सोमवार, 13 अप्रैल 2020

आयुर्वेद के अनुसार :: ज्वर के प्रकार Type of fever in hindi

Healthy lifestyle  आयुर्वेद के अनुसार :: ज्वर के प्रकार Type of fever in hindi

बुखार
 ज्वर के प्रकार 


आयुर्वेद मतानुसार शरीर में ज्वर का मूल कारण वात,पित्त और कफ का कुपित होना हैं ,तदानुसार ज्वर भी इसी तरह वात,पित्त और कफ से संयोजित होकर उत्पन्न होतें हैं । जैसें


१.वातज ज्वर


२.पित्तज ज्वर 


३.कफज ज्वर 


४.वातज पित्तज ज्वर 


५.पित्तज कफज ज्वर 



६.वातज कफज ज्वर 



७.वातज पित्तज ज्वर 



८.आगन्तुक ज्वर  


चरक संहिता में वर्णित उपरोक्त आठ प्रकार के ज्वर को विस्तारपूर्वक समझाकर इन ज्वरों के निदान का उपाय भी बताया हैं । आईयें जानतें हैं इनके बारें में विस्तारपूर्वक




१.वातज ज्वर 



तद्घथारूक्षलघुशीतव्यायामनविरेचनास्थापनशिरोविरेचनातियोगवेगसन्धारणानजगतवयवायोद्धेगशोकशोणितातिसेकजागरणविषमशमनसेभ्योंअतिसेवितेभ्योवायु:प्रकोमापघते ।।



श्लोकानुसार यदि रूक्ष ,लघु,शीतल पदार्थों के सेवन से ,परिश्रम ,वमन,विरेचन और आस्थापन के अतियोग से ,मलादि वेगों को रोकनें से ,उपवास करनें से,चोट लगनें से,मैथुन करनें से,उद्धेग और शोच होनें से, रक्त के अत्यधिक  स्त्राव से ,रात्रि जागरण से,शरीर को ऊँचा,निचा ,तिरछा करनें से शरीर में वायु का कोप हो जाता हैं ।


इस प्रकार यही कुपित वायु अमाशय में प्रवेश कर अमाशय की गर्मी से मिल जाती हैं। फिर वह आहार के सारभूत रस नामक धातु का आश्रय लेकर रस और स्वेद के बहनें वाले छिद्रों को बंद कर देती हैं । फिर पाचकअग्नि को हनन करके पंक्ति स्थान की गर्माई को बाहर निकाल देती हैं। यह वायु शरीर को यथोचित अग्निबलहीन देखकर बल पा जाती हैं यह बल पाई हुई वायु ही वातज ज्वर का कारण होती हैं ।





वातज ज्वर की पहचान 




वातज ज्वर की पहचान इसके लक्षणों के आधार पर करतें हैं जैसें



१.ज्वर के चढ़ते और उतरते समय शरीर का तापमान बदल जाता हैं । उदाहरण के लिये  कभी शरीर का तापमान अधिक होना कभी कम होना ।



२.भोजन करनें और पच जानें के बाद ज्वर का चढ़ना ।


३.सांयकाल में ज्वर चढ़ना



४.बरसात में ज्वर अधिकता से चढ़ना



५.आँख,नाक,कान,त्वचा और मल मूत्र का सूखना और कठोर हो जाना ।



६.शरीर के अँगों में इधर उधर घूमनें वाली पीड़ा होना ।




७.संधियों में दर्द होना ।



८.पैरों का सूजना


९.जीभ का स्वाद कसैला होना 



१०.सूखी खाँसी होना



११.डकार न आना



१२.जंभाई अधिक आना



१३. शरीर में कंपन होना 




१४.अधिक वाचाल होना 




१५.नींद नही आना 



१६.रोमांचित होना



१७.चित्त का एकाग्र  नही रहना






२.पित्तज ज्वर 




उष्णाम्ललवणक्षारकटुकाजीर्णभोजनेभ्योंतिसेवितभ्यस्तथातितीक्ष्णातपाग्निसन्तापश्रमक्रोधविषमाहारेभ्यपित्तप्रकोपमापघते।।


गर्म,अम्ल,लवण,क्षार चरपरे पदार्थों के सेवन से,अजीर्णकर्ता भोजन का अधिक सेवन करनें से,अति तेज धूप ,अग्नि,और संताप के सेवन से पित्त प्रकोपित हो जाता हैं ।



