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प्राकृतिक चिकित्सा [Naturopathy] पद्धति क्या हैं, सिद्धान्त और प्राकृतिक चिकित्सा की विधियां

प्राकृतिक चिकित्सा [Naturopathy] पद्धति क्या हैं, सिद्धान्त और प्राकृतिक चिकित्सा की विधियां 


प्राकृतिक चिकित्सा स्वस्थ जीवन बिताने की एक कला एवं विज्ञान है। यह ठोस सिद्धांतों पर आधारित एक औषधिरहित रोग निवारण पद्धति है।

 स्वास्थ्य, रोग तथा चिकित्सा सिद्धांतों के संबंध में प्राकृतिक चिकित्सा के विचार नितान्त मौलिक हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा एक अति प्राचीन विज्ञान है। वेदों व अन्य प्राचीन ग्रंथों में हमें इसके अनेक संदर्भ मिलते हैं। “विजातीय पदार्थ का सिद्धांत", "जीवनी शक्ति सम्बन्धी अवधारणा” तथा अन्यधारणाएं जो प्राकृतिक चिकित्सा को आधार प्रदान करती हैं, 

प्राचीन ग्रन्थों में पहले से ही उपलब्ध है।तथा इस बात की ओर संकेत करती हैं कि इनका प्रयोग प्राचीन भारत में व्यापक रूप से प्रचलित था। प्राकृतिक चिकित्सा व अन्य चिकित्सा प्रणालियों में मुख्य अन्तर यही है कि प्राकृतिक चिकित्सा का दृष्टिकोण समग्रता का है जबकि अन्य चिकित्सा पद्धतियों का दृष्टिकोण विशिष्टता का। 

प्राकृतिक चिकित्सा प्रत्येक रोग के अलग-अलग कारण तथा उसकी विशिष्ट चिकित्सा में विश्वास नहीं रखती अपितु अप्राकृतिक रहन-सहन, विचार करने, सोने-जागने, कार्य करने व यौन सम्बन्धी आचरण में विषमता आदि कारणों को ही रोगों के मुख्य कारण के रूप में स्वीकार करती है। साथ ही यह वातावरण सम्बन्धी उन कारणों को भी ध्यान में रखती है जो शरीर के संतुलन पर दुष्प्रभाव डालकर उसे दोषयुक्त, निर्बल तथा विजातीय द्रव्यों से युक्त कर देते हैं। चिकित्सा में भी यह उन सब कारणों को सुधारने में प्राथमिकता देती है तथा शरीर को अपनी नैसर्गिक अवस्था में लौटाने में सहायता पहुँचाती है।

 प्राकृतिक चिकित्सक का कार्य उचित चिकित्सा प्रक्रियाओं के प्रयोग द्वारा प्रकृति के रोग निवारण कार्य में सहायता पहुँचाना तथा नैसर्गिक शक्तियों को सुरक्षित सीमाओं में कार्यरत रखना ही होता है।

भारत में प्राकृतिक चिकित्सा के पुनरुत्थान की शुरुआत जर्मनी के लुई कुने की पुस्तक न्यू साइन्स ऑफ हीलिंग' के अनुवाद से हुई। 

तेलुगु भाषा में इस पुस्तक का अनुवाद श्री डी.वेंकटचेलापति शर्मा ने सन् 1894 के आसपास किया। बिजनौर निवासी श्री श्रोती कृष्ण स्वरूप ने सन् 1904 के लगभग इस पुस्तक का हिन्दी व उर्दू भाषाओं में अनुवाद किया। इससे इस पद्धति के प्रचार-प्रसार को काफी बढ़ावा मिला।

"एडोल्फ जस्ट " की पुस्तक 'रिटर्न टू नेचर' से प्रभावित होकर गांधी जी प्राकृतिक चिकित्सा के प्रबल समर्थक बन गए। उन्होंने न केवल अपने पत्र 'हरिजन' में प्राकृतिक चिकित्सा के समर्थन में अनेक लेख लिखे बल्कि अपने ऊपर, अपने परिवार के सदस्यों व आश्रमवासियों पर इसके अनेक प्रयोग भी किए।

