सोमवार, 20 मार्च 2017

राज्यपाल (Governor) लोकतंत्र के परिरक्षक या केन्द्र के एजेंट़

भारत की संविधानिक व्यवस्था केन्द्र में राष्ट्रपति की तरह राज्यों में भी राज्यपाल पद की व्यवस्था करती हैं.संविधान निर्माण के समय अनेक सदस्यों ने इस पद के सृजन से पूर्व गहन विचार किया था.

कुछ संविधान निर्माताओं ने इस पद को प्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति से भरनें का सुझाव दिया था,परन्तु मुख्यमंत्री और मंत्रीपरिषद के साथ होनें वाले संभावित टकराव को देखते हुये इस पद को अप्रत्यक्ष रीति से राष्ट्रपति द्धारा मनोनयन से भरने  का फैसला लिया गया .
आईयें जानतें हैं राज्यपाल के बारें में विस्तारपूर्वक कि यह पद पिछले वर्षों में लोकतांत्रिक व्यवस्था में कितना फिट़ बैठा हैं.


० नियुक्ति ::

• राज्यपाल की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 153 के अनुसार की जाती हैं,इस अनुच्छेद में कहा गया हैं,कि एक ही राज्य के लिये एक राज्यपाल होगा लेकिन एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों के लिये राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता हैं.
• राज्यपाल का कार्यकाल अपनी नियुक्ति तारीख़ से पाँच वर्ष तक होता हैं.
• अनुच्छेद 155 के अनुसार राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्धारा की जाती हैं,यह नियुक्ति राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर तथा पदमुद्रा के साथ करता हैं.
• राष्ट्रपति राज्यपाल का स्थानांतरण एक राज्य से दूसरे राज्य में कर सकता हैं.
• राज्यपाल अपनें पद पर राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त रह सकता हैं.

० राज्यपाल नियुक्त होनें के लिये योग्यताएँ :

• अनुच्छेद 157 के अनुसार राज्यपाल नियुक्ति होनें वाला व्यक्ति भारत का नागरिक हो तथा 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका होना चाहियें.
• संसद या राज्य विधानमंड़ल का सदस्य होनें पर शपथ ग्रहण वाली तिथि से सदस्यता समाप्त हो जावेगी.

भगवान श्री राम का चरित्र कैंसा था ? यहाँ जानियें

० शपथग्रहण ::

राज्यपाल का पद ग्रहण करने से पूर्व संबधित राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश समक्ष पद की शपथ लेना पड़ती हैं.
यदि उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश अनुपस्थिति हैं,तो उच्च न्यायालय के अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीश के समक्ष पद और गोपनीयता की शपथ ली जाती हैं.

० शक्तियाँ :::

राज्यपाल को भारत के राष्ट्रपति के समान अनेक शक्तियाँ प्राप्त हैं,जिनका प्रयोग वह मंत्रीपरिषद की सलाह और सहयोग से करता हैं.

० क्रिकेट अतीत से वर्तमान

० कार्यपालिक शक्ति ::

• अनुच्छेद 154 के अनुसार राज्य की कार्यपालिक शक्ति राज्यपाल में निहित हैं,जिसका प्रयोग वह अधीनस्थ अधिकारीयों के माध्यम से करता हैं.
• राज्यपाल विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता हैं.तथा मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रीयों की नियुक्ति करता हैं.
• राज्य के महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल ही करता हैं.
• राज्य के अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति राज्यपाल द्धारा की जाती हैं.उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के समय राष्ट्रपति राज्यपाल से परामर्श करता हैं.
• कार्य सुविधा के दृष्टिकोण से राज्यपाल राज्य के मंत्रीयों के बीच कार्यविभाजन के नियम बना सकता हैं.
• राज्यपाल राज्य प्रशासन तथा विधायन के प्रस्तावों के संबध में मुख्यमंत्री से सूचना प्राप्त कर सकता हैं.
• राज्य के विश्वविधालयों का कुलाधिपति राज्यपाल होता हैं,तथा कुलपतियों की नियुक्ति करता हैं.

० विधायी शक्तियाँ :::

• अनुच्छेद 174 के अनुसार राज्यपाल समय समय पर किसी भी सदन का अधिवेशन बुलायेगा,सत्रावसान करेगा तथा केवल विधानसभा का विघटन कर सकेगा.
• किसी विलम्बित विधेयक के संबध में राज्यपाल संदेश भेज सकता हैं.[अनु.175]
• अनु.176 के अनुसार वह विधानसभा या दोनों सदनों में संयुक्त रूप से सत्र के प्रारंभ में तथा नवनिर्वाचित विधानसभा के प्रथम सत्र में अभिभाषण करता हैं.
•  अनु.213 के अनुसार जब राज्य विधानमंड़ल का सत्र नही चल रहा हो तब राज्यपाल अध्यादेश प्रख्यापित कर सकता हैं,इस अध्यादेश का वही प्रभाव रहता हैं,जो राज्य विधानमंड़ल के नियम का रहता हैं,किन्तु इस अध्यादेश को छ: मास के भीतर राज्य विधानमंड़ल से अनुमोदित होना आवश्यक हैं,अन्यथा यह अपना प्रभाव समाप्त कर देगा.
• राज्यपाल विधानमंड़ल द्धारा पारित विधेयको पर चार प्रकार से अपनी प्रतिक्रिया प्रदान करता हैं :-
1.उस पर अपनी सहमति प्रदान करता हैं.
2.सहमति नही प्रदान करता हैं.
3.राष्ट्रपति के विचार हेतू आरक्षित करता हैं.
4.पुनर्विचार हेतू विधानमंड़ल के पास भेजता हैं.
• धन विधेयक राज्यपाल की पुर्वानुमति के पश्चात ही विधानसभा में प्रस्तुत होते हैं.अत: विधानमंड़ल द्धारा पारित होनें पर स्वीकृति देना अनिवार्य हैं.

