मंगलवार, 17 जुलाई 2018

जल [water] :: लोक सृष्टि का उपादान

पंच महाभूतों में एक जल भी हैं। जल ही लोक सृष्टि का उपादान हैं।जो जल हमें दिखाई पड़ता हैं वह अपने आप में महत्वपूर्ण हैं। एक यौगिक हैं। प्रथ्वी भी पानी का ही एक रूपांतर हैं।पानी में वायु प्रवेश करके घनीभूत होता हुआ कालांतर में मिट्टी रूप में बदलता हैं।


  • अंतरिक्ष में भी प्राणात्मक पानी का ही साम्राज्य हैं।चंद्रमा भी पानी का ही विरल अवस्था रूप सोम का ही रूपान्तर हैं।जल पिंड हैं।

मृत्यु के देवता
 महाकाल

अंतरिक्ष का जल ही भिन्न- भिन्न लोकों के बीच सूत्र संबंध बनाए रखता हैं।जैसे हमारे तीन चौथाई जल है, वैसे ही पृथ्वी, चंद्रमा आदि पिंडो में भी तीन चौथाई जल होता हैं।सभी जड़ और चेतन भी इसी जल के कारण एक दूसरे से जुड़े रहते हैं।जल में संग्रह करने की एक विशिष्ट शक्ति होती हैं। 

यह सभी ध्वनि तरंगों का संग्रह करता हैं।उसका परिवहन भी करता हैं।हम चाहें हरिद्वार या बनारस में गंगा स्नान करे, गौ मुख से गंगासागर की अनुभूति हो सकती हैं।लोगो के स्नान करने की, धोबी घाटो की,पूजा आरतियों की ध्वनियों पकड़ में आ सकती हैं।प्रत्येक डुबकी में अलग धरातल का अनुभव हो सकता हैं।

हमारे  शब्दों का स्पंदन भी जल ग्रहण करता हैं।उसी के अनुरूप उसकी प्रतिक्रिया भी अनुभूत होती हैं।स्नान करते समय वह जल हमें पवित्र तो करेगा ही, गोमुख से गंगासागर तक जोड़े रखेगा।हमारे अर्ध्य को देवता तक पँहुचायेगा।उसी के अनुरुप शरीर के जल मे (रक्त मे) परिवर्तन आता जायेगा।

एक आसान प्रयोग से सिद्ध कर सकते हैं कि ध्वनि के स्पंदन जल को कैसे प्रभावित करते हैं।

दो बोतलों में साफ पानी भरकर ढक्कन लगा ले।दोनों को अलग अलग कक्ष में रखें।एक बोतल के सामने नित्य सुबह शाम प्रार्थना करें,जैसे अपने आराध्य की पूजा करते है।अच्छे वचन बोले।दूसरी बोतल के समक्ष नित्य अपशब्द बोलें।आप देखेंगे कि कुछ दिन बाद जिस बोतल के समक्ष प्रार्थना की, अच्छी बातें की उसके पानी का रंग बदलकर पीला केसरिया सा हो गया हैं।उसमे हल्की खुशबू भी आने लगी।दूसरी तरफ, जिस बोतल के समक्ष अपशब्द बोलें गये उसके पानी का रंग गन्दा सा मटमैला प्रतीत होने लगा।उस पानी में बदबू भी महसूस होगी।

हमारे शरीर की रचना में भी सत्तर प्रतिशत पानी हैं।ध्वनि के स्पंदन के प्रभाव से हमारा शरीर कैसे अछूता रह सकता हैं।प्राणमय कोश, मनोमय कोश, और अंततः आत्मा भी प्रभावित होती हैं।नकारात्मक स्पंदनों का प्रभाव असाध्य रोगों के रूप में परिलक्षित होता हैं।


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# अग्नि-सोम से सृष्टि ::::


पृथ्वी के जल को मर,चन्द्रमा के जल को श्रद्धा, सूर्य के जल को मरीचि, परमेष्ठी के जल को आप:तथा अंतरिक्ष के जल को अम्भस कहते हैं।वास्तव में जल की घन, तरल,विरल अवस्थाये हैं।हमारी सम्पूर्ण सृष्टि ही अग्नि और सोम(जल का ही रूप) से बनी हुई हैं।अग्नि में सोम की आहुति का नाम ही यज्ञ हैं।सोम जल जाता हैं, अग्नि शेष रहता हैं।हमारा सम्पूर्ण जीवन भी इसी प्रकार यज्ञ रूप आगे बढ़ता हैं।चन्द्रमा मन का स्वामी हैं।मन ही कामनाओं का केन्द्र हैं।मन की कामनाये प्राणों में हलचल पैदा करती हैं।प्राणों को ही देवता कहते हैं।वाक् अग्नि रुप बनती हैं।अतः सृष्टि में जो कुछ दृष्टिग़ोचर होता हैं,वह सारा निर्माण अग्नि रूप हैं।सूर्य भी अग्नि पिंड हैं,किंतु उसका पोषण अंतरिक्ष का जल ही (सोम) करता हैं।

सूर्य भी परमेष्ठी की परिकृमा करता है।एक परिक्रमा 25000 साल मे पूरी होती हैं।परमेष्ठी भी स्वंयभू मंड़ल की परिक्रमा करता हैं।इस व्यवस्था से तीन अग्नियों (अग्नि पिंडो) के मध्य दो सोम लोक बने रहते हैं।इन्हीं के कारण अग्नि का स्वरूप प्रतिष्टित रहता हैं।

सोम और जल दोनों ही अग्नि द्वारा भोग्य हैं।भोग्य पदार्थ को अन्न कहते हैं।भोक्ता अग्नि हैं।वर्षा का जल भोग्य हैं।पृथ्वी की अग्नि भोक्ता हैं।जो अन्न पैदा हुआ, वह भोग्य होगा, उसे खाने वाला शरीर भोक्ता होगा।शरीर में सप्त धातुओं का निर्माण होगा।अंतिम धातु शुक्र और रज भी क्रमश :सोम ओर अग्नि रूप होंगे।प्रकृति मे स्त्री को भले ही सौम्य बताकर भोग्या कहते हो।व्यहवार मे शुक्र रूप सोम ही रज रूप अग्नि में आहूत होता हैं।उसी से सृष्टि यज्ञ आगे बढ़ता है।जो निर्माण (सन्तान)  होगा, अग्नि रूप होगा।
                                      (साभार :: गुलाब कोठारी जी )








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