रविवार, 10 जुलाई 2016

बढ़ती जनसँख्या बढ़ती चुनौतियाँ



दुनिया 11 जुलाई को प्रतिवर्ष "विश्व जनसँख्या दिवस " मनाती हैं.वास्तव में यह तारीख विश्व के नागरिकों को मात्र यह याद दिलानें के लिये ही हैं,कि पिछले वर्ष के मुकाबलें इस वर्ष विश्व की जनसँख्या में कितना परिवर्तन हुआ.पिछले दो दशकों के दोरान विश्व की जनसँख्या में अत्यधिक तेजी परिलक्षित हुई, सन् 2000 में जहाँ हम 5 अरब थे.


वही 2016 तक विश्व जनसँख्या 7.45 करोड़ हो गई.यही हाल भारत और दक्षिण एशिया के दूसरे विकासशील राष्ट्रों का हैं.आजादी के वक्त भारत ,बांग्लादेश,पाकिस्तान की सम्मिलित आबादी 33 करोड़ थी.आज अकेला भारत 1 अरब 30 करोड़ आबादी के साथ  चीन के बाद दूसरा बड़ी आबादी वाला राष्ट्र हैं.जो विश्व के मात्र 2.4 भोगोलिक क्षेत्रफल में विश्व की 17.5 आबादी का निवास स्थल बना हुआ हैं.


 भीड़ भाड़ वाला रेलवे स्टेशन

बढ़ती आबादी से बढ़ती चुनौतियाँ 



कृषि क्षेत्र में---- यदि वैश्विक खाद्य परिस्थितियों पर नज़र ड़ालें तो  बढ़ती आबादी ने खाद्य सुरक्षा को गंभीर चुनोंती प्रस्तुत की हैं.जिस तरह से खेतों की ज़मीन पर कांक्रीट के जंगल खड़े हो रहे हैं,उससे विश्व खाद्य और कृषि संगठन (F.A.O.) का अनुमान  सही निकलने वाला हैं,कि यदि इसी तरह खेती की ज़मीन का आवासीय परियोजना के लिये उपयोग होता रहा और आबादी इसी रफ़्तार से बढ़ती रही तो हमें हमारी खाद्य आवश्यकता दूसरे ग्रहों पर अनाज उगाकर पूरी करनी होगी.


आज विश्व के विकासशील और अल्पविकसित देश अपनी खाद्य आवश्कताओं के लियें विकसित राष्ट्रों की और देख रहे हैं,क्योंकि बढ़ती आबादी के अनुपात में प्रति हेक्टेयर उत्पादन न्यूनतम हैं.हाल ही में भारत ने दालों की कमी को आयात के जरिये पूरा करने का फैसला किया हैं.क्योंकि भारत में तमाम प्रयासों के बाद भी दाल का उत्पादन उसकी ज़रूरत के मुताबिक नही बढ़ाया जा सका ,ज़मीन के उत्पादन करने की भी एक सीमा होती हैं.एक स्तर के बाद इसमें चाहे कितनी भी टेक्नोलाजी इस्तेमाल करले उत्पादन स्थिर हो जाता हैं.


स्वास्थ क्षेत्र में ----- बढ़ती जनसँख्या नें स्वास्थ सेंवाओं तक लोगों की पहुँच को सीमित कर दिया हैं विश्व के अनेक राष्ट्र जैसे भारत,चीन, अपनी विकासदर में आशातीत वृद्धि के बावजूद स्वास्थ से सम्बंधित बुनियादी ज़रूरत मुहैया करवाने में असफल हैं.क्योंकि बढ़ती आबादी संसाधनों का दोहन शीघ्रता से करके संसाधनों की आपूर्ति में बाधा उत्पन्न करती हैं.


भारत में लगभग दस हज़ार की आबादी पर एक डाँक्टर उपलब्ध हैं,इस अंतर को कम करने के लिये हर वर्ष औसतन 10 मेड़िकल कालेज खोले जा रहे हैं परन्तु बढ़ती आबादी इस अंतर को यथावत रखे हुयें हैं.


मोलिक सुविधाओं के क्षेत्र में ----- विश्व की बढ़ती हुई आबादी ने मोलिक सुविधाओं में ज़बरजस्त वंचना पैदा की हैं.भारत तथा अन्य विकासशील राष्ट्रों में जहाँ जनाधिक्य की समस्या हैं वहाँ आधी आबादी खुले में शोच करनें को अभिशप्त हैं.स्वंय भारत में लगभग 44 प्रतिशत आबादी खुले में शोच के लियें मज़बूर हैं.यही हाल सड़को,बिजली,और पीने के पानी का हैं.


शिक्षा की बात करे तो लगभग एक तिहाई वैश्विक जनसँख्या क,ख,ग,से मिलों दूर हैं. विकसित राष्ट्र जहाँ आबादी संसाधनों के अनूकूल हैं वहाँ बच्चों को औपचारिक शिक्षा से आगे बढ़कर कम्प्यूटर ,टेक्नोलाजी का अध्ययन प्राथमिक कक्षा में ही करवा दिया जाता हैं,वही जनाधिक्य से जूझ रहे राष्ट्र में यह उच्च कक्षाओं में ही उपलब्ध हो पाती हैं.

वास्तव में विश्व की बढ़ती आबादी प्रथ्वी के अस्तित्व को भी गंभीर चुनौती हैं.अत:यदि हमें इस ग्रह को बचाना हैं,तो आईये इस विश्व जनसँख्या दिवस को संकल्प ले कि हम हमारी जनसंख्या को उपलब्ध संसाधनों के अनूकूलतम रखेगें.


कर्म और भाग्य का रोचक विश्लेषण



० यूटेराइन फाइब्राइड़

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