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शास्त्रो के अनुसार भोजन करने का तरीका कैसा होना चाहिए जिससे 100 साल जिन्दा रहें


शास्त्रो  के अनुसार भोजन करने का तरीका कैसा होना चाहिए जिससे 100 साल जिन्दा रहें  



आप जानतें हैं हमारें प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथों ने मनुष्य की आयु का निर्धारण सौ वर्ष माना हैं । प्राचीन काल में व्यक्ति का शतायु होना कोई अचरज की बात नही होती थी आखिर वे कौंन से खानपान के नियम थे जिनका पालन करने से व्यक्ति सौ साल की जिंदगी जीता था आईये जानतें हैं ---

शास्त्रों के अनुसार भोजन करने के नियम
 भोजन करने के नियम


भोजन कैसा होना चाहिये ?


तस्यसाद्धुण्यमुपदेक्ष्याम : उष्णमश्नीयादुष्णंहिभुज्यमानंस्वदतेभुक्तज्ञ्चाग्निमुदीय्र्यमुददीरयति। क्षिप्रज्चरांगच्छति वात ज्चानुलोमयति श्लेष्माणज्चपरिशोषयतितस्मादुष्णमश्नीयात्।।


भोजन कैसा होना चाहियें इसका उल्लेख शास्त्रों में बहुत विस्तारपूर्वक किया गया हैं और लिखा हैं कि भोजन सदैव गर्म और ताजा ही ग्रहण करना चाहियें ।

गर्म भोजन की स्वाद शक्ति बहुत ही उत्तम रहती हैं और इस आहार से  भूख बढ़कर आहार को शीघ्रता से पचा देती हैं । वैज्ञानिक रूप से देखा जाये तो भी गर्म भोजन समस्त प्रकार के हानिकारक कीटाणुओ से मुक्त होकर शीघ्रता से पचनें वाला माना गया हैं ।


गर्म भोजन करनें से पेट की वायु शरीर से बाहर निकल जाती हैं और कफ का शोषण हो जाता हैं , इस तरह शरीर निरोगी और चुस्त बना रहता हैं ।




स्निग्धमश्नीयात् ।स्निग्धंहिभुज्यमानंस्वदते।भुक्तश्चाग्निमुदीरयतिकषिप्रंजरांगच्छतिवातमनुलोमयतिदृढीकरोति।शरीरोपचयं बलाभिवृदधिश्चोपजनयति,वर्णप्रसादमपिचाभिनिवर्तयति।तस्मात् स्निग्धमश्नीयात्।।

भोजन का कुछ भाग आपके परिश्रमानुसार  चिकना और घृतयुक्त होना चाहियें । घृतयुक्त भोजन आपकी भूख को बढ़ाता हैं । और शरीर को ताकत प्रदान करता हैं ।

 
आधुनिक चिकित्सक आजकल यह कहतें हुये मिल जायेंगें की मनुष्य को घृतयुक्त पदार्थों का सेवन बिल्कुल  भी नही करना चाहियें किन्तु इस बात में थोड़ी भी सच्चाई  नही हैं ।

शास्त्र कहता हैं कि अपने परिश्रम की मात्रानुसार घृतयुक्त पदार्थों का सेवन बल,बुद्धि और शरीर के लिये आवश्यक हैं ।       


भोजन कितनी मात्रा में होना चाहियें ये बात हमारें आयुर्वेदाचार्य ५ हजार साल पूर्व बता गये थे आधुनिक डायटीशियन पाँच हजार वर्ष पूर्व लिखे गये इन विद्धानों के कथनों पर सिर्फ मोहर लगा रहे हैं एक जगह लिखा हैं।


मात्रावदश्नीयात्।मात्राव्रद्धिभुक्तं वातपित्तकफानप्रपीडयदायुरेवविवर्द्धयतिकेवलंसुखंसमयकपकवंविड्भूतंगदमनुपयरयेत्नचोषमाणुमुपहनतिअवयथशचपरिपाकमेति।तस्मानमात्रावदश्नीयात।।  

अर्थात नापतोल कर किया हुआ (अन्न,सलाद,दाल,सब्जी और पानी की संतुलित मात्रा)भोजन हमारें शरीर की तीनों धातुओं वात,पित्त और कफ को समान मात्रा में रखकर शरीर को निरोग रखता हैं  और आयु में वृद्धि करता हैं ।

सही परिणाम में किया हुआ भोजन शीघ्रता से पचकर शरीर से बाहर निकल जाता हैं और अमाशय खाली रहनें से गैस ,अपच ,खट्टी डकार जैसी बीमारीयाँ परेशान नही करती हैं ।


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भोजन कब करना चाहियें ?



