गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में निलम्बन (Suspension) सही या गलत : एक वृहत विश्लेषण

#भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में निलम्बन सही या गलत ?


निलम्बन
 निलम्बन क्या है

#१.निलम्बन क्या हैं ?


भारतीय प्रशासन अपनें कर्मियों से संचालित होता हैं.ये कर्मी अनेक संस्तरणों में अपनी योग्यतानुसार पदों पर कार्य करतें हैं.

कर्मियों के पदानुसार  संस्तरण  अनुसार ही इन पर वरिष्ठ अधिकारीयों का नियत्रंण रहता हैं.

जब कर्मीयों द्धारा प्रशासनिक नियमों के विरूद्ध कोई काम किया जाता हैं,जिससे शासन को गंभीर क्षति हुई हो तब संस्तरण में वरिष्ठ अधिकारी नियम विरद्ध कार्य की सजा निलम्बन के रूप में देता हैं.

निलम्बन के दोरान कर्मी को जीवन निर्वाह जितनी तनख़्वाह और अन्य ज़रूरी सुविधाँए मिलती रहती हैं.और नियम विरूद्ध किये गये कार्यों के सम्बंध में वरिष्ठ कार्यालय या न्यायालय द्धारा जाँच चलती रहती हैं.


##२.निलम्बन का इतिहास

कर्मीयों द्धारा राज खजानें या राजकाज में गड़बड़ करनें पर सजा देनें का वर्णन गुप्तकाल से मुगल काल तक मिलता हैं,परंतु निलम्बन का अधिक स्पष्ट ज्ञान हमें कोट़िल्य की रचनाओं में मिलता हैं,जहाँ उन्होंनें राज्य के ख़जानें से चोरी करनें वालें कर्मियों की सजा के बारें में अपनें ग्रंथ "अर्थशास्त्र" में उल्लेख किया हैं.

इसके पश्चात मुगल प्रशासन में भी इस व्यवस्था के बारें में बताया गया हैं,जहाँ मनसबदारों द्धारा गलत तरीकें से मनसब लेनें पर दंड़ की व्यवस्था का उल्लेख हैं.




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आधुनिक भारतीय प्रशासन में निलम्बन की जहाँ तक बात की जाती हैं,तो यह व्यवस्था विशुद्ध रूप से अँग्रेजों की देन हैं.

अंग्रेजी प्रशासनिक व्यवस्था दो तरह के निलम्बन पर आधारित थी भारतीय कर्मीयों के लिये कठोर निलम्बन या बर्खास्तगी तथा अंग्रेज कर्मीयों के लियें इंग्लैंड़ वापस भेजकर वहाँ उच्च पदों पर तैनाती.

##३.आधुनिक भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था और निलम्बन


आधुनिक भारतीय प्रशासनिक के सन्दर्भ में निलम्बन की बात की जायें तो यह व्यवस्था भारतीयों नें अंग्रेजों से जस की तस ग्रहण की थी.

 जिसमें समय - समय पर माननीय न्यायालय के निर्देश पर इसमें हुये संशोंधन को छोड़कर यह व्यवस्था आज भी उसी रूप में चल रही हैं.

यह व्यवस्था देश के सामाजिक वातावरण,अर्थव्यवस्था ,कार्य संस्कृति और स्वास्थ को किस तरह प्रभावित कर रही हैं आईंयें इसकी पड़ताल करतें हैं.


## राष्ट्र पर प्रभाव


भारत के सबसे बड़े नियोक्ता संगठन भारतीय रेलवें में होनें वालें निलम्बन की बात करें तो यहाँ औसतन 10-12 निलम्बन प्रतिदिन होतें हैं.

इन निलम्बनों में गंभीरतम् प्रकार के औसतन 1 निलम्बन को छोड़ दे तो बाकि के 10 -11 निलम्बन नियमों में चूक,मानवीय त्रुटि,नाचना गाना और वरिष्ठ अधिकारी या राजनेताओं की नापसंद के आधार पर होतें हैं.

निलम्बन के दोरान कर्मी को मुख्यालय में अटेच कर दिया जाता हैं और सामान्य से काम करनें को दे दिये जातें हैं.लगभग इसी प्रकार की कहानी भारत के हर सरकारी विभाग में दोहरायी जाती हैं.

