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आम की खेती समस्याएँ और संभावनाँए [ mango crop ]

# 1.परिचय :::

आम की उन्नत प्रजाति
                            आम की उन्नत प्रजाति
आम को फलों का राजा कहा गया हैं.यह फल अत्यंत पोष्टिक और स्वाद में बेजोड़ होता है.जिसको कच्चे से लगाकर पकने तक बड़े चाव से भिन्न - भिन्न रूप में खाया जाता हैं.


भारतीय संस्कृति में आम इस कदर

रचा है कि हर सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रम में आम के पत्तों का उपयोग सजावट और पूजा में किया जाता है।

आम का वानस्पतिक नाम aam ka vansptik nam मैंगीफेरा इंडिका हैं.इसकी प्रजातियों में भिन्नता के कारण लगभग हर जलवायु और मिट्टी में इसकी खेती की जा सकती हैं.


# 2.आम की विभिन्न किस्में :::



आम की सेैंकड़ो किस्में प्रचलित हैं,जिसमें कुछ नियमित फल देनें वाली हैं,तो कुछ 2 साल में फल देती हैं.इनमें से कुछ के नाम इस प्रकार हैं.

# 3.नियमित फल देनें वाली :::


• आम्रपाली

• मल्लिका

• नीलम

• बैंगनपल्ली


# 4.एकान्तरिक फल देनें वाली :::



जो किस्में 1 वर्ष के अन्तराल में फल देती हैं,उन्हें एकान्तरिक किस्में कहतें हैं जैसें

• दशहरी

• रानीरमन्ना

• लंगड़ा

• चौंसा


• हापुस




# 5.आम का पौधा लगानें की विधि :::



आम के पौधें लगानें का सर्वोंत्तम समय जून - जुलाई रहता हैं,इसके लियें अप्रेल माह में 1.5 फीट़ चोड़ें और 1.5 फीट़ गहरे गड्डें 3 - 3 मीटर के अंतराल में खोद लें,एक माह तक इन गड्डों को खुला छोड़ दें तत्पश्चात जुलाई माह में पौधारोपण करतें समय गोबर खाद आधी मात्रा में मिट्टी के साथ मिलाकर पौधे के आसपास भर दें.ध्यान रखें


• पोलिथीन की थैली यदि पौधे के साथ हैं,तो उसे सावधानीपूर्वक काट़ कर अलग कर दें,तत्पश्चात गड्डें के बीचों बीच पौधा रख उसके आसपास मिट्टी गिरा दें.


• ध्यान रहें पौधे की सिंचाई शाम के वक्त ही करें.


• नये पौधे को बांस की टहनी से बांधकर सहारा दें.


• पौधे के आसपास की घास हटाकर मिट्टी की सतह हल्की हल्की गेंती से खोद दें.


• पौधे की एक से दो वर्ष तक हल्की छँटाई करतें रहें.



• यदि मिट्टी में दीमक की समस्या हो तो पौधे के आसपास 10 सेमी के छेद करके उसमें क्लोरोपायरीफास दवा 50 मिली प्रति 15 लीटर की दर से प्रति पौधा 250 ml छेद में भरकर छेद मिट्टी से बंद कर दें.

# 7.आम की प्रमुख समस्या एकान्तरिक फलन :::



भारत में आम की फसल प्रति दूसरें वर्ष आनें से किसान भाईयों को काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा हैं,इस विषय पर शोधपरांत स्पष्ट हुआ कि जिन पौधों में जिब्रेलिन जैसें उत्तेजक पदार्थों की मात्रा अधिक पाई गई उनमें पेड़ की वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती हैं फलस्वरूप फलन नही हो पाता  इसके लिये शोधकर्ताओं ने किसानों को कल्टार विधि की अनुशंसा की हैं.



# 8.कल्टार विधि :::



कल्टार 25% पेक्लोब्यूट्राझोल मुख्य तत्व वाला वृद्धि निरोधक हार्मोंन हैं,जो कि वर्ष में एक बार या दो वर्ष में उपयोग करने की अनुशंसा की जाती हैं.