भोजन कब करना चाहियें इस विषय पर शास्त्रों का मत हैं कि पहले का किया हुआ भोजन जब  पूर्ण रूप से पच जाये तभी नया भोजन  किया जाना चाहियें ।


यदि पहले किया हुआ भोजन नही पचा और पुन: भोजन कर लिया जाये तो पहले किये हुये भोजन का रस कुपित होकर शरीर में बीमारीयाँ उत्पन्न करता हैं ।


खुलकर भूख लगने पर भोजन करनें से ह्रदयघात की समस्या समाप्त हो जाती हैं । मल मूत्र समय पर निकलतें हैं जिससे शरीर की समस्त गतिविधि सूचारू रूप से चलती हैं ।


इष्टेदेशेश्नीयात्हैंहि देशेभुज्जोनोनानिष्टदेशजैर्मनोविघातकरेभार्वैमरनोविघातंप्राप्नोतितथेष्टै:सर्वोपकरणैस्तस्मादिष्टेदेशेतथेष्टसर्वोपकरणश्चाशनीयात्।।

अर्थात भोजन करनें वाला स्थान पूर्ण रूप से पवित्र होना चाहियें पूर्ण रूप से स्वच्छ स्थान पर भोजन करनें से रोगाणु भोजन को दूषित नही कर पाते हैं   और मनुष्य रोगरहित जीवन व्यतीत करता हुआ उत्तम आयु को प्राप्त करता हैं ।   


नातिदु्रतमश्यीनात।अतिदु्रतमं हि भुज्जानस्यउत्स्नेहमवसदनंभोजनस्याप्रतिष्ठानम् ।भोज्यदोषसादगुण्योपलब्धिनियता।तस्मान्नातिदु्रमश्नीयात्।।

भोजन यथोचित रीति से धिरे धिरे चबाकर किया जाना चाहियें यथोचित रीति से चबाकर किये गये भोजन में लार के माध्यम से समस्त पाचक रस मिलकर भोजन को पूर्ण रूप से पचा देते हैं । जबकि जल्दी - जल्दी ग्रहण किये हुये भोजन में पाचक रस नही मिल पातें और यह भोजन अनेक दोषों को उत्पन्न करता हैं ।

अपचे हुये अन्न से लकवा ,शरीर में भारीपन और मस्तिष्क से सम्बधित बीमारी होती हैं ।


   
 नातिविलम्बितमश्नीयात्।अतिविलम्बितंहिभुज्जानोनतृप्तिमधिगच्छतिबहुभुंक्तेशीतीभवतिचाहारजातंविषमपाकश्चभवति तस्मान्नातिविलम्बितमश्नीयात् 

बहुत विलम्ब से किया हुआ भोजन अर्थात भूख लगने के बहुत बाद से किया गया भोजन शरीर में विषम धातु उत्पन्न कर वात पित्त और कफ को असंतुलित कर देता हैं । फलस्वरूप मनुष्य रोग से ग्रसित  होकर जल्दी मृत्यु को प्राप्त हो जाता हैं।    

बोलकर हँसते हुये और खड़े - खड़े भोजन ग्रहण कदापि नही करना चाहियें क्योंकि ऐसा करनें से व्यक्ति एकाग्र होकर भोजन नही कर पायेगा शास्त्र मे इस विषय में लिखा हैं ।

अजल्पन्नहसन्तन्मनाभुज्जीत।जल्पतोहसतोनयमनसोवाभुज्जानस्यतएवहिदोषाभवन्तियएवातिद्रुतमश्नत: ।। तस्महिदजल्पन्नहसंस्तन्मनाभुज्जीत।।

मनुष्य को अपने शरीर की प्रकृति को देखकर भोजन का चयन करना चाहियें। उदाहरण के लिये यदि कफ प्रकृति का मनुष्य सर्दीयों  में आईस्क्रीम या अन्य ठंड़े पदार्थों का सेवन करेगा तो उसका स्वास्थ्य बिगड़ना तय हैं ।

कफ प्रकृति का मनुष्य यदि सर्दीयों में गर्म पदार्थों का सेवन करेगा तो यह उसके शरीर की धातुओं को साम्य करेगा और व्यक्ति निरोग रहकर लम्बी उम्र प्राप्त करेगा ।

इस विषय में शास्त्र कहता हैं


आत्मानमभिसमीक्ष्यभुज्जीतसम्यक्।इदंममोपशेतेइदंनोपशेतेइति।विदितंहिअस्यआत्मनआत्मसात्म्यंभवति।तस्मादात्मनात्मनमभिसमीक्ष्यभुज्जीतस्मयमगिति।।

अर्थात आत्मा को प्रिय लगने वाला भोजन और शरीर के बल अनुसार किया हुआ भोजन करनें वाला मनुष्य शरीर संबधी उत्तम सुखो को भोगता हैं ।  इसलिये मनुष्य को अपनी भूख की इच्छा को जानकर भोजन करना चाहियें ऐसा नही होना चाहियें की व्यक्ति को भूख एक रोटी की हो ओर वह दस - दस रोटी खा रहा हो ।
      



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