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चने की खेती और उपयोग [CHANE KI KHETI AUR UPYOG]

CHANE KI KHETI
भारत एक कृषि प्रधान राष्ट्र  हैं,जहाँ लगभग 72% ग्रामीण आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती किसानी से जुड़ी हुई हैं.किन्तु आज देश का 80 फीसदी किसान कोई अन्य रोजगार मिलनें पर कृषि कार्य छोड़नें को राजी बैठा हैं,एक ज़मानें में खेती के बारें में कई किवंदंतिया प्रचलित थी जैसें
 
 चने की फसल
उत्तम खेती ,मध्यम व्यापार और निकृष्ट चाकरी
किन्तु आज खेती को सबसे निकृष्ट माना जाता हैं.क्योंकि खेती आज जीवन निर्वाह जीतना भी पैसा परिवार को नही दे पाती उल्टा खेती करने वाला किसान खेती करतें - करतें इतना कर्जदार हो जाता हैं,कि अंत में सिर्फ आत्महत्या ही उसके अधिकार में रह जाती हैं,किसानों की आत्महत्या में बड़ा योगदान घट़िया बीजों का भी रहता हैं,यदि किसान थोड़ी सावधानी रखकर उचित समय पर उचित बीज और परिस्थितियों के अनुसार खेती करें तो निश्चित रूप से मुनाफा कमा सकता हैं,इन्ही परिस्थितियों के अनुसार आज हम चने की खेती और उसके बीजों के विषय में किसानों को जागरूक करना चाहतें हैं.

जल प्रबंधन के बारें में विस्तारपूर्वक जानियें

#.चने का परिचय :::


चना रबी की फसल हैं,जो अक्टूबर- नवम्बर माह में बोया जाता हैं.यह सूखा प्रभावित क्षेत्रों में आसानी से उगती हैं.यह दलहनी फसलों में सर्वाधिक बोई और खायी जानें वाली फसलों में से एक हैं.

#.चने की  उन्नतशील किस्में :::


#1.PUSA - 327 


यह भारतीय कृषि और अनुसंधान परिषद द्धारा विकसित किस्म हैं,जो सम्पूर्ण भारतवर्ष में बुवाई के लिये अनुशंसित हैं.इसके दाने बारीक,हल्के पीले होते हैं,और यह देशी किस्म की प्रजाति हैं.यह प्रजाति देर से बोने पर भी उपयुक्त पैदावार देती हैं.क्योंकि इसकी जड़े गहराई में जाती हैं,जिससे सूखा के प्रति प्रतिरोधकता इस प्रजाति में होती हैं.

#पैदावार :::

18 से 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

175 से 180 दिन

#2.PUSA - 362


यह किस्म राजस्थान,उत्तरप्रदेश,मध्यप्रदेश सम्पूर्ण उत्तर भारत के लिये अनुशंसित की गई हैं.इसके दानें मध्यम आकार के होतें हैं,और इसकी जड़ गलन के प्रति प्रतिरोधी होती हैं.

#पैदावार :::

25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

185 से 190 दिन

CHANE KI KHETI

#3.PUSA - 391 

यह मध्यप्रदेश,राजस्थान उत्तरी महाराष्ट्र के लिये अनुशंसित किस्म हैं,जिसके दानें मध्यम आकार के और हल्के भूरे किस्म के होतें हैं.यह असिचिंत क्षेत्रों के लिये उपयुक्त प्रकार की किस्म मानी जाती हैं.

#पैदावार:::

20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि:::

185 से 190 दिवस

#4.PUSA - 1003 

यह काबुली प्रजाति का चना हैं,जो जो उकठा रोग के प्रति प्रतिरोधक दर्शाता हैं,इसकी जड़ी अधिक पानी में भी गलती नही हैं.यह सम्पूर्ण भारत के लिये अनुशंसित किस्म हैं.

#पैदावार :::

20 से 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
 

#अवधि :::

180 से 185 दिन

#5. B.G.D - 72 

यह मध्य भारत जैसें मध्यप्रदेश, पूर्वी राजस्थान, उत्तरी महाराष्ट्र,दक्षिणी उत्तर प्रदेश के लिये अनुशंसित किस्म हैं.इसके दानें हल्के भूरे किस्म के होतें हैं.यह सूखा प्रतिरोधी किस्म हैं.

#पैदावार :::

22 से 28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

170 से 180 दिन

#6.B.G.D.- 128

यह सिंचाई वाले क्षेत्रों के लिये सर्वाधिक उपयुक्त किस्म हैं,जो कि मध्य भारत के लिये अनुशंसित की जाती हैं.