 ज्ञातव्य है कि गांधी जी पुणे स्थिति डॉ. दिनशा मेहता के 'नेचर क्योर क्लिनिक में सन 1934 से 1944 के मध्य चिकित्सा के लिए रुका करते थे। उनकी स्मृति को चिरस्थायी करने के लिए भारत सरकार ने उस स्थान पर राष्ट्रीय प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान की स्थापना की। 

महात्मा गांधी और परचुरे शास्त्री
श्री परचुरे शास्त्री का इलाज करते हुए महात्मा गांधी 



इस दौरान गांधी जी के प्रभाव से कई राष्ट्रीय नेता भी इस अल्पसंख्यक स्वास्थ्य आन्दोलन से जुड़ गए। उनमें भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई, गुजरात के पूर्व राज्यपाल श्री श्रीमन्नारायण जी भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री वी.वी. गिरि, आचार्य विनोबा भावे तथा श्री बालकोवा भावे के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

भारत में प्राकृतिक चिकित्सा आन्दोलन मुख्य रूप से आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बंगाल, महाराष्ट्र और गुजरात आदि प्रान्तों में शुरू हुआ। उस समय जिन चिकित्सकों ने विभिन्न प्रान्तों में प्राकृतिक चिकित्सा के पुनरूत्थान की नींव डाली उनमें डॉ. महावीर प्रसाद पोद्दार, डॉ. जानकी शरण वर्मा डॉ. खुशी राम 'दिलकश', डॉ. एस.जे. सिंह, डॉ. हीरा लाल, डॉ. विटठल दास मोदी, डॉ. कुलरंजन मुखर्जी, डॉ. सुखराम दास, डॉ. जे.एम. जस्सावाला, डॉ. एम.एम. भामगारा, डॉ. वेगीराजू कृष्णम राजू डॉ. बी. वेंकटराव, डॉ. बी. विजयलक्ष्मी, डॉ. गंगा प्रसाद गौड़ नाहर, श्री धर्मचन्द सरावगी तथा आचार्य के. लक्ष्मण शर्मा आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

यहाँ इस बात का उल्लेख करना भी उपयुक्त होगा कि प्राकृतिक चिकित्सा का आधुनिक आन्दोलन जर्मनी तथा अन्य पाश्चात्य देशों में 'जल चिकित्सा' के रूप में प्रारंभ हुआ। उन प्रारंभिक 'दिनों में 'जल चिकित्सा' को ही प्राकृतिक चिकित्सा के रूप में जाना जाता था। जल चिकित्सा को विश्व प्रसिद्ध बनाने का श्रेय विन्सेन्ट प्रिसनिज (1799-1851) को जाता है, जो कि एक कृषक थे। बाद में अन्य लोगों ने भी इस कार्य में अपना योगदान दिया। इनमें लुई कुने का नाम उल्लेखनीय है जिन्होंने रोगों की एकरूपता का सिद्धांत' प्रतिपादित कर इस चिकित्सा प्रणाली को एक सैद्धान्तिक आधार प्रदान किया। इनकी लिखी पुस्तक 'न्यू साइन्स ऑफ हीलिंग' का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ।

प्राकृतिक चिकित्सा के अन्य प्रणेताओं में डॉ. हेनरी लिण्डलार, डॉ. जे.एच. केलाग, अर्नाल्ड इहरिट, डी.डी. पामर, रोलियर, ई. डी. बैबिट, मैकफेडन, अर्नाल्ड रिक्ली, जे.एच., टिल्डेन, फादर नीप, बेनेडिक्ट लस्ट, स्टेनली लीफ तथा हेरी बेंजामिन आदि के नाम भी प्रमुखता से लिए जा सकते हैं।

आज प्राकृतिक चकित्सा एक स्वतंत्र चिकित्सा पद्धति के रूप में सर्वमान्य है तथा मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों से सम्बद्ध कई महाविद्यालय इसके 5½ वर्षीय बी. एन. वाई.एस. डिग्री पाठ्यक्रम का संचालन कर रहे हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा की परिभाषा


प्राकृतिक चिकित्सा व्यक्ति को उसके शारीरिक, मानसिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक तलों पर प्रकृति के रचनात्मक सिद्धान्तों के अनुकूल निर्मित करने की एक पद्धति है। इसमें स्वास्थ्य संवर्धन, रोगों से बचाव, रोग निवारण और पुनस्थापना कराने की अपूर्व क्षमता है।

