सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

प्राचीन आयुर्वेद शास्त्र अनुसार विभिन्न प्रकार के नमक के फायदे। Salt benifits in hindi according to ancient Ayurveda

प्राचीन आयुर्वेद शास्त्र अनुसार विभिन्न प्रकार के नमक के फायदे


नमक का नाम आते ही हमारे मन-मस्तिष्क में नमक के फायदे के बारें में विचार तैरने लगते हैं। यदि भोजन में नमक नहीं हो तो भोजन बेस्वाद और अस्वास्थ्यकर हो जाता है । हमारे देश की बहुत बड़ी आबादी नमक के फायदे के बारें में अनजान हैं, तो आईये जानतें हैं प्राचीन आयुर्वेद विज्ञानियों के अनुसार विभिन्न प्रकार के नमक के फायदे

नमक के फायदे
नमक के फायदे


सेन्धा नमक

नमक के फायदे
सेंधानमक


आयुर्वेद ग्रंथों में सेन्धा नमक के बारे में लिखा है

रोचनंदीपनंह्रधंंचक्षुष्यमविदाहिच।त्रिदोषन्घंसमधुरंसैन्धवंलवणोत्तमम्।।


• सेंधानमक बहुत स्वादिष्ट होता है,यह भोजन के स्वाद को बढ़ाकर उसे रुचिकारक बना देता हैं ।


• सेंधानमक खानें से भूख खुलकर लगती हैं।


• भोजन के बाद सेंधानमक खानें से भोजन तुरंत पच जाता हैं ।


• सेंधानमक ह्रदयरोग में बहुत लाभदायक होता है। यदि टैकीकार्डिया है तो सेंधानमक भोजन में शामिल करें बहुत लाभ मिलेगा ।


• सेंधानमक ह्रदयरोग से बचाता है , इसके सेवन से HDL कोलेस्ट्रॉल,LDL कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड संतुलित रहता है ।


• सेंधानमक सेवन करने से आंखों का स्वास्थ उत्तम बना रहता है । नियमित सेंधानमक का सेवन करने से मोतियाबिंद नहीं होता है। यदि फलों पर सेंधानमक डालकर नियमित अंतराल पर सेवन किया जाए तो आंखों का लेंस बढ़ती उम्र के साथ कठोर नहीं होता है।


• सेंधानमक खानें से पेट में गैस, एसिडिटी, पेट दर्द की समस्या नहीं होती हैं ।


• सेंधानमक जोड़ों के दर्द, गठिया और पसली के दर्द में अतिशीघ्र फ़ायदा देता है । इसके लिए सेंधानमक 25 प्रतिशत और बालू रेत 75 प्रतिशत को साथ मिलाकर एक पोटली बना लें और सुबह-शाम इस पोटली को तवे पर गर्म कर प्रभावित भाग की सिकाई करें ।



• एक चम्मच सेंधानमक और 250 मिलीलीटर सरसों का तेल मिलाकर गर्म करले इस तेल की मालिश छाती पर करने से निमोनिया, अस्थमा में राहत मिलती है और फेफड़े मजबूत बनते हैं ।


• नियमित रूप से सेंधानमक का सेवन करने से मोटापा नहीं होता है ।


• शरीर में खुजली, फोड़े फुन्सी हो तो सेंधानमक बहुत लाभदायक होता हैं। इसके लिए सेंधानमक और सरसों तेल मिलाकर प्रभावित भाग पर लगा भी सकते हैं और सेंधानमक भोजन के साथ मिलाकर भी ले सकते हैं ।


• आयुर्वेद मतानुसार सेंधानमक मधुर या मीठा होता हैं , इसका सेवन करने वाला व्यक्ति अधिक मेहनत करने पर भी थकता नहीं है ।



समुद्री नमक


सामुद्रकंसमधुरंसतिक्तंकटुपांशुजम्।रोचनंलवणंसर्वंपाकिस्नंस्यनिलापहम्।।


• समुद्री नमक भी सेंधानमक के समान भोजन का स्वाद बढ़ाने वाला होता हैं । 


• समुद्री नमक के सेवन करने से शरीर की वायु बाहर निकल जाती हैं अर्थात समुद्री नमक वात के प्रभाव को कम करता हैं ।

 • समुद्री नमक का  सेवन करने शरीर का रक्तचाप बढ़ता है ।


• समुद्री नमक शरीर की शुद्धि करने का काम करता है ,पंचकर्म चिकित्सा में इसके माध्यम से वमन (vomiting) कराया जाता हैं ।


• यह नमक तीखा होता हैं जिससे शरीर में मौजूद अतिरिक्त पानी शीघ्रता से बाहर निकल जाता हैं। यदि शरीर में सूजन हो तो समुद्री नमक का सेवन करवाने से शरीर का सूजन कम हो जाता हैं ।