#पैदावार:::

25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

180 से 185 दिन

#7.PUSA - 1053

इस प्रजाति के दानें मोट़े काबुली प्रकार के होतें हैं.यह सिंचित क्षेत्रों के लिये अति उत्तम प्रजाति हैं.इसकी जड़े उकठा और गलन के प्रति प्रतिरोधक होती हैं.यह उत्तर भारत के लिये अनुशंसित की गई हैं.

#पैदावार :::

20 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

180 से 185 दिन.

#8.PUSA - 1088 

बीमारींयों के प्रति प्रतिरोधी किस्म हैं.यह काबुली प्रजाति की किस्म हैं,इसके दानें सुड़ोल होकर मोटे और चमकीले होते हैं.इसकी बुवाई की अनुशंसा उत्तरी भारत में की जाती हैं.

#पैदावार:::

25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि:::

180 से 185 दिन

#9.B.G.-1105

यह दिल्ली ,हरियाणा के लिये अनुशंसित किस्म हैं,जो देर से बुवाई के लिये उपयुक्त मानी गई हैं.इसके दाने मोटे काबुली प्रकार के होतें हैं.

#पैदावार :::

25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

180 से 185 दिन.

#10.B.G. - 1103 

यह किस्म भी देर से बुवाई के लिये उपयुक्त मानी जाती हैं.तथा दिल्ली तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में बुवाई के लिये उपयुक्त हैं.

#पैदावार :::

20 से 24 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

180 से 185 दिन.

#11.PUSA - 256

सिंचाई की सुविधा वालें क्षेत्रों हेतू अत्यन्त उन्नत किस्म हैं.यह खानें और पकवान हेतू अति आदर्श किस्म हैं.यह सम्पूर्ण भारत के लिये अनुशंसित की गई हैं.

#पैदावार :::

25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

180 से 185 दिन.


#12.वैभव 

यह किस्म सुखा और तापमान निरोधक किस्म हैं । इसका दाना बड़ा व कत्थई रंग का होता हैं।

#पैदावार :::

15 क्विंटल प्रति हेक्टयर (देर से बोने पर 13 क्विंटल तक) तक उपज देती हैं ।

#अवधि :::

110 से 115 दिन 

#13. जे जी 74 


इस किस्म का दाना मध्यम आकार का होता हैं ।

# पैदावार :::

15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टयर

# अवधि :::

110 से 115 दिन

#14.उज्जैन 21 :::


यह किस्म मध्यप्रदेश के पश्चिमी भाग के लिये अनुसंशित हैं। इसमें लगभग 18% प्रोटीन पाया जाता हैं।


# पैदावार :::

08 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टयर

# अवधि :::


115 दिन 


#15.राधे :::


# पैदावार :::

13 से 17 क्विंटल

अवधि :::

120 से 125 दिन 


#16.जे जी 315 :::

पछेती बुवाई हेतू यह उपयुक्त किस्म मानी गयी हैं ।इसका दाना बादामी रंग का होता हैं।

# पैदावार :::

12 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टयर

# अवधि :::


120 से 125 दिन 

#17.जे जी 11 :::


यह रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली किस्म हैं ।इसके दाने कोणीय और बड़े आकर के होते हैं ।

# पैदावार :::

15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टयर

# अवधि :::


15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#18.जी जे 130 :::

इसका पोधा कम  फैलाव वाला होता हैं ।

# पैदावार :::

18 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

# अवधि :::

110 दिन

# BG 391 :::

यह देशी चने की किस्म हैं।इसका दाना ठोस और मध्यम होता हैं।

# पैदावार :::

14 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टयर

# अवधि :::

110 से 115 दिन

# विशाल :::

चने की यह किस्म किसानों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हैं। क्योंकि इसका दाना बड़ा और उच्च गुणवत्ता वाला होता हैं ।  साथ ही अधिक ऊपज देने वाला होता हैं । इसके दानों से प्राप्त दाल सर्वाधिक स्वादिष्ट होती हैं।

# पैदावार :::

30 से 35 क्विंटल प्रति हेक्टयर 

#अवधि :::

110 से 115 दिन

# जे ए के आई - 9218 :::

यह किस्म उच्च गुणवत्ता के साथ उच्च अपने बड़े दानों के लिये प्रसिद्ध हैं ।

# पैदावार :::

15 से 20 क्विंटल

# अवधि :::

110 से 115 दिन

# काक :::




#चने की खेती के लिये उपयुक्त जलवायु :::

चना 60 से 90 सेमी.वार्षिक वर्षा वाले क्षत्रों में आसानी से उगाया जाता हैं.भारत में चनें की अधिकांश खेती वर्षा के पश्चात की सुरक्षित नमी पर की जाती हैं.अधिक सर्दी और पाले कारण चने की पैदावार और अवधि प्रभावित होती हैं.

