.

#२.इसका सेवन वीर्य को गाढ़ा और पुृृष्ट करता हैं.

#३.यह जल स्त्रीयों की अनेक समस्याओं जैसें महावारी की समस्याओं, गर्भवती की समस्याओं का शमन करता हैं.

#४.त्वचा संबधित समस्याओं में इसका सेवन बहुत फायदेमंद रहता हैं.


# ६.लाल मिट्टी से निकला जल

लाल मिट्टी से निकला जल स्वाद में कसेला,भारी और प्रकृति में गर्म होता हैं.

#१.रक्ताल्पता ( Anaemia ) में इस जल का सेवन करनें वाला व्यक्ति इस बीमारी से जल्द निजात पा लेता हैं.

#२.यह जल माँसपेशियों में लचीलापन लाता हैं.

#३.कसेला होनें से यह जल वात प्रकृति के लोगो के लिये बहुत फायदेमंद रहता हैं.

जल जिस स्त्रोंत से प्राप्त होता हैं वहाँ की भूमि,जलवायु के अनुसार अपनी प्रकृति बदल लेता हैं.

पीनें का जल साफ स्वच्छ और निर्मल होना चाहियें यदि पीनें का जल रूका हुआ,बदबूदार,और मटमेला हैं तो ऐसा जल पीनें योग्य कदापि नही होता हैं.

आजकल पीनें का पानी प्लास्टिक बाँटल में आता हैं,यह जल कई कई दिनों तक ऐसे ही पैकिंग में पड़ा रहता हैं.

कई शोधों में यह स्पष्ट हुआ हैं कि बौतलबंद पानी में प्लास्टिक के कण खतरनाक स्तर तक पायें जातें हैं जो मनुष्य के शरीर में जाकर कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी उत्पन्न कर रहें हैं.

भारत में करोड़ों लोग प्रतिवर्ष अशुद्ध पेयजल की वजह से बीमार होतें हैं तथा लाखो लोग मृत्यु को प्राप्त हो जातें हैं.जबकि वास्तविकता में देखा जाये तो भारत भारत शुद्ध वर्षा जल के मामलें में संपन्न देश हैं.

हमारें यहाँ प्रतिवर्ष इतनी वर्षा हो जाती हैं कि हम एशिया की आधी आबादी को पूरे एक वर्ष तक पानी पीला सकतें हैं.परंतु कुप्रबंधन के चलते यह जल समुद्र में बह जाता हैं और हमारी धरती प्यासी ही रह जाती हैं.

सरकारें सतह जल जैसें शुद्ध जल को सहजनें के बजाय जनता की प्यास हजारों फीट़ गहराई से निकालें जल से बुझाती हैं.कम गहराई से निकाले पानी की गुणवत्ता तो ठीक होती हैं परंतु अधिक गहराई से निकाला  जल कठोर,अनेक आँक्साइड़ों और सल्फेट से युक्त होता हैं.जो पीनें पर अनेक गंभीर रोग प्रदान करता हैं. 



#७.गेसियरों से निकला जल


गेसियरों से निकला जल गर्म होता हैं । यह पिनें योग्य तभी माना जाता हैं जब साफ स्वच्छ और बदबू रहित हो इस प्रकार का जल हृदय रोग,मधुमेह ,निम्न रक्तचाप और,मोटापे के लिए वरदान माना गया हैं । 

गेसियरों से निकला ऐसा जल जिसमें गंधक सिलिका जेसे तत्वों की प्रधानता हो चर्म रोगों के लियें वरदान माना गया हैं ।


आज आवश्यकता इस बात की है कि वैदिक कालिन ग्रंथों में वर्णित शुद्ध जल प्राप्त करनें के तरीकों पर गंभीरता से विचार किया जायें क्योंकि इन्ही वैदिककालीन तकनीकों की सहायता से मनुष्य पूरे 100 वर्ष तक जीवित रहता था.






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