सोमवार, 16 जनवरी 2017

चने की खेती और उपयोग [CHANE KI KHETI AUR UPYOG]


भारत एक कृषि प्रधान राष्ट्र  हैं,जहाँ लगभग 72% ग्रामीण आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती किसानी से जुड़ी हुई हैं.किन्तु आज देश का 80 फीसदी किसान कोई अन्य रोजगार मिलनें पर कृषि कार्य छोड़नें को राजी बैठा हैं,एक ज़मानें में खेती के बारें में कई किवंदंतिया प्रचलित थी जैसें
 
 चने की फसल
उत्तम खेती ,मध्यम व्यापार और निकृष्ट चाकरी
किन्तु आज खेती को सबसे निकृष्ट माना जाता हैं.क्योंकि खेती आज जीवन निर्वाह जीतना भी पैसा परिवार को नही दे पाती उल्टा खेती करने वाला किसान खेती करतें - करतें इतना कर्जदार हो जाता हैं,कि अंत में सिर्फ आत्महत्या ही उसके अधिकार में रह जाती हैं,किसानों की आत्महत्या में बड़ा योगदान घट़िया बीजों का भी रहता हैं,यदि किसान थोड़ी सावधानी रखकर उचित समय पर उचित बीज और परिस्थितियों के अनुसार खेती करें तो निश्चित रूप से मुनाफा कमा सकता हैं,इन्ही परिस्थितियों के अनुसार आज हम चने की खेती और उसके बीजों के विषय में किसानों को जागरूक करना चाहतें हैं.

जल प्रबंधन के बारें में विस्तारपूर्वक जानियें

#.चने का परिचय :::


चना रबी की फसल हैं,जो अक्टूबर- नवम्बर माह में बोया जाता हैं.यह सूखा प्रभावित क्षेत्रों में आसानी से उगती हैं.यह दलहनी फसलों में सर्वाधिक बोई और खायी जानें वाली फसलों में से एक हैं.

#.चने की  उन्नतशील किस्में :::


#1.PUSA - 327 


यह भारतीय कृषि और अनुसंधान परिषद द्धारा विकसित किस्म हैं,जो सम्पूर्ण भारतवर्ष में बुवाई के लिये अनुशंसित हैं.इसके दाने बारीक,हल्के पीले होते हैं,और यह देशी किस्म की प्रजाति हैं.यह प्रजाति देर से बोने पर भी उपयुक्त पैदावार देती हैं.क्योंकि इसकी जड़े गहराई में जाती हैं,जिससे सूखा के प्रति प्रतिरोधकता इस प्रजाति में होती हैं.

#पैदावार :::

18 से 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

175 से 180 दिन

#2.PUSA - 362


यह किस्म राजस्थान,उत्तरप्रदेश,मध्यप्रदेश सम्पूर्ण उत्तर भारत के लिये अनुशंसित की गई हैं.इसके दानें मध्यम आकार के होतें हैं,और इसकी जड़ गलन के प्रति प्रतिरोधी होती हैं.

#पैदावार :::

25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

185 से 190 दिन


#3.PUSA - 391 

यह मध्यप्रदेश,राजस्थान उत्तरी महाराष्ट्र के लिये अनुशंसित किस्म हैं,जिसके दानें मध्यम आकार के और हल्के भूरे किस्म के होतें हैं.यह असिचिंत क्षेत्रों के लिये उपयुक्त प्रकार की किस्म मानी जाती हैं.

#पैदावार:::

20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि:::

185 से 190 दिवस

#4.PUSA - 1003 

यह काबुली प्रजाति का चना हैं,जो जो उकठा रोग के प्रति प्रतिरोधक दर्शाता हैं,इसकी जड़ी अधिक पानी में भी गलती नही हैं.यह सम्पूर्ण भारत के लिये अनुशंसित किस्म हैं.

#पैदावार :::

20 से 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

180 से 185 दिन

#5. B.G.D - 72 

यह मध्य भारत जैसें मध्यप्रदेश, पूर्वी राजस्थान, उत्तरी महाराष्ट्र,दक्षिणी उत्तर प्रदेश के लिये अनुशंसित किस्म हैं.इसके दानें हल्के भूरे किस्म के होतें हैं.यह सूखा प्रतिरोधी किस्म हैं.

#पैदावार :::

22 से 28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

170 से 180 दिन

#6.B.G.D.- 128

यह सिंचाई वाले क्षेत्रों के लिये सर्वाधिक उपयुक्त किस्म हैं,जो कि मध्य भारत के लिये अनुशंसित की जाती हैं.