यह व्यवस्था पूर्णत: अवैज्ञानिक या अतार्किक हैं क्योंकि निलम्बित कर्मी इस व्यवस्था से कुछ भी नहीं सीखता उसका काम मात्र इतना ही रह जाता हैं,कि घर से आकर उपस्थिति रजिस्टर पर अपनें हस्ताक्षर करें और समय होनें पर अपनें घर चला जायें.

क्या इस व्यवस्था से जो समस्या कर्मी ने निलम्बन के पूर्व पैदा की थी,उसका समाधान हो गया ? 

जवाब हैं,कदापि नही !

बल्कि हास्यपद बात तो यह हैं,कि कर्मी एक ही गलती के लियें दो- दो तीन - तीन बार सजा प्राप्त करता हैं.

उससे भी मज़ेदार बात यह हैं,कि जिस पद पर रहतें हुये कर्मी ने गलती की हैं,उसी प्रकार की गलती उसके कई पूर्वकर्मी कर चुकें होतें हैं,जिसमें कुछ कर्मीयों को निलम्बन की सजा मिल चुकी हैं और कुछ को नही.यानि पुरानी गलतीयों का सिलसिला लगातार जारी रहता हैं,कुछ समय बाद कर्मी बहाल हो जातें हैं,जितनें समय ये कर्मी निलम्बित रहतें हैं उस अवधि की तनख्वाह और भत्तें शासन को वहन करनें पड़तें हैं.

जितनें समय कर्मी निलम्बित रहता हैं उतनें समय के दौरान उसके द्धारा की गई गलतियों को सुधारनें का कोई प्रशिक्षण नही दिया जाता हैं.

इस व्यवस्था ने स्वतंत्रता से अब तक देश की अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा झटका दिया हैं,यदि मौद्रिक रूप से इस झटकें का आकलन करें तो यह देश के वर्तमान सकल घरेलू उत्पाद ( GDP)से  दो से तीन गुना बैंठता हैं.

## निलम्बित कर्मी के परिवार पर प्रभाव 


निलम्बन का सबसे बड़ा प्रभाव निलम्बित व्यक्ति के परिवार पर पड़ता हैं.उसकी पत्नि,बच्चें,बूढ़े माँ बाप और वह स्वंय  अजीब तनाव के साये में जीवन व्यतीत करतें हैं, और इस तनाव का मूल कारण हैं,निलम्बन को समाज में परिवार की बेइज्जती के रूप में प्रचलित होना.जब परिवार समाज के दबाव में होता हैं,तो परिवार के सभी व्यक्तियों की उत्पादकता भी प्रभावित होती हैं.

बच्चों का स्कूल प्रभावित होता हैं,माँ बाप पत्नि और स्वंय निलम्बित व्यक्ति का Biological body clock तनाव की वज़ह से बायोलाजिकल बाँड़ी क्लाक गड़बड़ हो जाता हैं.जिससे डाँक्टर की शरण लेनी पड़ती हैं,जिसका पूरा खर्चा स्वास्थ बिल के रूप में सरकार को चुकाना पड़ता हैं.

अब तक शासन इस व्यवस्था पर कई खरब रूपये फूँक चुका हैं,वही दूसरी और शासन " सर्वें संतु निरामया" की भी बात भी करता हैं.

बच्चों के पढ़ाई या अन्य गतिविधियों का नुकसान होनें का झट़का इतना बढ़ा हैं,कि आनें वालें कई वर्षों तक देश इस नुकसान की भरपाई  करनें की स्थिति में नहीं होता हैं.क्योंकि बच्चों की जीवन प्रत्याशा  कही अधिक होती हैं.

बच्चा परिवार के तनाव की अवधि में जो उत्पादकता राष्ट्र को प्रदान कर सकता था वह उस अवधि में प्रदान नहीं कर पाता.


## निलम्बित कर्मी के कार्य स्थल का वातावरण

भारत के एक बड़े सरकारी विभाग के सेवानिृत्त कर्मीयों से बातचीत के बाद सामनें आया कि
निलम्बित कर्मी और उसे निलम्बित करनें या करवानें वालें अधिकारी कर्मचारीयों  के सम्बंध पूरे सेवाकाल में कभी - भी सामान्य नहीं हो पातें हैं.और उनमें आपसी वैमनस्यता बनी रहती हैं,जो कभी - कभी भीषण खूनी संघर्ष का भी रूप ले लेती हैं.

