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8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और महिला सशक्तिकरण के भारतीय मूल्य

8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और महिला सशक्तिकरण के भारतीय मूल्य



दोस्तों आज मैं आपको 8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और महिला सशक्तिकरण के भारतीय मूल्य से से सम्बंधित विचारों से परिचित कराना चाहता हूँ। तो आईये जानते हैं 8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और महिला सशक्तिकरण के भारतीय मूल्य के बारे मे 

वैदिककालीन भारतीय साहित्य गार्गी और मैत्रयी जैसी दार्शनिक महिला विद्वानों द्वारा अपने पुरुष समकक्ष विद्वानों के साथ किये जाने वाले उच्च कोटि के शास्त्रार्थ से भरा हुआ है ।

रानी लक्ष्मी बाई  जैसी वीरांगना ने अपनी नेतृत्व क्षमता ओर साहस से अंग्रेजों को परिचित करवाकर महिला को कमतर नहीं आंकने को विवश किया। 

अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च


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■ वेश्यावृत्ति क्या है समाज पर इसके क्या प्रभाव होते हैं

■ भ्रष्टाचार के बारें में विस्तार पूर्वक जानकारी





स्वंत्रता संग्राम में भी महात्मा गांधी के आह्वान पर महिलाएं ऐसे समय में घर से निकलकर आगे आयी जब उनकी बिरादरी मात्र 2 प्रतिशत शिक्षित थी,साथ ही महिलाओ पर पुरूष प्रधान समाज की कई वर्जनाएं कठोरतम रूप में प्रचलित थी।


लेकिन महिला सशक्तिकरण की परिकल्पना आजादी के बाद जिस तेजी से परवान चढ़नी थी । वह नहीं चढ़ पायी क्योंकि पुरूष प्रधान समाज की वर्जनाओं का अंधा समर्थन खुद नारी शक्ति ने ही कर महिला सशक्तिकरण की धार को कुंठित किया । उदाहरण के लिये किसी की बेटी जब दूसरे के घर बहू बन कर जाती हैं तो सबसे पहले अतार्किक और अवैज्ञानिक मर्यादा की लकीर  सास या ननद द्वारा ही खींची जाती हैं ।


भारतीय सविंधान निर्माताओं ने महिला समानता को सविंधान में यथोचित स्थान दिया लेकिन शासन प्रशासन की कार्यप्रणाली ने सविंधान निर्माताओं की भावना आगे बढ़ाने में  बहुत लचीला रुख अपनाया यही कारण हैं कि सविंधान में समानता मिलने के बावजूद महिला सशक्तिकरण के कई अधिनियम बनाने पड़े। 



कई पढ़ी लिखी और प्रशासन के उच्च पदों पर बैठी महिलाएं भी पुरुष प्रधान वर्चस्व को आगे बढ़ाने का काम कर रही हैं । मैंने कई महिला प्रशासकों को देखा हैं जो रात में काम करने से मात्र इस आधार पर छूट चाहती हैं और शासन भी इस कदम में उनके साथ खड़ा रहता हैं, क्योंकि वह महिला हैं क्या यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में महिला प्रशासकों की सही भूमिका हैं ?

समाज के शीर्ष पदों पर बैठी महिलाएं और अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त महिलाएं भी शादी के बाद या तो अपना उपनाम (surname) बदल लेती हैं या फिर अपने उपनाम के पिछे पति का उपनाम जोड़कर समाज को स्पष्ट संदेश दे रही हैं कि वह अभी पुरुष प्रधान समाज की बेड़ियों से जकड़ी हुई है। एक स्त्री अपने दांपत्य जीवन की शुरुआत युवावस्था में करती हैं और यदि स्त्री समाज के शीर्ष पद पर हैं तो निश्चित रुप से उसके पालन पोषण और इस पद तक पहुंचाने में माता पिता की अहम भूमिका रहती हैं ऐसे में एक झटके में माता पिता की पहचान त्यागकर नया उपनाम ग्रहण कर लेना "स्त्री गुलामी"का प्रतीक नहीं तो और क्या है ? 

क्या किसी पुरुष ने कभी ऐसा किया ? यदि नहीं,तो हर बार महिला ही क्यों ? प्रश्न स्वाभाविक है लेकिन शायद उत्तर बहुत अस्वाभाविक हो ?



 इसके स्थान पर इन जिम्मेदार पदों पर बैठी महिलाओं को समाज में महिला सशक्तिकरण का आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए जिससे समानता का सही सन्देश समाज मे संचारित हो।



कई लोग महिला सशक्तिकरण का बहुत संकीर्ण अर्थ निकाल कर बैठे हैं 


✓जो पुरुष करता हैं वह महिला करें क्या यही महिला सशक्तिकरण हैं ? 


✓जो पुरुष पहने वह महिला पहने क्या यह महिला सशक्तिकरण कहा जायेगा ?


✓जो पुरुष सेवन करें वह महिला करें क्या यह महिला सशक्तिकरण हैं ?



✓क्या पुरुष महिला के वस्त्र पहनकर सशक्त बन जायेगा ?