#पैदावार:::

25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

180 से 185 दिन

#7.PUSA - 1053

इस प्रजाति के दानें मोट़े काबुली प्रकार के होतें हैं.यह सिंचित क्षेत्रों के लिये अति उत्तम प्रजाति हैं.इसकी जड़े उकठा और गलन के प्रति प्रतिरोधक होती हैं.यह उत्तर भारत के लिये अनुशंसित की गई हैं.

#पैदावार :::

20 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

180 से 185 दिन.

#8.PUSA - 1088 

बीमारींयों के प्रति प्रतिरोधी किस्म हैं.यह काबुली प्रजाति की किस्म हैं,इसके दानें सुड़ोल होकर मोटे और चमकीले होते हैं.इसकी बुवाई की अनुशंसा उत्तरी भारत में की जाती हैं.

#पैदावार:::

25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि:::

180 से 185 दिन

#9.B.G.-1105

यह दिल्ली ,हरियाणा के लिये अनुशंसित किस्म हैं,जो देर से बुवाई के लिये उपयुक्त मानी गई हैं.इसके दाने मोटे काबुली प्रकार के होतें हैं.

#पैदावार :::

25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

180 से 185 दिन.

#10.B.G. - 1103 

यह किस्म भी देर से बुवाई के लिये उपयुक्त मानी जाती हैं.तथा दिल्ली तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में बुवाई के लिये उपयुक्त हैं.

#पैदावार :::

20 से 24 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

180 से 185 दिन.

#11.PUSA - 256

सिंचाई की सुविधा वालें क्षेत्रों हेतू अत्यन्त उन्नत किस्म हैं.यह खानें और पकवान हेतू अति आदर्श किस्म हैं.यह सम्पूर्ण भारत के लिये अनुशंसित की गई हैं.

#पैदावार :::

25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#अवधि :::

180 से 185 दिन.


#12.वैभव 

यह किस्म सुखा और तापमान निरोधक किस्म हैं । इसका दाना बड़ा व कत्थई रंग का होता हैं।

#पैदावार :::

15 क्विंटल प्रति हेक्टयर (देर से बोने पर 13 क्विंटल तक) तक उपज देती हैं ।

#अवधि :::

110 से 115 दिन 

#13. जे जी 74 


इस किस्म का दाना मध्यम आकार का होता हैं ।

# पैदावार :::

15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टयर

# अवधि :::

110 से 115 दिन

#14.उज्जैन 21 :::


यह किस्म मध्यप्रदेश के पश्चिमी भाग के लिये अनुसंशित हैं। इसमें लगभग 18% प्रोटीन पाया जाता हैं।


# पैदावार :::

08 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टयर

# अवधि :::


115 दिन 


#15.राधे :::


# पैदावार :::

13 से 17 क्विंटल

अवधि :::

120 से 125 दिन 


#16.जे जी 315 :::

पछेती बुवाई हेतू यह उपयुक्त किस्म मानी गयी हैं ।इसका दाना बादामी रंग का होता हैं।

# पैदावार :::

12 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टयर

# अवधि :::


120 से 125 दिन 

#17.जे जी 11 :::


यह रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली किस्म हैं ।इसके दाने कोणीय और बड़े आकर के होते हैं ।

# पैदावार :::

15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टयर

# अवधि :::


15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

#18.जी जे 130 :::

इसका पोधा कम  फैलाव वाला होता हैं ।

# पैदावार :::

18 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

# अवधि :::

110 दिन

# BG 391 :::

यह देशी चने की किस्म हैं।इसका दाना ठोस और मध्यम होता हैं।

# पैदावार :::

14 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टयर

# अवधि :::

110 से 115 दिन

# विशाल :::

चने की यह किस्म किसानों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हैं। क्योंकि इसका दाना बड़ा और उच्च गुणवत्ता वाला होता हैं ।  साथ ही अधिक ऊपज देने वाला होता हैं । इसके दानों से प्राप्त दाल सर्वाधिक स्वादिष्ट होती हैं।

# पैदावार :::

30 से 35 क्विंटल प्रति हेक्टयर 

#अवधि :::

110 से 115 दिन

# जे ए के आई - 9218 :::

यह किस्म उच्च गुणवत्ता के साथ उच्च अपने बड़े दानों के लिये प्रसिद्ध हैं ।

# पैदावार :::

15 से 20 क्विंटल

# अवधि :::

110 से 115 दिन

# काक :::




#चने की खेती के लिये उपयुक्त जलवायु :::

चना 60 से 90 सेमी.वार्षिक वर्षा वाले क्षत्रों में आसानी से उगाया जाता हैं.भारत में चनें की अधिकांश खेती वर्षा के पश्चात की सुरक्षित नमी पर की जाती हैं.अधिक सर्दी और पाले कारण चने की पैदावार और अवधि प्रभावित होती हैं.

