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12 जन॰ 2021

सर्जरी [SURGERY] और ऐनेस्थिसिया के जनक :आचार्य सुश्रुत

 सर्जरी [SURGERY] और ऐनेस्थिसिया के जनक :आचार्य सुश्रुत

भारत सरकार ने अभी हाल ही में आयुर्वेद चिकित्सकों को सर्जरी [SURGERY] का अधिकार देकर आयुर्वेद चिकित्सा विधा सर्जरी को अपनी मूल जड़ों की ओर लोटाने का काम किया हैं ।

 जबकि आमजनों में यही धारणा विधमान हैं कि सर्जरी ऐलोपैथिक विधा हैं । विश्व में सबसे पहले सर्जरी का आविष्कार लगभग 2500 वर्ष पूर्व [प्राचीन भारत में शल्य चिकित्सा]  आयुर्वेद के महान चिकित्सक आचार्य सुश्रुत द्धारा किया गया था । 

आचार्य सुश्रुत नें अपने लिखित चिकित्सा ग्रंथ "सुश्रुत संहिता" Shushrut Sanhita में सर्जरी के कई प्रकार और इन सर्जरी के लिए उपयोग होने वाले कई उपकरणों का वर्णन किया हैं ।


इसी प्रकार आचार्य सुश्रुत ने अपनी सर्जरी के लिए रोगी को सर्वप्रथम संज्ञाहारक [ऐनेस्थिसिया] दिया था ।

 तात्कालिन समय में आचार्य सुश्रुत शल्यक्रिया [SURGERY] से पूर्व रोगी को अल्कोहल युक्त विभिन्न पेय पदार्थ पीलाकर सर्जरी के दौरान होनें वाले दर्द से मुक्ति दिलानें के लिए बेहोश करते थे ।

 इस प्रकार आचार्य सुश्रुत विश्व के प्रथम ऐनेस्थेसिओलोजिस्ट थे। 



आचार्य सुश्रुत का जीवन परिचय और सुश्रुत संहिता का संक्षिप्त परिचय 


आचार्य 'सुश्रुत का जन्म,' ईसा पूर्व छठी शताब्दी में काशी [वर्तमान में उत्तरप्रदेश राज्य का बनारस या वाराणसी] में हुआ था ।

 आचार्य सुश्रुत के पिता का नाम विश्वामित्र था । आचार्य सुश्रुत के गुरू का नाम दिवोदास और आचार्य धन्वंतरी था ।

आचार्य सुश्रुत ने अपनी शल्यक्रिया [SURGERY] विधा का व्यवस्थित वर्णन अपने ग्रंथ "सुश्रुत संहिता" में किया हैं।सुश्रुत संहिता में शल्य यंत्रों की संख्या 125 और 300 से अधिक प्रकार की  सर्जरी का वर्णन  हैं । 




आचार्य सुश्रुत
आचार्य सुश्रुत सर्जरी करते हुए

आचार्य सुश्रुत नें अपने शल्यकर्म उपकरणों का नामकरण हिंसक जानवरों और चिडियों के नाम पर किया था । 

उनका मानना था कि शल्यकर्म उपकरणों को हिंसक पशु के दाँतों के समान तीक्ष्ण होना चाहिए ताकि शल्यकर्म के दौरान रोगी को पीडा न हो ।


आचार्य सुश्रुत Acharya Shushrut नें मोतियाबिंद, प्लास्टिक सर्जरी,सिजेरियन, आदि सर्जरी के बारें में विस्तारपूर्वक वर्णन किया हैं ।

सुश्रुत ने आठ प्रकार की शल्यचिकित्सा का वर्णन किया हैं जिनमें शामिल हैं

1.छेदन कर्म


छेदन कर्म के द्धारा शरीर को बीमार कर रहें उन हिस्सों को काटा जाता हैं जो औषधियों से ठीक नहीं हो रहे हो आजकल इस शल्यक्रिया [SURGERY] के द्धारा अपेंडिक्स,गाँठों,पित्ताशय आदि की सर्जरी की जाती हैं ।