• चने की खेती के लिये उपयुक्त भूमि :::

हल्की से भारी दोमट मिट्टी चने की खेती के लिये उपयुक्त मानी जाती हैं.यदि मिट्टी भारी ,अधिक उपजाऊ होती हैं,तो पौधे की वानस्पतिक बढ़वार अधिक होती हैं,फलस्वरूप उत्पादन प्रभावित होता हैं.क्षारीय और लवणीय भूमि में चना पैदा करने से पूर्व भूमि को उपचारित करना चाहियें.चना ऐसी भूमि मे अधिक पैदा होता हैं,जो कल्टिवेटर से हांका जाता हैं.रोटावेटर से भूमि समतल करने पर चने की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं.

• चने की बुवाई का उपयुक्त समय :::

राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश सहित सम्पूर्ण मध्य भारत में चना अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में जब दिन का औसत तापमान 25 से 28 डिग्री सेल्सियस हो बोना उचित माना जाता हैं.जबकि जहाँ सिचांई के पर्याप्त साधन हो वहाँ इसकी बुवाई नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक की जा सकती हैं.

• बीज :::

अगेती बुवाई के लिये प्रति हेक्टेयर 70 - 80 कि.ग्रा.चना जबकि पछेती बुवाई के लिये 90 से 100 कि.ग्रा.चना बोना चाहिये.

• बीजोपचार :::

बीज बोने से पूर्व उपचारित करना उतना ही आवश्यक हैं,जितना भोजन करनें से पहले हाथ धोना.यदि किसान भाई बीज उपचारित नही करेंगें तो इसका उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा फलस्वरूप किसान को आर्थिक क्षति होगी.

चने को गलन व उकठा रोग से बचानें हेतू कार्बेडिजेम अथवा थाइरम से उपचारित करना चाहियें.ये कवकनाशी हैं,और 2 ग्राम प्रति किलो की दर से इन्हे बीज मे मिलातें हैं.
राइजोबियम से बीज उपचारित करनें से पौधे द्धारा वायुमंड़लीय नाइट्रोजन एकत्रीकरण प्रक्रिया तेज हो जाती हैं,जिससे उत्पादन अधिक होता हैं,इस हेतू दो 200 ग्राम प्रति हेक्टेयर राइजोबियम पर्याप्त होता हैं.

राइजोबियम से बीज उपचार हेतू एक लीटर पानी में 150 ग्राम गुड़ और तीन ग्राम गोंद मिलाकर उबाला जाता हैं,इसके पश्चात घोल को ठंडा कर इसमें राइजोबियम जीवाणु मिलाकर इसे बीज पर छिड़क दे.छांव में बीज सुखाकर बुवाई करें.इस विधि से 30% उत्पादन अधिक लिया जा सकता हैं.

• बुवाई :::

चने की बुवाई हल या सीडड्रील से करनी चाहियें. पंक्ति से पंक्ति के मध्य की दूरी 30 सेमी. तथा गहराई सिंचित क्षेत्रों 8 से 10 सेमी.तथा असिंचित क्षेत्रों में 5 से 7 सेमी.होनी चाहियें.

बीज बुवाई के समय पर्याप्त मात्रा मे नमी होना आवश्यक हैं.जिससे बीज का अंकुरण जल्दी हो सकें.बुवाई पूरब से पश्चिम दिशा की ओर होनी चाहिये जिससे पर्याप्त मात्रा में सूर्य प्रकाश पोधें को मिलता रहें.

• उर्वरक प्रबंधन :::

चने की बेहतर पैदावार प्राप्त करने के लिये मिट्टी परीक्षण उपरांत खाद और उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिये.

गोबर की खाद का प्रयोग 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिये और इसे अच्छी तरह खेत में मिलाकर बुवाई करनी चाहियें.

चूंकि चना दलहनी फसल हैं,अत: वायुमंड़लीय नाइट्रोजन का स्थरिकरण करती हैं,किन्तु मृदा का स्थरीकरण बुवाई के 20 दिनों के बाद शुरू होता हैं,अत: शुरूआत की बढ़वार के लिये 20 किलो ग्राम यूरिया और 50 किलो ग्राम फास्फोरस का प्रयोग खेत तैयार करतें वक्त करना चाहियें.

