मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

महान भारतभूमि के आदर्श विचार [MAHAN BHARATBHUMI KE Aadarsh vichar]

दोस्तों मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति हैं,यह बात सदियों से हमारें पूर्वज कहते आये हैं,और आज के समय में भी हम इस बात को मानतें हैं,मनुष्य ने अपने शक्तिशाली दिमाग की बदोलत पूरें विश्व की भौगोलिक सीमाओं को अनेक साम्राज्यों में विभाजित किया और इन साम्राज्यों पर शासक बन शासन किया

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भारत का वीर सपूत चन्द्रशेखर आजाद

होली पर्व स्वास्थ्य का पर्व

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शासक बनने के साथ ही मनुष्य अंहकारों की प्रतिमूर्ति बन बैठा  और विनम्रता,सादगी ,सरलता,दया जैसे शब्द धिरें - धिरें विस्म्रत होकर अंहकार,राग,द्धेष,हिंसा ने मन मस्तिष्क पर शासन करना शुरू कर दिया.

बुद्ध,महावीर ने दया,करूणा,प्रेम,विनम्रता,अहिंसा जैसे शब्दों को  अपने आचरण में उतारकर जगत प्रसिद्धि दिलाई वही अंहकार, हिंसा,राग,द्धेष जैसे शब्द भारत पर आक्रमण करनें और यहाँ साम्राज्य स्थापित करनें वालें आक्रान्ताओं के साथ आकर आम जनमानस में फैलें.


वैदिक कालीन आक्रान्ताओं,से लगाकर आधुनिक ब्रिटिश आक्रान्ताओं ने भारत में अंहकार ,हिंसा, राग,द्धेष को आम जनमानस में स्थापित करनें का प्रयत्न अपनें कार्यों के द्धारा किया और यह विचार भारतीय लोगों में स्थापित भी हुये क्योंकि इन्हीं विचारों के साथ जब इन लोगों ने सफलता प्राप्त की तो ये विचार सफलता का पर्याय समझे जानें लगे और अनेक भारतीयों ने भी इन विचारों के साथ सफलता प्राप्त की और आज भी इन विचारों के साथ अनेक लोग सफलता प्राप्त करते हुये समाज में देखे जा सकतें हैं.

अनेक लोग जो हिंसा, राग,द्धेष की सहायता से सफल होकर आगे बढ़े हैं,इन विचारों का समर्थन करतें हुये कहतें हैं,कि अहिंसा ,दया,करूणा,प्रेम जैसे विचारों की वजह से ही हम लम्बें समय तक मुठ्ठीभर आक्रान्ताओं के गुलाम बनककी रहें,यदि हमनें हमारें स्वर्णिम समय में हिंसा,राग - द्धेष,जैसे विचारों के साथ विश्व विजेता बनने का प्रयत्न किया होता तो भारतीय साम्राज्य भी इतना विशाल बन पड़ता कि यहाँ सूरज भी अस्त नही होता.

वास्तव में सच्चाई यह हैं,कि जिन लोगों ने अंहकार, राग - द्धेष में लिप्त होकर  सफलता प्राप्त की और जिनका साम्राज्य सीमाओं से परे हो गया था,उनका अन्तिम समय भी  इन विचारों को त्यागनें में ही बिता हैं,चाहें अशोक हो या अकबर हिंसा के दम पर विश्व विजेता बनने के बाद एक ने अपना जीवन धम्मम् शरणम् गच्छामि बुद्धम् शरणम् गच्छामि 
और दूसरें ने दीन - ए - इलाही  का प्रचार करते हुये समाप्त किया.


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