सोमवार, 30 जनवरी 2017

GAJAR GHAS गाजर घास का उन्मूलन कैसे करें

खरपतवार
 गाजरघास
गाजर घास का वानस्पतिक नाम पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस [ parthenium hysterophorus ] हैं.यह एस्टेरेसी कुल का सदस्य हैं.



इसकी पत्तियाँ गाजर के समान होनें के कारण इसे गाजर घास के नाम से जाना जाता हैं.इसे अन्य कई नामों से जाना जाता हैं,जैसे गजरी, गांधी बूटी,अमेरिकन फीवर फ्यू .

इसके फूल सफेद रंग के होनें से इसे चटक चांदनी भी कहा जाता हैं.यह मूल रूप से अमेरिका और वेस्टइंडीज का पौधा हैं,जो पूरे विश्व में आयातित पदार्थों के माध्यम से विश्व में फैल गया.

भारत में यह पौधा लगभग 35 लाख हेक्टेयर में अनचाहे रूप से उगा हुआ हैं ।

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मनुष्यों पर गाजर घास के हानिकारक प्रभाव 

गाजर घास के बहुत ही हानिकारक प्रभाव मानव स्वास्थ पर देखे गये हैं.इसमें घातक एलिलो रसायन जैसें एम्ब्रोसीन ,पार्थेनिन , कोरोनोपीलिन,फेरुलिक अम्ल,वेनिलीक अम्ल, कैफीन अम्ल ,पेरा - हाइड्राँक्सी बेन्जोइक अम्ल, तथा पेरा - काउमेरिक अम्ल पाये जातें हैं.ये घातक रसायन इसके सम्पर्क में आनें व्यक्ति वालें व्यक्तियों की त्वचा में खुजली ,एलर्जी , एक्जिमा जैसे घातक रोग पैदा करते हैं.

इसमें पाया जानें वाला पार्थेनिन मनुष्य की तंत्रिका     तंत्र को को प्रभावित कर डिमेंशिया,डिप्रेशन,अवसाद,सिरदर्द ,माइग्रेन जैसे रोग पैदा करता हैं.

गाजर घास के फूलो से निकलनें वाले परागकण श्वास के माध्यम से फेफडों में जाकर अस्थमा जैसे रोग पैदा करते हैं.

गाजर घास के बहुतायत क्षेत्रों के आसपास रहनें वालें व्यक्तियों को भूख की कमी ,आँखों से पानी आना,आँखों में खुजली होना जैसी समस्या पायी जाती हैं.
यदि गलती से इसकी पत्तियाँ मुहँ ,पेट में चली जाती हैं,तो मुहँ  और आंत में छाले  हो सकते हैं.

इसमें एक प्रकार का कैफीन अम्ल पाया जाता हैं,जो नींद नही आनें की समस्या पैदा कर सकता हैं.

गाजर घास प्रभावित जलसत्रोत का जल पीनें से डायरिया,पेचिस,और किड़नी से संबधित घातक रोग उभरतें हैं.

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पशुओं के स्वास्थ पर प्रभाव

गाजर घास के विषेले प्रभाव से मनुष्य ही नही बल्कि पशु भी बहुत हानिकारक प्रभाव झेलतें हैं.यदि दुधारू पशु गाजर घास खा लेते हैं,तो उनके दूध का स्वाद कड़वा होकर मनुष्य के लिये बहुत हानिकारक हो जाता हैं,जिससे पेट संबधित बीमारी पनपती हैं.
गाजर घास के सेवन से पशुओं की जीभ पर छाले,आंतों पर छाले हो जातें हैं.

जैवविविधता पर प्रभाव 

गाजर घास को पर्यावरणविद "पारिस्थितिक आतंकवादी " कहते हैं,क्योंकि यह एलिलो रसायन उत्सर्जित कर अपने आसपास के पौधो की वृद्धि को रोक देता हैं.और स्वंय फलता फूलता रहता हैं. इस पौधे पर विपरीत मौसम का कोई विशेष प्रभाव नही पड़ता हैं.
गाजर घास के अत्यधिक फैलाव की वजह से पारम्परिक भारतीय जड़ी-बूटीयों का उन्मूलन हो रहा हैं.

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गाजर घास का उन्मूलन

गाजर घास को नष्ट करना बड़ी महत्वपूर्ण चुनोतीं बन चुकी हैं,क्योंकि यह आसानी से नष्ट नहीं होता हैं,यदि पौधा 30 - 35 दिनों का हो गया तो यह अपना जीवनचक्र पूर्ण करता ही हैं.इसको नष्ट करनें की कुछ महत्वपूर्ण विधियाँ जानकारों द्धारा बताई गई जिसके अनुसार पौधे की शुरआती अवस्था में 2- 4 D नामक खरपतवारनाशी का छिड़काव इस पर कर देना चाहियें.

इसके अलावा एक अन्य विधि हैं,जिसमें गाजर घास को उखाड़कर गोबर के साथ सड़नें के लिये छोड़ दिया जाता हैं,व एक वर्ष पश्चात इस सड़ी हुई खाद का खेतो में प्रयोग किया जा सकता हैं.

इस सड़ी हुई खाद में नाइट्रोजन 2.5 %,फाँस्फोरस 1.38%,एँव पोटेशियम 1.29% प्रतिशत पाया जाता हैं,जो किसी भी फसल के लिये महत्वपूर्ण खाद हैं.

यदि गाजर घास में बीज आ गये हो तो इस पौधे से खाद नही बनाना चाहियें बल्कि इस पौधे को उखाड़कर बायोगैस संयत्र में ड़ाल देना चाहियें. इस प्रकार की विधि से पर्याप्त मात्रा में बायोगैस मिलती हैं।

एक अन्य विधि गेंदा और चकोडा से इसको विस्थापित करने से सम्बंधित हैं यदि गेंदा और चकोडा के बीजों को बरसात से पूर्व जहाँ गाजरघास होती हैं वहाँ छिड़क दिया जाये तो ये दोनों पौधें बहुत तेजी से बढ़कर गाजरघास को विस्थापित कर देते हैं ।

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बीटल कीट


सन 1989 में मेक्सिको से एक कीट भारत सरकार ने आयात किया था । जिसका नाम बीटल कीट हैं । एक वयस्क बीटल कीट 1 से डेढ़ माह में गाजरघास के एक पौधे को खा जाता हैं । इस कीट की एक महत्वपूर्ण विशेषता हैं की यह सिर्फ गाजरघास को ही खाता हैं । दूसरी फसलों को इससे कोई नुकसान नहीं होता हैं ।


गाजर घास के प्रकोप से बचने हेतू सावधानियाँ 

• गाजर घास को नंगे हाथों से नही उखाड़ना चाहियें.

• बच्चों द्धारा गाजर घास वाली जगह पर खेलने पर गाजर घास का स्पर्श शरीर पर न हो ऐसी सावधानी रखनी चाहियें.

• घरो के आसपास गाजर घास होनें पर इसका उचित निस्तारण अवश्य करना चाहियें.

• इस पौधे को घर पर किसी भी रूप में नही लाना चाहियें.


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