सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मधुमक्खी पालन एक लाभदायक व्यवसाय [Honeybee]


एपीकल्चर
 मधुमक्खी पालन(एपीकल्चर)
जिस प्रकार से शहद की मांग दिनों दिन बढ़ती जा रही हैं,उसकी पूर्ति के लिये मधुमक्खी पालन (एपीकल्चर) एक लाभप्रद व्यवसाय बन गया हैं.यदि हम उचित विधि अपनाकर मधुमक्खी पालन को अपनायें तो न केवल मधुमक्खी पालन से लाभ कमा सकते हैं,बल्कि फसलों और फूलों की पैदावार भी  बढ़ा सकते हैं क्योंकि मधुमक्खी फसलों का परागण की दर तीव्र कर देती हैं.आईयें जानतें मधुमक्खी पालन के बारें में

#1.शहद निर्माण की प्रक्रिया :::

मधुमक्खी एक साथ समूह में रहती हैं, प्रत्येक मधुमक्खी का काम बँटा रहता हैं जैसे एक समूह में एक रानी मधुमक्खी, लगभग 100 नर मधुमक्खी तथा 20 से 60 हजार नपुसंक श्रमिक मधुमक्खीयाँ होती हैं.

श्रमिक मधुमक्खी फूलो से रस व पराग मुहँ में भरकर लाती हैं,व छत्ते पर आकर मुहँ खाली कर देती हैं,कुछ मधुमक्खीयाँ अपने मुख से रस को ऊपर निचें करती रहती हैं,फलस्वरूप रस गाढ़ा हो जाता हैं,इन मधुमक्खीयों  के शरीर से एक इनवर्ट नामक एंजाइम निकलता हैं,जिसके फलस्वरूप शहद मीठा हो जाता हैं.लगभग 100 ग्राम शहद बनानें में मधुमक्खी को 1 लाख बार फूलों के चक्कर लगानें पड़ते हैं.

#मधुमक्खी पालन हेतू प्रजाति :::

#1.एपिस डोरसेटा :::

यह प्रजाति सम्पूर्ण भारत में पाई जाती हैं,यह सबसे ज्यादा शहद उत्पादन देने वाली प्रजाति हैं.इसके द्धारा 5 से 6 फीट़ लम्बा और 2 से 4 फीट़ चोड़ा छत्ता बनाया जाता हैं.

#2.एपिस इण्ड़िका :::

जैसा कि नाम से स्पष्ट हैं,यह एक भारतीय प्रजाति की मधुमक्खी हैं,जो औसत उत्पादन प्रदान करती हैं.गुणवत्ता के दृष्टिकोण से इसका शहद एपिस डोरसेटा से उत्तम होता हैं.

प्याज के औषधीय उपयोग

० कद्दू के औषधीय उपयोग

#3.एपिस फ्लोरिया :::

इस प्रजाति का शहद उत्पादन में नगण्य योगदान रहता हैं,क्योंकि यह लगातार एक जगह से दूसरी जगह घूमती रहती हैं फलस्वरूप यह ज्यादा बड़ा छत्ता निर्मित नही कर पाती हैं.और इससे निकलने वाला शहद भी कम होता हैं,किन्तु गुणवत्ता के दृष्टिकोण से इसका शहद सर्वोत्तम होता हैं.

#मधुमक्खी के रोग :::

बेहतर शहद उत्पादन के लिये आवश्यक हैं,कि मधुमक्खी स्वस्थ हो और निरन्तर उत्पादन देती रहे किन्तु कई बार मधुमक्खीयाँ बीमार हो जाती हैं,जिसकी जानकारी मधुमक्खी पालको को होना आवश्यक हैं.

#1.अमेरिकन विकृत शिशु रोग :::

इस रोग में शिशु मधुमक्खी प्यूपा अवस्था में मर जाती हैं.तथा रोगग्रस्त शिशु का रंग मैले सफेद से काले रंग का हो जाता हैं.तथा सुखकर कोष्ठ के तल पर चिपक जाता हैं.

इस बीमारी के नियत्रंण हेतू टेरामाइसिन एन्टीबायोटिक कैप्सूल  0.25 - 0.45 ग्राम प्रति 3 लीटर शक्कर का घोल बनाकर मधुमक्खीयों को सप्ताह में दो बार खिलाना चाहियें.

#2. यूरोपियन विकृत शिशु रोग :::

इस रोग में मुडी हुई सुंडी अवस्था में मर जाते हैं,मरे हुये शिशु से ज्यादा खट्टी बदबू आती हैं.तथा मधुमक्खी का रंग भूरा होकर सिर तरफ से काला हो जाता हैं.इस रोग का कोई प्रभावी उपचार नही हैं.

#3. नोशीमा रोग :::

इस रोग में मधुमक्खी रेंगती हुई पत्तियों पर चलती हैं तथा मधुमक्खी का पेट लंबा और मोटा हो जाता हैं.
इसका भी प्रभावी उपचार उपलब्ध नही हैं.