कुछ सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग कर चने की पैदावार कई गुना बढ़ाई जा सकती हैं,जैसे गंधक के उपयोग से फसल की गुणवत्ता के साथ उत्पादन पर सकारात्मक असर पड़ता हैं.

क्लोरोसिस नामक रोग लोह तत्व की कमी से होता हैं,जिससे नई पत्तियाँ पीली पढ़कर सूख जाती हैं,और पौधे की वृद्धि रूक जाती हैं.इस प्रकार की समस्या होनें पर फेरस सल्फेट 5 ग्राम 1 लीटर पानी की दर से फसलों पर छिड़काव करें.

• सिंचाई 

चना वैसे तो असिंचित क्षेत्र में अधिकांशत: बोया जाता हैं,किन्तु चने की मांग बढ़नें , नयी - नयी किस्मों के आ जानें व इन किस्मों से बेहतर उत्पादन देने की वज़ह से सिंचित क्षेत्रों में भी चने का बहुत उत्पादन होने लगा हैं.

चने की उपज बढ़ाने हेतू दो बार सिंचाई की आवश्यकता पड़ती हैं,प्रथम बार बोवाई के 45 दिन बाद जब फूल नही आये हो तथा दूसरी बार पौधे में फलियाँ बेठने पर इस विधि से सिंचाई करनें पर बीमारी भी बहुत कम चने को प्रभावित करती हैं.

यदि सिंचाई की व्यवस्था एक ही बार हो तो बुवाई के 60 दिन बाद सिंचाई करनी चाहियें.
यदि असिंचित क्षेत्रों में चने की फसल लेनी हैं,तो खरीफ फसल के तुरंत पश्चात खेत मे नमी देखकर फसल बोनी चाहिये.

• चने मे खरपतवार प्रबंधन

चने में पाये जानें वाले खरपतवार के नियत्रंण हेतू समय - समय पर निराई - गुडाई करते रहना चाहिये जिससे की भूमि में वायु संचार बेहतर तरीके से हो.

यदि रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण करना हो तो 1 kg सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर के हिसाब से पेंड़ीमेथालिन {30 E.C.} को 650 लीटर पानी मे घोलकर बुवाई के तुरंत बाद परन्तु अंकुरण से पूर्व छिटकाव करें.

फ्लूक्लोरोलिन {45 E.C.} 1 kg सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर सतही मिट्टी पर छिडकाव करे तत्पश्चात बोवनी करें.

• चने के प्रमुख कीट 


चने की फसल मे अनेक प्रकार के कीट नुकसान पँहुचाते हैं जैसे :

• कटुवा 

यह कीट चने के उगते पौधो को काटकर जमीन पर गिरा देता हैं, जिससे किसान भाईयों को काफी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता हैं.

• बचाव 

1.कटुवा से बचाव हेतू किसान भाई गर्मीयों मे खेत में हल से गहरी जुताई करें. 
2.सरसो,गेँहू और अलसी को सह - फसली रूप में चने के साथ बोये.
3.फसल चक्र अपनायें.
4.रासायनिक प्रबंधन हेतू 25 kg डाइक्लोरोफोन 5% प्रति हेक्टेयर की दर से शाम के समय फसल पर बुरकाव करें.

• दीमक 

खडी फसल में दीमक का प्रकोप अधिक देखनें मे आता हैं,जिसे किसान नजरअन्दाज अधिक करतें हैं,फलस्वरूप फसल नष्ट हो जाती हैं.क्योंकि दीमक सीधे फसल की जड़़ पर हमला कर उसे सूखा देती हैं.

• बचाव

1.गर्मीयों में गहरी जुताई आवश्यक रूप से करनी चाहियें जिससे दीमक के बिल नष्ट हो जावें.
2.खडी फसल में दीमक का प्रकोप होनें पर चार लीटर क्लोरोपाईरोफास (20 E.C.) प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचाई के पानी के साथ करें.

० कद्दू के औषधीय उपयोग

• फली छेदक कीट

यह कीट प्रारंभ मे पत्तियाँ को खाता हैं,पश्चात फली आनें पर फली को खाकर उसे नष्ट कर देता हैं.

• बचाव

इसका निंयत्रण करनें के लिये फलियाँ बनते समय 1.25 लीटर एंडोसल्फान (35 EC) प्रति हेक्टेयर की दर से घोल बनाकर छिड़कना चाहियें.