प्राकृतिक चिकित्सा के 10 सिद्धान्त

प्राकृतिक चिकित्सा के मुख्य सिद्धान्त इस प्रकार हैं

1. सभी रोग, उनके कारण एवं उनकी चिकित्सा एक है। चोट-चपेट और वातावरणजन्य परिस्थितियों को छोड़ कर शेष सभी रोगों का मूल कारण एक ही है और इनका इलाज भी एक है। (शरीर में विजातीय पदार्थों के संग्रह से रोग उत्पन्न होते हैं और शरीर से उनका निष्कासन ही चिकित्सा है।)

2. रोग का मुख्य कारण जीवाणु नहीं हैं। जीवाणु शरीर में जीवनी शक्ति के हास आदि के कारण विजातीय पदार्थों के जमाव के पश्चात् तब आक्रमण कर पाते हैं जब शरीर में उनके रहने और पनपने लायक अनुकूल वातावरण तैयार हो जाता है। अतः मूल कारण विजातीय पदार्थ हैं. जीवाणु नहीं। जीवाणु द्वितीय कारण हैं।

3. तीव्र रोग चूंकि शरीर के स्व-उपचारात्मक प्रयास हैं अतः ये हमारे शत्रु नहीं मित्र है। जीर्ण रोग तीव्र रोगों के गलत उपचार और दमन के फलस्वरूप पैदा होते हैं। 4. प्रकृति स्वयं सबसे बड़ी चिकित्सक है। शरीर में स्वयं को रोगों से बचाने व अस्वस्थ हो जाने पर पुनः स्वास्थ्य प्राप्त करने की क्षमता विद्यमान है।

5. प्राकृतिक चिकित्सा रोग की नहीं बल्कि रोगी की होती है।

6. प्राकृतिक चिकित्सा में रोग निदान सरलता से संभव है। किसी आडम्बर की आवश्यकता नहीं पड़ती। उपचार से पूर्व रोगों के निदान के लिए लम्बा इन्तजार भी नहीं करना पड़ता । 7. जीर्ण रोगों से ग्रस्त रोगियों का भी प्राकृतिक चिकित्सा में सफलतापूर्वक तथा अपेक्षाकृत कम अवधि में इलाज होता है।

8. प्राकृतिक चिकित्सा से दबे रोग भी उभर कर ठीक हो जाते हैं।


9.प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा शारीरिक, मानसिक, सामाजिक (नैतिक) एवं आध्यात्मिक चारों पक्षों की चिकित्सा एक साथ की जाती है। 

10.विशिष्ट अवस्थाओं का इलाज करने के स्थान पर प्राकृतिक चिकित्सा पूरे शरीर की चिकित्सा एक साथ करती है। प्राकृतिक चिकित्सा में औषधियों का प्रयोग नहीं होता ।
 प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार ' आहार ही औषधि है "

12. गांधी जी के अनुसार "राम नाम सबसे बड़ी प्राकृतिक चिकित्सा है अर्थात् अपनी आस्था के अनुसार प्रार्थना करना चिकित्सा का एक आवश्यक अंग है।

प्राकृतिक चिकित्सा की विभिन्न विधियाँ


प्राकृतिक चिकित्सा वस्तुतः स्वस्थ रहने का विज्ञान है। यह हमें सिखाती है कि हमें किस प्रकार से रहना चाहिए. क्या खाना चाहिए और हमारी दिनचर्या कैसी होनी चाहिए? प्राकृतिक चिकित्सा के तौर-तरीके न केवल हमें रोगों से मुक्ति दिलाने में सहायता पहुँचाते हैं बल्कि इनका समुचित और नियमित पालन करने पर स्वास्थ्य सशक्त एवं प्रभावूपर्ण बन जाता है। इसीलिए प्राकृतिक चिकित्सा को प्राकृतिक जीवन भी कहा जाता है। इसका मूल उद्देश्य लोगों की रहन-सहन की आदतों में परिवर्तन कर उन्हें स्वस्थ जीवन जीना सिखाना है। प्राकृतिक चिकित्सा की विभिन्न विधियाँ इस उद्देश्य की पूर्ति में अत्यन्त सहायक हैं।

