बुधवार, 24 मई 2017

आश्रम व्यवस्था [Asharama system] :: एक विश्लेषण

आश्रम व्यवस्था
 गुरु और शिष्य 


#A.आश्रम का अर्थ :::



भारतीय जीवन पद्धति मनुष्य जीवन को 100 वर्षों का मानती हैं.और 100 वर्षों के जीवन चक्र को शरीर की ,समाज की उपयोगिता आवश्यकता के दृष्टिकोण से चार भागों में विभाजित करती हैं.

आश्रम का अर्थ भी श्रम यानि उघम हैं,अर्थात मनुष्य श्रम करता हुआ जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करें.

आश्रम का एक अन्य अर्थ ठहराव या पड़ाव भी हैं.ये वे ठहराव स्थल हैं जहाँ मनुष्य कुछ समय रूककर अपनी आगामी जीवन यात्रा की तैयारी करता हैं.

महाभारत के अनुसार जीवन के चार आश्रम व्यक्तित्व और समाज के विकास की चार सीढ़ीयाँ हैं,जिन पर चढ़कर व्यक्ति परम ब्रम्ह को प्राप्त करता हैं.

भारतीय संस्कृति के जो चार कर्तव्य (धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष ) हैं,इन कर्तव्यों के द्धारा समाज,परिवार,और व्यक्तित्व का विकास भी आश्रम व्यवस्था द्धारा ही संभव हैं.जब एक आश्रम में व्यक्ति सफल जीवन जीता हैं,तो उसका दूसरा आश्रम भी सफ़ल हो जाता हैं.

मनुष्य जीवन को 100 वर्षों का मानकर चार आश्रमों में विभाजन किया हैं. आईए जानते हैं आश्रम और आश्रम व्यवस्था की प्रासंगिकता और आश्रमों के बारें में 



#1.ब्रम्हचर्य आश्रम [Brahmacharya]




उपनयन के पश्चात बालक ब्रम्हचर्य आश्रम में प्रवेश करता हैं.ब्रम्हचर्य आश्रम का काल उम्र के 25 वर्ष तक माना जाता हैं.इस उम्र तक व्यक्ति गुरू के सानिध्य में रहकर इन्द्रियों पर संयम रखना और ग्यान तथा कौशल प्राप्त करना सीखता था.यही ग्यान,कौशल और इन्द्रीय संयम उसके भावी जीवन का आधार था.

आधुनिक दृष्टिकोण से देखें तो यह आश्रम पूर्णत: वैग्यानिक दृष्टिकोण पर आधारित हैं,क्योंकि यही वह अवस्था होती हैं,जब मनुष्य में सीखनें की ललक,जोश और स्फूर्ति होती हैं ,यदि इस अवस्था में व्यक्ति के व्यक्तित्व को विकसित कर दिया जावें तो समाज को एक उत्तम नागरिक प्राप्त होकर देश समाज को आगे ले जा सकता है.

यह आश्रम सामाजिक स्तरीकरण या राजा रंक की सामाजिक व्यवस्था पर भी करारा प्रहार कर सभी को बराबर मान संघर्ष करनें की ओर प्रेरित करता था.क्योंकि जंगल में गुरू के सानिध्य में रहकर प्रत्येक बालक  कंद मूल फल एकत्रित कर ,भिक्षाटन कर अपनी और गुरू की उदरपूर्ति करता था.

इसी प्रकार अनुशासित जीवन जीना,दूसरों की बुराई न करना ,वेदाध्ययन करना ,ब्रम्हचर्य व्रत का पालन करना भी इस आश्रम के अनिवार्य अंग थे.

आधुनिक मतानुसार 24 - 25 वर्ष तक जो व्यक्ति ब्रम्हचर्य व्रत का पालन कर इन्द्रिय नियत्रंण प्राप्त कर लेता हैं,उसका मानसिक विकास बहुत तीव्र गति से होता हैं,ऐसे लोग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी रहकर भूमिका निभातें हैं.







# 2.गृहस्थाश्रम [Grihasthashram]





इस आश्रम का कालखंड़ मनुष्य जीवन के 25 - 50 वर्ष तक निर्धारित हैं.इस कालखंड़ में मनुष्य पत्नि बच्चों के साथ रहकर अपनी वह भूमिका निभानें की कोशिश करता हैं,जिससे समाज गतिमान रहें यानि बच्चों की उत्पत्ति और उनका लालन पालन .

इसके अलावा यही एकमात्र आश्रम हैं,जिस पर आश्रित होकर ब्रम्हचर्य,वानप्रस्थ और सन्यास अपने को चलायमान रखतें हैं.ब्रम्हचर्यी वानप्रस्थी और सन्यासी अपनी उदरपूर्ति ग्रहस्थाश्रम से ही पूरी करतें हैं.

ग्रहस्थाश्रम समाज और अर्थव्यवस्था को गतिमान रखनें वाला आश्रम हैं,क्योंकि यही वह आश्रम हैं,जिसमें व्यक्ति अर्थ कमाकर अर्थव्यवस्था को गतिमान बनाता हैं.

ग्रहस्थाश्रम में रहनें वालें व्यक्ति के कुछ कर्तव्य निर्धारित हैं जिनको करने की एक ग्रहस्थ से अपेक्षा की जाती हैं.ये कर्तव्य हैं,अतिथि की सेवा,ब्राहम्ण यानि समाज और देश को आगे ले जानें वालें की सेवा,माता - पिता की सेवा,तथा प्रत्येक जीव की उसकी आवश्यकतानुसार सेवा.