• समुद्री नमक चोंट,मोंच और मांसपेशियों को ठीक करता हैं। यदि समुद्री नमक को पोटली में बांध कर गर्म कर लें और इसे प्रभावित भाग की सिकाई करें तो तुरंत आराम मिलता है ।


• समुद्री नमक में सभी आवश्यक खनिज तत्व जैसे सोडियम, पोटेशियम, मैग्नेशियम,आदि प्रचुरता से मिलते हैं जिससे यह बढ़ते बच्चों की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता हैं ।


• समुद्री नमक के साथ शक्कर मिलाकर पीनें से यह शरीर में पानी की पूर्ति करता हैं ।


• समुद्री नमक की चिकित्सकीय मात्रा कैंसर, हाइपोथायरायडिज्म,त्वचा की समस्याओं जैसे खुजली, सफेद दाग आदि से तुरंत ही राहत प्रदान करती हैं ।


• समुद्री नमक शरीर की मेटाबॉलिज्म को सही रखता है ।


• समुद्री नमक का संतुलित इस्तेमाल ग्रंथियों से हार्मोन का सही स्त्रावण करवाता है। जिससे शरीर में हार्मोन असंतुलन नहीं होता हैं ।



संचल नमक


सौक्ष्म्यादौष्ण्याल्घुत्वाच्चसौगन्ध्याच्चरुचिप्रदम।सौवर्च्चलंविबन्धन्घंहघमुद्धारशोधित।।


• संचर नमक प्रकृति से गर्म होता हैं जिससे यह शीत प्रकृति के लोगों के लिए लाभदायक है।


• मोटापा कम करने के लिए संचर नमक का सेवन करना चाहिए ।


• जिन लोगों का पेट सुबह पूरी तरह से साफ नहीं होता हैं उन्हें रात को सोते समय संचर नमक से बना भोजन करना चाहिए ।


• संचर नमक से बना भोजन करने से पेट का भारीपन समाप्त होता हैं, यदि भारी भोजन के साथ संचर नमक का सेवन किया जाए तो भोजन का भारीपन समाप्त हो जाता हैं ।


• संचर नमक ह्रदय की कार्यप्रणाली को सुधारकर धड़कन नियमित रखता है ।


• संचर नमक बहुत ही सूक्ष्म होता हैं जिससे यह शरीर द्वारा तुरंत अवशोषित हो जाता हैं ।


• संचर नमक भोजन के स्वाद को उत्तम बनाता हैं ।


विड नमक


तैक्ष्ण्यादौष्ण्याद्धयवायित्वाद्धीपनंशूलनाशनम्।ऊर्द्धच्जाधश्चवातानामानुलोम्यकरंविडम्।


• विड नमक भूख बढ़ाकर भोजन का पाचन शीघ्रता से करने में मदद करता हैं ।


• विड नमक मिले गर्म पानी को पांव पर डालने से पांव दर्द में आराम मिलता हैं और थकावट दूर होती हैं ।


• विड नमक एसिडिटी,पेटदर्द की समस्या में आराम देता है ।


• विड नमक भोजन के साथ मिलाकर खाने से सिरदर्द, कमरदर्द,पसली का दर्द आदि में आराम मिलता हैं ।


काला नमक


सतिक्तकटुसक्षारंतीक्ष्णमुत्क्लेदिचौद्भिदम्।नकाललवणेगन्ध:सौवर्च्चलगुणाश्चते।।


 

• काला नमक शरीर को बल प्रदान कर मस्तिष्क को शक्तिशाली बनाता हैं ।


• काला नमक फेफड़ों के लिए लाभदायक होता हैं इसके सेवन से फेफड़ों में जमा बलगम बाहर निकल जाता हैं ।


• काला नमक लीवर की कार्यप्रणाली में सुधार लाकर पीलिया, हेपेटाइटिस,आदि से सुरक्षा प्रदान करता हैं ।


• काला नमक स्वादिष्ट और भोजन की पोष्टिकता को बढ़ाता है ।


• काला नमक शरीर में रक्त संचार को व्यवस्थित और नियमित रखता है ।


• काला नमक शरीर से अतिरिक्त वसा की मात्रा बाहर निकाल देता है ।




उद्भिद नमक


• उद्भिद या खारा नमक कड़ुआ होता हैं जिसके कारण यह शरीर और रक्त की अशुद्धि बाहर निकाल देता है ।

• खारा नमक कैल्सियम की अधिकता वाला होकर हड्डीयों के लिए लाभदायक होता हैं । इसके सेवन से बच्चों की लम्बाई बढ़ती है ।


[नोट::नमक का चिकित्सा के रुप में उपयोग वैद्यकीय परामर्श के बिना नहीं करें ]




 