• चने की खेती के लिये उपयुक्त भूमि :::

हल्की से भारी दोमट मिट्टी चने की खेती के लिये उपयुक्त मानी जाती हैं.यदि मिट्टी भारी ,अधिक उपजाऊ होती हैं,तो पौधे की वानस्पतिक बढ़वार अधिक होती हैं,फलस्वरूप उत्पादन प्रभावित होता हैं.क्षारीय और लवणीय भूमि में चना पैदा करने से पूर्व भूमि को उपचारित करना चाहियें.चना ऐसी भूमि मे अधिक पैदा होता हैं,जो कल्टिवेटर से हांका जाता हैं.रोटावेटर से भूमि समतल करने पर चने की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं.

• चने की बुवाई का उपयुक्त समय :::

राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश सहित सम्पूर्ण मध्य भारत में चना अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में जब दिन का औसत तापमान 25 से 28 डिग्री सेल्सियस हो बोना उचित माना जाता हैं.जबकि जहाँ सिचांई के पर्याप्त साधन हो वहाँ इसकी बुवाई नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक की जा सकती हैं.

• बीज :::

अगेती बुवाई के लिये प्रति हेक्टेयर 70 - 80 कि.ग्रा.चना जबकि पछेती बुवाई के लिये 90 से 100 कि.ग्रा.चना बोना चाहिये.

• बीजोपचार :::

बीज बोने से पूर्व उपचारित करना उतना ही आवश्यक हैं,जितना भोजन करनें से पहले हाथ धोना.यदि किसान भाई बीज उपचारित नही करेंगें तो इसका उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा फलस्वरूप किसान को आर्थिक क्षति होगी.

चने को गलन व उकठा रोग से बचानें हेतू कार्बेडिजेम अथवा थाइरम से उपचारित करना चाहियें.ये कवकनाशी हैं,और 2 ग्राम प्रति किलो की दर से इन्हे बीज मे मिलातें हैं.
राइजोबियम से बीज उपचारित करनें से पौधे द्धारा वायुमंड़लीय नाइट्रोजन एकत्रीकरण प्रक्रिया तेज हो जाती हैं,जिससे उत्पादन अधिक होता हैं,इस हेतू दो 200 ग्राम प्रति हेक्टेयर राइजोबियम पर्याप्त होता हैं.

राइजोबियम से बीज उपचार हेतू एक लीटर पानी में 150 ग्राम गुड़ और तीन ग्राम गोंद मिलाकर उबाला जाता हैं,इसके पश्चात घोल को ठंडा कर इसमें राइजोबियम जीवाणु मिलाकर इसे बीज पर छिड़क दे.छांव में बीज सुखाकर बुवाई करें.इस विधि से 30% उत्पादन अधिक लिया जा सकता हैं.

• बुवाई :::

चने की बुवाई हल या सीडड्रील से करनी चाहियें. पंक्ति से पंक्ति के मध्य की दूरी 30 सेमी. तथा गहराई सिंचित क्षेत्रों 8 से 10 सेमी.तथा असिंचित क्षेत्रों में 5 से 7 सेमी.होनी चाहियें.

बीज बुवाई के समय पर्याप्त मात्रा मे नमी होना आवश्यक हैं.जिससे बीज का अंकुरण जल्दी हो सकें.बुवाई पूरब से पश्चिम दिशा की ओर होनी चाहिये जिससे पर्याप्त मात्रा में सूर्य प्रकाश पोधें को मिलता रहें.

• उर्वरक प्रबंधन :::

चने की बेहतर पैदावार प्राप्त करने के लिये मिट्टी परीक्षण उपरांत खाद और उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिये.

गोबर की खाद का प्रयोग 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिये और इसे अच्छी तरह खेत में मिलाकर बुवाई करनी चाहियें.

चूंकि चना दलहनी फसल हैं,अत: वायुमंड़लीय नाइट्रोजन का स्थरिकरण करती हैं,किन्तु मृदा का स्थरीकरण बुवाई के 20 दिनों के बाद शुरू होता हैं,अत: शुरूआत की बढ़वार के लिये 20 किलो ग्राम यूरिया और 50 किलो ग्राम फास्फोरस का प्रयोग खेत तैयार करतें वक्त करना चाहियें.

