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पंडित दीनदयाल उपाध्याय ( PANDIT DINADAYAL UPADHYAY)

                       ।।। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ।।।


महान राष्ट्रवादी, चिंतक, कुशल संघठनकर्ता,राष्ट्रनिर्माता पंडित दीनदयाल उपाध्याय उन व्यक्तित्वों में शुमार हैं। जिन पर हर भारतीय गर्व महसूस करता हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक और जनसंघ
पंडित दीनदयाल उपाध्याय

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का जन्म अश्विन कृष्ण त्रयोदशी संवत1973 तदनुसार,25 सितम्बर1916 को राजस्थान के धनक्या गांव में प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार मेंहुआ था। ( पासपोर्ट में जन्म स्थान नागल चन्द्रभान गांव दर्ज हैं)


इनके पिता का नाम ' भगवती प्रसाद उपाध्याय ' और माता का नाम ' रामप्यारी बाई ' था।
इनके पिता रेलवे में असिस्टेंट स्टेशन मास्टर थे।


                              ।।।  प्रारम्भिक जीवन ।।।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के बचपन का नाम " दीना "था।इनका बचपन कठोर संघर्ष में बीता, मात्र 3 वर्ष की उम्र में इनके पिता का देहांत हो गया था.

आपकी प्रारम्भिक शिक्षा मामा राधारमण शुक्ल के यहां गंगापुर में हुई, अपनी छोटी सी उम्र में ही दीनदयाल जी ने अपनी प्रतिभा का परिचय करा दिया था जब इन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा में सर्वोच्च अंक हासिल किये थे।

इसके उपलक्ष्य में तत्कालीन सीकर नरेश ने दीनदयाल जी को स्वर्ण पदक,250 रुपये नकद और 10 रुपये मासिक की छात्रवृत्ति प्रदान की थी।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय को गणित में महारत हासिल थी, इनकी गणित की उत्तरपुस्तिका काफी समय तक छात्रों को दिखाने के लिये रखी गई थी, ताकि युवा पीढ़ी इनकी बौद्धिकता से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ सके।

इसके बाद आगे की पढ़ाई इन्होंने कानपुर के सनातन धर्म कॉलेज से की इस कॉलेज से अध्ययन करने के दोरान दीनदयाल जी का सम्पर्क प्रखर राष्ट्रवादी चिंतकों सुंदर सिंह भंडारी ओर बलवन्त महसिंघे जैसे लोंगो से हुआ।

इसके बाद दीनदयाल जी एम. ए. की पढ़ाई करने आगरा चले गए जहाँ वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्तम्भ नानाजी देशमुख और भाऊराव जुगाड़े के सम्पर्क में आए,और संघ की गतिविधियों में सक्रिय हो गये।

इस बीच सरकारी नोकरी की भी पेशकश हुई परन्तु दीनदयाल जी का मन और विशाल था वे देश की सच्ची सेवा करना चाहते थे।यह बात उन्होंने पत्र के माध्यम से अपने मामा को बता दी थी।



                            ।।।   राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ।।।


पंडित दीनदयाल जी ने सन 1937 में बलवन्त महाशब्दे के प्रेरणा से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचार प्रसार करने का बीड़ा उठाया  ।

सन 1947 ई में पंडित जी ने राष्ट्रधर्म मासिक, पांचजन्य, और स्वदेश के सम्पादन में नानाजी देशमुख, अटल बिहारी वाजपेयी, और यादव राव देशमुख का सहयोग किया।

सन 1950 में जब श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने नेहरू मन्त्रिमण्डल से त्यागपत्र देकर जनसंघ का निर्माण किया तो पंडित जी ने मुखर्जी जी के साथ जनसंघ के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सन 1951 में आप जनसंघ के संघठन मन्त्री बने।
सन 1953 में जनसंघ के महामंत्री बने।सन 1955 में आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघठन के उप प्रांतीय संघठक बने।

सन 1967 में पंडित जी कालीकट में आयोजित सम्मेलन में जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए।

                                      ।।।   निधन ।।।


जब जनसंघ का संघठनात्मक कार्य पूर्ण हो चुका था और पार्टी पंडित दीनदयाल उपाध्याय के कुशल नेतृत्व में आगे बढ़ रही थी ,अचानक काल का पहिया घुमा 11 फरवरी 1968 को पंडित जी मुग़लसराय स्टेशन( अब पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्टेशन) के निकट पोल संख्या 1276 पर मृत अवस्था में पाये गये। 

सारा राष्ट्र  इस हृदय विदारक घटना से स्तब्ध रह गया राष्ट्र अपना कमाऊ पूत खो चुका था।

किन्तु आदरणीय पंडित दीनदयाल उपाध्याय अपने साथ राष्ट्र भक्ति की वो विचारधारा छोड़ गए हैं जिसे पढ़कर हर भारतीय अपना सीना गर्व से चौडा कर सकता हैं।


