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19 जुल॰ 2016

वृद्धावस्था और आयुर्वेद के अनुसार जीवन

वृद्धावस्था और आयुर्वेद

भारतीय शास्त्रों और ग्रन्थों में मनुष्य की औसत आयु की कामना 100 वर्ष की गई.इन सौ वर्षों को विभिन्न भागों में बाँटा गया हैं.जिन्हें जीवनयापन के चार आश्रम कहा गया हैं.ये चार आश्रम मुख्य रूप से इस प्रकार हैं --- 1.ब्रम्हचर्य आश्रम.2.ग्रहस्थ आश्रम 3. सन्यास आश्रम 4. वानप्रस्थ आश्रम.इन आश्रमों में अन्तिम दो आश्रम सन्यास और वानप्रस्थ मूल रूप से वृद्धावस्था से सम्बंधित हैं.जिनमें मनुष्य शारीरिक रूप थक जाता हैं,और समाज की उत्पादकता में अपना योगदान सीमित कर लेता हैं.


कोई कहे कि वृद्धावस्था क्या हैं तो इसका जवाब यह हैं,कि शरीर पर, इन्द्रियों पर,त्वचा आदि पर लगातार कार्यरत रहनें के कारण शरीर की कोशिकाओं, उत्तकों पर,समय के साथ और दबाव से जो क्षय होता हैं.इसके अलावा जो मानसिक परिवर्तन होता हैं,वह वृद्धावस्था कहलाता हैं.

वृद्धावस्था से संबधित समस्याएँ 



1.ह्रदय की कार्यपृणाली कमज़ोर हो जाती हैं,जिससे उच्च रक्तचाप, निम्न रक्तचाप जैसी बीमारींयाँ पैदा हो जाती हैं.


2. फेफडों से श्वसन गहरा नहीं हो पाता.


3. दांत कमज़ोर होकर गिरनें लगतें हैं.जिससे कठोर चीज़ें नहीं खा सकतें.


3. हार्मोंन असंतुलित हो जातें हैं,जिससे मधुमेह (Diabetes) hypothyroid, जैसे रोग उत्पन्न हो जातें हैं.


4.जबान (Tongue) की स्वाद कोशिकायें मरने लगती हैं जिससे खानें में स्वाद नहीं आता.


5.पाचन संस्थान कमज़ोर हो जाता हैं.जिससे भोजन लम्बें समय तक नहीं पचता.


6.जोंड़ों में से साइनोवियूल फ्लूड़ सूख जाता हैं,जिससे जोंड़ों में दर्द रहनें लगता हैं,जिससे उठनें बैठनें में समस्या रहती हैं.


7. रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर हो जाती हैं,फलस्वरूप बीमारी जल्दी जल्दी होती हैं.


8. आँखों से कम दिखाई देने की समस्या हो जाती हैं.


9. कानों से कम सुनाई देनें लगता हैं.


10. स्मरण क्षमता कम हो जाती हैं.


11. स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता हैं.जिसकी वज़ह से पीढ़ीयों में टकराव की समस्या जन्म ले लेती हैं.


12. महिलाओं में जनन क्षमता,तथा पुरूषों में सेक्स की इच्छा खत्म होनें लगती हैं.


13. नींद कम आती हैं.

14.चलते हुए संतुलन नहीं रहता जिससे आदमी फिसल कर गिर जाता हैं और चोटग्रस्त हो जाता हैं ।

15.वृद्धावस्था में प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ जाती हैं फलस्वरूप पूरी पेशाब नहीं निकल पाती हैं और मूत्राशय में संक्रमण और किडनी से संबंधित समस्या हो जाती हैं ।

क्या करना चाहियें 


1.भोज़न समय पर हो,संतुलित हो इसका विशेष ध्यान रखना चाहियें. भोजन में पर्याप्त मात्रा में हरी सब्जियाँ,सलाद होना चाहियें.


2. रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ानें हेतू योगिक क्रियायें,पैदल घूमना और अन्य शारीरिक गतिविविधियों में सक्रिय रहें.


3. अध्ययनों,और शोधों से ये बात साबित हुई हैं,कि युवावस्था से ही नियमित रूप से च्यवनप्राश का सेवन करनें वाला व्यक्ति बिना किसी विशेष शारीरिक परेशानी के अपने जीवन के सौ वर्ष पूरें करता हैं.अत:च्यवनप्राश का नियमित रूप से सेवन करें.


4. तेलीय पदार्थों, जंक फुड़,बर्गर ,पिज्जा का सेवन करनें से बचें इसके बजाय अंकुरित अनाजों,और फलों का सेवन करें.


5. पानी नियमित अंतराल से और पर्याप्त मात्रा में पीयें.


6.शरीर में चिकनाहट़ और त्वचा की देखभाल हेतू नियमित रूप से सरसों,तिल तेल की मालिश करें.