• चने की प्रमुख बीमारी


• उकठा 

इस बीमारी में पौधे की जड़ सड़ जाती हैं,तथा धिरें - धिरें सम्पूर्ण पौधा पीला पड़कर नष्ट हो जाता हैं.यह बीमारी फसल उगने के 15 - 20 दिनों बाद होती हैं.

• बचाव

1.बीजों को उपचारित करनें के पश्चात ही बोना चाहियें.
2.फसल चक्र का पालन करें अर्थात बार - बार एक ही खेत मे एक ही फसल बोने की बजाय बदलकर फसल बोना चाहिये. सरसो व गेंहू बोकर इस बीमारी से बचा जा सकता हैं.
3.बीमारी से बचाव के लिये अगेती बुवाई न करें.

• अंगमारी 

यह बीज से फैलने वाली बीमारी हैं.इस बीमारी में पत्तियों, फूल,तने, और फलियों पर गोल ,छोटे - छोटे भूरे रंग के चकते बन जातें हैंं.जिससे फूल ,पत्तियाँ और फलियाँ सूखकर गिर जातें हैं.

• बचाव

1.मेंकोजेब के 0.2 % घोल का छिड़काव करें.
2.बीजो की बुवाई से पूर्व कैप्टान 3 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें.

• पाला गिरने पर बचाव

यदि फसल पर पाला गिरने की संभावना हो तो 45 लीटर पानी में 1 - 1 किलो की दर से सल्फर,यूरिया,पोटाश और बोरान मिलाकर फसल पर छिड़काव करनें से फसल पाले से पूर्णत: सुरक्षित रहती हैं.

• कटाई 

जब पत्तियों और फलियों का रंग सुनहरा होने लगे तब काटकर एक सप्ताह तक धूप में अच्छी तरह सुखा लें,तत्पश्चात मडाई करें.
चने की खेती
 चने की फलियाँ

• चने की पोषणीय महत्ता 

कार्बोहाइड्रेट.               प्रोटीन.               वसा

  56.5%.                    19.4%.            4.5%

फायबर.                  खनिज़ लवण.      पानी

7.4%.                       3.4%.             10.2%

कैल्सियम.               फास्फोरस.       आयरन

280 mg.                   301mg.       12.3mg

   एनर्जी

 396 kcal.            (प्रति 100 gm हरा चना)

CHANE KI KHETI

• चने की औषधिगत उपयोगिता

• चना कैल्सियम और फास्फोरस का अच्छा स्रोत हैं यदि हड्डीयों से संबधित समस्या जैसे fracture, गठिया ,मोच, हो तो भूने चने नियमित रूप से खाना चाहिये.

• चना कुपोषण मिटाने का बहुत अच्छा स्रोत हैं,क्योंकि इसमें आयरन और प्रोटीन पर्याप्त मात्रा मे पाया जाता हैं ,अत: कुपोषण की समस्या होनें पर चना रात को भीगोंकर सुबह खायें.

• इसमें लोहा और खनिज लवण पाया जाता हैं,यदि गर्भवती स्त्रीयाँ नियमित रूप से देशी चने का सेवन करें तो रक्ताल्पता की समस्या नही होती हैं,तथा संतान भी स्वस्थ और सुंदर उत्पन्न होती हैं.

• हरे चने मे पानी की मात्रा भी बहुत होती हैं,जो ठंड के दिनों मे पानी की पूर्ति का उत्तम स्रोत हैं.

• चने से बनने वाला बेसन एक उत्तम सौन्दर्यवर्धक पदार्थ हैं,जिसका इस्तेमाल हल्दी और दूध के साथ मिलाकर उबटन के रूप में किया जावें तो सौन्दर्य निखर जाता हैं,यही कारण है,कि दुल्हन का सौन्दर्य बेसन से निखारा जाता हैं.

• चना भारतीय रसोई का अभिन्न अंग हैं,जिससे बहुत सारे व्यंजन बनायें जातें हैं और चने से बने व्यंजन बहुत स्वादिष्ट होते हैं,यदि बच्चों को मैदा से बने नूडल्स,पिज्जा,बर्गर आदि के स्थान पर बेसन से बनी चीजों को रोचकता से परोसा जावें तो पोषणता और स्वास्थ बच्चों को दिया जा सकता हैं.

• चना वसा (fat) का बहुत उत्तम स्रोत हैं,अत: दूध देने वाली गाय,भैंस को इसकी खली बनाकर खिलानें से दूध की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती हैं,इसी प्रकार यदि दूध पीलानें वाली स्त्रीयाँ चने का सेवन करें तो दूध की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती हैं.