                                 ।।।   पंडित जी ।।।



एक बार दीनदयाल उपाध्याय जी सिविल सेवा की परीक्षा में सम्मिलित होने धोती,कुर्ता और सिर पर टोपी लगाकर गये थे ।जबकि अन्य अभ्यर्थी सूट पहनकर।
पंडित जैसी वेशभूषा में देखकर कुछ अभ्यथियों ने हँसी उड़ाई, बाद में जब परिणाम आया तो दीनदयाल उपाध्याय जी ने इस परीक्षा में सर्वोच्च स्थान हासिल किया। किन्तु उन्होंने नोकरी नही की।

इसके पश्चात दीनदयाल उपाध्याय अपने समर्थकों में  " पंडित जी "नाम से लोकप्रिय हो गये।
    

                                   ।।।   पुस्तकें ।।।


1.दो योजनायें
2.राजनितिक डायरी
3.अर्थनीति का अवमूल्यन
4.सम्राट चन्द्रगुप्त
5.जगतगुरु शंकराचार्य
6.एकात्म मानववाद
7.राष्ट्र जीवन की दिशा
8.एक प्रेमकथा

                              ।।।   एकात्म मानववाद ।।।


स्वतन्त्रता के पश्चात देश पूंजीवाद और समाजवाद के अन्तर्द्वन्द से गुज़र रहा था। पश्चात्यकरण के प्रभाव में आकर अपनी नीतियां बना रहा था। भारतीय दर्शन, संस्कृति, और विचारों से दूर जा रहा था। तब पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने  " एकात्म मानववाद" के दर्शन से भारत को परिचित कराया ।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का एकात्म मानववाद व्यक्ति को केन्द्र में रखकर विकास करने से सम्बंधित हैं,जिसके अनुसार व्यक्ति से जुड़ा परिवार, परिवार से जुड़ा समाज, समाज से जुड़ा राष्ट्र, और राष्ट्र से जुड़ा विश्व अन्तरसम्बन्धित रहते हुए ही प्रगति कर सकते हैं। और इनमें कोई संघर्ष नहीं हो सकता।

पंडित जी ने राष्ट्र को जीवित व्यक्ति के समान माना हैं, जिस प्रकार से व्यक्ति के प्राकृतिक सहज ज्ञान को दबाया नही जा सकता, उसे दबाने पर अलग अलग मानसिक रोग हो सकते हैं, व्यक्ति बेचेन और उदासीन रहता हैं, उसकी क्षमता घट जाती हैं।

उसी प्रकार राष्ट्र की प्राकृतिक सहज पहचान को नजरंदाज करने के घातक परिणाम होते हैं।

               

              ।।।   महात्मा गांधी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय ।।।


कई लोग महात्मा गांधी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों में विरोधाभास प्रकट करते हैं, जबकि हम गहराई से अध्ययन करें तो पता चलता हैं कि कई मामलों में ,विशेषकर विदेशी संस्कृति और सभ्यता को लेकर दोनों में बहुत कुछ समान हैं। एक उदाहरण देखिए 

      '' महात्मा गांधी विदेशी संस्कृति अपनाने को लेकर कहा करते थे कि           मेरा  घर ऐसा होना चाहिये जिसमें चारों ओर खिड़किया हो ,लेकिन           ये मेरे ऊपर निर्भर करेगा कि में वही खिड़की खोलूँ जिसमें से शीतल           पवन आ रही हो अर्थात में वही  विदेशी विचार या सँस्कृति ग्रहण               करू,जिसमें देश का कल्याण हो "


इसी प्रकार पंडित दीनदयाल उपाध्याय का मत था कि 

       " विदेशी परम्परायें सार्वभौमिक नहीं हो सकती हो सकता हैं उसके               कुछ अंश अच्छे हो और वे हमारे अनुकूल हो तो उन्हें अपनाने में                 कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। आयुर्वेद में भी रोगी की जगह के                     अनुरूप निदान तलाशा जाता हैं"



                  ।।।   राजनीतिक शुचिता के कट्टर समर्थक ।।।


पंडित दीनदयाल उपाध्याय राजनीति में शुचिता के कट्टर समर्थक थे, सत्ता प्राप्ति के लिये दलबदल ओर छलकपट के वे कट्टर विरोधी थे।

पंडित दीनदयाल जी का स्पष्ट मत था कि यदि राजनीतिक दलों के प्रति जनता में इज्जत रहे तो उन्हें इन पचड़ों से दूर रहना चाहिए।

सन 1967 में जब दीनदयाल उपाध्याय ने चुनाव लड़ा तो जौनपुर में ब्राह्मण मतदातओं का बाहुल्य देखते हुए अनेक कार्यकर्ताओ ने उन्हें अपने नाम के आगे  " पंडित " शब्द लिखने का आग्रह किया, परन्तु दीनदयाल जी ने कार्यकर्ताओं को निर्देश दे दिया कि मेरे नाम के आगे यदि पंडित लगाकर जाति के नाम पर वोट मांगने की कोशिश की तो में चुनाव बीच में ही छोड़ दूंगा।

आज की राजनीति में जहां राजनीति का आधार ही जातिवादी बन गया हैं, जातिवाद के आधार पर वोट मांगने वाले राजनितिक दलो के लिये यह एक सबक हैं।