यह स्थिति राष्ट्र को दोगुनी रफ़्तार से पिछे ले जा रही हैं,क्योंकि एक तो कार्यालयों का कामकाज आपसी वैमनस्यता की वजह से धीमा हो जाता हैं,वहीं दूसरी ओर पुलिस और कोर्ट़ कचहरी में कर्मी का सबसे कीमती कार्यालयीन समय बर्बाद होता हैं,यह समय वास्तव में कर्मी का नही राष्ट्र का समय होता हैं,क्योंकि आरोप सिद्ध नही होनें तक कर्मी राष्ट्र के संसाधनों और पैसों का उपयोग करता हैं.


## क्या कर्मी या अधिकारी का निलम्बन उसका स्वंय का निलम्बन हैं ?


कर्मी का या अधिकारी का निलम्बन को उसका स्वंय का निलम्बन कह कर समाचारों में प्रसारित किया जाता हैं.

लेकिन क्या कर्मचारी या अधिकारी का निलम्बन उसका स्वंय का निलम्बन होता हैं ?

 जवाब हैं नही ! 

जब किसी विभाग से कोई कर्मचारी या अधिकारी निलम्बित होता हैं तो इसका सीधा  मतलब हैं विभाग के शीर्ष मंत्री से लेकर उसके सबसे निम्न कर्मचारी और विभाग की नितियाँ तक भी असफल हैं.

यह ठीक उसी प्रकार हैं जब कोई बच्चा अपनी कक्षा में फैल होता हैं तो वह अकेला ही फैल नही होता बल्कि उसके शिक्षक,माता - पिता ,स्कूल सब फैल हो जातें हैं.क्योंकि ये लोग बच्चें की रूचि को पहचान ही नहीं पायें .

मध्यप्रदेश राज्य भारत का एकमात्र राज्य हैं,जहाँ उसके कर्मचारीयों की कार्य संस्कृति को सुधारनें और उन्हें आनंद देने के लिये "आनंद विभाग" का गठन किया गया हैं.

किंतु अपनें कर्मचारी अधिकारी को निलम्बित करनें में यह राज्य भी भारत का सिरमौर राज्य हैं.आनंद विभाग के गठन के कई वर्षों बाद भी यह विभाग कर्मचारीयों के लिये उल्लेखनीय नवाचार करनें में अब तक सफ़ल साबित नहीं हुआ हैं.

## निलम्बित करनें या करवानें वालें व्यक्ति की मनोस्थिति


 कई जिलों के जिला कलेक्ट़र कार्यालय का इतिहास देखनें पर पता चलता हैं कि जिस कलेक्टर के कार्यकाल में जितनें अधिक निलम्बन हुये उसका आगें का और पिछला कार्यकाल काफी आलोचना और विवाद का शिकार हुआ था.और कई कर्मचारी और अधिकारी ऐसे कलेक्ट़र को कर्मचारी विरोधी कलेक्ट़र कहकर प्रचारित करतें थे,जिसका प्रभाव उनकी आगामी पदस्थापना पर भी पड़ा.

कई सेवानिवृत्त जिला कलेक्टरों से जब निलम्बन के संबध में बात की जाती हैं,तो उनका जवाब होता हैं कि कर्मचारी या अधिकारी को निलम्बित करनें का उनका निर्णय उनके कार्यकाल का सबसे घटिया निर्णय था जिसनें उनकी आत्मा को  गहरे तक विदीर्ण किया हैं और जिसका उन्हें ताउम्र पछतावा रहेगा.

कुछ ऐसे व्यक्तियों से बात की गई जिन्होंनें अधीनस्थ कर्मी को इतनी छोटी सी गलती पर निलम्बित करवाया जो उसके संज्ञान में नही थी और जिसे सहकर्मी के संज्ञान में लाकर आसानी से ठीक करवाया जा सकता था.जब उनसे और आगें बात की गई तो उन्होंने आगे रहकर ही बताया की मैंनें थोड़ी सी वैमनस्यता में सहकर्मी को निलम्बित करवाके जिन्दगी भर के लिये एक सम्बंध की हत्या कर दी.