• चने का साग खानें से शरीर का मेटाबॉलिज्म सक्रिय रहता हैं फलस्वरुप पाचन संस्थान से संबधित रोग नहीं होतें हैं ।


० तुलसी


० अश्वगंधा के फायदे

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गेरू के औषधीय प्रयोग गेरू के औषधीय प्रयोग   आयुर्वेद चिकित्सा में कुछ औषधीयाँ सामान्य जन के मन में  इतना आश्चर्य पैदा करती हैं कि कई लोग इन्हें तब तक औषधी नही मानतें जब तक की इनके विशिष्ट प्रभाव को महसूस नही कर लें । गेरू भी उसी श्रेणी की आयुर्वेद औषधी हैं । जो सामान्य मिट्टी से कही अधिक इसके विशिष्ट गुणों के लियें जानी जाती हैं । गेरू लाल रंग की की मिट्टी होती हैं जो सम्पूर्ण भारत में बहुतायत मात्र में मिलती हैं । इसे गेरू या सेनागेरू भी कहतें हैं । गेरू आयुर्वेद की विशिष्ट औषधी हैं जिसका प्रयोग रोग निदान में बहुतायत किया जाता हैं । गेरू का संस्कृत नाम  गेरू को संस्कृत में गेरिक ,स्वर्णगेरिक तथा पाषाण गेरिक के नाम से जाना जाता हैं । गेरू का लेटिन नाम  गेरू   silicate of aluminia  के नाम से जानी जाती हैं । गेरू की आयुर्वेद मतानुसार प्रकृति गेरू स्निग्ध ,मधुर कसैला ,और शीतल होता हैं । गेरू के औषधीय प्रयोग 1. आंतरिक रक्तस्त्राव रोकनें में गेरू शरीर के किसी भी हिस्से में होनें वाले रक्तस्त्राव को रोकनें वाली सर्वमान्य औषधी हैं । इसके लिय

Ayurvedic medicine list । आयुर्वैदिक औषधि सूची

Ayurvedic medicine list  [आयुर्वैदिक औषधि सूची] #1.नव ज्वर की औषधि और अनुसंशित मात्रा ::: १.त्रिभुवनकिर्ती रस  :::::   १२५ से २५० मि.ग्रा. २.संजीवनी वटी       :::::    १२५ से २५० मि.ग्रा. ३.गोदन्ती मिश्रण.    :::::     १२५ से २५० मि.ग्रा. #2.विषम ज्वर ::: १.सप्तपर्ण घन वटी  :::::    १२५ से २५० मि.ग्रा. २.सुदर्शन चूर्ण.        :::::     ३ से ६ ग्रा.   # 3 वातश्लैष्मिक ज्वर ::: १.लक्ष्मी विलास रस.  :::::  १२५ से २५० मि.ग्रा. २.संशमनी वटी          :::::  ५०० मि.ग्रा से १ ग्रा. # 4 जीर्ण ज्वर :::: १. प्रताप लंकेश्वर रस.  :::::  १२५ से २५० मि.ग्रा. २.महासुदर्शन चूर्ण.     :::::   ३ से ६ ग्राम ३.अमृतारिष्ट              :::::    २० से ३० मि.ली. # 5.सान्निपातिक ज्वर :::: १.नारदीय लक्ष्मी विलास रस. :::::  २५० से ५०० मि.ग्रा. २.भूनिम्बादि क्वाथ.      ::::: १०से २० मि.ली. #6 वातशलैष्मिक ज्वर :::: १.गोजिह्यादि क्वाथ.      ::::: २० से ४० मि.ली. २.सितोपलादि चूर्ण.       ::

एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन क्या हैं

#1.एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन क्या हैं ?  एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन प्रणाली से अभिप्राय यह हैं,कि मृदा उर्वरता को बढ़ानें अथवा बनाए रखनें के लिये पोषक तत्वों के सभी उपलब्ध स्त्रोंतों से मृदा में पोषक तत्वों का इस प्रकार सामंजस्य रखा जाता हैं,जिससे मृदा की भौतिक,रासायनिक और जैविक गुणवत्ता पर हानिकारक प्रभाव डाले बगैर लगातार उच्च आर्थिक उत्पादन लिया जा सकता हैं.   विभिन्न कृषि जलवायु वाले क्षेत्रों में किसी भी फसल या फसल प्रणाली से अनूकूलतम उपज और गुणवत्ता तभी हासिल की जा सकती हैं जब समस्त उपलब्ध साधनों से पौध पौषक तत्वों को प्रदान कर उनका वैग्यानिक प्रबंध किया जाए.एकीकृत पौध पोषक तत्व प्रणाली एक परंपरागत पद्धति हैं. ///////////////////////////////////////////////////////////////////////// यहाँ भी पढ़े 👇👇👇 विटामिन D के बारें में और अधिक जानियें यहाँ प्रधानमन्त्री फसल बीमा योजना ० तम्बाकू से होनें वाले नुकसान ० कृषि वानिकी क्या हैं ///////////////////////////////////////////////////////////////////////// #2.एकीकृत पोषक त

