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खस [vetiver grass] की खेती और औषधीय गुणों की जानकारी

 खस [vetiver grass] की खेती और औषधीय गुणों की जानकारी 


खस का वैज्ञानिक नाम 

[Vetiveria zizanioides (L.) Nash] Syn. Chrysopogon zizanioides (L.) Roberty


कुल: Poaceae


संस्कृत नाम : वीरा


अंग्रेजी नाम :vetiver grass ,vetiveria


उपयोगी भाग : जड़ 


खस का पौधा


रासायनिक अवयव


इस पौधे में पाये जाने वाले रासायनिक अवयवों में vetiverol, vetiverone, o तथा B vetivone, vetivene, vetivazulene, vetiveryl, vetiverate, vetiveryl acetate, valerenol. valencene, furfural, khusimene, khusimone, khusimol, iso khusimol, celarene, celacorene, 3-epizizanol, 5-epiprezizone, a-longipinene, B-humulene, Y-selinine, ō salinine, ð-cadinene, nootkatone तथा terpinen-4-ol प्रमुख हैं।


खस के गुण


इसकी जड़े बारीक संरचना वाली बहुत मजबूत तथा लम्बी होती हैं। इसके कारण ये मिट्टी को पकड़ कर रखती है। ये जल के सतही अपवाह (surface run off) को नियंत्रित कर भूमि में जल अवशोषण (infiltration) में वृद्धि करती हैं तथा सतह वाष्पीकरण (evaporation) को भी कम करती हैं। साथ ही इसकी जड़ों ने मृदा में विद्यमान भारी धातुओं के अवशोषण का विशेष गुण भी पाया गया है। इस पौधें में अनेक पौष्टिक तत्व भी पाये जाते हैं।


इसकी जड़ों में पीले भूरे रंग का गाढ़ा, सुगंधित, वाष्पशील तेल, जिसका व्यावसायिक नाम VZEO है, पाया जाता है, जिसमें प्रति-उपचायक, सृजनरोधी, रोगाणुरोधी, कवकरोधी तथा कीट विकर्षक गुण पाये जाते है।

खस एक बहुवर्षीय गुच्छा घास (bunch grass) प्रजाति का पौधा है। बॉस की तरह इसके भी भिरे (clumps) बनते हैं। परन्तु अधिकांश अन्य घास प्रजातियों से यह इस मामले मे अलग है कि न तो इसमें भू-स्तरीय क्षैतिज प्रसरण होता है और न ही इस में प्रकन्द होते है। अपितु इसकी जड़े जमीन के अन्दर सीधी नीचे ऊर्ध्वाधर दिशा में 3 से 4 मीटर की गहराई तक चली जाती है। जमीन के अन्दर दबी गाँठो (nodes) से नये तने (culms) निकल आते हैं।


इसके तने सीधे तथा लम्बे (1 से 3 मीटर लम्बाई के) होते. हैं। यह पौधा ज्वार तथा लेमन ग्रास जैसा दिखता है। इसकी पत्तियाँ लम्बी पतली, कुण्डलित (convolute) तथा कड़ी होती है। इनकी लम्बाई 1.2 से 1.5 मी. तथा चौड़ाई लगभग 8 मि.मी. होती है।


इसमें पुष्पन अगस्त-सितम्बर मे तथा फलन अक्टूबर-नवम्बर में होता है। पुष्प भूरे- बैंगनी रंग के होते है। पुष्प गुच्छ (panicles) 15 से 30 से.मी. लम्बे तथा चक्करदार (whorled) होते हैं। इनमें तीन पुंकेसर (stamens) होते हैं।


खस के औषधीय गुण क्या हैं 


दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के देशो में पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों में इसका उपयोग सुगंध चिकित्सा (aromatherapy) में तथा त्वचा रोगों (मुंहासे, घाव, इत्यादि), पित्त ज्वर, सिरदर्द इत्यादि के उपचार में किया जाता है। इसकी जड़ों के वाष्प आसवन से प्राप्त तेल के अनेक घरेलू तथा औद्योगिक उपयोग है तथा इसका उपयोग सौन्दर्य प्रसाधनों, हर्बल साबुन, फेसक्रीम, इत्र इत्यादि के निर्माण में होता है। जड़ो से तैयार किये गये खस सीरप को मिल्क शेक, लस्सी, आइसक्रीम तथा अन्य खाद्य पदार्थों में विशिष्ट सुगंध लाने के लिये डाला जाता है। पीने के पानी को सुगंधित करने के लिए इसकी जड़ो को कुछ समय तक पानी मे डाल कर रखा जाता है। इसकी रेशेदार जड़ों से रस्सी, चटाई, पंखे, कूलर तथा घर की खिड़कियों-दरवाजों में लगने वाली टट्टियाँ तथा अन्य अनेक हस्तशिल्प उत्पाद तैयार किए जाते हैं। 