इसके लियें पेड़ की प्रति एक वर्ष उम्र पर एक मिली पेक्लोब्यूट्राझाल आधा लीटर पानी में मिलाकर  10 सेमी के पतलें सरियों से निर्मित गड्डों में भर देतें हैं.इन गड्डों को मिट्टी से भरकर सिंचाई कर दी जाती हैं,ताकि दवा का शोषण जड़ों द्धारा कर लिया जावें.



कुल्टार विधि के प्रयोग का सही समय अक्टूबर नवम्बर के मध्य होता हैं.कुल्तार विधि का प्रयोग प्रत्येक वर्ष या पेड़ पर फलन की दशा देखकर किया जाना चाहियें.



# 9.आम के प्रमुख कीट़ व बीमारियाँ :::



# एन्थ्रोक्नोज :::



यह बीमारी फंफूद (कोलेटोट्राइकम) से पैदा होती हैं,जो फल तोड़ने के बाद  जब नये प्ररोह विकसित होतें हैं,तब होती हैं,इसके प्रभाव से नये प्ररोह नष्ट हो जातें हैं.

# उपचार


इस बीमारी से बचाव हेतू नीम तेल 100 ग्राम प्रति लीट़र पानी में मिलाकर नये प्ररोह बनते समय छिड़काव करना चाहियें, तत्पश्चात पन्द्रह बीस दिनों के अन्तराल पर पुन: इस घोल का छिड़काव करना चाहियें.
जब फल मक्का के दानें बराबर होतें हैं,तब भी इस घोल का छिड़काव करना चाहियें.

# आम का भुनगा :::



जब आम पर फूल आये हो तब इस बीमारी का प्रकोप आम पर होता हैं,इस बीमारी से बचाव हेतू जैविक कीट़नाशक का प्रयोग 100 ग्राम प्रति दस लीट़र पानी में मिलाकर करना चाहियें.

# बैक्टेरियल केंकर



यह रोग एक प्रकार के बैक्टेरिया जेन्थोमोनास मैंजिफेरी से होता हैं.

इसमें पत्तियों पर छोट़े अनियमित तथा कोणीय जलयुक्त घाव बनतें हैं.तथा पत्तीयाँ पीली होकर गिरनें लगती हैं.


# उपचार 



इस बीमारी से बचाव हेंतू काँपर फँफूदनाशक का प्रयोग नियमित अंतराल पर करना चाहियें, तथा आम की नियमित साफ सफाई करना चाहियें.



# पत्ती धब्बा रोग (अल्टनेर्या)




यह रोग भी फंफूद के कारण होता हैं,इसमें पत्तियाँ पर गोलाकार धब्बें बनतें हैं जो कि बाद में पूरी पत्ती पर फैल जातें हैं.बाद में यह पत्तियाँ असमय गिर जाती हैं.



#उपचार



रोगग्रस्त भाग को काटकर इकठ्ठा करलें और जला दें,रोग से बचाव हेतू काँपर फफंदनाश का छिड़काव करें.


# सफेद रतुआ या Powdering mildue


यह रोग भी फफूंद के कारण होता हैं,इस रोग में आम की पत्तियाँ, फूलों,फल और डंठलों पर सफेद पावड़र सा पदार्थ जम जाता हैं.

इस रोग से ग्रसित फल,फूल गिर जातें हैं.और पत्तियाँ बैंगनी - गुलाबी रंग की हो जाती हैं.

# उपचार


रोगी पौधें पर 5 किलों प्रति पौधे की दर से सल्फर पावड़र का छिड़काव करें.

फूल आनें पर कार्बेंडाजिम 0.1% या नीम तेल 500 मिली प्रति 5 लीटर पानी या ट्रायेडमार्फ 0.1% का छिड़काव करें.

