सोमवार, 24 जून 2019

आयुर्वैदिक तेल और उनके फायदे



1 महाभृंगराज तेल : सिर पर इसकी धीरे-धीरे मालिश करने पर यह बालों का गिरना बंद करता है और गंजापन समाप्त कर बालों को बढ़ाने में मदद करता है। 

असमय सफेद हुए बालों को काला करने के साथ ही यह सिर की गर्मी को शांत कर माथे को ठंडा करता है।

2  नारायण तेल : सब प्रकार के वात रोग, पक्षघात (लकवा), हनुस्म्भ, कब्ज, बहरापन, गतिभंग, कमर का दर्द, अंत्रवृद्धि, पार्श्व शूल, रीढ़ की हड्डी का दर्द, गात्र शोथ, इन्द्रिय ध्वंस, वीर्य क्षय, ज्वर क्षय, दांतों के रोग, पंगुता आदि के लिए यह एक प्रसिद्ध औषधि है। 

दो-तीन बार पूरे शरीर में मालिश करना एवं 1 से 3 ग्राम की मात्रा में दूध के साथ पीना फायदेमंद है।

3 चंदनबला लाशादि तेल : इसके प्रयोग से शरीर की सातों धातुओं में वृद्धि होती है एवं वात विकार नष्ट होते हैं। 

कास, श्वास, क्षय, शारीरिक क्षीणता, दाह, रक्तपित्त, खुजली, शिररोग, नेत्रदाह, सूजन, पांडू व पुराने ज्वर में यह बेहद उपयोगी है। 

दुबले-पतले शरीर को पुष्ट करता है एवं बच्चों के लिए सूखा रोग में लाभकारी है। सुबह व रात्रि को इसकी मालिश करना लाभकारी है।                        
4 इरमेदादि तेल : यह तेल दांत के रोगों में खास तौर से लाभदायक। मसूढ़ों के रोग, मुंह से दुर्गंध आना, जीभ, तालू व होठों के रोगों में भी यह बेहद लाभप्रद है।

 मुख के रोगों में इसे मुंह में भरना या दिन में तीन-चार बार तीली से लगाना चाहिए।

5 काशीसादि तेल : यह तेल नासूर शोधक तथा रोपण है। इसके लगाने से बवासीर के मस्से नष्ट हो जाते हैं साथ ही यह नाड़ी नासूर एवं दूषित नासूर के उपचार हेतु लाभकारी है। 

बवासीर होने पर दिन में तीन-चार बार संबंधित स्थान पर लगाना अथवा रूई भिगोकर रखना लाभदायक है।

6 जात्यादि तेल : नाड़ी व्रण (नासूर), जख्म व फोड़े के जख्म को भरता है। कटने या जलने से पैदा होने वाले घावों के व्रणोपचार के लिए यह उत्तम है। 

जख्म को साफ करके इस तेल को लगाना या तेल में कपड़ा भिगोकर बांधना फायदेमंद होता है। 

7 गुडुच्यादि तेल : वात रक्त, कुष्ठ रोग, नाड़ी व्रण, विस्फोट, विसर्प व पाद दाहा नामक बीमारियों के लिए यह तेल उपयुक्त है। एग्जिमा या छाजन होने पर इस तेल का प्रयोग बेहद लाभकारी होता है।

8 महालाक्षादि तेल : यह तेल सभी प्रकार के ज्वर अर्थात बुखार, विषम ज्वर, जीर्ण ज्वर व तपेदिक का नाश करने में सहायक है।

 कास, श्वास, प्रतिशाय (जुकाम), हाथ-पैरों की जलन, पसीने की दुर्गंध, शरीर का टूटना, हड्डी के दर्द, पसली के दर्द एवं वात रोगों को यह नष्ट करता है। 

यह बल, वीर्य कांति बढ़ाकर शरीर को पुष्ट करता है। सुबह व रात्रि को इसककी मालिश करना फायदेमंद है।

9 पंचगुण तेल : संधिवात एवं शरीर के किसी भी अंग में दर्द होने पर यह तेल उपयोगी है। 

कर्णशूल होने पर कान में बूंदें डालना लाभदायक होगा। व्रण उपचार में इसका एक फाहा भिगोकर संबंधित स्थान पर बांधे।

10 षडबिंदु तेल : इस तेल के प्रयोग से गले के ऊपर के रोग जैसे सिर दर्द, सर्दी-जुकाम, नजला, पीनस आदि में लाभ होता है। 

दिन में दो-तीन बार 5-6 बूंद नाक में डालकर इसे सूंघना चाहिए।

11 महाविषगर्भ तेल : यह सभी प्रकार के वात रोगों की प्रसिद्ध औषधि। 

जोड़ों की सूजन समस्त शरीर में दर्द, गठिया, हाथ-पांव का रह जाना, लकवा, कंपन्न, आधा सीसी, शरीर शून्य हो जाना, नजला, कर्णनाद, गण्डमाला आदि रोगों में सुबह व रात्रि में इस तेल से मालिश करें।.                                       
12 महामरिचादि तेल : इसके प्रयोग से खाज, खुजली, कुष्ठरोग, मुंह के दाग व झाई, दाद, बिवाई आदि चर्म रोगों और रक्त के रोगों में लाभ होता है। एवं इस तेल से त्वचा के काले व नीले दाग नष्ट होते हैं व त्वचा स्वच्छ होती है।



० नीम के औषधीय उपयोग



० पंचनिम्ब चूर्ण



० काला धतूरा के फायदे और नुकसान

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