सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Nipah virus : निपाह वायरस के लक्षण

Nipah virus एक तरह का आर.एन.ए. वायरस हैं जो फल खानें वाली चमगादड़ों की एक प्रजाति टेरोपस जींस में पाया जाता हैं ‌‌।

निपाह वायरस paramyxovirinae सब फैमिली का वायरस हैं। 
 

निपाह वायरस का नाम निपाह मलेशिया के गांव "निपा" के नाम पर पड़ा हैं, जहां पहली बार यह वायरस पाया गया था।

मनुष्यों को संक्रमित करने के क्रम में निपाह वायरस को पहली बार चमगादड़ों द्वारा खाए गए अधूरे कच्चे खजूर फल से अलग किया गया था। 

इसके बाद यह सुंअरो से मनुष्य में फैला था।

Nipah virus first outbreak

निपाह वायरस का प्रथम outbreak सन् 1998 में मलेशिया देखने को मिला था। इसके बाद यह सिंगापुर फैला था। मलेशिया में मनुष्यों में निपाह वायरस संक्रमण का कारण सुंअर थें।

भारत और बांग्लादेश में पहली बार निकाह वायरस outbreak का कारण चमगादड़ों द्वारा खाया गया कच्चे खजूर का बना जूस था।


निपाह वायरस चमगादड़ों से मनुष्य में कैसे फैला


w.h.o.के अनुसार निपाह वायरस फैलने के स्पष्ट प्रमाण मौजूद हैं w.h.o.के अनुसार जब मनुष्य के क्रियाकलापों से चमगादड़ों के प्राकृतिक आवास और भोजन प्रणाली समाप्त हुई तो चमगादड़ भूखे रहने लगे फलस्वरूप चमगादड़ों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो गई।

जब चमगादड़ों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हुई तो निपाह वायरस का लोड चमगादड़ों के शरीर में बढ़ने लगा और उनके  मल मूत्र और लार के माध्यम से वायरस फैलने लगा।

मनुष्य जब इन मल मूत्र और लार के सम्पर्क में आए तो यह वायरस इन्सानों में आ गया।

Incubation period of nipah virus

Nipah virus का मनुष्यों में incubation period 4 से 18 दिन होता हैं।

Nipah virus,निपाह वायरस


निपाह वायरस संक्रमित व्यक्ति के लक्षण

• बुखार आना

• बदन दर्द होना

• चक्कर आना

• मस्तिष्क में सूजन, Encephalitis

• झटके आना

• गंभीर स्थिति में लक्षणों के प्रकट होने के 24 से 48 घंटों में व्यक्ति कोमा में चला जाता हैं।

• गले में दर्द होना

निकाह वायरस की जांच की विधि

मनुष्यों में निपाह वायरस का संक्रमण जांचने के लिए निम्नलिखित विधियां अपनाई जाती हैं

• RT-PCR [Real time polymerase chain reaction]

• ELISA Test

• virus cell culture method द्वारा

• सिरम न्यूट्रीलाइजेशन टेस्ट विधि


निपाह वायरस का इलाज क्या है

अब तक निपाह वायरस से संक्रमित व्यक्ति का कोई इलाज नहीं खोजा गया है। सिर्फ लक्षणों के आधार पर उपलब्ध चिकित्सा की जाती हैं।

क्या निपाह वायरस की वैक्सीन उपलब्ध हैं

जी नहीं,अब तक निपाह वायरस से बचाव हेतू कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं हैं। किंतु w.h.o.के अनुसार वैक्सीन विकसित करने की दिशा में प्रयास जारी हैं।

निपाह वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए w.h.o.की गाइड़ लाइन क्या है


• निपाह वायरस संक्रमित व्यक्ति को आइसोलेशन में रखना चाहिए। अस्पतालों में इसके लिए अलग आइसोलेशन वार्ड होना चाहिए।

• निपाह वायरस संक्रमित व्यक्ति के मल मूत्र आदि का उचित निस्तारण होना चाहिए।

• हेल्थ वर्कर निपाह वायरस संक्रमित व्यक्ति का इलाज करतें समय उचित सुरक्षात्मक कवच जैसे पीपीई किट,मास्क आदि धारण करें।