खस के पौधों को घर की छतो के छप्पर बनाने तथा मिट्टी की ईट बनाने में भी उपयोग में लाया जाता है। इसीधे में लगने वाले सुंदर हल्क बैंगनी रंग के फूलों के कारण कुछ लोग इसे शोभादार पौधे के रूप में भी लगाते हैं। इससे बनी मालायें मंदिरों में मूर्तियो पर भी चढ़ाई जाती है। इस पौधे का उपयोग पशुचारे के रूप में भी किया जाता है। मृदा-जल संरक्षण तथा मृदा के जैविक उपचार (bioremediation) हेतु भी खास क व्यापक पैमाने पर रोपण किया जाता है। इस पौधे को किसान फसल सुरक्षा हेतु भी खेत की मेड़ो पर लगाते है।


खस के पौधे कहां पाए जाते हैं 


भारतवर्ष में यह पंजाब से लेकर असम तक मैदानी क्षेत्रों में तथा प्रायद्वीपीय भारत में विभिन्न प्रदेशों में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। राजस्थान, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु केरल तथा आध्रप्रदेश में इसकी खेती भी की जा रही है। कैरीबियन देश हैती, हिन्द महासागरीय फ्रेन्च रियूनियन द्वीप तथा इण्डोनेशिया में भी व्यापक पैमाने पर इसकी खेती की जा रही है। हैती इसका सबसे उत्पादक देश है।



खस के पौधे को उगाने लिए जलवायु और मिट्टी कैसी होनी चाहिए 


खस का पौधा बहुत ही मजबूत (hardy) होता है। इसे विभिन्न प्रकार की मृदा तथा जलवायु वाले क्षेत्रों में उगाया जा सकता है। अच्छी जल निकासी वाली रेतीली-दोमट, मटियार दोमट तथा जीवाश्म युक्त लाल लेटरिटिक, उदासीन अथवा क्षारीय मृदा इसकी खेती के लिये अधिक उपयुक्त है। मटियार (clayey) मृदा इसकी खेती के लिए उपयुक्त नही है। मृदा मे सोडियम, मैग्नीशियम, अल्यूमिनियम, मैगनीज, आर्सेनिक, कॅडमियम, क्रोमियम, निकिल, सीसा, पारा, सेलीनियम, जस्ता तथा लवणों की उपस्थिति भी यह पौधा सहन कर लेता है। यह पौधा (-) 15° से (+) 55° सेल्सियस तक के तापमान में जीवित रह सकता है, यद्यपि इसकी वृद्धि के लिए 22° से. से 43° से. तापमान अनुकूलतम है। 13° से. से कम तापमान होने पर इसके तने की वृद्धि पर प्रभाव पड़ने लगता है तथा 5° से. तापमान पर जड़ सुसुप्तावस्था (root dormancy) आ जाती है।


यह पौधा सूखे तथा जल प्लावन, दोनो स्थितियो को सहन कर लेता है, यद्यपि प्रारम्भिक अवस्था में पौधे को पाले तथा जल भराव (water logging) की स्थिति से बचाना चाहिए। परिपक्व पौधा गहरे बहते पानी में तथा साफ पानी में दो माह तक दवा रहने पर भी जीवित रह सकता है। 1000 मि.मी. से 2000 मि.मी. तक वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए अनुकूल है परन्तु न्यूनतम 225 मि.मी. वार्षिक वर्षा होनी आवश्यक है। यह पौधा मवेशियों अथवा वन्य शाकाहारी पशुओं की अधिक चराई भी सहन कर सकता है।


खस को खुले मे अथवा आंशिक छायादार स्थान पर लगाया जा सकता है यद्यपि छाया से इसकी वृद्धि पर प्रभाव पड़ता है।

 प्रवर्धन सामग्री: बीज अथवा स्लिप्स नर्सरी तकनीक

यदि खस की पौध बीज से तैयार करनी है, तो इसके पुराने पौधों से परिपक्व बीज युक्त बालियों (spikelets) को अक्टूबर नवम्बर के मध्य संग्रहित किया जा सकता है। चूँकि ताजी संग्रहित बालियों में लगभग तीन माह की सुसुप्तावस्था (dormancy) रहती है, अतः सुसुप्तावस्था समाप्ति तक कटी हुई बालियों को सुखा कर रख लेना चाहिए। तत्पश्चात उन्हें मसल कर दानों से बीजावरण (भूसी) अलग कर देना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से बीजांकुरण में सुविधा होती है। जिबरेलिक एसिड अथवा पोटेशियम नाइट्रेट के साथ बीजोपचार करने से भी बीज सुसुप्तावस्था से बाहर निकल सकते हैं।