karma aur bhagya [ कर्म और भाग्य ]

# 1 कर्म और भाग्य   कर्म आगे और भाग्य पिछे रहता हैं अक्सर लोग कर्म और भाग्य के बारें में चर्चा करतें वक्त अपनें - अपनें जीवन में घट़ित घट़नाओं के आधार पर निष्कर्ष निकालतें हैं,कोई कर्म को श्रेष्ठ मानता हैं,कोई भाग्य को ज़रूरी मानता हैं,तो कोई दोनों के अस्तित्व को आवश्यक मानता हैं.लेकिन क्या जीवन में दोनों का अस्तित्व ज़रूरी हैं ? गीता में श्री कृष्ण अर्जुन को कर्मफल का उपदेश देकर कहतें हैं.     " कर्मण्यें वाधिकारवस्तें मा फलेषु कदाचन " अर्थात मनुष्य सिर्फ कर्म करनें का अधिकारी हैं,फल पर अर्थात परिणाम पर उसका कोई अधिकार नहीं हैं,आगे श्री कृष्ण बतातें हैं,कि यदि मनुष्य कर्म करतें करतें मर  जाता हैं,और इस जन्म में उसे अपनें कर्म का फल प्राप्त नहीं होता तो हमें यह नहीं मानना चाहियें की कर्म व्यर्थ हो गया बल्कि यह कर्म अगले जन्म में भाग्य बनकर लोगों को आश्चर्य में ड़ालता हैं, ]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]][]]]]]][[[[[[[]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]]] ● यह भी पढ़े 👇👇👇 ● आत्मविकास के 9 मार्ग ● स्वस्थ सामाजिक जीवन के 3 पीलर

गिलोय के फायदे । GILOY KE FAYDE

  गिलोय के फायदे GILOY KE FAYDE गिलोय का संस्कृत नाम क्या हैं ? गिलोय का संस्कृत नाम गुडुची,अमृतवल्ली ,सोमवल्ली, और अमृता हैं । गिलोय का हिन्दी नाम क्या हैं ? गिलोय GILOY का हिन्दी नाम 'गिलोय,अमृता, संशमनी और गुडुची हैं । गिलोय गिलोय का लेटिन नाम क्या हैं ? गिलोय का लेटिन नाम Tinospra cordipoolia (टिनोस्पोरा  कोर्ड़िफोलिया ) गिलोय की पहचान कैसें करें ? गिलोय सम्पूर्ण भारत वर्ष में पाई जानें वाली आयुर्वेद की सुप्रसिद्ध औषधी हैं । Ayurveda ki suprasiddh oshdhi hai यह बेल रूप में पाई जाती हैं, और दूसरें वृक्षों के सहारे चढ़कर पोषण प्राप्त करती हैं । गिलोय के पत्तें दिल के (Heart shape) आकार के होतें हैं।  गिलोय का तना अंगूठे जीतना मोटा और प्रारंभिक   अवस्था में हरा जबकि सूखनें पर धूसर हो जाता हैं । गिलोय के फूल छोटे आकार के और हल्का पीलापन लियें गुच्छों में लगतें हैं । गिलोय के फल पकनें पर लाल रंग के होतें हैं यह भी गुच्छों में पाये जातें हैं । गिलोय में पाए जाने वाले पौषक तत्व 1.लोह तत्व : 5.87 मिलीग्राम 2.प्रोटीन : 2.3

म.प्र.की प्रमुख नदी [river]