यदि ग्रहस्थ इन कर्तव्यों को पूरा करता हैं,तभी उसका जीवन सफ़ल माना जायेगा आधुनिक दृष्टिकोण भी एक ग्रहस्थाश्रम के व्यक्ति से यही अपेक्षा करता हैं,कि वह दुनियादारी के कर्तव्यों को सही तरीके से निभाये.

डाँ.कापड़िया  जो कि प्रमुख समाजशास्त्री हैं का भी यही मानना हैं,कि समस्त जीवधारीयों के प्रति दया भाव का दृष्टिकोण हिन्दू आचारशास्त्र की गहराई को प्रदर्शित करता हैं.और मानवीय धर्म को प्रतिष्ठित करता हैं.


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# 3.वानप्रस्थ आश्रम [Vanprastha Asharama] :::





जब व्यक्ति के बाल पक गये हों,त्वचा पर झुर्रियाँ पड़ गई हो ,नाती पोतो वाला हो गया हों,तथा ग्रहस्थी के दायित्वों से मुक्त हो गया हो तब उसे वानप्रस्थी का जीवन अपना लेना चाहियें. हिन्दू शास्त्राकारों के मुताबिक यह अवस्था उम्र के 50 वें वर्ष से लगाकर 75 वें वर्ष तक मानी गई हैं.



इस उम्र वाला व्यक्ति पत्नि सहित या बिना पत्नि के वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करता हैं,पत्नि सहित प्रवेश करनें का मुख्य कारण यह रहा हैं,कि इतने दिनों तक ग्रहस्थाश्रम मे रहे व्यक्ति के लिये पत्नि बच्चों नाती पोतों को छोड़ना दुखदायी होता हैं.



वानप्रस्थी व्यक्ति का यह कर्तव्य हैं,कि भोग विलास पर धिरें - धिरें नियत्रंण कर अपनें को समाज हित हेतू उपयोगी बनायें ,बच्चें जो कि समाज और देश का भविष्य हैं,को शिक्षित कर उनमें उचित संस्कारों का बीजारोपण करें.




प्राचीन काल में वानप्रस्थी का घर गुरूकुल कहलाता था,जो कि जंगल में स्थित होता था.जहाँ वह बच्चों को रखकर शिक्षा देता था.




वानप्रस्थी को धिरें - धिरें रस, रूप,गंध की और आकर्षित होना छोड़कर कठोर संयम और त्याग का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहियें.उसे वेदाध्ययन कर उसका ग्यान आगामी पीढी़ तक पहुँचाना चाहियें.उसे अब अपने शरीर के प्रति भी कठोर रहना चाहियें ताकि शरीर स्वस्थ रहकर कार्य कर सकें.



वानप्रस्थ की वर्तमान युग में भी बहुत अधिक प्रासंगिकता हैं.और कई आर्थिक और पारिवारिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता हैं. व्यक्ति 50 की उम्र में कार्यों से सेवानिवृत्त हो जाता हैं,तो आगामी पीढ़ को रोज़गार का मोका मिलता हैं,फलस्वरूप बेरोजगारी नही पनपती.
पिता - पुत्र ,सास - बहू ,ससुर में सत्ता और  अधिकार को लेकर होनें वालें लड़ाई झगड़ों की संभावना समाप्त हो जाती हैं,जो राष्ट्र का समय और धन बर्बाद करतें हैं.



वानप्रस्थी का यह कर्तव्य हो जाता हैं,कि वह समाज का चरित्र निर्माण कर आगामी आश्रम के लिये अपने को तैयार करें.




# 4.संन्यास आश्रम [Sanyas Ashrama]




वनेषु च विहत्येवं तृतीयं भागमायुष|
चतुर्थामायुषों भापं त्यक्त्वासंगान परिव्रजेत ||
अर्थात आयु के तृतीय भाग में वनों में रहकर व्यक्ति चतुर्थ भाग में व्यक्ति परिव्राजक हो जायें और संसार के कल्याण के लिये कार्य करें.

संन्यास आश्रम उम्र के चौथे अर्थात 75 से 100 वर्ष के बीच माना गया हैं.

संन्यासी को चाहियें कि वह समस्त सांसारिक बंधनों को तोड़ते हुये मानव मात्र के प्रति समभाव रखें, और जीवन के रहस्यों और मोक्ष से संबधित तथ्यों के बारें में खोजकर समाज को बतायें.

सन्यासी का यह कर्तव्य हैं,कि वह जीवन और मृत्यु की परवाह किये बिना उन मार्गों की खोज कर आगामी पीढ़ी को बतायें जिससे समाज जीवन का वास्तविक उद्देश्य जान सकें.

कई लोग संन्यास का अर्थ संपूर्ण वैराग्य समझकर इधर उधर घूमना ही समझतें हैं,जो कि संन्यास का वास्तविक उद्देश्य कदापि नही हैं.

अनेक लोग आश्रम व्यवस्था की आलोचना इस रूप में करतें हैं,कि यह व्यक्ति को अकर्म की ओर प्रेरित करती हैं,किन्तु वास्तविकता में आश्रम व्यवस्था मनुष्य जीवन की नश्वरता से समाज को परिचित करवाकर प्रत्येक कार्य का समय निर्धारित कर उसे अपनें लक्ष्य को प्राप्त करवानें पर ज़ोर देती हैं. ताकि व्यक्ति निश्चित समय पर काम पूरें कर समाज को दिशा, शिक्षा और जीवन के गूढ़ रहस्यों की बात समझा सकें.









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