मनुष्य के शरीर में स्वयं को रोग मुक्त करने की अपूर्व शक्ति है। यह पांच तत्त्वों (पंच महाभूतों) का बना है जिनका असंतुलन ही रोगों के उत्पन्न होने का कारण है। इन्हीं तत्त्वों-मिट्टी पानी धूप, हवा और आकाश द्वारा रोगों की चिकित्सा प्राकृतिक चिकित्सा कहलाती है। प्राकृतिक चिकित्सा में सामान्य रूप से प्रयोग में लायी जाने वाली चिकित्सा और निदान की विधियाँ निम्न हैं।

आहार चिकित्सा

इस चिकित्सा के अनुसार आहार को उसके प्राकृतिक या अधिक से अधिक प्राकृतिक रूप में ही लिया जाना चाहिए। मौसम के ताजे फल, ताजी हरी पत्तेदार सब्जियाँ तथा अंकुरित अन्न इस दृष्टि से उपयुक्त है। इन आहारों को मोटे तौर पर तीन वर्गों में वर्गीकृत किया गया है।

1. शुद्धिकारक आहार : रस-नीबू, खट्टे रस, कच्चा नारियल पानी, सब्जियों के सूप, छाछ,गेहू घास का रस आदि ।



शांतकारक आहार :: फल सलाद, उबली / भाप में बनायी गई सब्जियाँ, अंकुरित अन्न, सब्जियों की चटनी आदि


3. पुष्टिकारक आहार: सम्पूर्ण आटा, बिना पालिश किया हुआ चावल कम दालें, अंकुरित अन्न, दही आदि 

क्षारीय होने के कारण ये आहार स्वास्थ्य को उन्नत करने के साथ-साथ शरीर का शुद्धीकरण कर रोगों से मुक्त करने में भी सहायक सिद्ध होते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि इन आहारों का आपस में उचित मेल हो। स्वस्थ रहने के लिए हमारा भोजन 20 प्रतिशत अम्लीय और 80 प्रतिशत क्षारीय अवश्य होना चाहिए। अच्छा स्वास्थ्य बनाये रखने के इच्छुक व्यक्ति को संतुलित भोजन लेना चाहिए। प्राकृतिक चिकित्सा में आहार को ही मूलभूत औषधि माना जाता है।

उपवास चिकित्सा


स्वस्थ रहने के प्राकृतिक तौर-तरीकों में उपवास एक महत्त्वपूर्ण तरीका है। उपवास में प्रभावी परिणाम प्राप्त करने के लिए मानसिक तैयारी एक आवश्यक पूर्व किया है। इसके पश्चात् एक या दो दिन का उपवास किसी को भी कराया जा सकता है।

उपवास के बारे में प्राकृतिक चिकित्सा का मानना है कि यह पूर्ण शारीरिक और मानसिक विश्राम की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के दौरान पाचन प्रणाली क्योंकि विश्राम में होती है अतः भोजन का पाचन करने वाली प्राण ऊर्जा पूर्ण रूप से निष्कासन की प्रक्रिया में लग जाती है। यही उपवास का उद्देश्य भी है। 

मस्तिष्क एवं शरीर के विकारों को दूर करने के लिए उपवास एक उत्कृष्ट चिकित्सा है। मंदाग्नि, कब्ज, गैसादि पाचन संबंधी रोगों, दमा-श्वास, मोटापा, उच्च रक्तचाप तथा गठिया आदि रोगों के निवारणार्थ उपवास का परामर्श दिया जाता है।

मिट्टी चिकित्सा


मिट्टी की चिकित्सा बहुत सरल एवं प्रभावी है। इसके लिए प्रयोग में लायी जाने वाली मिट्टी साफ-सुथरी और जमीन से 3-4 फिट नीचे की होनी चाहिए। उसमें किसी तरह की मिलावट, ककड़-पत्थर या रासायनिक खाद वगैरह न हो।