यदि स्लिप्स से खस की पौध तैयार करनी हैं, तो पुराने खस के पौधे से स्लिप्स भी तैयार की जा सकती है। इसके लिए खस के भिरों (clumps) से कुछ तनों (culms) को जड़ सहित खोद कर निकाल लेते हैं तथा उन्हें 15 से 20 से.मी. ऊँचाई पर काट कर स्लिप्स तैयार की जाती है। स्लिप्स में लगी सूखी पत्तियों को अलग कर देना चाहिए ताकि बाद में इस कारण पौधों में



रोग अथवा कीट संक्रमण न हो। तैयार स्लिप्स को सूखने से बचाने के लिए उन्हें गीले कपड़े में लपेट कर छायादार स्थान पर रखते हैं।


पौधशाला मे बीज अथवा स्लिप्स का रोपण थैलियों, क्यारियो अथवा रूट ट्रेनर्स में किया जा सकता है। इनमे रेत, मिट्टी तथा खाद के 2:1:1 अनुपात मे मिश्रण का प्रयोग किया जा सकता है। पौधशाला मे बीज / स्लिप्स का रोपण मई-जून माह में करना चाहिए।


खस की खेती के लिए खेत की तैयारी कैसे करें 


खस की खेती के लिए मई-जून माह में दो से तीन बार 20-25 से.मी. गहरी जुताई कर खेत को बहुवर्षीय खरपतवार से मुक्त कर लेना चाहिए। अन्तिम जुताई के समय आवश्यकतानुसार मिट्टी मे 10 टन प्रति हेक्टेयर गोबर खाद / कम्पोस्ट / रासायनिक उर्वरक मिलाया जा सकता है। यदि खेत समतल न हो कर ढालयुक्त है, तो समोच्च मे (across contour) लम्बी सीधी कतारों मे गड्ढे खोदने चाहिए। विकल्प के रूप में 15-20 से.मी. गहरी खन्तियाँ खोदकर उनके ऊपर रोपण किया जा सकता है।



पौधा रोपण


पौधशाला मे बीज अथवा स्लिप्स से तैयार पौधो को खेत में मानसून आगमन के पश्चात जून से अगस्त तक रोपित किया जा सकता है। सिंचाई की सुविधा होने पर मार्च-अप्रैल मे रोपण किया जा सकता है। रोपण हेतु कतारों के बीच का अन्तराल 45 से 60 से.मी. तथा कतार में पौधों के बीच का अन्तराल 30. 45 अथवा 60 से. मी. रखा जा सकता है। स्लिप्स को 10 से भी गहराई तक गाड़ना चाहिए। वर्षा के पानी के अभाव की स्थिति मे रोपण के तत्काल बाद सिचाई की जाना चाहिए।


खरपतवार नियंत्रण हेतु दो से तीन बार निंदाई करनी चाहिए। प्रथम निंदाई जुलाई-अगस्त मे तथा तत्पश्चात मासिक अन्तराल पर करना चाहिए। साथ ही खस के पौधों की बढ़त की प्रारम्भिक अवस्था में मासिक अन्तराल पर गुडाई भी कर देनी चाहिए। खरपतवार नियंत्रण हेतु रोपण के कुछ दिन पश्चात atrazine नामक खरपतवार नाशक दवा का प्रयोग भी किया जा सकता है।


खस के पौधों की सिंचाई और निंदाई गुड़ाई 


इस फसल को पानी की अधिक आवश्यकता नहीं होती है परन्तु शुष्क क्षेत्रों में वर्ष मे शुष्क मौसम में 8 से 10 बार सिंचाई आवश्यक है। विदोहन के 7-10 दिन पूर्व सिंचाई बंद कर देनी चाहिए। प्रारम्भिक माहो में ऊपर से सिंचाई (overhead irrigation) करना चाहिए। बाद में खेत में पानी भरकर (flood imigation) सिंचाई करना चाहिए।


उर्वरक 

अच्छी उपजाऊ मृदा वाले क्षेत्रों में उर्वरकों की आवश्यकता नहीं होती है परन्तु कम उर्वरता बाली मृदा में NP, O KO की क्रमशः 60 कि. ग्रा.. 22.5 कि.ग्रा. तथा 22.5 कि.ग्रा. मात्रा दी जा सकती है। नत्रजन उर्वरक को दो से तीन विभाजित खुराकों (split doses) में देना चाहिए।


छंटाई


रोपण के 4-5 माह पश्चात जमीन की सतह से 20-30 से.मी. ऊपर खस के पौधे की प्रथम छंटाई (trimming) करनी चाहिए। दूसरी बार रोपण के द्वितीय वर्ष में पौधे में पुष्पन के ठीक पहले पुनः छंटाई करनी चाहिए। अंतिम बार द्वितीय वर्ष मे ही अक्टूबर-नवम्बर माह में जड़ो की खुदाई से एक माह पूर्व छंटाई करनी चाहिए।


