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5 मई 2016

महापुरूषों की स्वस्थ विचारधारा,

भारत भूमि पर प्राचीन काल से ही ऐसें विद्धान जन्म लेते रहें हैं,जिन्होनें समाज का पतन होनें पर समाज को अपनें कर्मों और विचारों से आगें बढ़ाया.चाहे वह भगवान राम हो,कृष्ण हो,स्वामी विवेकानंद हो,या महात्मा गांधी रहे हो.




स्वामी विवेकानंद



स्वामी विवेकानंद का जन्म भारत में ऐसे समय में हुआ था,जब 1857 की क्रांति असफल हो गई थी,भारतीय दर्शन,वैदिक परपंरा और धर्म की खुलकर बात भी करनें वाला कोई नहीं था,क्योंकि अंग्रेंजी पाशविकता चरम पर थी.पश्चिमी विद्धान भारत को अपनें धर्म प्रचार की उर्वरा भूमि के तोर पर देख रहे थें.


ऐसे समय में भारतीय धर्म और दर्शन को प्रतिष्ठित करनें वाले स्वामी विवेकानंद ही थें.जिन्होनें शिकागो धर्मसभा 1893 में जब उद्भोदन देना शुरू किया " मेरें अमेरिकी भाई और बहनों" तो सम्पूर्ण सभासद अवाक् रहकर लम्बें समय तक सिर्फ तालिया ही बजातें रह गयें.इसके पश्चात अनेक जगह घूमकर स्वामी जी नें वेद,भारतीय दर्शन,साहित्य की जो व्याख्या प्रस्तुत की उसे सुनकर अनेक अमेरिकी विद्धानों को कहना पड़ा था कि " उनके देश में पाश्चात्य धर्म प्रचारकों को भेजना कितनी बड़ी मूर्खता हैं"



स्वामी जी कहा करते थें,कि मात्र सौ कर्मठ युवा मेरें पास हो तो में भारत को पुन: उसका गौरवशाली अतीत वापस दिला सकता हूँ.किन्तु अफसोस मात्र 36 वर्ष ही स्वामी जी हमारें बीच रह पायें.किन्तु यदि हम विवेकानंद के विचारों को अपने जीवन में उतारते चलें तो हमें विश्व सिरमोर बननें से कोई नहीं रोक सकता .



महात्मा गांधी 



गांधी जी भारत के ऊन सपूतों में शुमार हैं,जिनकी गणना विश्व के महापुरूषों में होती हैं.भारत को आजाद करवानें के लियें जिस तरह से अहिंसात्मक गतिविविधियों का सहारा लिया वह अपनें आप में अनूठा होनें के साथ सम्पूर्ण विश्व को प्रेरणा देनें वाला हैं.



गाँधी जी के कार्यों को देखते हुये आंइस्टीन ने भी आश्चचर्यचकित होकर कहा था कि "आने वाली सदियों के लोगों को यह विश्वास करना मुश्किल होगा कि बिना अस्त्र शस्त्र के एक हाड़ मांस के पुतले ने ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंका था.



गाँधी जी के अहिंसा दर्शन को यदि आज का विश्व समुदाय अपना ले तो न आतंकवाद होगा न अस्त्र शस्त्र की अँधी दोड़ होगी फलस्वरूप अरबों ड़ालर का रक्षा बज़ट़ मानव  कल्याण पर खर्च होगा, भूखमरी,गरीबी ,अशिक्षा जैसी समस्या अतीत की बात होगी ,क्या हम ऐसी व्यवस्था के लिये कृतसंकल्पित हैं.जो आने वाली पीढ़ीयों के लिये मिसाल बन सकें.


भगवान राम 




राम का जन्म भी  ऐसे समय में हुआ था जब मानवता रावण के रूप में व्यभिचार,पाप,अधार्मिकता ,पाशविकता में फँसी हुई थी.राम ने अपनें कर्मों द्वारा मर्यादा की नई रेखायें खींची चाहे वह पति धर्म का पालन हो,शबरी के बैर खाकर समानता को प्रोत्साहन,रावण का अंत कर लोभ ,व्यभिचार ,अत्याचार को नष्ट करना हो.राम भी हमें एक आदर्श समाज की स्थापना का संदेश प्रदान करते हैं,जो न कैवल भारत बल्कि विश्व के लिये प्रेरणास्पद हैं.



कृष्ण 




कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन उपदेशो और मानव को दिशावान बनानें से भरा हुआ हैं.आज की जीवनशैली में जहाँ हर व्यक्ति कर्म करनें के पूर्व ही परिणामों के प्रति आशंकित रहता हैं,कर्तव्यों की अपेक्षा हक के प्रति ज्यादा संवेदनशील रहता हैं,भगवान कृष्ण का मात्र यह कहना कि


कर्मण्ये वाधिकारवस्ते मा फलेषु कदाचन
सम्पूर्ण विश्व समाज को बिना फल की आशा किये कर्म करनें को प्रेरित करता हैं.







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