म.प्र.की प्रमुख नदी [river]  म.प्र.भारत का ह्रदय प्रदेश होनें के साथ - साथ नदी,पहाड़,जंगल,पशु - पक्षी,जीव - जंतुओं के मामलें में देश का अग्रणी राज्य हैं.  river map of mp प्रदेश में बहनें वाली सदानीरा नदीयों ने प्रदेश की मिट्टी को उपजाऊ बनाकर सम्पूर्ण प्रदेश को पोषित और पल्लवित किया हैं.यही कारण हैं कि यह प्रदेश "नदीयों का मायका" उपनाम से प्रसिद्ध हैं. ऐसी ही कुछ महत्वपूर्ण नदियाँ प्रदेश में प्रवाहित होती हैं,जिनकी चर्चा यहाँ प्रासंगिक हैं. #१.नर्मदा नर्मदा म.प्र.की जीवनरेखा कही जाती हैं.इस नदी के कि नारें अनेक  सभ्यताओं ने जन्म लिया . #उद्गम  यह नदी प्रदेश के अमरकंटक जिला अनूपपुर स्थित " विंध्याँचल " की पर्वतमालाओं से निकलती हैं. नर्मदा प्रदेश की सबसे लम्बी नदी हैं,इसकी कुल लम्बाई 1312 किमी हैं. म.प्र.में यह नदी 1077 किमी भू भाग पर बहती हैं.बाकि 161 किलोमीटर गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र में बहती हैं. नर्मदा प्रदेश के 15 जिलों से होकर बहती हैं जिनमें शामिल हैं,अनूपपुर,मंड़ला,डिंडोरी,जबलपुर,न

भगवान श्री राम का प्रेरणाप्रद चरित्र [BHAGVAN SHRI RAM]

 Shri ram #भगवान श्री राम का प्रेरणाप्रद चरित्र रामायण या रामचरित मानस सेकड़ों वर्षों से आमजनों द्धारा पढ़ी और सुनी जा रही हैं.जिसमें भगवान राम के चरित्र को विस्तारपूर्वक समझाया गया हैं,यदि हम थोड़ा और गहराई में जाकर राम के चरित्र को समझे तो सामाजिक जीवन में आनें वाली कई समस्यओं का उत्तर उनका जीवन देता हैं जैसें ● आत्मविकास के 9 मार्ग #१.आदर्श पुत्र ::: श्री राम भगवान अपने पिता के सबसे आदर्श पुत्र थें, एक ऐसे समय जब पिता उन्हें वनवास जानें के लिये मना कर रहें थें,तब राम ही थे जिन्होनें अपनें पिता दशरथ को सूर्यवंश की परम्परा बताते हुये कहा कि रघुकुल रिती सदा चली आई | प्राण जाई पर वचन न जाई || एक ऐसे समय जब मुश्किल स्वंय पर आ रही हो  पुत्र अपनें कुल की परंपरा का पालन करनें के लिये अपने पिता को  कह रहा हो यह एक आदर्श पुत्र के ही गुण हैं. दूसरा जब कैकयी ने राम को वनवास जानें का कहा तो उन्होनें निसंकोच होकर अपनी सगी माता के समान ही कैकयी की आज्ञा का पालन कर परिवार का  बिखराव होनें से रोका. आज के समय में जब पुत्र अपनें माता - पिता के फैसलों

पारस पीपल के औषधीय गुण

पारस पीपल के औषधीय गुण Paras pipal KE ausdhiy gun ::: पारस पीपल के औषधीय गुण पारस पीपल का  वर्णन ::: पारस पीपल पीपल वृक्ष के समान होता हैं । इसके पत्तें पीपल के पत्तों के समान ही होतें हैं ।पारस पीपल के फूल paras pipal KE phul  भिंड़ी के फूलों के समान घंटाकार और पीलें रंग के होतें हैं । सूखने पर यह फूल गुलाबी रंग के हो जातें हैं इन फूलों में पीला रंग का चिकना द्रव भरा रहता हैं ।  पारस पीपल के  फल paras pipal ke fal खट्टें मिठे और जड़ कसैली होती हैं । पारस पीपल का संस्कृत नाम  पारस पीपल को संस्कृत  में गर्दभांड़, कमंडुलु ,कंदराल ,फलीश ,कपितन और पारिश कहतें हैं।  पारस पीपल का हिन्दी नाम  पारस पीपल को हिन्दी में पारस पीपल ,गजदंड़ ,भेंड़ी और फारस झाड़ के नाम से जाना जाता हैं ।   पारस पीपल का अंग्रजी नाम Paras pipal ka angreji Nam ::: पारस पीपल का अंग्रेजी नाम paras pipal ka angreji nam "Portia tree "हैं । पारस पीपल का लेटिन नाम Paras pipal ka letin Nam ::: पारस पीपल का लेटिन paras pipal ka letin nam नाम Thespesia