कीट-रोग नियन्त्रण


वैसे तो खस के पौधे में कीटो अथवा रोगो का प्रकोप कम ही देखा गया है परन्तु फिर भी कीट नियन्त्रण खेत मे अन्तिम जुताई के पूर्व 5 टन प्रति हेक्टेयर नीम खली डाली जा सकती है। बाद में कीट प्रकोप पाये जाने पर 5% नीम तेल का पौधों पर छिड़काव किया जा सकता है। दीमक के प्रकोप वाले क्षेत्रों में दीमक नियन्त्रण हेतु Hexachlorobenzene का प्रयोग अनुशंसित है। साथ ही बढ़त काल (growing period) की समाप्ति पर खस के पौधो को जमीन की सतह से 3 से. मी. ऊपर से काट देना चाहिए।


रोगो का प्रकोप पाये जाने पर Copper oxychloride 0.3% का दो-तीन बार छिड़काव किया जा सकता है।


फसल की कटाई 


रोपण के 15 से 24 माह पश्चात दिसम्बर से फरवरी के मध्य जड़ो की खुदाई की जा सकती है। परन्तु 18 से 24 माह के पश्चात विदोहित जड़ो से प्राप्त तेल सर्वोत्कृष्ट गुणवत्ता का होता है। फरवरी के पश्चात खुदाई करने पर तेल की मात्रा में कमी आ जाती है। जड़ो की खुदाई हाथ से (manually) अथवा यांत्रिक तरीके से (mechanically) की जा सकती है। यांत्रिक विदोहन हेत single blade mould board plough अथवा disc plough का प्रयोग किया जा सकता है। जड़ो को जमीन के 20-25 से भी नीचे तक खोदा जाता है। जड़ों की खुदाई के पूर्व अक्टूबर-नवम्बर में खस के बीजों का संग्रहण किया जा सकता है।


विदोहनोत्तर प्रबन्धन


खुदाई के पश्चात जड़ो को तने से अलग करने के पश्चात अच्छी तरह धो लेना चाहिए ताकि उनसे लगी मिट्टी तथा अन्य अपद्रव्य साफ हो जायें। इसके बाद उन्हें 5-10 से.मी. लम्बे छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लेते हैं, ताकि वे आसानी से सूख सकें। इन्हे छाया मे ही सुखाना चाहिए। सुखाने के लिए जमीन पर कोई कपडा अथवा प्लास्टिक शीट बिछा कर उस पर जड़ों के टुकड़ो को पतला-पतला फैला देते है। एक-दो दिन में ये जड़े सूख जाती है। सूखी जड़ो को कुछ माह तक रखने के पश्चात उनका तेल निकालने से तेल मे अच्छी सुगंध आती है। वाष्प आसवन से तेल निकाला जा सकता है. जिसमे लगभग 24 घंटे का समय लगता है। तेल को छान कर 20 ग्राम/लिटर anhydrous Na, So, अथवा Nact के घोल से उपचारित किया जाता है। तत्पश्चात इस तेल को काँच की बोतलो, स्टेनलेस स्टील अथवा अल्यूमिनियम के पात्रों में रखकर सूखे तडे स्थान पर भण्डारित किया जाता है।


उपज और खस की किस्में


प्रति हेक्टेयर 400 650 कि.ग्रा. बीज तथा 3-4 टन जड़े प्राप्त होती है जिनसे 10-30 किं. ग्रा. तेल प्राप्त होता है। सूखी जड़ो मे 05-30% (औसतन 1%) तेल प्राप्त होता है। उत्तर भारतीय किस्मो की तुलना में दक्षिण भारतीय किस्मों में तेल की मात्रा अधिक होती है।


खस की कुछ किस्मों में बीज नहीं आते है। खस की वाणिज्यिक खेती के लिए ज्यादातर बीज रहित किस्मों का प्रयोग किया जाता है। बीज रहित किस्मों का प्रवर्धन स्लिप्स के माध्यम से ही होता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा पूसा हाइब्रिड-7 तथा हाईब्रिड-8 किस्मे विकसित की कई है। केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पादप संस्थान (CIMAP) द्वारा भी के.एस.-1 तथा 2. सुगंधी, केसरी, गुलाबी, धारिणी, इत्यादि उन्नत किस्मे विकसित की गई है। इनमें से तेल उत्पादन की दृष्टि से धारिणी (39 कि.ग्रा./हे.). केशरी (30 कि.ग्रा./हे.) तथा गुलाबी (25-30 कि.ग्रा./हे.) अच्छी किस्में हैं।


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