#4.इरीडो रोग :::

यह वायरसजनित रोग हैं.यह रोग गर्मीयों मे अधिक होता हैं इसकी वज़ह से मधुमक्खी सुस्त होकर काम करना बंद कर देती हैं.

#5.मकड़ी माइट रोग :::

यह रोग माइट के आक्रमण से होता हैं। माइट से प्रभावित मधुमक्खी के बच्चों के पँख नही होतें हैं । जिसके कारण वे शहद बनानें की प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले पातें ।

#6.वरोआ :::

वरोआ रोग परजीवी दीमक वरोआ डिस्ट्रक्टर  की वजह से होता हैं,इस रोग में दीमक मधुमक्खीयों  का खून चूसतें हैं फलस्वरूप मधुक्खीयाँ कमज़ोंर हो जाती हैंं ।और शहद उत्पादन में विपरीत प्रभाव पड़ता हैं ।

#मधुमक्खी के शत्रु कीट़ :::

#1.चींटी :::

चींटीयाँ मौनगृह में घूसकर शहद को चट कर जाती हैं,इसके अलावा प्यूपों का भी शिकार कर शहद उत्पादन को प्रभावित करती हैं.
इससे बचाव हेतू मौनगृहो आधार पायो के निचें पानी की प्यालियाँ भरकर रख देना चाहिये.

#2.मोमी पतंगा :::

यह पतंगा मोनगृह के छत्तों से प्यूपा को पकड़कर शरीर से रस चूसता हैं.
इसके नियत्रंण हेतू फारमलीन या इथलीन डायबरोमाइड़ का धुँआ मौनगृह में करें.

#3.पक्षी :::

पक्षी मौनो को पकड़कर खाते हैं,अत: इनसे बचाव हेतू पक्षी को भगाने की व्यवस्था करें.


#कीट़नाशको का मधुमक्खी पर प्रभाव :::


 फसलों पर अत्यधिक कीट़नाशको के छिड़काव करनें से मधुमक्खी पालन प्रभावित होता हैं,क्योंकि मधुमक्खी पर्यावरण असंतुलन के प्रति सर्वाधिक सवेंदनशील होती हैं.यदि फूलों पर रासायनिक कीट़नाशक का छिड़काव किया जाता हैं,तो मधुमक्खी इन कीट़नाशक प्रभावित फूलों से रस चूसती हैं,फलस्वरूप कीट़नाशक मधुमक्खी के शरीर में जाकर पाचन प्रणाली को नष्ट कर देता हैं,और मधुमक्खी की मृत्यु हो जाती हैं.

#मधुमक्खी के दोस्त पेड़ - पौधें :::

मधुमक्खी की सँख्या बढ़ानें या मधुमक्खी को प्रिय पेड़ - पौधे ,फूल को मौनचर कहा जाता हैं.उदाहरण के लिये सरसों, तोरिया,मूली,गाजर,धनिया,फूलगोभी,पत्तागोभी,सूरजमुखी,प्याज,बरसीम,अरहर,कपास,लीची,जामुन,निम्बू, इमली,आंवला, बेर आदि बहुत अच्छे मौनचर हैं.
पहाड़ी इलाको मे
सेब,आडू,आलूबुखारा,नाशपती,चैरी,खुमानी अच्छे मौनचर हैं.

उत्तम और भरपूर शहद प्राप्त करने के लिये मधुमक्खी पालन घर के आसपास पानी  का पर्याप्त प्रबंधन होना चाहियें.

# विशेष


• मधुमक्खी के वंश और उसमें लगनें वालें शहद के सही उत्पादन हेतू  10 -12 दिनों के अंतराल पर छत्ते का अवलोकन करतें रहना चाहियें.

• मधुमक्खी के बक्से में गंदगी होनें पर इसकी नियमित रूप से सफाई करें.

• रानी मधुमक्खी पर विशेष रूप से नज़र बनाये रखना चाहियें,यदि रानी मधुमक्खी मर गई हैं,या कहीं चली गई हैं,तो तुरंत नयी रानी मधुमक्खी की व्यवस्था करना चाहियें.और यह भी देखना चाहियें कि रानी मधुमक्खी नये वातावरण में ढ़ली हैं या नही.

• मधुमक्खी के छत्तों का निरीक्षण करतें समय तेज ख़ूशबू वाला परफ्यूम,तेल ,पावड़र आदि  इस्तेमाल नही करें अन्यथा मधुमक्खी आक्रमण कर सकती हैं.

• निरीक्षण के दोरान मधुमक्खी के आक्रमण से बचनें हेतू पर्याप्त सुरक्षा उपकरण अवश्य पहनना चाहियें.



यदि उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर मधुमक्खी पालन किया जावें तो शहद उत्पादन के साथ किसान भाई आर्थिक सशक्तता प्राप्त कर सकते हैं.