2.भेदन कर्म


भेदन कर्म के द्धारा चीरा लगाकर शल्यक्रिया [SURGERY] की जाती हैं। इस शल्यक्रिया द्धारा फोड़ो को फोड़ना और साफ करना,पेट से और फेफड़ों से पानी निकालना जैसी शल्यक्रिया की जाती हैं ।


3.लेखन कर्म 


शरीर की ऐसी कोशिकाएँ जो शरीर के अँगों को नुकसान पँहुचाती हैं या शरीर में मौजूद मृत कोशिकाएँ इस शल्यक्रिया [SURGERY] द्धारा अलग की जाती हैं। 

खराब खून बाहर निकालना ,पाइल्स सर्जरी,कैंसर जैसी सर्जरी में यह विधा उपयोग में लाई जाती हैं। 


० लेप्रोस्कोपिक सर्जरी के बारे में जानकारी


4.वेधन कर्म 


वेधन कर्म में सुई की मदद ली जाती हैं । इस शल्यक्रिया द्धारा पेट में भरा पानी या जहर,शरीर के अंदरूनी भागों में भरा खराब मवाद शरीर से बाहर निकाला जाता हैं ।


5.ऐष्ण कर्म 

इस विधा में नाक के अंदर की सर्जरी ,साइनस सर्जरी,फिस्टुला की सर्जरी,आदि की जाती हैं।


6.अहर्य कर्म

अहर्य कर्म द्धारा दाँत निकालना,कानों में कुछ फँस जानें पर सर्जरी द्धारा बाहर निकालना,किड़नी से पथरी बाहर निकालना, तथा शरीर के अन्य हिस्सें जो नुकसान पहुँचा रहे हो को बाहर निकाला जाता हैं ।

7.विश्रव्य कर्म 

इस विधा में भी भेदन कर्म की तरह फोड़े में पाइप डालकर खराब मवाद निकाला जाता हैं । या फिर फेफड़ों से पानी निकाला जाता हैं ।


8.सीव्य कर्म

आपरेशन होनें के बाद सर्जरी की हुई जगह को इस विधा द्धारा सिला जाता हैं ताकि घाव जल्दी भर जाए ।

 इस शल्यक्रिया विधा में सुई और धागे का इस्तेमाल किया जाता था कालान्तर में यह तकनीक और उन्नत होती गई ।

यहाँ उल्लेखनीय हैं कि शल्यक्रिया से पूर्व उस जगह को विसंक्रमित  भी किया जाता था ताकि किसी प्रकार का संक्रमण ना फैले और विसंक्रमण के लिए त्रिफला मिला हुआ गर्म जल उपयोग किया जाता था ।

घाव के भरने हेतू घी की पट्टी उस पर लगाई जाती थी ताकि घाव जल्दी भर सकें । 

सुश्रुत घाव को जल्दी भरनें के लिए अपने रोगी को हल्दी  और अन्य औषधियों से युक्त पेय भी पिलाते थे ।


आचार्य सुश्रुत ने अपनी शल्यक्रिया को अपने अनुयायीओं को सिखाने हेतू मृत शरीर,मोम के पुतले,फल ,सब्जियों और जीवित रोगी को उपयोग में लिया था।

 आजकल की Plastic surgery जिसमें शरीर के एक हिस्से से चमड़ी निकालकर दूसरे हिस्सें में लगाई जाती हैं ,यह विधा भी आचार्य सुश्रुत ने ही दुनिया को सीखाई थी । 

आचार्य सुश्रुत Acharya Shushrut मोतियाबिंद सर्जरी,सिजेरियन द्धारा बच्चा बाहर निकालना आदि विधा में निष्णांत थें । 

सुश्रुत के लिखे सुश्रुत संहिता का आठवी शताब्दी में "किताबे -ए-सुसुरद" नाम से अनुवाद भी किया गया था ।


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