टिप्पणियां

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

टीकाकरण चार्ट [vaccination chart] और संभावित प्रश्न

 टीकाकरण चार्ट # 1.गर्भावस्था के समय टीकाकारण ::: गर्भावस्था की शुरूआत में Titnus का पहला टीका टी.टी - 1. टी.टी -1 के चार सप्ताह बाद टी.टी.-2 यदि पिछली गर्भावस्था में टी.टी - 2 दिया गया हैं,तो केवल बूस्टर दीजिए. ० गर्भावस्था के प्रथम तीन महिनें मे किए जानें वाले योगासन # टीके की मात्रा ,कैसें और कहाँ दें 0.5 ml.मात्रा प्रशिक्षित व्यक्ति द्धारा ऊपरी बांह की मांसपेशी में. # महत्वपूर्ण गर्भावस्था के 36 सप्ताह हो गयें हो तो मात्र टी.टी.- बूस्टर देना चाहियें.  टीकाकरण का दृश्य # 2.शिशुओं के लियें टीकाकरण  #जन्म के समय ::: 1. B.C.G.  =     0.1 ml बाँह पर त्वचा के निचें. 2.हेपेटाइटिस बी.=  0.5 ml मध्य जांघ के बाहरी हिस्सें पर मांसपेशी में 3.o.p.v.या oral polio vaccine = दो बूँद मुहँ में . ///////////////////////////////////////////////////////////////////////// ० आँखों का सूखापन क्या बीमारी हैं ? जानियें इस लिंक पर ०  जानिये पोलियो क्या होता हैं ? ० चुम्बक चिकित्सा के बारें में जानें ० बच्चों की परवरिश कैसें करें healthy parating

गेरू के औषधीय प्रयोग

गेरू के औषधीय प्रयोग गेरू के औषधीय प्रयोग   आयुर्वेद चिकित्सा में कुछ औषधीयाँ सामान्य जन के मन में  इतना आश्चर्य पैदा करती हैं कि कई लोग इन्हें तब तक औषधी नही मानतें जब तक की इनके विशिष्ट प्रभाव को महसूस नही कर लें । गेरू भी उसी श्रेणी की आयुर्वेद औषधी हैं । जो सामान्य मिट्टी से कही अधिक इसके विशिष्ट गुणों के लियें जानी जाती हैं । गेरू लाल रंग की की मिट्टी होती हैं जो सम्पूर्ण भारत में बहुतायत मात्र में मिलती हैं । इसे गेरू या सेनागेरू भी कहतें हैं । गेरू आयुर्वेद की विशिष्ट औषधी हैं जिसका प्रयोग रोग निदान में बहुतायत किया जाता हैं ।     गेरू का संस्कृत नाम  गेरू को संस्कृत में गेरिक ,स्वर्णगेरिक तथा पाषाण गेरिक के नाम से जाना जाता हैं । गेरू का लेटिन नाम  गेरू   silicate of aluminia  के नाम से जानी जाती हैं । गेरू की आयुर्वेद मतानुसार प्रकृति गेरू स्निग्ध ,मधुर कसैला ,और शीतल होता हैं । गेरू के औषधीय प्रयोग 1. आंतरिक रक्तस्त्राव रोकनें में गेरू शरीर के किसी भी हिस्से में होनें वाले रक्तस

गिलोय के फायदे GILOY KE FAYDE

 GILOY KE FAYDE गिलोय के फायदे GILOY KE FAYDE गिलोय का संस्कृत नाम क्या हैं ? गिलोय का संस्कृत नाम गुडुची,अमृतवल्ली ,सोमवल्ली, और अमृता हैं । गिलोय का हिन्दी नाम क्या हैं ? गिलोय GILOY का हिन्दी नाम 'गिलोय,अमृता, संशमनी और गुडुची हैं । गिलोय का लेटिन नाम क्या हैं ? गिलोय का लेटिन नाम Tinospra cordipoolia (टिनोस्पोरा  कोर्ड़िफोलिया ) गिलोय की पहचान कैसें करें ? गिलोय सम्पूर्ण भारत वर्ष में पाई जानें वाली आयुर्वेद की सुप्रसिद्ध औषधी हैं । Ayurveda ki suprasiddh oshdhi hai यह बेल रूप में पाई जाती हैं, और दूसरें वृक्षों के सहारे चढ़कर पोषण प्राप्त करती हैं । गिलोय के पत्तें दिल के (Heart shape) आकार के होतें हैं।  गिलोय का तना अंगूठे जीतना मोटा और प्रारंभिक   अवस्था में हरा जबकि सूखनें पर धूसर हो जाता हैं । गिलोय के फूल छोटे आकार के और हल्का पीलापन लियें गुच्छों में लगतें हैं । गिलोय के फल पकनें पर लाल रंग के होतें हैं यह भी गुच्छों में पाये जातें हैं । गिलोय में पाए जाने वाले पौषक तत्व 1.लोह तत्व : 5.87 मिलीग्राम 2.प्रोट