                                   ।।। वसुधैव कुटुम्बकम ।।।

वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा को समग्र रूप में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ही प्रचारित किया है, उनके अनुसार यह विचार भारतीय सभ्यता के शुरू से ही प्रचलित हैं।इसी के अनुसार भारत में सभी धर्मों का आदर हैं।


                                      ।।।   राष्ट्रधर्म ।।।


पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रधर्म को सबसे बहुत व्यापक दृष्टिकोण से देखते थे। उनके अनुसार राष्ट्रधर्म व्यक्ति के साथ राष्ट्र को भी नियमानुकूल ओर प्रकृति अनुकूल आचरण करना सिखाता है ।

जब जर्मनी ने फ्रांस पर आक्रमण किया तो फ्रांस की सेना नाजी जर्मनी का सामना नहीं कर सकी ओर फ्रांस के राष्ट्रपति ने नाजी जर्मनी की अधीनता स्वीकार कर ली ओर फ्रांस के राष्ट्रपति के इस फैसले का फ्रांस की जनता ने समर्थन किया,किंतु  " डिगाल " नामक व्यक्ति ने जर्मनी की अधीनता नही स्वीकार की ,यह व्यक्ति भागकर लन्दन चला गया ओर वहाँ फ्रांस की निर्वासित सरकार की स्थापना की।

उसका मत था कि  

                        " फ्रांस आजाद था,और आजाद रहेगा " 

बाद में उसने फ्रांस को आजाद देखा अब कई लोग यह कहते हैं कि डिगाल फ्रांस के जनमत के विरुद्ध गया, जबकि वास्तविकता यह हैं कि डिगाल के लिये राष्ट्रधर्म जनमत से कही बड़ा था।


कश्मीर पर भी दीनदयाल जी इसी प्रकार का विचार रखते थे उनका मत था कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग हैं।इसमे जनमत का कोई सवाल ही नही उठता।


                                     ।।।   राष्ट्रवाद ।।।


पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का मत था कि राष्ट्रवाद की भावना किसी ज़मीन के टुकड़े पर एक साथ रहने मात्र से ही नहीं उपजती बल्कि इसके लिए राष्ट्रवाद का तत्व मनुष्य की अंतरात्मा में होना चाहिए।

ग्रीक ओर मिस्र जैसे राष्ट्रों का कभी विघटन नहीं हुआ लेकिन क्या हम आज के ग्रीक ओर मिस्र की तुलना  प्राचीन ग्रीक ओर मिस्र से कर सकते हैं ,शायद कदापि नहीं जबकि यहूदियों ने इस्राइल बनने के पूर्व दूसरे समाजो ओर राष्ट्रों में रहकर भी अपनी राष्ट्रीय पहचान ओर अस्मिता बचाकर रखी थी।  

                              ।।।    शिक्षा के संदर्भ में मत ।।।


शिक्षा के संदर्भ में पंडित दीनदयाल उपाध्याय बहुत खुले ओर उदार विचारों के धनी थे।उनका मत था कि शिक्षा पूर्णतः निःशुल्क होनी चाहिये।
वे कहते थे बीज बोने ओर पेड़ बनने तक क्या हम उस पेड़ से पैसे लेते है, बिल्कुल भी नही क्योंकि हमें पता हैं कि पेड़ में किया गया निवेश हमें प्राणवायु प्रदान करेगा।
उसी प्रकार किसी बच्चे की शिक्षा में किया गया निवेश राष्ट्र ओर समाज को बहुत आगे तक ले जाने का कार्य करेगा।

प्राचीन गुरुकुलों में भी बच्चों से किसी प्रकार की कोई फीस नही ली जाती थी । ये राष्ट्र का उत्तरदायित्व हैं कि वह अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा प्रदान कर स्वयं विकसित बने।


                                            ।।। रोजगार।।।


रोजगार प्रदान करने के सन्दर्भ में दीनदयाल जी का मत था कि राष्ट्र को प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता अनुसार काम करने की गारंटी देना चाहिए, जिससे समाज और राष्ट्र विकृत होने से बच सके।

हमें ऐसी व्यवस्था बिल्कुल भी नहीं चाहिए की जिसमें बच्चे ओर बुजुर्ग अपने स्वाभाविक कर्मों को छोड़कर कठोर परिश्रम करें और युवा काम के अभाव में बेरोजगार घूमे।

                

                                         ।। ज्ञान ।।


दूसरे समाजो के ज्ञान को अपनाने के संदर्भ में दीनदयाल उपाध्याय का मत था की दूसरे समाजो में प्रचलित ज्ञान की अच्छाई को ग्रहण कर लिया जाना चाहिए, ओर उसकी विकृति को छोड़ दिया जाना चाहिए।



वास्तव में पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीयता की प्रतिमूर्ति थे। जिनसे प्रत्येक भारतीय को प्रेरणा ग्रहण करना चाहिये।






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० आत्मविकास के 9 मार्ग



० राज्यपाल

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