० तुलसी



टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गेरू के औषधीय प्रयोग

गेरू के औषधीय प्रयोग गेरू के औषधीय प्रयोग   आयुर्वेद चिकित्सा में कुछ औषधीयाँ सामान्य जन के मन में  इतना आश्चर्य पैदा करती हैं कि कई लोग इन्हें तब तक औषधी नही मानतें जब तक की इनके विशिष्ट प्रभाव को महसूस नही कर लें । गेरु भी उसी श्रेणी की   आयुर्वेदिक औषधी   हैं। जो सामान्य मिट्टी   से   कहीं अधिक   इसके   विशिष्ट गुणों के लिए जानी जाती हैं। गेरु लाल रंग की मिट्टी होती हैं। जो सम्पूर्ण भारत में बहुतायत मात्रा में मिलती हैं। इसे गेरु या सेनागेरु कहते हैं। गेरू आयुर्वेद की विशिष्ट औषधी हैं जिसका प्रयोग रोग निदान में बहुतायत किया जाता हैं । गेरू का संस्कृत नाम  गेरू को संस्कृत में गेरिक ,स्वर्णगेरिक तथा पाषाण गेरिक के नाम से जाना जाता हैं । गेरू का लेटिन नाम  गेरू   silicate of aluminia  के नाम से जानी जाती हैं । गेरू की आयुर्वेद मतानुसार प्रकृति गेरू स्निग्ध ,मधुर कसैला ,और शीतल होता हैं । गेरू के औषधीय प्रयोग 1. आंतरिक रक्तस्त्राव रोकनें में गेरू शरीर के किसी भी हिस्से में होनें वाले रक्तस्त्राव को कम करने वाली सर्वमान्य औषधी हैं । इसके लिय

टीकाकरण चार्ट [vaccination chart] और संभावित प्रश्न

 टीकाकरण चार्ट # 1.गर्भावस्था के समय टीकाकारण ::: गर्भावस्था की शुरूआत में Titnus का पहला टीका टी.टी - 1. टी.टी -1 के चार सप्ताह बाद टी.टी.-2 यदि पिछली गर्भावस्था में टी.टी - 2 दिया गया हैं,तो केवल बूस्टर दीजिए. # टीके की मात्रा ,कैसें और कहाँ दें 0.5 ml.मात्रा प्रशिक्षित व्यक्ति द्धारा ऊपरी बांह की मांसपेशी में. # महत्वपूर्ण गर्भावस्था के 36 सप्ताह हो गयें हो तो मात्र टी.टी.- बूस्टर देना चाहियें.  टीकाकरण का दृश्य # 2.शिशुओं के लियें टीकाकरण  #जन्म के समय ::: 1. B.C.G.  =     0.1 ml बाँह पर त्वचा के निचें. 2.हेपेटाइटिस बी.=  0.5 ml मध्य जांघ के बाहरी हिस्सें पर मांसपेशी में 3.o.p.v.या oral polio vaccine = दो बूँद मुहँ में . ०  जानिये पोलियो क्या होता हैं ? #6 सप्ताह पर ::: 1.हेपेटाइटिस बी. = 0.5 ml 2.D.P.T. = 0.5 ml मध्य जांघ का बाहरी हिस्सें में माँसपेशियों में. 3.o.p.v.या oral polio vaccine. #10 सप्ताह पर ::: 1.हेपेटाइटिस बी. 2.D.P.T. 3.o.p.v. #14 सप्ताह पर ::: 1.हेपेटाइटिस बी. 2.D.P.T. 3.o.p.v.   #9 से 12 माह

काला धतूरा के फायदे और नुकसान kala dhatura ke fayde aur nuksan

धतूरा भगवान शिव का प्रिय पौधा है। भगवान शिव धतूरा अपने मस्तिष्क पर धारण करते हैं और जो लोग धतूरा भगवान शिव को अर्पण करते थे वे उन्हें मनचाहा आशीष प्रदान करते हैं। धतूरा भी कई प्रकार का होता है जैसे काला धतूरा, सफेद धतूरा, पीला धतूरा आदि। आज हम आपको "काला धतूरा के फायदे और नुकसान kala dhatura ke fayde aur nuksan" के बारे में बताएंगे।  काला धतूरा के फायदे और नुकसान आयुर्वेद आयुर्वेद चिकित्सा में काला धतूरा बहुत महत्वपूर्ण औषधि के रूप में बहुत लंबे समय से इस्तेमाल हो रहा है । धतूरा बहुत ही जहरीला फल होता है , प्रकृति में गर्म और भारी होता है। काला धतूरा का वैज्ञानिक नाम काला धतूरा का वैज्ञानिक नाम धतूरा स्ट्रामोनियम DHATURA STRAMONIUM है । अंग्रेजी में इसे डेविल्स एप्पल Devil's apple, डेविल्स ट्रम्पेट Devil's trumpet के नाम से जाना जाता है। संस्कृत में इसे दस्तूर, मदन, उन्मत्त ,शिव प्रिय महामोधि, कनक आदि नाम से जानते हैं। काला धतूरा की पहचान कैसे करें  काला धतूरा के पत्ते नोक दार ,डंठल युक्त और बड़े आकार के होते हैं। काला धतूरा के फूल घंटी