रविवार, 19 मार्च 2017

प्रदूषित होती नदिया(River) कही सभ्यताओं के अंत का संकेत तो नही


विश्व की तमाम सभ्यताएँ नदियों के किनारें पल्लवित हुई हैं,चाहे मेसोपोटोमिया हो या हड़प्पा यदि नदिया नही होती तो न ये सभ्यताएँ होती और ना ही प्रथ्वी पर जीवन,आज भी  नील,अमेजान,गंगा,यमुना ,   नर्मदा,कृष्णा,कावेरी,गोदावरी,ब्रम्हपुत्र,क्षिप्रा,प्रणहिता,बेनगंगा जैसी नदिया मानव सभ्यताओं को विकसित करनें में अपना अमूल्य योददान दे रही है.


भारत में नदियों की महत्ता ने इन नदियों को माता के समान पूजनीय बनाया हैं,और इनकी स्तुति कई प्रकार के श्लोकों के साथ की गई हैं.

कही गंगे हर के उद्घघोष के साथ तो कही नमामि देवी नर्मदें त्वदीय पाद पंकजम् के साथ यह बतानें का प्रयत्न किया गया हैं,कि नदियों का हमारें जीवन में माँ के समान महत्व हैं.
नदी
 प्रदूषित नदी
नदियों के किनारें लगनें वालें कुम्भ मेलों एँव इनके किनारें अवस्थित तीर्थों के माध्यम से भी यही कल्पना की गई हैं,कि व्यक्ति जीवन में कम से कम एक बार इन तीर्थों एँव मेलों में जाकर इन माँ समान नदियों का हालचाल जान लें कि क्या इनका जल वास्तव में आनें वाली पीढ़ी के जीवन की संभावना को बढ़ानें वाला हैं.

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होली पर्व स्वास्थ्य का पर्व

बाघ बचायें जंगल



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यदि हम नदियों के प्रदूषण की बात करें तो आंकड़े बहुत ही भयावह तस्वीर प्रस्तुत करतें हैं,यदि स्थिति यही रही तो कुछ शताब्दियों में मानव भी अन्य जंतुओं के समान इस प्रथ्वी से विलुप्त हो जायें तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी.

नदियों के प्रदूषित होनें का सबसे बड़ा कारण मानव मल मूत्र का इन नदियों में विसर्जन हैं,लगभग 80% नदिया इनमें मिलनें वाले सीवेज की वज़ह से गन्दे नालें में बदल गई हैं,और ये नदिया बहुत पूजनीय मानी गई हैं,इनमें शामिल हैं,गंगा,यमुना,क्षिप्रा,नर्मदा आदि.

केन्द्रीय प्रदूषण नियत्रंण बोर्ड़ के अनुसार भारत की लगभग सभी नदियों में घुलनशील आक्सीजन [DO] की मात्रा तय सीमा से काफी कम होती जा रही हैं,जैसे यमुना में यह 0 से 3 mg/litre तक तो गंगा में 0 से 15.5mg/L हैं.जबकि नियमानुसार इसका स्तर 20 mg/L होना आवश्यक हैं,तभी पानी मे जलीय जीव जन्तु जीवित रह सकतें हैं.

Dissolved oxygen की कमी से पानी में बेक्टेरिया अधिक पनपते हैं और पानी गर्म हो जाता हैं.

घुलनशील आक्सीजन कम होनें का एक प्रमुख कारण औघोगिक अपशिष्ट,सीवेज और खेती में प्रयोग किये जानें वाले जहरीले रासायनिक पदार्थ हैं.

जल प्रबंधन के बारें में विस्तारपूर्वक जानियें

BOD (Biochemical oxygen demand) भी भारत की नदियों में काफी ख़तरनाक स्तर पर पँहुच गया हैं,इसका तय स्तर 3 mg/L माना गया हैं,जबकि यह भारत की सभी नदियों में 9 से 97 mg/L पाया गया हैं,

यह स्तर इन नदियों के जल को हाथ लगानें के भी खिलाफ हैं,यदि इस BOD स्तर वालें जल को खेती के कार्यों में उपयोग कर लिया जावें,तो जमीन बंजर होनें के साथ इससे पैदा होनें वाली फसलें खानें वाला व्यक्ति कैंसर, मस्तिष्क संबधित बीमारीयों,त्वचा संबधित बीमारियों,अस्थमा, से ग्रसित हो जाता हैं.

भारत में बहनें वाली प्रमुख नदियों जैसें गंगा,यमुना,खान,क्षिप्रा ,चम्बल के किनारें की औघोगिक ईकाईयाँ इतना जहरीला अपशिष्ट इन नदियों में में छोड़ रही हैं,कि इन नदियों का पानी पीनें वालें दुधारू पशुओं का दूध भी लेड़,आर्सेनिक,अमोनिया,जैसे ख़तरनाक तत्वों से संक्रमित पाया गया हैं.

एक अन्य महत्वपूर्ण स्तर टोट़ल कोलिफार्म की बात करें तो इसमें भी भारतीय नदिया ख़री नही उतरती इन नदियों में यह स्तर 500mpn/100 ml जल होना आवश्यक हैं,परन्तु यमुना,गंगा,कावेरी,चम्बल समेत तमाम नदियों में यह 5000 से 43000 mpn/100ml पाया गया हैं.इसी कोलिफार्म की वज़ह से जलजनित बीमारियाँ डायरिया,पेचिस,पीलीया,टायफाइड़ ,पेट़ संबधित बीमारीयाँ भारत में सर्वाधिक हैं.और सरकार प्रतिवर्ष करोड़ों रूपये इन बीमारीयों को नियत्रिंत करनें में ही खर्च कर देती हैं,जो धन के साथ के साथ मानव कार्यदिवसों का क्षरण करती हैं.

अमोनिया (NH3) मान्य स्तर नदियों के जल में 1.2mg/l होना चाहियें. इस मापदंड पर भारत की एक दो नदियों को छोड़कर कोई खरी नही उतरती जो नदिया इस मापदंड़ पर खरी उतरती हैं,इसका मूल कारण इन नदियों का बारहमासी बहाव नही होना और छोटे क्षेत्रफल पर बहना हैं.अन्यथा गंगा,यमुना,ब्रम्हपुत्र जैसी प्रमुख नदियों में यह स्तर 24.7mg/l तक हैं.

परिस्थितियाँ और आंकड़े गवाही खुद बयान कर रहें कि यदि अब नदियों को पुनर्जीवित नही किया गया तो हिरोशिमा नागाशाकी से भी बद्तर स्थिति में भारतीय सभ्यता पँहुच जायेगी,जिसका दोष सिर्फ और सिर्फ हमारा रहेगा.

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