7. अपनी पसंद का काम अवश्य करें,जैसे किसी को बागवानी पसंद हैं,किसी को अध्यात्म में रूचि हैं यदि कुछ समय अपनी पसंद का कोई कार्य करेगें तो मस्तिष्क पर और स्वास्थ पर इसका सकारात्मक असर होगा.

8. नकारात्मक विचारों से दूरी बनाकर रखें.आध्यात्म नकारात्मक विचारों से दूर रहनें में मदद करता हैं.शोधों द्धारा यह बात स्पष्ट हुई हैं,कि जो व्यक्ति आध्यात्म में रूचि लेता हैं,वह दीर्घायु को प्राप्त होता हैं.


9. बच्चों संग खेलनें से शरीर में हार्मोंन का स्तर बढ़ जाता हैं,जो रोग प्रतिरोधकता बढ़ानें में मदद करता हैं,इसलिये खाली बैठनें की बज़ाय बच्चों संग बच्चें ज़रूर बनें.

10.बुजुर्गों को स्वयं आगे रहकर सामाजिक जीवन में सक्रिय रहना चाहियें ऐसा करने से एकाकीपन की समस्या से निजात तो मिलती ही हैं बल्कि समाज को एक अनुभवी व्यक्ति का साथ मिलता हैं ।


11. विटामिंस और मिनरल्स हमारे शरीर में कोशिकाओं का पुनर्निर्माण और टूटी हुई कोशिकाओं की मरम्मत करने का काम करते हैं वृद्धावस्था में कोशिकाओं की टूटने की प्रक्रिया बहुत तेज हो जाती हैं अतः उसी अनुपात में हमें विटामिन और मिनरल्स का सेवन भी करना पड़ता है आमतौर पर देखा गया है कि वृद्धावस्था में विटामिन d3 ,आयरन और विटामिन b12 की कमी हो जाती है इन विटामिन और मिनरल्स की कमी से मांसपेशियों में दर्द हड्डियों की समस्या मस्तिष्क संबंधी समस्या राधे ह्रदय संबंधी समस्या होने लगती है यदि नियमित रूप से विटामिन और मिनरल्स सप्लीमेंट्स का सेवन वृद्धावस्था में किया जाए तो इन बीमारियों का जोखिम कम किया जा सकता है।


वास्तव में वृद्धावस्था अनुभव का खज़ाना होती हैं,अत:युवाओं का भी दायित्व बनता हैं,कि उनके अनुभव का लाभ लेकर उन्हें विशिष्ठ होनें का आभास करवायें.



पलाश वृक्ष के औषधीय गुण



० कद्दू के औषधी गुण 


आयुर्वेद ग्रंथों के अनुसार वृद्धावस्था :::


हमारे प्राचीन चिकित्सा ग्रंथों में वृवृद्धावस्थाको रोककर चिरयोवन बनाने का वर्णन हैं । आयुर्वेद ग्रंथों में जिन उपायो के द्धारा वृद्धावस्था को रोककर चिरयोवन बने रहने के उपाय बताये हैं उन्हें "रसायन चिकित्सा" के नाम से जानते हैं । आचार्य सुश्रुत लिखते हैंअधिक 
रसायनतंत्रनाम वयस्थापनमायुर्मे धाबलकरं रोगहरण समर्थ च ।।

रसायन चिकित्सा सौ वर्षों तक आयु स्थिर रख ,सौ वर्षों से अधिक जीवित रहना,शरीर को सदा रोगों से मुक्त रखना और वृद्धावस्था को दूर कर नवयोवन प्राप्त करने में समर्थ चिकित्सा विज्ञान हैं ।


रसायन चिकित्सा और आधुनिक अध्ययनों का मत हैं कि वृद्धावस्था तब आती हैं जब शरीर में हार्मोन की कमी और धमनी (artery ) में कठोरता आ जाती हैं ।


आयुर्वेद ग्रंथों में लिखा हैं 

बाले विवध्दर्ते श्लेष्मा मध्यम पित्तमेवतु भूमिष्ठं वध्दर्ते वायु वृध्देस्तद्धोस्य योजयेत् ।।


अर्थात बचपन  में कफ प्रधान रहता हैं ,युवावस्था में पित्त प्रधान रहता हैं तथा वृद्धावस्था के समय वायु तत्व प्रधान रहता हैं । यदि शरीर में वायु की प्रधानता हो जाती हैं तो शरीर में कफ कम हो जाता है और धमनी में कठोरता आ जाती हैं। यह धमनी में कठोरता ही वृद्धावस्था का कारण हैं ।

आयुर्वेद में वयस्थापक औषधीयों के माध्यम से शरीर की पुरानी कोशिकाओं को शरीर से बाहर निकाला जाता हैं और नवीन कोशिकाओं का निर्माण किया जाता हैं । ऐसा करने से शरीर बलिष्ठ बन जाता हैं और शरीर के वृद्ध होनें की रफ्तार कम हो जाती हैं ।




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