• फलों और सब्जियों को उपयोग से पहले अच्छी तरह विसंक्रमित करना चाहिए।

• निपाह वायरस संक्रमित पशु को स्वस्थ्य पशु से अलग थलग कर दिया जाए।

• सुंअरों के फार्म हाउस को बहुत अच्छी तरह विसंक्रमित किया जाए।

• फलों को बाजार में पहुंचाने से पहले बहुत अच्छी तरह संक्रमण रहित करने का उपाय अपनाया जाएं।

• फलों को खानें वाले चमगादड़ जो pterpodiae कुल से संबंध रखतें हैं निपाह वायरस के सबसे अधिक संक्रामक कारक होतें हैं अतः इस कुल के प्राकृतिक रहवास के आसपास उगने वाले फलों की सुरक्षा के लिए फलों के फार्म हाउस के ऊपर जालीदार नेट का उपयोग किया जाए ताकि चमगादड़ों से फल सुरक्षित रहें।


भारत को निपाह वायरस से अतिरिक्त सचेत होने की आवश्यकता है

भारत को निपाह वायरस से अतिरिक्त सतर्कता बरतने की आवश्यकता है क्योंकि भारत की घनी आबादी में इस वायरस का प्रसार बहुत तेजी से होगा,इसका अनुभव हमें कोरोना वायरस की दूसरी लहर हो चुका है।

भारत की स्वास्थ्य सुविधाओं पर दबाव कम करने के लिए हमें निपाह वायरस के प्रसार को बहुत तेजी से रोकने की आवश्यकता है इसके लिए निपाह वायरस प्रभावित क्षेत्रों में टेस्टिंग,ट्रैसिंग और आइसोलेशन पर काम करना होगा।

हाल में केरल के kozikode में एक निपाह वायरस संक्रमित बच्चें की मौत हो गई है। 

भारत में निपाह वायरस की घातकता बहुत अधिक है उदाहरण के लिए सन् 2007 में पश्चिम बंगाल के नादिया जिले में पांच व्यक्ति संक्रमित हुए थे और पांचों की मौंत हो गई थी अर्थात मृत्युदर 100 प्रतिशत थी।

W.h.o.के अनुसार Nipah virus

World health organization ने सन् 2018 से ही nipah virus को प्राथमिकता वाली बीमारी की सूची में डाल रखा है जिसे w.h.o. research and development blueprint कहा जाता हैं। 

इसका मतलब है कि निकाह वायरस से निपटने के लिए तत्काल रिसर्च और वैक्सीन बनाना आवश्यक है वरना यह बीमारी महामारी का रूप धारण कर सकती हैं।

भारत सरकार स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट से इस संबंध में और अधिक जानकारी ली जा सकती हैं जिसका लिंक नीचे दिया जा रहा हैं




Author :: healthylifestyehome


• Omicron virus के लक्षण

• कोराना थर्ड वेव से बचने के तरीके

• हैप्पी हाइपोक्सिया क्या होता है

• होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति की शुरुआत कब हुई थी

टिप्पणियाँ

प्रेम लता ने कहा…
क्या निगाह वायरस से केरल में मौत हो गई है

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गेरू के औषधीय प्रयोग

गेरू के औषधीय प्रयोग गेरू के औषधीय प्रयोग   आयुर्वेद चिकित्सा में कुछ औषधीयाँ सामान्य जन के मन में  इतना आश्चर्य पैदा करती हैं कि कई लोग इन्हें तब तक औषधी नही मानतें जब तक की इनके विशिष्ट प्रभाव को महसूस नही कर लें । गेरु भी उसी श्रेणी की   आयुर्वेदिक औषधी   हैं। जो सामान्य मिट्टी   से   कहीं अधिक   इसके   विशिष्ट गुणों के लिए जानी जाती हैं। गेरु लाल रंग की मिट्टी होती हैं। जो सम्पूर्ण भारत में बहुतायत मात्रा में मिलती हैं। इसे गेरु या सेनागेरु कहते हैं। गेरू आयुर्वेद की विशिष्ट औषधी हैं जिसका प्रयोग रोग निदान में बहुतायत किया जाता हैं । गेरू का संस्कृत नाम  गेरू को संस्कृत में गेरिक ,स्वर्णगेरिक तथा पाषाण गेरिक के नाम से जाना जाता हैं । गेरू का लेटिन नाम  गेरू   silicate of aluminia  के नाम से जानी जाती हैं । गेरू की आयुर्वेद मतानुसार प्रकृति गेरू स्निग्ध ,मधुर कसैला ,और शीतल होता हैं । गेरू के औषधीय प्रयोग 1. आंतरिक रक्तस्त्राव रोकनें में गेरू शरीर के किसी भी हिस्से में होनें वाले रक्तस्त्राव को कम करने वाली सर्वमान्य औषधी हैं । इसके लिय