० वित्तीय शक्तियाँ :::

• प्रत्येक वर्ष राज्य का वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) विधानसभा में वित्तमंत्री के माध्यम से राज्यपाल ही रखवाता हैं.
• अनुदान की मांग और धन विधेयक राज्यपाल की पूर्वानुमति से ही विधानसभा में प्रस्तुत किये जाते हैं.

० न्यायिक शक्ति ::

राज्यपाल को उस विषय संबधित जिस पर राज्य कार्यपालिक शक्ति का विस्तार हैं,किसी अपराधी के दण्ड़ को क्षमा,उसका प्रविलम्बन,विराम या परिहार करने की अथवा दण्डादेश के निलम्बन,परिहार या लघुकरण की शक्ति हैं.

० लोकतंत्र का परिरक्षक या केन्द्र का एजेंट 

राज्यपाल संविधान के परिरक्षण की शपथ लेता हैं,किन्तु राज्यपाल के कुछ स्वविवेकी कार्यों पर सदा सवाल उठते रहें हैं,तथा कुछ विपक्षी दल राज्यपाल को केन्द्र सरकार का एजेंट कहतें आये हैं,यह स्थिति तब पैदा होती हैं,जब केन्द्र और राज्यों में भिन्न - भिन्न दलों की सरकार हो.
राज्यपाल पर केन्द्र का ऐजेंट़ होनें का ठप्पा 1977 के बाद लगना शुरू हुआ जब केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार और राज्यों में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी यह क्रम आज के दोर में भी जारी हैं.
एक चर्चित विवाद बिहार सरकार और राज्यपाल रोमेश भंड़ारी के बीच का हैं,जिसमें राज्यपाल भंड़ारी ने अभिभाषण के दोरान अपनी पार्टी और केन्द्र की भाजपा सरकार के विरूद्ध आरोप पढ़नें से इंकार कर दिया था.
अभी हाल ही में अरूणाचल प्रदेश, उत्तराखंड़ में भी राज्यपाल द्धारा सुझाये गये राष्ट्रपति शासन को लेकर सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा और राज्य में पुन: पूर्व की सरकारों ने कामकाज संभाला.
गोवा,मणिपुर के विधानसभा सभा चुनावों में भी राज्यपाल की भूमिका विपक्षी दलों के निशानें पर रही जब राज्यपाल ने त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में सबसे बड़े दल की अनदेखी कर कम सीटो वाली पार्टी को सरकार बनानें का मोका दिया.
समय - समय पर सरकारीया आयोग और प्रशासनिक सुधार आयोग ने राज्यपाल पद को लेकर अनेक सुझाव दिये हैं,जैसें
1.राज्यपाल गैर राजनितिक होना चाहियें.

2.राज्यपाल की नियुक्ति के समय संबधित राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श लिया जाना चाहियें.

3.इस पद पर योग्य,अनुभवी व्यक्ति को नियुक्त किया जाना चाहियें.

4.केन्द्र में सरकार बदलनें के बाद त्यागपत्र देने या राज्यपाल बर्खास्त करनें की बजाय राज्यपाल को एक निश्चित कार्यकाल की गारंटी दी जावें.

वास्तव में वर्तमान व्यवस्था में राज्यपाल का पद सेवानिवृत राजनेताओं के लिये आरामगाह बन गया हैं,जो समय आनें पर अपनी पार्टी के प्रति निष्ठा प्रदर्शित करनें में कोई कसर नही छोड़ते हैं.अत: आवश्यकता इस बात की हैं,कि इस पद की गरिमा को बुद्धिजीवीयों और संविधान की मंशानुरूप बनाया जावें.जहाँ फैसले स्वविवेक के स्थान पर संविधानिक प्रावधानों से संचालित हो .

० भगवान श्री राम का प्रेरणाप्रद चरित्र


कोई टिप्पणी नहीं:

Laparoscopic surgery kya hoti hai Laparoscopic surgery aur open surgery me antar

Laparoscopic surgery kya hoti hai लेप्रोस्कोपिक सर्जरी सर्जरी की एक अति आधुनिक तकनीक हैं। जिसमें सर्जरी के लिए बहुत बड़े चीरें की जगह ...