गुरुवार, 30 मार्च 2017

जल प्रबंधन [WATER MANAGEMENT] आज की महती आवश्यकता

भेड़ाघाट
 नर्मदा नदी 

भारत सहित दुनिया के सभी विकासशील देश चाहें वह अफ्रीकी राष्ट्र हो,लेटिन अमरीकी हो या एशियाई सभी पानी की गंभीर कमी से जूझ रहें हैं,इस कमी का मूल कारण जल का प्रबंधन नही कर पाना हैं.उदाहरण के लिये भारत में प्रतिवर्ष 4,000 अरब घन मीटर पानी प्राप्त होता हैं.जो कि भारत समेत तमाम एशियाई राष्ट्रों की ज़रूरतों के लियें पर्याप्त हैं,लेकिन बेहतर प्रबंधन के अभाव में लगभग 1500 अरब घन मीटर जल बहकर समुद्र में चला जाता हैं.यही 1500 अरब घन मीटर जल जब नदियों के माध्यम से बहता हैं,तो साथ में बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा भी लाता हैं जिससे भारत में प्रतिवर्ष 30 करोड़ आबादी,करोड़ों पशु एँव अरबों रूपये की फसल बर्बाद होती हैं.इसी तरह पानी की कमी यानि सूखे से प्रतिवर्ष 10 करोड़ लोग प्रभावित होतें हैं.

# बेहतर प्रबंधन कैसें हो :::


# 1.बाढ़ प्रबंधन :::


यदि हम बाढ़ के पानी को नदियों के माध्यम से सूखा प्रभावित क्षेत्रों में पहुँचाकर संचयित करनें की कार्यपृणाली को अपनायें तो न केवल सूखा प्रभावित क्षेंत्रों में पर्याप्त पानी की व्यवस्था हो जायेगी,बल्कि उन करोड़ों रूपयों की भी बचत होगी जो सरकार बाढ़ और सूखा राहत के नाम पर प्रतिवर्ष खर्च करती हैं.

# 2.पेड़ - पौधें बचायें नदियाँ :::


भारत में गंगा ,ब्रम्हपुत्र जैसी नदियों को छोड़ दे तो अधिकांश बढ़ी नदिया घनें जंगलों एँव पहाड़ों से निकलती हैं.ये घनें पेड़ पौधें वर्षा जल को मिट्टी में बांधकर उसे धिरें धिरें नालीयों के माध्यम से निचलें भागों की और रीसाते रहतें हैं,जब अनेक नालियाँ  एक जगह इकठ्ठी होती हैं,तो वही से नदियों का जन्म होता हैं,किन्तु पिछलें कुछ दशकों में इन नदी उद्गम स्रोतों के आसपास पेड़ - पौधों का कटाव इतना अधिक हुआ हैं,कि नदियों का प्राकृतिक जल प्रवाह लगभग समाप्त हो गया हैं,अब जो प्रवाह होता हैं,वह शहरों से निकलनें वालें गन्दें नालों के पानी का हैं,यदि नदियों के उद्गम स्रोतों के आसपास जंगलों का सफाया बंद नही हुआ तो ये नदियाँ गन्दें पानी के नालें ही बन जायेगी.

# 3.वर्षा जल पुन्रभंड़ारण :::

एक समय वर्षा जल को रोकनें की स्थाई पद्धति हमारें देश में काफी लोकप्रिय थी.और यह रूका हुआ जल वर्ष भर मानवीय प्रयोग में आता था.वर्षा जल को रोकनें वाली इन पद्धतियों में बावली काफी लोकप्रिय थी,किन्तु समय के साथ ये पद्धति विस्म्रत हो गई और इसका स्थान ट्यूबवेलों ने ग्रहण कर लिया इन ट्यूबवेलों से मनुष्य नें सिर्फ पानी उलीचना ही सीखा हैं,इन्हें वर्षाजल से रिचार्ज करनें का कोई विशेष प्रयत्न मनुष्य ने नही किया फलस्वरूप देश के लगभग 80% राज्यों में भूजल स्तर पाताल में पहुँच गया .
परंपरागत बावलियों की एक विशेषता यह हैं,कि इन्हें मानवीय प्रयत्नों से रिचार्ज नही करना पड़ता एक बावली जिसका मुहँ आसमान की ओर खुला हो वर्षाजल से स्वंय रिचार्ज होती रहती हैं.