मिट्टी लेपन चिकित्सा
मिट्टी लेपन 


शरीर को शीतलता प्रदान करने के लिए मिट्टी चिकित्सा का प्रयोग किया जाता है। मिट्टी शरीर के दूषित पदार्थों को घोलकर एवं अवशोषित कर अन्ततः शरीर के बाहर निकाल देती है। मिटटी की पट्टी तथा मिट्टी स्नान इसके मुख्य उपचार है। विभिन्न रोगों जैसे कब्ज, तनावजन्य सिरदर्द, उच्च रक्तचाप तथा चर्म रोगों आदि में इसका प्रयोग सफलतापूर्वक किया जाता है। सिरदर्द तथा उच्च रक्तचाप की स्थिति में माथे पर भी मिट्टी की पट्टी रखी जाती है। गांधी जी अपने कब्ज को दूर करने के लिए प्राय मिट्टी चिकित्सा का प्रयोग किया करते थे।

जल चिकित्सा

जल चिकित्सा, प्राकृतिक चिकित्सा
जल चिकित्सा 


मिट्टी की तरह जल को भी चिकित्सा का सर्वाधिक प्राचीन साधन माना जाता है। स्वच्छ, ताजे एवं शीतल जल से अच्छी तरह स्नान करना जल चिकित्सा का एक उत्कृष्ट रूप है। इस प्रकार के स्नान से शरीर के सभी रध खुल जाते हैं. शरीर में हल्कापन और स्फूर्ति आती है, शरीर के सभी संस्थान और मांसपेशिया सक्रिय हो जाती हैं तथा रक्त संचार भी उन्नत होता है। विशेष अवसरों पर नदी, तालाब अथवा झरने में स्नान करने की प्रथा वस्तुतः जल चिकित्सा का ही एक प्राकृतिक रूप है। जल चिकित्सा के अन्य साधनों में कटिस्नान, एनिमा गरम-ठंडा सेंक, गरम पाद स्नान रीढ़ स्नान, भाप स्नान, पूर्ण टब स्नान, गरम-ठंडी पट्टियां, पेट, छाती तथा पैरों की लपेट आदि आते हैं जो इसके उपचारात्मक प्रयोग हैं। जल चिकित्सा का प्रयोग मुख्यतः स्वस्थ रहने के साथ-साथ विभिन्न रोगों के निवारणार्थ किया जाता है।

मालिश चिकित्सा


मालिश भी प्राकृतिक चिकित्सा की एक विधि है तथा स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक है। इसका प्रयोग अंग-प्रत्यंगों को पुष्ट करते हुए शरीर के रक्त संचार को उन्नत करने में होता है। सर्दी के दिनों में पूरे शरीर की तेल की मालिश के बाद धूप स्नान करना सदैव स्वस्थ एवं क्रियाशील बने रहने का एक चिर-परिचित तरीका है। यह सभी के लिए लाभकारी है। इससे मालिश एवं सूर्य किरण चिकित्सा दोनों का लाभ मिलता है। रोग की स्थिति में मालिश के विशिष्ट प्रयोगों द्वारा आवश्यक चिकित्सकीय प्रभाव उत्पन्न करके विभिन्न रोग लक्षणो को दूर किया जाता है। जो व्यायाम नही कर सकते उनके लिए मालिश एक विकल्प है। मालिश से व्यायाम के प्रभाव उत्पन्न किये जा सकते हैं।

सूर्य किरण चिकित्सा

सात रंगों से बनी सूर्य के किरणों के अलग-अलग चिकित्सकीय महत्व है। ये रंग है-बैंगनी, नीला आसमानी, हरा, पीला, नारंगी तथा लाल स्वस्थ रहने तथा विभिन्न रोगों के उपचार में ये रंग प्रभावी ढंग से कार्य करते हैं। रंगीन बोतलों में पानी तथा तेल भरकर निश्चित अवधि के लिए सूर्य की किरणों के समक्ष रखकर तथा रंगीन शीशों को सूर्य किरण चिकित्साके साधनों के रूप में विभिन्न रंगों के उपचारार्थ प्रयोग में लाया जाता है। सूर्य किरण चिकित्सा की सरल विधियाँ स्वास्थ्य सुधार की प्रक्रिया में प्रभावी तरीके से मदद करती हैं।

अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्वच्छ वायु अत्यन्त आवश्यक है। वायु चिकित्सा का लाभ वायु स्नान के माध्यम से उठाया जा सकता है। इसके लिए कपड़े उतार कर या हल्के कपड़ने पहन कर किसी स्वच्छ एकान्त स्थान पर जहाँ पर्याप्त वायु हो, प्रतिदिन टहलना चाहिए। कई रोग में चिकित्सक भी वायु स्नान की सलाह देते हैं। प्राणायाम का भी वायु चिकित्सा की एक विधि के रूप में चिकित्सात्मक प्रयोग किया जाता है।

वायु चिकित्सा


प्राकृतिक चिकित्सा के कुछ मुख्य उपचार


• मिट्टी की पट्टी 

• मिट्टी का स्नान 

• सूर्य स्नान 

• गर्म और ठंडी सिंकाई

• कटि स्नान 

• मेहन स्नान 

• पाद स्नान 

• वाष्प स्नान

• पूर्ण टब स्नान

• रीढ़ स्नान

• गीली चादर लपेट

• छाती की पट्टी

• पेट की पट्टी

• घुटने की पट्टी

• एनिमा 

प्राकृतिक चिकित्सा में रोग को पहचानने की विधि 


रोग के मूल कारणों को जानने के लिए प्राकृतिक चिकित्सक दिनचर्या, ऋतुचर्या, आहार क्रम से लेकर वंशानुगत कारणों तक का विश्लेषण करते हैं। तात्कालिक रोगिक अवस्था को ज्ञात करने के लिए मुख्यतः निम्न दो नैदानिक विधियों का सहारा लिया जाता है

1. कननिका निदानः

पूरा शरीर कननिका के विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिबिम्बित होता है। उनके विश्लेषण द्वारा रोगी की दशा का अच्छी तरह से निदान किया जा सकता है।

2. आकृति निदान :

 शरीर के विभिन्न अंगों में विजातीय पदार्थों का जमाव शरीर की आकृति से परिलक्षित होता है। शरीर के विभिन्न अंगों में रोगों की स्थिति का निदान उनके अवलोकन से किया जा सकता है।

प्राकृतिक चिकित्सा दिवस कब मनाया जाता हैं

प्राकृतिक चिकित्सा दिवस प्रतिवर्ष 18 नवंबर को मनाया जाता हैं। 18 नवंबर को प्राकृतिक चिकित्सा दिवस मनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य महात्मा गांधी और दिनशा मेहता की प्राकृतिक चिकित्सा के प्रति प्रतिबद्धता को अक्षुण्ण बनाए रखना हैं।

18 नवंबर 1945 को महात्मा गांधी ने "आल इंडिया नेचर क्योर फाउंडेशन ट्रस्ट" की स्थापना की थी और दिनशा मेहता ने इस संस्थान को अपनी सभी संपत्ति दान की थी। बाद में इस ट्रस्ट को आयुष मंत्रालय भारत सरकार ने " राष्ट्रीय प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान पुणे" के रूप में बदल दिया गया।

प्रथम प्राकृतिक चिकित्सा दिवस 18 नवंबर 2018 को मनाया गया था । जिसका ध्येय वाक्य था "स्टेनेबल लिविंग प्रैक्टिस"

प्राकृतिक चिकित्सा के बारे में महात्मा गांधी के विचार 



"प्रकृति के नियमों के उल्लंघन के कारण बीमारियां होती हैं, जिससे संक्रमण, विषाक्तता, रक्त और लसीका की असामान्य संरचना और अंगों और प्रणालियों को नुकसान होता है। रोग ही शरीर का एक आत्म-शुद्धिकरण प्रयास है। इसलिए बिमारियों से घबराएं नहीं-उन्हें न्यौता दें जिससे कि आपका शरीर विषाक्त और रुग्ण पदार्थों से मुक्त हो सके ।

नेचर क्योर को स्वीकार करने वाला आदमी कभी भीख नहीं मांगता। 'स्व-सहायता से आत्म सम्मान बढ़ता है'। वह शरीर से विषाक्तता को खत्म करके खुद को ठीक करने के लिए कदम उठाता है और भविष्य में कभी बीमार न पड़ने के लिए सावधानी बरतता है।

प्रकृति के नियमों के जाने या अनजाने उल्लंघन से रोग पनपता है। इसलिए, उन नियमों की समय पर वापसी का मतलब बहाली होना चाहिए।"

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• भारत में होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति की शुरुआत कब हुई थी




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