नहीं ना बल्कि जो महिला करती हैं वह पुरुष करेगा तो वह हास्यपद और उपहास का पात्र बन जाता हैं । तो फिर महिला पुरुष के समान दिखकर सशक्त कैसे ?


 आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता, और आत्मविश्वास ही महिला सशक्तिकरण के 3 स्तम्भ हैं ।जिस पर टिक कर ही महिला सशक्त हो सकती हैं ,इन स्तम्भों पर टीका महिला सशक्तिकरण न केवल महिलाओं को बल्कि देश और दुनिया को नई ऊंचाइयों पर ले जायेगा ।


यह बात सही हैं कि भारत में पिछले 10 - 15 वर्षों के दौरान महिला सशक्तिकरण का नया दौर शुरू हुआ हैं पंचायत से लेकर विधानसभा और संसद महिला प्रतिनिधियों की साक्षी बन रही हैं लेकिन इस दौर को और आगे ले जाना होगा और यह काम भी खुद उन्हें ही अपने बलबूते करना होगा । क्योंकि पुरुषवादी मानसिकता और उनके अधिकार में रहकर प्राप्त किया गया सशक्तिकरण वास्तव में अधूरा सशक्तिकरण ही माना जायेगा । स्त्री का सशक्तिकरण, उसके जीवन का आकर्षण उसके अपने निज पहचान में छिपा हैं न कि पुरुषों की प्रतिलिपि बनने में ।

भारत और यूरोप का स्त्री सशक्तीकरण 


भारत और यूरोप में महिला सशक्तिकरण की तुलना करें तो पायेंगे की भारत में स्त्री सशक्तिकरण समाज का अभिन्न अंग रहा हैं, वेद की ऋचाओं से लेकर वर्तमान आदिवासी समुदायों की समाज व्यवस्था इसका जीता जागता प्रमाण हैं। जबकि यूरोप का स्त्री सशक्तिकरण  18 वी शताब्दी में 'मैरी' के फ्राँस की क्रांति से प्रभावित स्वतन्त्रता ,समानता और भातृत्व से जुड़ा हैं।


 लेकिन इसके बावजूद वर्तमान भारत का स्त्री सशक्तिकरण यूरोप के स्त्री सशक्तिकरण से बहुत पीछे हैं।बल्कि यह कहा जा सकता हैं कि भारत का स्त्री सशक्तिकरण भारतीयता से प्रभावित होने के बजाय यूरोप के स्त्री सशक्तिकरण की प्रतिलिपि बनने की ओर अग्रसर हैं।

✓ यदि यह सशक्तिकरण भारतीयता से विलग होगा तो इसकी खूबसूरती खत्म हो जायेगी।


✓यदि यह सशक्तिकरण भारतीयता से भिन्न हुआ तो इसकी आत्मा मर जाएगी ।


यदि यह सशक्तिकरण भारतीयता की सुंगध को विश्व मे नहीँ फैला पाया तो ऐसे जीवन मूल्यों का पतन होगा जो स्वामी विवेकानंद, महात्मा गाँधी, मदर टेरेसा, देवी अहिल्याबाई,मैत्रयी, गार्गी आदि ने विश्व को दिये थे ।


MAHILAYE SAMAJ AUR PARIVAR महिलायें,समाज और परिवार


पूरी दुनिया की 7 अरब 48 करोड़ आबादी में से आधी आबादी का प्रतिधिनिधित्व महिलाएँ करती हैं.

किन्तु 193 देशों में महज ऊंगलियों पर गिनने लायक देश ऐसे हैं,जहाँ महिलायें पुरूषों के साथ समाज के अग्रिम पायदान पर हैं.बाकि के देशों में महिलायें किसी न किसी रूप में दोयम दर्जें की नागरिक ही समझी जाती हैं.महिलाओं के प्रति होनें वाले भेदभावों की अंतहीन सीमा हैं जैसें

लैंगिक भेदभाव [Sexual Discrimination]



विश्व के अधिकांश विकसित और विकासशील देश महिलाओं को लैंगिक समानता दिलानें में असफल साबित हुये हैं,कुछ महिलायें अपवाद बनकर जरूर आगें बढ़ी हैं,परन्तु उनकी आबादी के मान से यह संख्या उँट के मुहँ मे जीरे के समान हैं.स्त्रीयों को शारीरिक रूप से कमज़ोर मानकर उनको घरेलू कामो बर्तन,झाडू जैसे कामों तक सीमित रखना ,व्यापार  सुरक्षा जैसें घर के बाहरी कामों में पुरूषों का वर्चस्व होना.इसी प्रकार यदि  को बाहर पढ़ने - लिखने खेलकूद प्रतियोगिता में भाग लेनें जाना हो तो परिवार की रोक लड़कियों के लिये ही होती हैं.