टीकाकरण चार्ट [vaccination chart] और संभावित प्रश्न

 टीकाकरण चार्ट # 1.गर्भावस्था के समय टीकाकारण ::: गर्भावस्था की शुरूआत में Titnus का पहला टीका टी.टी - 1. टी.टी -1 के चार सप्ताह बाद टी.टी.-2 यदि पिछली गर्भावस्था में टी.टी - 2 दिया गया हैं,तो केवल बूस्टर दीजिए. # टीके की मात्रा ,कैसें और कहाँ दें 0.5 ml.मात्रा प्रशिक्षित व्यक्ति द्धारा ऊपरी बांह की मांसपेशी में. # महत्वपूर्ण गर्भावस्था के 36 सप्ताह हो गयें हो तो मात्र टी.टी.- बूस्टर देना चाहियें.  टीकाकरण का दृश्य # 2.शिशुओं के लियें टीकाकरण  #जन्म के समय ::: 1. B.C.G.  =     0.1 ml बाँह पर त्वचा के निचें. 2.हेपेटाइटिस बी.=  0.5 ml मध्य जांघ के बाहरी हिस्सें पर मांसपेशी में 3.o.p.v.या oral polio vaccine = दो बूँद मुहँ में . ०  जानिये पोलियो क्या होता हैं ? #6 सप्ताह पर ::: 1.हेपेटाइटिस बी. = 0.5 ml 2.D.P.T. = 0.5 ml मध्य जांघ का बाहरी हिस्सें में माँसपेशियों में. 3.o.p.v.या oral polio vaccine. #10 सप्ताह पर ::: 1.हेपेटाइटिस बी. 2.D.P.T. 3.o.p.v. #14 सप्ताह पर ::: 1.हेपेटाइटिस बी. 2.D.P.T. 3.o.p.v.   #9 से 12 माह

काला धतूरा के फायदे और नुकसान kala dhatura ke fayde aur nuksan

धतूरा भगवान शिव का प्रिय पौधा है। भगवान शिव धतूरा अपने मस्तिष्क पर धारण करते हैं और जो लोग धतूरा भगवान शिव को अर्पण करते थे वे उन्हें मनचाहा आशीष प्रदान करते हैं। धतूरा भी कई प्रकार का होता है जैसे काला धतूरा, सफेद धतूरा, पीला धतूरा आदि। आज हम आपको "काला धतूरा के फायदे और नुकसान kala dhatura ke fayde aur nuksan" के बारे में बताएंगे।  काला धतूरा के फायदे और नुकसान आयुर्वेद आयुर्वेद चिकित्सा में काला धतूरा बहुत महत्वपूर्ण औषधि के रूप में बहुत लंबे समय से इस्तेमाल हो रहा है । धतूरा बहुत ही जहरीला फल होता है , प्रकृति में गर्म और भारी होता है। काला धतूरा का वैज्ञानिक नाम काला धतूरा का वैज्ञानिक नाम धतूरा स्ट्रामोनियम DHATURA STRAMONIUM है । अंग्रेजी में इसे डेविल्स एप्पल Devil's apple, डेविल्स ट्रम्पेट Devil's trumpet के नाम से जाना जाता है। संस्कृत में इसे दस्तूर, मदन, उन्मत्त ,शिव प्रिय महामोधि, कनक आदि नाम से जानते हैं। काला धतूरा की पहचान कैसे करें  काला धतूरा के पत्ते नोक दार ,डंठल युक्त और बड़े आकार के होते हैं। काला धतूरा के फूल घंटी