यह प्रकोपित पित्त कुपित होकर अमाशय की गर्मी को बढ़ा देता हैं और रस धातु में मिलकर स्वेद और रस के बहानें वाले छिद्रों को रोक देता हैं ।फिर अपने द्रव्य से जठराग्नि को हनन कर पाचक स्थान की गर्मी को बाहर निकाल देता हैं । इस प्रकार अपना अधिकार पाकर यह पित्त पीड़न करता हुआ पित्त ज्वर को उत्पन्न करता हैं ।




पित्तज ज्वर के लक्षण




१.शरीर में एकदम वेग से ज्वर आना


२.दिन के मध्य में ,आधी रात्रि में ज्वर की वृद्धि होना ।


३.मुहँ में कड़वापन



४.नाक,कान,कंठ,मुख,होंठ और तालु का पकना 


५.बुखार के दोरान मूर्च्छा



६.दस्त होना 



७.शरीर में चकते होना



८.भोजन में अरूचि


९.शरीर में जलन होकर ज्वर आना 


१०.शीतल वस्तुओं से आराम मिलना 



११.उष्ण वस्तुओं से रोग का बढ़ना 


१२.मुख,त्वचा,मूत्र आदि का पीला होना 



१३.मस्तिष्क भ्रमित होना 






३.कफज ज्वर 



स्निग्धमधुरगुरूशीतपिच्छिलाम्ल लवण दिवास्वप्नहर्षव्यायामेभ्योंअतिसेवितेभ्य:श्लेष्माप्रकोपमापघते ।।



चिकने,मधुुर ,भारी,शीतल,अम्लीय, एँव लवण पदार्थों के खानें से ,दिन में सोनें से ,ज्यादा हर्ष से ,कफवर्द्धक पदार्थों के अधिक सेवन करनें से कफ का प्रकोप हो जाता हैं ।


यह प्रकोपित कफ जठराग्नि का हनन करके पाचक अग्नि को बाहर निकाल देता हैं और अपना अधिकार पाकर शरीर को पीडित कर कफज ज्वर उत्पन्न करता हैं ।





कफज ज्वर के लक्षण




१.शरीर में भारीपन के साथ ज्वर 


२.अत्यधिक बलगम निकलना



३.मुहँ का स्वाद  मीठा होना


४.भोजन में अरूचि


५.नींद अधिक आना



६.श्वास चलना 


७.खाँसी होना


८.सर्दी होना 


९.गर्मी नही लगना


१०. त्वचा,नाखून,मुख,मल मूत्र का सफेद होना 


११.चिकने और कफ कारक पदार्थों से रोग का बढ़ना 


१२.रूक्ष और गर्म पदार्थों से आराम मिलना 



यदि ये तीनों दोष एक दूसरें के साथ मिलकर ज्वर पैदा करतें हैं तो यह वातज पित्तज,पित्तज कफज और वातज कफज ज्वर होतें हैं । इन ज्वरों के लक्षण भी तदनुरूप होतें हैं ।






आगन्तुक ज्वर 





अभिघाताभिषगांभिचाराभिशापेभ्यआगन्तुव्र्यथापूर्वोज्वरोंष्टमोभवतिसकन्जितकालमागन्तु:केवलोभूत्वापश्चाद्धोषैरेनुबध्यते अभिघातजोवायुनादुष्टशोणिताधिष्ठानेनअभिषगंज:पुनर्वातपित्ताभ्याम्अभिचाराभिशापजौतुसन्निपातेनउपनिबध्यते सप्त विधाज्ज्वराद्धिशिष्टलिगोंपक्रमसमुत्थित्त्वाद्धिशिष्टोंवेदितव्य :।कर्मणासाधारणेनचोपक्रम्येतिअष्टविधाज्वरप्रकृतिरूक्ता ।।



आगन्तुक  ज्वर  पहलें स्वंय प्रकट होकर पीछे वात,पित्त,कफ की सहायता करता हैं। अर्थात आगन्तुक ज्वर में पहले ज्वर उत्पन्न होकर बाद में वातादि दोष कुपित होतें हैं ।



चोट लगनें,काम क्रोध,अविचार की अधिकता से आगन्तुक ज्वर उत्पन्न होता हैं ।



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