मैं ऐसे ही एक परिवार को जानता हूँ,जिसकी होनहार बिटिया ने एम्स जैसे मेड़िकल कालेज की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण कर ली परन्तु उसके परिवार ने उसे इसलिये रोक दिया की दिल्ली जैसे शहर में लड़की अकेली केसे रहेगी,इसके बनिस्बत उस परिवार ने उस लड़की का एड़मिशन अपने ही शहर के अपेक्षाकृत कमज़ोर रेंकिंग वाले मेडिकल कालेज में कराना उचित समझा.जबकि वही परिवार अपने लड़के को दूसरे प्रान्त में भेजकर IIT की शिक्षा दिलाना उचित समझता हैं.और नाते रिश्तेदारी में में बडे गर्व के साथ अपने बच्चें के बाहर रहकर पढ़ाई करनें की बात करता हैं. क्या इस सोच के साथ बेहतर समाज का निर्माण कर पायेंगे ?


स्त्री और पुरूष समाजरूपी शरीर के हाथ और पांव हैं,इनमें से यदि शरीर में हाथ या पांव किसी एक का अभाव हो तो क्या हम शरीर को स्वस्थ मान सकते हैं.नही ना ! तो फिर समाज में एक का विकसित होना और दूसरें का अविकसित होना स्वस्थ समाज का निर्माण कैसें कर सकता हैं.


महिलाओं के प्रति भेदभाव मात्र यही तक सीमित नही हैं,बल्कि वे कामकाजी महिलाएँ जिनके परिवार ने उन्हें कामकाज की आजादी दी हैं से पूँछे तो हकीक़त और ज्यादा बेपर्दा होती हैं.


शारीरिक शोषण 


कार्यस्थल पर महिलाओं का शोषण आजकल आम बात हो गई हैं,जिसे सरकार हो या समाज कोई गंम्भीरतापूर्वक लेने के मूड़ मे नही हैं बल्कि यदि इस प्रकार की बातें जनसंचार माध्यमों में आ जाती हैं तो शक की ऊँगली महिला के नाते - रिशतेदारों और सहयोगीयों द्धारा पीड़ित महिला की ओर ही उठती हैं.


कार्यस्थलों,यात्रा के दोरान बसो,रेलगाडियों,भीड़भाड़ वाली जगहों पर पुरूषों द्धारा गलत नियत से महिलाओं को स्पर्श करना या स्पर्श करने का भरसक प्रयत्न करना ये सब वही पुरूष वर्ग करता हैं,जो किसी स्त्री का भाई,बेटा,पति या पिता हैं.


सरकारों द्धारा महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर सैंकड़ो कानून,आयोग और संहिताएँ बनाई गयी हैं,क्या ये व्यवस्थाएँ स्त्रीयों से होनें वाली छेड़छाड़ को रोक पाई हैं ? नही ना ! क्योंकि कानून किसी समस्या का सम्पूर्ण समाधान नही हैं.
यदि महिलाओं के प्रति होनें वाली छेड़छाड़ को रोकना हैं, तो उस सोच को बदलना होगा उस समाज को बदलना होगा जहाँ यह सोच विकसित होती हैं. सोच कहाँ से विकसित होती हैं ? 
समाज कहाँ से बनता हैं ?



निश्चित रूप से परिवार से सोच और समाज बनतें हैं.यदि हमनें परिवार मे ही लड़के - लड़की मे भेद का स्वांग रचा तो निश्चित है समाज में यही मानसिकता पलेगी बढेगी.




बलात्कार [Rape]


पूरी दुनिया में हर एक मिनिट में दस महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनायें घट रही हैं,आखिर क्या वज़ह हैं,इन समस्याओं की ? कई लोग पुरूष वर्ग के समर्थन मे खडे होकर कहते हैं,कि स्त्रीयाँ ही कामुक वस्त्र पहनकर पुरूष को उत्तेजित करती हैं.मैं पूछना चाहता हूँ तो फिर दूधमुँही बच्ची के साथ बलात्कार क्यों होता हैं क्या वह बालिका भी बलात्कारी को उतनी ही कामुक लगती हैं.



वास्तव में बात फिर वही घूम फिरकर आती हैं,कि समाज की सोच ही निम्नस्तर की है.

मैंनें कई स्कूल - कालेजों के ड्रेसकोड़ की अनिवार्यता सम्बधी नियम - कानून  पढ़े-सुने हैं.जिसमें स्त्रीयों को सिर से पाँव तक ढँकने वाली ड्रेस पहनना अनिवार्य हैं.इस प्रकार की व्यवस्था पर समाज,कानून और अग्रिम पंक्ति के लोग क्यों खामोश रहकर मोन समर्थन देते हैं ? सवाल फिर वही आकर टीकता हैं,कि क्या कोई ड्रेस कामुक होती हैं ? अरे श्री मान आपकी सोच ही कामुक हैं.जो स्त्री ,बालिका में काम प्रवृत्ति खोजती हैं,जिसे तब तक नही ठीक किया जा सकता जब तक कि पारिवारिक मूल्यों को परिवर्तित नही कर दिया जाता इसके लिये प्रयास भी माता - पिता को लड़के - लड़कियों को समान स्वतंत्रता,समान सोच,देकर करनें होगें.



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