# कुरचना रोग



यह रोग ग्राफ्टिंग वालें पौधों में होनें की संभावना अधिक होती हैं.इस रोग से संक्रमित पौधा अधिक शाखाएँ उत्पन्न करता हैं,फलस्वरूप पौधें की सीमित वृद्धि होती हैं.

# उपचार


इस रोग का प्रामाणिक उपचार अभी तक अनुपलब्ध हैं.यदि ग्राफ्टिंग के समय उत्तम किस्म के पौधें का चयन किया जायें तो रोग होनें की संभावना समाप्त की जा सकती हैं.

पौधे के संक्रमित भाग को काटकर जला देंना चाहियें.

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एकीकृत पोषक तत्व प्रबन्धन क्या हैं जानियें इस लिंक पर

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# 10.आम की सघन बागवानी :::



आम की सघन बागवानी से किसान अधिक उपज के साथ मुनाफा भी दुगना तिगुना कर सकतें हैं,इस विधि में एक हजार से डे़ढ़ हजार पौधे प्रति हेक्टेयर की दर से रोपे जातें हैं.सघन बागवानी से पेड़ की अनियत्रिंत वृद्धि पर भी विराम लगता हैं,और नियमित फलन प्राप्त होता हैं.

# 11.आम की छंटाई :::



सघन बागवानी में पेड़ की शाखाँए एक दूसरें से न उलझे और पेड़ बेहतर फल देता रहें,इस उद्देश्य से पेड़ की कमज़ोर टहनीयों और शाखाओं को काट देना चाहियें. इससे पेड़ों के बीच अन्तरवर्तीय फसलें जैसें हल्दी, अदरक ,प्याज,आलू आदि भी ली जा सकती हैं.

# 12.सिंचाई :::



नये पौधों के लिये टपक सिंचाई पद्धति सर्वोत्तम होती हैं,यदि यह पद्धति उपलब्ध नही हो तो गर्मीयों में प्रति सप्ताह और सर्दियों में पन्द्रह से बीस दिनों के अन्तराल पर पारपंरिक विधि से  सिंचाई करते रहना चाहियें.


# 13.संभावनाँए :::


भारत विश्व का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश हैं,भारत में उत्पादित आम गुणवत्ता,स्वाद और पौष्टिकता के मामलें में बेजोड़ होता हैं,यही कारण हैं,कि भारत में उत्पादित आमों की मांग लगातार अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में बनी हुई हैं.
भारत में वर्तमान में फलों के अन्तर्गत आनें वाले कुल क्षेत्रफल के 36% भाग पर आम की खेती की जाती हैं,इसमें भी उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश प्रमुख उत्पादक राज्य हैं.


म.प्र.में  नर्मदा, चम्बल, शिप्रा,बेतवा,आदि नदियों के किनारें वाला क्षेत्र अाम उत्पादन के दृष्टिकोण से असीम संभावनाओं वाले क्षेत्र हैं.इसके अलावा जो किसान आम की बागवानी करना चाहतें हैं,उनके लिये निम्न सुझाव हैं.



• किसान यदि बेहतर उपज और दाम देनें वाली किस्मों का चयन कर आम की खेती करें,तो कुछ ही सालों में भारी मुनाफा कमा सकता हैं.


• यदि आम की उपज के साथ इसके पोधें तैयार कर नर्सरी बना ली जायें तो पौधें की बिकवाली से भी लाभ कमाया जा सकता हैं.


• आम के बाग से निकलनें वालें पत्तों से कम्पोस्ट और वर्मी कम्पोस्ट़ बनाकर भी किसान आर्थिक लाभ हासिल कर सकतें हैं.इसके अलावा आम के बाग में मधुमक्खी पालन करनें से आम का फलन भी अच्छा होता हैं,और अतिरिक्त आमदानी भी मिलती हैं.


आम के इन फायदों से परिचित होनें के कारण ही शायद हमारें पूर्वजों ने कहा हैं "आम तो आम गुठलियों के भी दाम "



० कद्दू के औषधीय उपयोग



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