इसी प्रकार छोटें - छोंट़ें तालाब ,पहाड़ीयों पर बनें चेकडेम,कन्टूर वर्षाजल को पृथ्वी में सहेजनें के बेहतरीन माध्यम हैं.

# 4.जल का पुन: उपयोग :::


आज से 2000 वर्ष पूर्व जितना जल प्रथ्वी पर उपलब्ध था,लगभग वही जल आज भी उपलब्ध हैं,किन्तु तब प्रथ्वी की आबादी आज के मुकाबलें मात्र 1% ही थी,उदाहरण के लिये भारत में सन् 1947 में जल की प्रतिव्यक्ति उपलब्धता 6000 घन मीटर थी,जो आज 1600 घन मीटर के आसपास ही बची हैं,ऐसे में जल का पुन्रउपयोग ही एकमात्र विकल्प बचता हैं,जो मनुष्य को पर्याप्त मात्रा में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करवा सकता हैं.इसके लिये ऐसी तकनीकों का उपयोग किया जाना उचित होगा जो औघोगिक पानी,मलमूत्र का पानी,सिवेज के पानी को स्वच्छ पानी में बदल सकें ताकि इसका उपयोग बाहरी कार्यों में किया जा सकें,इस तरह यदि हम पानी का पुन्रउपयोग सीख गये तो 25% तक पानी की ख़पत कम हो जायेगी.

ऐसी ही तकनीक व्यापक स्तर पर समुद्र के पानी को पीनें लायक बनानें के काम लाई जा सकती हैं.जिससे समुद्र किनारें रहनें वालें या टापूओं पर रहनें वालें मनुष्यों को पीनें का साफ पानी मिल सकें.

आश्रम व्यवस्था के बारें में पूरी जानकारी


#5. बेहतर सिंचाई तकनीक 

भारत में पानी का सबसे ज्यादा उपयोग सिंचाई के कार्यों में होता हैं,किन्तु हमारी सिंचाई तकनीक अत्यन्त पिछड़ी हुई हैं,इसी पिछड़ेपन की वज़ह से हमारी 60% जमीन बिना फसल उगायें पड़ी रहती हैं,यदि सिंचाई के क्षेंत्र में हम इजराइल का उदाहरण ले तो वहाँ मात्र 25 सेमी वार्षिक वर्षा होती हैं,किन्तु बेहतर तकनीकों की वजह से अधिकांश जमीन उपजाऊ हैं,जबकि भारत में इजराइल से चार गुना अधिक वर्षा होती हैं.
यदि ड्रीप पद्धति, स्प्रिंकिलर आदि के द्धारा सिंचाई की जायें तो पानी की बहुत बड़ी मात्रा बचाई जा सकती हैं,जिसका उपयोग बंजर भूमि में फसल उगाकर किया जा सकता हैं.
इसके अलावा क्षेंत्र आधारित फसलें उगाकर पानी की बचत की जा सकती हैं,क्षेत्र आधारित फसल से तात्पर्य जहाँ जितना अधिक पानी बरसता हैं,उतनें अधिक पानी की ज़रूरतों वाली फसल, इसके उलट कम वर्षा वालें क्षेंत्रों में कम पानी वाली फसलें उगाना चाहियें.

वास्तव में पानी की बेहतर उपलब्धता बेहतर प्रबंधन पर ही निर्भर करती हैं.इसीलिये कहा गया हैं,कि "जल हैं तो कल हैं"




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