रविवार, 18 सितंबर 2016

जवान होता हुआ भारत,बुढ़ाता जनस्वास्थ public health


भारत विश्व की सबसे युवा जनसँख्या वाला देश हैं, जहाँ की 65% जनसँख्या 35 वर्ष से कम उम्र की हैं,जानकार इसे भारत उदय के रूप में देख रहे हैं. लेकिन जब हम जनस्वास्थ के दृष्टिकोण से देखें तो शायद इस बात पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल होता हैं,आईये जानतें हैं हक़ीकत क्या कहती हैं.

 कुपोषण और मातृ - शिशु मृत्यु दर 


भारत अपनी GDP का औसतन 1.5% स्वास्थ पर ख़र्च करता हैं,यदि खाद्य सुरक्षा कानून (food security act) और मध्यान्ह भोजन योजना (mid day meal) को इसमें शामिल कर दिया जावें तो यह राशि GDP के कुल 8% के करीब बेठती हैं,लेकिन कुपोषण और मातृ मृत्यु के मामलें में हम विकसित राष्ट्रों से मीलों दूर हैं. और इन दोनों मामलों में दहाई के अंक से निचे नहीं आ रहे हैं.म.प्र. में तो कुपोषण 52 प्रति हज़ार हैं,जबकि प्रदेश प्रोटीन के सबसे बढ़े स्त्रोंत सोयाबीन उत्पादन में भारत का अग्रणी राष्ट्र हैं.


देश की गर्भवती स्त्रीयों में यदि एनिमिया की चर्चा करें तो यह दर 44% हैं.
किशोरीयों में तो 79%  खून की कमी का सामना कर रही हैं.क्या इन हालातों में एक माँ आनें वाले सालों में स्वस्थ संतान को जन्म दे सकती हैं ? 

                   
एक स्वास्थ केन्द्र की स्थिति

बीमारीयों में विविधता और डाँक्टरों की भूमिका :::

भारत और उसके प्रदेशों की ग्रामीण आबादी जहाँ गरीबों वाली बीमारियों जैसें मलेरिया,डेंगू, चिकनगुनिया,डायरिया से मर रही हैं ,वहीं अमीर वर्गों में ह्रदय रोग ,ड़ायबीटीज ,मोटापा जैसी बीमारीयाँ बढ़ती जा रही हैं


.मधुमेह की तो भारत राजधानी कहलाता हैं.आखिर इसका मूल कारण क्या हैं? यदि इसका विश्लेषण गहराई में जाकर करें तो हक़ीकत परत दर परत सामनें आती हैं.देश के अधिकांश अच्छे मेडिकल कालेजों से निकलनें वालें छात्र और विश्वविधालयों के छात्र कभी नहीं चाहतें की वह मलेरिया,टी.बी.जैसी सामान्य बीमारियों का इलाज करें या उस पर रिसर्च करें हर छात्र कैंसर,ह्रदय रोग,मोटापा,ड़ायबीटीज जैसी बीमारियों की तरफ़ ही आकर्षित होतें हैं,क्योंकि इन बीमारियों का इलाज करके वे करोड़ो अरबों रूपयें देश के अमीरों की जेब से आसानी से निकाल सकतें हैं.एक तरफ़ ग्रामीण क्षेत्रों के औषधालय खाली पड़े हैं,जबकि शहरों में कुकुरमुत्तों की तरह सुपर स्पेशलिटी अस्पताल खुल रहे हैं.

पारपंरिक चिकित्सा प्रणाली के साथ भेदभाव ::: 


भारत में अंग्रेजी शासन के पूर्व पारम्परिक चिकित्सा प्रणाली योग,आयुर्वैद लोकप्रिय,सस्ती और टीकाऊ थी.अंग्रेजों ने इसकी महत्ता जानतें हुये भी अपनें देश की दवा कम्पनियों को लाभ  पहुचाँनें के उद्देश्य से इसके स्थान पर आधुनिक चिकित्सा पद्धति का जाल बुनना शुरू किया और इसके माध्यम से हर मर्ज़ को मिट़ानें का दावा किया.


स्वतंत्रता के पश्चात भी सरकारें इन दवा कम्पनियों के दबाव में रही और "भौर समिति" जिसमें एक भी भारतीय चिकित्सा पद्धति और योग का जानकार नहीं था,ने भी एलोपैथी को ही मान्यता प्रदान .हर चिकित्सा प्रणाली अपनें आप में विशिष्ठ और कुछ क्षेत्रों में निष्णान्त होती किन्तु एक को दबाकर दूसरी का विकास किया जावें तो प्रश्न उठना स्वाभाविक हैं.अत: आवश्यकता इस बात की हैं,कि पारपंरिक चिकित्सा में शोध को बढ़ावा देकर जनसामान्य को इस और प्रेरित किया जावें की वे छोटी - छोटी बीमारियों को अपनें ग्यान से काबू कर सकें,क्योंकि ये औषधियाँ हर घर के आसपास आसानी से उपलब्ध रहती हैं,ज़रूरत हैं,मात्र इस दिशा में शोध को बढ़ानें और पारपंरिक ग्यान के संकलन की.

मर्ज बढ़ता गया ज्यों - ज्यों दवा की :::

भारत स्वास्थ सेंवायें हर नागरिक तक पहुँचाने के मामलें में विकसित देशों के समान ही संसाधन जुटाता आ रहा हैं,पैसा भी लगभग विश्व स्वास्थ संगठन के मानकों के अनुरूप ख़र्च हो रहा हैं.लेकिन क्या कारण हैं,कि हम 17 वीं शताब्दी की बीमारियों से ही पल्ला नहीं छुड़ा पा रहे हैं,जबकि हमसे कम विकसित राष्ट्रों नें कई बीमारियों का उन्मूलन कर दिया हैं,जैसे श्री लंका मलेरिया मुक्त राष्ट्र हैं .


यदि छोट़े - छोट़े राष्ट्र ये सब कर सकतें हैं तो हम क्यों नहीं ,हमारें पास तो इन राष्ट्रों से भी अच्छें अनुसंधान संगठन और संस्थान हैं,हम रोज़ ही इनकी सफलता की कहानी अखबार और समाचारों में पढ़ते सुनते हैं,तो फिर क्या कारण हैं,कि हम पिछें हैं,यदि इसका भी विश्लेषण गहराई में जाकर करें तो उपचार दिखाई देता हैं.वो क्या हो सकता हैं,

आईयें जानें 

सबसे बड़ी बाधा हमारी शासन - प्रशासन प्रणाली की हैं देश - प्रदेश में भले कही भी लोग बीमीरीयों और महामारी फैलनें से मर रहे हों लेकिन जाँच  या तो प्रसाशनिक अधिकारी करेगा,या मजिस्ट्रेट यदि विषय विशेषग्य सम्मिलित भी हो गया तो रिपोर्ट किसी प्रसाशनिक व्यक्ति को करेगा जिसके बाद उस पर कोई निर्णय लिया जावेगा .लेकिन इन सबके बीच में हमारें शीर्ष अनुसंधान संस्थानों को नजरअंदाज कर दिया जाता हैं,क्यों नहीं जाँच से लेकर कार्यवाही तक इनकी सेंवाओं का उपयोग लिया जाता हैं.क्या इन संस्थानों की भूमिका मात्र बीमारी की जाँच तक सीमित रखी जानी चाहियें ? क्यों  इन संस्थानों को मैदान में नहीं उतारा जाता ?

यदि भारत सदा खुशहाल ,संपन्न और यहाँ के नागरिकों को निरोगी रखना हैं,तो हमें शुरूआत अभी से करनी पड़ेगी.








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