कुछ सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग कर चने की पैदावार कई गुना बढ़ाई जा सकती हैं,जैसे गंधक के उपयोग से फसल की गुणवत्ता के साथ उत्पादन पर सकारात्मक असर पड़ता हैं.

क्लोरोसिस नामक रोग लोह तत्व की कमी से होता हैं,जिससे नई पत्तियाँ पीली पढ़कर सूख जाती हैं,और पौधे की वृद्धि रूक जाती हैं.इस प्रकार की समस्या होनें पर फेरस सल्फेट 5 ग्राम 1 लीटर पानी की दर से फसलों पर छिड़काव करें.

• सिंचाई 

चना वैसे तो असिंचित क्षेत्र में अधिकांशत: बोया जाता हैं,किन्तु चने की मांग बढ़नें , नयी - नयी किस्मों के आ जानें व इन किस्मों से बेहतर उत्पादन देने की वज़ह से सिंचित क्षेत्रों में भी चने का बहुत उत्पादन होने लगा हैं.

चने की उपज बढ़ाने हेतू दो बार सिंचाई की आवश्यकता पड़ती हैं,प्रथम बार बोवाई के 45 दिन बाद जब फूल नही आये हो तथा दूसरी बार पौधे में फलियाँ बेठने पर इस विधि से सिंचाई करनें पर बीमारी भी बहुत कम चने को प्रभावित करती हैं.

यदि सिंचाई की व्यवस्था एक ही बार हो तो बुवाई के 60 दिन बाद सिंचाई करनी चाहियें.
यदि असिंचित क्षेत्रों में चने की फसल लेनी हैं,तो खरीफ फसल के तुरंत पश्चात खेत मे नमी देखकर फसल बोनी चाहिये.

• चने मे खरपतवार प्रबंधन

चने में पाये जानें वाले खरपतवार के नियत्रंण हेतू समय - समय पर निराई - गुडाई करते रहना चाहिये जिससे की भूमि में वायु संचार बेहतर तरीके से हो.

यदि रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण करना हो तो 1 kg सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर के हिसाब से पेंड़ीमेथालिन {30 E.C.} को 650 लीटर पानी मे घोलकर बुवाई के तुरंत बाद परन्तु अंकुरण से पूर्व छिटकाव करें.

फ्लूक्लोरोलिन {45 E.C.} 1 kg सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर सतही मिट्टी पर छिडकाव करे तत्पश्चात बोवनी करें.

• चने के प्रमुख कीट 


चने की फसल मे अनेक प्रकार के कीट नुकसान पँहुचाते हैं जैसे :

• कटुवा 

यह कीट चने के उगते पौधो को काटकर जमीन पर गिरा देता हैं, जिससे किसान भाईयों को काफी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता हैं.

• बचाव 

1.कटुवा से बचाव हेतू किसान भाई गर्मीयों मे खेत में हल से गहरी जुताई करें. 
2.सरसो,गेँहू और अलसी को सह - फसली रूप में चने के साथ बोये.
3.फसल चक्र अपनायें.
4.रासायनिक प्रबंधन हेतू 25 kg डाइक्लोरोफोन 5% प्रति हेक्टेयर की दर से शाम के समय फसल पर बुरकाव करें.

• दीमक 

खडी फसल में दीमक का प्रकोप अधिक देखनें मे आता हैं,जिसे किसान नजरअन्दाज अधिक करतें हैं,फलस्वरूप फसल नष्ट हो जाती हैं.क्योंकि दीमक सीधे फसल की जड़़ पर हमला कर उसे सूखा देती हैं.

• बचाव

1.गर्मीयों में गहरी जुताई आवश्यक रूप से करनी चाहियें जिससे दीमक के बिल नष्ट हो जावें.
2.खडी फसल में दीमक का प्रकोप होनें पर चार लीटर क्लोरोपाईरोफास (20 E.C.) प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचाई के पानी के साथ करें.

• फली छेदक कीट

यह कीट प्रारंभ मे पत्तियाँ को खाता हैं,पश्चात फली आनें पर फली को खाकर उसे नष्ट कर देता हैं.

• बचाव

इसका निंयत्रण करनें के लिये फलियाँ बनते समय 1.25 लीटर एंडोसल्फान (35 EC) प्रति हेक्टेयर की दर से घोल बनाकर छिड़कना चाहियें.