कोई भी संगठन उसके सदस्यों के संगठित प्रयासों और  संतुष्टि के आधार पर ही लक्ष्य प्राप्त कर सकता हैं,इसके अभाव में लक्ष्य बहुत दूर की कोढ़ी नज़र आता हैं.भारतीय प्रशासन के द्धारा लक्ष्यों की प्राप्ति में दशकों खपा देनें का भी यही कारण हैं.


## निलम्बन का विकल्प क्या होना चाहियें?


#१.हमनें पश्चिम की गलत बातों का अंधानुकरण करनें में कोई कसर नहीं छोड़ी जबकि हमारें प्राचीन आदर्श तिरोहित कर दिये गये .इस सन्दर्भ में भारत के कई आदिवासी समाजों का उदाहरण देना चाहूँगा कि कैसें वहाँ कि पंचायत उनके समाज को संचालित करती हैं.

जब कभी आदिवासी समाज में कोई शादी ब्याह होता हैं और उनका ढ़ोली इस उत्सव पर शराब पीनें की वज़ह से ढ़ोल बजानें में असमर्थ हो जाता हैं,तो उत्सव में खलल पड़ता हैं.इस समस्या से निपट़नें के लियें पंचायत ने शादी संपन्न होनें तक ढ़ोली के शराब पीनें पर प्रतिबंध रहता हैं.

यदि ढ़ोली इस उत्सव के दोरान बाराती या घराती के साथ शराब का सेवन कर लेता हैं और ढ़ोल बजानें में असमर्थ हो जाता हैं,तो ढ़ोली को जाति पंचायत गाँव के प्रत्येक घर के सामनें कई महिनों तक ढ़ोल बजानें की सजा देती हैं,जिसें ढ़ोली को पूरा करना पड़ता हैं.और इस दोंरान शराब पीनें पर प्रतिबंध रहता हैं,ताकि ढ़ोल बजानें वाला शराब का आदि नहीं बनें.

यही बात भारतीय प्रशासन के लिये लागू की जा सकती हैं.यदि कर्मी या अधिकारी कहीं कम गंभीर प्रकृति की गलती करता हैं तो उसे उस गलती को सुधारनें के लियें संबधित क्षेत्र की प्रशिक्षण शाला में भेजा जा सकता हैं.

किसी सूदूर ग्रामीण अँचल की शाला में जहाँ शिक्षक नहीं हैं वहाँ कर्मी को बच्चों को पढ़ानें के लियें भेजा जा सकता हैं.

किसान के खेतों में हाथ बंटानें भेजा जा सकता हैं.

 शासन द्धारा संचालित योजनाओं की जानकारी देनें के लिये गाँव में  भेजा जा सकता हैं.जिसमें गाँव में निवास करनें की अनिवार्य शर्त हो.


नेतिक दशा उन्नत करनें के लियें जीवन प्रबंधन की कार्यशाला में भेजा जा सकता हैं.

प्रत्येक सरकारी कर्मचारी के लियें सैनिक सेवा अनिवार्य की जाना चाहियें ताकि इनमें देशभक्ति की भावना जागृत हो.

शासकीय सेवकों के वेतन में अंतर बहुत कम रखा जाना चाहियें, उदाहरण के लिये एक प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी को हमारें देश में औसतन 2.50 लाख मिलतें हैं,वही एक वरिष्ठ लिपिक को 50 हजार प्रतिमाह मिलतें हैं,जबकि यही लिपिक प्रमुख सचिव के बगल में बैठकर फाईल तैयार करता हैं.

वेतन का यह बड़ा अंतर ही पास बैठनें वालें लिपिक के मन में हीन भावना पैदा करता हैं,जिससे वह अनेतिक रास्तों का सहारा लेकर आगें बढ़नें की कोशिश करता हैं,और पकड़ में आनें पर निलम्बन का दंश झेलता हैं.

प्रत्येक कर्मचारी अधिकारी को अच्छा कार्य करनें पर  असीमित पदोन्नति के अवसर प्रदान करनें चाहियें.

कर्मचारी अधिकारी को उनकी रूचि के कार्य करनें को दियें जायें.

जिस प्रकार खेलों में हार जीत किसी एक व्यक्ति के योगदान की वज़ह से नहीं होती उसी प्रकार किसी विभागीय काम की सफलता असफलता में भी  किसी एक व्यक्ति का योगदान नहीं माना जा सकता तो फिर निलम्बन व्यक्तिगत क्यों ? 






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