बुधवार, 21 दिसंबर 2016

swasth samajik Jivan ke 3 pillar [स्वस्थ सामाजिक जीवन के 3 पीलर]

सामाजिक जीवन
 भगवान महावीर
दोस्तों,स्वस्थ जीवन जीनें के लिये के लियें दवाई,योग,व्यायाम के साथ स्वस्थ सामाजिक आचरण की भी बराबर आवश्यकता होती हैं,यह बात भारतीय प्राचीन शास्त्रों ने कई बार उद्घाटित की हैं,वर्तमान सामाजिक जीवन में भी इस बात को कई मोटिवेशन वक्ता स्वीकारतें हैं,कि स्वस्थ सामाजिक आचरण के बिना स्वस्थ जीवन की कल्पना करना नामुमकिन हैं.आईयें जानतें हैं,स्वस्थ जीवन के पीलरों को

# 1.अहंकार मुक्त जीवन :::

अपनें - अपनें क्षेत्रों में व्यक्ति सफल होकर शीर्ष मुकाम धारण करतें हैं,कुछ व्यक्ति सफल होकर भी विनम्र बनें रहतें हैं,ऐसे लोगों का शीर्ष पद पर बनें रहना वास्तव में सुखद और सन्तोष प्रदान करता हैं,भगवान राम अहंकाररहित जीवन के सर्वोत्तम उदाहरण हैं,सूर्यवंशी जितनें भी राजा हुए उन सब में उनका नाम ही सर्वपृथम जिव्हा पर आता हैं,क्यों ?क्योंकि राम में शक्ति के साथ अहंकारमुक्त आचरण भी था.तभी तो रावण को परास्त करनें के लियें उन्होनें मनुष्यों,जानवरों सभी का सहयोग लिया.जबकि रावण अपनें अहंकार और आत्ममुग्धि में परिवार का सहयोग भी न ले सका और भाई के कारण ही युद्ध भूमि में मारा गया.
नमन्ति फलनो वृक्षा : नमन्ति गुणनो जना:|
शुष्क काष्ठानि मुर्खाश्च न नमन्ति कदाचन ||
अर्थात फल देनें वाला वृक्ष और गुणवान व्यक्ति झुक जातें हैं,मूर्ख व्यक्ति और वृक्ष का सूखा ठूंठ हमेशा अकड़कर खड़े रहतें हैं.
scientific रूप से अंहकार का नकारातमक प्रभाव शरीर और मस्तिष्क पर पड़ता हैं,जो व्यक्ति विनम्र होकर अपना कार्य करता हैं,उसके मस्तिष्क से ऐसे हार्मोंन का उत्सर्जन अधिक होता हैं,जो रोगप्रतिरोधकता को बढ़ाकर मूड़ को खुशमिजाज रखते हैं.जबकि अंहकारी व्यक्ति के मस्तिष्क से ऐसे हार्मोंन उत्सर्जित होतें हैं,जो व्यक्ति को तनाव देतें यही कारण हैं,कि सबसे ज्यादा तनाव में अंहकारी व्यक्ति ही रहता हैं,सचिन तेंडुलकर क्रिकेट के सबसे सफल खिलाड़ी मानें जातें हैं,जिनके प्रदर्शन को देखकर सुखद आश्चर्य होता हैं,क्या कभी आपनें इस खिलाड़ी को किसी से अहंकार प्रदर्शित करते देखा हैं,जबकि कई खिलाड़ी जिनकी प्रतिभा सचिन से भी उम्दा थी,विवादों और अंहकार के साथ ही गुमनाम हो गयें.
ऊँचाई पर चढ़नें वाला पर्वतारोही तभी चोंटी पर पहुचेगा जब पीठ और सिर आगे की ओर झुकाकर चलें.अत:
नर की और नलनीर की,गति एकै कर जोइ |
जेतो नीचो है चले,ते तो ऊँचो होय ||

# 2.ईर्ष्या का साथ छोडियें :::

मनुष्य जैसें - जैसें आगें बढ़ रहा हैं,प्रतिस्पर्धा भी उसी अनुपात में बढ़ रही हैं,पढाई के नाम पर ईर्ष्या,धर्म के नाम पर ईर्ष्या,कार्यस्थल पर एक दूसरें को नीचा दिखानें की होड़ ,शर्मा जी की नई गाड़ी की ईर्ष्या और भी न जानें कितनें प्रकार से मनुष्य एक दूसरें की प्रगति देखकर नाक भों सिकोड़ते रहतें हैं,क्या यह स्वस्थ समाज की निशानी हैं ? कदापि नही दूसरों से ईर्ष्या वही लोग करतें हैं,जिनके पास करनें के लिये कुछ भी नही होता.

● पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचार

एक बार भगवान बुद्ध से  भिक्षुक ने प्रश्न किया कि उनके प्रति हमारा नजरिया क्या हो जो हमारें प्रति दुर्भावना रखतें हो तब बुद्ध ने मुस्कुराते हुये कहा कि यदि उसके द्धारा की गई ईर्ष्या का तुमनें प्रति उत्तर नहीं दिया अर्थात उसके प्रति सदभाव रखा तो उसकी ईर्ष्या उसी के दिमाग में बनी रहकर उसका जीवन मुठ्ठी की रेत की तरह कम करती रहेगी.कहनें का तात्पर्य यही कि हम ईर्ष्या,राग देष जैसे विचारों को हमारें मन में न आनें दें तथा प्रेम,सदभाव जैसें गुणों को अपनें जीवन में अंगीकार करें.

परनिंदा रस में डूबें हुए विचार विचार प्रदूषण बनकर सम्पूर्ण वातावरण को कम्पायमान रख प्रदूषित करतें हैं.और व्यक्ति के भावनात्मक पक्ष को कमज़ोर करतें हैं.

# 3.क्रोध की धार कुन्द करें :::

सामाजिक जीवन
 Angry 
आपनें अनेक लोगों को बात - बात पर तुनकते हुये देखा होगा ऐसे व्यक्ति समाज का तो अहित करतें ही हैं,अपना भी सर्वनाश कर बेंठतें हैं.रावण बात - बात में क्रोध करता था किन्तु इस क्रोध का अन्तिम परिणाम क्या हुआ सब जानतें हैं,दूसरी और भगवान राम और परम प्रतापी हनुमान थें जिनके बास बल होतें हुये भी अक्ल थी.रामायण की अनेक पंक्तियों से हमें धेर्य धारण करनें व आवश्यकता होनें पर ही उचित रीति से क्रोध करनें की शिक्षा मिलती हैं.ऐसे ही जब राम नें समुद्र से बार - बार रास्ता देनें का आग्रह किया और समुद्र नें इस विनती को बार - बार ठुकराया तो राम को मज़बूरी के वश धनुष पर प्रत्यांचा चढ़ाकर समुद्र सुखानें की धमकी देनी पड़ी कहनें का अर्थ यही कि राम का क्रोध उचित अनुचित पर निर्णय करनें के पश्चात ही प्रकट़ हुआ था.अत: जब तक विनती और प्रार्थना से काम चलता हो वहाँ अनावश्यक क्रोध को प्राथमिकता नही देनी चाहियें.किसी ने कहा भी हैं,कि 
क्रोध मूर्खता से शुरू होकर पश्चाताप पर समाप्त होता हैं.
क्रोध से अनेक शारीरिक और मानसिक पीढ़ा भी प्रकट होती हैं,जैसें क्रोध करनें वालें का रक्तचाप उच्च ही रहता हैं,उच्चरक्तचाप से अनेक शारीरिक परेशानी बिना बुलायें ही शरीर में आ जाती हैं,जैसें ह्रदय रोग,मधुमेह,ब्रेन स्ट्रोक आदि.अत: इन सभी शारीरिक समस्यायाओं से बचनें हेतू क्रोध पर नियत्रंण करना आवश्यक हैं.

जिन व्यक्तियों को अधिक क्रोध आता हैं,उन्हें अनुलोम - विलोम,प्राणायाम जैसी योगिक क्रियाओं को अपनें जीवन का अभिन्न अंग बना लेना चाहियें,ऐसा करनें से मस्तिष्क में शांति, संतुलन स्थापित होता हैं.

 कर्म और भाग्य में से कोन बड़ा हैं


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