• चने की प्रमुख बीमारी


• उकठा 

इस बीमारी में पौधे की जड़ सड़ जाती हैं,तथा धिरें - धिरें सम्पूर्ण पौधा पीला पड़कर नष्ट हो जाता हैं.यह बीमारी फसल उगने के 15 - 20 दिनों बाद होती हैं.

• बचाव

1.बीजों को उपचारित करनें के पश्चात ही बोना चाहियें.
2.फसल चक्र का पालन करें अर्थात बार - बार एक ही खेत मे एक ही फसल बोने की बजाय बदलकर फसल बोना चाहिये. सरसो व गेंहू बोकर इस बीमारी से बचा जा सकता हैं.
3.बीमारी से बचाव के लिये अगेती बुवाई न करें.

• अंगमारी 

यह बीज से फैलने वाली बीमारी हैं.इस बीमारी में पत्तियों, फूल,तने, और फलियों पर गोल ,छोटे - छोटे भूरे रंग के चकते बन जातें हैंं.जिससे फूल ,पत्तियाँ और फलियाँ सूखकर गिर जातें हैं.

• बचाव

1.मेंकोजेब के 0.2 % घोल का छिड़काव करें.
2.बीजो की बुवाई से पूर्व कैप्टान 3 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें.

• पाला गिरने पर बचाव

यदि फसल पर पाला गिरने की संभावना हो तो 45 लीटर पानी में 1 - 1 किलो की दर से सल्फर,यूरिया,पोटाश और बोरान मिलाकर फसल पर छिड़काव करनें से फसल पाले से पूर्णत: सुरक्षित रहती हैं.

• कटाई 

जब पत्तियों और फलियों का रंग सुनहरा होने लगे तब काटकर एक सप्ताह तक धूप में अच्छी तरह सुखा लें,तत्पश्चात मडाई करें.
 चने की फलियाँ

• चने की पोषणीय महत्ता 

कार्बोहाइड्रेट.               प्रोटीन.               वसा

  56.5%.                    19.4%.            4.5%

फायबर.                  खनिज़ लवण.      पानी

7.4%.                       3.4%.             10.2%

कैल्सियम.               फास्फोरस.       आयरन

280 mg.                   301mg.       12.3mg

   एनर्जी

 396 kcal.            (प्रति 100 gm हरा चना)


• चने की औषधिगत उपयोगिता

• चना कैल्सियम और फास्फोरस का अच्छा स्रोत हैं यदि हड्डीयों से संबधित समस्या जैसे fracture, गठिया ,मोच, हो तो भूने चने नियमित रूप से खाना चाहिये.

• चना कुपोषण मिटाने का बहुत अच्छा स्रोत हैं,क्योंकि इसमें आयरन और प्रोटीन पर्याप्त मात्रा मे पाया जाता हैं ,अत: कुपोषण की समस्या होनें पर चना रात को भीगोंकर सुबह खायें.

• इसमें लोहा और खनिज लवण पाया जाता हैं,यदि गर्भवती स्त्रीयाँ नियमित रूप से देशी चने का सेवन करें तो रक्ताल्पता की समस्या नही होती हैं,तथा संतान भी स्वस्थ और सुंदर उत्पन्न होती हैं.

• हरे चने मे पानी की मात्रा भी बहुत होती हैं,जो ठंड के दिनों मे पानी की पूर्ति का उत्तम स्रोत हैं.

• चने से बनने वाला बेसन एक उत्तम सौन्दर्यवर्धक पदार्थ हैं,जिसका इस्तेमाल हल्दी और दूध के साथ मिलाकर उबटन के रूप में किया जावें तो सौन्दर्य निखर जाता हैं,यही कारण है,कि दुल्हन का सौन्दर्य बेसन से निखारा जाता हैं.

• चना भारतीय रसोई का अभिन्न अंग हैं,जिससे बहुत सारे व्यंजन बनायें जातें हैं और चने से बने व्यंजन बहुत स्वादिष्ट होते हैं,यदि बच्चों को मैदा से बने नूडल्स,पिज्जा,बर्गर आदि के स्थान पर बेसन से बनी चीजों को रोचकता से परोसा जावें तो पोषणता और स्वास्थ बच्चों को दिया जा सकता हैं.

• चना वसा (fat) का बहुत उत्तम स्रोत हैं,अत: दूध देने वाली गाय,भैंस को इसकी खली बनाकर खिलानें से दूध की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती हैं,इसी प्रकार यदि दूध पीलानें वाली स्त्रीयाँ चने का सेवन करें तो दूध की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती हैं. 

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